Beauty of nature

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Tuesday, May 22, 2012

ढलते सूरज की तपिश : राहुल द्रविड़

विवादों से घिरे आईपीएल के पांचवे संस्करण का अंत होने जा रहा है और इस आईपीएल पांच से राजस्थान रॉयल बहार हो चुकी है..सीमित संसाधन और गैरसितारा खिलाडियों से भरी टीम को राहुल द्रविड़ की कप्तानी भी पार न लगा पाई...लेकिन सारे टूर्नामेंट में राजस्थान के जुझारू प्रदर्शन ने कई यादगार, रोमांचक मेच बनाये...यूँ तो टीम के सबसे सफल बल्लेबाज अजिंक्य रहाने रहे..लेकिन ढलती उम्र में भी राहुल द्रविड़ की जीवटता देखने लायक रही और उनकी आकर्षक बल्लेबाजी हमें ये गीत गुनगुनाने को मजबूर कर देती है कि अभी न जाओ छोड़ के, कि दिल अभी भरा नहीं”!

भारतीय टीम की ‘दीवार’ का रंग धुंधला पड़ गया पर मजबूती आज भी बरक़रार है..और किसी ज़माने में मैक्ग्राथ, एलन डोनाल्ड, कर्टनी वाल्श जैसे धुरंधर गेंदबाजो के प्रहारों को सहने वाली ये दीवार आज मलिंगा, डेल स्टेन, ब्रेट ली को भी उसी मुस्तैदी से खेलती है...सिर्फ संयत बल्लेबाजी ही नहीं, संयत व्यक्तित्व भी द्रविड़ की पहचान है. १६ साल के क्रिकेट करियर में न कभी द्रविड़ के बल्ले ने आग उगली, न उनकी बातों ने...उनके बल्ले से सितार की सुरलहरियां प्रवाहित होती थी और वाणी से फूल झड़ते थे...विवादों की गूंज इस साउंडप्रूफ दीवार में प्रवेश नहीं कर पाई. अपने करियर में मेच फिक्सिंग और चैपल-गांगुली जैसे विवादों की कीचड़ के बीच भी इन्होंने खुद को कमल की तरह खुद को उस कीचड़ से दूर रखा!

राहुल द्रविड़ उन चुनिन्दा खिलाडियों में से थे जिनके परफार्मेंस और फिटनेस में निरंतरता रही..यही कारण है कि अपने डेब्यू टेस्ट मेच से लेकर लगातार ८४ टेस्ट खेलने का रिकार्ड इनके नाम है..यह रिकार्ड उनकी मानसिक मजबूती के साथ शारीरिक मजबूती को दर्शाता है और एक अनुशासित, आदर्श जीवन शैली की ओर इशारा करता है क्योंकि ये निरंतरता बिना अनुशासन के नहीं आ सकती. उनकी जीवनशैली आज के हुड़दंगी गैर जिम्मेदार युवा के लिए एक सीख देती है...द्रविड़ उस सदाबहार फूल की तरह रहे जो मदहोश करने वाली महक तो नहीं बिखेरता लेकिन हर मौसम में खिला रहना जनता है!

करियर के शुरूआती दिनों में कई विशेषज्ञों ने द्रविड़ को टेस्ट क्रिकेटर कहकर वनडे मैचों के लिए अनुपयुक्त घोषित कर दिया था..लेकिन वनडे का भी स्थापित बल्लेबाज बनकर द्रविड़ ने उनके मुंह पे ताला लगा दिया..और वनडे क्रिकेट में १०००० से ज्यादा रन बनाने वाले चंद वनडे विशेषज्ञ बल्लेबाजों की जमात में शामिल हुए...१९९९ के क्रिकेट विश्वकप में सचिन तेंदुलकर, ब्रायन लारा, सनत जयसूर्या, रिकी पोंटिंग जैसे धमाकेदार बल्लेबाज होने के बाबजूद द्रविड़ विश्वकप के टॉप स्कोरर रहे...२००३ के विश्वकप में विकेटकीपर की समस्या से जूझ रही भारतीय टीम के लिए द्रविड़ ने दस्ताने पहनकर विकेट के पीछे भी शानदार काम किया. वे सही मायने में टीम के संकटमोचक थे लेकिन इस संकटमोचक का योगदान हमेशा किसी न किसी वजह से दब जाता था और उन्हें वो तारीफें नहीं मिलती थी जिसके वे हक़दार थे..ये भूत करियर के शुरुआत से ही उनपे हावी रहा जब अपने डेब्यू टेस्ट में ९७ रन की बेहतरीन पारी गांगुली के शतक के नीचे दब गयी..२००१ के ऐतिहासिक कोलकाता टेस्ट की लाजबाव १८० रन की पारी लक्ष्मण के २८१ रन के आगे धुंधली पड़ गयी..१९९९ विश्वकप में गांगुली के १८३ रन और २००० में सचिन तेंदुलकर के न्यूजीलेंड के खिलाफ वनडे में बनाये १८६ रन के पीछे दूसरे छोर पे मुस्तैदी से खड़े द्रविड़ के शतक भुला दिए गए...पाकिस्तान के खिलाफ मुल्तान टेस्ट में सहवाग के ३०९ रन ने और पाकिस्तान के ही खिलाफ २००६ में द्रविड़-सहवाग के विश्वरिकार्ड ४१० रन की ओपनिंग भागीदारी में सहवाग के दोहरे शतक ने द्रविड़ के शतक की चमक को फीका कर दिया...ऐसे न जाने कितने रिकार्ड होंगे जो उस समय किसी न किसी कारण से हमारा ध्यान द्रविड़ की तरफ नहीं खींच पाए...पर द्रविड़ ने इन सब बातों की परवाह किये वगेर अपना ध्यान सिर्फ अपने खेल पर लगाया...और इसी जीवटता से खेलते हुए जब उन्हें लगा कि अब उन्हें अपनी जगह नए युवा खिलाडियों के लिए खाली कर देना चाहिए तब उन्होंने वनडे और टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह दिया!

दरअसल, राहुल द्रविड़ अब एक इंसान नहीं एक प्रवृत्ति बन चुके है..और शायद आने वाले क्रिकेटर्स को यह तालीम दी जाये कि अपने अंदर द्रविड़त्व लाओ. द्रविड़ होने का मतलब धैर्य, साहस और अनुशासन का होना है..और क्रिकेट के इस जेंटलमेन गेम के लिए इन गुणों का होना अत्यधिक जरुरी है...क्रिकेट के असली जेंटलमेन बनकर रहे राहुल द्रविड़...धोनी, सहवाग अगर क्रिकेट की आंधी है तो द्रविड़ वो मधुर हवा है जो रूह को सुकून देती है. द्रविड़ के स्ट्रेट ड्राइव, लेट कट और पुल शाट को देखना लता मंगेशकर के गीतों को सुनने की तरह राहत का अहसास कराता है!
  
