Tuesday, February 25, 2014

ज़िंदगी के 'हाईवे' पे जज़्बातों का ओवरटेक कराता फ़िल्मकार : इम्तियाज़ अली

उसे रास्ते पसंद हैं..और उन रास्तों से ही कुछ ऐसी मोहब्बत है कि मनमर्जी से जहाँ-तहाँ, जब-तब वो रिश्तों या जज़्बातों का ओवरटेक करते हुए मस्तमौला बन बस चलते रहना चाहता है...और उसकी फ़िल्मों की हर नायिका 'हाईवे' की वीरा की तरह वहाँ नहीं लौटना चाहती जहाँ से वो आई है और वहाँ भी नहीं जाना चाहती जहाँ उसे ले जाया जा रहा है..गोया सफ़र ही रास्ता है और सफ़र ही मंजिल...और इन्हीं वजहों से इम्तियाज़ अपनी फ़िल्मों में एकआध ऐसा गाना भी रख देते हैं जिसमें इरशाद क़ामिल को कुछ ऐसा लिखना होता है..'हम जो चलने लगे, चलने लगे हैं ये रास्ते..मंजिल से बेहतर लगने लगे हैं ये रास्ते'।

इम्तियाज़ के पात्र बड़े मनमौजी हैं..खासतौर से उनकी नायिकाएं और वे आज की चौका-चूल्हा में उलझी व बच्चे पैदा करने की मशीन बनी हुई महिलाओं को एक जवाब हैं जहाँ उनकी हस्ती इन पारंपरिक क्रियाओं से परे भी बहुत कुछ है...वे आजाद रहना चाहती हैं, कदम-कदम पे अपनी हसरतों को रौंदते रहना उन्हें पसंद नहीं, सिर्फ ज़मीन ही नहीं वे आकाश में अपना अस्तित्व खोजती है, वे नटखट हैं, बड़बोली हैं. प्यार करती है और जब-तब अपने जज़्बातों का ओवरटेक करवाती हैं...पर अपनी मर्यादाएं नहीं भूलती, उनका प्यार उद्दंता नहीं है, उनकी स्वतंत्रता कभी भी स्वच्छंदता में नहीं बदलती..आजाद रहते हुए भी उन्हें पता है कि अकेली लड़की खुली हुई तिजोरी की तरह है और पुरुष वर्चस्व वाले भौंडे समाज में उनकी नायिका खुद को प्यार करने वाले मर्द की निगाह को पहचानती हैं जिसकी नीयत साफ है...जो वाकई मर्द है।

सदियों से नारी को चारदीवारी में दबोच कर रखने वाले समाज के अंदर.. इम्तियाज़ की महिलाचरित्रों द्वारा जो स्त्री विमर्श प्रस्तुत किया है वो अति बौद्धिक लोगों के कोरे उपदेशों से बहुत ऊपर बड़ा ही प्रेक्टिकल है। एक आदर्श स्त्री की तथाकथित भारतीय व्याख्या से दूर इम्तियाज़ की नायिका पूरे दम के साथ अपने प्रेमी के साथ भागने का दम रखती है(जब वी मेट)..ब्रेकअप पार्टी को इंज्वाय करती है और अबला नारी के तरह आंसू नहीं बहाती(लव आजकल), अपने कुछ दिनों के पुुरुष मित्र के साथ बिंदास हो जंगली जवानी जैसी फि़ल्म देखती है(रॉकस्टार) और आधीरात को चुपके से अपने मंगेतर के साथ कुछ प्यार भरे पल भी ढूंढना चाहती है...और अपने ही जज़्बातों की परख में जब उसे ये अहसास होता है कि उसका दिल क्या चाहता है तो बेखौफ हो वो अपने मंगेतर को छोड़, रास्ते में मिले अनजान साथी को चुनती है या शादी के बाद भी अपने पूर्वप्रेमी के मिलने पर उसे चूमती है उसका आलिंगन करती है। गोया कि हरजगह किसी बने-बनाये सिद्धांत को थामें आगे नहीं बढ़ती, वो आज में जीती है और जो भी वर्तमान का सच होता है बस उसे अपनाती है और इस बदलाव में हरबार होता है उसके मौजूदा जज़्बातों द्वारा पुराने अहसासों पर ओवरटेक। और इसी वजह से इम्तियाज़ अपनी 'हाइवे' की नायिका से बुलवाते भी है कि 'इस दुनिया में पता ही नहीं चलता कि क्या सही है और क्या ग़लत..सब कुछ मिक्स-मिक्स सा हो गया है'

इम्तियाज़ को समाज और समाज के रिवाज़ों से भी ऐतराज़ है..जहाँ शिष्टाचार सिर्फ टिशु पेपर की तरह महज़ खुद को सभ्य दिखाने का हथियार बनके रह गया है...उनके नायक-नायिका की आजादी को समाज के इस शिष्टाचार और रिवाज़ों ने ही ख़त्म किया है और उनकी फ़िल्में खासतौर पर हाइवे ये बताती है कि सबसे ज्यादा असभ्य लोग आलीशान मकानों, ऊंचे पदों और शहर के पॉश इलाकों में ही निवास करते हैं..नारी का क्यूट और शालीन की तथाकथित परिभाषा में बांधकर सबसे ज्यादा हाईप्रोफाइल लोगों ने ही शोषण किया है उसे बंधक बनाया है...घर के बाहर वाले लोगों से उसे बचने को कहा जाता है पर घर के अंदर उसे मर्यादा और संस्कारों की नसीहत देकर चुप्पी साधे हुए सारे जुल्म सहने को मजबूूर किया जाता है। पिता के हिसाब से उसे अपना जीवनसाथी चुनना होगा, माँ के हिसाब से उसे अपनी सोच रखनी होगी, भाई के हिसाब से उसे पहनना-ओढ़ना और दोस्ती करना होगा, पति के हिसाब से उसे माँ बनना होगा-घर संभालना होगा या काम करना होगा...और कभी-कभी अपने निकटतम रिश्तेदारों की हवस का शिकार भी बनना होगा। इन सबमें नारी का अपना वजूद कहाँ हैं? लेकिन इस सबके बावजूद उसे चुप्पी साधे रहना होगा क्योंकि यदि मूँह खोला तो वो असंस्कारी साबित कर दी जायेगी।

