एम.फिल. वर्ष 2010 में पूरी हो चुकी थी। उसके बाद के कुछ महीने फिर उसी पुराने खालीपन के नाम रहे। जुलाई 2010 से लेकर फरवरी 2011 तक यहां-वहां कई इंटरव्यू दिए, कई उम्मीदें बांधीं, कई बार लौटकर निराशा भी हाथ लगी। लोगों से मैं यही कहता फिरता था कि अभी नौकरी नहीं, पढ़ना चाहता हूं। लेकिन भीतर का आदमी जानता था कि उसे एक अदद नौकरी चाहिए थी, सिर्फ इसलिए नहीं कि वेतन मिले, बल्कि इसलिए कि आत्मनिर्भर होकर अपने परिवार की आंखों में गर्व देख सके। आदमी अक्सर दुनिया से सच नहीं बोलता, कई बार वह खुद से भी सच छिपा लेता है।
इन्हीं दिनों मन का एक और कोना अपनी अलग दुनिया बसा रहा था। मौसम पहले से ज्यादा अच्छे लगने लगे थे। बारिश की बूंदें सिर्फ पानी नहीं लगती थीं, उनमें कोई अनकहा संदेश सुनाई देता था। पुराने रुहानी गीत घंटों तक कानों में गूंजते रहते। प्रेम-कथाओं वाले उपन्यास अपने पात्रों से ज्यादा अपने भीतर के आदमी से परिचय करा रहे थे। और कोई था... जिसकी मौजूदगी ने इन तमाम अनुभूतियों को अर्थ देना शुरू कर दिया था।
मुझे आज भी लगता है कि प्रेम मनुष्य को उसकी इहलौकिक सीमाओं से कुछ दूर ले जाकर किसी पारलौकिक अनुभूति का स्पर्श कराता है, बशर्ते वह अपने स्वार्थों से परे जाकर सिर्फ पाने का नहीं, बल्कि होने का भाव बन जाए। प्रेम केवल किसी का हाथ पकड़ लेने का नाम नहीं, बल्कि अपने भीतर के कठोर हिस्सों का पिघल जाना भी है। वह आपको किसी और के लिए जीना सिखाता है। प्रेम का पल्लवन, उसका इज़हार, इकरार, इंतज़ार और फिर कभी-कभी उसका वियोग... ये सब मिलकर ऐसी शिक्षा देते हैं जो शायद विश्वविद्यालयों की कोई डिग्री नहीं दे सकती।
इन्हीं भावनाओं के बीच अंततः फरवरी 2011 में एक मीडिया कॉलेज में बतौर अध्यापक जीवन की पहली नौकरी शुरू हुई। पहली तनख्वाह से ज्यादा खुशी इस बात की थी कि अब अपने नाम के आगे "कार्यरत" लिख सकूंगा। उसी समय जीवन में पहला प्रेम भी अपने पूरे सौंदर्य के साथ मौजूद था। मैं दोस्तों से मुस्कराकर कहता फिरता था—"यार, ज़िंदगी का सबसे सुनहरा दौर चल रहा है।"
लेकिन जीवन का एक पुराना नियम है—जब सब कुछ बहुत अच्छा लगने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि समय अगली परीक्षा की तैयारी भी कर चुका है। दरअसल, जीवन का सौंदर्य इसी परिवर्तन में है। परिपक्व वही है जो अनुकूलताओं में उन्मत्त न हो और प्रतिकूलताओं में टूट न जाए। साम्य ही अंततः मनुष्य का सबसे बड़ा साधन है।
उधर वर्ष 2011 का क्रिकेट विश्वकप भी पूरे शबाब पर था। पूरा देश उत्साह में डूबा हुआ था और टीम इंडिया लगातार जीतती चली जा रही थी। इसी दौरान 27 मार्च 2011 को एक और सुखद समाचार मिला कि पीएच.डी. प्रवेश परीक्षा में मेरा चयन हो गया है। सचमुच ऐसा लगता था मानो चारों ओर हरियाली ही हरियाली हो।
लेकिन इन्हीं सब हरियालियों के बीच 2 अप्रैल 2011 का वह दिन आया, जिसने जीवन की दिशा ही बदल दी। कुछ शारीरिक असमर्थता और भीतर की असहजता के कारण चिकित्सक के पास पहुंचा। जांच हुई और पता चला—दोनों किडनियां जवाब दे चुकी हैं। जीवन की तेज़ रफ्तार से भागती गाड़ी को ऐसा ब्रेकर मिला कि एक पल को लगा, शायद अब यहीं विराम है।
लेकिन नियतिर की योजनाएं मनुष्य की कल्पनाओं से बड़ी होती हैं।
18 मई 2011 को सफल किडनी ट्रांसप्लांट हुआ। मेरी मां ने अपनी एक किडनी देकर मुझे दूसरा जीवन दिया। मां के त्याग, समर्पण और प्रेम को शब्दों में बांधना संभव नहीं। उस पूरे दौर के अनुभवों को मैंने अपनी पुस्तक "ये हौसला कैसे झुके" में विस्तार से लिखा है। इसलिए यहां उसे दोहराना उचित नहीं समझता। ये पुस्तक विभिन्न ई कॉमर्स स्टोर पर मौजूद है जिसे गूगल पर इसी नाम से सर्च कर ढूंढा जा सकता है।
इतना अवश्य कहूंगा कि उस कठिन समय में प्रेम भी एक संबल बनकर साथ खड़ा रहा। जब कोई व्यक्ति आपको आपकी सफलताओं के कारण नहीं, बल्कि आपकी कमजोरियों सहित स्वीकार करता है, तब प्रेम अपने सबसे पवित्र रूप में होता है। शायद इसीलिए आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि बीमारी ने मेरे अच्छे समय को बहुत अच्छा नहीं होने दिया, लेकिन प्रेम ने उसी बुरे समय को उतना बुरा भी नहीं होने दिया।