  खैर, क्रिकेट के इस धुरंधर ने आईपीएल के इस संस्करण में ४५० से ज्यादा रन बनाकर खुद को क्रिकेट के इस तीसरे फारमेट का भी पुरोधा साबित किया... आज उम्र के इस पड़ाव पे आके भी राहुल ने जिस तरह का प्रदर्शन किया वो ये साबित करता है कि ढलते सूरज में भी तपिश होती है...उसका प्रकाश और प्रताप रात के चाँद-सितारों से कही ज्यादा होता है....अपने आगे के करियर को द्रविड़ अनिश्चित बताते है और किसी पूर्वनियोजित योजना के इतर वे समय की मांग के अनुरूप फैसले लेने को वरीयता देते हैं...क्रिकेट छोड़ने के बाद द्रविड़ के जीवन की दिशा क्या होगी ये तो वक्त बताएगा पर इतना पता है है कि अपनी खूबसूरती से संवारी क्रिकेटीय पारी की तरह उनके जीवन की पारी भी बेहद मजबूत होगी...जिसमे उनके परिवार, मित्र और रिश्ते-नातेदारों की अहमियत सर्वोपरि होगी...



Wednesday, March 7, 2012

भ्रष्ट-तंत्र, बागी-चम्बल और पान सिंह तोमर


फ़िल्मकार तिग्मांशु धुलिया की कमाल की फिल्म 'पान सिंह तोमर' देखी। अंतरराष्ट्रीय पदकविजेता धावक से बागी बने पान सिंह तोमर की ये कहानी हमारे तंत्र को आइना दिखाती है..और बताती है कि किस तरह इस देश में राजनीति और व्यवस्था के तवे पे स्वार्थ की रोटी तंत्र सेंकता है...जिससे मजबूरन एक राष्ट्रीय प्रतिभा को अपने हाथ में बंदूक उठाना पड़ता है।

फिल्म की शुरुआत में ही एक गजब का संवाद है..जब पत्रकार द्वारा पानसिंह से पूछा जाता है कि आप कैसे एक धावक से डकैत बने...जिसपे पानसिंह का जबाव कि ''डकैत नहीं, बागी..डकैत तो देश की संसद में बैठते है"। चम्बल कि पृष्ठभूमि पे निर्मित इस फिल्म का समग्र प्रभाव कुछ ऐसा है..कि फिल्म देखने के बाद भी आप खुद को इससे अलग नहीं कर पाते। अपनी व्यवस्था और तंत्र पे मन में रोष उठता है...पानसिंह की मज़बूरी खुद की मज़बूरी लगने लगती है...और दिल में एक उमंग ऐसी भी जगती है कि पानसिंह हमें भी बंदूक थमा के अपनी गेंग में शामिल कर ले।

फिल्म में निर्देशक के कैमरे ने चम्बल के बीहड़ को प्रभावकारी ढंग से प्रस्तुत किया है पर चम्बल के बीहड़ से ज्यादा प्रभावकारी चित्रण उस बीहड़ का है जो हमारे तंत्र में पसरा हुआ है...जहाँ पढ़े-लिखे तथाकथित सभ्य लोगो द्वारा गरीब-अनपढ़ लोगों की मजबूरियों का जनाज़ा निकला जाता है। साथ ही फ़िल्मकार ने ठेठ-गंवारू बाहुबलीय सोच को भी उजागर किया है..जहाँ बन्दूक चलाने, रौब झाड़ने, जोर आजमाने को ही पुरुषार्थ समझा जाता है...जहाँ प्रशासन की औकात अपनी रखैल से ज्यादा नहीं है।

पानसिंह इन दोनों ही पाट के बीच पिस रहा है..जहाँ उसका चचेरा भाई बन्दूक की नोक पे उसकी सारी ज़मीन हथियाए हुए है और प्रशासन उसकी मज़बूरी पे आँख मूंदे हुए है। ज़मीन की जद्दोजहद में उसकी माँ को मार दिया जाता है, बेटे को पीट-पीट के अधमरा कर दिया जाता है, उसे अपना घरबार छोड़ना पड़ता है...और अपनी इन परेशानियों को लेकर जब वो सिस्टम का दरवाजा खटखटाता है तो उससे उसके पदकविजेता होने का सबूत माँगा जाता है। उन पदकों को जमीन में फेंक दिया जाता है।

फ्रेम दर फ्रेम जैसे-जैसे फिल्म आगे बढती है..कदम-कदम पे सिस्टम के द्वारा एक नागरिक की राष्ट्रीय भावना, उसका प्रशासन के प्रति सम्मान को कुचलते हुए हम देखते हैं। जब इस कदर अपने ही तंत्र द्वारा उसका दमन होता है..तो आखिर उसे भी अपने हाथ में बंदूक उठाना पड़ती है। एक बेहद सीधे-सादे इन्सान को क़त्ल, अपहरण, लूट जैसे अपराध करने पे मजबूर होना पड़ता है...जो इन सबसे पहले तक ये कहता था कि 'हिंसा से कुछ हासिल नहीं होगा'..जो देश के लिए अपनी जान देने तक को तैयार था...जिसे अपने काम के लिए किसी के सामने झुकने, पैर पड़ने से भी गुरेज नहीं था..जो हर काम कानून के दायरे में ही करना चाहता था। एक ऐसे नागरिक को बागी बनने में, कानून तोड़ने को मजबूर करने में हमारे सिस्टम का ही हाथ है...ये फिल्म हमारे तंत्र को अपनी गिरेबान में झाँकने पे मजबूर करती है। पान सिंह तोमर से लेकर फूलन देवी तक सबके हाथ में बन्दूक थमाने में कहीं न कहीं हमारे सिस्टम का ही हाथ है...चम्बल के पानी को यूँही दोष दिया जाता है।

बहरहाल, एक बेहद कसी हुई, सार्थक फिल्म का निर्माण धुलिया ने किया है..जिसे इरफ़ान खान के अद्भुत अभिनय ने बेजोड़ बना दिया है..इरफ़ान ने अपनी अदाकारी से पानसिंह तोमर को जिया है। फिल्म के संवाद कमाल के हैं जो दर्शक को भी भिंड-मुरैना में होने का अहसास कराते हैं। गीत-संगीत के लिए फिल्म में कोई जगह नहीं है..जो इक्का-दुक्का गीत है वो भी पार्श्व में सुनाई देते है और कथा के भाव को ही दर्शाते हैं। सेट डिसाइन और कास्ट्यूम पे अच्छा काम किया है..जो फिल्म को यथार्थ का रूप देने का काम करते हैं..ड्रेस का ही कमाल है कि मूलतः पंजाब की माही गिल और राजस्थान के इरफ़ान खान ऐसे जान पड़ते हैं मानो उनकी रगों में चम्बल का पानी बहता हो।

अग्निपथ जैसी कमर्शियल फिल्म की सक्सेस के बाद एक यथार्थपरक सिनेमा का निर्माण और दर्शकों द्वारा इसे पसंद किया जाना सुखद अहसास देता है। इस तरह की फिल्मों की सफलता ही..बालीवुड को मसालेदार व्यावसायिक सिनेमा के इतर सार्थक फ़िल्में रचने की उर्जा प्रदान करती है..........

