Sunday, August 2, 2026

मेरी प्रथम पच्चीसी : अंतिम किस्त


(**वर्ष 2013 में 31 जुलाई को स्वांतःसुखाय शुरू की गई जीवन की इस शृंखला को अब करीब तेरह वर्ष बीत चुके हैं। पिछली किस्त और इस किस्त के बीच भी पूरे सात वर्षों का लंबा अंतराल आ गया। अब लगा कि इस अधूरी यात्रा को उसके मुकाम तक पहुंचा ही देना चाहिए। क्योंकि जीवन के पहले पच्चीस वर्षों का लेखा-जोखा अपने पच्चीसवें जन्मदिन पर लिखना शुरू किया था, लेकिन गत 31 जुलाई को खाकसार 39वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। शुरुआत में सोचा न था कि यह सफर इतना लंबा खिंच जाएगा। कुछ आलस्य मेरा था, कुछ जीवन की व्यस्तताएं थीं और कुछ वे ज़ेहनी ऊहापोहें, जो समय-समय पर कलम को थाम भी लेती थीं। खैर... अब आगे बढ़ते हैं और इस पच्चीसी को उसके अंतिम पड़ाव तक पहुंचाते हैं।)


एम.फिल. वर्ष 2010 में पूरी हो चुकी थी। उसके बाद के कुछ महीने फिर उसी पुराने खालीपन के नाम रहे। जुलाई 2010 से लेकर फरवरी 2011 तक यहां-वहां कई इंटरव्यू दिए, कई उम्मीदें बांधीं, कई बार लौटकर निराशा भी हाथ लगी। लोगों से मैं यही कहता फिरता था कि अभी नौकरी नहीं, पढ़ना चाहता हूं। लेकिन भीतर का आदमी जानता था कि उसे एक अदद नौकरी चाहिए थी, सिर्फ इसलिए नहीं कि वेतन मिले, बल्कि इसलिए कि आत्मनिर्भर होकर अपने परिवार की आंखों में गर्व देख सके। आदमी अक्सर दुनिया से सच नहीं बोलता, कई बार वह खुद से भी सच छिपा लेता है।

इन्हीं दिनों मन का एक और कोना अपनी अलग दुनिया बसा रहा था। मौसम पहले से ज्यादा अच्छे लगने लगे थे। बारिश की बूंदें सिर्फ पानी नहीं लगती थीं, उनमें कोई अनकहा संदेश सुनाई देता था। पुराने रुहानी गीत घंटों तक कानों में गूंजते रहते। प्रेम-कथाओं वाले उपन्यास अपने पात्रों से ज्यादा अपने भीतर के आदमी से परिचय करा रहे थे। और कोई था... जिसकी मौजूदगी ने इन तमाम अनुभूतियों को अर्थ देना शुरू कर दिया था।

मुझे आज भी लगता है कि प्रेम मनुष्य को उसकी इहलौकिक सीमाओं से कुछ दूर ले जाकर किसी पारलौकिक अनुभूति का स्पर्श कराता है, बशर्ते वह अपने स्वार्थों से परे जाकर सिर्फ पाने का नहीं, बल्कि होने का भाव बन जाए। प्रेम केवल किसी का हाथ पकड़ लेने का नाम नहीं, बल्कि अपने भीतर के कठोर हिस्सों का पिघल जाना भी है। वह आपको किसी और के लिए जीना सिखाता है। प्रेम का पल्लवन, उसका इज़हार, इकरार, इंतज़ार और फिर कभी-कभी उसका वियोग... ये सब मिलकर ऐसी शिक्षा देते हैं जो शायद विश्वविद्यालयों की कोई डिग्री नहीं दे सकती।

इन्हीं भावनाओं के बीच अंततः फरवरी 2011 में एक मीडिया कॉलेज में बतौर अध्यापक जीवन की पहली नौकरी शुरू हुई। पहली तनख्वाह से ज्यादा खुशी इस बात की थी कि अब अपने नाम के आगे "कार्यरत" लिख सकूंगा। उसी समय जीवन में पहला प्रेम भी अपने पूरे सौंदर्य के साथ मौजूद था। मैं दोस्तों से मुस्कराकर कहता फिरता था—"यार, ज़िंदगी का सबसे सुनहरा दौर चल रहा है।"

लेकिन जीवन का एक पुराना नियम है—जब सब कुछ बहुत अच्छा लगने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि समय अगली परीक्षा की तैयारी भी कर चुका है। दरअसल, जीवन का सौंदर्य इसी परिवर्तन में है। परिपक्व वही है जो अनुकूलताओं में उन्मत्त न हो और प्रतिकूलताओं में टूट न जाए। साम्य ही अंततः मनुष्य का सबसे बड़ा साधन है।

उधर वर्ष 2011 का क्रिकेट विश्वकप भी पूरे शबाब पर था। पूरा देश उत्साह में डूबा हुआ था और टीम इंडिया लगातार जीतती चली जा रही थी। इसी दौरान 27 मार्च 2011 को एक और सुखद समाचार मिला कि पीएच.डी. प्रवेश परीक्षा में मेरा चयन हो गया है। सचमुच ऐसा लगता था मानो चारों ओर हरियाली ही हरियाली हो।

लेकिन इन्हीं सब हरियालियों के बीच 2 अप्रैल 2011 का वह दिन आया, जिसने जीवन की दिशा ही बदल दी। कुछ शारीरिक असमर्थता और भीतर की असहजता के कारण चिकित्सक के पास पहुंचा। जांच हुई और पता चला—दोनों किडनियां जवाब दे चुकी हैं। जीवन की तेज़ रफ्तार से भागती गाड़ी को ऐसा ब्रेकर मिला कि एक पल को लगा, शायद अब यहीं विराम है।

लेकिन नियतिर की योजनाएं मनुष्य की कल्पनाओं से बड़ी होती हैं। 

18 मई 2011 को सफल किडनी ट्रांसप्लांट हुआ। मेरी मां ने अपनी एक किडनी देकर मुझे दूसरा जीवन दिया। मां के त्याग, समर्पण और प्रेम को शब्दों में बांधना संभव नहीं। उस पूरे दौर के अनुभवों को मैंने अपनी पुस्तक "ये हौसला कैसे झुके" में विस्तार से लिखा है। इसलिए यहां उसे दोहराना उचित नहीं समझता। ये पुस्तक विभिन्न ई कॉमर्स स्टोर पर मौजूद है जिसे गूगल पर इसी नाम से सर्च कर ढूंढा जा सकता है।

