Wednesday, December 22, 2010

कांच की बरनी और दो कप चाय


जीवन में जब सबकुछ जल्दी-२ करने की इच्छा होने लगती है। सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है..और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ने लगे हैं...उस समय ये बोध कथा "कांच की बरनी और दो कप चाय " याद आती है-
दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज उन्हें जिन्दगी का एक ख़ूबसूरत पाठ पढ़ाने जा रहे हैं। उन्होंने अपने साथ ली एक कांच की बरनी (जार) टेबल पे रखी और उसमे टेनिस की गेंद तब तक डालते रहे जब तक उस जार में एक भी गेंद के समा सकने की जगह नहीं बची। फिर उन्होंने छात्रों से पूछा की क्या बरनी भर गई?
आवाज आई- हाँ!!
फिर प्रोफ़ेसर साहब ने कुछ छोटे-२ कंकर उस बरनी में भरने शुरू किये...और वे कंकर भी बरनी में जहाँ-जहाँ जगह थी वहां समा गए। प्रो. साहब ने फिर पुछा क्या बरनी भर गई?
छात्रों की आवाज आई- हाँ!!
अब प्रो.साहब ने उस बरनी में रेत भरना शुरू किया...और देखते ही देखते वो रेत भी उस बरनी में समा गई, अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे। प्रो.साहब ने फिर पुछा-अब तो बरनी भर गई ना?
इस बार सारे छात्रों की एक स्वर में आवाज आई- हाँ अब भर गई!!
प्रो.साहब ने टेबल के नीचे से २ कप निकालकर उसमे स्थित चाय को बरनी में उड़ेल दिया..बरनी में वो चाय भी जगह पा गई....
विद्यार्थी भौचक्के से देखते रहे!!!
अब प्रो.साहब ने समझाना शुरू किया- "इस कांच की बरनी को तुम अपनी जिन्दगी समझो...टेनिस की गेंदे सबसे महत्त्वपूर्ण भाग मतलब भगवान, परिवार, रिश्ते-नाते, स्वास्थ्य, मित्र, शौक वगैरा। छोटे कंकर मतलब नौकरी, कार, बड़ा मकान या अन्य विलासिता का सामान...और रेत का मतलब और भी छोटी-मोटी बेकार सी बातें, झगडे, मन-मुटाव वगैरा।
अब यदि तुमने रेत को पहले जार में भर दिया तो उसमे टेनिस की गेंद और कंकरों के लिए जगह नहीं रह जाती, यदि पहले कंकर ही कंकर भर दिए होते तो गेंदों के लिए जगह नहीं बचती, हाँ सिर्फ रेत जरुर भरी जा सकती।
ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है यदि तुम छोटी-२ बातों के पीछे पड़े रहोगे और अपनी उर्जा और समय उसमे नष्ट करोगे तो जीवन की मुख्य बातों के लिए जगह नहीं रह जाती। मन के सुख के लिए क्या जरुरी है ये तुम्हे तय करना है।
धर्म-अध्यात्म में समय दो, परिवार के साथ वक़्त बिताओ, व्यसन मुक्त रहकर स्वास्थ्य पर ध्यान दो कहने का मतलब टेनिस की गेंदों की परवाह करो। बाकि सब तो रेत और कंकर हैं....
इसी बीच एक छात्र खड़ा हो बोला की सर लेकिन आपने ये नहीं बताया कि 'चाय के दो कप क्या हैं?'
प्रोफ़ेसर मुस्कुराये और बोले मैं सोच ही रहा था कि किसी ने अब तक ये प्रश्न क्यूँ नहीं पूछा.....इसका उत्तर ये है कि जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट क्यूँ ना लगे लेकिन अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा बचा कर रखना चाहिए.........
क्यूंकि आगे बढ़ने की चाह में करीबी रिश्तों को भुला देना समझदारी नहीं है...करीबी मित्र के साथ बिताये चंद लम्हों का सुख इस चराचर जगत का उत्तम आनंद है...इस आनंद के लिए वक़्त बचाए रखिये................