Sunday, March 4, 2012

छद्म धार्मिकता, नास्तिक वैज्ञानिकता और अनुभूत अध्यात्म


अरस्तु, शेलिंग फिकटे, हीगेल, शापेन्हार, वर्डस्वर्थ, ग्राण्ड जैसे पाश्चात्य दार्शनिको-विद्वानों से लेकर कन्फ्युशियास और भारतीय चिन्तक चार्वाक तक प्रत्यक्षवाद, धर्म, अध्यात्म, ईश्वर अस्तित्व को लेकर काफी विमर्श हुआ, जो आज भी होता है। लेकिन विद्वत्ता की सारी पराकाष्ठा अध्यात्म की तह तक पहुंचने में थक जाती है और परिणाम-स्वरूप विद्वत जनों द्वारा ईश्वर, अध्यात्म, पुण्य-पाप जैसी बातों को सिरे से नकार दिया जाता है। प्रत्यक्षवाद के सिद्धांत ने सारी बौद्धिकता को भौतिक स्तर पर ही खर्च कर दिया..और उन विषयों को रूढ़ीवाद का नाम दे दिया जो तर्क के परे है या आँखों द्वारा अदृष्ट है। ऐसे में उन सारी अनुभूतियों को तिलांजलि दे दी गयी जो तर्क का विषय नहीं है..ये जाने वगेर कि अनुभव को किसी प्रमाण या तर्क की मोहताजगी नहीं होती।

यथार्थ अनुभूत धर्म जब कहीं नज़र नहीं आया तो धर्म को बदनाम करने में भी विद्वानों ने कसर नहीं छोड़ी..कार्ल मार्क्स ने तो धर्म को अफीम की संज्ञा ही दे डाली। धर्म का उपरी रूप जो था वो वाकई किसी अफीम की तरह ही था..पूजा-भक्ति के नाम पर पाखंड, यज्ञादि अनुष्ठानों में हिंसा, कोरे व्रत-तप-उपवास, और मन्नतें पूरी करने या रोगों को दूर करने के लिए भगवान के दर पर चढ़ने वाले चढ़ावे..सब कुछ कोरी छद्म धार्मिकता से अलग कुछ न था। जो सत्यान्वेषण कर सके, ऐसा धर्म दूर-दूर तक कही नजर नहीं आया...पर सत्यान्वेषण के लिए न इन सब क्रियाओं की जरुरत थी नाही बौद्धिक कौशल की..क्योंकि सत्य की खोज के लिए बुद्धि की नहीं, संबुद्धि की जरुरत है..विश्लेषण की नहीं संश्लेषण की दरकार है...इसे अभिव्यक्ति से नहीं अनुभूति से हासिल किया जा सकता है...किन्तु जो उस परम सत्य को निकाल सके, ऐसे समस्त साधनों से इन्सान बहुत दूर रहा...और जिन्होंने उस अध्यात्म अनुभूतियों की उपलब्धि की, उन्हें तो इस इन्सान ने सम्मान दिया पर उनके कथनों का अनुसरण न किया। गोयाकि राम को तो माना पर राम की नहीं मानी।

आज न अनुभूत अध्यात्म है और नाही छद्म धार्मिकता प्रकट रूप से सामने है...आज यदि कहीं कुछ है तो वो है सिर्फ नास्तिक वैज्ञानिकता या कहें कि भौतिक चाकचिक्य। यदि कहीं आस्तिकता है भी, तो वो छद्म धार्मिकता का ही ढका हुआ स्वरूप है। यूँ तो सारे तीज-त्यौहार, व्रतादि आज की संस्कृति मना रही है..पर उपलब्धि जिन चीजों की चाहती है वो सारी आकांक्षाये भौतिक है। नेम-फेम, बंगला-गाड़ी, अच्छा करियर, बेशुमार दौलत सब कुछ विलासी महत्वाकांक्षाओं के लिए ही है..ऐसे में धर्म भी विलासिता की विषयवस्तु से अलग कुछ नहीं रह गया है। जो लोंग-इलायची की तरह मूल्यविहीन इंसानी भौतिक जीवन में माउथफ्रेशनर का काम करता है।

सारा आनंद इन्द्रियाधीन है और उसके लिए ही सारे जतन है। यहाँ स्वामी विवेकानंद की उक्ति स्मरण करना चाहूँगा-"जीवन का स्तर जहाँ हीन है, इन्द्रियों का आनंद वहीं अत्यंत प्रखर होता है। खाने और भोग में जैसा उत्साह भेड़िये और कुत्ते दिखाते हैं वैसा उत्साह मनुष्य में नहीं होना चाहिए। जानवरों का आनंद इन्द्रियाधीन है, सुसंस्कृत व्यक्ति का आनंद विचार, कला, दर्शन और विज्ञानं में निहित है।" लेकिन आज का परिदृश्य हमारे सामने है जहाँ खाने-पीने, उठने-बैठने, गीत-संगीत, मनोरंजन आदि समस्त चीजों में विवेकरहित स्वच्छंद प्रवृत्ति नज़र आ रही है। यदि इन प्रवृत्तियों पे अंकुश लगाने को कहा जाये तो एक ही जवाब सुनने को मिल जाता है 'एक जिन्दगी मिली है खुल के ऐश करो, अगला जनम किसने देखा है'। हमारे ऐश करने के पैमाने ही हमारे व्यक्तित्व के परिचायक होते हैं।

वैज्ञानिकता सर्वप्रकार से धर्म, अध्यात्म, ईश्वर को नकारने की कोशिश कर रही है..और निरंतर होने वाली वैज्ञानिक खोजें हमारी विलासिता को ही पुष्ट कर रही है। विज्ञान नैतिकता की स्थापना में नाकाम है और सिर्फ क्षणिक शारीरिक संतुष्टि के साधनों को ही विकसित करने में संलग्न है। महायोगी अरविन्द इस सन्दर्भ में कहते थे-"मनुष्य की समस्याएं दो प्रकार की है, एक शरीर से संबंधित, जैसे- भूख,प्यास, सर्दी,गर्मी,काम इत्यादि...और दूसरी समस्या आत्मिक है, जैसे-जन्म-मरण भय, आकुलता, आंतरिक क्लेश इत्यादि। विज्ञान से सिर्फ शारीरिक समस्याओं का तो समाधान हो सकता है...किन्तु शाश्वत आत्मिक समस्याओं का समाधान खोजने में विज्ञान असफल है..और उसका कारण है विज्ञान की नास्तिकता।" धर्म को वैज्ञानिक और विज्ञान को धार्मिक बनाकर ही इन समस्याओं से निजात पाई जा सकती है...और इसके लिए अनुभूत अध्यात्म की आवश्यकता है।

