Tuesday, December 30, 2014

धोनी! बस एक यही सरप्राइस अच्छा नहीं लगा...

वर्ष 2014 का अंत इस ख़बर से होगा उम्मीद नहीं थी...क्रिकेट और क्रिकेट प्रेमियों के लिये शायद सबसे बड़ी ब्रेकिंग। लेकिन एक ऐसी ब्रेकिंग जो कतई अपेक्षित नहीं थी। हालांकि यह सही है कि आस्ट्रेलिया में चल रही मौजूदा टेस्ट सीरिज़ में इंडिया कुछ कमाल नहीं कर पा रही थी और हर कोई धोनी की कप्तानी पर सवाल उठा रहा था और उन्हें कप्तानी छोड़ने की नसीहतें दे रहा था। लेकिन वे महज कप्तानी ही नहीं बल्कि टेस्ट क्रिकेट को भी अलविदा कह देंगे ये किसी ने नहीं सोचा था। सिर्फ 33 वर्ष की उम्र में ये फैसला बहादुरी भरा है और धोनी के नज़रिये से देखा जाय तो यह सही भी होगा...पर क्रिकेट प्रेमियो को यह रास इसलिये नहीं आ रहा क्योंकि किसी को भी क्रिकेट के इस महानतम योद्धा को आलीशान विदाई देने का अवसर नहीं मिला..या कहें कि हम ठीक से अलविदा न कह सके...और जुदा होने से ज्यादा दुखदायी होता है किसी को ठीक से अलविदा न कह पाना।

वर्ष 2007। धोनी पहली मर्तबा कप्तान बने और यह सिलसिला तब से ही शुरु हुआ। भारत को न सिर्फ जीतना सिखाया..बल्कि अधिकारपूर्ण जीत और टीम का वर्चस्व कैसा होना चाहिये यह भी उन्होंने ही बताया अपने निर्णयों से सरप्राइज देने का सिलसिला भी उन्होंने पहले ही मैच से शुरु कर दिया। जब पहले टी-ट्वेंटी वर्ल्ड कप के टाई हुए पहले मैच में अंतिम निर्णय बॉल आउट के ज़रिये होना था..और धुर विरोधी पाकिस्तान के खिलाफ धोनी ने अपने रेगुलर बॉलर्स की तुलना में सेहवाग और उथप्पा से गेंद फिकवाकर वो मैच जीता। इसी तरह उस वर्ल्ड कप के फाइनल में अंतिम और निर्णायक ओवर जोगिंदर सिंह जैसे चलताऊ गेंदबाज से करवाया...लेकिन बावजूद इसके टीम को जीत का स्वाद चखाया और आगे चलकर इसकी आदत डाली। इस तरह के सरप्राइजेस से भरा उनका पूरा करियर ही रहा।

जब कप्तानी मिली तो जिम्मेदारी भी बढ़ी और इस खिलाड़ी ने टीम हित में निजी स्वार्थों को ताक पर रखकर कई कड़े फैसले लिये। जैसे खुद की बैटिंग पोजिशन में बदलाव। शुरुआत में वे तीसरे नंबर पर खेलने आते थे और उस नंबर पर खेेलते हुए उन्होंने वनडे क्रिकेट की अपनी श्रेष्ठ पारियां (183 और 148 रन) खेली। लेकिन बाद में धोनी छठवे-सातवे नंबर पर सिर्फ इसलिये खेले ताकि निचले क्रम को मजबूती दे सके और परिस्थितियों के अनूरूप टीम को संबल प्रदान कर सकें। अपने बल्लेबाजी क्रम में ज़रूरत के मुताबिक बाद में भी कई परिवर्तन किये। कभी वे आठवे नंबर भी खेले और ज़रूरत पढ़ने पर चौथे या वापस तीसरे नंबर पर भी खेलने उतरे। 2011 के क्रिकेट वर्ल्ड कप का फायनल कौन भूल सकता है जहाँ तीसरे नंबर पर बेटिंग कर मुश्किल में फंसी टीम को न सिर्फ परेशानी से बाहर निकाला बल्कि नायाब 91 रन बनाकर भारत को अट्ठाईस साल बाद वनडे विश्व कप जिताया। 

धोनी, शुरुआत में अपनी आक्रामक शैली के लिये जाने जाते थे पर वक्त के साथ उन्होंने अपने रवैये में खासा परिवर्तन किया। कौन भूल सकता है 2007 में इंग्लैण्ड में हुए लार्ड्स टेस्ट मैच को..जब धोनी ने लगभग पूरे दिन बल्लेबाजी कर 203 गेंदों में मात्र 76 रन बनाये और निचले क्रम के साथ मिलकर तकरीबन हारा हुआ मैच ड्रा कराया। बाद मे भारत ने यह टेस्ट सीरिज़ 1-0 से जीती। इसी तरह मेलबोर्न में हुए अपने अंतिम मैच में भी धोनी ने अपने प्रवृत्ति के विरुद्ध बल्लेबाजी से अश्विन के साथ मिलकर मैच को ड्रा कराने में सफलता पाई। यह सारी चीज़ें सिर्फ टीम हित में..क्योंकि यदि धोनी हमेशा अपना स्वाभाविक गेम और बल्लेबाजी में ऊपरी क्रम पर खेलते तो उनके व्यक्तिगत रिकॉर्ड कई बेहतर हो सकते थे जो कि आज हैं। इन परिवर्तनों को देख हम कह सकते हैं कि वक्त के साथ वे अपनी युएसपी माने जाने वाले लंबे बालों को छोटा करते गये पर उनका कद लगातार बढ़ता गया। 