Tuesday, December 21, 2010

इक्कीसवी सदी का पहला दशक और बालीवुड


२०१० के ख़त्म होने के साथ ही इक्कीसवी सदी का पहला दशक हमसे विदा हो जाएगा। यूँ तो गुजरा वक़्त दोबारा लौट के नहीं आता लेकिन उस गुजिश्ता दौर से हम कई चीजें सीखकर आने वाले कल में नए ढंग से कदम रख सकते हैं...गोयाकि आत्ममंथन नयी संभावनाओं के निर्माण में सहायक साबित होता है...बहरहाल

बात यहाँ हिंदी सिनेमा के सन्दर्भ में करना है...बीते कई दशकों की तरह इस दशक में भी हमारे हिंदी सिनेमा की सफलता का प्रतिशत तकरीबन पांच ही रहा। लेकिन यही पांच प्रतिशत कामयाबी नए लोगों और विभिन्न कार्पोरेट सेक्टर्स को फिल्म निर्माण के लिए ललचा रही है... और इसके चलते ही आज तकरीबन १०० वर्ष बाद भी भारतीय सिनेमा अपनी खास पहचान बनाये हुए है।

बीते दशक पे गौर किया जाय तो इस दशक में हम एक नए तरह के सिनेमा से रूबरू हुए, जो न तो पारम्परिक व्यावसायिक सिनेमा है नाही ये सामानांतर सिनेमा की तर्ज का है...ये अपने ही तरह का नया सिनेमा है जिसे विशेषज्ञ न्यूएज्ड सिनेमा कहते हैं। ये सिनेमा भी आज की युवा पीढ़ी की तरह सीधी-सपाट, खुली बातें करने वाला असल मानवीय चित्रण करता है...जहाँ मानव को उसकी खूबियों और कमजोरियों के साथ-साथ प्रस्तुत किया जाता है। इन फिल्मों के निर्देशक भी आज की पीढ़ी के ही है जो युवामन और आज के हालातों से भली भांति परिचित हैं। फरहान अख्तर, इम्तियाज अली, अब्बास टायरवाला, अयान मुखर्जी, कुनाल कोहली इसी श्रेणी के चर्चित नाम हैं।

बीते दशक में मल्टीप्लेक्स संस्कृति के फलने-फूलने के कारण नए विषयों पर बनी कम बजट वाली फिल्मो को भी दर्शक नसीब हुए...और इन फिल्मों को विश्व स्तर पर सराहना मिली। खोसला का घोसला, भेजा फ्राई, देव डी, उडान, इकबाल जैसी फिल्मो ने मुख्य धारा के सिनेमा को चुनौती दी। फलतः बड़े बैनर और निर्देशकों ने इस तरह की फिल्मों में अपने हाथ आजमाए।

लेकिन इन कुछ फिल्मो की कामयाबीयों को छोड़ दे और सांगोपांग आकलन करे तो इस दशक में भी हमारा सिनेमा हमेशा की तरह चुनिन्दा सितारों के इर्द-गिर्द घूमता रहा। जिस कारण अच्छे लेखको और निर्देशकों को सितारा केन्द्रित होकर काम करना पड़ा। सीमित प्रतिभा द्वारा संचालित इस उद्योग ने नयी संभावनाओं को पनपने का अवसर नहीं दिया। इस कारण जमकर पिष्टपेषण हुआ मतलब पुरानी फिल्मों के रीमेक बने और सफल व्यावसायिक सिनेमा को फार्मूले की तरह प्रयोग कर सीक्वल बनाये गए। नए विषयों को अकाल बना रहा। धूम, हेरा-फेरी, गोलमाल इसी का नतीजा रही। इस श्रृंखला में 'मुन्ना भाई सीरिज' अपवाद रही। जो सीक्वल होते हुए भी उम्दा अभिव्यक्ति थी और दोनों फिल्मे गुणवत्तापरक थी।

सुभाष घई, राजकुमार संतोषी, डेविड धवन, महेश भट्ट जैसे निर्देशकों की जगह नए निर्देशकों ने अपने कदम जमाये। लगान, ब्लेक, दिल चाहता है, रंग दे बसंती, ३ इडियट्स जैसी फिल्मों से आशुतोष गोवारिकर, संजय लीला भंसाली, राजकुमार हिरानी, राकेश ओमप्रकाश मेहरा को ख्याति मिली। संगीतकारों में भी प्रीतम, सलीम-सुलेमान, विशाल-शेखर, साजिद-वाजिद ने अपना खास मुकाम बनाया। विभिन्न म्युजिक रियलिटी शो के जरिये गायकी में भी नयी प्रतिभाओ को अवसर मिले, जिससे उन्होंने भी बालीवुड के इस समंदर में खुद को स्थापित किया...सुनिधि चौहान, श्रेया घोषाल को सितारा हैसियत मिली।

