रानी मुखर्जी का जीवंत और आत्मीय अभिनय 'हिचकी' को उन चुनिंदा फिल्मों की श्रेणी में खड़ा कर देता है जिन्हें केवल देखा नहीं जाता, बल्कि लंबे समय तक महसूस किया जाता है। मर्दानी के लगभग चार वर्ष बाद बड़े पर्दे पर लौटी रानी के लिए इससे बेहतर वापसी शायद संभव नहीं थी। उन्होंने एक बार फिर सिद्ध किया कि उत्कृष्ट अभिनय का कोई विकल्प नहीं होता। अपने दौर की शीर्ष अभिनेत्रियों में शुमार रानी, एकल महिला सितारा होते हुए भी पूरी फिल्म को अपने कंधों पर सहजता से लेकर चलती हैं और कहीं न कहीं श्रीदेवी की याद ताजा कर देती हैं, जिन्होंने English Vinglish और Mom जैसी महिला-केंद्रित फिल्मों से अपनी अद्भुत वापसी दर्ज कराई थी।
'हिचकी' दरअसल नाकामयाबियों और जन्मजात सीमाओं को चुनौती देने वाली एक विलक्षण सिनेमाई कृति है। यह मेहनत, जिजीविषा और अटूट इच्छाशक्ति का ऐसा मधुर राग है जो बार-बार गिरने के बाद भी फिर से उठ खड़े होने का साहस देता है। यह सिखाती है कि कई बार असफलताओं का चरम, सफलता के सबसे निकट होने का संकेत होता है और उस दरवाजे को खोलने के लिए बस "एक और" दस्तक की जरूरत होती है। यह फिल्म "क्यों?" और "क्यों नहीं?" के बीच का अंतर समझाती है तथा निराशा के अंधकार में भटक रहे व्यक्ति के लिए ध्रुवतारे की तरह दिशा दिखाती है।
यह उन दुर्लभ फिल्मों में शामिल है जिन्हें आंखें केवल देखती नहीं, बल्कि आत्मा महसूस करती है। हर दृश्य मन की गहराइयों में उतरता चला जाता है और भावनाओं का ऐसा ज्वार पैदा करता है कि कई बार आंखें अनायास ही नम हो उठती हैं। दिलचस्प यह है कि उस क्षण हम अपनी भावुकता छिपाने के लिए बगल में बैठे व्यक्ति की ओर भी नहीं देखते, जबकि संभव है कि वह भी ठीक उसी भावावेश से गुजर रहा हो।
फिल्म में नैना माथुर (रानी मुखर्जी) के प्रिंसिपल पद से सेवानिवृत्त होकर विद्यालय से विदा लेने वाला दृश्य मुझे व्यक्तिगत रूप से सबसे अधिक भावुक करता है। उस पल अनायास ही अपने अध्यापन जीवन की स्मृतियां ताजा हो जाती हैं। विद्यार्थियों द्वारा दी गई वह आत्मीय विदाई आज भी स्मृतिपटल पर वैसी ही अंकित है। संयोग देखिए कि लगभग चार वर्ष पहले मार्च माह के इन्हीं दिनों, जीवन की व्यावहारिक आवश्यकताओं और बेहतर आर्थिक संभावनाओं के आकर्षण में मैंने अपने सबसे प्रिय अध्यापन-करियर को अलविदा कह दिया था। दुनिया की नजर में शायद मैंने आगे बढ़कर कुछ बेहतर हासिल किया हो, लेकिन उस निर्णय का एक मौन अफसोस आज भी मन के किसी कोने में जीवित है।
फिल्म का अंतिम संवाद शिक्षा व्यवस्था पर गहरी टिप्पणी करता है। नैना माथुर का प्रतिद्वंद्वी रहा शिक्षक अंततः स्वीकार करता है कि "दुनिया में कोई विद्यार्थी बुरा नहीं होता, अच्छे या बुरे शिक्षक होते हैं। और जो मानवीय दृष्टि से अच्छे नहीं हैं, वे वास्तव में शिक्षक कहलाने के योग्य भी नहीं हैं।" शायद यही संवाद पूरी फिल्म का सबसे बड़ा संदेश भी है।
चलते-चलते, अपने विद्यार्थियों द्वारा दी गई विदाई के उस वीडियो (जिसका यूट्यूब लिंक नीचे संलग्न है) को याद करते हुए मैं पूरे मन से 'हिचकी' देखने की अनुशंसा करता हूँ। यदि आपने अब तक यह फिल्म नहीं देखी है, तो इसे केवल एक फिल्म समझकर नहीं, बल्कि जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण को थोड़ा और विस्तृत करने के लिए अवश्य देखिए।
https://www.youtube.com/watch?v=ePhjjpGSpSs
इत्यलम्।
