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Monday, April 15, 2019

मेरी प्रथम पच्चीसी : पंद्रहवीं किस्त

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(*जीवन की पहली पच्चीसी बयां करने के क्रम में आने वाली 31 जुलाई को ज़िंदगी के 31 बसंत पूरे कर लूंगा। वर्ष 2013 में 31 जुलाई को ही स्वांतसुखाय शुरु की गई जीवन की इस श्रंख्ला को करीब छह वर्ष का वक्त गुज़र गया...पर पच्चीसी का ये सफ़र अब भी जारी है। शुरुआत में सोचा नहीं था कि इतना वक्त लग जायेगा और इन बीते वर्षों में हुए कई तरह के अच्छे-बुरे बदलावों के साथ ज़ेहनी ऊहापोह ने इसे इतने लंबे वक्त तक खींच दिया...कुछ मेरा ही आलस, तो कुछ व्यस्तताओं से श्रृंख्ला लंबे समय अवरुद्ध रही। खैर, आगे बढ़ते हैं उम्मीद है पच्चीसी जल्द अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंचेगी)

गतांक से आगे....

मास्टर डिग्री ख़त्म होने के बाद अब दिलोदिमाग की निगाहें एक अदद नौकरी की तलाश कर रही थी...साथ पढ़ाई करने वाले दोस्त-यारों में से कई आजीविका से लग गये थे और ज़िंदगी के अगले पड़ाव में प्रविष्ट हो गये थे तो कई दोस्त मेरी ही तरह बीच भंवर में फंसे थे और बस तब यही दोस्त सहानुभूति और गम का सहारा हुआ करते थे। एक-दूसरे से मिल, बात कर हम आपस में एक दूसरे का संबल बनने की निरर्थक कोशिश करते थे। ये ऐसा दौर होता है जब दीन न होने के बावजूद हम स्वयं को सबसे ज्यादा दीन-हीन महसूस करते हैं। मसलन, एक चाय के लिये पैसे देने पर भी ऐसा महसूस होता था कि हम मानो बाप के पैसे में ऐश कर रहे हों, जो कि एक नैतिक, चारित्रवंत पुत्र को निश्चित ही आत्मग्लानि से भरने के लिये काफी होता है। घर-परिवार के लोग उम्मीद संजोये ये सोचा करते हैं कि बेटा उज्जवल भविष्य की नई इबारत गढ़ रहा है लेकिन उनसे दूर कुछ खुद की जरुरतें और कुछ विलासिता में होने वाले खर्चे ज़ेहन को तोड़े डाल रहे थे। बेसब्री का दौर भी होता है ये, जब हम तुरत-फुरत में ही किसी बड़े पद, मोटी तनख्वाह और सामाजिक प्रतिष्ठा को झट से पाने का ख्वाब पाल लेते हैं लेकिन ये तमाम चीज़ें मिलने में वक़्त लगता है, ये वक़्त गुजरने के बाद ही पता लगता है।

बहरहाल, कुछ छुट-मुट कोशिशों के बाद भी नौकरी न लगी तो अचानक आगे की पढ़ाई करने का प्रस्ताव हाथ लगा.. जब कुछ करने को न था तो सोचा पढ़ ही लिया जाये। और ये बंदा अपने एक अदद दोस्त को साथ लिये पहुंच गया मध्यप्रदेश की व्यवसायिक राजधानी इंदौर, जहाँ देवी अहिल्याबाई विश्वविद्यालय से जनसंचार में एम.फिल करने की ठानी। यहाँ एक औपचारिक इंट्रेंस टेस्ट दिया और हो गया एडमिशन। ये फैसला बाइ च्वाइस नहीं, बल्कि बाइ चांस लेना पड़ा लेकिन मैं अपने संगी साथियों में यही बताता था कि ये मेरी पसंद का फैसला है और हेकड़ी बघारते हुए कहता कि नौकरी करने के लिये तो ज़िंदगी पड़ी है पर पढ़ाई करने का वक़्त दोबारा लौटकर नहीं आ सकता। ये बात प्रथम दृष्टया भली जान पड़ती है लेकिन मैं इसे सिर्फ खुद को विशेष बताने के लिये प्रयोग करता क्युंकि असल में तो मैं एक उच्छिष्ट भोगी था जिसने नौकरी न मिल सकने पर पढ़ने का मजबूरी वश मन बनाया था।