इतना अवश्य कहूंगा कि उस कठिन समय में प्रेम भी एक संबल बनकर साथ खड़ा रहा। जब कोई व्यक्ति आपको आपकी सफलताओं के कारण नहीं, बल्कि आपकी कमजोरियों सहित स्वीकार करता है, तब प्रेम अपने सबसे पवित्र रूप में होता है। शायद इसीलिए आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि बीमारी ने मेरे अच्छे समय को बहुत अच्छा नहीं होने दिया, लेकिन प्रेम ने उसी बुरे समय को उतना बुरा भी नहीं होने दिया।

करीब तीन महीने के पुनर्वास के बाद फिर जीवन की मुख्यधारा में लौटा। कॉलेज वापस जॉइन किया। अध्यापन हमेशा से मेरा प्रिय शगल रहा है। विद्यार्थियों के बीच जाकर मैं स्वयं भी विद्यार्थी बन जाता था। जितना उन्हें पढ़ाता, उससे कहीं अधिक उनसे सीखता। ज्ञान के संसार से मेरा रिश्ता केवल पेशे का नहीं, आत्मा का रहा है। कई बार अपने साथियों की कक्षाएं लेने का अवसर मिला तो उसे भी आनंद से स्वीकार किया। कॉलेज में बिताए वे तीन वर्ष आज भी स्मृतियों के सबसे रंगीन पन्नों में दर्ज हैं।

इन्हीं वर्षों में खूब पढ़ा, खूब लिखा, अनेक फिल्में देखीं, अनेक विचारों से जूझा, स्वयं को बार-बार परखा। जीवन में आकर्षण भी आए, मोह भी हुए, अनेक परिस्थितियां भी आईं, लेकिन ईश्वर की कृपा, संस्कारों की नींव और शायद कुछ अपनी इच्छाशक्ति ने हर बार मर्यादाओं की रक्षा कर ली। पीछे मुड़कर देखता हूं तो इस बात का संतोष है कि गलतियां बहुत कीं, पर ऐसी कोई गलती नहीं की जिसे आज अपनी आत्मा के सामने स्वीकार न कर सकूं।

समय धीरे-धीरे अपने अगले पड़ाव की ओर बढ़ रहा था। तभी प्रेम का वियोग भी जीवन का हिस्सा बना। मन फिर एक बार अस्थिर हुआ। हीनता, क्रोध, ईर्ष्या, क्षोभ, निराशा—इन सब भावों से भी परिचय हुआ। मनुष्य यदि ईमानदारी से आत्मावलोकन करे तो पाएगा कि उसके भीतर देवत्व और दानवत्व दोनों साथ-साथ रहते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि हम किसे रोज़ थोड़ा-थोड़ा भोजन दे रहे हैं।

ऐसे समय में यदि किसी ने सबसे अधिक संभाला तो वह था—स्वाध्याय। जिनवाणी से मिला आध्यात्मिक आलोक बार-बार अंधेरों के बीच दीपक बनकर खड़ा हुआ। यह दावा नहीं कि मैं कोई विशिष्ट व्यक्ति हूं या मैंने जीवन में कोई असाधारण उपलब्धियां अर्जित की हैं। लेकिन इतना अवश्य कह सकता हूं कि पच्चीसवें बसंत के बाद बीते तेरह वर्षों में यदि मैं अपनी सकारात्मकता बचा सका, अपने भीतर की आस्था को जीवित रख सका, तो उसके पीछे नियमित स्वाध्याय का बहुत बड़ा हाथ है। ज्ञान के बिना जीवन केवल घटनाओं का ढेर है; ज्ञान ही उन्हें अर्थ देता है।

मेरी पहली पच्चीसी का समापन एक गहरे दर्द के साथ हुआ था। लेकिन शायद वही दर्द आगे चलकर सबसे बड़ा शिक्षक भी बना। यदि उस समय बिखर गया होता तो संभवतः बाद के वर्षों में परिवार, मित्र, जीवनसंगिनी, बच्चों, सामाजिक-सांस्कृतिक यात्राओं, अकादमिक सफलताओं और जो कुछ भी थोड़ा-बहुत सार्थक कर पाया, वह संभव न हो पाता। इस वक्त कई मित्रों का साथ निश्चित ही एक सकारात्मक ऊर्जा की तरह साथ था उन सबका नाम लिखकर उन्हें किसी क्रम में नहीं रख सकता लेकिन वे मेरे लिये कितने खास है ये बात उन्हें बखूबी पता है।

आज इतना ही समझ पाया हूं कि प्रतिकूलताएं स्थायी नहीं होतीं और अनुकूलताएं भी शाश्वत नहीं हैं। जो आज असहनीय लगता है, वही कल स्मृति बन जाता है। और जो आज उपलब्धि लगती है, वह भी समय के साथ सामान्य हो जाती है। इसलिए जीवन का ध्येय शायद इन दोनों के पार जाकर स्वयं को जानना है।

हम समस्याएं नहीं हैं, समस्याओं के साक्षी हैं। हम सुख-दुख नहीं हैं, उनके अनुभवकर्ता हैं। हम वह एक लम्हा नहीं हैं जो बीत जाएगा; हमारे भीतर एक ऐसा तत्त्व भी है जो समय, परिस्थिति और उपलब्धियों से कहीं बड़ा है। उसी तत्त्व की अनुभूति शायद जीवन का वास्तविक प्रयोजन है।

यदि इस पूरी पच्चीसी से कोई एक सीख लेकर उठना चाहूं तो बस यही कि—जीवन आपको बार-बार गिराएगा, बार-बार संभालेगा और अंततः यह पूछेगा कि तुमने इन सबके बीच अपने असल स्वयं को कितना बचाकर रखा?

