Sunday, June 19, 2011

एक ख़ूबसूरत प्रेम-पत्र



ब्लॉग भ्रमण के दरमियाँ एक ख़ूबसूरत प्रेमपत्र मिला जिसे अपने ब्लॉग पर आप सबसे साझा कर रहा हूँ....ये टीस किसी एक की नहीं, प्रायः हर जवान दिल की हो सकती है...सुन्दर शब्दों के साथ अपने अहसासों को कागज पे उतारता ये प्रेमपत्र कई आशिकों का प्रतिनिधि हो सकता है-


प्रिये,
काफ़ी लंबे वक़्त बाद प्रेम पत्र लिखने का मौक़ा मिल रहा है, यक़ीन मानों. हां इतना ज़रूर है कि स्कूली दिनों में गुलाबी कागज़ों पर कलम चला लिया करता था.. लेकिन कामयाबी शायद ही कभी मिली हो... मिलती भी कैसे, वो ख़त या तो दोस्तों के ख़ातिर हुआ करता या फिर इकतरफ़ा आकर्षण की ज़ोर आजमाइश।। ख़ैर, आज मौक़ा मिला है,
ठिकाना भी मिला है... और ख़ुद के भावों को उकेरने का दस्तूर भी... सो लिख देता हूं।
पहला सवाल, कैसी हो... बिन मेरे। मैं तो हालात की तपिश और ज़िम्मेदारियों का भरम पाल बैठा हूं, लगा हुआ हूं.. चल रहा हूं... ज़िंदगी में कुछ हासिल करने की होड़ में ना-ना करते मैं भी शामिल हो ही गया। मैं वो वादा तोड़ चुका हूं, जिसमें तुमसे और सिर्फ़ तुमसे चाहत का क़रार हुआ था... ऐसा नहीं कि तुमसे मेरी चाहत में किसी भी तरह की कमी आई हो... हुआ तो बस इतना है कि मुझे एहसास हो गया है कि ज़िंदगी सिर्फ़ और सिर्फ़ माशूका की ज़ुल्फों तले नहीं गुज़ारी जा सकती। और भी कई हैं, जो मुझमें, खुद की उम्मीदें देखते हैं... और भी हैं जो ये सोचते हैं कि मैं हूं ना.... । कैसे उनकी उम्मीदों से छल कर लूं
, कैसे सिर्फ़ खुद की सोचूं, कैसे ये कह दूं कि मैं नहीं हूं।

ख़ैर, तुमसे मिले लंबा वक़्त गुज़र चुका है, इस बीच मैनें तो कुछ ख़ास हासिल नहीं किया लेकिन उम्मीद है तुम्हें वो सब मिल रहा होगा.. जिसकी ख़्वाहिश तुमने की थी। मैं उस वक़्त तो नहीं कह पाया, लेकिन यक़ीन मानो तुम्हारे जाने से जो खालीपन मेरी ज़िदंगी में आया है, जाने क्यों वो जाता ही नहीं। शायद मैं ही इस सूनेपन से दिल लगा बैठा हूं, वैसे ये भी है कि इस खालीपन ने मुझे हमेशा इस बात का एहसास कराया है कि जो मेरा है वो कितना ख़ास है, और उसके खो जाने या छूट जाने पर कितनी तकलीफ़ होती है। तुम समझ रही हो ना...। अरे, ये क्या कह रहा हूं, तुम भला क्यूं समझोगी... तुमने कभी समझा ही कहां... और मैं भी ना चाहते हुए, तुम्हे समझा ही तो रहा हूं। ख़ैर छोड़ो, हम क्यों उलझ रहे हैं,
लंबा वक़्त निकल गया पिछली उलझन को सुलझाने में। यक़ीनन तुम्हारे दिलों दिमाग़ में ये सवाल ज़रूर आया होगा कि मैनें तुम्हे ख़त लिखने का कैसे सोचा, कैसे तुम्हे उसी हक़ से प्रिये कहा... जवाब बड़ा आसान है, हालात तुम्हारे लिए बदले होंगे, लेकिन मैं तो अब भी उसी मोड़ पर खड़ा हूं। वक़्त के गुज़रते लम्हे भी मेरी चाहत को कम करने में बेअसर साबित हुए, यूं समझो कि किसी वीराने में खुद को पनाह देती पुरानी आहटें आज भी पुरअसर तरीके से गूंज रही हैं।