इंदौर में जिस वर्ष (2009) एमफिल शुरु की उस वर्ष समूचे मध्यप्रदेश के विश्वविद्यालयों में प्राध्यापकों की हड़ताल का दौर था लिहाजा प्रथम सत्र के शुरुआती तीन महीने कोई अकादमिक डेवलमेंट नहीं हुआ। इन तीन महीनों में न तो अगले सफर पर ही मैंने कुछ कदम बढ़ाये थे और न ही पिछला पड़ाव ही ज़ेहन से छूटने का नाम ले रहा था तो बड़ी त्रिशंकु जैसी हालत थी। ऐसे में जवानी के जुनून, महत्वाकांक्षाओं का सैलाब और फैसलों में नियमित तौर पर वर्तने वाले कन्फ्युसिंग रवैये के चलते दिल बड़ा बेचैन रहा करता। आज जब उस उम्र के कुछ युवाओं से मिलता हूूूँ तो उन्हें भी ऐसे ही परेशान होते देखता हूँ। अपने अनुभव से उन्हें कुछ समझाना भी चाहता हूँ लेकिन ये जानता हूँ कि किसी के समझाने से इस दौर की ऊहापोह दूर नहीं होती, बल्कि भविष्य में गुजरते वक्त, होती गलतियों और बढ़ते अनुभवों से ही ये सब समझ में आता है।

इंदौर में क्लासेस जब शुरु हुईं तो उन्हें रस्मी तौर पर अटेंड करता लेकिन किसी से दिली जुड़ान न हो पा रहा था क्युंकि पुराने दरख़्तों से दिल अब भी चिपटा हुआ था। इस वक़्त में कुछ सुकून था तो वो अपने पुराने कुछ दोस्तों से आये दिन फोन पर होने वाली अतीत की जुगाली ही थी और इसी खालीपन के दौर में पल्लवित हो रही प्रेम की कोंपल भी एक और खुशी का जरिया रही। वहीं अपने फ्लैट पर साथी बने तीन अन्य रूममेट्स के साथ होने वाली तफरी और विचारों का विरेचन नये रिश्ते गढ़ रहा था इन तीन साथियों में से दो मेरे जयपुर में अध्ययन के दौरान के सीनियर थे जिनसे पहचान तो थी पर उस वक्त ये रिश्ता और गहरा बना।

वक़्त अपनी रफ़्तार से गुजर रहा था एमफिल का प्रथम सत्र भी गुजरा। चुंकि दूसरे सत्र में सिर्फ डिजर्टेशन बनाने की जिम्मेदारी थी तो नियमित कॉलेज जाने की कोई बाध्यता नहीं थी इसलिये अब वापस अपने ज़ेहनी रिश्ते वाले शहर भोपाल लौट आया था और यदा-कदा ही इंदौर जाना होता। इस खाली वक़्त में कुछ किताबें पढ़ने, लिखने और अपने चंद दोस्तों के बीच थोड़ा-बहुत ज्ञान पेलने के अलावा कोई खास काम नहीं था। इस वक़्त में एक बार फिर नौकरी के लिये हाथ-पैर मारे पर 6-7 हजार मासिक वेतन वाली नौकरियों तक में कहीं सिलेक्शन न हो सका। इस हताशा के वक़्त में हम अपने आसपास कुछ फ़जूल के ख़याली किले बना लेते हैं तब न हम किसी से मिलना चाहते हैं, न किसी जगह जाना चाहते हैं बस अपने ही सेफ ज़ोन में रहते हुुए खुद की घुटन को महसूस करते हैं क्युंकि महफिल़ों में अक्सर पूछा जाने वाला सवाल- "और क्या चल रहा है?" इसका हमारे पास कोई अदद जवाब नहीं होता। और हम तन्हाईंयों से ही अपना वास्ता जोड़े रखने में खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं। इस तरह अमूमन 2010 का पूरा वर्ष, यूं ही 'बिना कुछ अच्छा या बिना कुछ ज्यादा बुरा' हुए बगैर ही गुजरा।

