Monday, April 15, 2019

मेरी प्रथम पच्चीसी : पंद्रहवीं किस्त

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(*जीवन की पहली पच्चीसी बयां करने के क्रम में आने वाली 31 जुलाई को ज़िंदगी के 31 बसंत पूरे कर लूंगा। वर्ष 2013 में 31 जुलाई को ही स्वांतसुखाय शुरु की गई जीवन की इस श्रंख्ला को करीब छह वर्ष का वक्त गुज़र गया...पर पच्चीसी का ये सफ़र अब भी जारी है। शुरुआत में सोचा नहीं था कि इतना वक्त लग जायेगा और इन बीते वर्षों में हुए कई तरह के अच्छे-बुरे बदलावों के साथ ज़ेहनी ऊहापोह ने इसे इतने लंबे वक्त तक खींच दिया...कुछ मेरा ही आलस, तो कुछ व्यस्तताओं से श्रृंख्ला लंबे समय अवरुद्ध रही। खैर, आगे बढ़ते हैं उम्मीद है पच्चीसी जल्द अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंचेगी)

गतांक से आगे....

मास्टर डिग्री ख़त्म होने के बाद अब दिलोदिमाग की निगाहें एक अदद नौकरी की तलाश कर रही थी...साथ पढ़ाई करने वाले दोस्त-यारों में से कई आजीविका से लग गये थे और ज़िंदगी के अगले पड़ाव में प्रविष्ट हो गये थे तो कई दोस्त मेरी ही तरह बीच भंवर में फंसे थे और बस तब यही दोस्त सहानुभूति और गम का सहारा हुआ करते थे। एक-दूसरे से मिल, बात कर हम आपस में एक दूसरे का संबल बनने की निरर्थक कोशिश करते थे। ये ऐसा दौर होता है जब दीन न होने के बावजूद हम स्वयं को सबसे ज्यादा दीन-हीन महसूस करते हैं। मसलन, एक चाय के लिये पैसे देने पर भी ऐसा महसूस होता था कि हम मानो बाप के पैसे में ऐश कर रहे हों, जो कि एक नैतिक, चारित्रवंत पुत्र को निश्चित ही आत्मग्लानि से भरने के लिये काफी होता है। घर-परिवार के लोग उम्मीद संजोये ये सोचा करते हैं कि बेटा उज्जवल भविष्य की नई इबारत गढ़ रहा है लेकिन उनसे दूर कुछ खुद की जरुरतें और कुछ विलासिता में होने वाले खर्चे ज़ेहन को तोड़े डाल रहे थे। बेसब्री का दौर भी होता है ये, जब हम तुरत-फुरत में ही किसी बड़े पद, मोटी तनख्वाह और सामाजिक प्रतिष्ठा को झट से पाने का ख्वाब पाल लेते हैं लेकिन ये तमाम चीज़ें मिलने में वक़्त लगता है, ये वक़्त गुजरने के बाद ही पता लगता है।

बहरहाल, कुछ छुट-मुट कोशिशों के बाद भी नौकरी न लगी तो अचानक आगे की पढ़ाई करने का प्रस्ताव हाथ लगा.. जब कुछ करने को न था तो सोचा पढ़ ही लिया जाये। और ये बंदा अपने एक अदद दोस्त को साथ लिये पहुंच गया मध्यप्रदेश की व्यवसायिक राजधानी इंदौर, जहाँ देवी अहिल्याबाई विश्वविद्यालय से जनसंचार में एम.फिल करने की ठानी। यहाँ एक औपचारिक इंट्रेंस टेस्ट दिया और हो गया एडमिशन। ये फैसला बाइ च्वाइस नहीं, बल्कि बाइ चांस लेना पड़ा लेकिन मैं अपने संगी साथियों में यही बताता था कि ये मेरी पसंद का फैसला है और हेकड़ी बघारते हुए कहता कि नौकरी करने के लिये तो ज़िंदगी पड़ी है पर पढ़ाई करने का वक़्त दोबारा लौटकर नहीं आ सकता। ये बात प्रथम दृष्टया भली जान पड़ती है लेकिन मैं इसे सिर्फ खुद को विशेष बताने के लिये प्रयोग करता क्युंकि असल में तो मैं एक उच्छिष्ट भोगी था जिसने नौकरी न मिल सकने पर पढ़ने का मजबूरी वश मन बनाया था।

इंदौर में जिस वर्ष (2009) एमफिल शुरु की उस वर्ष समूचे मध्यप्रदेश के विश्वविद्यालयों में प्राध्यापकों की हड़ताल का दौर था लिहाजा प्रथम सत्र के शुरुआती तीन महीने कोई अकादमिक डेवलमेंट नहीं हुआ। इन तीन महीनों में न तो अगले सफर पर ही मैंने कुछ कदम बढ़ाये थे और न ही पिछला पड़ाव ही ज़ेहन से छूटने का नाम ले रहा था तो बड़ी त्रिशंकु जैसी हालत थी। ऐसे में जवानी के जुनून, महत्वाकांक्षाओं का सैलाब और फैसलों में नियमित तौर पर वर्तने वाले कन्फ्युसिंग रवैये के चलते दिल बड़ा बेचैन रहा करता। आज जब उस उम्र के कुछ युवाओं से मिलता हूूूँ तो उन्हें भी ऐसे ही परेशान होते देखता हूँ। अपने अनुभव से उन्हें कुछ समझाना भी चाहता हूँ लेकिन ये जानता हूँ कि किसी के समझाने से इस दौर की ऊहापोह दूर नहीं होती, बल्कि भविष्य में गुजरते वक्त, होती गलतियों और बढ़ते अनुभवों से ही ये सब समझ में आता है।

इंदौर में क्लासेस जब शुरु हुईं तो उन्हें रस्मी तौर पर अटेंड करता लेकिन किसी से दिली जुड़ान न हो पा रहा था क्युंकि पुराने दरख़्तों से दिल अब भी चिपटा हुआ था। इस वक़्त में कुछ सुकून था तो वो अपने पुराने कुछ दोस्तों से आये दिन फोन पर होने वाली अतीत की जुगाली ही थी और इसी खालीपन के दौर में पल्लवित हो रही प्रेम की कोंपल भी एक और खुशी का जरिया रही। वहीं अपने फ्लैट पर साथी बने तीन अन्य रूममेट्स के साथ होने वाली तफरी और विचारों का विरेचन नये रिश्ते गढ़ रहा था इन तीन साथियों में से दो मेरे जयपुर में अध्ययन के दौरान के सीनियर थे जिनसे पहचान तो थी पर उस वक्त ये रिश्ता और गहरा बना।