कैप्टन कूल के नाम से प्रसिद्ध इस खिलाड़ी की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है इनकी सहजता। ये जीत को जितनी संजीदगी से स्वीकार करते हैं उतने ही धैर्य से अपनी हार और असफलताओं को भी लेते हैं। न इन्हें जीत में बौराना आता है न ही हार में बिखरना। मुझे अच्छे से याद है जब 2007 वनडे वर्ल्डकप में मिली शुरुआती हार के बाद लोगों ने धोनी के घर पर तोड़-फोड़ की थी तब धोनी ने कहा था एक दिन यही लोग मेरे घर की दीवार खड़ी करेंगे। 2011 विश्वकप के बाद यह सच साबित हुआ। इसी तरह 2011 विश्वकप जीतने के बाद जहाँ टीम के खिलाड़ियों के साथ पूरा देश खुशी में पागल हो रहा था तब धोनी के चेहरे पर मात्र एक संजीदा मुस्कान और साम्यता देखी जा सकती थी। गोयाकि धोनी अपने व्यक्तित्व से गीता के स्थिरप्रज्ञ की अवधारणा को जीवंत करते हैं। अनुशासन, धैर्य और लक्ष्य पर तीक्ष्ण नज़र ये चीज़ें भी धोनी से ग्रहण की जा सकती है। यही वजह है कि मैच की अंतिम गेंद तक वे आपा नहीं खोते और आखिर तक प्रयासरत रहते हैं।

एक बेहद सामान्य परिवार और पृष्ठभुमि से आये धोनी...यह साबित करते हैं कि सफलता, संसाधनों की मोहताज नहीं होती..और संसाधनों का पर्याय तो मिल सकता है पर प्रतिभा का पर्याय नहीं मिलता। असीम शोहरत और पैसा कमाने के बावजूद वे संयमित रहे...और कंट्रोवर्सी से दूर। आईपीएल घोटाले मामले में चैन्नई सुपर किंग का नाम उछला पर धोनी ने तब भी सिर्फ वहीं फोकस किया जो उनका वास्तविक काम था। उनके इसी आचरण ने किसी को भी उन पर उंगली उठाना के मौका नहीं दिया। वो कहते हैं न कि आप सिर्फ अपने चरित्र की रक्षा कीजिये आपका यश आपकी स्वयमेव रक्षा कर लेगा। कुछ ऐसा ही धोनी के साथ हुआ। सामान्य से चेहरे-मोहरे वाला युवा देश का स्टाइल आइकॉन बना, ट्रेन में टीटीई की नौकरी करने वाला ये युवा देश का सबसे अमीर सेलीब्रिटी भी बना, लड़कियों में उनका पागलपन छाया और बॉलीवुड में उनकी दीवानगी को बताने वाली 'हैट्रिक' जैैसी फ़िल्म भी बनी..पर इस तमाम चौंधियाने वाली शोहरत के बावजूद उनका ध्यान कभी अपने लक्ष्य से ओझल न हुआ। धोनी के ऐसे कई उदाहरण पेश किये जा सकते हैं जो आज के युवा के लिये प्रेरणादायी हो सकते हैं..क्योंकि सफलता और उसकी निरंतरता सिर्फ प्रतिभा पर निर्भर नहीं करती..उसके पीछे सतत् संघर्ष और मजबूत चरित्र बेहद ज़रुरी होता है।

बहरहाल, धोनी क्रिकेट के इस महत्वपूर्ण फॉरमेट को छोड़कर जा रहे हैं लेकिन अब भी वे हमें वनडे और टी-ट्वेंटी में नज़र आते रहेंगे और हम उम्मीद करेंगे कि इस एक फॉरमेट को छोड़ने से उनका वनडे और टी-ट्वेंटी करियर काफी लंबा हो..और अपनी कप्तानी में वे देश को 2015 का विश्वकप जिताकर एक बार फिर झूमने का मौका देंगे..यह काम धोनी के लिये कोई मुश्किल नहीं है क्योंकि टी-ट्वेंटी और वनडे विश्वकप, आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी, टेस्ट में टीम इंडिया को नंबर वन का खिताब के अलावा अपनी टीम चैन्नई सुपर किंग को दो बार आईपीएल और इतनी ही बार चैंपियंस लीग टी-ट्वेंटी का खिताब जिताया...कहते हैं जीतना एक आदत होती है और धोनी को यह लत बहुत पहले ही पड़ चुकी थी..उम्मीद है वे फिर जीतेंगे। धोनी के इस रिटायरमेंट पर उनके साथी खिलाड़ी सुरेश रैना द्वारा किया ट्वीट काफी सही साबित होता है कि धोनी ने बहादुरों की तरह अगुआई की और बहादुरों की तरह ही विदाई ली। 

Saturday, December 20, 2014

इक बूंद भी उसने न पी पर 'पीके' वो कहलाया था : टिंगा-टिंगा, नंगा-पुंगा दोस्त

वैश्विक परिदृष्य में इन दिनों पाकिस्तान में हुई आतंकवादी वारदात की ख़बर ताजी है..भारत में धर्मांतरण के मुद्दे पर संसद आये दिन गरमाती रहती है, लव जेहाद जैसे मुद्दें बहस का विषय बने हैं, इसी तरह पाखंड-झूठ-दिखावा और स्वार्थ जैसी दुर्दांत वृत्तियां दुनिया को एक समुचित संतुलन से दूर रखे हुई हैं। इन्ही वजहों से कोई सब कुछ होते हुए भी अगाध तृष्णा के चलते दुखी है तो कोई अभावों के चलते पीड़ित। कोई न मिले हुए को हासिल करना चाहता है तो कोई मिले हुए को गंवाना नहीं चाहता....और इन हालातों में जो मनोभाव व्यक्तित्व का हिस्सा बनता है वो है डर और लालच। फिर इन्हीं मनोभावों से जन्म लेती है धर्म की तथाकथित परिभाषाएं, तथाकथित ईश्वर के रूप और पश्चात ईश्वर एवं धर्म के नाम पर असंख्य आडंवर...अनंत सरहदें।

पीके। आमिर ख़ान अभिनीत और राजकुमार हीरानी निर्देशित एक बेहतरीन फ़िल्म। इन दो लोगों का फ़िल्म से जुड़ा होने ही इसके सार्थक और मनोरंजक होने की गारंटी देती है। हीरानी ने अपनी पिछली फ़िल्मों की तरह इस बार भी अपने कद को और ऊंचा करने का ही काम किया है..या यूं कहें की उनके मन में समाज की दोहरी वृत्तियों को लेकर बेइंतहा छटपटाहट है जो किस्तों में बाहर आ रही है। 'पीके' भी मुन्नाभाई और थ्री इडियट्स की श्रंख्ला को ही आगे बढ़ाती है। हीरानी के नायक सभ्य-सुसंस्कृत समाज के प्रतिनिधि नहीं होते..ये तो गुंडे-मवाली, इडियट्स और दूसरे ग्रह के पियक्कड़ किस्म के नमूने होते हैं जो सभ्य समाज की तमाम संस्कृति की बखैया उधेड़ते हैं। 'पीके' भी कुछ ऐसी ही है। धर्म,  धर्मायतनों और धार्मिकों की सच्चाई बयां करने वाली। ईश्वर के नाम पर चल रहीं सैंकड़ों दुकानों और उनके ठेकेदारों की असल नस्ल का परिचय देने वाली। भगवान के नाम पर इंसान से उसका हक छीनने वालों को उनकी गिरेबान में झांकने पर मजबूर करने वाली।