इम्तियाज़ की बाकी फ़िल्मों की तरह 'हाईवे' में भी पात्र अपना अस्तित्व खोजते नज़र आते हैं..और जज्बातों का ओवरटेक कराते हुए प्रेम की मासूम संवेदनाओं को भी उन्होंने बखूब जगह दी है। नायिका, खुद की सगाई होने के बावजूद अपने अपहरणकर्ता से प्रेम करती है..और अपनी हाईप्रोफाइल सोसायटी से दूर उसे एक किडनेपर में ही सभ्य इंसान नज़र आता है..उसकी ख़ुशी आलीशान बंगला, मोटरकार या लग्जरीस् में नहीं है बल्कि उसे दूर कहीं पर्वत पे एक कच्चा-सा पर अपना-सा घर चाहिए, प्यार करने वाला हमसफ़र चाहिये। इम्तियाज़ की इन कथाओं के सार को तहलका के फिल्म समीक्षक गौरव सोलंकी कुछ यूं बयाँ करते हैं "इम्तियाज के पास हमारे समय की सबसे ईमानदार प्रेम कहानियां हैं और वह होना बड़ी बात नहीं हैं क्योंकि वे और भी बहुत से लोगों के पास है. लेकिन इम्तियाज़ के पास उनका सबसे ईमानदार ट्रीटमेंट भी है..उनके पास युवाओं की भाषा है जिससे वे गज़ब के रोचक डॉयलाग गढ़ते हैं और बचपना है जो तालाब में कूदने से पहले  उसकी गहराई का अंदाज लगाने वाली तहजीब में यकीन नहीं रखता।"

बहरहाल, भले ही 'हाइवे' का प्रस्तुतिकरण व रोचकता इम्तियाज़ की बाकी फ़िल्मों की तुलना में कमजोर है पर फ़िल्म की मूल आत्मा में इम्तियाज़ का हृदय ही नज़र आता है और इम्तियाज़ की ये फ़िल्म कई मामलों में 'रॉकस्टार' की उन्हीं संवेदनाओं को छूकर आने की कोशिश करती है जिसमें कहानी, संवाद या प्रस्तुतिकरण ज्यादा मायने नहीं रखता, बस आप हर फ्रेम के साथ अहसासों की चासनी को अपने ज़हन में जाने का मौका देते जाईये..और वैसे भी इम्तियाज़ की ही फ़िल्म का सुर है "जो भी मैं कहना चाहूं, बरबाद करें अल्फाज़ मेरे" इसलिये लफ्ज़ों से बहुत दूर जाकर इस फ़िल्म को देखना होगा...जिसमें इंसान के दिल की अमूर्त तड़प को साकार करने की कोशिश इम्तियाज ने की है। खासतौर से नायक-नायिका द्वारा एक-दूसरे को आलिंगन करने वाला दृश्य जहाँ नायक अपने बनावटी रौबदार रूप से बाहर निकल एक बच्चा बन जाता है और नायिका स्त्री के स्वभावाविक रूप माँ के किरदार में आ जाती है...ओशो रजनीश की बात याद आती है कि प्रेम की गहराई पुरुष और स्त्री को उनके सर्वोत्तम और स्वाभाविक रूप में ला देती है जहाँ पुरुष में पुत्रत्व और स्त्री में मातृत्व का भाव आ जाता है और यही स्त्री-पुरुष का उत्कृष्टतम व सच्चा रूप है..इस रूप में आने के बाद स्त्री-पुरुष का आपस में किया गया आलिंगन, संभोग की परिधि से बाहर निकल जाता है अन्यथा इस संपूर्ण विश्व में प्रेम के नाम पे अपने हवस की पूर्ति और रस्म अदायगी ही हो रही है।

खैर, एक दर्शनीय फ़िल्म...कथा के परे यदि विधा के स्तर पर बात की जाय तो भी भले महानतम न हो पर बदतर भी नहीं है..ए आर रहमान का संगीत उनकी प्रतिष्ठा के अनुरूप। सिनेमैटोग्राफी और लोकेशन्स बेहतरीन और आपका पैसा वसूल करने की ताकत तो इसकी खूबसूरत लोकेशन्स में ही काफी है, सिनेमाई कथ्य की गुणवत्ता तो मुफ्त है..आलिया भट्ट का अभिनय लाजवाब है उन्हें देख लगता नहीं कि ये उनकी महज़ दूसरी फ़िल्म है..रणदीप हुड्डा का चुनाव एक किडनैपर के किरदार अनुसार एकदम फिट बैठा है..स्वाभाविक और उत्कृष्ट अभिनय। कुल मिलाकर कंपलीट पैकेज पर आप इसे सिर्फ मनोरंजन की उथली सतह से परे जाकर देखिये..ये आपको खुद के अहसासों का बोध कराने वाली प्रतीत होगी। एक आम इंसान की कथा..जहाँ कोरा आदर्शवाद नहीं बस स्वाभाविक आजादी की माँग है..जो प्रैक्टिकल है पर स्वार्थी नहीं। आपाधापी से घिरे किरदार बस मांगते है रत्ती भर प्यार..हमारी आपकी तरह। लेकिन समाज और रिवाज़ उन्हें काट देना चाहते हैं हमेशा की तरह सभ्य बनकर और प्यार करने वालों को असभ्य बनाकर..लेकिन फिर भी इन नायक-नायिकाओं का प्यार, नजदीकियों का मोहताज़ नही हैं..इरशाद कामिल 'रॉकस्टार' के लिये लिखते हैं 'जितना महसूस करुं तुमको, उतना मैं पा भी लूं' वैसा ही कुछ हाईवे में कहते हैं "हर दूरी शरमाये, तू साथ है हो दिन-रात है..साया-साया माही वे"। बंधनों के बावजूद प्रेम का सदियों से चला आ रहा अंतिम रिसोल्युशन- दूरियों के बावजूद बस एक अहसास...बिल्कुल हमारी-तुम्हारी तरह।

Saturday, February 22, 2014

एक चीज़ मिलेगी वंडरफुल

अपने लेख की शुरुआत करने से पहले..मैं बता देना चाहता हूं कि "एक चीज़ मिलेगी वंडरफुल" महज़ मेरे लेख का टाइटल नहीं है अपितु यह एक बेहतरीन डाक्युड्रामा हिन्दी फ़िल्म हैं...जिससे संभवतः काफी लोग अपरिचित हैं लेकिन मैं उन सबसे इसे अवश्य देखने की गुज़ारिश करता हूँ..फ़िल्म को ऑनलाइन देखने के लिये या डाउनलोड करने के लिये नीचे कुछ लिंक भी दे रहा हूँ जहाँ आप इसे देख सकते हैं- ये फ़िल्म निश्चित ही आपको दुनिया और अपने बारे में समझने का एक खूबसूरत अवसर मुहैया करायेगी-