वक़्त अपनी रफ़्तार से गुजर रहा था एमफिल का प्रथम सत्र भी गुजरा। चुंकि दूसरे सत्र में सिर्फ डिजर्टेशन बनाने की जिम्मेदारी थी तो नियमित कॉलेज जाने की कोई बाध्यता नहीं थी इसलिये अब वापस अपने ज़ेहनी रिश्ते वाले शहर भोपाल लौट आया था और यदा-कदा ही इंदौर जाना होता। इस खाली वक़्त में कुछ किताबें पढ़ने, लिखने और अपने चंद दोस्तों के बीच थोड़ा-बहुत ज्ञान पेलने के अलावा कोई खास काम नहीं था। इस वक़्त में एक बार फिर नौकरी के लिये हाथ-पैर मारे पर 6-7 हजार मासिक वेतन वाली नौकरियों तक में कहीं सिलेक्शन न हो सका। इस हताशा के वक़्त में हम अपने आसपास कुछ फ़जूल के ख़याली किले बना लेते हैं तब न हम किसी से मिलना चाहते हैं, न किसी जगह जाना चाहते हैं बस अपने ही सेफ ज़ोन में रहते हुुए खुद की घुटन को महसूस करते हैं क्युंकि महफिल़ों में अक्सर पूछा जाने वाला सवाल- "और क्या चल रहा है?" इसका हमारे पास कोई अदद जवाब नहीं होता। और हम तन्हाईंयों से ही अपना वास्ता जोड़े रखने में खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं। इस तरह अमूमन 2010 का पूरा वर्ष, यूं ही 'बिना कुछ अच्छा या बिना कुछ ज्यादा बुरा' हुए बगैर ही गुजरा।

कोई खास काम-धंधा न होने से मिला खालीपन प्रेम के पल्लवन का सबसे मुफीद वक़्त होता है और इस वक्त जो भी कोई अपोजिट जेंडर का शख़्स आपके परिचय में सबसे करीब होता है उससे आप दिल लगा बैठते हैं। कई मामलों में व्यस्तताएं प्रेम विच्छेदन की वजह बनती हैं तो खालीपन, मुफलिसी और बेचारगी उसी प्रेम के खाद-पानी बन जाते हैं। इस ख़ाकसार के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा था... लौटूंगा उस ज़ेहनी दास्तां को लेकर, बिना किसी व्यक्ति-विशेष को निशाना बनाये, सिर्फ अपने जज़्बात लिये। इंतजार कीजिये अगली किस्त का....

Tuesday, February 5, 2019

जश्न और जीत की नई गर्जना - हाऊज् द जोश? …..हाई सर!!!

(***ये फिल्म समीक्षा दिल्ली से प्रकाशित मासिक पत्रिका "हिन्दुस्तान ओपिनियन" के जनवरी-फरवरी 2019 के अंक में प्रकाशित हुई, इसलिये प्रकाशन होने तक इसे ब्लॉग पर डालना संभव नहीं हो सका।)

सिनेमा के जनक दादासाहेब फाल्के का एक कथन था फिल्में निश्चित ही मनोरंजन का सशक्त माध्यम हैं। लेकिन इनका सार्थक प्रयोग ज्ञानवर्धन और जागरुकता के लिये भी किया जा सकता है। सीमा पर अपने साहस का परिचय देते हमारे वीर जवानों की कर्तव्यनिष्ठा एवं शौर्य के बारे में सुनना और उसके जीवंत रूपांतरण को रुपहले परदे पर देखना एकदम भिन्न अनुभूति का संचार हमारे ज़ेहन में करता है।

उरी- द सर्जिकल स्ट्राईक सिनेमा की हमारे जवानों को दी गई एक ऐसी आदरांजलि का नाम है जिसे दशकों बाद भी एक सशक्त दस्तावेज की तरह प्रस्तुत किया जा सकता है। ये एक ऐसी फिल्म है जिसने सिनेमाई मानदंडों की पारंपरिक रीत के परे एक ऐसे कथ्य की प्रस्तुति पेश कर सफलता पाई जो अमूमन सिनेमा में विरले ही देखने को मिलती है।

जहां न कोई पारंपरिक प्रेम कहानी है, न कोई आइटम नंबर और न नायिका के बदन से सरकता लिबास... ये सब वे चीज़ें हैं जिन्हें सिनेमाई कामयाबी का मूलतत्व कहा जाता है लेकिन इन सबसे हटकर उरी- द सर्जिकल स्ट्राईकअपने पहले फ्रेम से अंतिम फ्रेम तक सेना का शौर्य, साहस, समर्पण और अनेक कठिनाईयों के बावजूद अपनी कर्तव्यनिष्ठा का निर्वहन करते जवानों की कहानी है।

फिल्म के केन्द्र में सिंतबर 2016 में भारतीय सेना द्वारा उरी में हुई आतंकी वारदात के बाद पाकिस्तान पर की गई जबावी कार्रवाई है लेकिन फिल्म का ट्रीटमेंट कुछ ऐसा है कि फ्रेम दर फ्रेम आप ज़ेहन में देशभक्ति का जज़्बा महसूस करते हुए कई मर्तबा हमारे सैनिकों के लिये तालियां बजाते हैं और उनकी निष्ठा को सलाम करते हैं।

फिल्म के कथानक के जरिये निर्देशक आदित्य धर दर्शकों को पेट्रिऑटिज्म का जबरदस्त डोज़ देते हैं। फ्रेम दर फ्रेम फिल्म चीख चीखकर ये बताती है कि आप पेट्रियोटिक सिनेमा देख रहे हैं। युद्ध पर आधारित फ़िल्में यूं भी भारतीय सिनेमा में कम ही बनी है लेकिन जो चंद फिल्में हमें याद हैं उनमें हम उरी-  द सर्जिकल स्ट्राईक को भी याद रखेंगे। निर्देशक का जबरदस्त ट्रीटमेंट और काफी क्लीशेड स्क्रीनप्ले उरी को क्लास फिल्म बनाने के साथ साथ मास फिल्म भी बनाती है। यही वजह है कि क्रिटिकली और कमर्शियली दोनों पहलुओं पर फिल्म सफल साबित हुई है। बेहद कम बजट की बनी होने के बावजूद करीब 200 करोड़ रुपये का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन कर फिल्म ने यह साबित भी कर दिया है।