धर्म, इंसान को नैतिक बनाने के लिये था...ईश्वर, इंसान को अभिमानी बनने से रोकने के लिये था लेकिन अब इस धर्म के नाम पर ही नैतिकता का चीरहरण और इंसान का अभिमान पुष्ट हो रहा है। 'पीके' में कई ज्वलंत सवाल उठाते हुए एक बात कही गई है कि हम उस भगवान को माने जिसकी वजह से हमारी हस्ती, हमारे आचार-विचार और व्यवहार हैं न कि उस ईश्वर को अपनी आस्था का केन्द्र बनाये जिसे हमने अपने-अपने पक्ष पोषण के लिये पैदा किया है। आज धर्म और ईश्वर के नाम पर व्यवसाय हो रहा है, राजनीति हो रही है, बंटवारा हो रहा है, विवाद, लड़ाई-झगड़े और असीम हिंसा हो रही हैं लेकिन धर्म के नाम पर कहीं धर्म नहीं हो रहा। बेशक, हमें धार्मिक होना चाहिये...लेकिन पंथों में बंटे किसी एक ईश्वर का पिछलग्गु होकर नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता या कहें कि समस्त वसूधा को अपने प्रेम में समेटते हुए धार्मिक होना चाहिये। धर्म अपने अस्तित्व का बोध कराने के लिये था लेकिन उस धर्म की प्राप्ति के जतन आज खुद की और कई बार दूसरों की भी हस्ती मिटाकर किये जा रहे हैं। 

हीरानी ने अपनी पिछली फ़िल्मों लगे रहो मुन्नाभाई और थ्री इडियट्स की तरह इस फ़िल्म में भी अपना सिग्नेचर मार्क छोडा है। जैसे उन फ़िल्मों को देखने के बाद गेट वेल सून और ऑल इज वेल जैसे मंत्र ज़हन में छूट जाते हैं वैसे ही 'पीके' देखने के बाद 'राँग नंबर' दिल में चस्पा हो जायेगा..इस राँग नंबर के जरिये निर्देशक ईश्वर को पाने के उन तमाम जतनों पर सवाल उठाता है जिसके चलते देश-दुनिया में धर्म का व्यापार चल रहा है। मसलन फ़िल्म में कुछ ऐसे ही एक गीत के बोल हैं- "दुनिया नशे में टल्ली थी यह होश में उसे लाया था, थर्रा दे जो पूरी धरती को, वो सवाल उसने उठाया था...टिंगा-टिंगा-नंगा-पुंगा दोस्त"

'पीके' समझदारों के बीच भटका है और उसकी सबसे बड़ी मुश्किल इन समझदारों को ही समझना है। तन पर पहने जाने वाले भांत-भांत के वस्त्राभूषण की तरह लोगों ने अपने व्यक्तित्व पर भी असंख्य प्रकार के आवरण डाल रखे हैं और व्यक्तित्व की इन परतों में असल इंसान कौन है यही समझ पाना सबसे जटिल काम है। ज़मीन पर जो इंसान पैदा हुआ था वो ऐसा कतई नहीं था बल्कि जमाने ने समाजीकरण की प्रक्रिया करते हुए इस इंसान को गढ़ा है। जो अत्यंत छली है, असंतुष्ट है, स्वार्थी है और झूठा है और यदि इसने जैसे को तैसा कहना सीख लिया तो यह दुनिया इस पर मूर्ख होने का तमगा ठोंकते देर नहीं करेगी। डिप्लोमेटिक और प्रेक्टिकल होना ही आज की ज़रूरत है और ऐसा बन जाने पर मानवीयता और प्रेम का अक्स आपके व्यक्तित्व में बना रहे ऐसा हो पाना नितांत दुर्लभ है।

पीके में प्रेम कथा भी है...और बड़ी संजीदगी से निर्देशक ने बताया है कि प्रेम सिर्फ सन्निकटता का मोहताज होता है, मात्र सहृदयता का आकांक्षी होता है..इसके अलावा कोई शर्त उसपे नहीं लगाई जा सकती। लेकिन मौजूदा दौर के प्रेम में धर्म, जाति, वर्ग, देश जैसी न जाने कितनी बंदिशें है...धर्म के नाम पर बनाये गये तमाम रिवाज़ परतंत्र बनाये रखने के लिये हैं...प्रेम, स्वतंत्रता का हिमायती है इसलिये प्रेम पर भी धर्म की लकीरों से ही सबसे ज्यादा सरहदें बनाई जाती हैं। आश्चर्य होता है इस छोटे से जीवन और इस तनिक सी दुनिया में जाने कैसे इतनी सरहदें इस इंसान ने बना रखी हैं? 'पीके' का नायक दूसरी दुनिया के इंसान से प्यार कर बैठता है उसकी वजह सिर्फ सहृदयता है समानता कतई नहीं। 

बहरहाल, ज्यादा कुछ कहकर फ़िल्म का चिट्ठा इस पोस्ट में बयां नहीं करना चाहता..और ऐसा मैं कर भी नहीं सकता क्योंकि फ़िल्म के अर्थ बेहद गहरे हैं। एक शब्द में कहें तो ये बेमिसाल है। जिसका जल्द से जल्द थियेटर में जाकर मजा उठाया जाना चाहिये। आमिर खान के करियर में ऐसे अनेक नगीने हैं जो उन्हें दूसरे अभिनेताओं से अलग करते हैं यह फ़िल्म उनका कद समकालीन अभिनेताओं से और भी ऊपर ले जाने वाली है और 'हैप्पी न्यू ईयर' जैसे हादसे रचने वालों को तो ये प्रेरणा देने वाली है। फ़िल्म में कई जगह आमिर का अभिनय बदन में अनायास ही झुनझुनी पैदा कर देता है। खुद को कैसे किरदार में ढाला जाता है यह कोई आमिर से सीखे..नवोदित अभिनेताओं के लिये तो वे एक युनिवर्सिटी बन गये हैं।