सुख की चाह। ये इस विश्व के संपूर्ण चराचर प्राणी जगत की प्राथमिक चाह है...इसके अतिरिक्त तमाम ख्वाहिशें, उस मूलभूत चाह को पूरा करने के लिये हैं। इंसान चाहे नौकरी करे, शादी करे, पढ़ाई-लिखाई करे, खाना-पीना या सोना हो अथवा फिह ज़हर खाके मर ही क्यों न जाना हो...इन तमाम क्रियाओं में सिर्फ एक मूलभूत चाहत यदि कोई है तो वो है..सुख की उपलब्धि। जन्म से लेकर मृत्यु तक के तमाम उपक्रमों में हमने जो कुछ भी इस दुनिया में गढ़ा है वो सिर्फ और सिर्फ सुख-शांति या सुकून पाने के लिये ही किया है। हमारे उत्सव, हमारा सामाजिक ढ़ाचा, रीति-रिवाज़ या फिर हमारी सृजनात्मकता एवं कल्पनाशक्ति ये सारी चीज़ें सुख को हासिल करने के लिये हैं लेकिन प्रश्न यही है कि क्या उन तमाम प्रयासों में हमने ऐसा सुख पाया है जो सार्वभौमिक हो, सार्वकालिक हो या जिसे हासिल करने के बाद हम ऊब न जाये...और ये कहना बंद कर दें कि ये 'दिल मांगे मोर'। और अगर अब तक उन तमाम उपक्रमों के बावजूद हमारी भागमभाग बंद नहीं हुई है तो फिर निश्चित ही हमारे प्रयास विपरीत दिशा में काम कर रहे हैं और हमें सतही धरातल पे सुख खोजने के बजाय, समस्या के मूल में जाना होगा और अपनी कोशिशों की दिशा परिवर्तित करना होगा। बस इसी कथ्य को लेकर आगे बढ़ने वाली ये बेमिसाल फ़िल्म, इंसान की तथाकथित बौद्दिकता से कई प्रश्न करती हुई..हमें हमारी तलाश करने को ही मजबूर करती है।

इंसान अपने ज्ञान और अपने आविष्कारों पे आज जमकर इतरा रहा है और खुद को इस प्रकृति की नायाब रचना बताने पर आमादा है लेकिन प्रश्न यही है कि हमारी वो कौन सी क्रियाएं हैं जिसके चलते हम खुद को प्रकृति की दूसरी रचनाओं से बेहतर मानते हैं...वनपस्पति से लेकर कीड़े-मकोड़ों तक और कुत्ता-बिल्ली जैसे थलचरों से लेकर मछली-मगर और गिद्ध-कव्वौ जैसे नभचर व जलचरों तक सभी अपने Survival और सुख के लिये अपने-अपने स्तर पर वही क्रियाएं कर रहे हैं जिन्हें इंसान बेहद बुद्दिजीवी होने के बाद कर आ रहा है। आहार, मैथुन, संग्रह और माया अथवा छल ये वे क्रियाएं हैं जिनकी पूर्ति हो जाने पर हम खुद को सुखी सा महसूस करते हैं..लेकिन ये आहार-मैथुन-संग्रह आदि की वृत्ति के तमाम उपक्रम तो जानवरों मे भी जस के तस हैं हमारे ज्ञान का विस्तार भी यदि इन्ही चीज़ों की प्राप्ति के लिये होगा...तो हमने प्रकृति की अनमोल रचना होकर क्या किया? यदि संग्रहवृत्ति की बात की जाये तो शायद हम जानवरों से भी निकृष्ट हैं क्योंकि कोई जानवर तो महज़ अपनी भूख को पूरा करने के लिये कुछ समय तक को संग्रह करता है और सिर्फ जीवनोपयोगी चीज़ें ही एकत्रित करता है किंतु मानव की हवस सिर्फ अपनी भूख को शांत करने तक नहीं अपितु अपनी अगाध तृष्णा को संतुष्ट करना है और इंसान तो उन चीज़ों के संग्रह में भी बेसुध हुआ जा रहा है जिनका ज़िंदगी के Survival से कोई लेना देना नहीं है...इस शरीर की भूख तो तृप्त की जा सकती है किंतु तृष्णा रूपी गड्ढा तो इतना भयंकर है कि इसमें संपूर्ण पृथ्वी के संसाधन भी एक तिनके के समान हैं...लेकिन कदम-कदम पर अपनी तृष्णा को पूरा करने के बाद भी असंतुष्टि जस की तस बनी रहती है..और हमारी सुख के लिये दौड़ हमेशा जारी रहती है।

भोजन के सुख के लिये भूख का दुख होना ज़रुरी है, मैथुन के सुख के लिये कामवासना की पीड़ा होना ज़रूरी है, पानी का सुख प्यास के दुख पर आधारित है, सोने का सुख अनिद्रा के दुख पर आश्रित है...इस तरह अपने तमाम सुखों की एक लिस्ट बनाईये आप पायेंगे की हमारे दुख पर ही हमारा सुख आश्रित है। हमारा दुख जितना बड़ा होगा, हमें बाह्रा संयोगों से उतना ही ज्यादा सुख मिलेगा...और क्षुधा के तृप्त होने के बाद भोजन का अधिक संयोग दुख का कारण बन जाता है, वीर्यस्खलन के बाद संभोग कष्टकर हो जाता है यही हाल हमारे तमाम संयोग आश्रित सुख के साथ है। तो इस तरह जो कुछ वक्त पहले तक सुख का कारण था वही अब दुख की वजह बन गया है। लेकिन प्रश्न ये है कि इस सबमें सुख कहाँ है? दरअसल हम दुःखों के पर्वत पे खड़े होकर भ्रम से ही कुछ संयोगों की उपलब्धि को सुख मानने की भूल कर रहे हैं...और हमारा ये भ्रम इतना मजबूत और सजीव हो चुका है कि अब दूसरी किसी बात को या किसी और रास्ते को हम अपनाना ही नहीं चाहते...प्रत्यक्षवाद और तथाकथित वैज्ञानिकता की ओट में हमने इन चर्म चक्षुओं से दिखाई देने वाली चीज़ों के परे देखना ही बंद कर दिया है। और अपने संपूर्ण इंद्रियज्ञान को वृद्धिंगत व संतुष्ट करने के प्रयास में सहज-अनंत ज्ञान को अनदेखा कर दिया है। अल्फाज़ो को कहने की वजह अहसास तक पहुंचाना था पर हम अल्फाज़ों में ऐसा उलझे की अहसास कहीं दफन ही कर दिये गये।