शाहरुख़ खान, सलमान, अक्षय कुमार, अजय देवगन, हृतिक रोशन बुलंदियों पे रहे..लेकिन यदि दशक का सुपरस्टार चुनने की बात हो तो निर्विवाद रूप से आमिर खान श्रेष्ठ साबित होंगे...जिन्होंने लगान, रंग दे बसंती, तारे ज़मीन पर, दिल चाहता है, फ़ना, गजनी, ३ इडियट्स जैसे नगीने इंडस्ट्री को दिए, बस 'मंगल पांडे' इस दशक का उनके लिए हादसा रहा। संजय दत्त, अनिल कपूर लगातार तीसरे दशक में अपनी जगह बचाए रखने में सफल हुए।

भले ही नए निर्देशकों, लेखकों, संगीतकारों, गायकों का आगाज हुआ पर प्रतिष्ठित नाम भी अपनी उपस्थित दर्ज कराते रहे, और अपनी प्रतिष्ठा को बनाये रखा। यश चोपड़ा, श्याम बेनेगल, मणिरत्नम, सूरज बडजात्या, राम गोपाल वर्मा ने क्रमशः वीरजारा, जुबैदा, गुरु, विवाह, सरकार जैसी फिल्मों से खुद को मुख्य धारा में जोड़े रखा। तो वही a.r. रहमान, शंकर-अहसान-लॉय, उदित नारायण, सोनू निगम, लता मंगेशकर, अलका याग्निक जैसी हस्तियाँ अपनी मुस्तैदी के साथ बने रहे।

इस बीच अनुराग कश्यप, अनुराग बासु, मधुर भंडारकर जैसे फिल्मकारों ने लीग से हटकर फिल्म निर्माण कर तारीफें बटोरी...इनकी बनाई ब्लेक-फ्राईडे, मेट्रो, पेज ३ जैसी फिल्मो को काफी सराहना मिली। कई बी ग्रेड फिल्मे भी इस दरमियाँ आई जो अश्लीलता से लबरेज थी और उन्होंने मुख्यधारा के सिनेमा में आने की भरसक कोशिशें भी की। मर्डर, ख्वाहिश, शीशा जैसी कुछेक फिल्मे कमाई भी करने में सफल रही..पर बाद में इन पर ब्रेक लग गया, अब यदि ये बनती भी हैं तो मुख्य धारा से अलग रहकर इनका एक खास लक्षित दर्शक वर्ग होता है। इमरान हाशमी इस तरह की फिल्मो से सितारा बने। इस दशक की हास्य फिल्मो का जिम्मा प्रियदर्शन, अनीस बाजमी जैसे निर्देशकों ने संभाला। परेश रावल, राजपाल यादव, बोमन ईरानी प्रमुख चरित्र अभिनेता बनकर उभरे।

हमेशा की तरह महिला केन्द्रित फिल्मे न के बराबर बनी..लेकिन पुरुष केन्द्रित फिल्मों में नारी की छवि सशक्तता से प्रस्तुत हुई..जिससे बोल्ड होती नारी की महत्वकांक्षाएं खुलकर सामने आई। पिंजर, चमेली, लज्जा, फैशन, सलाम नमस्ते, पेज ३, जब वी मेट, लव आजकल जैसी फिल्मो में नारी अपने अधिकारों के लिए सजग नजर आई। आतंकवाद, नक्सल समस्या, समलैंगिकता, किसान आत्महत्या जैसे विषयों को लेकर फिल्म निर्माण हुआ। अ वेडनेसडे, मुंबई मेरी जान, आमिर, रक्तचरित्र, पीपली लाइव सफल रही।

कई कम बजट की अनापेक्षित फिल्मे सफल रही तो दूसरी ओर कई बड़े निर्देशकों की स्टारकास्ट से सजी महंगी फिल्मे औंधे मूंह गिरी। हालिया रिलीज काइट्स, खेलें हम जी जान से, रावण समेत मंगल पांडे, सांवरिया, रामू की आग, चांदनी चौक २ चाइना, पहेली, बिल्लू, कैश, लन्दन ड्रीम्स, ब्लू जैसी फिल्मे बुरी तरह फ्लॉप हुई...ये लिस्ट बहुत लम्बी है।