कोई खास काम-धंधा न होने से मिला खालीपन प्रेम के पल्लवन का सबसे मुफीद वक़्त होता है और इस वक्त जो भी कोई अपोजिट जेंडर का शख़्स आपके परिचय में सबसे करीब होता है उससे आप दिल लगा बैठते हैं। कई मामलों में व्यस्तताएं प्रेम विच्छेदन की वजह बनती हैं तो खालीपन, मुफलिसी और बेचारगी उसी प्रेम के खाद-पानी बन जाते हैं। इस ख़ाकसार के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा था... लौटूंगा उस ज़ेहनी दास्तां को लेकर, बिना किसी व्यक्ति-विशेष को निशाना बनाये, सिर्फ अपने जज़्बात लिये। इंतजार कीजिये अगली किस्त का....

Thursday, May 5, 2016

मेरी प्रथम पच्चीसी : चौदहवीं किस्त

(पिछली किस्त पढ़ने के लिये क्लिक करें- पहली किस्त, दूसरी किस्ततीसरी किस्तचौथी किस्त, पांचवी किस्तछठवी किस्तसातवी किस्तआठवी किस्त, नौवी किस्तदसवी किस्तग्यारहवी किस्तबारहवी किस्त, तेरहवीं किस्त)

(जीवन के पहले पच्चीस वर्षों को लिखने के लिये तकरीबन ढाई साल पहले प्रवृत्त हुआ था पर अब तक जीवन के बीसवें पड़ाव तक ही बमुश्किल पहुंचा हूँ। अतीत के गलियारे में न कुछ छोड़ने का मन करता है न कुछ अधुरा लिखने को...काम हाथ में लिया है तो अधिकतम बयां करने की कोशिश भी है। लेकिन पेशेगत व्यस्तताएं, रचनात्मक अभिरुचियों के लिये फुरसत नहीं देती। इसलिये कथानक विलंब से आगे बढ़ रहा है...लेकिन खुशी है कि बढ़ रहा है। देर से  ही सही काम हाथ में लिया है तो पूरा करूंगा जरूर।)

गतांक से आगे....

कॉलेज टूर से लौटने के बाद बस उन दस दिनों की खुमारी ही छाई हुई थी। जो एक दिव्य दर्शन रिश्तों को लेकर हमने उस कॉलेज टूर के बाद जाना था वो इस वाक्य में कुछ इस तरह बयां हुआ था कि "इस टूर से पहले जिन्हें हम सिर्फ जानते थे उनके करीब आ गये और जिनके करीब थे उन्हें जान गये।" रिश्तों के नये ताने-बाने इस शैक्षणिक भ्रमण के बाद बुने गये थे। जिनमें से कई आज भी कायम है...और उन रिश्तों के दरमियां झूमता है बस वही एजुकेशन टूर। 

खैर, यदि उन यादों में उलझ गया तो इस किस्त में उससे ही बाहर नहीं निकल पाउंगा क्योंकि ज़िंदगी के सबसे खुशनुमा और यादगार दस दिन थे वे। लेकिन पच्चीसी को वहां ठहराना अभीष्ट नहीं है सो बढ़ता हूँ आगे। कॉलेज के तीसरे सेमेस्टर की परीक्षा देने के बाद चौथे सेमेस्टर का अधिकतम वक्त कैंपस सिलेक्शन और कहीं जॉब या इंटर्नशिप की तलाश में ही ज़ाया होता है सो हम भी अपने इस अनजान भविष्य की तलाश में उन्हीं अहसासों से दो-चार हुए, जिनसे प्रायः हर युवा होता है। किसी एक कैंपस में सिलेक्ट नहीं हुए तो लगा कि दुनिया ही लुट गई...किसी इंटरव्यु में जलालत का सामना करना पड़ा तो आत्मविश्वास सरक के धरती के क्रोड में समा गया। जिन दोस्तों की जॉब लगती उनसे बरबस ही ईर्ष्या होती। धीरे-धीरे कॉलेज लाइफ की तत्कालीन खुशियां किसी अनजान भविष्य की खोज में स्वाहा होने लगीं। 