विधु विनोद चोपड़ा भी बधाई के पात्र हैं जो इन सार्थक फ़िल्मों पर शिद्दत से काम करते हैं और वर्षों में भले एक फ़िल्म देते हैं लेकिन गुणवत्ता से समझौता नहीं करते। राजकुमार हीरानी के बारे में जो भी कहे वो कम है..संभवतः वे अपने दौर के इकलौते फ़िल्मकार हैं जो विषय की गंभीरता और मनोरंजन दोनों में से किसी को भी अपनी फ़िल्म में कमजोर नहीं पड़ने देते। अन्यथा, विषय के कारण मनोरंजन गौढ़ हो जाता है या मनोरंजन के कारण विषय..पर हीरानी अपवाद है। संगीत आनन्द देने वाला है..और हीरानी की दूसरी फ़िल्मों की तरह सांदर्भिक भी। अनुष्का में ताजगी है..और फिल्म देखने के बाद उनका अभिनय भी याद रखा जायेगा। दूसरे कलाकारों के लिये ज्यादा स्पेस नहीं है...पर जितना है उसमें वे अपने रोल से न्याय करते हैं। कुल मिलाकर कंप्लीट पैकेज। जो कमियां हैं भी तो उन्हें इग्नोर करना ही समझदारी है।

और ज्यादा क्या कहूँ...कुछ दिनों बाद आप खुद देख लीजियेगा कि ये 'पीके' किस तरह लोगों के दिलो-दिमाग पर छाने वाला है...यदि आप अब तक इस नायाब सिनेमा के दीदार से दूर हैं तो शीघ्रता करें..हो सकता है ये नंगा-पुंगा दोस्त पूर्वाग्रहों में भटके आपके दृष्टिकोण को भी सही दिशा दे दे..............

Tuesday, December 16, 2014

मेरी प्रथम पच्चीसी : दसवी किस्त


(शुरुआती नौ किस्तों में जीवन के प्रारंभिक अठारह वर्षों की दास्तां सुना चुका हूँ, अब तक की ज़िंदगी के अनुभव बहुत ज्यादा हैपनिंग तो नहीं रहे पर जैसे भी रहे उनमें सिखाने का माद्दा बहुत था। अपने परिवार से निकलकर जिस हॉस्टल में स्नातक किया वहाँ भी माहौल काफी कुछ सुरक्षित ही था और लगभग एक जैसे वर्ग, संस्कृति और प्रकृति वाले लोगों के साथ रहा। अपने हॉस्टल लाइफ का विवरण एक अन्य ब्लॉग पर स्मारक रोमांस और Pinkish Day in Pinkcity नाम से लिखी पोस्ट में कर चुका हूं। इसलिये यहाँ ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा, सीधे आगे की किस्सागोई शुरु करता हूँ। चुंकि पहले कह चुका हूँ मेरी प्रथम पच्चीसी स्वांतसुखाय ही लिखी जा रही है इसलिये किसी से भी जबरदस्ती इसमें प्रवेश करने का आग्रह नहीं करुंगा। अपनी रुचि और समय के अनुकूल ही इसमें प्रविष्ट हों।)

गतांक से आगे....

ज़िंदगी उस वक्त सबसे ज्यादा कठिन हो जाती है..जब सीधे चल रहे रास्तों के बाद अचानक कोई मोड़ आता है। जब फैसले लेेने की घड़ी आती है। जब हमें ऐसे चौराहों पर छोड़ दिया जाता है जहां रास्तों का पता बताने वाले बोर्ड  नहीं लगे होते। लेकिन आप जहाँ हो वहाँ आप रह नहीं सकते और आगे बढ़ने को लेकर निरंतर संशय की स्थिति बनी रहती है। ज़िंदगी हर हाल में फैसले की दरकार कर रही होती है और ऐसे चौराहों से जीवन में पहली बार मुलाकात हो रही थी। हालांकि हाई स्कूल या हायर सेकेंडरी के बाद इस तरह की परिस्थितियां बनती हैं जब फैसला करना होता है लेकिन तब हमारे ज्ञान और विवेक की बजाय माँ-बाप के लिये गये फैसलों की अहमियत ज्यादा होती है। पर स्नातक की परीक्षा करने के बाद पूर्णतः स्वंय की समझ और हिम्मत से ही चुनाव करना पड़ता है। जयपुर के टोडरमल स्मारक में पांच साल पूरे करने के बाद अब फैसले की घड़ी थी, बदलाव की घड़ी थी और बदलाव हमेशा आपको विचलित करता है।

उस परिसर में रहते हुए कभी सोचा नहीं था कि इक दिन इसे छोड़कर किसी और तलाश में निकलना होगा।  दोस्तों का साथ, फुरसत के लम्हे और ऐशो-आराम की घड़ियां अब इतिहास बनने जा रही थी। संघर्ष का सफ़र शुरु हो रहा था। इसलिये मन बड़ा बेचैन था और इन बेचैनियों के दौर में ही आपको अपने सफ़र का अगला रास्ता तय करना होता है। यदि अच्छी किस्मत, हौंसला और हिम्मत न हो तो इस दौर में लिये गये फैसले पूरी ज़िंदगी को ही अंधेरों के भंवर में धकेल सकते हैं। इसलिये जिम्मेदारी ज्यादा थी। जो छूट रहा था उसका ग़म था, जो हो रहा था वो बहुत तनावपूर्ण था और जो हासिल करना है वो बहुत ही कन्फ्युसिंग था। ऐसी मानसिक स्थिति के बीच मैंने ग्लैमर की चकाचौंध में मुग्ध होकर मीडिया को अपना करियर बनाने का मन बनाया। अपने हॉस्टल में मैं स्टार माना जाता था, अच्छा वक्ता, तार्किक दक्षता वाला और कुछ हद तक बुद्धिमान भी समझा जाता था...पर उस छोटे से दायरे में मैं कूपमंडूक ही था और खुद को मिली तनिक सी प्रशंसा में उन्मादी हो रहा था। उस उन्माद ने ही मुझमें ये आत्मविश्वास भरा था कि मैं मीडिया में भी स्टार बन सकता हूँ। लेकिन जैसे ही उस छोटे से कूँए से निकल कर दुनिया के समंदर में पहुंचा तो अपने अदने से कद का ज्ञान हुआ और पता चला कि मियां! यहाँ तो तुमसे कई बेहतर बल्लम खाँ पहले से ही अपनी मंजिल को पाने के लिये संघर्ष कर रहे हैं।