मैनें तो हर पल तुम्हे सोचा, मेरे ख़्वाब-ख़याल, मेरा मक़सद.. सभी कुछ तो तुमसे मिला था, तुम ही तो थीं जो मुझसे कहती थी कि फलां ठीक है, और फलां ग़लत... और मैं हमेशा की तरह कुछ नहीं कह रहा होता। लेकिन सच तो ये है कि मेरा आज उसी दौर में लिख दिया गया था... उन्ही ख़ुशगवार लम्हों ने आने वाले कल की इबारत लिख दी थी।
आज भी मेरे सच और झूठ, सही और ग़लत का पैमाना वही है जो तुमने सिखाया था। तुम भूल चुकी होगी, यक़ीनन तुम्हे याद न हो... लेकिन तुम्हारी हर बात अब मेरा किस्सा है। कुछ कमियां मैं आज भी दूर नहीं कर सका हूं
, शायद दूर करना भी नहीं चाहता... मुझे ताउम्र अफ़सोस रहेगा कि मैं तुम्हे वो भरोसा नहीं दिला सका जो तुम चाहती रही। जिस एक अफ़साने पर मोहब्बत टिकी होती है, वो अफ़साना कब शुरू हुआ, कहां जाकर ख़त्म भी हो गया, पता ही नहीं चला... अब सोचता हूं कि रिश्तों का जो ताना-बाना हमने बुना था, क्या वो इतना कमज़ोर था। नहीं वो कमज़ोर नहीं हो सकता.. फिर कैसे दरक गई ये दीवार, जिसकी नींव गुलशन से चुने गए ताज़े फूलों पर रखी गई थी। लगता है उन फूलों में पहले जैसी बात नहीं रही, लेकिन सुना तो कुछ और ही था कि मुहब्बत के बासी फूल ज़िंदा सांसों से भी ज़्यादा असर रखते हैं।

कभी हालात मेहरबां हुए तो उम्मीद करता हूं कि फ़िज़ां फिर बदलेगी, सूख चुके दरख़्तों पर फिर कोपलें खिलेंगी, अरसे से सन्नाटे का दामन थामे मेरे दरो-दीवार किसी आहट को महसूस करेंगे, तेज़ चलती आंधियों में खुद का वजूद तलाशते क़दमों के निशान फिर कहेंगे कि यहां भी कोई चलता है। बुलबुल फिर कब्रगाह बन चुके मेरे आशियाने का रुख़ करेगी। जब तुम आओगी तो देखोगी, वक़्त के लम्हे आज भी वहीं ठहरे हुए हैं जहां तुम उन्हे छोड़कर गईं थी। हां एक बात और मेरे आंगन के सबसे कोने में एक ईंट है, उसके नीचे सुनहरे रंग की डिब्बी में एक पर्चा लिखा मिलेगा, उसे पढ़ना.. सोचना... और हां आंसू मत छलकने देना... क्योंकि मैं अगर ज़िंदा होता तो शायद तुम्हे रोने न देता।

तुम्हारा
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साभार गृहीत- aapaskibat-nishant.blogspot.com

Saturday, June 18, 2011

परम्पराओं का आग्रह और शिक्षा




लार्ड मेकाले की शिक्षा पद्धत्ति को पाश्चात्य दृष्टि से देखने पर हम कह सकते हैं की आज रूढ़ीवाद, धर्मान्धता, कट्टरवाद का अंत हुआ है पर गहराई में जाकर विचार करने से हम देखते हैं कि कुछ नहीं बदला सिवा कलेवर के।

ऊपर से जींस-टी शर्ट पहने नजर आ रही संस्कृति आज भी उसी कच्छे-बनयान में हैं। सारा mordanization खान-पान बोलचाल और पहनावे तक सीमित है विचारों पर आज भी जंग लगी है। तमाम शिक्षा संस्थानों में महज साक्षरता का प्रतिशत बढाया जा रहा है शिक्षित कोई नहीं हो रहा है। इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट कॉलेज में दाखिला लेकर छात्र रचनात्मकता के नाम पर बस हालीवुड की फ़िल्में देखना और सिगरेट के धुंए का छल्ला बनाना सीख रहे हैं सोच तो मरी पड़ी है।