यहाँ मैं जिस बात को करने की कोशिश कर रहा हूँ उसे इस फ़िल्म को देखे बगैर समझना मुश्किल है..क्योंकि भौतिकवाद की सुनामी ने हमारी मानसिकता को कुछ इस तरह अपनी गिरफ्त में लिया है कि इस तरह की बातों में हमें महज़ कोरी दार्शनिकता और पोंगापंथी ही नज़र आती है। लेकिन 'एक चीज़ मिलेगी वंडरफुल' हमारे तमाम पूर्वाग्रहों-दुराग्रहों और बौद्धिकता के अभिमान पर तमाचा मारने का प्रयास करती है जहाँ वर्तमान में मौजूद उद्धरणों और अक्सर व्यक्त किये जाने वाले तर्कों को उठाकर ही हमें पुनः-पुनः सोचने पे मजबूर करने की कोशिश की गई है...निर्देशक ने बेहतरीन कथ्य का प्रयोग कर अपने लक्ष्य तक पहुंचने का प्रयास किया है...और सिनेमा की इस जीवंत कला का प्रयोग बेहतरीन अर्थ के संप्रेषण के लिये किया है। भले ही इस फ़िल्म को हमारी सिनेमा इंडस्ट्री की बाकी फ़िल्मों की तरह दर्शक नहीं मिलेंगे..लेकिन ये फ़िल्म भविष्य के लिये सिनेमा की बेहतरीन धरोहर है और साथ ही ये अपनी तरह की कथा कहने वाली बेमिसाल दस्तावेज साबित होगी।

और ज्यादा यहाँ कुछ नहीं कहना चाहुँगा बस इतनी गुज़ारिश है कि इस फ़िल्म को ज़रूर-ज़रूर-ज़रूर देखें। अपनी व्यस्ततम ज़िंदगी में से महज ढाई घंटे का वक्त निकालकर, शांतचित्त हो इस फ़िल्म का दीदार करें... ये साहित्य या किसी पुराण से कमतर नहीं है। गर आपमें संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना है तो ये फ़िल्म आपके लिये एक बेहतरीन अहसास कराने वाली साबित होगी...हाँ कुछ मनचलों और भौतिकवादिता के उपासकों के लिये ज़रूर ये एक बोझिल अनुभव हो सकता है। लेकिन ब्लॉग्स के इस साइबर संजाल पर मौजूद सभी लेखकों और पाठकों को मैं सामान्य बुद्धिजीवियों से काफी ऊपर, तह में जाकर विचार करने वाला मानता हूँ इसलिये मेरी उनसे तो प्रार्थना ही है कि आप ज़रूर देखें- एक चीज़ मिलेगी वंडरफुल।

Thursday, February 13, 2014

प्रेमानुभूत विभिन्न विचारों की मनोवैज्ञानिक व्याख्या

प्रेम का महीना बसंत गतिमान है..साथ ही पाश्चात्य संस्कृति प्रदत्त विभिन्न प्रेम के प्रतीक स्वरूप 'डे' भी सेलीब्रेट किये जा रहे हैं..प्रेम कम और तमाशा ज्यादा नज़र आ रहा है और सबसे ज्यादा इस सप्ताह को एक अवसर के तौर पे केश करने का काम बाज़ार कर रहा है..जहाँ ग्रीटिंग कार्ड, गुलाब और विभिन्न गजैट्स गिफ्ट के तौर पे देने का काम प्रेमी कर रहे हैं बस इसी वजह से बाजार में रौनक है।

बहरहाल, बात दूसरी करना है..प्रेम, एक ऐसी अनुभूति जिसका साम्राज्य संपूर्ण विश्व पे छाया हुआ है, जिस पर सबसे ज्यादा पन्ने काले किये गये हैं किंतु अब तक ये अपरिभाषेय और अव्यक्त मनोभाव ही रहा है और सिर्फ अनुभूतियों में ही सम्यक् तरीके से बसर करता है..किंतु फिर भी इसपे कुछ न कुछ कहने का जतन हर कवि, लेखक और चिंतक करता ही रहता है। मैं भी इसी कड़ी में एक व्याख्या करने के लिये उद्धृत हुआ हूँ...यकीनन मेरा प्रयास सफल हो इसकी संभावना कम ही हैं पर एक सच्ची कोशिश का कुछ न कुछ उत्तम आउटपुट आने की उम्मीद तो कर ही सकता हूँ...ये मेरे व्यक्तिगत विचार है जो मैंने साहित्य, सिनेमा और अपने आसपास के माहौल से अवलोकन कर निर्मित किये हैं साथ ही इन विचारों में मेरी स्वयं की कुछेक अनुभुतियां भी स्वभावतः सम्मिलित होंगी ही...और इस लेख के ज़रिये अब वे अमूर्त अनुभूतियाँ, मूर्त रूप लेने का प्रयास कर रही हैं।

मनोविज्ञान ने मानवमन के विचारों को सात भागों में विभाजित किया है..इनमें प्रथम से शुरु कर आगे-आगे का विचार उत्तमोत्तम कहा जाता है..तथा सप्तम विचार तक पहुंचना अंतिम ध्येय है और उस अंतिम विचार की निरंतरता के जतन में ही सारे धर्म-दर्शन बौद्धिक आलाप कर रहे हैं। ये सात विचार है- विषाक्त विचार (Toxic Thought), नकारात्मक विचार (Negative Thought), व्यर्थ विचार (Waste Thought), आवश्यक विचार (Necessary Thought), वास्तविक विचार (Real Thought), सकारात्मक विचार (Positive Thought) तथा उन्नत  विचार (Elevated Thought)। प्रेम इस दुनिया की संभवतः ऐसी इकलौती अनुभूति है जिसमें ये संपूर्ण विचार एक साथ कम या ज्यादा मात्रा में हो सकते हैं। इन्ही वजहों से प्रेम इंसान को अधमाधम मनुष्य से लेकर एक दिव्य मनुष्य तक बनाने में कार्यकारी हो सकता है।

ईर्ष्या, क्रोध, अहंकार, लोभ और द्वेष जैसे प्रथम श्रेणी अर्थात् विषाक्त विचारों का सर्वाधिक बोलबाला वर्तमान में प्रेम के चलते देखने को मिलता है और इन्ही वजहों से प्रेम में नकारे जाने पे हत्या, बलात्कार, तेजाब फेंकना और आत्महत्या जैसी दुर्दांत हरकतें देखने को मिलती हैं। कई लोग इन तमाम चीज़ों के घटित होने के बाद ये कहते देखे जाते हैं कि ये कोई प्यार नहीं था..उन लोगों की नज़र में प्रेम का मतलब सिर्फ त्याग ही होता है पर ये एक अधूरा सच है क्योंकि उपरोक्त तमाम घटनाओं के पीछे प्रेम से उपजा आकर्षण अवश्य होता है...प्रेम जब अपनी हदों से बाहर निकल स्वछंद वृत्तियों का आलिंगन करता है तब यही मनोभाव हवस बन जाता है और हवस अपने आप में एक अति विषाक्त विचार है।