शेष जीवन उसी प्रश्न का उत्तर खोजने की यात्रा है।

इसी कामना के साथ कि जीवन की हर श्वास आत्मिक उत्थान, सत्मार्ग और स्वाध्याय को समर्पित हो सके... अपनी इस "पच्चीसी" को यहीं विराम देता हूं।

– इति।

Sunday, July 12, 2026

लहरों, पहाड़ों और कुछ टूटती धारणाओं के बीच : समुद्र, सन्नाटा और मैं

यात्राएँ दरअसल किसी देश तक पहुँचने का नाम नहीं होतीं। वे उन धारणाओं से बाहर निकलने का नाम होती हैं जिन्हें हम बरसों तक बिना परखे अपने भीतर पालते रहते हैं। हर जगह का एक चेहरा होता है, जिसे बाज़ार हमारे सामने प्रस्तुत करता है और एक आत्मा होती है, जिसे केवल वहाँ की मिट्टी, हवा, लोग और प्रकृति मिलकर रचते हैं। दुर्भाग्य से हम प्रायः चेहरों को ही सच मान बैठते हैं और आत्मा तक पहुँचने का धैर्य नहीं जुटा पाते।


थाईलैण्ड भी मेरे लिये वर्षों तक ऐसा ही एक चेहरा था। एक ऐसा देश जिसकी चर्चा होते ही नाइट लाइफ़, बार, रंगीन रोशनियाँ और कुछ ऐसी गतिविधियाँ याद आती थीं जिनसे मेरी प्रवृत्ति का दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं। शायद इसीलिये कभी मन में वहाँ जाने की इच्छा भी नहीं जगी। सोचता था कि जिस जगह का आकर्षण ही मेरे लिये आकर्षक नहीं है, वहाँ जाकर करूँगा भी क्या? लेकिन जीवन की खूबसूरती ही यही है कि वह हमारी धारणाओं से सलाह नहीं लेता। वह अचानक एक ऐसा दरवाज़ा खोल देता है जिसके पीछे हमारी सारी समझ छोटी पड़ जाती है।

पर्यावरण पत्रकारिता की एक अंतरराष्ट्रीय समिट ने मुझे वह दरवाज़ा खोलकर दिया। सत्ताईस जून की शाम दिल्ली से उड़ान भरी और कुछ घंटों बाद फुकेट की धरती पर था। विमान से उतरते ही पहली अनुभूति समुद्र की नहीं, हवा की हुई। हवा में एक अजीब-सी नमी थी, लेकिन उससे कहीं अधिक एक ऐसी शांति थी जो महानगरों की भागती ज़िंदगी में शायद अब दुर्लभ होती जा रही है। लगा जैसे हवा भी यहाँ धीरे-धीरे चलती है ताकि किसी के ख़्यालों की धुन में खलल न पड़े और मन थी धीरता न टूटे।

अगली सुबह ही फी-फी आइलैण्ड के लिये निकले। समुद्र में आगे बढ़ती स्पीडबोट के साथ पीछे छूटता किनारा मुझे बार-बार यही समझा रहा था कि जीवन में सुंदर चीज़ें हमेशा किनारे छोड़ने के बाद ही मिलती हैं। जो लोग हर समय सुरक्षित ज़मीन तलाशते रहते हैं, वे समुद्र का विस्तार कभी नहीं जान पाते।


फी-फी आइलैण्ड पहुँचना किसी पर्यटन स्थल पर पहुँचना नहीं था, वह प्रकृति की एक जीवित कविता में प्रवेश करना था। इतना निर्मल पानी कि अपनी ही परछाईं भी अनजान लगने लगे। दूर-दूर तक फैली हरी पहाड़ियाँ, दूध-सी सफ़ेद रेत और फ़िरोज़ी लहरें... प्रकृति जब रंग भरती है तो किसी चित्रकार की कल्पना भी उसके सामने फीकी पड़ जाती है। मैं देर तक समुद्र को देखता रहा। पहाड़ों के साथ समुद्र हमेशा से मुझे इसलिए भी आकर्षित करता है क्योंकि वह अपने भीतर अनगिनत नदियों को समेट लेने के बाद भी किसी से उसका नाम नहीं पूछता। स्वयं की अनुभूति और निस्पृह प्रेम भी शायद ऐसा ही होता होगा। जितना विशाल, उतना ही निर्विकार।

वहाँ बैठकर पहली बार लगा कि प्रकृति कभी प्रदर्शन नहीं करती। वह सुंदर है, लेकिन उसे सुंदर कहलाने की बेचैनी नहीं। केवल मनुष्य है जो हर समय अपने होने का प्रमाण माँगता रहता है। अपने अस्तित्व को जहाँ तहाँ प्रदर्शित करने की बेचैनी, खुद के वजूद पर झूठे कलेवर चढ़ाने की बेचैनी।


अगले दिन फुकेट के ओल्ड टाउन की गलियों में घूमना समय के किसी पुराने अध्याय में प्रवेश करने जैसा था। रंगीन इमारतें, शांत सड़कें और हर मोड़ पर इतिहास की कोई अनकही कहानी। उसके बाद वहाँ के बौद्ध मंदिरों में पहुँचा। तो देखा कि अपनी आधुनिकता के बीच कैसे धर्म और अध्यात्म को ये देश संजोकर रखा है। सभी तरह के शोर से दूर एक अनूठी नीरवता यहाँ आपका ध्यान आकर्षित करती है। धर्म का सबसे सुंदर स्वरूप शायद मौन ही होता है। जहाँ शोर बढ़ जाता है, वहाँ आध्यात्मिकता धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है। बुद्ध की मूर्तियां शांत थी, लेकिन उनकी खामोशी भीतर चल रहे अनगिनत संवादों से कहीं अधिक मुखर थी। वाकई ईश्वर चाहे कोई भी हो शायद प्रार्थनाओं के शोर से अधिक उसे हमारी शांति ही प्रिय होती होगी।

उसी शाम क्राबी के लिये रवाना हुए। इस यात्रा का मूल उद्देश्य पर्यटन नहीं, पर्यावरण पत्रकारिता की वह समिट थी जिसके कारण यह पूरा सफ़र संभव हुआ। दुनिया के अलग-अलग देशों से आये पत्रकारों और विशेषज्ञों के बीच बैठकर महसूस हुआ कि पर्यावरण अब किसी एक देश का विषय नहीं रह गया है। न समुद्र पासपोर्ट देखते हैं, न हवाएँ वीज़ा। पृथ्वी ने कभी सीमाएँ नहीं बनाईं। सीमाएँ हमने बनाईं और फिर उन्हीं के भीतर कैद होकर स्वयं को स्वतंत्र घोषित करते रहे।

समिट समाप्त होने के अगले दिन फोर आइलैण्ड टूर था। यदि फी-फी ने समुद्र का सौंदर्य दिखाया था तो फोर आइलैण्ड ने उसकी विराटता का परिचय कराया। समुद्र के बीच खड़ी चट्टानें, उन पर उगी हरियाली और लहरों का अंतहीन संगीत... वहाँ खड़े होकर लगा कि प्रकृति जितनी विशाल है, मनुष्य का अहंकार उतना ही हास्यास्पद। हम अपने छोटे-छोटे पदों, उपलब्धियों और संपत्तियों पर इतराते रहते हैं और समुद्र एक लहर उठाकर बता देता है कि हम वास्तव में कितने छोटे हैं।