खैर, दस वर्षों के सिनेमा जगत पे महज एक लेख के जरिये कुछ नहीं कहा जा सकता। ये तो बस एक सरसरी निगाह दौड़ाने का प्रयास भर था। बस अब आने वाले वर्षों में हमारे सिनेमा से कुछ उम्दा, सार्थक, मनोरंजक फिल्मों की आशा रहेगी। क्योंकि ये सिनेमा हमारे लिए महज मनोरंजन का जरिया नहीं बल्कि हमारे समाज का दर्पण भी है। अंत में इन दस वर्षों की श्रेष्ठ फिल्मों के नाम याद कर विराम लूँगा.. ये श्रेष्ठ फिल्मे मेरी व्यक्तिगत पसंद पे आधारित है इन्हें विशेषज्ञों के मापदंडो पर न तौले-
लगान, दिल चाहता है, कोई मिल गया, मुन्नाभाई m.b.b.s., स्वदेश, रंग दे बसंती, जब वी मेट, तारे जमीन पर, नमस्ते लन्दन, ३ इडियट्स........................


(दैनिक पत्र 'राज एक्सप्रेस' एवं मासिक पत्रिका 'विहान' व 'सूचना साक्षी' में प्रकाशित)

Thursday, December 16, 2010

दर्द जो उभरा है अभी अभी ..जिसको समझा है अभी अभी!!!!