हमेशा से भारत ने भौतिक वैभव को छोड़, किसी परलौकिक वैभव की तलाश की है...क्योंकि भौतिक सुख के तो कई दौर ये देश देख चुका है। लेकिन अब हम पर हमारी ही संस्कृति का असर नहीं रहा... आज जो हालात है वो बड़े बदतर हैं..युवाओं की इच्छाएं बड़ी संकुचित और निम्न स्तर की है। महँगी कार, अच्छा पेकेज वाली नौकरी, गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड का साथ, शराब के नशे में डूबी रंगीली शामें, लेट नाइट पार्टी, डिस्को और लफ्फाजी..इस पतित लाइफस्टाइल में कहाँ दर्शन और अध्यात्म की बात हो सकती है। बड़े-बूढ़े भी अपनी कुछ ऊपरी सांसारिक जिम्मेदारियों को पूरा करने को ही मुक्ति मान बैठें है...कि बच्चों को पाला-पोसा, पढाया-लिखाया, नौकरी से लगाया, शादी की और हो गया...इन्सान का बौद्धिक दायरा बस इनमे ही सिमट कर ख़त्म हो जाता है।

जिस जीवन में लाचारी है वहां मूलभूत चीजों रोटी, कपडा और मकान के संघर्ष में जिन्दगी अस्त हो रही है और जिस जीवन में समृद्धि है वहां विलासिता के कारण जीवन की बर्बादी हो रही है..अनुभूत अध्यात्म दोनों ही जिंदगियों से दूर है।

बहरहाल, इस भौतिकवाद की कीचड़ में कहीं-कहीं कुछ आध्यात्मिक कमल भी नज़र आ ही जाते हैं..जो सुकून देते हैं। ये सत्यान्वेषण की वो आग है जो भौतिकवाद और छद्म जीवनशैली के समंदर के अन्दर धधक रही है...और उस समुद्र को अपने दायरे का उलंघन करने से रोक रही है। ये समंदर किनारों की चट्टानों से टकराकर भले ही अपना माथा कितना भी क्यूँ न कूट ले...पर ये आग उसे चट्टानों को तोड़कर बाहर निकलने की इजाज़त नहीं देती............

Thursday, February 16, 2012

प्रेम-दिवस है,प्रेम-मास है,प्रेम-ग्रन्थ है,प्रेम-रोग है....पर प्रेम कहाँ है?


खाली बगीचे से मन
हाथों में सुर्ख गुच्छे
संकीर्ण दिलों के बीच
बड़ा सा दिल बने तकिये
महंगे स्वाद हीन पकवान.
और
खाली होती जेबों के मध्य
दिवस तो मन रहा है
पर
प्रेम नदारद है....

शिखा वार्ष्णेयजी की ये कविता कम शब्दों में बड़ी गहरी बात बयां करती है...प्रेम की एक दिवसीय संस्कृति(वेलेनटाइन डे) को सेलीब्रेट कर बाज़ार होली की तैयारी में मशरूफ हो गया है...बाजारवाद के साये में भावनायें भी बाजारू हो गयी है...गोयाकि उत्सवी रौनक इंसानी चेहरों पे कम, बाज़ार में ज्यादा नजर आती है...आधुनिक पीढ़ी की प्रेम की परिभाषा महज शारीरिक मोहपाश से ज्यादा कुछ नहीं है...दिलों का मेल बस बातों में हैं..दिल की सतह तो बंजर है, उसमे भला कहाँ प्रेम का बीज पनप सकता है। आर्चीज के का‌र्ड्स, गुलाब के फूलों का संसार, होटल, रेस्तरां, पब यहां तक कि सार्वजनिक स्थान भी अब प्रेम के बाजार की कहानी स्वत: ही बयां कर रहे हैं... लेकिन इस कहानी में अहसास नज़र नहीं आता।

14 फरवरी के साथ सीधे तौर पर एक मान्यता यह जुड़ी है कि वेलेंटाइन नामक पादरी को उस समय के यूनानी शासक क्लाउडियस ने ईसा के मत के प्रचार के अपराध में जेल में डाल दिया और इस दिन उसे मृत्युदंड देते हुए उसका सिर धड़ से अलग कर दिया था। ऐसा माना जाता है कि जिस दिन उसे मौत के घाट उतरा गया उसी रात उसकी मृत्यु से पहले उसने जेलर की बेटी को अलविदा कहते हुए पत्र लिखा था, जिसके अंत में उसने लिखा था तुम्हारा वेलेंटाइन। तभी से दंडित किए गए सेंट वेलेंटाइन के मार्मिक और अपूर्ण प्रेम की स्मृति में यह दिवस मनाया जाता है। लेकिन ये दिन कहीं भी हमारी संस्कृति से मेल नहीं खाता..और जिस तरह का सेलिब्रेशन इस दरमियाँ बयां होता है वो तो कतई हमारा अपना नहीं है...भारतीय प्रेम में नज़ाक़त, नफासत और प्रबल सरसता की त्रिवेणी का वास है...जो नितांत व्यक्तिगत मधुर अनुभूति है..जिसमे प्रदर्शन की कोई गुंजाइश नहीं है। लेकिन नवसंस्कृति का प्रेम उत्कट छद्म-प्रदर्शन, अय्याशी, शोर-शराबे और अभद्र कलेवर से लिप्त है जिसमे भावमयी संकल्पना का पूर्णतः आभाव है।

भारतीय परंपरा में यूँ तो हर उत्सव प्रेम और वात्सल्य से लवरेज होता है किन्तु इसकी अभिव्यक्ति का दिवस बसंत-पंचमी को माना जाता है...आज शायद ये पता भी न रहता हो कि कब ये दिन आया और गया...हमारी सारी तैयारियां वेलेनटाइन डे के लिए ही होती है...हर तरफ जो माहौल निर्मित किया जाता है वो भी इस दिन के लिए ही होता है...टेलीविजन पे भी हम धारावाहिकों में पूरे हफ्ते इस दिन को मनते देख सकते हैं...बाज़ार की ताकतें हमारी मानसिकता का रुख भी उस तरफ मोड़ देती है जिससे उन्हें फायदा मिलता हो..बेचारा गुलाब का फूल भी इन दिनों महंगा हो जाता है।