क्राबी का एओनांग बीच हर शाम एक उत्सव में बदल जाता था। दुनिया के अलग-अलग देशों के लोग, सड़क किनारे संगीत, कैफ़े, सूर्यास्त की लालिमा और समुद्र की ओर जाती हवा। लेकिन इस पूरे उत्सव में भी जो चीज़ सबसे अधिक प्रभावित करती रही, वह अनुशासन था। इतनी भीड़ के बावजूद न धक्का-मुक्की, न शोर, न अव्यवस्था। सभ्यता केवल बड़ी इमारतों से नहीं आती, वह नागरिकों के व्यवहार से जन्म लेती है।

दो दिन बाद बैंकॉक पहुँचे। आधुनिकता का ऐसा संतुलित स्वरूप कम ही शहरों में देखने को मिलता है। गगनचुंबी इमारतों के बीच सदियों पुराने मंदिर उसी गरिमा से खड़े हैं जैसे समय ने उन्हें छुआ ही न हो। चौड़ी सड़कें, व्यवस्थित यातायात और नियमों का सहज पालन यह समझाने के लिये काफी था कि किसी देश की पहचान उसके कानूनों से नहीं, उन्हें निभाने वाले लोगों से बनती है।

जंगल सफ़ारी का अनुभव रोमांच से भर देने वाला था। विभिन्न जानवरों के अद्भुत शो देखकर बार-बार यही लगा कि बुद्धिमत्ता केवल मनुष्य का विशेषाधिकार नहीं है। प्रकृति ने हर जीव को उसकी आवश्यकता के अनुसार विलक्षण बनाया है। हम स्वयं को सबसे विकसित प्राणी कहते हैं, लेकिन शायद सबसे अधिक विनाश भी हमने ही किया है।

कोरल आइलैण्ड का डे-टूर यात्रा का सबसे रोमांचक हिस्सा रहा। पैरासेलिंग करते समय जब समुद्र के ऊपर हवा में था, तब नीचे फैला नीला विस्तार किसी नक्शे की तरह दिखाई दे रहा था। उस क्षण पहली बार समझ आया कि ऊँचाई केवल देखने का कोण बदलती है, दुनिया नहीं। जीवन की अधिकांश समस्याएँ भी शायद ऐसी ही होती हैं। हम उन्हें जिस जगह खड़े होकर देखते हैं, वे वैसी ही दिखाई देती हैं।


स्नॉर्कलिंग करते हुए समुद्र के भीतर उतरना किसी दूसरे ग्रह पर पहुँच जाने जैसा अनुभव था। रंग-बिरंगी मछलियाँ, शांत जल और एक बिल्कुल अलग संसार। प्रकृति हमें बार-बार यही सिखाती है कि जीवन केवल वहाँ नहीं है जहाँ हमारी नज़र पहुँचती है।

बैंकॉक में ही जैन मंदिर जाने का सौभाग्य मिला। अपने देश से हजारों किलोमीटर दूर भगवान के दर्शन करना एक अलग ही अनुभूति थी। प्रवासी भारतीयों ने जिस श्रद्धा से अपनी संस्कृति को सँजोकर रखा है, वह सचमुच नमन योग्य है। मंदिर में बैठते ही अनायास लगा कि घर केवल वह नहीं होता जहाँ हम रहते हैं, घर वह भी होता है जहाँ हमारी आस्था सुरक्षित महसूस करती है।

थाई भोजन दुनिया भर में प्रसिद्ध है, लेकिन मेरी जीवनशैली उससे अलग रही है। यहाँ शुद्ध शाकाहारी और जैन भोजन के पर्याप्त विकल्प उपलब्ध थे, फिर भी अधिकतर समय अपने साथ लाया हुआ भोजन और बैंकॉक के परिचितों का स्नेह ही सहारा बना। यात्राएँ यह भी सिखाती हैं कि दुनिया में सबसे बड़ा स्वाद भोजन का नहीं, अपनत्व का होता है।

इस पूरे सफ़र में एक बात बार-बार भीतर कौंधती रही। जिस थाईलैण्ड को हम उसके बाज़ारू चेहरे से पहचानते हैं, उसकी वास्तविक पहचान कुछ और ही है। क्रिस्टल क्लियर बीच, हरे-भरे पर्वत, झरनों का संगीत, समुद्र की नमी, लोगों की विनम्रता, उनकी ईमानदारी, उनका सिविक सेंस और अनुशासन। किसी देश को पर्यटन के लिये सुंदर उसकी इमारतें नहीं बनातीं, वहाँ के लोग बनाते हैं। मुस्कुराता हुआ चेहरा, साफ़ सड़क और नियमों का पालन किसी भी स्मारक से कहीं अधिक बड़ा आकर्षण होता है।


पाँच जुलाई की रात जब दिल्ली लौट रहा था तो सूटकेस में कुछ कपड़े, कुछ स्मृतियाँ और सैकड़ों तस्वीरें थीं, लेकिन सबसे बड़ा सामान मेरे भीतर था। लौटा मैं वही था, पर वैसा नहीं था।

दरअसल यात्राएँ हमें नई जगहें नहीं दिखातीं, वे हमारी दृष्टि बदल देती हैं। वे समझाती हैं कि जीवन केवल वही नहीं है जो हम रोज़ जी रहे हैं। दुनिया हमारी कल्पना से कहीं अधिक बड़ी है और हमारी चिंताएँ उससे कहीं अधिक छोटी। प्रकृति के बीच खड़े होकर अहंकार स्वयं सिकुड़ने लगता है। ईर्ष्या, राग-द्वेष, प्रतिस्पर्धा और संग्रह की भूख अचानक बहुत बौनी दिखाई देने लगती है।

किताबें पढ़कर हम जानकार हो सकते हैं, लेकिन यात्राएँ हमें थोड़ा बेहतर मनुष्य बनाती हैं। वे हमारे भीतर जमा धूल झाड़ देती हैं। वे हमें याद दिलाती हैं कि हम पृथ्वी के स्वामी नहीं, केवल यात्री हैं। कुछ समय के लिये आये हैं, थोड़ा-सा देखेंगे, थोड़ा-सा सीखेंगे और फिर आगे बढ़ जायेंगे।