तू होगा समंदर -इ -इश्क किसी और के लिए फ़राज़ ..
हम तो रोज़ तेरे 'साहिल ' से प्यासे गुज़र जाते हैं !!
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वापसी का सफ़र अब मुमकिन ना होगा “फ़राज़ ”
हम तो निकल चुके हैं आँख से आंसू की तरह !
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यारों की वफाओं का भरोसा किया मैंने ..
फुल्लों मैं छुपाया हुवा खंजर नहीं देखा !!
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इन्हीं रास्तों ने जिन पर कभी तुम थे साथ मेरे ..
मुझे रोक रोक के पूछा तेरा हमसफ़र कहाँ है ??"
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वफ़ा की लाज मैं उसको मना लेता तो अछा था ..
दिल की जंग मैं अक्सर जुदाई जीत जाती है !!
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मैं कभी ना मुस्कुराता जो मुझे ये इल्म होता ..
के हजारों ग़म मिलेंगे मुझे इक ख़ुशी से पहले !!
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वो जिस के नाम की निस्बत से रौशन था वजूद ..
खटक रहा है वही आफताब आँखों में !!
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वो रोज़ परिंदों की मिसाल देता है फ़राज़ ..
साफ़ नहीं कहता मेरा शेहेर छोड़ दे !!
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अनजान बन कर मुझसे पूछते है के कैसे हो ,
के मुझे जानता नहीं के मैं तुझी में रहता हूँ ..
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निकाल दे फ़राज़ दिल से ख्याल उस का . .
यादें किसी की तकदीर बदला नहीं करती !!
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दिल की बस्ती भी अजीब बस्ती है ..
लूटने वाले को तरसती है !!
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इस तरह गौर से मत देख मेरे हाथ ऐ फ़राज़ ..
इन लकीरों मैं हसरतों के सिवा कुछ भी नहीं !!
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मुझे भी शौक़ हुवा मोहब्बत का
अघाज़ -इ -मुहब्बत मैं ही जान गिरवी रखनी पड़ी .......
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अक्ल हर बार दिखाती थी जले हाथ अपने ..
दिल ने हर बार कहा आग पराई ले ले !!
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मुझे तिष्ना.. लबों की याद मे पीने नहीं देती
उठाता जा रहा हूँ .. टूटता जाता है पैमाना ..!!
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शाम होते ही शमा को बुझा देता हूँ ..
इक दिल ही काफी है तेरी याद मैं जलने के लिए !!
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खैरात मैं मिली ख़ुशी मुझे अच्छी नहीं लगती ..
मैं अपने ग़ममें रहता हूँ नवाबो की तरह !!
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फ़राज़ ' अपने सिवा है कौन तेरा ..
तुझे तुझ से जुदा देखा ना जाए !!
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मैं खुद को भूल चुका था मगर जहावाले ..
उदास छोड़ गए आईना दिखाके मुझे !!
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किस तरह उसको मई दरिया की रवानी कर दूं ..
बर्फ है और वो पिघलना भी नहीं चाहता है !!
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तेरे दस्त -इ -सितम का अज्ज़ नही ..
दिल ही काफिर था जिस ने आह ना की !!
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इसी में इश्क की किस्मत बदल भी सकती थी ..
जो वक़्त बीत गया मुझ को आज़माने में !!
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निजाम इस मैकदे का इस कदर बिगड़ा है ऐ साकी ..
उसी को जाम मिलता है जिसे पीना नहीं आता !!
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दिल भी इक जिद पे अड्डा है किसी बचे की तरह
या तो सब कुछ चाहिए , या फिर कुछ भी नहीं .
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वोह दिल का हमसफ़र है येही पहचान है उसकी ..
जहाँ से भी गुज़रता है सलीका छोड़ जाता है ! !
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हम ना बदलेंगे वक़्त की रफ़्तार के साथ फ़राज़ ..
हम जब भी मिलेंगे अंदाज़ पुराना होगा !!
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तुम तक़ल्लुफ़ को भी इखलास समझते हो 'फ़राज़ '..
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलानेवाला !!
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तू भी दिल को इक लहू की बूंद समझा है 'फ़राज़ '..
आँख गर होती तो कतरे में समंदर देखता !!
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नर्म जज़्बात , भली बातें , मोहज्ज़ाब लहजे ..
पहली बारिश में ही यह रंग उतर जाते हैं !!
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कल ख़ुशी थी दामन में , आज सिर्फ दर्द है उनका
वो भी था करम उनका , ये भी है करम उनका
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ये जो रात दिन की हैं गर्दिशें , यह जो रोज़ -ओ -शब् के हैं सिलसिले
हैं अज़ल से उन के नसीब मैं .. वही दूरियां वही फासले ..
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तो ये तय है के अब उम्र भर नहीं मिलना
तो फिर ये उम्र ही क्यूँ .. गर तुझ से नहीं मिलना !!
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किसी बेवफा की खातिर ये जनून फ़राज़ कब तक
जो तुम्हें भुला चूका है उसे तुम भी भूल जाओ
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थी खबर गर्म के ग़ालिब के उड़ेंगे तुकडे
देखने हम भी गए .. पर तमाशा ना हुआ !!
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मसरूफियत ये मेरी गर तुझसे नहीं , तोह जाया है ..
गम हुआ है तुझमे जो उस्सने खुदा को पाया है !!
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बंदिशें हम को किसी हाल गवारा ही नहीं ..
हम तो वो लोग हैं दीवार को दर करते हैं !
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रोने से और इश्क में बे -बाक हो गए ..
धोये गए हम ऐसे की बस पाक हो गए
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ग़ालिब ना कर हुज़ूर में तू बार -बार अर्ज़ ..
ज़ाहिर है तेरा हाल सब उन पर कहे बग़ैर !!
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भटके हुए फिरते हैं कई लफ्ज़ जो दिल मैं ..
दुनिया ने दिया वक़्त तो लिक्खेंगे किसी दिन !!
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जो तुम बोलो बिखर जायें , जो तुम चाहो संवर जायें ..
मगर यूं टूटना जुड़ना बुहत तकलीफ देता है
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कुछ ऐसे हादसे भी ज़िन्दगी में होते हैं 'फ़राज़ '..
के इंसान बच तो जाता है मगर जिंदा नहीं रहता !!
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साभार गृहीत

Monday, December 13, 2010

२०११ क्रिकेट विश्वकप और टीम इंडिया की सम्भावनाओं का संसार


टेस्ट क्रिकेट में नम्बर १ और वनडे क्रिकेट में दूसरे पायदान पे विराजी टीम इण्डिया पूरे जोश और जज्बे के साथ वर्ष २०११ में प्रवेश कर रही है...जहाँ उसे विश्वकप जैसी बड़ी अग्निपरीक्षा से गुजरना है। हालिया आंकड़ो और प्रदर्शन को यदि देखा जाये तो लगता है कि ये टीम इण्डिया २४ साल के वनडे विश्वकप के सूखे को दूर करने का माद्दा रखती है।