इसके साथ ही जहाँ प्रेम होता है वहाँ अनिष्ट की आशंका सदैव विद्यमान होती है..ये हम प्रति समय अपने रिश्ते-नातों और निकटवर्ती लोगों के बीच अनुभव करते हैं। इस अनिष्ट की शंका से जन्म लेते हैं द्वितीय श्रेणी के विचार अर्थात् नकारात्मक विचार..प्रतिसमय हमें अपने प्यार के खो जाने का डर सताता है और दिमाग की ऊहापोह तमाम चीज़ों से परे सिर्फ उन संशययुक्त नकारात्मक विचारों में उलझी रहती है। इन नकारात्मक विचारों के साथ ही दिमाग कुछ व्यर्थ के अनावश्यक विचारों को भी आसरा देता है..जिसमें व्यक्ति अपने प्रेमी के विषय में अनावश्यक चिंतन करता हुआ, कभी अनायास ही प्रसन्न रहता है तो कभी यूंही अवसाद में चला जाता है।

प्रेम में पाये जाने वाले उपरोक्त प्रथम तीन तरह के विचारों के अलावा, जो अन्य ऊपर-ऊपर के विचार है वे अपेक्षाकृत अधिक उत्तम है। चौथी श्रेणी में वर्णित आवश्यक विचारों का संबंध उन विचारों से है जो प्रेम को जिंदा रखते हैं..ये विचार उन कतिपय प्रयासों के प्रतिनिधि हैं जिनके सहारे व्यक्ति अपने रिश्ते को लंबा बनाता है। अपने प्रेमी को प्रसन्न रखने की कोशिशें, उसकी ज़रूरतों को समझना, अपने परिवेश को देखते हुए अपने रिश्ते के साथ योग्य समन्वय बनाये रखना। इन सभी प्रयासों के लिये चिंतनशील रहना आवश्यक विचारों के अंतर्गत शुमार है। इसके अतिरिक्त जो पंचम श्रेणी की विचार श्रंख्ला है वह अधिक प्रैक्टिकल और कल्पनालोक से दूर यथार्थपरक विश्व का प्रतिनिधित्व करती हैं..जिनमें भ्रमजनित प्रसन्नता और भ्रामक अवसाद नहीं बल्कि यथार्थपरक परिपक्वता और साम्यता निवास करती है। यहाँ किसी तरह के चाँद-तारों को तोड़ने वाले झूठे वादे या शेखचिल्ली के ख़याली पुलाव नहीं होते बल्कि अपनी परिस्थितियों को भलीभांति समझने वाला विवेक होता है..किंतु इस तरह की यथार्थपरक सोच प्रेम के आभामंडल को कहीं न कहीं कमजोर बनाता है क्योंकि प्रेम की चमक तो उसके पागलपन और एक मीठी सी सनक से ही ज़ाया होती हैं। लेकिन फिर भी पागलपन के साथ किसी प्रेम में डूबे व्यक्ति का सामना इन वास्तविक विचारों से भी होता ही है।

इस क्रम की अगली सीढ़ी है सकारात्मक विचार..प्रायः व्यक्ति के सकारात्मक होने को बेहतर माना जाता है और यह उसकी आंतरिक मजबूती का परिचायक भी होता है। सकारात्मक विचार हमेशा वास्तविक और आवश्यक विचारों के सम्मिश्रण से बनते हैं। इन विचारों में कल्पनाओं की अनावश्यक ऊछलकूद नहीं होती और न ही ये पूर्णतः प्रैक्टिकल ही होते है। इन विचारों में बस एक सच्ची उम्मीद होती है लेकिन उस उम्मीद के पूरे किये जाने का हठ नहीं होता। इन विचारों मे साहस होता है किंतु अपनी सीमाओं का भलीप्रकार ज्ञान भी पाया जाता है...इनमें अनावश्यक प्रसन्नता की चमक नहीं होती और न ही ये विचार बेबुनियाद के अवसाद से ग्रस्त होते हैं। एक उचित उम्मीद, सम्यक् प्रयास और विवेक की आधारशिला पे सकारात्मक विचारों की इमारत खड़ी होती है और यही विचार प्रेम को दैवीय स्वरूप तक पहुंचाते हैं अर्थात् ये अंतिम श्रेणी के विचारों से पहले वाली अवस्था के परिचायक हैं..इन विचारों के सोपान पर कदम रखकर ही व्यक्ति उन्नत विचारों की कक्षा में प्रवेश कर पाता है।

अंतिम प्रकार के विचार या कहें कि व्यक्ति को पारलौकिक श्रेणी में ले जाने वाले विचार..जो निर्मित होते हैं व्यक्ति के त्याग, समर्पण, निर्वाँछक, निस्वार्थ, निर्लोभ और क्रोध व अहंकार से रहित विचारों की सहायता से। प्रेम इन दिव्य विचारों की ओर ले जाने का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम है..जहाँ व्यक्ति अपनी मानवीय कमियों से दूर हठ स्वयं में दैवीय गुणों की प्रतिस्थापना करता है..और प्राणीमात्र के प्रति करुणा व त्याग से लबरेज़ होता है जहाँ व्यक्ति का सबसे बड़ा सुख दूसरों के लिये किये गये स्वयं के त्याग से शुरु होता है..जहाँ पाने की नहीं सिर्फ देने की भावना प्रबल होती है...और इस तरह प्रेम व्यक्ति को संपूर्णता देने वाला एक महत्वपूर्ण अस्त्र बन जाता है।

इन तमाम विचारों में से ऐसा नहीं है कि प्रेम में डूबे किसी व्यक्ति को किसी एकआध विचार का ही सामना करना पड़े..ये सभी तरह के विचार अलग-अलग अवस्थाओं में एक ही व्यक्ति के अंदर आ सकते हैं। प्रेम में डूबा हुआ एक ही इंसान त्याग की मूर्ति भी हो सकता है और स्वार्थ व ईर्श्या का पुतला भी। ये विभिन्न तरह के विचार व्यक्ति की अपनी इच्छाशक्ति एवं संस्कारों पे निर्भर करते हैं प्रेम तो सिर्फ एक उदासीन निमित्त का कार्य ही करता है...क्योंकि व्यक्ति के मानस में उठने वाले विचार भिन्न-भिन्न भले हों पर प्रेम से जन्मा आकर्षण इतना विविध नहीं हो सकता...प्रेम एक नैसर्गिक प्रक्रिया है जिसपे काबू कर पाना आसान नहीं किंतु उस प्रेम से पैदा विचारों की दिशा निर्धारित करने का कार्य व्यक्ति कर सकता है। अन्यथा सिर्फ बाहरी संयोगों पर ही माथापच्ची और जोड़-घटाना चलता रहेगा..किंतु अंतर में प्रतिक्षण होने वाले नये-नये जुड़ाव एवं बिखराव से व्यक्ति अनभिज्ञ ही बना रहेगा।