शायद इसी लिये हर अच्छी यात्रा अधूरी ही लौटती है। क्योंकि यदि वह पूरी हो गयी, तो फिर अगली यात्रा की चाह कहाँ बचेगी? जैसे प्रेम की कोई मंज़िल नहीं होती, वैसे ही यात्राओं का भी कोई अंतिम पड़ाव नहीं होता। एक यात्रा समाप्त होती है तो दूसरी भीतर जन्म लेने लगती है। पासपोर्ट पर लगी मुहरें भले समय के साथ धुंधली पड़ जाएँ, लेकिन आत्मा पर दर्ज यात्राएँ कभी फीकी नहीं होतीं। और असल मायने में एक उत्तम यात्रा थमने की जिजीविषा भी पैदा करती है, कदमों से नहीं अपनी आंतरिक चंचलता से... मानो इस ब्रह्मांड की इस स्वचलित प्रवाह धारा में "मैं" महज तट पर बैठा एक दृष्टा मात्र हूँ... ठहरा हुआ, थमा हुआ... कहीं न जाने को आतुर।

और शायद यही किसी भी यात्रा का सबसे सुंदर स्मृति-चिह्न है—हम किसी देश से लौटते अवश्य हैं, लेकिन अपने भीतर से कभी वापस नहीं आ पाते... चैतन्य की डुबकियां कुछ ऐसी ही तो हैं।

Wednesday, December 24, 2025

बुर्ज खलीफ़ा से मन की यात्रा तक : एक सफ़र, कई अर्थ

और आखिर…

समय फिर अपनी एक और परत उतार चुका है। वर्ष 2025 का अंतिम सप्ताह शुरू हो गया है। कैलेंडर के पन्ने भले बदल रहे हों, लेकिन मन कुछ ठहर–सा गया है—बीते वर्ष की ओर। जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो एहसास होता है कि जीवन में सब कुछ योजनाबद्ध नहीं होता। कई बार जो घटता है, वही सबसे ज़रूरी होता है। कई बार जिन रास्तों पर बिना तैयारी निकल पड़ते हैं, वही भीतर तक पहुँचा देते हैं।

यूँ तो इस पूरे वर्ष में काम, दायित्व और संघर्षों की अपनी कहानी रही, लेकिन इन सबके बीच एक यात्रा है जो स्मृति में बार–बार उभर आती है—यूएई की वह यात्रा, जो महज़ देशों और शहरों की नहीं थी, बल्कि भीतर और बाहर—दोनों दिशाओं में की गई एक यात्रा थी।

यह सफ़र किसी पर्यटन की लालसा से शुरू नहीं हुआ था। एक निजी कार्य के सिलसिले में 24 सितंबर से 30 सितंबर 2025 तक आबुधाबी, दुबई और अजमान जाना तय हुआ। मेरे साथ थे—मेरा आठ वर्षीय बेटा तत्त्वार्थ, मित्र विवेक और उसका पुत्र निर्ग्रन्थ। सच कहूँ तो मन में यह यात्रा बस काम तक सीमित रखने का विचार था। लेकिन बच्चों की उत्सुक आँखों, उनके प्रश्नों और उनके सपनों ने इस सफ़र को विस्तार दिया। शायद जीवन भी ऐसा ही है—हम सीमाएँ तय करते हैं, और नियति उन्हें धीरे–धीरे तोड़ती चली जाती है।

24 सितंबर की रात मुंबई से एतिहाद एयरवेज़ की उड़ान ने हमें आबुधाबी की ओर ले जाना शुरू किया। विमान की खिड़की से झाँकते हुए नीचे फैलता अँधेरा और ऊपर सितारों की शांति—मन को अनायास ही भीतर की यात्रा पर ले जा रही थी। लगा, जैसे ज़मीन से उठते ही कई विचार भी पीछे छूटते जा रहे हों। शायद यात्रा का पहला चरण यही होता है—अपने भीतर के बोझ से थोड़ा हल्का होना।

25 सितंबर की सुबह आबुधाबी पहुँचे। वहाँ से बस द्वारा दुबई की ओर प्रस्थान किया। यह रास्ता महज़ शहरों को जोड़ने वाला नहीं था—यह अनुशासन, आधुनिकता और दृष्टि का रास्ता था। चौड़ी सड़कें, सटीक ट्रैफिक, शांत गति—मानो यह देश अपने नागरिकों को यह सिखा रहा हो कि विकास शोर से नहीं, व्यवस्था से आता है।

दुबई पहुँचकर होटल में ठहरने के बाद शाम को हम बर दुबई की गलियों में निकल पड़े। अनजान ज़मीन पर चलना, विभिन्न भाषाओं, चेहरों और संस्कृतियों के बीच खुद को देखना—यह अनुभव भीतर कुछ खोलता है। वहाँ कोई आपको नहीं जानता, फिर भी आप स्वयं को अधिक जानने लगते हैं। यह पहली बार था जब दुबई सिर्फ़ एक शहर नहीं, एक एहसास बनकर सामने आया।

26 सितंबर का दिन गति से भरा था। दुबई फ्रेम में अतीत और भविष्य को आमने–सामने खड़ा देखा। म्यूज़ियम ऑफ़ द फ़्यूचर ने यह सवाल भीतर छोड़ा—क्या भविष्य केवल तकनीक है, या चेतना भी? दुबई क्रीक ने इतिहास की धड़कन सुनाई, मरीना वॉक ने वर्तमान की चमक दिखाई, और अटलांटिस, जाबील पैलेस व जुमेरा बीच ने यह एहसास दिया कि वैभव तब सुंदर होता है, जब वह संतुलित हो।

अगले दिन फिर आबुधाबी—लेकिन इस बार मन अलग था। बाप्स हिंदू मंदिर पहुँचकर भीतर एक गहरी शांति उतरी। लगा कि आधुनिकता और आध्यात्मिकता विरोधी नहीं हैं, यदि दोनों में सम्मान का भाव हो। फरारी वर्ल्ड और एमिरेट्स पैलेस ने वैभव दिखाया, लेकिन शेख ज़ायेद ग्रैंड मस्जिद ने विनम्रता सिखाई। श्वेत संगमरमर में लिपटी वह भव्यता दरअसल अनुशासन, श्रद्धा और दृष्टि का प्रतीक थी। वहाँ खड़े होकर यह समझ आया कि रेगिस्तान से इमारतें नहीं, संकल्प उगते हैं।

28 सितंबर का दिन कुछ खास था, सुबह ही अजमान स्थि जैन मंदिर में भगवान के दर्शन का सौभाग्य मिला। और उसके बाद साधर्मियों के बीच पहुँचकर, आचार्य कुन्दकुन्द के ग्रन्थ समयसार पर स्वाध्याय— यह अनुभव बाहर की यात्रा को भीतर से जोड़ रहा था। यूएई जैसे देश में रहकर भी लोग अपनी संस्कृति, संस्कारों और आध्यात्मिक चेतना को जीवित रखे हुए हैं—यह देखकर लगा कि जड़ें गहरी हों, तो मिट्टी बदलने से पेड़ नहीं सूखते।