बहरहाल, टोडरमल स्मारक के छूटने के साथ ही अब एक नया शहर और नया सफ़र मुझे मिल चुका था। भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में दाखिला लेने जा रहा था और इस युनिवर्सिटी के सामान्य से इंट्रेंस एक्साम ने ही मुझे अपनी गिरेबान में झांकने का अवसर प्रदान कर दिया और ये पता चल गया कि अपने इस झूठे आत्मविश्वास को जितने जल्दी खुद से बाहर किया जा सके उतना बेहतर है क्योंकि ये आत्मविश्वास नहीं अहंकार है और अहंकार के साथ कभी कुछ सीखा नहीं जा सकता। विनम्रता से ही ज्ञान प्राप्त करने की पात्रता प्रगट होती है और विनम्रता ही ज्ञान या शिक्षा का परिणाम होना चाहिये। इंट्रेस टेस्ट में मेरा सिलेक्शन नहीं हुआ और मध्यप्रदेश का होने के कारण स्टेट कोटे के कारण वेटिंग लिस्ट में भी अंतिम स्थान मिला था। बाद में किस्मत और थोड़ी मिन्नतों के बाद जैसे-तैसे उस युनिवर्सिटी में पढ़ने का अवसर मिला। इससे पहले के कुछ दिन बेहद कठिन और किंकर्तव्यविमूढ़ कर देने वाले थे।

6 अगस्त 2007, युनिवर्सिटी में अपनी पहली क्लास अटेंड करने पहुंचा। सब कुछ अलग और नया था। अब तक जो पढ़ा था उसका रत्तीभर भी यहाँ काम नहीं आना था, और जो यहाँ की ज़रूरत थी उसका तनिक भी ज्ञान नहीं था। जो साथी मेरे साथ थे उनमें से कोई दिल्ली विश्विद्यालय, इलाहबाद विश्वविद्यालय और फर्ग्युसन इंस्टीट्युट जैसे देश के नामी-गिरामी शिक्षा संस्थानों से अध्ययन करके मेरे साथ बैठे थे। जिनकी देश-दुनिया के गहनतम मुद्दों पर होने वाली चर्चा मेरे लिये किसी दूसरे ग्रह की बात लगती थी। संस्कृत, अंग्रेजी साहित्य और दर्शनशास्त्र के अध्ययन करने से मैं संस्कारी और चरित्रवान तो था पर बुद्धिमान कतई नहीं। अभी तक सिर्फ ब्वायस् हॉस्टल और कॉलेज में पढ़ाई की थी तो कन्याओं के सानिध्य से ही डर लगता था। लेकिन अब माहौल बदल गया था और ज़िंदगी ओवर फ्रेंक होने की डिमांड कर रही थी। फ्रेंक और बोल्ड होना ज़रुरी तो था पर ये सब रातों-रात तो हो नहीं सकता था। इसलिये अपनी क्लास पढ़कर तुरंत घर भाग लेता। दो-चार ऐसे लोगों से दोस्ती ज़रूर हो गई थी जो मेरी ही तरह अपने अस्तित्व की तलाश कर रहे थे। तब लड़कियों से दूर भागने का कारण मैं लोगों को ये बताता कि मैंं इन सब चीज़ों में अपना टायम वेस्ट नहीं करना चाहता पर सच्चाई यह थी कि मुझमें न तो हिम्मत थी और न लड़कियों से बात करने का हुनर। अन्यथा दिल तो बहुत करता..कि मेरी भी इन सबसे यारी हो, मैं भी मस्तमौला बन यहां-वहाँ घूमो, मैं भी किसी से प्यार करूं और जीभर के अपना समय बरबाद करूं।

लगभग इसी तरह अपना पहला सेमेस्टर गुजार दिया और जयपुर को छोड़े लगभग साल भर हो जाने के बाद भी आये दिन पुराने साथियों और गुजरे दिनों की यादें परेशान करती। वक्त बदल चुका था पर मैं नहीं बदल पा रहा था। अपने पहले सेमेस्टर में कुछ अच्छा हुआ तो वो बस यही कि प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित एक वाद-विवाद प्रतियोगिता के लिये मेरा चयन युनिवर्सिटी से हुआ और दिल्ली के एक बड़े मंच पर युनिवर्सिटी का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला। जिससे अपनी कक्षा के लोगों के बीच कुछ गुमनामी जरूर कम हुई पर तेजी से बन रहे छोटे-छोटे ग्रुप में से किसी भी ग्रुप का सदस्य मैं नहीं बन सका और लड़कियों से दोस्ती अब तक महरूम ही थी। आज सोचता हूँ तो लगता है एक बेहद मूर्खतापूर्ण ख्वाहिश के लिये मैंने कई-कई घंटे फिजूल की हरकतों और विचारों में ज़ाया किये। एक 25-30 लोगों की कक्षा का खेमों में बंटना अपने-आप में बुरा है जिससे हमारे संबंधों और सोच का दायरा भी सिकुड़कर बेहद छोटा हो जाता है और इस तरह छोटे से दायरे में सिमट जाने से सीखने की संभावनाएं भी कम होती है क्योंकि अधिकतम का सानिध्य हमें ज्यादा समझ प्रदान करता है। लेकिन उम्र के उस दौर में यह सब चीज़ें समझ नहीं आती, हम किसी मजबूत और रुतबेदार ग्रुप का सदस्य बनना चाहते हैं और खेमों में बंटकर कब हम स्वार्थी और ओछी प्रवृत्तियां करने लगते हैं पता ही नहीं चलता। खुद को सुपीरियर दिखाने की चाहत में कई दिखावे और झूठे शिगूफे भी हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाते हैं।