फिल्म की अदाकारी की बात की जाये तो विक्की कौशल अपनी कम्पीटेंट एक्टिंग के चलते दर्शकों के दिलों में अपनी खास जगह बनाने में कामयाब होते हैं। उनकी अदाकारी देख ये यकीन करना मुश्किल होता है कि ये वही विक्की कौशल हैं जिन्हें हमने मसान फिल्म में एक कम्पेल्ड युवक के रूप में देखा था। कहना गलत नहीं होगा कि उरी के लाउड स्क्रीनप्ले को भी अपनी बढ़िया अदाकारी से विक्की कौशल ने बैलेंस किया है। फिल्म देखने के बाद विहान का किरदार दर्शकों पर अपनी खास छाप छोड़ता भी है। विक्की कौशल के अलावा दूसरे किरदार भी अपनी- अपनी भूमिकाओं में काफी सजे हैं। परेश रावल, मोहित रैना, स्वरूप सम्पत, यामी गौतम और कीर्ति कुलहरि आदि सभी ने अपने अपने किरदारों के साथ न्याय किया है।

फिल्म की जबरदस्त एक्शन कोरियोग्राफी, जोश भर देने वाले संवाद, वॉर सीन्स का पिक्चराईजेशन और कॉस्ट्युम फिल्म के घटनाक्रम को यकीन करने वाला बनाते हैं। कुछ लोगों को पैट्रियॉटिज्म को ओवरडोज फिल्म में दिख सकता है लेकिन यही ओवरडोज एक बड़े मास के लिये फिल्म की यूएसपी भी है। चुंकि ये फिल्म बहुत पुराने घटनाक्रम को पेश करने के बजाय हाल ही में हुई वारदात पर आधारित है लिहाजा दर्शक खुद को फिल्म से बेहतर ढंग से जोड़ पाते हैं।

अपने मिशन पर जाने से पहले विक्की कौशल जब जवानों में ऊर्जा का संचार करते हुए सवाल करते हैं हाउज् द जोश... तो सिनेमाघर में बैठा दर्शक भी उसी ऊर्जा को महसूस करते हुए जबाव देता है हाई सर। ये नारा उरी फिल्म का ही सुर नहीं रह गया है बल्कि नये भारत के युवा की भी गर्जना बन गई है और इसे कई अवसरों पर इन दिनों सुना जा सकता है।

बहरहाल, सिनेमा के ट्रेंड बन चुके मसाला मनोरंजन से इतर इन दिनों लीक से हटकर बनने वाली ये कुछेक फ़िल्में भारतीय सिनेमा की प्रतिष्ठा में जबरदस्त इजाफा करने वाली साबित हुई हैं। बीते वर्ष रिलीज़ हुई फिल्म राज़ी के बाद हाल ही में प्रदर्शित उरी- द सर्जिकल स्ट्राईकसिनेमा में राष्ट्रवाद का बेहतरीन शंखनाद है।

Friday, May 11, 2018

मेरा पहला ख़त तुम्हारे लिये.......

प्रिय बेटा !

बड़ा अजीब लग रहा है बेटा ये शब्द इस्तेमाल करना.... क्योंकि अब तक खुद के लिये ये संबोधन सुनने के आदी थे लेकिन तुमने आकर चंद लम्हों में बढ़प्पन का अहसास करा दिया और मैं इस शब्द से बेहतर कुछ और तुम्हें कहने के लिये नहीं तलाश पा रहा हूँ। तुम्हारे आने से जज़्बात की जो फसल ज़ेहन में ऊगी है उन्हें अल्फाज़ की शक्ल  दे अभी ही इस ख़त में उड़ेल देना चाहता हूँ.... ये जानते हुए भी कि तुम इस ख़त में कही बातों को अरसे बाद ही समझ पाओगे, लेकिन अरसे बाद मैं इन अहसासात को अभी जैसे बयां करने में अशक्य रहूंगा।

24, अप्रैल 2018 की सुबह भी आम दिनों की तरह अलसाई हुई सी ही थी। जागना...और जागकर भागना, अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को जीना बस यही था उस दिन भी। देश राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस मना रहा था और मध्यप्रदेश के लिये वो दिन इस मायने में अहम् था कि मंडला जिले में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कुछ कार्यक्रमों में शरीक हो रहे थे और पीएम के प्रदेश दौरे के मद्देनजर मेरे लिये दूरदर्शन में ये दिन आम दिनों के बनिस्बत थोड़ा ज्यादा व्यस्त था। तुम्हारी माँ का रुटीन चेकअप था पर कुछ कॉम्पलिकेशन के चलते वही दिन तुम्हारे आगमन का दिन बन पड़ा। तुम सामने थे... चंद घंटों में तुम हमारे ख़यालों के आसमान से उतरकर हक़ीकत की ज़मीं पर थे। इन चंद घंटों में तुम्हारे स्वागत की कुछ खास तैयारी भी न कर सके थे हम...पर तुम्हारा सामने होना हमारे लिये अन्य तमाम चीजों से ज्यादा अहम् था इसलिये कैसे इस लम्हे को जीये ये सोचने का वक़्त भी नहीं ही था समझो।

दुनिया के लिये और कुकुरमुत्तों की तरह बिखरी मीडिया के लिये तुम कोई हेडलाइन नहीं थे.... तुम से कुछ मिनटों पहले यू ट्यूब पर राजकुमार हिरानी की फिल्म "संजू" का ट्रेलर लांच हुआ था जो तुम्हारे होने तक लाखों व्युअर्स की हिट पा चुका था... उस दिन क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर का जन्मदिन था लिहाजा ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी इन्हीं की भरमार थी (जब तुम होश संभालो तब शायद ये सब अप्रासंगिक हो चुके हों पर अभी तो इंसान की ज़िंदगी का आधे से ज्यादा टाइम यही खा रहे हैं)। सड़क परिवहन मंत्री ने सडक सुरक्षा सप्ताह शुरु किया था, मध्यप्रदेश को सड़कों का ढांचा सुधारने इसी दिन 258 मिलियन डॉलर का कर्ज मिला था, दादा साहेब फाल्के अवार्ड की घोषणा हुई थी, भारत ने आठवीं एशियन जूडो चैंपियनशिप जीती थी, एक रात पहले ही आईपीएल के 11वे संस्करण में हैदराबाद ने लोएस्ट टोटल को बचाते हुए मुंबई इंडियन्स को हराया था। वहीं अंतरराष्ट्रीय फलक पर देखें तो कनाडा और युरोपीय युनियन द्वारा दुनिया की महिला विदेश मंत्रियों का पहला सम्मेलन आयोजित किया गया था, चाइना में शंघाई समन्वय संगठन की बैठक चल रही थी, इजिप्ट के फोटोग्राफर मोहम्मद अबू जैद को युनेस्को द्वारा वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम पुरस्कार मिला था, फिल्मप्रेमी चार दिन बाद रिलीज़ होने वाली हॉलीवुड मूवी एवेंजर्स-3 का इंतज़ार कर रहे थे। और तुम, हर रोज़ पैदा होने वाले लाखों बच्चों की तरह एक सामान्य सी घटना भर थे... दुनिया के लिये तुम बस उन लाखों की ही तरह थे.... पर हमारे लिये तुम दुनिया थे या युं कहें उन लाखों में अकेले एक थे।