Saturday, January 25, 2014

मेरी प्रथम पच्चीसी : पांचवी किस्त

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(अपने जीवन की यात्रा का विवरण प्रस्तुत कर रहा हूँ..बहुत हद तक स्वांतसुखाय लिखा गया ये स्मरण, वास्तव में स्वयं की प्रेरणा के लिये है पर कुछ संघर्ष ऐसे हैं जो शायद किसी ओर के लिये भी प्रेरक साबित हो सके...जिंदगी के कुछ हिस्सों में भरपूर लफ्फाजी है तो कुछ बेहद ट्रेजिक लम्हों से भी दो चार हुआ। जो लम्हें रंगीन हैं वो यकीनन आप के बचपन की नटखट हरकतों को ताज़ा करेंगे लेकिन जो यादें त्रासदियों से लबरेज़ हैं वो एक हौंसले का संचार करेंगी, ऐसी मेरी आशा है...गुजश्ता किस्तों में काफी कुछ कह चुका हूँ अब उन पलों से आगे बढ़ने का वक्त है। हालांकि जैसा में पहले भी कह चुका हूँ कि सब कुछ कह पाना नामुमकिन है पर कम कहे गये में सबकुछ को समेटा ज़रूर जा सकता है..बस आप अल्फाज़ की जगह अहसास पढ़ने की कोशिश कीजिये)

गतांक से आगे-

कक्षा आठ की परीक्षा देने के बाद हर बार की तरह इस बार भी नानी के यहाँ छुट्टी मनाने गया था...जैसा कि बता चुका हूँ नानी के यहां जाना बड़ा ही रोमांचक हुआ करता था पर वहाँ एक हद तक ही मन लगता था उसके बाद वापस अपने गाँव लौटने की तलब मचा करती थी...लेकिन कुछ नाटकीय घटनाचक्र के कारण इस बार कि मेरी छुट्टियां लंबी होने जा रही थी...दरअसल अब मैं छुट्टियों के बाद वापस अपने घर लौटने वाला नहीं था और कक्षा नवमी में मेरा प्रवेश मेरे ननिहाल मतलब छिंदवाड़ा में ही होने जा रहा था। यह एक अहम् परिवर्तन था इसलिये थोड़ी घबराहट थी पर कुछ एडवेंचरर्स जैसी अनुभूति भी थी इसलिये थोड़ा जोश भी था.. लेकिन ये जोश कुछ हफ्तों में ही फ़ना हो गया और फिर उस जगह रहना मेरे लिये बस एक भार जैसा लगने लगा..धीरे-धीरे आत्मविश्वास भी मुरझाने लगा। कल तक जो मैं अपने आपको गाँव का शेर मानता था पर अब इस शहर में आकर अपने यथार्थ का भान हुआ और खुद को सब से काफी पिछड़ा महसूस किया और शायद इसी वजह से अब यहाँ स्कूल जाना, दोस्त बनाना, उनसे मिलना, पढ़ाई करना सब कुछ एक बोझ की तरह महसूस होने लगा। 

अपने आत्मविश्वास के कम होने का एक और कारण शायद नानी के घर के आर्थिक हालात भी थे  जिसके कारण मैं अपने संगी-साथियों में खुद को दीन-हीन महसूस करता था..जबकि अपने पैतृक निवास पे मैंने आला दर्जे की संपन्नता देखी थी पर यहाँ एकदम उल्टा ही था। स्वयं के तत्कालीन अहसासों की समीक्षा करता हूँ तो समझ आता है कि आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियां किस तरह से बालमन की बुनावट करती हैं और बचपन की उन अनुभूतियों के फलस्वरूप ही किसी व्यक्तित्व का निर्माण होता है...गोया कि बाहरी माहौल, आंतरिक वातावरण को आकार देता है जबकि ऐसा होना उचित नहीं माना जा सकता क्योंकि अंतर के वैचारिक परिवेश का निर्माण सद्ज्ञान और संस्कारों से होना चाहिये और उस आंतरिक परिवेश के अनुरूप हमें बाहरी वातावरण तैयार करना चाहिये। 

छिंदवाड़ा की इस भूमि पे रहते हुए एक और दुखद वाक़या मेरे साथ हुआ जब एक खेल के दौरान पेड़ पे से गिरने के कारण मेरे दोनों हाथ फ्रैक्चर हो गये और तकरीबन डेढ़ माह तक हाथों पर चढ़े प्लास्टर के कारण मैं उन सारे कामों से महरूम था जिनमें हाथों की ज़रूरत पड़ती है। उन पलों की अनुभूति बयाँ कर पाना ख़ासा मु्श्किल है पर ये समझ लीजिये कि जब महीने भर बाद मेरे प्लास्टर के खुलने की तिथि आई और एक्सरा रिपोर्ट में गड़बड़ी के चलते, उस प्लास्टर के खुलने की डेट को जब एक हफ्ते बढ़ा दिया गया..तो उस आगे बढ़े एक हफ्ते का वक्त मेरे लिये एक सदी के बराबर जान पड़ा था। कई बार ये सोच के अफसोस होता है कि हमें उपलब्ध चीज़ों की कीमत कभी समझ नहीं आती...न हम हाथों की कीतत समझते हैं न आँखो की, यहाँ तक की इस अनमोल जीवन की महत्ता का ख़याल भी हमें कभी नहीं आता। लेकिन ज़िंदगी के उन पलों ने मुझे कम उम्र में ही काफी कुछ सिखाया...इस कारण मुझे उन लम्हों से कोई शिकायत नहीं है और कहीं न कहीं उन लम्हों का ही योगदान है कि मैं जीवन में आने वाली आगामी विषमताओं के सामने मजबूती से खड़ा रहा। इस दौरान मेरा संघर्ष जो था वो अपनी जगह है पर मेरी नानी का मेरे लिये किया गया संघर्ष भी कुछ कम नहीं था..उन डेढ़ माह तक उनका जीवन सिर्फ मुझ तक केन्द्रित हो गया था..क्योंकि मैं इस कदर लाचार और निहत्था था कि मैं अपनी दिनचर्या की मौलिक चीज़े करने के लिये भी नानी का मोहताज़ बन गया था। नानी का मेरे लिये किये गये उस दौर के बर्ताव और समर्पण का मूल्य मैं किन्ही शब्दों से बयां नहीं कर सकता।