शिक्षा सफलता के लिए है सफलता स्टेटस पर निर्भर है स्टेटस सिर्फ अर्निंग और प्रापर्टी केन्द्रित है। ऐसे में कौन विचारों कि बात करे, कैसे नवीन सुसंगातियो का प्रसार हो? यहाँ तो विसंगतियों का बोझा परम्पराओं के नाम पर ढ़ोया जा रहा है। शिक्षा का हथोडा कोने में खड़े परम्पराओं के स्तम्भ को नहीं तोड़ पाता मजबूरन उस स्तम्भ पर छद्म-आधुनिकता का डिस्टेम्पर पोतना पड़ता है।

दिल में पैठी पुरानी मान्यताएं महज जानकारी बढ़ाने से नहीं मिटने वाली, सूचनाओं की सुनामी से समझ नहीं बढती। जनरल नालेज कभी कॉमन सेन्स विकसित नहीं करता। जनरल नालेज बहार से आता है कॉमन सेन्स अन्दर पैदा होता है। विस्डम कभी सूचनाओं से हासिल नहीं होता। भोजन बाहर मिल सकता है पर भूख और भोजन पचाने की ताकत अन्दर होती है। इन्फार्मेशन एक्सटर्नल हैं पर विचार इन्टरनल। अभिवयक्ति आउटर होती है पर अनुभूति इनर।

पर आज हालात सिर्फ इमारतों को मजबूत कर रहे हैं नींव का खोखलापन बरक़रार है। इसी कारण चंद संवेदनाओं के भूचाल से ये इमारतें ढह जाती हैं। फौलादी जिस्म के आग्रही इस दौर में श्रद्धा सबसे कमजोर है। उस कमजोर श्रद्धा का फायदा उठाने ठगों की टोली हर चौक-चौराहों पर बैठी है। गले में ताबीज, हाथ में कड़ा, अँगुलियों में कई ग्रहों की अंगूठियाँ पहनकर लोग किस्मत बदलना चाहते हैं। व्रत, उपवास, पूजा, अर्चना बरक़रार है पर नम्रता, शील, संयम आउटडेटेड हो गए हैं। जितनी भी तथाकथित धार्मिकता की आग धधक रही है वह लोगों के दिमाग में पड़े भूसे के कारण जल रही है इनमें तर्क कहीं नहीं है।

गोयाकि वेस्टर्न टायलेट पर बैठने का स्टाइल खालिश भारतीय है। ऐसे में खुद को माडर्न बताने का राग आलाप जा रहा है। नए वक्त में परम्पराएँ पुरानी ही है और उन परम्पराओं का अहम् भी है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर सड़ी हुई रूढ़ियाँ धोयी जा रही हैं और न्यू-माडर्नस्म के नाम पर नंगापन आयात किया जा रहा है। इन्सान की फितरत भी समंदर सी हो गयी है परिवर्तन बस ऊपर-ऊपर है तल में स्थिति जस की तस है।

विचारों के ज्वार-भाटे परम्पराओं की चट्टानों से माथा कूट-कूटकर रह जाते हैं पर सदियों से उन चट्टानों में एक दरार तक नहीं आई। शिक्षा पद्धति की उत्कृष्टता का बखान करने वाले लोगों के लिए ये सांस्कृतिक शुन्यता आईना दिखाने का काम करती है।

Monday, June 13, 2011

अभिव्यक्ति और अनुभूति

एक विचारणीय sms कुछ इस प्रकार है- "किलोग हमें हमारे प्रस्तुतिकरण से आंकते हैं, हमारे अभिप्रायों से नहीं जबकि ईश्वर हमें हमारे अभिप्रायों से आंकते हैं प्रस्तुतिकरण से नहीं"। विज्ञापन के इस दौर में जो दिखता है वही बिकता है। संस्कार सम्पन्नता महज एक दिखावा है जिसे so called manners कहते हैं।