ऊपर कही गई तमाम बातें इसलिये भी हैं कि भविष्य में कभी अहंकार के रथ पर सवार हो खुद को इतना बड़ा न समझ लेना कि दुनिया बोनी नज़र आने लगे... हमारी ये भौतिक हस्ती इस ब्रह्मांड की अनंतों घटनाओं के सामने कुछ भी नहीं है लेकिन आध्यात्मिक हस्ती अनुपम, अद्वितीय, बहुमूल्य और इकलौती ही है। एक बात और साफ कर दूं...कि तुम एक लड़के के रूप में हमारे बीच आये इसलिये तुम बहुत खास हो ऐसा बिल्कुल नहीं है... तुम जिस रूप में हमारे सामने आते तुम उतने ही खास होते जितने अभी हो। ये इसलिये याद दिलाना जरुरी है कि बेटा-बेटी के बीच गैरबराबरी की खाई गहराने वाले इस जहाँ में तुम खुद को कहीं आधी आबादी से कुछ विशेष न मान बैठो और हमारी सांस्कृतिक रग़ों में बहने वाले रुढ़िवाद एवं पितृसत्तात्मक सोच के ज़हर का असर तुम पर न आने पाये। तुम्हारे आने से ये दुनिया बेहतर नहीं हुई है इसे बेहतर बनाये रखने के लिये तुम्हें अपना बहुत कुछ झोंकना होगा।

तुम आज जैसे हो यदि अंदरुनी तौर पर ऐसे ही रहो तो यक़ीन मानना ये दुनिया तुम्हारी पूजा करेगी लेकिन मुझे पता है कि हम और हमारे आसपास का परिसर तुम्हें ऐसा नहीं रहने देगा। हम तुम्हें कुछ सिखाने के नाम पर तुमसे तुम्हारी मासूमियम, तुम्हारी निश्छलता सब कुछ छीन लेंगे। जिन असल दैवीय गुणों के साथ तुम आये हो उसे हम रहने नहीं देंगे और हमें ये दंभ होगा कि हमने तुम्हें शिक्षित कर दिया। एक बात समझ सको तो ज़रूर समझना कि दुनिया की तालीमें तुम्हें सिर्फ पैसा और कोरी पद-प्रतिष्ठा दिला सकती हैं लेकिन मानवीय मूल्यों को तुम अपनी सहज प्रज्ञा के बल पर ही पा सकोगे। सही-ग़लत का निर्णय करने का विवेक... बहुत दुर्लभ चीज़ है जो वास्तव में अपने से ही आता है। यदि तुम ऐसा विवेक, सरलता और निश्छलता अपने व्यक्तित्व में ला सके तो तुम दुनिया में भीड़ का हिस्सा न होकर कुछ चुनिंदा लोगों में से एक होगे।

एक बात और जो मैं बतौर अध्यापक अपने विद्यार्थियों को समझाते आया हूँ वो तुमसे भी कहना चाहूँगा... कि प्रतिभा और चरित्र में से हमेशा चरित्र को तवज्जो देना, हुनर या प्रतिभा को नहीं क्योंकि प्रतिभावान तो कई लोग होते हैं पर उन्हें महानता उनका चरित्र दिलाता है। वहीं यदि प्रतिभा और पैसे में से कुछ चुनना हो तो पैसे को नहीं, प्रतिभा को चुनना क्योंकि जो कौशल तुम हासिल करोगे वो ज़िंदगी भर काम आयेगा...पैसा हमेशा काम नहीं आ सकता। और हाँ यदि पैसे को चुनना ही हो तो उसे व्यसन (बुरी आदतों) पर वरीयता देना, भले लोग तुम्हें कंजूस, खूसठ, खड़ूस या जो कुछ भी क्यों न कहें क्योंकि जिस दौर में मैं जी रहा हूँ वहीं विलासिता और भोगवादी संस्कृति अपने चरम पर है तुम्हारे वक्त तो जाने कौन-सा परिदृश्य होगा; अंदाजा लगाना मुमकिन नहीं... ऐसे में खुद का वजूद उन हरकतों से बचाना बेहद जरुरी है इसलिये पैसा भले खूब हो तुम्हारे पास, लेकिन उसका प्रयोग उस विलासिता में न हो ये आरजू मेरी हमेशा रहेगी। असल मे तो तुम्हारे संस्कार ही तुम्हारी वास्तविक पूंजी है........और हाँ यदि चंद वक्त की बुरी आदत और बुरी संगति में से किसी एक को चुनना पड़ ही जाये तो चंद वक्त की बुरी आदत के फेर में पड़ जाना पर बुरी संगति से तौबा ही करना। यदि ये चयन सिद्धांत अपना सके...तो भरोसा रखना तुम कभी कुछ गलत नहीं चुनोगे।

संबंधों को वस्तुओं की तुलना में अधिक महत्व देना क्योंकि इस दुनिया में लोग अपनी-अपनी मशरुफियत और स्वार्थ में अंधे हो एक निर्जन टापू की तरह हो गये हैं। संबंध, स्वार्थों की भट्टी में तप रहे हैं और उसमें ही पक रहे हैं। मैं चाहूँगा कि तुम्हारे लिये इंसान किसी भी दूसरी निर्जीव या अटकलपच्चू विचार की तुलना में ज्यादा महत्वपूर्ण रहें। जिस देश में तुम जन्मे हो वहां की विविधता तुम्हें कन्फ्यूज भी करेगी और हैरान भी लेकिन अपने पूर्वाग्रहों में इतने अंधे मत हो जाना कि तुम्हारे विचारों से विपरीत सोच रखने वाला व्यक्ति तुम्हारी नफरत का नुमाइंदा बन जाये। प्रेम बड़ी कठिन चीज़ है और यदि करने का मिजाज़ आ गया तो बड़ी आसान भी.... मैं नहीं मानता कि दुनिया में शायद ही कोई ऐसा काम हो जो प्रेम से न हो सके और हमें नफरत की जरूरत पड़े। विश्वास करना और विश्वास जीतना दोनों ही सीखना... विश्वास की भी दुनिया को बहुत जरुरत है।