वास्तव में वेलेनटाइन डे की भावना में दोष नहीं है...दोष तो केवल एक दिवसीय मदनोत्सव की संस्कृति में है, जो सारी वर्जनाओं को ध्वस्त करके बाजार की संस्कृति का हिस्सा बनकर आक्रामक स्वरूप अपना रही है। दोष है युवाओं की सोच में, जो प्रेम सिर्फ शारीरिक आकर्षण एवं यौवन की आकांक्षाओं में देखता है। प्रेम को आखिर कैसे किसी दिन में या महीने में बांधा जा सकता है..क्या सिर्फ प्यार की जिम्मेदारी इतनी है कि ग्रीटिंग कार्डस या उपहार दे दिए जाये..क्या महज इस बात का प्यार पे असर पड़ता है कि किसने सबसे पहले अपने साथी को वेलेनटाइन विश किया था। सब कुछ बड़ा निराला है...प्यार की कसमें है, प्यार के किस्से हैं, प्यार की शायरी, प्यार की डायरी है...पर प्यार जाने कहाँ है। इस बारे में काफी कुछ मैं अपने इसी ब्लॉग पे प्रकाशित लेख "प्रेम-फिजिक्स, कैमिस्ट्री, फिलोसफी या कुछ और.." में कह दिया है...यहाँ वो सब कहना अभीष्ट नहीं समझता।

बहरहाल, दिखावे से भरे संसार में प्यार का कालीन के नीचे तड़पना दर्द देता है...संभवतः प्रेम आज शायद महज साहित्य के पन्नो में सिमट कर रह गया है..प्रेमी-प्रेमिका के आदर्श प्रेम की बात तो दूर आज की नव-संस्कृति में माँ-बाप, भाई-बहिन..जैसे पारिवारिक प्रेम के दर्शन भी दुर्लभ हो गये है। हर प्रेमी के पास एक स्टेपनी है..कि एक के साथ प्रेम ख़त्म, तो बेक-अप के लिए दूसरी प्रेमिका तैयार है। भौतिक विकास के युग में सड़कें तो चौड़ी हो रही हैं पर दिल संकरे हो रहे है...बंगलो और अपार्टमेन्ट की लम्बाई तो बढ़ रही है पर फैमिली का आकार घट रहा है...और सिकुड़ता दिल, लुप्त होती संवेदनाएं भला कैसे प्यार करें।

वर्तमान हालात देख लगता है कि एक दिवसीय उत्सव सेलिब्रेट करने वाली ये संस्कृति वेलेंटाइन, मदर्स,फादर्स,फ्रेंडशिप डे के बाद शायद एक ऐसा दिन भी ईजाद करें..जब प्रेम के लिए रखा जाएगा दो मिनट का मौन.........

Saturday, December 31, 2011

केलेन्डर बदलता है...हालात और फितरत नहीं


२०११ का समापन है और २०१२ दस्तक देने को तैयार..साल ख़त्म होने के पहले ही कई घरों में केलेन्डर बदल गये होंगे..और २०१२ का नवीनतम केलेन्डर सज-धज के दीवारों पे चस्पा हो गया होगा। वर्ष की विदाई, हर्ष की विदाई, उत्कर्ष की विदाई तो किसी के लिए संघर्ष की विदाई का आलम है..पर सच ये भी है कि गुजरा हुआ वक़्त गुजरकर भी नहीं गुजरता।

वर्ष बदल रहा है तो ज़ाहिर है केलेन्डर भी बदल जायेगा...लेकिन इस बदलते केलेन्डर के बावजूद कुछ चीजें जस की तस बरक़रार रहेंगी। लोकपाल बिल का तमाशा खूब हुआ बीते वर्ष..पर अब भी ये विवादों के फेरे में उलझा हुआ है...भ्रष्टाचार की त्रासद तस्वीरें नहीं बदलेंगी..अशिक्षा, जातिवाद, रुढियों का दीमक भी शायद ही देश की दीवारों से दूर हो पायेगा..और शायद ही रुकेंगी किसानों की आत्महत्याएं, मेट्रो सिटीज में बलात्कार की घटनाएं, डकैत, लूट या गली-मोहल्लों में दिनदहाड़े हो रही हत्याओं की वारदातें। गत वर्ष ओसामा मारा गया पर क्या आतंकवाद मरा है..गद्दाफी और होस्नी मुबारक की तानाशाही मिटी है पर क्या तानाशाह ख़त्म हुआ है..खाद्य सुरक्षा बिल पास हुआ है लेकिन क्या अब भूख से कोई नहीं मरेगा, ये गारंटी है...अफ़सोस बदलता हुआ केलेन्डर न बदलने वाले सवालों के जबाव दिए बगेर ही गुजर रहा है...

न हालात बदल रहे हैं नाही इंसानों की फितरत...नया वर्ष सिर्फ नयी तारीखें लेकर आएगा, सुसंगतियाँ नहीं। धार्मिक कट्टरताएँ नहीं हटने वाली और इससे जन्मी धार्मिक हिंसा भी बनी रहेगी..लोगों के पूर्वाग्रह विसंगतियों को ख़त्म नहीं होने देंगे...तथाकथित मोड़ेर्निटी विचारों पर नज़र नहीं आती सिर्फ पहनावे और चालचलन में दिखती है। पुरातन रूढ़िवादिता से जनमी छुआछूत, ओनरकिलिंग, अन्धविश्वास, पाखंड जैसी वारदातें नहीं मिटने वाली...कहने के लिए महिला सशक्त हुयी है लेकिन क्या असल में घरेलु हिंसा ख़त्म हुई है, क्या आज भी महिला पे बंदिशें मिटी है, क्या बेटियों का आबोर्शन होना रुका है...यदि कहीं महिला बंदिशों के बिना नज़र आ भी रही है तो वो महिला का सशक्त रूप नहीं, कुत्सित रूप नज़र आ रहा है...आज भी पुरुष मानसिकता उसे एक विलास सामग्री के तौर पे ही देखती है...और नारी का प्रयोग भी विज्ञापनों और फेशन जगत में सिर्फ उत्पाद का बाज़ार बढ़ाने के लिए किया जा रहा है...विश्वास नहीं होता कि हम इक्कीसवी सदी के बारहवे वर्ष मेंप्रवेश करने जा रहे है।