बहरहाल, इन कुछेक त्रासद पलों के अलावा कुछ बड़े ही रंगीन और महत्वपूर्ण जज़्बातों से भी मैं दो-चार हुआ..जिसमें सबसे ज्यादा अहम् चीज़ जो इस भूमि से मुझे मिली वो थी सांध्यकालीन पाठशाला। जिसमें भाग लेने हम हर शाम मंदिर जाया करते थे..इसने सद्ज्ञान, सत्चरित्र और संस्कारों का ऐसा बीजारोपण मुझमें किया जो ताउम्र मेरे चरित्र की मजबूती का आधार बना हुआ है। दरअसल, यह पाठशाला अधिकारिक तौर पे मेरी पहली धार्मिक-आध्यात्मिक शिक्षा का सोपान थी...बाद में ऐसे कई सोपानों से गुज़रते हुए मैंने आध्यात्मिक शिक्षा के शिखर तक की सैर की किंतु उस प्रथम सोपान की नींव को भुला पाना बहुत मुश्किल है। इसके अलावा मेरे दोस्त के घर में स्थित छोटे से ग्राउंड में हर शाम चार बजे क्रिकेट खेलने जाने का अपना अनुभव था...हर रोज़ मैं चार बजने का इंतज़ार किया करता, किसी दिन यदि मामा मुझे अपनी दुकान पे बैठा के बाहर चले जाते और इसी बीच क्रिकेट का टाइम हो जाता तो मन में अपने मामा को भी भला-बुरा कहने से नहीं चूकता था। क्रिकेट की इनकी रंगीनियों के अलावा हर सुवह कोचिंग को जाना, गवर्नमेंट कॉलेज में दोस्तों के भद्दे और अश्लील चुटकुलों को सुनना, चाहे जिसकी शादी-विवाह के फंक्शन में जाके तरह-तरह के व्यंजन खाना, स्कूल बंक करके पार्क में बैठना और न जाने ऐसे कितने तरह के अनोखे और मजेदार अनुभव थे जिनसे मैं पहली बार गुज़र रहा था...लेकिन इन अनुभवों से गुज़रते हुए मेरे अंदर एक व्यक्तित्व का सतत् निर्माण हो रहा था।

ये दौर 2000-2001 के दरमियां का है...नई सदी में दुनिया प्रविष्ट हो चुकी थी और मैं भी अहसासों की नई कशिश को महसूस कर रहा था। मेरे लिये ये जीवन का वो दौर था जब बचपनें ने पूरी तरह मेरा दामन नहीं थामा था और जवानी ने अब तक दस्तक नहीं दी थी..लेकिन अंदर ही अंदर कुछ तो बदल रहा था..और उस बदलाव के चलते कुछ विद्रोही जज़्बात रुह में दस्तक दे रहे थे तो कई रुमानी ख़यालों से भी दो चार होने लगा था..लेकिन उन नादान जज़्बातों में भटकने की सर्वाधिक संभावना थी..ऐसे में संगति सर्वाधिक असर करती है। जो उन जज्बातों को अपने अनुरूप आकार देने का माद्दा रखती है..खैर इन जज़्बातों का विवरण आगे की किस्तों में दूंगा..फिलहाल इन्हें स्किप कर आगे बढ़ता हूँ।

भारत-आस्ट्रेलिया की ऐतिहासिक टेस्ट श्रंख्ला गतिमान थी..हरभजन की हैट्रिक और लक्ष्मण-द्वविड़ की शानदार पारियों की बदौलत आस्ट्रेलिया के विजयरथ को रोककर इंडिया चहुंओर कीर्ति अर्जित कर रही थी...लेकिन मैं इन खुशियों में डूबा हुआ होने पर भी वापस अपने घर लौटने को बेचैन था...अपने उसी गांव जहाँ घर के पीछे एक बूढ़ा आम का पेड़ है, जहां दादी के पलंग के पास सुलगती सिगड़ी है, जहां हरे-भरे खेत और उबड़-खाबड़ कच्चे रास्ते हैं, जहां कंचे, गिल्ली-डंडा और एक टूटा हुआ क्रिकेट का बल्ला है...मैं वहीं लौट जाना चाहता था...मेरे माँ-बाप के लिये मेरा वापस लौटना कहीं न कहीं मेरे उन्नत भविष्य के टूटने की तरह था..मेरे विकास की राह में रोड़ा था...पर बचपन कहाँ विकास चाहता है वो तो सिर्फ खुशी चाहता है..और वो खुशी यदि बैलगाड़ी, टूटे हुए खिलौनों और कच्ची पगडंडियों में मिल रही हो तो भला कौन हवाईजहाज, शॉपिंग मॉल और विदेश भ्रमण की आरजू करे???

ज़ारी............

Saturday, January 18, 2014

गपोढ़ अल्फाज़ और अधेड़ अहसासों की 'डेढ़ इश्किया'

'हर किसी को आज़ादी पसंद होती है लेकिन उस आज़ादी के लिये किसी न किसी को तो कीमत ज़रूर चुकानी होती है'...लगभग ऐसे ही किसी गंतव्य तक पहुंचने का प्रयास करती अभिषेक चौबे निर्देशित और विशाल भारद्वाज निर्मित 'डेढ़ इश्कियां' देखी। हालांकि विशाल भारद्वाज की छाया इस फ़िल्म पे पड़ी हुई है इसलिये किसी सार्वभौमिक कथ्य तक पहुंचने की आशा आप नहीं कर सकते...क्योंकि मासुमियत और गहन बौद्धिकता के बीच फंसे इस फ़िल्मकार के कथानक को देख लोग इसे अपने-अपने ढंग से विश्लेषित करते हैं..और विश्लेषण के पश्चात सबके अपने-अपने ही निष्कर्ष होते हैं। वैसे ये विशाल से ज्यादा अभिषेक की फ़िल्म हैं इसलिये आप मनोरंजन और अर्थों की कुछ नई परतें इस सिनेमाई कलेवर से उखाड़ सकते हैं। मनोरंजन के लिये इस फ़िल्म की गपोढ़ संवादगी और अर्थों की खोज के लिये इसके अधेड़ पड़ चुके जज्बातों की उधेड़बुन की जा सकती है..कुछ इन्हीं वजहों से ये सिनेमा के पारंपरिक मनोरंजन से दूर हो ऑफबीट फ़िल्म होने का दंभ भर सकती है...किंतु फिल्म का ट्रीटमेंट, सिनेमेटोग्राफी और कुछ ऐसी ही दूसरी चीज़ें इसे मुख्यधारा के सिनेमा में धकेल देती हैं।