खैर, किसी ग्रुप्स का सदस्य न होने का दर्द था तो खुशनसीबी भी थी कि ग्रुपिंग में बरबाद होने वाले समय से बचा रहा जिससे कि इस सेमेस्टर में कई किताबें पढ़ी, फ़िल्में देखी जिससे अपने साथियों के बीच का मेरा पिछड़ापन कुछ कम ज़रूर हुआ। पर समझ का दायरा सिर्फ किताबों तक ही सीमित था, ज़िंदगी की समझ तो गलतियां करने और ठोकर खाने से ही बढ़ती है। इस सेमेस्टर के अंत तक पहुंचते-पहुंचते ज़िंदगी के कई अहंकार और टूटे। जिसके चलते जीवन की महत्ता का आंशिक अहसास हुआ। उन घटनाओं के ज़िक्र के चलते ये किस्त काफी लंबी हो जायेगी, बस इसी विस्तार भय से अभी यहीं रुकना मुनासिब समझता हूँ..पर शायद ज़िंदगी की असली 'साढ़े साती' की शुरुआत अब होने वाली थी। जीवन की क्षणभंगुरता और लम्हों की अहमियत क्या होती है यह समझ आ रहा था..सेहत, समय और संबंधों की कद्र बताने वाली घटनाएं घटना शुरु हो रही थी....उन तमाम घटनाओं के साथ जल्द लौदूंगा..क्योंकि मेरी पच्चीसी का असल सार तो उन घटनाओं में ही है........................

Saturday, November 22, 2014

'वेस्ट ऑफ टाइम' की 'इम्पॉर्टेंस'

राजकुमार हिरानी निर्देशित और आमिर खान अभिनीत साल की सबसे प्रतीक्षित फ़िल्म 'पीके' अपनी रिलीज़ से पहले ही जमकर सुर्खियां बटोर रही हैं। जिनमें हाल ही में बाहर आया फिल्म का संगीत और खास तौर पर 'लव इज वेस्ट ऑफ टाइम' खासा आकर्षित करता है। कोई गहरी और दार्शनिक बात न करते हुए गीत के बोल सिर्फ उन जज़्बातों को बयां करते हैं जो हर युवामन के अनुभूत हैं। युवामन की फितरत को भली भांति समझते हुए गीतकार जहाँ प्यार-व्यार को वेस्ट ऑफ टाइम कहता है तो वहीं आई वांट टू वेस्ट माय टाइम, आई लव दिस भेस्ट ऑफ टाइम कहता भी नज़र आता है।

यकीनन, जब दार्शनिको द्वारा ये कहा जाता है कि प्रेम बुद्धिमानों की मूर्खता और मूर्खों की बुद्धिमानी है। तो इस पंक्ति में प्रेम को वक्त की बरबादी के साथ उसकी उपयोगिता को भी वे बड़े डिप्लोमेटिक तरह से बयां कर देतेे हैंँ। इस दुनिया में अब तक जितना कुछ भी सुना-समझा और अनुभव किया है उसमें इक चीज़ समझ आई है कि ज़िंदगी के अनेक विषयों में से प्रेम ही एकमात्र ऐसा विषय है जिस पर कही गई हर बात सही है। प्रेम पर व्यक्त तमाम नज़रिये अपनी-अपनी जगह सही है और कहीं न कहीं गलत भी। ये जरुरी भी है, मजबूरी भी। इसमें खुशी भी हैं, ग़म भी। इसमें देवत्व भी है और पाशविकता भी। ये ताकत भी देता है और कमजोर भी करता है। ये खुदा की बरकत भी है और अभिषाप भी। ये जीने की वजह भी है और मरने का कारण भी। ऐसी तमाम एक-दूसरे से विरुद्ध लगने वाली चीज़ों का निवास प्रेम में होता है और इनमें से कोई भी नज़रिया यदि प्रस्तुत किया जा रहा है तो वे सब अपनी-अपनी जगह सही है और प्रेम के इन्हीं तमाम रूपों को लेकर हिन्दी सिनेमा में हर तरह के गीत प्रस्तुत हुए हैं। साहित्यकारों ने अपनी रचनाएं लिखी हैं। साहित्य और सिनेमा के इसी क्रम का एक और सोपान प्रतीत होता है ये गीत जिसमें प्रेम को 'वेस्ट ऑफ टाइम' कहते हुए भी 'एक बार तो इस जीवन मां करना है वेस्ट ऑफ टाइम' जैसे बोल पिरोये गये हैं।

जीवन के सबसे सृजनात्मक समय में होने वाली सबसे गैर-उत्पादक अनुभूति का नाम है प्रेम। लेकिन इस अनुभूति को पा लेने के बाद व्यक्ति में जिस रचनात्मकता की वृद्धि होती है वो बिना इसके हासिल किये नहीं हो सकती। इसलिये शायद कहा है कि इंसान के जीवन में सबसे क्रांतिकारी परिवर्तन तब होते हैं जब उसके जीवन में या तो कोई लड़की आ जाती है अथवा जीवन से चली जाती है। दोनों ही कंडीशन में किसी हमदर्द की जीवन में मौजूदगी तो जरुरी है ही क्योंकि जाने के लिये भी उसे आना होगा ही। प्रेम परिपक्वता देता है और जीवन को सतही सोच से परे ले जाकर कई ऐसे गहरे अनुभवों का दीदार कराता है जो बिना प्रेम के संभव नहीं। प्यार के जीवन में आविर्भाव के बाद हम अपने प्रेमी को कितना समझ पाते हैं यह तो फिर भी एक विवादित प्रश्न है लेकिन हम खुद के व्यक्तित्व की कई अनगढ़ परतों से अपना परिचय पा लेते हैं। रविन्द्र सिंह के उपन्यास 'आई टू हेड लव स्टोरी' के मुखपृष्ठ पर एक पंक्ति है- 'तेरे जाने का कुछ ऐसा असर हुआ मुझपे, तुझको खोजते-खोजते मैंने खुद को पा लिया' और यह हकीकत है कि प्रेम करने के बाद हम खुद को ज्यादा बेहतर तरीके से समझने लगते हैं। यह प्रेम ही है जो एक भले इंसान में से उसके अच्छे व्यक्तित्व की परतें उतारकर, छुपी हुई बहसी परतों को बाहर निकाल देता है और कई मर्तबा एक बुरे इंसान से उसके व्यक्तित्व की विषाक्त परतें उतारकर, उसकी दबी पड़ी दैवीय परतें उभार देता है।