तुम अपने जीवन में बहुत शोहरत न कमा सको तो इसका कोई मलाल मत रखना... थोड़े ही सही पर उन चंद लोगों के बीच प्रतिष्ठित होना ज्यादा बड़ी बात है। महत्वपूर्ण यह नहीं कि कितने लोग तुम्हें जानते हैं महत्वपूर्ण ये है कि कितने लोग तुम्हें वास्तव में चाहते हैं। लोगों का प्रेम पाना... प्रेम देने से भी कठिन है यदि पा गये तो समझो जी गये। अपने जीते जी ज़ेहन में ये बात भी ज़िंदा रखना जरुरी है कि हम बहुत थोड़े समय के लिये अपने इस रूप में दुनिया में है हम इसे अपने योगदान से बहुत बेहतर भले न बना पायें लेकिन यदि हमारे अदने से प्रयास इसे बद्तर होने से बचा लें तो ये भी कम नहीं है। त्याग और समर्पण भी बड़े दुर्लभ गुण हैं यदि ये हममें है तो कुदरत ने हमें इंसान बनाके ग़लत नहीं किया। 

कुछ बातें तुमसे उन चीज़ों के बारे में भी करना है जो चीज़ें खुद अपने बारे में कुछ जुवां से अभिव्यक्त नहीं करतीं। ये धरती संसाधनों से भरी पड़ी है यदि हम उनका सदुपयोग कर सकें तो। संसाधन तब ही कम होते हैं जब हम उन्हें हड़पने या उनके दुरुपयोग की मंशा रखते हैं। पृकृति की उन चीज़ों के प्रति भी संवेदनशील रहना जो अपने प्रति संवेदना की भीख, कहकर नहीं मांगतीं। ये नदियां, ये जंगल, ये हवा, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी आदि सब हमारे जीवन से अंतर्संबंध रखने वाले हैं, हमारा परिवार ही हैं इनके प्रति भी संवेदनशील होना बहुत जरुरी है। इस संवेदना में सर्वगुण समाहित हो जाते हैं। दुनिया में सच्चा मूल्य उन्हीं चीज़ों का है, जिन पर कोई प्राइस टैग नहीं लगा है।

यूं तो बहुत कुछ है जो कहा जाये... ऊपर कही बातों में से अधिकांश तुम्हें सैद्धांतिक ही लग रही होंगी। दुनिया के लिये ये सैद्धांतिक बनी हुई हैं इसलिये जगत में सकारात्मक बदलाव देखने को कम ही मिल पाते हैं ये सैद्धांतिक बातें प्रयोग के धरातल पर जितनी-जितनी साकार होती जायेंगी उतना बदलाव और आनंद तुम्हें महसूस होगा। मानव संभावनाओं का आकाश है तो दायरों का सेतूबंध भी है। संभाव्य को संभव बनाने की कोशिश करना, किंतु सफल न होने पर हताश मत होना क्योंकि उस पल से आगे जहाँ और भी हैं और वो समय, वो दिन विशेष बुरा हो सकता है किंतु पूरा जीवन कभी अर्थहीन नहीं होता। 

रोना, परेशान होना, झुकना, रुकना पर थम ही मत जाना.... बुरे को भुलाके आगे बढ़ना और अच्छा पाके आत्ममुग्धता या गुरुर में गाफिल मत हो जाना। यदि इस दुनिया में कुछ निश्चित है तो वो है परिवर्तन, बाकी और सब 'बस कुछ समय' का ही है। बहुत कुछ खोजना, बहुत कुछ जानना लेकिन सब कुछ खोजने और जानने से ज्यादा जरुरी है आत्म-अनुसंधान। खुद के इस भौतिक परिचय से दूर वास्तविक परिचय की खोज। यदि अपनी उपलब्ध प्रज्ञा से उस छुपी प्रज्ञा को पा गये तो पाने को कुछ बाकी न रहेगा और फिर दुनिया की तुच्छ चीज़ें खुद ब खुद तुम्हारी नज़र में अपना मूल्य खो देंगी। तुम ऐसा कुछ कर सको तो यकीनन मुझे खुशी होगी... लेकिन मेरे कहे रास्तों से परे अपनी असल मंजिल को पाने के रास्ते भी कई हैं और उन रास्तों को तुम्हें खुद इज़ाद करना होगा। संघर्ष बहुत है... लेकिन अपने हौसले को ये मत बताना कि संघर्ष कितना बड़ा है बल्कि अपने संघर्ष को ये बताना कि तुम्हारा हौसला कितना बड़ा है। 

इतना सब कहकर भी जज़्बात का कतरा ही बयाँ हुआ है पर जितना कहा, तुम उसमें छुपे मर्म को ठीक से समझ सको और खुद एक बेहतर इंसान बनो, बस यही छोटी सी ख़्वाहिश है। 

असीम आशीषों के साथ........ 

Saturday, March 24, 2018

शिक्षक और शिक्षण को आदरांजलि : हिचकी

यादों का हिरण जब कभी अतीत के गलियारों में उछलकूद करता है और गुजरता है अपने बचपन के मनोरम पड़ावों के ईर्द-गिर्द तो उसे गाहे-बगाहे, उस पड़ाव पर कहीं-कोई कुछ खास, एक अदद सा अध्यापक भी खड़ा नजर आता है। ज़िंदगी में पहली मर्तबा मोहब्बत भी शायद हमें हमारे टीचर से ही होती है। लड़का हो तो कोई महिला अध्यापिका और लड़की हो तो कोई पुरुष टीचर...दिल में एक ऐसी जगह बना लेता है जिसे आसमां की ऊंचाई पर ले जाकर पूजने को मन करता है। दिल करता है तनाव के भंवर में उसके कांधे पर सिर रख रोया जाये.. भ्रम के हालातों में अपनी उस भ्रमणा का समाधान तलाशा जाये। "सबका कोई न कोई एक फेवरेट टीचर ज़रूर होता है लेकिन क्या आपको उसकी उस वक्त की सैलरी पता है?"