ऐसा पहली बार हुआ है कि एक ही स्तर की समान क्षमताओं वाली दो टीमे हमारे पास है। अब हमारे पास कप्तानी का विकल्प है, विकेट कीपिंग का विकल्प है, बल्लेबाजी-गेंदबाजी, ओपनर्स, मिडिल ऑर्डर्स हर चीज के विकल्प है। अब हमारे क्षेत्ररक्षक कैच नहीं टपकाते, नाही हमारे बल्लेबाज शुरूआती झटकों के बाद लड़खड़ाते हैं। इस टीम की ताकत अब महज १-२ खिलाडी नहीं, बल्कि पूरी एकादश अब बहुत कुछ कर गुजरने को बेताब रहती है, तो वही टीम से बाहर बैठी बेंच स्ट्रेंथ भी जरा सा अवसर मिलने पर खुद को साबित करने का मौका नहीं गवाना चाहती।

अब हम सिर्फ घर में ही जीतना नहीं जानते बल्कि हमारे रणबांकुरो में विदेशी ज़मीं पर भी विरोधियों को धूल चटाना आता है। हमारे रिकार्ड्स अब सिर्फ ज़िम्बाब्वे और बंगलादेश जैसी टीमों को हराकर ही बेहतर नहीं होते, अब तो हमने आस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका को भी हराना सीख लिया है और सामने यदि न्युजीलेंड जैसी टीम आ जाये तो उसकी तो गर्दन ही कलम कर दी जाती है।

ये सारी चीजें टीम इण्डिया के लिए आने वाले विश्वकप में एक ख़ूबसूरत संभावनाओं का संसार निर्मित कर रही हैं और इन्हें देख लगता है कि इन जोशीले जवानो ने क्रिकेट के भगवान मतलब सचिन तेंदुलकर को उनके इस अंतिम विश्वकप में वर्ल्डकप उपहार में देने की ठान ली है। ये युवा खिलाडी न सिर्फ दिमाग से खेलते हैं और नाही सिर्फ दिल से बल्कि इनके पास दिलोदिमाग का सही संतुलन मौजूद है। इस कारण इनके पास जोश, होश, जूनून और जज्बातों का सही तालमेल विद्यमान है जो इन्हें जहाँ जीतने का साहस देता है।

धोनी के ये धुरंधर गुरु गैरी के मार्गदर्शन में पूरे रुतबे के साथ आगे बढ़ रहे हैं। इन्हें अब सिर्फ जीतना गवारा नहीं है अब ये अधिकार पूर्ण जीत चाहते हैं। यही कारण है कि पहले टेस्ट में आस्ट्रेलिया का सूपड़ा साफ किया फिर वनडे में न्यूजीलेंड का। पिछले २-३ सालो में जो कामयाबी टीम को मिली है वो उससे पहले के १५ सालो में भी नसीब नहीं हुई। इसकी बानगी देखनी है तो इस साल के टेस्ट रिकार्ड पे ही नज़र डाली जा सकती है २०१० में हमने कुल १५ टेस्ट खेले जिनमे ८ जीते और सिर्फ २ हारे। और ये जीत हमने आस्ट्रेलिया, अफ्रीका, श्रीलंका, न्यूजीलेंड जैसी टीमों को हराके हासिल की। वही वनडे में भी हमने पिछले वर्षों में नेटवेस्ट सीरिज, एशिया कप को जीता तो अफ्रीका, श्रीलंका, आस्ट्रेलिया को कई बार धूल चटाई।

अब हमें जीतने के लिए सचिन-सहवाग के भरोसे रहना जरुरी नहीं है...अब कोहली, रैना, गंभीर में भी विरोधियो के सर में दर्द पैदा करने का दम है। अब कोई टीम शुरूआती विकेट जल्दी-जल्दी गिराके चैन की साँस नहीं ले सकती अब छठवे-सातवे नंबर तक हमारे पास मेच विनर मौजूद है न्युजीलेंड के खिलाफ हालिया संपन्न सीरिज के चौथे मेच में युसूफ पठान ने छठे नम्बर पे उतरकर भारत की प्रस्तावित हार को जीत में बदला। जब उनकी १२३ रनों की पारी की बदौलत टीम ने ३१६ रनों के पहाड़ जैसे स्कोर को फतह किया। पिछले सालो की टीम इण्डिया पे यदि गौर किया जाये तो इस टीम ने सचिन, सहवाग, द्रविड़, गंभीर, धोनी, युवराज जैसे सीनियर खिलाडियों के बिना भी जीत दर्ज की है और इस टीम की औसत उम्र २५-२६ साल के आसपास रही है। और जब कभी सचिन जैसे सीनियर खिलाडी टीम में खेले तो उन्होंने भी वनडे का पहला डबल लगाकर युवाओं में भरपूर उर्जा का संचार किया।