इंसान के रुहानी जज़्बातों की विविध परतों और तकरीबन बूढ़े हो चुके अहसासों को..समाज की रिवाज़ी बंदिशों से आज़ाद कर एक नया आसमान देने की कोशिश अभिषेक चौबे ने की हैं...यूं तो फ़िल्म का मनोरंजन पक्ष ज्यादा मुखर है इसलिय फ़िल्म के कुछ कंट्रोवर्सियल मायने चुप्पी साधे रहते हैं। खासतौर से वर्तमान के इस दौर में जहाँ देश की एक कोर्ट द्वारा समलैंगिकता को बड़ा अपराध बताया गया है, धारा-377 पर राजनीतिक गहमागहमी ज़ारी है.. उसी दौर में ये फ़िल्म बड़ी खामोशी से उन रिश्तों की पैरवी करती नज़र आती है। निर्देशक ने फिल्म में बेहद संवेदनशील दृश्यों को इस चतुराई से फिल्माया है कि अंत तक उस रिश्ते के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता...पारा ज़ान(माधुरी) और मुनिया(हुमा कुरैशी) के आपसी संबंधों को जिस असमंजसपूर्ण स्थिति के साथ फिल्मकार ने प्रस्तुत किया है वो भारतीय समाज के अंदर बहुत बड़े विवाद की वजह माने जाते हैं किंतु फिल्मकार के प्रस्तुतिकरण का तरीका इतना ज्यादा डिप्लोमेटिक है कि विवाद करने की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती। जबकि इसी रिश्ते के बिंदास प्रस्तुतिकरण के चलते मीरा नायर की 'फायर' विवादास्पद बन जाती है। 

पारा और मुनिया के रिश्ते की पृष्ठभूमि निर्मित करने की जो वजह फिल्मकार ने दी है उसके चलते दर्शकों को भी इस रिश्ते के साथ हमदर्दी हो जाती है। इस रिश्ते की वजह भी पारा के शौहर का समलैंगिक होना बताया गया है...और अपने शौहर की इन अय्याशियों के चलते ही पारा की ज़िंदगी में तन्हाई है और पारा ज़ान को उस तन्हाई को दूर करने का ज़रिया किसी मर्द के नहीं बल्कि एक औरत के प्रेम में ही नज़र आता है। अपने पति की अय्याशियां और उनके समलैंगिक संबंध पारा के मन में सारे मर्द समाज के लिये ही नफ़रत का बीज़ बो देते हैं और पुरुष की इन स्वछंद हरकतों के खिलाफ ही उसकी जंग है..उसका बदला किसी मर्द को ठगने से पूरा होगा जिससे वो अपने स्वछंद आनंद के पैमाने निर्धारित कर सकें, उस आनंद को जी सके।

एक खास बौद्धिक वर्ग को  ये रास्ता महिलासशक्तिकरण के दरबाजे पे दस्तक की तरह नज़र आयेगा..जहाँ ये स्त्री द्वारा अपनी आजादी और आनंद के लिये किये गये संघर्ष का ही एक रूप माना जायेगा...और इसे वे स्त्री का तिरियाचरित्र न कह 'Survival of Fittest' कहना ज्यादा पसंद करेंगे। एक स्त्री अपने शरीर को मर्द को सौंपते वक्त भी अपना ही उल्लु सीधा कर रही है और संभोग उपरांत उस मर्द को भी ये संशय बना हुआ है कि उसने स्त्री का इस्तेमाल किया है या वो खुद स्त्री द्वारा इस्तेमाल किया गया है...अबसे पहले औरत की इज़्जत को दैवीय रूप देकर हमेशा उसे पुरुष के समक्ष दबाने की कोशिश की गई है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि औरत, चाहकर भी पुरुष की आबरु नहीं लूट सकती किंतु पुरुष ऐसा कर सकता है।

एक औरत द्वारा अपने भ्रम का आभामण्डल रचा जाता है और उस आभामण्डल की चमक के चलते ही कई नवाब अपने हुनर की पेशगी उसे पाने के लिये करते हैं...एक अधेड़, बीमार और अवसाद ग्रस्त महिला अपनी चालाकियों से दिग्गज मर्दों को बेवकूफ बनाती है..और उन अधेड़ मर्दों के बुढ़या चुके अहसासों को भी जवान बनाती है, उनमें नये अरमान जगाती है। इन तमाम कारगुज़ारियों के दरमियां परदे पे हमें मर्दों की विशाल महफिल के बीच सिर्फ एक औरत ही इंटेलीजेंट नज़र आती है अन्यथा हिन्दी सिनेमा का सुर तो हमेशा से औरतों को 'क्यूट' कह कर उनकी बेवकूफी की बिक्री करने वाला ही रहा है। वास्तव में पुरुष अपनी कमतरी को छुपाने के लिये ही साहित्य-सिनेमा और समाज में उन रिवाज़ों को जन्म देता है जिससे स्त्री अबला नज़र आती है अन्यथा प्राकृतिक तौर पे स्त्री, परुष की तुलना में अधिक मजबूत और हुनरमंद रही है। 'डेढ़ इश्किया' कहीं-कहीं नारी की उस सशक्तता का ऐलान करते नज़र आती है। एक अन्य अहम् बात जो इस सिनेमा में देखी जा सकती है कि फ़िल्म में तकरीबन तमाम किरदार अधेड़ उम्र के हैं लेकिन उनमें मोहब्बत के जज़्बात और इश्क पाने की हसरत अब भी जवां बनी हुई है..इन अहसासों की लुका-छिपी के बीच ही आला दर्जे की मूर्खता पैदा होती है और यही मूर्खता दिल को बच्चा बनाये रखती है। जिस बात को इस फ़िल्म के पिछले संस्करण में एक गीत के ज़रिये दर्शाया गया था।

बहरहाल, बेहतरीन अभिनय, शानदार संवाद एवं शायरियां, उम्दा निर्देशन, बढ़िया सिनेमेटोग्राफी और नवाबी कल्चर के दीदार करने की आरजू है तो डेढ़ इश्कियां एक अच्छा विकल्प है। हालांकि इस फ़िल्म की टारगेट ऑडियंस बहुत ज्यादा युनिवर्सल नहीं हैं पर आप थोड़ा भी शायराना और आशिकाना मिज़ाज रखते हैं तो 'डेढ़ इश्कियां' आपको निराश नहीं करेगी..और जैसा कि बताया कि ये विशाल भारद्वाज के बैनर तले बनी फिल्म है तो विशाल की फ़िल्मों में आपको ऐसी एक-आध चीज़ मिल ही जाती है जो आपके पैसे वसूल करवा देती है। लेकिन साथ ही ये भी याद रखें कि चुंकि ये भारद्वाज बैनर की फ़िल्म हैं तो आप बिना किसी निष्कर्ष के ही सिनेमाघरों से बाहर आयेंगे...क्योंकि दर्शकों को निश्कर्ष तक पहुंचाने से विशाल की यूएसपी प्रभावित होती है और अपनी यूनिकनेस के साथ समझौता करना विशाल को कतई पसंद नहीं आएगा........