देखादेखी हमने भी किसी चैनल की तलाश शुरु कर दी जो या तो हमें नौकरी दे या कम स कम इंटर्नशिप करने का ही मौका दे दे...और ये खोज पूरी हुई रायपुर के जी चौबीस घंटे न्यूज चैनल में जाकर, जो वर्तमान में आईबीसी-24 कहलाता है। हम नौ दोस्तों में से सिर्फ पांच लोग ही इंटर्नशिप में चयनित हुए..भाग्य से मैं इन पांच में शामिल था। जिन दोस्तों को नहीं चुना गया उन्हें लेकर काफी दुख था..दुख का कारण ये नहीं कि उनके करियर को दिशा नहीं मिल पाई बल्कि उसके पीछे मेरा स्वार्थ था कि सिर्फ यही शाकाहारी और मेरी फितरत वाले दोस्त थे...और अब जबकि ये साथ नहीं होंगे तो मुझे मन मार के किसी अनचाहे मित्र के साथ गुजर-बसर करनी होगी। दुख का एक कारण ये भी था कि जिन दोस्तों का सिलेक्शन नहीं हुआ वे जबरदस्ती मुझे अपने साथ इस इंटरव्यु के लिये लाये थे और यहाँ आकर मैंने उनका ही स्थान छीन लिया। करियर को आकार देने में ऐसे कई कठोर फैसले हमें लगातार ताउम्र करने होते हैं जहाँ लौकिक महत्वाकांक्षाओं की आग में कई मर्तबा ज़ेहनी अहसासों और रिश्तों को हमें होम करना पड़ता है।

तब ये भी लगा कि जब इंटर्नशिप के लिये इतनी मशक्कत है तो एक अदद नौकरी के लिये कितना भटकना पड़ेगा। जिन सपनों को लेकर इस रास्ते पर मैं निकला था उसके संघर्ष की दास्तां अब शुरु हो रही थी। हम अपने वाञ्छित भविष्य को जितना आसान और स्वर्णिम समझ उसके सपने देखा करते हैं उसका रास्ता कभी भी उतना दिलकश नहीं होता। ख्यालों में खूबसूरत दिखने वाली चीज़ों की असलियत उनके नजदीक आने पर ही पता चलती हैं। मीडिया, जिसके ग्लैमर से आकृष्ट हो इस क्षेत्र में आने का मन बनाया था उसके निष्ठुर यथार्थ ने विचलित कर दिया। असंवेदनशीलता और गलाकाट प्रतिस्पर्धा ने भावनाशून्य प्रवृत्ति का आविर्भाव कर दिया। चुंकि मैं अपने पारिवारिक और धार्मिक संस्कारों से बंधा हुआ था इसलिये अपने दायरों को लांघने की हिम्मत तथा रुचि कभी नहीं हुई। सहकर्मियों-साथियों को धूंए में अपना तनाव उड़ाते और मयखानों में अपना ग़म मिटाते देखता तो हरबार लगता कि क्यों एक सीधी-सादी शांत ज़िंदगी छोड़ मैं इस रास्ते पर आगे बढ़ रहा हूं।

ग्रामीण पृष्ठभुमि, छोटी सी दुनिया, परिवार-दोस्त सब छूट रहे थे...और अब लगातार मिल रही बेतरतीब सूचनाएं, संवेदनाओं को ख़त्म कर रही थीं। इस तरह के माहौल में काम कर बेशक हम वैश्विक हो जाते हैं पर अपनी ज़मीन से उखड़ हमारी हालत त्रिशंकु की भांति हो जाती है। जहाँ दुनिया तो हमारे दिमाग में होती है पर हम किसी के दिल में नहीं रह जाते। जिन्होंने हमें अपने दिलों में आसरा दे रखा था...वो हमारी बौद्धिक व्यापकता के समक्ष बौना जान पड़ता है। 

कहते हैं पहला कदम सोच समझ कर उठाइये क्योंकि दूसरा कदम अंधा होता है...अब जबकि पहला कदम तकरीबन उठ चुका था। तो पीछे मुढ़ना भी मुश्किल था और आगे जाने से डर लग रहा था। इसलिये खुद को वक्त के प्रवाह के हवाले कर बस बहते जाने का मन बना लिया...इस प्रवाह में आज भी बह ही रहे हैं। पहुंंचना कहाँ है ये भी खुद नहीं जानते...अब वक्त ही सारी नियति निर्धारित कर रहा है। वैसे असल में हर इंसान की नियति स्वतः वक्त पर ही निर्भर होती है किंतु हर कोई अपना कर्तत्व का अभिमान लिये ये समझता रहता है कि ये मैंने किया। इंसान बड़ा स्वार्थी है जब कभी भी इसके मनमाफिक चीज़ें घटती हैं तो खुद के हुनर को जिम्मेदार मानता है और जब चीज़ें प्रतिकूल होती हैं तो किस्मत या भगवान को उसका जिम्मा दे देता है।