अभिव्यक्ति पूर्णतः अचेतन प्रक्रिया है जिसे चेतन इंसानी पुतलों ने अपना लिया है। शुभेच्छाए, प्यार, सम्मान, विनम्रता सब अभिव्यक्ति तक सीमित है। सूचनाएँ जीवन को अनुशाषित कर रही है पर नैतिक कोई नहीं हो रहा। अनुशाषन भी so called manners है। प्रैक्टिकल होने के उपदेश दिए जाते हैं, इमोशंस सबसे बड़ी कमजोरी बताई जाती है। डिप्लोमेटिक होने के लिए मैनेजमेंट की शिक्षा है सत्य को पर्स में दबाकर रखना ही समझदारी है। बस आप वही कहिये जो लोग सुनना चाहते हैं वह नहीं जो सुनाना चाहिए। गर्दन को सलामत रखना है तो सत्य छुपाकर रखिये।

भर्तहरी, चाणक्य, सुकनास के सिद्धांतो पर फेयोल और कोटलर कि शिक्षा भारी हो गयी है। रामायण और गीता के चीरहरण का दौर जारी है। संवेदन शुन्यता को परिपक्वता का पर्याय माना जाता है। ख़बरों की बाढ़ के चलते खबर का असर होना बंद हो गया है। गोयाकि बासी रोटी गरम करके बेंची जा रही है या गोबर की मिठाई पर चांदी की वर्क चढ़ी हुई है।

पढ़-सुनकर हम अच्छे वक्ता हो रहे है या फिर अच्छे लेखक, पर घटनाएँ अनुभूत नहीं हो रही है। प्रेम की परिभाषा रटने वाले या प्रेम पर पी एच डी करने वाले जीवन भर प्रेम से अछूते रहते हैं। तथाकथित प्रेमप्रदर्शन के तरीके ईजाद हो रहे हैं पर मौन रहकर महसूस किया जाने वाला उत्कृष्ट अहसास कहाँ हैं? मदर्स डे फादर्स वेलेंटाइन डे से लेकर कुत्ते-बिल्ली को पुचकारने वाले दिन तक उत्साह से सेलिब्रेट किये जा रहे हैं पर माँ-बाप का असल सम्मान नदारद है। प्रातःकालीन चरण स्पर्श पर ग्रीटिंग कार्ड्स का अतिक्रमण है। सम्मान के बदले गिफ्ट्स के लोलीपोप पकड़ा दिए जाते हैं। श्रवण कुमार को कौन याद करता है? तमाम ताम-झाम अभिव्यक्ति की मुख्यता से हैं।

अभिव्यक्ति की चकाचौंध में अनुभूति भी दूषित हो रही है। सहानुभूति शब्द सर्वाधिक बदनाम हो गया है। दुःख में सहानुभूति सांत्वना पुरुस्कार सरीखी लगती है एक sms, scrap या readymade email ही सहानुभूति के लिए काफी है। समझ नहीं आता इस अभिव्यक्ति में अनुभूति कहाँ है? विपदा में सहानुभूति तो बहुत मिल जाती है पर साथ नहीं मिलता। एक्सपेक्टेशन बहुत हावी हैं इंटेंशन पर। सहज प्रेम, करुणा, त्याग गयी गुजरी बात बन गये हैं।

उसूल सिर्फ बघारने के लिए हैं जिन पर ताली बजती है जीवन जीने के लिए 'सब चलता है' के जुमले बोले जाते हैं। किसी ने कहा भी है-"झूठ न कहें, चोरी भी न करें..पेट भरने के लिए क्या उसूल सेंककर खायेंगे" भैया उसूलों से चलकर पेट भर जाता है अलबत्ता पेटी न भर पाए। नवसंस्कृति मशीनी हो गयी है और मशीनों के अनुभूति नहीं होती। इस संस्कृति ने दादी-नानी को वृद्धाश्रम में छोड़ दिया है, पुराने साहित्य और पुराणों के पन्ने समोसे के नीचे पड़े हैं, पुरानी धरोहरें, इमारतें टूटकर कोम्प्लेक्स और शापिंग माल में बदल गयी हैं ऐसे में पुरा संस्कारों के समस्त स्त्रोत अपाहिज हो गए हैं।

बहरहाल, इस शुन्यता के माहौल में भी कहीं न कहीं भावनाओं का दीपक टिमटिमा रहा है जो राहत देता है। जो आधुनिकता की आंधी को ललकार रहा है ....और यही संवेदना, संस्कारो और भावनाओं का दिया मजबूर कर रहा है हमें आश्चर्य करने पर कि जो असंवेदना और संस्कारविहीनता के सूरज को सिद्धांतों की रौशनी दिखाने का उद्यम कर रहा है।

Thursday, April 7, 2011

मैं कोई कवि नही....