कुछ ऐसे ही सुर से उठी और इस सुर को और भी सुरीला बनाती, हिन्दी सिनेमा की बेहतरीन फिल्म है हिचकी। तारे ज़मीं पर, इम्तिहान, किताब, जागृति, ब्लैक, हिन्दी मीडियम जैसी फिल्मों के बाद शिक्षक और शिक्षण को एक और आदरांजलि प्रस्तुत करती निर्देशक सिद्धार्थ मल्होत्रा और अभिनेत्री रानी मुखर्जी की ये फिल्म अध्यापक के मायनों को तमाम भौतिक उपलभ्य से परे ले जाती है। भारतीय संस्कृति, साहित्य और समाज गुरु के महात्मय को सदियों से बयां करता चला आ रहा है... सिनेमा ने उस सुर को मौजूदार दौर के मुताबिक तनिक बदले कलेवर के साथ प्रस्तुत किया है लेकिन उसका मूल भाव अब भी वही है। हिन्दी सिनेमा में अध्यापकों के बदलते प्रतिमान पर पहले इसी ब्लॉग पर एक अन्य लेख लिख चुका हूँ।

ये फिल्म अमेरिकन मोटिवेशनल स्पीकर और टीचर ब्रैड कोहेन के जीवन से प्रेरित है जो खुद टॉरेट सिंड्रोम नामक बीमारी के चलते तमाम परेशानियां झेलकर भी कामयाब टीचर बने। उन्होंने अपनी लाइफ पर एक किताब लिखी, जिस पर 2008 में फ्रंट ऑफ द क्लास नाम से अमेरिकन फिल्म भी आई। 'हिचकी' फिल्म कुछ कुछ इसी का  हिन्दी रुपांतरण है लेकिन फिल्म में मौजूद भारतीयता इसकी अपनी मौलिक है जो कि हिन्दी सिनेमा की आत्मा को संजोये हुए है। 

रानी मुखर्जी के जीवंत अभिनय ने इसे सिनेमाई अर्काइव में सहेजकर रखा जाने वाला और गौरव से प्रस्तुत किया जाने वाला दस्तावेज बना दिया है। 'मर्दानी' फिल्म के तकरीबन चार साल बाद सिल्वर स्क्रीन पर वापसी करने वाली रानी के लिये इससे अच्छी कहानी नहीं हो सकती थी और इन्होंने इसके जरिये बताया भी है कि बेहतर अभिनय का कोई विकल्प नहीं हो सकता। अपने दौर की शिखर सितारा रहीं रानी मुखर्जी...एकल महिला सितारा होने के बावजूद अपने दम पर फिल्म खींचकर ऑलटाइम हिट श्रीदेवी की याद दिलाती हैं जिन्होंने इंग्लिश-विंग्लिश और मॉम जैसी महिला-केन्द्रित फिल्मों से सफल वापसी कर खुद की प्रतिभा एक बार फिर साबित की थी। 

"हिचकी" नाकामयाबियों और नैसर्गिक कमियों को मूँह चिढ़ाता नायाब सृजन है। ये मेहनत, जिजीविषा और दृढ इच्छाशक्ति का मधुरम राग है जो दर्जनों बार गिरने के बाद भी फिर दोगुने उत्साह से खड़े होने का संबल देता है। जो बताती है कि नाकामयाबियों का चरम पर होना, कामयाबी के करीब होने का इशारा है और उस कामयाबी के दरबाजे पर "बस एक और" दस्तक की दरकार है। ये "क्यों और क्यों नहीं" के फर्क को बयां करता बिगुल है जो नाउम्मीदी के अरण्य में घिरे व्यक्ति को उसके गंतव्य की ओर बुला रहा है। "हिचकी" का कथ्य वो ध्रुुव तारा है जो अवसाद की अंधियारी निशा में घिरे पथिक को दिशा देता है।

ये सिनेमा की उन अनुपम कृतियों में से एक है जिन्हें देखा नहीं जाता बल्कि जो नैनों की जुवां से प्रविष्ट हो जेहन रूपी उदर की भूख को तृप्त करती है और फिर अहसासों की सरगर्मी कुछ ऐसी चढ़ती है जो अपनी अभिव्यक्ति में कई मर्तबा आंखों को भी गीला कर देती है। फिल्म के कई दृश्य भावनाओं का ऐसा ही ज्वार लेकर आते हैं जो कपोलों पर नजर आता है। हम अपनी भावुकता छुपाने के लिये बगल में बैठे शख्स को भी मुड़कर नहीं देखते और बगल में बैठा व्यक्ति भी इसी मनोभाव से दो चार हो रहा होता है।

"हिचकी" में नैना माथुुर (रानी मुखर्जी) का प्रिंसिपल के पद से रिटायर होकर वापस जाने वाला दृश्य व्यक्तिगत तौर पर मुझे काफी भावुक करता है क्योंकि इस नाचीज़ को भी अपने अध्यापन करियर छोड़ने के बादछात्रों द्वारा मिली भावभीनी विदाई स्मृतिपटल पर उभर आती है। संयोग से अब से चार वर्ष पहले, मार्च माह की यही कुछ तारीख रहीं होंगी जब ज़रुरतों की मृगतृष्णा में घायल हो और धन के आभामंडल में मुग्ध हो मैंने अपने पसंदीदा करियर को तिलांजलि दी थी। दुनिया की नजर में शायद में पहले से कुछ अच्छा कर गया हूँ लेकिन वो अफसोस हर पल नासूर बनकर कचोटता है।

बहरहाल, फिल्म का उपसंहारात्मक बोल अध्यापन के क्षेत्र में फैली विसंगति को आईना दिखाता है जब नैना माथुर का प्रतिस्पर्धी रहा अध्यापक अपनी गलती का अहसास होने पर कहता है कि दुनिया का कोई स्टूडेंट बुरा नहीं होता, अध्यापक ही अच्छे या बुरे होते हैं और वास्तव में जो मानवीय तौर पर बुरे होते हैं वे अध्यापक ही नहीं होते। चलते चलते अपने विद्यार्थियों द्वारा दी गई विदाई के वीडियो (नीचे यूट्यूब लिंक पर मौजूद) को याद कर इस फिल्म को जरुर देखने की अनुशंसा करता हुआ विराम लेता हूँ।