उस पैंतालीस दिन की इंटर्नशिप का एक-एक दिन काटना बड़ा मुश्किल हो रहा था। इस बीच मन मारके और ऑफिस के दबाव में काम भी बहुत किया। मसलन आज जो पत्रकारिता मैं कर रहा हूँ उसकी असल नर्सरी वो संस्थान ही था जहां पहली बार लेखन किया, संपादन किया और रिपोर्टिंग भी की। जैसा कि मैं लगातार बताता आ रहा हूँ कि अपने धार्मिक आग्रहों से भी मैं गहरे तक बंधा था तो उनके चलते खाने-पीने का भी अदद इंतजाम मेरे लिये न हो सका। न तो मुझे बिना प्याज-लहसुन और जमींकंद वाला भोजन ही नसीब हो पाता था और न ही दिन रहते मैं घर पहुंच पाता था जिससे कभी एक टाइम खाकर तो कभी पूरा दिन फलों या चाय-बिस्किट पर ही गुजारना पड़ा। भूखे पेट इंसान कुछ ज्यादा ही बेचैन होता है...इस बेचैनी की कई वजहों में से एक वजह उपयुक्त खुराक न मिल पाना भी थी। इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि पैंतालीस दिन बाद जब मैं रायपुर से लौटा तो पूरा नौ किलो वजन उस दरमियां कम हो चुका था। मीडिया के प्रति पहली बार में ही बेहद नकारात्मक नजरिया बना। 

इंटर्नशिप के दौरान ही मुझे जॉब ऑफर की गई। 2008-09 के आर्थिक मंदी के दौर में नौकरी का मिलना किसी स्वप्न से कम नहीं था। यकीनन बहुत खुशी हुई। मैं बड़ा और बाजार संकरा नजर आने लगा। अपने हुनर पर बेइंतहा गुमान हुआ और लगा अब तो सारा जहाँ मेरे लिये ही बाहें फैला कर खड़ा है। लेकिन इस खुशी से बड़ी खुशी उस वक्त मेरे लिये वापस अपने शहर लौटना था। इसलिये जॉब के ऑफर को अपने चौथे सेमेस्टर के एक्साम के बाद करने की रुचि व्यक्त कर मैं वापस अपने वतन आने को लेकर ही ज्यादा चिंतित था। अपने घर, अपने दोस्तों के बीच, अपने उसी कॉलेज के माहौल में एक बार फिर ज़िंदगी को जीने...मैं लौटना चाहता था। इसलिये जब रायपुर छोड़ मैं भोपाल पहुंचा तो मुझे याद नहीं आता कि इतनी खुशी मुझे तब से पहले कभी अपने शहर लौटने की हुई हो।

इंटर्नशिप से लौट कॉलेज के बचे हुए दो महीनों को पूरी शिद्दत से जिया। चुंकि नौकरी लगने की बात दोस्तों में फैल चुकी थी इसलिये सभी का मुझे देखने का नजरिया भी बदल गया था...इसलिये कुछ कुछ एलीट ग्रुप वाला होने का अहसास होता था। मौज, मस्ती, हुडदंगी, किस्से, कहानी और पार्टी-शार्टी के बीच उन दो महीनों का समय भी बीत गया। एक बार फिर दोस्तों की विदाई सामने थी। ग़म के बादल फिर पसर गये थे...साल में एक बार मिलने के वादे, फोन-ऑरकुट-ई मेल के जरिये टच में रहने के वादे और न जाने क्या-क्या...पर वक्त की सीड़न और ज़िंदगी के भौतिक परिवर्तन आंतरिक हालातों को भी बदल देते हैं। रिश्तों का रेशा...कमजोर होते होते टूट जाता है...मुलाकातें फिर खयालों में ही होती है।