इतिहास महज़ कुछ तिथियों में सिमटकर नहीं रह जाता...वो एक अहम् अनुभवशास्त्र भी होता है। जिसका भाव समझकर अध्ययन किया जाय तो कुछ सीखा भी जा सकता है...और वो सीख लक्षित भविष्य को हासिल करने में सहायक साबित हो सकती है। २०११ इतिहास के पन्नो में समा रहा है लेकिन हम इससे क्या सीख कर आने वाले कल की तरफ निहार रहे हैं, ये महत्वपूर्ण है..क्या कोई इस न्यू ईयर ईव पे अपनी भागमभाग भरी जिंदगी में से कुछ विराम का वक़्त निकाल कर अपने बीते हुए कल पे विचार करेगा...शायद नहीं..और मैं यदि कुछ विचारने की हिदायत दूंगा तो सबसे बड़ा पुरातनपंथी होने का ताज मेरे सर पर ही मढ़ दिया जायेगा...भैया न्यू ईयर ईव की ये रात तो जाम छलकाने के लिए है, DJ की धुनों पे थिरकने के लिए है, सिगरेट के कस से धुंए के बादल उड़ाने के लिए है..और उन बादलों में जबकि पूरी फिजा धुंधली हो जाएगी तो किसे अपना अतीत नज़र आयेगा..कौन उसमें अतीत का मूल्यांकन करेगा..और जो करेगा वो तो पुरातनपंथी कहलायेगा ही जनाब!!!

केलेन्डर बदल जायेगा पर कुछ यादे ज़हन में बनी रहेंगी..जो आने वाले वक़्त में भी यदा-कदा अपना मीठा या कडवा रस हमें देती रहेंगी..लोगों की २०११ की डायरी बंद हो जाएगी लेकिन उसकी कुछ बातें २०१२ की डायरी में अनायास चली आएँगी। गुजरा हुआ वक़्त और आने वाला कल दोनों किसी न किसी तरह हमारे साथ चलते ही रहते है...गोयाकि जिंदगी भी दीवार में चस्पा सुइयों वाली घड़ी की तरह होती है जिसमे गुजरा हुआ और आने वाला समय भी उन दो सुइयों पे नज़र आता है जो वक़्त वे सुइयां नहीं बता रही होती है। बकौल जयप्रकाश चौकसे "कुछ लोग पुरानी डायरी में अंकित कुछ बातों को नई डायरी में नोट कर रहे हैं, परंतु अधिकांश लोग कैलेंडर अवश्य बदलना चाहते हैं। काश, कैलेंडर बदलने की तरह आसान होता कड़वाहट को भुलाना, परंतु वह तो दीवार में ठुके कीले की तरह दिल में पीड़ा का सतत स्मरण कराती है। हम अपने हर वर्तमान क्षण पर विगत का साया और आगामी की आशंका को महसूस करते हुए वर्तमान के क्षण को ही भींची हुई मुट्ठियों से रेत की मानिंद फिसलने देते हैं। अधिकांश लोग कैलेंडर बदलते हैं, परंतु नियति नहीं बदलती और इस कैलेंडरों से भरे देश में तारीख बदलने से भाग्य नहीं बदलता।"

बहरहाल, सभी की तरह मेरे लिए भी २०११ मिले-जुले अनुभवों से भरा रहा..जहाँ मैने रीनल डिसआर्डर के बाद किडनी ट्रांसप्लांट जैसे कठिन लम्हों को देखा तो कई बेहद सुखद अनुभवों से भी दो-चार हुआ..आगे देखता हूँ तो दर्द का साया भी है और डर भी...लेकिन उम्मीद, दर्द और डर दोनों से ज्यादा है...और उसी उम्मीद और हौसले के साथ निरंतर आगे बढ़ने का ज़ज्बा भी बना हुआ है। केलेन्डर से २०११ गुजर जायेगा पर मेरे दिल से नहीं....नववर्ष की शुभकामनाओं के साथ.........................

Friday, November 18, 2011

प्यार का सुर और दर्द का राग : रॉकस्टार


जिन्दगी में कुछ बड़ा करना है तो दर्द पैदा करो..सर्वोत्तम कला या भीड़जुटाऊ सफलता त्रासद जिन्दगी से जन्म लेती है...लेकिन एक वक़्त आता है जब हमारे पास कला, शोहरत, सफलता, पैसा सब होता है पर ये सब जिस दर्द से हासिल हुआ है वही दर्द असहनीय बन जाता है। गोयाकि जनक और जन्य दोनों बर्दाश्त के बहार होते हैं...असंतोष जिन्दगी का सच होता है।

रणवीर कपूर अभिनीत और इम्तियाज़ अली द्वारा निर्देशित फिल्म 'रॉकस्टार' कुछ इसी कथ्य को लेकर आगे बढती है। नायक की हसरत होती है एक बड़ा सिंगिंग रॉकस्टार बनने की...और उसके पास अपनी इस हसरत को हासिल करने लायक प्रतिभा भी है लेकिन फिर भी तमाम सामाजिक, आर्थिक बंदिशें उसे अपने मुकाम पे नहीं पहुँचने दे रही। इसी वक़्त कोई उसे कहता है कि तू तब तक अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर सकता जब तक तुझमें एक जूनून न हो, तड़प न हो, दर्द न हो, टुटा हुआ दिल न हो...अपने लक्ष्य को हासिल करने की दीवानगी इस कदर नायक के दिल में हैं...कि वो बुद्धिपूर्वक उस दर्द को पाना चाहता है...जानबूझ के तड़पने के लिए उसमे बेकरारी है...पर दर्द हालत के थपेड़ों से सहसा मिलता है उसके लिए कोई पूर्वनियोजन नहीं होता।

लेकिन इसी कश्मकश में नायक ये समझ बैठता है कि वो जो चाह रहा है वो मिल पाना मुश्किल है...और इसी बीच वो अपनी सब हसरत भुलाकर दोस्त बन बैठता है एक लड़की हीर कौल का...इस दोस्ती की शुरुआत में उसे नहीं पता कि यही दोस्ती उसकी जिन्दगी के सबसे त्रासद लम्हों को जन्म देगी। वो तो बस अभी सिर्फ उन पलों में डूबा है जहाँ सिर्फ खुशियाँ है, मस्ती है, बेफिक्री है..उसे नहीं मालूम कि ये बेफिक्री ही आगे चलके उसकी जिन्दगी का दर्द बनेगी और यही उसे एक अनचाही शोहरत दिलाएगी, उसे रॉकस्टार बनाएगी। सच, आनंद जितना चरम पे पहुंचकर नीचे उतरता है वो उतना ही गहरा दर्द बन जाता है।

नायक और नायिका सिर्फ अपनी दोस्ती के मजे ले रहे हैं..और लिस्ट बना-बनाकर छोटी-छोटी हसरतें पूरी करने में खुशियाँ ढूंढ़ रहे हैं। कभी वे ब्लू फिल्म देखते हैं तो कभी देशी दारू पीते हैं..ये सब करते हुए भी वो बस दोस्त होते हैं...और नहीं जानते कि उनका ये साथ अब उनकी आदत बन चुका है, प्यार बन चुका है। जो उनके अलग-अलग हो जाने के बाद भी उन्हें तड़पाने वाला है।