शाम को डेज़र्ट सफारी—रेत के समंदर में उतरना, सूरज को ढलते देखना, ऊँट की सवारी और आग का नृत्य। बच्चों की खुशी में खुद को देखना—यह शायद किसी भी पिता के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार होता है। लगा कि यात्राएँ बच्चों को दुनिया दिखाने के लिए नहीं, उन्हें संवेदना सिखाने के लिए होती हैं।

29 सितंबर को बुर्ज खलीफ़ा की 125वीं मंज़िल से नीचे फैला दुबई देखा। ऊँचाई पर खड़े होकर मन ने एक सवाल किया—हम ऊपर क्यों जाना चाहते हैं? शायद इसलिए कि नीचे को बेहतर समझ सकें। शाम की यॉट राइड ने दुबई को रोशनी की कविता बना दिया। रात के समय यह शहर किसी सपने जैसा लगता है—पर एक जागता हुआ सपना।

अंतिम दिन दुबई के जैन मंदिर में दर्शन और साधर्मी भाई के यहाँ भोजन—अपनेपन का यह एहसास विदेश में और गहरा हो जाता है। संस्कार जब दूरी तय करते हैं, तो और मजबूत हो जाते हैं। वाकई, यह ट्रिप केवल एक विदेश यात्रा नहीं थी। यह बच्चों की आँखों में बसे सपनों, मित्रता की गर्माहट, साधर्मी बंधुत्व और आधुनिकता के बीच संस्कृति के संतुलन का साक्षात्कार थी।

शाम को आबुधाबी से मुंबई की उड़ान थी। लौटते समय लगा—हम वापस आ तो रहे हैं, लेकिन कुछ पीछे छोड़ नहीं रहे। कुछ साथ ले जा रहे हैं—अनुभव, प्रश्न, स्मृतियाँ और एक नई दृष्टि।

यह यात्रा शायद मुझे सिखा गई कि
सफ़र केवल देखने का नहीं होता,
सफ़र समझने का भी होता है,
सफर, खुद से गुजरने का भी होता है
सफर, शहरों को पढ़ने का भी होता है
अपने व्यक्तित्व को गढ़ने का भी होता है
और कभी–कभी,
रेगिस्तान हमें
खुद के सन्नाटों को चीरने के मंत्र
से भी परिचित करा देता है।

~अंकुर

Wednesday, March 5, 2025

Andaman Odyssey: A Journey Through Pristine Shores and Hidden Wonders

In India; the regional diversity, weather, and geographical mysteries of the country have always fascinated me and have been a subject of curiosity for me. During my academic years, I always enjoyed studying geography, which naturally led to a deep-seated passion for exploring different places, traveling, and experiencing things up close. My heart never wants to miss an opportunity for travel, and fortunately, I often get chances to fulfill this interest.


In this context, a few days ago, I had the opportunity to travel with a few friends to the mysterious islands of the Andaman and Nicobar Islands in the far southeastern part of the country for some personal work. And as expected, this five-day journey and the tranquility of Andaman's beautiful coastal islands left a profound impression on my mind. Even after almost a month, I still find myself unable to let go of those mesmerizing memories. 

The Andaman Islands had always been on my bucket list, and when the opportunity finally came to visit this tropical paradise, I couldn’t contain my excitement. With pristine beaches, crystal-clear waters, and lush greenery, this journey was nothing short of a dream. Our itinerary covered the best of the archipelago—Port Blair, Havelock, Neil Island, and Baratang Island.

Day 1: Port Blair – A Glimpse into History

The flight from Indore to Port Blair via Kolkata was quite tiring because after reaching Kolkata late at night, we had to wait till morning for our flight to Port Blair. After this night vigil, when we reached Port Blair at around 9 am, after resting for about half a day, we reached Cellular Jail in the afternoon.

The first stop was the historic Cellular Jail, also known as 'Kala Pani.' Walking through its corridors, I could feel the echoes of India's freedom struggle. The light and sound show in the evening was an emotional experience, narrating the stories of the past with powerful visuals and narration. The concept of the light and sound show is amazing, it brings alive the feeling of the freedom struggle and if you are even a little sensitive, your eyes will remain moist.

Same day, we visited Corbyn’s Cove Beach, a serene stretch of golden sand lined with palm trees. The gentle waves and cool breeze made for a relaxing evening, marked a perfect end to our first day.

Day 2-3: Havelock Island – The Jewel of Andaman


Next day, An early morning ferry took us to Havelock Island, now known as Swaraj Dweep. As the boat sliced through the turquoise waters, the excitement grew. Upon arrival, we headed straight to Kala Patthar Beach and Radhanagar Beach, one of Asia’s most beautiful beaches. The soft white sand and the azure waves created a picture-perfect setting. Watching the sunset here was truly mesmerizing.

The next day was all about adventure. We indulged in snorkeling and scuba diving at Havelock, where the vibrant coral reefs and marine life left us spellbound. The thrill of swimming alongside colorful fish and witnessing the underwater beauty made this an unforgettable experience. The silence of the ocean and the intimate awareness of each breath make you experience the profound sensation of your own existence. In the rush of the world, it becomes clear how far we have drifted from ourselves. The truth is that we spend our lives valuing things that have no emotional essence, yet we fail to appreciate where true emotions actually reside.

Day 4: Neil Island – A Tranquil Retreat


After completing scuba activity we took a short ferry ride brought us to Neil Island now known as Shaheed Dweep, a quieter and more relaxed counterpart to Havelock. The laid-back vibe of the island was refreshing. We explored Laxmanpur Beach, famous for its natural rock formation known as the 'Howrah Bridge.' The stunning arch-shaped rock was a fascinating sight.

Next, we visited Bharatpur Beach, where the shallow waters and vibrant coral reefs provided the perfect setting for glass-bottom boat rides and snorkeling. Unlike the more touristy spots, Neil Island offered a sense of seclusion and peace, making it a paradise for nature lovers.

Day 5: Baratang Island – The Road Less Traveled

We took a ferry from Neil Island to Port Blair late in the evening and rested at the hotel that night as we had to leave at 2:30 in the morning for our last mysterious destination, Baratang Island. An offbeat destination known for its unique geological wonders. The journey itself was thrilling, as we passed through the dense Jarawa Reserve Forest, home to the indigenous Jarawa tribe.


Baratang Island is a hidden gem that offers a mesmerizing blend of untouched natural beauty, mysterious caves, lush mangrove forests, and pristine beaches. Unlike the more commercialized parts of the Andamans, Baratang remains a tranquil paradise where nature thrives in its purest form.