इत्यलम्।

Saturday, February 17, 2018

बड़े-बड़े विमर्शों के बीच उपेक्षित होती छोटी-छोटी बातों का दस्तावेज : पैडमैन

*लेख की शुरुआत में सबसे पहले उन तमाम ब्लॉगर साथियों और इस ब्लॉग के चहेते पाठक रहे मित्रों से माफी... उन तमाम वजहों के लिये जिनके कारण मैं अपने पसंदीदा काम ब्लॉगिंग में निष्क्रिय सा हो गया हूँ। यकीनन कुछ व्यस्तताएं रहीं, कुछ बाधाएं भी रहीं लेकिन इन सबसे ज्यादा मेरी स्वयं की अपनी बदलती रुचि, आलस्य और समय प्रबंधन करने के गुर का अभाव होना ही इस निष्क्रियता का अहम् कारण है। बहरहाल तकरीबन पौने दोे साल बाद कोई फिल्म समीक्षा लिख रहा हूँ। नज़रे इनायत कीजिये-

बेहद नवाचारी, होनहार निर्देशक आर. बाल्की निर्देशित और अक्षय कुमार अभिनीत 'पैडमैन' बॉक्स ऑफिस पर धूम मचा रही है। मसलन, इसकी सफलता महज बॉक्स ऑफिसी धनबरसाऊ कामयाबी नहीं है बल्कि ये वो सिनेमाई दस्तावेज है जिसकी नज़ीरें सिनेमा के विद्यार्थियों को आने वाले वक़्त में भी दी जायेंगी। आर बाल्की की पिछली फिल्मों की तरह इस फिल्म का विषय भी बेहद संजीदा और समाज में एक विमर्श खड़ा करने वाला है लेकिन उनकी पिछली फिल्मों 'शमिताभ' और 'की एंड का' की तरह ये फिल्म अपने कथ्य के प्रवाह में लड़खड़ाती नहीं है। बल्कि जितनी ईमानदारी से ये विषय चुना और गढ़ा गया है उतनी ही खूबसूरती से परदे पर प्रस्तुत भी हुआ है।

बाल्की के प्रॉडक्शन हाउस के विषय कुछ ऐसे रहे हैं जिनके बारे में यदि हम पहले सुनलें तो ये कयास लगाना मुश्किल है कि इस पर भी कोई ढाई-तीन घंटे की मनोरंजक, प्रभावी फिल्म बन सकती है लेकिन जब हम इन्हें देखते हैं तो लगता है कि ये छोटा सा उपेक्षित विषय कितना कुछ कहने की दरकार रखता था। चीनी-कम, इंग्लिश-विंग्लिश, पा, की एं का ऐसी ही फिल्मों की मिसाल है लेकिन पैडमैन इस कड़ी का अद्भुत नगीना है जिसकी चमक अक्षय कुमार, सोनम कपूर और राधिका आप्टे की अदाकारी, स्वानंद किरकिरे-आर बाल्की के संवाद और अमित त्रिवेदी के संगीत ने कई गुना बढ़ा दी है। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर फिल्म की नसों में रक्त बनकर तैरता है जो उस समय भी ज़ेहन में हिलोरें पैदा करता है जब परदे पर कोई डॉयलॉग नहीं होता। 

जिस दौर में हम रह रहे हैं वहां आये दिन बड़ी-बड़ी शोध संगोष्ठियां, दार्शनिक विमर्श, कार्यशालाएं, वैश्विक सम्मेलन और न जाने क्या-क्या हो रहा है...लेकिन इन बड़े बड़े विमर्शों के बीच रोजमर्रा की अदनी सी चीज़ें हमारी आम दिनचर्या में चर्चा का विषय नहीं बन सकी हैं। हाँ, इन पर बड़े सम्मेलनों में चर्चा जरूर होती है लेकिन ये हमारे पारिवारिक-सामाजिक वार्तालाप में अब भी सम्मिलित न हो सकें है। औरतों का मासिक धर्म और उन दिनों में सैनिटरी पैड्स का प्रयोग आधी आबादी की मूलभूत जरूरत है। लेकिन इस बारे में बात करने में झिझक, शर्म, रुढ़िवादी मान्यताएं कई उन विसंगतियों को आमंत्रित करती हैं जो महिलाओं के लिये अत्यंत कष्टकारी और कई बार जानलेवा भी बन पड़ती हैं। 

हर घर में, हर व्यक्ति, हर महीने अपने आसपास रह रहीं माँ-बहन-बेटी या पत्नी के जीवन में ये दौर देखते हैं। लेकिन कभी 'अमुक महिला को खाना नहीं बनाना', 'वो छुट्टी से हैं' या कुछ खिलंदड़ लोगों द्वारा टपांच दिन का टेस्ट मैचट जैसे शब्दों से इसकी असल सच्चाई और मुश्किल को ही उभरकर सामने नहीं आने देते। जब हम पीरियड्स का नाम लेने में ही इतने संकोची हैं तो इस पर बात क्या खाक कर सकेंगे। मेडिकल स्टोर पर कागज में लपेटकर पैड्स का दिया जाना, घर में प्रयोग किये जा चुके पैड्स को ठिकाने लगाने की मुश्किलें, किसी दूसरे कपड़े के नीचे अंडरगारमेंट्स या फ्रैश पेड्स छुपा कर रखना ये तमाम वे चीजें हैं जो इन विषयों पर कभी चर्चा ही न होने देंगी। और उचित जानकारी एवं समझ के अभाव में जो आधी अधूरी जानकारी से महिलाएं कदम उठायेंगी वो उनके लिये कई नई मुश्किलों को आमंत्रण देने वाली साबित होंगी। फिल्म में एक आंकड़ा पेश किया है कि देश में इस समय महज 12 से 15 प्रतिशत महिलाएं ही सैनेटरी पेैड्स का इस्तेमाल करती हैं तो आप खुद सोच सकते हैं कि देश की पिच्यासी फीसदी महिलाओं को हम किस दिशा में धकेल रहे हैं। इन वजहों से न जाने कितनी औरतें बांझ हो जाती हैं, कितनी असाध्य गुप्त रोगों के चंगुल में फंस जाती हैं और कई संक्रमण के कारण मर भी जाती हैं। जिसमें ग्रामीण भारत की स्थिति तो बेहद भयावह है। ऐसे अति आवश्यक विषय पर मौन रखते हुए हम महिलासशक्तिकरण या सशक्त भारत का सपना संजो रहे हैं। फिल्म में अक्षय का एक डॉयलॉग है- "बिग मैन, स्ट्रांग मैन नॉट मेकिंग कंट्री स्ट्रांग...वूमेन स्ट्रांग, मदर स्ट्रांग, सिस्टर स्ट्रांग देन कंट्री स्ट्रांग।