हालात दोनों को अलग कर देते हैं..लेकिन अलग होके भी अब वो अलग नहीं रह गए हैं...यहाँ नायक अब जनार्दन से जोर्डन बन चूका है और नायिका एक गृहणी...दोनों उस जिन्दगी को जी रहे हैं जो वो चाहते थे लेकिन फिर भी दोनों के दिल में एक कसक है..सब कुछ मन का होके भी न जाने क्यूँ सब कुछ मन का नहीं है। जिंदगी कितनी अजीब होती है हम जो चाहते है उसे हासिल कर लेने के बाद भी यही लगता है कि कुछ कमी है...और बेचैनियाँ बराबर हमें तड़पाती रहती हैं। उस तड़प को, उस कसक को बयां कर पाना मुमकिन नहीं होता और जो हम बयां करते हैं वो हमारा असल अहसास नहीं होता...क्योंकि "जो भी मैं कहना चाहूं बरबाद करें अल्फाज़ मेरे"

नायक का सुर प्यार की गहराई से जन्मा है और उस सुर में मिली हुई दर्द की राग उसे और कशिश प्रदान कर रही है...प्यार करने को वो सड्डा हक कहता है..लेकिन उसे अपने उस हक को हासिल करने में तमाम तरह के सामाजिक बंधन परेशान करते हैं...उन बंधनों से वो खुद को कटता हुआ महसूस करता है...वो कहता भी है कि आखिर क्यूँ उसे 'रिवाजों से-समाजों से काटा जाता है, बांटा जाता है..क्यूँ उसे सच का पाठ पढाया जाता है और जब वो अपना सच बयां करता है तो नए-नए नियम, कानून बताये जाने लगते हैं।' इस सामाजिक ढांचें में सफलता पचा पाना भी आसन नहीं है...आप सफल तो हो जाते हैं पर आप एक इंसानी जज्बातों का उस ढंग से मजा नहीं ले पाते जो एक आम आदमी को नसीब होता है। खुद को अपनी जड़ों से दूर महसूस करने लगते है..अपना आशियाना छूटा नजर आता है और हम वापस अपने घर आना चाहते हैं...और इस दर्द में सुर निकलता है "क्यूँ देश-विदेश में घूमे, नादान परिंदे घर आजा"

नायक अपने गीत-संगीत से ही प्यार को महसूस करता है...और उसके दिल की गहराई से निकले यही गीत आवाम की पसंद बन जाते हैं...नायक गाता है कि 'जितना महसूस करूँ तुमको उतना मैं पा भी लूँ' अपने गीत के साथ वो अपनी प्रेमिका का आलिंगन कर रहा है। संवेदना के रस में डूबकर कला और भी निखर जाती है...और साथ ही वो जनप्रिय बन जाती है।

बहरहाल, एक बहुत ही सुन्दर सिनेमा का निर्माण इम्तियाज़ ने किया है...जो उनके कद को 'जब वी मेट' और 'लव आजकल' के स्तर का बनाये रखेगी। इरशाद कामिल के लिखे गीत और रहमान के संगीत की शानदार जुगलबंदी देखने को मिली है...और फिल्म का गीत-संगीत ही फिल्म की आत्मा है...नहीं तो कहीं-कहीं इम्तियाज़ अपनी पकड़ फिल्म पे से छोड़ते नज़र आते हैं पर फिल्म का संगीत उन्हें संभाल लेता है। रणवीर की अदाकारी कमाल की है सारी फिल्म का भार उन्ही के कन्धों पर है...उन्होंने अपने अभिनय से साबित किया कि उनमे भावी सुपरस्टार के लक्षण बखूबी विद्यमान हैं...एक बेचैन गायक की तड़प को बेहतरीन ढंग से प्रस्तुत किया है रणवीर ने। नर्गिस फाखरी खूबसूरत लगी है उनमे एक ताजगी महसूस होती है...हम उम्मीद कर सकते हैं कि कटरीना के बाद एक और विदेशी बाला अपना बालीवुड में सिक्का जमा सकती है।

खैर, जुनूनी मोहब्बत, मोहब्बत पे समाजी बंदिशें, सफलता की हकीकत से रूबरू होना चाहते हैं और सुन्दर गीत-संगीत और फ़िल्मी रोमांटिज्म पसंद करते हैं... तो 'रॉकस्टार' कुछ हद तक आपकी इसमें मदद कर सकती है...

Tuesday, November 8, 2011

समृद्ध इण्डिया की उत्सवधर्मिता और लाचार भारत की बदनसीबी


दीपावली के साथ भारत में उत्सवों का एक दौर हर साल विदा ले लेता है और दूसरा दौर ग्यारह दिन बाद ही दस्तक दे देता है...जी हाँ अवरुद्ध पड़े शादी व्याह की बहार आ जाती है। भारत वो देश है जिसकी रगों में उत्सव खून बनकर बहते हैं। देश की सामाजिक संरचना या कहें भारतीय फितरत ही ऐसी है कि उसे हर वक़्त झूमने के अवसर की तलाश होती है गोयाकि खुद के घर में शादी न हो तो दूसरे की बारात में ठुमकने से भी परहेज नहीं है। इस असल भारतीय स्वभाव ने ही हमारी संस्कृति को लचीला स्वरूप प्रदान किया है। यही कारण है कि ये संस्कृति जितने जोश-खरोश के साथ दीवाली, ईद और रक्षाबंधन मानती है उतने ही उत्साह से वेलेंटाइन डे, मदर्स-फादर्स डे जैसे पश्चिमी दिनों को मनाती है।

उत्सवप्रियता का ये स्वभाव इस कदर मानवीय है कि जन्म की खुशियाँ तो इसमें शुमार हैं ही वरन मौत की रसोई भी शामिल है। इस मानवीय पृकृति ने ही विलासिता, बाजारवाद और झूठी शान-शौकत की प्रवृत्ति में इजाफा किया है।

आज हम त्यौहारों-उत्सवों के रंग में खुद नहीं रंगते बल्कि इन उत्सवों को अपने रंग में रंग देते हैं। अपनी दूषित प्रकृति से उत्सवों को दूषित कर दिया जाता है। मैं उत्सवप्रियता या प्रसन्नचित्तता का विरोधी नहीं हूँ बल्कि ये कहना चाहता हूँ कि हमने उत्सवों में अपनी प्रसन्नता के मायने जो तय किये हैं वो ग़लत हैं। अपने उत्सव धर्म से जो हमने प्रक्रितिधर्म को ठेस पहुचाई है वो ग़लत है। अपने परिवेश को भूलकर जो उत्साह मनाया है वह ग़लत है।