वक्त की करवट पलों में बदल जाती है, दिन तो बहुत दूर की बात है। इन दो महीनों में अहंकार का हिरण भी समय की दहाड़ पा कहीं छुप गया। जब पता चला कि जी 24 घंटे छत्तीसगढ़ चैनल में सत्ता परिवर्तन हो गया है और अब जिस बॉस की छत्रछाया में मुझे जॉब ऑफर की गई थी वो वहां से जा चुके हैं लिहाजा अब..जबकि वो इंसान ही नहीं रहा तो उसका किया वादा कैसे रह सकता था। जिस चैनल में बादशाहों की तरह इंटर्नशिप की थी..जब वही चैनल कॉलेज में कैंपस सिलेक्शन के लिये आया तो इस हुनर के अहंकारी प्राणी का उस कैंपस में सिलेक्शन न हो सका और अपने से कमतर समझे जाने वाले कई दोस्त उस कैंपस में सिलेक्ट हो रायपुर जा पहुंचे। तन्हाई...और ग़म का एक जलजला आया। मैं वहां नौकरी नहीं करता तो मुझे यकीनन कोई परेशानी नहीं होती...लेकिन मैं वहां नहीं हूँ और मेरी जगह मेरे साथ के ही किसी और ने वहां डेरा जमा लिया है ये चीज़ खासी तड़पाने वाली थी। 

एक मर्तबा लगा कि ज़िंदगी में सब कुछ लुट गया...और अब सारे रास्ते बंद हो गये। एक लंबे समय के लिये ठहराव सा आ गया। कॉलेज ख़त्म हो गया था..दोस्त जा चुके थे। आगे का कोई रास्ता समझ नहीं आ रहा था...हाथ में न कोई नौकरी थी और न कोई लक्ष्य। अतीत की यादें और भविष्य के डरावनी कल्पनाओं में वर्तमान जख्मी हो रहा था...वक्त अपनी रफ्तार से बढ़ रहा था पर मैं वहीं जड़ चुका था......ज़िंदगी के सफर में समय ने एक ऐसे चौराहे पर ला पटका था जहाँ से आगे का कोई भी रास्ता नजर नहीं आ रहा था। 

बहरहाल, वक्त बीता और वक्त ने ही खुद भविष्य का रास्ता मुकर्रर कर दिया। जिसकी दास्तां के साथ लौटूंगा जल्द....फिलहाल और ज्यादा विस्तार भय से रुकता हूं यहीं.......................

जारी................

Tuesday, January 19, 2016

मेरी प्रथम पच्चीसी : तेरहवीं किस्त

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(पुनः लंबे विलंब के बाद अरसे पहले शुरु की अपने जीवन की इस श्रंख्ला के अगले पड़ाव को लिखने के लिये उद्धृत हूँ। जीवन की तथाकथित व्यस्तताएं हमसे उन्हीं चीज़ों से वक्त छीन लेती हैं जिन्हें हम वाकई करना चाहते हैं। लिखना और पढ़ना जीवन की सबसे जरुरी चीज़ें हैं मेरे लिये..यही मेरा मनोरंजन है और यही ताजगी का असल स्त्रोत किंतु महत्वाकांक्षा के नाम पर लोभी हो करियर के लिबास में दरअसल एक बोझा ढोना मजबूरी बन जाता है और फिर इस अर्थ संचय के लिये किये गये प्रयत्नों से हमारी रचनात्मक शक्ति क्षीण होती चली जाती है...बहरहाल इस दर्शन को पिलाना मेरा उद्देश्य नहीं है। सीधे आगे बढ़ता हूँ...जीवन के पहले पच्चीस बसंतों में से अब तक बीसवे वर्ष के पड़ाव तक पहुंच गया हूं...अब अगले वर्षों की दास्तां बताता हूँ... )

गतांक से आगे...