प्रेम के सफल या असफल होने से ज्यादा मायने रखता है प्रेम का होना, क्योंकि सफलता और असफलता का निर्धारण बाहर से देखी गई दृष्टि से किया जाता है। जबकि प्यार को अंतर्तम से देखा जाये तो उसमें ऐसे भेद ही नहीं है वो बस प्रेम है। कहा ये भी जाता है कि असफल प्रेम अक्सर नफरत में बदल जाता है लेकिन ये भी उसी सतही नज़रिये का कथन है क्योंकि प्रेम, उपेक्षा में तो बदल सकता है पर नफरत में कभी नहीं। निश्चित ही प्रेम स्वार्थी होता है लेकिन यह स्वार्थी होकर भी अंतस में सबसे ज्यादा त्याग की भावना का संचार करता है। वक्त के साथ प्रेम पर भी अपने दौर के रंग देखने को मिलते हैं और इसकी अनुभूति और अभिव्यक्ति में भी फर्क देखा जाता है लेकिन फिर भी कुछ ऐसा भी होता है जो सर्वत्र एक समान होता है। प्रेम का ऐसा सार्वभौमिक, शाश्वत अहसास पूर्णतः अमूर्त है और सैंकड़ो परते चढ़ाने-उतारने के बावजूद वो सदा एक महक बनकर जीवंत रहता है। यही वजह है कि इस 'वेस्ट ऑफ टाइम' का 'इम्पार्टेंस' किसी भी दूसरे 'युसफुल टाइम' से बढ़कर है। प्रेम की इसी उपयोगिता को देखते हुए सैंकड़ो साल पहले कबीर को कहना पड़ा- 'पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढें सो पंडित होय।।'

अकेले में भी जो किसी के संग होने का अहसास दे और कई मर्तबा महफिलों में भी तन्हा कर दे, ऐसा जादूगर प्रेम से बढ़कर कोई नहीं हो सकता। ये प्रेम ही है जिसमें 'मिलके भी हम न मिले' वाले जज्बात जागते हैं और इसमें ही 'जितना महसूस करूं तुमको, उतना ही पा भी लूं' वाले अहसासों से वास्ता होता है। 'पीके' के इस गीत में ही कुछ पंक्तियां हैं 'बैठे-बैठे बिना बात मुस्कायें, क्या है माजरा कुछ भी समझ न आये' इसलिये लव इज वेस्ट ऑफ टाइम। बट आय लव दिस वेस्ट ऑफ टाइम। 

दरअसल, हम हर उस चीज़ को व्यर्थ करार देते हैं जिसके अर्थ बुद्धि के विषय नहीं बनते। लेकिन बुद्धि के परे भी बहुत कुछ होता है और यदि हम प्रेम को भी बुद्धि का विषय न बना संबुद्धि से जाने..और इसका विश्लेषण न कर संश्लेषण करने की कोशिश करें तो शायद प्रेम भी हमें वेस्ट ऑफ टाइम न लगकर बहुत प्रॉडक्टिव लगने लगेगा। यह दुनिया बहुत प्रेक्टिकल हो गई यहां समय का सदुपयोग सिर्फ पैसे और संसाधनों की कमाई को माना जाता है पर प्रेम इन सब चीज़ों को नहीं, जज़्बातों को कमाकर देने वाली चीज़ है। भौतिकवादिता के प्यालों में सिर्फ शारीरिक सुखों का घूंट पीने वालों के लिये 'व्यक्ति का भावनात्मक होना' वेस्ट ऑफ टाइम ही है। चुंकि प्रेम पे लिखी तमाम पाण्डुलिपियां 'सिक्स सिग्मा' जैसे किसी प्रबंधन का सिद्धांत न बन हमारे व्यवसायिक उपयोग में नहीं आती। इसलिये प्रेम के तमाम आचार, विचार और संस्कार बस वेस्ट ऑफ टाइम ही लगते हैं। 

बहरहाल, किसी कवि की कुछ पंक्तियां हैं- 'मैं जो लिखता हूँ वो व्यर्थ नहीं है...हूँ जहाँ खड़ा वहाँ गर तुम आ जाओ, तो कह न सकोगे कि इसका कोई अर्थ नहीं है।' प्रेम पे लिखी किसी लेखनी को वेस्ट ऑफ टाइम कहना या प्रेम से संतृप्त किसी अहसास को वेस्ट ऑफ टाइम कहने वालों के लिये उपरोक्त पंक्तियां सर्वोत्तम जबाव देती हैं। वैसे भी जब हम समय को खुद से बांधने की कोशिश करते हैं तब ही प्रेम की उपयोगिता और अनुपयोगिता का निर्धारण कर सकते हैं पर जब समय से खुद को बाँध देते हैं तब वेस्ट ऑफ टाइम का आकलन करने वाली बुद्धि ही ख़त्म हो जाती है। प्रेम में होने का मतलब है खुद की हस्ती, वक्त के हवाले कर देना। फिर वक्त अपने हिसाब से आपको दिशा दे देता है और हमें नियति की सच्चाई पता चल जाती है कि 'हम भले हाथ में घड़ी बांध वक्त को थामने का गुरुर कर ले, पर हाथ में हमारे एक लम्हा भी नहीं है.............

Saturday, October 11, 2014

स्वार्थी वृत्तियो पर हो मलाल, तभी संभव है जीवन का सत्यार्थ

युद्ध की विभीषिका, प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़, संसाधनों को हथियाने के लिये लालायित बुर्जुआ वर्ग के अधिपति, विस्तारवाद की राजनीति औऱ ऐसे माहौल के बीच ही ख़बर आती है एक भारतीय और एक पाकिस्तानी के नोबल शांति पुरुस्कार मिलने की। सीमा पे युद्ध के आशंकित बादलों को कवर करने के लिये उतावला बैठा मीडिया अचानक, उन व्यक्तित्वों की तह में उतरने लगता है जिसके चलते इन शख्सियतों ने इस प्रतिष्ठित अंंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कार को हासिल किया। शांति, हमेशा युद्ध से खूबसूरत, दैदीप्यमान और वजनदार होती है।