कविता करना कोई मजाक नही

जो हम जैसे नौसिखिये कर सके

ये तो एक साधना है

जो संगिनी है साधकों की...

बेचैन हूँ मै पर,

मैं कोई कवि नही...............


जब चरम तन्हाईयों के दौर में

दोस्त हो जाते हैं दूर

तो कागजों से बातें करता हूँ

कविता के जरिये

हैरान हूँ मैं पर

मैं कोई कवि नही...........


जब भर जाता है दिल दर्द से लबालब

तो छलकने लगता है वो

रूह के प्यालों से शराब बनकर

और फ़ैल जाता है वो

इन कागजों की जमीं पर

मतवाला हूँ मैं पर

मैं कोई कवि नही.................


जब अपनों की दगा से

प्रियतम की झूठी वफ़ा से

जगता है मन में रोष

तो इन कागजों के समंदर में

शब्दों के पत्थर फेंक देता हूँ....

दीवाना हूँ मैं पर मैं कोई कवि नही..................


(c) अंकुर 'अंश'

Tuesday, February 15, 2011

प्रेम- फिजिक्स,केमिस्ट्री,फिलोसफी या कुछ और......?


कालिदास के प्रेम रस से सराबोर नाटको से लेकर शेक्सपीयर की अमर रोमांटिक कृतियों तक...मीरा की भक्ति से लेकर जायसी के विरह बारहमासों तक, गुरुदत्त की अमर कृति 'प्यासा' से लेकर संजय लीला भंसाली की 'गुजारिश' तक, शाहजहाँ के 'ताजमहल' से लेकर लन्दन के 'एलिनर क्रासेस' तक....ये धरती यदि किसी एक भाव से सर्वसामान्य होती है तो वो है-प्यार।

दुनिया भले प्यार से बनती नहीं लेकिन प्यार से चलती जरुर है। चाहत ही इन्सान को प्राणिजगत की तमाम कृतियों से अलग करती है। दिल की हरकतें ही इन्सान को कही ताकत देती है तो कही कमजोर करती हैं या कहे की इन्सान को इन्सान बनाये रखती है। इन्सान की जिन्दगी को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले भाव को ही आज तक इस तरह से परिभाषित नहीं किया जा सका जिसे एकमत से स्वीकार किया जा सके।

कोई इसके अपने ही वैज्ञानिक तथ्य प्रस्तुत करता है आक्सीटोसिन नामके हारमोंस को प्रेम होने का जिम्मेदार बताया जाता है। तो कोई इसके पीछे नेचुरल फिजिक्स को दोषी करार देता है....कही इसे आध्यात्मिकता से जोड़कर दार्शनिक रूप में प्रस्तुत किया जाता है...तो किसी के लिए ये मन की परतो में उत्पन्न अनेक परिणामो में से एक मनोविज्ञान माना जाता है। कभी ये महज साहित्य का वचन-व्यापर है तो कभी एक पागलपन...और आज की नवसंस्कृति में बढ़ रही युवा पीढ़ी के लिए महज उत्कृष्टतम मनोरंजन।

गोयाकि आत्मिक मनोभाव पर परतें चढ़ा दी गयी है...और उन परतों के अन्दर प्रेम भी पसीज रहा है। कभी ये जीने का मकसद है तो कभी मरने का कारण....और प्रेम में आकंठ लिप्त इन्सान जो भी कर गुजरे सब सही है। इस दशा में फैसले सारे सही होते हैं बस कुछ के नतीजे गलत निकल आते हैं। everything is fair in love n war के जुमले बोले जाते हैं। प्रेम में सफल इन्सान सातवे आसमान में होता है तो असफल रसातल में। और असफलता में जन्मी कुंठा निर्ममता को जन्म देती है तब इन्सान न खुद से प्यार करता है न उस शख्स से जिसके लिए कभी जान देने की बात करता था। इस दशा में वो युक्ति चरितार्थ होती है-''रिश्ते-नाते, प्यार-वफ़ा सब बातें हैं बातों का क्या..."