Our first stop was the Limestone Caves, an awe-inspiring network of formations created over thousands of years. The intricate stalactites and stalagmites made it feel like stepping into another world. From there, a speedboat ride took us to the mud volcano, a rare natural phenomenon where small craters continuously emit bubbling mud.

Farewell to Andaman

As we sailed back to Port Blair for our return journey, I couldn’t help but reflect on the unforgettable moments we had experienced. The Andaman Islands had given us not just beautiful sights but also incredible memories of adventure, history, and serenity. This journey was truly an escape into paradise, and I left with a promise to return someday.

If you’re looking for a perfect blend of adventure, relaxation, and natural beauty, Andaman should be on your travel list. The islands will enchant you with their charm and leave you longing for more.

For me, traveling is essentially a way to connect with nature and myself. Away from worldly struggles and the set routine of life, the more you see of this world, the broader your perspective becomes. You begin to realize how, by giving undue importance to small things, we often drift away from our fundamental, larger purpose.

Tuesday, July 30, 2024

जुलाई, पीएचडी और बीते हुये वो 14 साल....

अपने 36वें जन्मदिवस की पूर्व संध्या पर आज डॉक्टरेट ऑफ फिलोसोफी "पीएचडी" उपाधि प्राप्त होने की अधिसूचना प्राप्त हुई। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से एमएससी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के अध्ययन के अंतिम वर्ष में ही बतौर प्राध्यापक बनकर अपने करियर को दिशा देने का ख्याल मन में आया था जिसका पहला पायदान पीएचडी की डिग्री लेना ही था... लिहाजा उस दौर में मेरे लिये एक अति महत्त्वाकांक्षी कार्य पीएचडी करना ही था किंतु कालांतर में जीवन की अनेक घटना प्रघटनाओं के चलते अपनी ये आकांक्षा कुंद होती चली गई और जीवन एक अलग ही दिशा में गतिमान होते हुये अपने को गढ़ रहा था।

30 जुलाई 2024 को जब पीएचडी का ये नोटिफिकेशन प्राप्त हुआ तो बीते चौदह वर्ष मानो आंखों के सामने एक बार फिर घूम गये। फ्लैश बैक में जाने पर बचकाने सपने, करियर बुनने की जद्दोजेहद, महत्वाकांक्षाओं की बाढ़ और अदृश्य भविष्य की धुंधली तस्वीरों में खोया चित्त... सब कुछ मानो एक बार फिर सामने तैर गया। जुलाई का महीना यूं तो मेरे जन्म का माह होने से हमेशा ही अन्य महीनों की तुलना में कुछ खास रहा है लेकिन मेरी पीएचडी के विभिन्न चरणों के दरमियान भी जुलाई माह की तारीखें अहम् रही हैं लिहाजा 14 सालों के सफर में जुलाई की तारीखें अनायास ही याद आ जाती हैं।

पीएचडी का ये सफर 6 जुलाई 2010 को उस वक्त शुरु हुआ... जब माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय द्वारा पहली बार पीएचडी के एंट्रेंस टेस्ट की अधिसूचना जारी की गई। पीएचडी के लिये छह माह का कोर्स वर्क उस वक्त नया-नया ही इंट्रोड्यूस हुआ था लिहाजा पत्रकारिता के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय से पीएचडी करने के लिये संचार एवं पत्रकारिता में अध्ययन कर चुके सैंकड़ों युवा सपने पीएचडी करने को तैयार थे, उनमें ही एक 22 साल का लड़का जो हाल ही में अपनी मास्टर और एमफिर पूरी कर पीएचडी करने की बाट जोह रहा था। फिर क्या था 6 जुलाई 2010 को फॉर्म भरा गया और तभी से यूजीसी नेट के साथ साथ इस एंट्रेंस की तैयारी भी शुरु कर दी।

हालांकि, युवा अवस्था का ये वक्त बड़ा उलझनों भरा होता है जब एक अनजाने करियर को संवारने के लिये आप कोशिशों में लगे होते हैं तो दूसरी ओर इसी वक्त अतृप्त लिप्साएं, महत्वाकांक्षाओं का गुबार, अधीरता, मोहब्बत के जज़्बात और अन्य यौवनिक चपलताएं चित्त को गुमराह किये रहते हैं। फिर भी अपने सपने के पीछे दौड़ते हुये वो तारीख आई जब 9 जनवरी 2011 को इस पीएचडी का इंट्रेंस टेस्ट दिया। महज 22 साल 6 माह की उम्र में पीएचडी की राह में आगे बढ़ते हुये ख्यालों का परिंदा उड़कर उस दौर में पहुंच गया था कि लगने लगा मानो 25 या 26 वर्ष की उम्र में ही ये युवा अंकुर से, डॉ अंकुर हो जायेगा।

किंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था... वक्त के साथ ये कोशिशें असफल होती चली गईं... कई विषमताएं जीवन में आती गईं, निराशाओं के भंवर मंडराने लगे और ऐसा दौर भी आया जब पीएचडी जो कभी पहली प्राथमिकता थी वो अब प्राथमिकता सूची में कहीं रही ही नहीं और दूसरी जिम्मेदारियों को पूरा करना अधिक जरुरी बन पड़ा। इक दौर ऐसा भी आया कि जब पीएचडी के प्रयास से सरेंडर ही कर देने का मन हुआ, पर रास्ते में कुछ जामवंत मिलते चले गये और इस हनुमान ने पीएचडी का ये समंदर पार कर ही लिया। इस उड़ान में ज़िगर मुरादाबादी का शेर कुछ बदले हुये अंदाज में यूँ याद आता रहा-

ये पीएचडी नहीं आसां, बस इतना समझ लीजिये।

कुछ अड़चनों का दरिया है, और 'सब्र' से जाना है।।

तो इक पैराग्राफ में इस सफर को बतायें तो ये कुछ यूं रहा कि 9 जनवरी 2011 को एंट्रेंस हुआ, 27 मार्च 2011 को एंट्रेंस का परिणाम आया, 12 नवंबर 2011 से कोर्स वर्क शुरु हुआ, जिसकी परीक्षा 24 जुलाई 2012 को हुई, फिर करीब 2-3 महीने बाद इस प्री-पीएचडी परीक्षा का परिणाम आया। फरवरी, 2013 में सिनोप्सिस जमा करी, 16 जुलाई 2013 को आरडीसी हुई लेकिन पता चला कि मेरी सिनोप्सिस कहीं मिसप्लेस होने से जमा ही नहीं हुई लिहाजा आरडीसी न हो सकी। सपनों की हवा कैसे निकलती है इसका अहसास बड़ा जोर से हुआ। अगली आरडीसी 12 फरवरी 2015 को हुई, एक बार फिर सिनोप्सिस को पीएचडी के लिये उपयुक्त नहीं पाया गया। फिर सिनोप्सिस का विषय परिवर्तित कर पुनः इसे जमा किया गया,  15 अक्टूबर 2016 को आरडीसी हुई किंतु एक बार फिर सिनोप्सिस को उपयुक्त नहीं पाया गया। करीब 6 साल और 3 आरडीसी की असफलताएं पर्याप्त थीं कि मैं ये ख्याल छोड़ दूं कि अब पीएचडी करना है। जबकि मेरे सहपाठी अनेक अभ्यर्थी इस दौर में अपनी पीएचडी थीसिस जमा करने के करीब पहुंच चुके थे।