मलाला युसुफजई और कैलाश सत्यार्थी। अपने पीछे संघर्ष का एक विस्तृत इतिहास छोड़ा है इन्होंने, तब जाकर इस चमकदार उपलब्धि को हासिल किया है और निश्चित ही ये प्रयत्न जब शुरु किये गये थे तो इन प्रयत्नों का उद्देश्य कतई ये नहीं था कि इन्हें वैश्विक स्तर पर सम्मानित किया जायेगा। यदि ये पुरुस्कार न भी मिला होता तब भी ये संघर्ष इतना ही महान होता जितना आज माना जा रहा है। भले ही इसे इतनी व्यापक पहचान न मिली होती। इस पुरुस्कार के परे भी कई ऐसे लोग हैं जिन्हें कभी कोई सम्मान नहीं मिला लेकिन फिर भी वे अपने प्रयासों से एक सुंदर जहाँ रचने का प्रयत्न कर रहे हैं। सफलता या सम्मान मिल जाने के बाद हमें लोगों का संघर्ष नजर आने लगता है अन्यथा संघर्ष तो कई जगह व्याप्त है। उपलब्धियां सिर्फ उत्कृष्ट प्रयत्नों पर मोहर लगा देती हैं पर ये मोहर न भी हो तब भी उन प्रयासों की सत्यता से इंकार नहीं किया जा सकता।

मेरे इस लेख का उद्देश्य इस पुरुस्कार और पुरुस्कार पाने वालों पर कुछ कहना नहीं है क्योंकि ये बात मीडिया बखूब कर रहा है और पुरुस्कार को सही-गलत ठहराने वाले कई समीक्षात्मक दृष्टिकोण इस प्रचारतंत्र में नजर आ रहे हैं। इन व्यक्तित्वो का सम्मान होना चाहिये था या नहीं, ये अलग विषय है। नोबेल महानता का पैमाना तय करे ये सही नहीं है क्योंकि कई व्यक्तित्व अपने कार्यों से खुद इतने महान हो जाते हैं कि नोबेल जैसे पुरुस्कार ही उनके आगे बौने नजर आते हैं। क्या गाँधी, विवेकानंद की महानता का पैमाना कोई नोबेल तय कर सकता है? 

यहाँ बात है जीवन के सत्यार्थ की, जीवन के असल प्रयोजन की। मौजूदा दौर, जीवन की अगाध व्यापकता को संकुचित कर चंद छद्म स्वार्थों तक सीमित करने वाला है। मैं, मेरा घर, मेरा परिवार, मेरी जाति, कुल, वंश या देश...ऐसे न जाने कितने 'मैं, मेरे और मुझ' के दायरे हमने बना रखे हैं इस 'मेरेपन' या अंधी आत्ममुग्धता में क्या किसी को वसुधैव कुटुंबकम् की संकल्पना समझ आ सकती है। बेशक, हमारे अपने कुछ कर्तव्य उन लोगों के प्रति होते हैं जो हमसे जुड़े हैं लेकिन अपने उस दायरे के भौतिकवादी विस्तार के कारण हम अनायास ही दूसरों के अधिकार क्षेत्र में प्रविष्ट हो जाते हैं और इस स्वार्थी वृत्ति के परिणाम स्वरूप पैदा होती है अनंत तृष्णा, शोषण, भ्रष्टाचार, अन्याय और अंत में युद्ध। ये जीवन का सत्यार्थ कतई नहीं है।

एक उक्ति है यदि 'हासिल करो तो बांटो, और कुछ सीखो तो सिखाओ'। तमाम प्राप्तियों और हुनर का सर्वोत्तम प्रयोग बस यही है कि जिसमें देने का भाव निहित है। त्याग, करुणा, परोपकारिता और अंत में इन्हीं गुणों से बढ़ते हुए वीतरागता, निर्मोहीपना या स्थितप्रज्ञता तक पहुंचना, यही है जीवन का सत्यार्थ। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की विचारणा 'परस्परोपग्रहो जीवानाम्' अर्थात् परस्पर एक दूसरे का उपकार, इसी संकल्पना से साकार हो सकती है। जीवन के इस सत्यार्थ के पहले ज़रुरी है कि हमें अपनी तमाम स्वार्थी वृत्तियों का मलाल हो।

लेकिन आज की नास्तिक वैज्ञानिकता ने तमाम चरित्रनिर्माण के स्मारकों को पोंगापंथी कहकर, हमें उससे विमुख कर दिया है। जिसके फलस्वरूप जन्मी मैक्डोनाल्ड संस्कृति हमें 'विश करो-डिश करो' की शिक्षा दे रही है। इस दौर में संतुष्टि का भाव कहा खोजा जा सकता है जहाँ अगाध तृष्णा को बढ़ाने के जतन किये जा रहे हैं, और बेतहाशा इच्छाएं अपने फन फैला रही हैं। इन अंधी महत्वाकांक्षाओं से ही जन्मी है तमाम भौतिकवादिता और इस भौतिकवादिता के आभामंडल में ग्रस्त हो हमारा समाज, शिक्षाप्रणाली, साहित्य और सिनेमा भी महज संवेदनहीन मनुष्य का निर्माण कर रहे हैं। जहाँ सिर्फ हड़पने का भाव है देने का नहीं। जीवन का सत्यार्थ भारी बैंक बेलेंस, आलीशान बंगला, गाड़ी और झूठा रुतबा बनकर रह गया है। इन सब चीज़ों को पाकर हमें लगता है कि हमारा विस्तार हो रहा है पर असल में यह मानवीयता के सिकुड़ने का प्रतीक है।

जीवन का सत्यार्थ, अपने व्यवहार से प्राणीमात्र को सुकून देने में हैं...विषमताओं को दूर कर एक वर्गविहीन आदर्श समाज बनाने में हैै..खुद को पर्यावरणोन्मुखी बनाने में है...'मैं' का भाव ख़त्म कर 'हम' का भाव जगाने में है और इस हम में संपूर्ण बृह्माण्ड को ही समेट लेने में हैं। जीवन का सत्यार्थ नोबेल या इस जैसे दूसरे पुरुस्कारों को पा लेने में नहीं, जीवन का सत्यार्थ समस्त आधि-व्याधि और उपाधियों से परे खुद को समझ लेने में है। वास्तव में देखा जाये तो आज सत्यार्थ को नोबेल की जरूरत नहीं, नोबेल को खुद सत्यार्थ प्राप्ति के जतन करना चाहिये...................