बहरहाल, वर्ल्डकप का काउंटडाउन शुरू हो चूका है, टीम इण्डिया अफ्रीका के दौरे पे है। वर्ल्डकप से पहले अपनी तैयारियों का जायजा लेने का संभवतः अंतिम मौका है, अफ्रीका के खिलाफ जीत दर्ज कर मनोबल को और ऊपर उठाया जा सकता है, लेकिन ध्यान रहे अति आत्मविश्वास घातक हो सकता है। अपनी सफलताओं के खुमार में कही हम अपनी कमियों को न नज़रन्दाज कर दे। आसमान में उड़ना है लेकिन ज़मीन का दामन थाम के....क्योंकि ऊँचाइयों से गिरने पर चोट भी गहरी लगती है।

GO....INDIA GO.......

(मासिक पत्रिका 'पालिटिकल स्पार्क' और समाचार पत्र 'राज एक्सप्रेस' में भी प्रकाशित)

Wednesday, November 24, 2010

आत्महत्या, मौत की गुजारिश और मृत्यु महोत्सव


सांवरिया के घोर हादसे से उबरकर आखिर संजय लीला भंसाली अपने पुराने फार्म में लौट ही आये...मर्सी किलिंग की पृष्ठभूमि पर बेहतरीन सिनेमा का निर्माण कर जता दिया की जीनियस लड़खड़ा तो सकते हैं पर उन्हें चित नहीं किया जा सकता। मौत की गुजारिश करते एक अपंग सितारे जादुगर की कथा अंततः सिखा जाती है कि हालात चाहे जैसे भी हों but life is good yar....

फिल्म देखते समय समझ नहीं आता कि मजबूरियां जिन्दगी पे हस रही हैं या जिन्दगी मौत को चिड़ा रही है...नायक को मोहब्बत है जिन्दगी से, लेकिन गुजारिश है मौत की...और इसी कारण ये मौत, महज मौत न होकर महोत्सव बन जाती है। मौत की ये गुजारिश आत्महत्या नहीं है क्योंकि नायक किसी से छुपकर जैसे-तैसे मरने का प्रयास नहीं करता, वो बाकायदा कोर्ट से मरने की इजाजत चाहता है। उसने अपनी इसी अपंग अवस्था में रहते हुए जज्बे के साथ जिन्दगी के १२ साल गुजारे हैं..और खूबसूरती से एक रेडियो चेनल का संचालन करते हुए कई अपाहिज, हताश लोगों के लिए प्रेरणा का काम किया है। उसका तो ये मानना है कि जिन्दगी चाहे कितनी भी क्यों न हो...वो १०० ग्राम हो या १०० पौंड, वो खूबसूरत ही होती है........

लेकिन अब उसमे और ताकत नहीं है कि इस घुटन को सह सके...और नाही उसके फिर से वापस पुरानी स्थिति में लौट सकने की उम्मीद है...इन हालातों के बीच अब जिन्दगी नहीं, मौत उसके लिए वरदान बन गयी है...और इसी वरदान को वो समाज और कानून से पाना चाहता है...कथानक का विकास कुछ इस तरह से किया गया है कि सिनेमाहाल में बैठा हर दर्शक इथन (हृतिक रोशन) के मौत की गुजारिश करने लगता है...

नायक की लड़ाई है समाज और हमारी संस्कृति द्वारा थोपी गयी उस अवधारणा से..जो हमें हर हाल में जिन्दा रहने की नसीहत देती है...फिल्म के एक दृश्य में नायक से कहा जाता है कि 'तुम्हे god के द्वारा दी गयी इस जिन्दगी से खेलने का कोई हक नहीं है'...जहाँ नायक का प्रत्युत्तर में कहना कि 'god को हमारी जिन्दगी से खेलने का हक किसने दिया'। समाज की सहानुभूतियाँ नायक के दर्द को न तो कम कर सकती हैं न ही महसूस कर सकती..उसकी जिन्दगी और उसका दर्द उसका अपना है...समाज उसे मजबूरन जीने के लिए विवश नहीं कर सकती...नायक शरीर से अपाहिज होने के चलते मौत की गुजारिश कर रहा है, वो हौसलों से अपाहिज नहीं है...दुनिया के अधिकतर आत्महत्या करने वालों के हौसले अपंग होते हैं...ये मौत की गुजारिश आत्महत्या नहीं है।