बात जटिल लग रही होगी सरल करने का प्रयास करता हूँ। दरअसल अपने हिन्दुस्तानी परिवेश को गहनता से देखा जाये तो यह हमें कतई उस उत्सव धर्म में शरीक होने कि इज़ाज़त नहीं देता जो हम मना रहे हैं। बशर्त आप एक उत्सवधर्मी न होकर एक इन्सान के नाते बात पर गौर करने की कोशिश करें। जिस देश की सत्तर प्रतिशत आबादी दो वक़्त का पेट भर खाना नहीं खा पा रही उस देश में कैसे आप ख़ुशी के जाम छलका सकते हैं, लाखों-करोड़ो रुपये महज़ पटाखों पर खर्चे जा सकते हैं। जिस देश में लाखों-करोड़ो बच्चे कुपोषण, भुखमरी का शिकार है या जिनके सर माँ-बाप का साया नहीं हैं वहां कैसे लोगों के गले के नीचे महँगी मिठाइयाँ उतर सकती हैं। जहाँ किसान आत्महत्या कर रहा है उसके पास क़र्ज़ चुकाने का चंद पैसा नहीं है जहाँ महंगाई के बोझ तले इन्सान अपने बच्चों को रोटी नहीं खिला पा रहा वहां कैसे धनतेरस जैसे अवसरों पर सोने-चाँदी कि दीनारें महज शगुन के तौर पर खरीदी जा सकती हैं।

हालात, उत्सवों पर वास्तव में बहुत थोड़े ही बदलते हैं कि आम दिनों में समृद्ध इण्डिया एक पैग पीता है और उत्सवों में दो,तीन या चार जबकि लाचार भारत आम दिनों में बस रोता है तो उत्सवों में उसका चेहरा हल्की मुस्कराहट लिए आंसू बहता है। आंसू इस लाचार भारत का यथार्थ है और मुस्कान आदर्श।

वैज्ञानिक विकास और तकनीकी दक्षता ने भी खुशहाली सिर्फ उस समृद्ध इण्डिया के हिस्से में दी है...फेसबुकिया सेलिब्रेशन उसे ही नसीब है वही इन सोशल नेट्वर्किंग साइट्स पे वधाईयां लाइक और शेयर कर रहा है। लाचार भारत उस दिन भी रिक्शा चला रहा है, इमारतें बना रहा है, गड्ढे खोद रहा है या समृद्ध इण्डिया के घरों,कालोनियों,सड़कों की सफाई में सलंग्न है। हाँ ये बात है कि किसी तरह उसे इस समृद्ध इण्डिया के उत्सवों का शोर ये बता देता है कि आज कुछ खास दिन है और इस खास दिन का पता लगने पर वो चेहरे पे मुस्कान लाकर फिर काम में लग जाता है।

वैज्ञानिक विकास इस लाचार भारत के विनाश का गड्ढा खोद रहा है उत्सवधर्मिता इसकी लाचारी को और बढ़ा रही है। प्रकृति और संसाधनों को जितनी हानि ये समृद्ध इण्डिया पहुंचा रहा है..उतना लाचार भारत नहीं। उल्टा वह तो उस हानि से त्रस्त ही हो रहा है। समृद्ध इण्डिया की जरुरत दो की है तो वह दो सौ का उपभोग कर रहा है और लाचार भारत की जरुरत एक की है तो वो उस एक को पाने के लिए ही संघर्षरत है। एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व के एक तिहाई संसाधनों पे विश्व जनसंख्या का सिर्फ छटवा हिस्सा उपभोग कर रहा है तो सोचिये एक बड़े जनसमूह के पास कितने संसाधन हैं? महंगाई, ग्लोबल वार्मिंग, बेरोजगारी, अशिक्षा, गरीबी जैसी सारी समस्याओं ने इस लाचार भारत के घर की ओर रुख कर लिया है।

अखवारों में आने वाले विकास के आंकड़े एकतरफा हैं और विनाश के आंकड़े भी एकतरफा है। समृद्ध इण्डिया और लाचार भारत के बीच बस आर्थिक असंतुलन नहीं, उत्सव असंतुलन भी है। समृद्ध इण्डिया संयम और मर्यादा में उपभोग की नीति विसरा चूका है। उसकी उत्सवधर्मिता अब विलासिता बन चुकी है या कहें उसने खुश होने के जो मानक बनाये हैं वह उसके व्यसन बन चुके हैं। उसका उत्सवप्रियता पे खर्च बढ़ता जा रहा है और अय्याशियाँ ख़ुशी का रूप लेती जा रही हैं। उत्सवी खुशियाँ सिर्फ कालीन के ऊपर हैं कालीन के नीचे लाचार भारत की तड़प देखने की ज़हमत कोई नहीं कर रहा है।

आश्चर्य होता है एक सिर्फ इसलिए परेशान है कि उसे होटल में पिज्जा टाइम पे नहीं मिला या उसकी ब्रांडेड ज्वेलरी का आर्डर डिलीवर होने में देरी हो गयी..तो दूसरा भूखा रहकर भी अपनी कसक जाहिर नहीं कर पा रहा। एक इसलिए परेशान है कि उसके बच्चे को मन के इंग्लिश मीडियम स्कूल में एडमिशन नहीं मिला..तो दूसरा अपनी आँखों के सामने भूख से मरते बच्चे को देखकर भी आंसू नहीं बहा पा रहा। एक इसलिए गुस्सा है है कि उसकी बेटी की शादी के लिए मनपसंद मैरिज गार्डन नहीं मिला..तो दूसरा कदम-कदम पे दुत्कारे जाने के बाद भी अपना गुस्सा नहीं दिखा पा रहा। गोयाकि आंसू बहाने, गुस्सा दिखाने, दर्द में कराहने के लिए भी स्टेटस का होना जरुरी है।

बहरहाल, किसे पड़ी है दुनिया-ज़माने के सोचने की..अपनी उत्सवी फुलझड़ियाँ जलते रहना चाहिए, अपनी गिलास में जाम भरा होना चाहिए....हम तो लाचार भारत पे यह कहके पल्ला झाड़ सकते हैं कि ये उनके अपने कर्मों का फल है..हम अपने उत्सवों या कहें अय्याशियों को क्यों फीका करें। करवाचौथ और नवदुर्गा पे हम व्रत रखके उत्सव मनाते हैं..लाचार भारत भूखा रहकर हर दिन बेउत्सव व्रत करता है।

खैर, अपनी अय्याशियों की लगाम हमें टाईट करने की जरुरत नहीं है और वैसे भी हमें हमारे उत्सवी पटाखों के शोर में लाचारियों की चीखें सुनाई कहाँ देती हैं............................