करीब तीन महीने के पुनर्वास के बाद फिर जीवन की मुख्यधारा में लौटा। कॉलेज वापस जॉइन किया। अध्यापन हमेशा से मेरा प्रिय शगल रहा है। विद्यार्थियों के बीच जाकर मैं स्वयं भी विद्यार्थी बन जाता था। जितना उन्हें पढ़ाता, उससे कहीं अधिक उनसे सीखता। ज्ञान के संसार से मेरा रिश्ता केवल पेशे का नहीं, आत्मा का रहा है। कई बार अपने साथियों की कक्षाएं लेने का अवसर मिला तो उसे भी आनंद से स्वीकार किया। कॉलेज में बिताए वे तीन वर्ष आज भी स्मृतियों के सबसे रंगीन पन्नों में दर्ज हैं।
इन्हीं वर्षों में खूब पढ़ा, खूब लिखा, अनेक फिल्में देखीं, अनेक विचारों से जूझा, स्वयं को बार-बार परखा। जीवन में आकर्षण भी आए, मोह भी हुए, अनेक परिस्थितियां भी आईं, लेकिन ईश्वर की कृपा, संस्कारों की नींव और शायद कुछ अपनी इच्छाशक्ति ने हर बार मर्यादाओं की रक्षा कर ली। पीछे मुड़कर देखता हूं तो इस बात का संतोष है कि गलतियां बहुत कीं, पर ऐसी कोई गलती नहीं की जिसे आज अपनी आत्मा के सामने स्वीकार न कर सकूं।
समय धीरे-धीरे अपने अगले पड़ाव की ओर बढ़ रहा था। तभी प्रेम का वियोग भी जीवन का हिस्सा बना। मन फिर एक बार अस्थिर हुआ। हीनता, क्रोध, ईर्ष्या, क्षोभ, निराशा—इन सब भावों से भी परिचय हुआ। मनुष्य यदि ईमानदारी से आत्मावलोकन करे तो पाएगा कि उसके भीतर देवत्व और दानवत्व दोनों साथ-साथ रहते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि हम किसे रोज़ थोड़ा-थोड़ा भोजन दे रहे हैं।
ऐसे समय में यदि किसी ने सबसे अधिक संभाला तो वह था—स्वाध्याय। जिनवाणी से मिला आध्यात्मिक आलोक बार-बार अंधेरों के बीच दीपक बनकर खड़ा हुआ। यह दावा नहीं कि मैं कोई विशिष्ट व्यक्ति हूं या मैंने जीवन में कोई असाधारण उपलब्धियां अर्जित की हैं। लेकिन इतना अवश्य कह सकता हूं कि पच्चीसवें बसंत के बाद बीते तेरह वर्षों में यदि मैं अपनी सकारात्मकता बचा सका, अपने भीतर की आस्था को जीवित रख सका, तो उसके पीछे नियमित स्वाध्याय का बहुत बड़ा हाथ है। ज्ञान के बिना जीवन केवल घटनाओं का ढेर है; ज्ञान ही उन्हें अर्थ देता है।
मेरी पहली पच्चीसी का समापन एक गहरे दर्द के साथ हुआ था। लेकिन शायद वही दर्द आगे चलकर सबसे बड़ा शिक्षक भी बना। यदि उस समय बिखर गया होता तो संभवतः बाद के वर्षों में परिवार, मित्र, जीवनसंगिनी, बच्चों, सामाजिक-सांस्कृतिक यात्राओं, अकादमिक सफलताओं और जो कुछ भी थोड़ा-बहुत सार्थक कर पाया, वह संभव न हो पाता। इस वक्त कई मित्रों का साथ निश्चित ही एक सकारात्मक ऊर्जा की तरह साथ था उन सबका नाम लिखकर उन्हें किसी क्रम में नहीं रख सकता लेकिन वे मेरे लिये कितने खास है ये बात उन्हें बखूबी पता है।
आज इतना ही समझ पाया हूं कि प्रतिकूलताएं स्थायी नहीं होतीं और अनुकूलताएं भी शाश्वत नहीं हैं। जो आज असहनीय लगता है, वही कल स्मृति बन जाता है। और जो आज उपलब्धि लगती है, वह भी समय के साथ सामान्य हो जाती है। इसलिए जीवन का ध्येय शायद इन दोनों के पार जाकर स्वयं को जानना है।
हम समस्याएं नहीं हैं, समस्याओं के साक्षी हैं। हम सुख-दुख नहीं हैं, उनके अनुभवकर्ता हैं। हम वह एक लम्हा नहीं हैं जो बीत जाएगा; हमारे भीतर एक ऐसा तत्त्व भी है जो समय, परिस्थिति और उपलब्धियों से कहीं बड़ा है। उसी तत्त्व की अनुभूति शायद जीवन का वास्तविक प्रयोजन है।
यदि इस पूरी पच्चीसी से कोई एक सीख लेकर उठना चाहूं तो बस यही कि—जीवन आपको बार-बार गिराएगा, बार-बार संभालेगा और अंततः यह पूछेगा कि तुमने इन सबके बीच अपने असल स्वयं को कितना बचाकर रखा?
शेष जीवन उसी प्रश्न का उत्तर खोजने की यात्रा है।
इसी कामना के साथ कि जीवन की हर श्वास आत्मिक उत्थान, सत्मार्ग और स्वाध्याय को समर्पित हो सके... अपनी इस "पच्चीसी" को यहीं विराम देता हूं।
– इति।


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