दरअसल प्रेम जीवन को पूर्णता देने वाला हो तो ठीक है...तबाही प्रेम का मकसद नहीं होना चाहिए। सापेक्ष प्रेम शाश्वत नहीं हो सकता..प्रेम में निरपेक्षता निरंतरता की वाहिनी होती है। आज की नवसंस्कृति में बढ़ रहे युवाओं के लिए प्रेम की पारलौकिकता समझाना दूसरे गृहों की बातों जैसा है। आज के सम्भोग केन्द्रित विश्व में प्रेम कालीन के नीचे तड़प रहा है। आज प्रेम आदर्श है और सेक्स नवयथार्थ। रोमांस आधुनिकता है और प्यार गुजरे ज़माने की बात।

जीवन का स्वर्णिम दौर मोहब्बत का सोपान होता है...उत्साह से इन्सान का चेहरा कुछ ऐसा खिल जाता है कि बिना सौन्दर्य प्रसाधनों के भी चमक दोगुनी हो जाती है। बकौल जयप्रकाश चौकसे इस दरमियाँ चेहरे पे इतना नूर जमा हो जाता है कि ठोड़ी पे कटोरी रखके सारा नूर समेट लेने को जी चाहता है। ''आजकल पांव जमीं पर नहीं पड़ते मेरे...
जैसी हालत होती है उल्फत बदल जाती है रंगत जुदा हो जाती है...ख्यालों में यही गुनगुनाहट होती है-"ख्याल अब अपना ज्यादा रखता हूँ, देखता हूँ मैं कैसा लगता हूँ...कुछ तो हुआ है, कुछ हो गया है"

चाहत कब कहाँ किससे हो जाये इस पे दिल का जोर नहीं चलता...दिल्लगी आशिकी तो है पर गुनाह नहीं। हाँ अपनी उस चाहत को पाने के जतन जरुर गुनाह करवा देते हैं...लेकिन प्रेम में हासिल करने कि मोह्ताजगी नहीं होती...बस एक साइलेंट केयरिंग होती है जिसमे दिल से बस दुआएं निकलती है। प्रेम खता नहीं, दुआ है और ''खता तो तब हो कि हम हाले दिल किसी से कहें, किसी को चाहते रहना कोई खता तो नहीं....

एक और जहाँ ये प्रेम उत्साह का संचार करता है तो दूसरी ओर इससे जन्मी तड़प भी कोई कम दर्द नहीं देती....एक ओर इंतजार बेचैनी बढ़ाता है तो दूसरी ओर वेवफाई का डर व्याकुल किये रखता है। वही आपकी मोहब्बत को आप तो समझते हैं पर उसे दुनिया को समझा पाना कठिन होता है...."ये इश्क नहीं आसाँ, बस इतना समझ लो..इक आग का दरिया है और डूब के जाना है"...नफरत की आग तो भस्म करती ही है पर इश्क की सुलगती चिंगारी भी कृष करने में कोई कसर नहीं छोडती....इसलिए इश्क कभी करियो न कहा जाता है...साथ ही ये भी कहते हैं कि "ये राग आग दहे सदा तातें समामृत सेइये"...समझाइशों की फेहरिस्त यही ख़त्म नहीं होती आगे कहते हैं-''छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए ये मुनासिब नहीं आदमी के लिए...प्यार से भी बड़ी कई चीज हैं प्यार सब कुछ नहीं आदमी के लिए''

बहरहाल इस प्यार न अपने कई कलेवर बदले पर ये हर काल में कायम रहा...लेकिन आज के इस मशीनी युग में ये कुछ ज्यादा ही जख्मी हो गया है क्योंकि मशीनें दिल नहीं लगाती। हम २०५० के लिए सपने बुन रहे हैं...हमारी धरती इतनी बोझिल लगने लगी है कि मंगल और चाँद पे जीवन तलाश रहे हैं...पर २०५० कि कल्पना ही रोंगटे खड़े कर देती है...क्या पता २०५० में प्यार, इश्क, लव, चाहत, मोहब्बत जैसे शब्द डायनासोर कि प्रजातियों कि तरह विलुप्त तो नहीं हो जायेंगे......................