इस गुजरे हुये वक्त में इस नाचीज़ ने ज़िंदगी के कई दौर देख लिये थे। मसलन, पीएचडी एंट्रेंस का रिजल्ट आने के 5 दिन बाद स्वास्थ्य कारणों से अस्पताल में भर्ती होना पड़ा, पता चला कि मामला गंभीर है... फिर 18 मई 2011 को रीनल ट्रांस्प्लांट जैसी बड़ी सर्जरी से गुजरा। रिकवरी के दौर में ही कोर्स वर्क पूरा किया। बतौर व्याख्याता एक मीडिया कॉलेज में अध्यापन किया। दिल भी टूटा। सिविल सर्विसेज की तैयारी की, कुछ परीक्षाएं उत्तीर्ण भी की। इसी दौर में फरवरी 2014 में प्रसार भारती की एक परीक्षा पास कर, 27 मार्च 2014 से दूरदर्शन समाचार भोपाल में  बतौर आलेख संपादक सेवा शुरु हुई, जो अब तक जारी है। 17 जनवरी 2015 को विवाह बंधन में बंधा, 24 अप्रैल 2018 को पहली बार पितृत्व के अहसास से गुजरा, और 26 फरवरी 2021 को एक बार फिर अपने जीवन में एक नन्ही परी का प्रवेश हुआ। अकदामिक स्तर पर बात करूं तो इस दौर में डिस्टेंस से अध्ययन करते हुये एजुकेशन, हिन्दी, फिलोसोफी से मास्टर डिग्री पूरी की, हिस्ट्री से एमए अब भी जारी है। बैकग्राउंड में पीएचडी भी चलती रही। 

जिसके रजिस्ट्रेशन के लिये अंततः आरडीसी 16 जुलाई 2018 को हुई थी और 30 जुलाई 2018 को रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पूरी हुई थी। "दूरदर्शन और निजी समाचार चैनलों की विकासात्मक खबरों का तुलनात्मक अध्ययन" विषय पर शोधकार्य की यहाँ से शुरुआत हुई। हर साल पीएचडी की छह माही प्रोग्रेस रिपोर्ट, वार्षिक प्रस्तुतिकरण, प्री-सब्मिशन जैसी प्रक्रियाओं को पूरा करते हुये और कोविड के दौर में हिचकोले खाता हुआ यह सफर आखिरकार 23 जुलाई 2024, सावन की दूज यानि हिन्दी तिथि अनुसार मेरे जन्मदिन पर पीएचडी के फाइनल वाइवा के साथ पूरा हुआ, जिस पर आखिरी मोहर 26 जुलाई 2024 को अधिसूचना जारी होने के साथ लगी और विश्वविद्यालय का यह उपहार मुझे अपने जन्मदिवस के ठीक एक दिन पहले प्राप्त हुआ। इस दौर में कई शोधपत्र लिखे, कई शोध संगोष्ठियों में प्रस्तुतियां दीं जिनमें वर्ष 2023 में युनिवर्सिटी ऑफ लंदन में प्रस्तुत किया गया शोधपत्र भी शामिल है। इन सबसे काफी कुछ सीखने, समझने और अनुभव करने को मिला।

इस सफर के सहयोगियों की बात करूं तो अनेक लोगों की वजह से ही ये मुकाम मुमकिन हो सका है। मुझे नहीं पता दूसरों के लिये पीएचडी कितनी आसान या कठिन होती है पर मेरे लिये ये जीवन का एक दौर ही था जिसे सतत् कोशिशों, सब्र, इंतजार, इम्तिहान, अनेक लोगों की प्रेरणा, सहयोग और मुकद्दर से हासिल कर पाया हूँ। मेरा पुरुषार्थ तो इसमें बस यही रहा कि गिव अप न कर इस प्रवाह में मैं बना रहा। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. के जी सुरेश सर, मेरे शोध के मार्गदर्शक डॉ संजीव गुप्ता सर, इलेक्ट्रानिक मीडिया विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ श्रीकांत सिंह सर, मेरे मित्र हुसैन ताबिश, चंदन सिंह, अर्जुन गोटेवाल, पंकज शर्मा, हितेश शुक्ला, पूजा मिश्रा सहित कई लोगों का प्रत्यक्ष परोक्ष सहयोग इस कार्य में रहा। साथ ही माता पिता, पत्नी, बच्चे, परिवार, अपने ऑफिस के सहकर्मी, अधिकारी आदि की प्रेरणा और सहयोग भी सतत् इस कार्य में आगे बढ़ाने वाला रहा। हर तरह से साथ के लिये इन सबके प्रति अत्यंत कृतज्ञता से ये दिल भरा हुआ है।


अपने इस शोध कार्य में यदि इंट्रेंस देने, कोर्स वर्क करने के समय से लेकर अब तक का काल इसमें जोड़ दूं तो 14 साल के बाद ये शोध प्रबंध सामने आया है। आखिर में अर्जित चर्चित बन पड़ता है पर असल में पग पग पर सीखी गई छोटी छोटी बातों से ही जीवन गढ़ता है। हर अर्जित ज्ञान अपने परम गंतव्य के पथ का पाथेय ही है इन पड़ावों में न अटक, मूल लक्ष्य को भेदने की दृष्टि प्रगाढ़ हो इसी भावना के साथ सबके सहयोग और शुभकामनाओं को विनम्रता से स्वीकारते हुए आभार जताता हूं।

वस्तुतः पीएचडी ने अनुसंधान की आंशिक समझ भर पैदा की है अन्वेषण का ये सफर तो सतत् अब भी जारी है... आत्मअनुसंधान के परम गंतव्य को पाकर ही, अंततः ये खोज पूरी हो सकती है और तब तक मैं शोधार्थी ही बना रहना चाहता हूँ।

अस्तु।