इस बदलाव के रास्ते में पुरुषों से ज्यादा समाज की रुढ़िवादी सोच में जकड़ी कई महिलाएं ही जिम्मेदार हैं जिन महिलाओं पर इस पितृसत्तात्मक समाज ने अनेक रिवाजों के बंधन थोप संस्कृति का संरक्षक होने का जिम्मा सौंप रखा है। कहने को बहू-बेटी एक समान है, कहने को घर का बेटा-बेटी समान है लेकिन इन रिश्तों के दरमियां पसरी हुई असमानता आसानी से महसूस की जा सकती है, यदि हम महसूस करना चाहें तो। लज्जा, औरत का गहना है, व्रतपरायणता, स्वामिधर्मिता, संस्कृति प्रसारिका जैसे न जाने कितने विशेषण लादकर हम उसे दबाये रखना चाहते हैं लेकिन इस संस्कृति-सभ्यता की दुहाई में हम उसकी नैसर्गिक उड़ान और चाहतों का ही गला घोंट रहे हैं... क्योंकि हम जानते हैं कि औरत अपनी क्षमता के साथ यदि बाहर आये तो इस पितृसत्तात्मक समाज की हवाई उड़ जायें। हम जानते हैं कि प्राकृतिक तौर पर औरत...एक पुरुष से ज्यादा सशक्त है। ऐसे में कैसे हम उसकी उड़ान को पंख दे सकते हैं। ध्यान रहे मैं यहां महिलासशक्तिकरण की शह लेते हुए स्त्री की उन आदतों या प्रदर्शन की पैरवी नहीं कर रहा हूँ जो एक पुरुष को भी शोभा नहीं देते। 

दायरे यदि स्त्री के लिये हैं तो पुरुष के लिये भी हैं लेकिन पुरुष की सोच में बदलाव के लिये तो कोई उपक्रम नहीं, पुरुष को संस्कृति-सभ्यता, धर्म-समाज, जात-बिरादरी का कोई लिहाज नहीं  इसलिये मर्यादा के नाम पर हर बेड़ी औरत के पैरों में ही बांध देना कोई न्याय नहीं है। हम नहीं जानते कि हमने इस दोहरी सोच के चलते खुद को विकास की राह में कितना पीछे कर लिया है। हम उन चीज़ों में ही उलझे पड़े हैं जिनसे हमें उस आदिम युग में ही बाहर निकल जाना था जब हमने पत्ते या जानवर की खाल, लिबास के तौर पर पहनना छोड़ा था। 

कालीन के नीचे धूल खा रहे इन तमाम विषयों पर से फिल्म ने रुढ़िवाद की धूल झाड़ने की कोशिश की है। अक्षय की अदाकारी और फिल्म का स्क्रीनप्ले इतना कमाल है कि दर्शक भी इस सिनेमाई कथ्य के प्रवाह में बहता नजर आता है। तमिलनाड़ू के अरुणाचलम् मुरुगुंथम के जीवन से प्रेरित फिल्म "पैडमैन" के लक्ष्मी के जरिये मुरुगुंथम के संघर्ष को भी समझा जा सकता है। वास्तव में ऐसे लोगों की ज़िद ही है जिसने समाज को नित नये नवोन्मेषों से समृद्ध बनाया है और ऐसी अधिकांश ज़िद की मूल वजह प्रेम ही रहा है। फिर चाहे वो पहाड़ तोड़ने वाले दशरथ मांझी हों या समाज में बहिष्कृत करार दिये गये 'पैड्स' के निर्माता मुरुगुंथम। फिल्म में एक संवाद कुछ इसी तरह है कि 'तुम्हारी फिक्र ने इस जिद को पैदा किया, अब जिद इस कदर बढ़ गई कि फिक्र ही कहीं खो गई'। ये जिद ही आविष्कारी लोगों को पागल बना देती है और फिल्म के अंत में अक्षय कहते भी हैं कि "यू थिंक आई मैड, बट मैड ऑनली बिकमिंग फैमस"। फिल्म के आखिर में अक्षय का टूटी फूटी अंग्रेजी में बोला गया गया संवाद..फिल्म का सार है और हिन्दी सिनेमा के कई अद्भुत क्लाईमैक्स दृश्यों में से एक बन पड़ा है।

ओवरऑल ये फिल्म एक कंप्लीट इंटरटैनिंग पैकेज है। जिसने समाज को जागरुक करने वाले सिनेमा के उस उद्देश्य को भी पूरा किया है जिसका जिक्र भारतीय सिनेमा के पितामह दादासाहेब फाल्के किया करते थे। लोंग-इलायची की तरह फिल्म में मौजूद अन्य चरित्र अभिनेताओं की अदाकारी भी कमाल है। अक्षय की फिल्म देख उनके उस कथन के मायने भी समझ आते हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पे कितना कमाती है ये मायने नहीं रखता, बस जिस उद्देश्य के लिये ये फिल्म बनी है वो पूरा हो जाये। अक्षय का इस व्यवसायिक सफलता के प्रति निर्मोही रवैया हमें तभी समझ आ गया था जब उन्होंने गणतंत्र दिवस की छुट्टीयों वाले वीकेंड से अपनी फिल्म को 'पद्मावत' के लिये सहर्ष हटाने को मंजूर कर लिया था। कुछ सालों पहले मैं कहा करता था कि अक्षय की पोटली में अरबी क्लब (100 करोड़ कमाई वाली) फिल्में भले बहुत हैं लेकिन उनके पास एक भी अदद महान् फिल्म नहीं है। लेकिन बीते सालों में एयरलिफ्ट, रुस्तम, टॉयलेट-एक प्रेम कथा और अब पैडमैन ने इस मिथक को तोड़ दिया है। उनकी आने वाली फिल्म "गोल्ड" की पहली झलक भी उम्मीद जगाती है।

खैर, उम्र के इस पड़ाव पर "मिंटिंग मनी" के व्यामोह से बाहर निकल देश-समाज के लिये कुछ खास करने और जीवन के असल अर्थ तलाशने के प्रति ही इंसान को उन्मुख होना चाहिये। सिनेमाई माध्यम से अक्षय शायद यहीं कर रहे हैं। हम बड़े फलक़ पर न सहीं, अपने आसपास तो एक सकारात्मक बदलाव ला ही सकते हैं।