भारतीय दर्शन में भी कई जगह इस तरह की मौत के प्रावधान हैं..जैनधर्म में तो विधिवत सल्लेखना के नाम से इसका प्रकरण उद्धृत किया गया है...तत्संबंधी ग्रंथो और साहित्य से इस विषय में जानना चाहिए। फिल्म के कथानक में इन सबके बीच एक प्रेम-कथा भी तैर रही होती है...जो प्रेम भंसाली निर्मित पहले की फिल्मो वाली शैली का ही है...जिस प्रेम में कुछ हासिल करने की शर्त नहीं होती, उसमे तो बस लुटाया जाता है। जिस प्रेम का सुखद अहसास पाने के कारण नहीं देने के कारण है। ताउम्र नायक की सेवा एक नर्स बिना किसी बोझ के करने को तत्पर है..इसके लिए वो अपने पति से तलाक लेती है...ये सेवा बिना प्रेम के नहीं हो सकती। अंततः १२ साल के लम्बे साथ के बाद मरने से एक रात पहले इथन, सोफिया(ऐश्वर्या राय) को शादी के लिए प्रपोज करता है...ये प्रेम कुछ उसी तर्ज का है जो 'हम दिल दे चुके सनम' में एक पति अपनी पत्नी को उसके पुराने प्रेमी को सौपकर प्रदर्शित करना चाहता है...या 'देवदास' में चंद्रमुखी द्वारा प्रदर्शित है जो देवदास को पारो के बारे में जानते हुए भी चाहती है..या फिर इसे हम 'ब्लेक' के उस अध्यापक के प्रयास में देख सकते हैं जो सारा जीवन अपनी अंधी-बहरी और गूंगी शिष्या को जीवन जीने लायक बनाने के लिए करता है। इन सभी में प्रेम है पर हासिल करने की मोह्ताजगी नहीं..और ये आज के सम्भोग केन्द्रित इश्क से परे है...इस प्रेम में तो बस सच्चे दिल से दुआएं निकलती है, और एक silent caring होती है...जो आज की नवसंस्कृति में बढ़ रहे युवा के समझ में नहीं आ सकता, क्योंकि आज प्रेम आदर्श है और सेक्स नवयथार्थ...इस प्रेम में करुणा है, दया है, संवेदना है और इसी के चलते इथन अपने उस प्रतिस्पर्धी जादुगर के पुत्र को अपना कौशल सिखा जाता है जिसने उसे अपंग बनाया था... नफरत के लिए इसमें कोई जगह नहीं...

बहरहाल, एक बेहद गुणवत्तापरक फिल्म है...जो कदाचित कुछ मनचलों को रास न आये, क्योंकि यहाँ हुडदंग नहीं है और न यहाँ शीला की जवानी है..नाही यहाँ मुन्नी बदनाम हुई है। हृतिक और ऐश्वर्या के बेजोड़ अभिनय ने फिल्म को जीवंत बना दिया है..रवि के.चंद्रन की सिनेमेटोग्राफी कमाल की है...सेट डिज़ाइनिंग भंसाली की अन्य फिल्मों की तरह प्रतिष्ठानुरूप है... संगीत अलग से सुनने पर कोई प्रभाव नहीं छोड़ता, लेकिन फिल्म के साथ जुड़कर सुनने पर अद्भुत अहसास कराता है...कुछ दृश्य तो बेमिसाल बन पड़े है, जैसे-'हृतिक द्वारा नाक पर बैठी मक्खी हटाना, छत से टपकने वाले पानी से हृतिक की जद्दोजहद या 'उडी-उडी' गाने पर ऐश्वर्या का नृत्य आदि...

खैर..एक उम्दा पैकेज है...सार्थक सिनेमा के शौक़ीन लोगों को इसे जरूर देखना चाहिए...इस तरह की फिल्मों के कारण ही बालीवुड की प्रतिष्ठा बची हुई है...दबंग, वांटेड और कमबख्त इश्क जैसी फिल्मे पैसा तो कमा के दे सकती है...पर इज्जत नहीं बढ़ा सकती...


(मासिक पत्रिका 'सूचना साक्षी' में प्रकाशित)