2008। मेरे लिये यही वो वर्ष था जिसने यौवन की दहलीज पर कदम रखते एक नवयुवा को हर वो अनुभव दिया जिसका स्वपन हर उन्मादी पुरुष अपने जीवनकाल में देखता है। हायर सेकेण्डरी उत्तीर्ण कर कॉलेज या युनिवर्सिटी में अध्ययन करने का आकांक्षी युवा ख़यालों में ऐसे ही किसी दौर को चाहता है..बस यूँ समझ लीजिये ये कौमार्य का ऐसा ही कोई दौर था। मौज या ऐश करने की सबकी भिन्न परिभाषाएं हो सकती हैं...उन परिभाषाओं के पैमानों पर मेरे ये अनुभव भी कम या ज्यादा रूप से कुछ-कुछ उसी श्रेणी में रखे जा सकते हैं...लेकिन एक बात स्पष्ट कर दूं कि मेरे मौज की उत्तंग तरंगों ने कभी अपनी सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया। मैं ये नहीं कहता कि इसमें सिर्फ मेरी इच्छाशक्ति या संस्कारों की प्रबलता थी बल्कि यूं कहिये इच्छाशक्ति के साथ मेरी किस्मत भी अच्छी थी जिसकी वजह से कभी मैंने अपने दायरे नहीं लांघे..और यही वजह है कि आज भी मैं पूरे गुरूर के साथ अपने चरित्र को निहार सकता हूँ। कॉलेज लाइफ के अनेक अनुभवों से गुजरने के बावजूद भी यह नहीं कहा जा सकता कि मुझे 'कॉलेज की हवा लग गई'।

खैर, महिला सहपाठियों से मित्रता बढ़ी, ग्रुप्स बने और घूमना-फिरना, पार्टी जैसे उन्मत्ता के कई रंग चढ़े। युनिवर्सिटी में हुए खेलों और कई अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों में पुरस्कार प्राप्त किये तो विद्यार्थियों के एक अलग एलीट ग्रुप में शामिल हुआ। विद्यार्थी जीवन में अक्सर वर्तने वाले अस्तित्व के संकट से मुक्त हुआ। खुद की पहचान पाई। सहपाठी और सहपाठिनों ने खुद से पहल कर मित्रता करना शुरु की। निगाहें, आसपास के दायरे में ही कोई हमसफर तलाशने लगीं। प्रेम के पल्लवन के अहसास जागे। इस उम्र में प्रेम के नाम पर किसी विपरीत लिंग के प्रति जो छटपटाहट होती है उसमें वास्तव मेंं शारीरिक परिवर्तन और एक कथित प्रेस्टीज का मुद्दा ही मुख्य होता है। या यूं कहें कि हमारे सिनेमा-साहित्य और समाज ने एक ऐसी परिपाटी का निर्माण किया है जिसमें कॉलेज और युनिवर्सिटी में बिताये जाने वाले लम्हों को 'प्रेम का काबा-काशी' साबित कर दिया है। किताबों में मुरझाये गुलाब के फूल, सिकुड़े से प्रेम पत्र और अब झटपट मोहब्बत के प्रतीक बने व्हाट्सएप्प-फेसबुक के मैसेज या ईमेल कॉलेज के आवश्यक पाठ्यक्रम का हिस्सा माने जाते हैं। बस इसी जरुरी पाठ्यक्रम के कुछ चैप्टर पढ़ने की उत्कंठा अपने हृदय में भी बसा करती थी और तलाशते थे किसी ऐसे कंधे को जिस पर सिर रखकर रोया जा सके या अपनी उपलब्धियों का गुमान उसकी निगाहों में देखा जा सके। 

जो सीरियसली वाली मोहब्बत या देवदासी फितूर होता है वो प्रेम के आगाज के वक्त नहीं होता। शुरु में तो अक्सर टाइमपास और प्रेस्टीज मजबूत करने की भावना ही प्रबल होती है किंतु आगाज़ चाहे जिस भी भावना से हो पर प्रेम जब परवान चढ़ता है तो क़त्ल करके ही दम लेता है...प्रेम का आगाज़ चाहे जैसा भी हो किंतु अंजाम कुछ भी नहीं। ये शुरु होकर सिर्फ रास्तों में ही रहता है...मंजिल पे पहुंचने का भ्रम तो हो सकता है पर मंजिल प्रेम में है ही नहीं और जिसे हमने मंजिल मान रखा है वहाँ दरअसल चाहे जो भी हो पर प्रेम कतई नहीं।

ऐसी ही किसी लालसा से हम भी तलाशा करते थे...अहसासों के सिलेबस में पूछे गये कुछ मनचले सवालों के नोट्स।  लेकिन वो कहते हैं न प्रेम न बाड़ी उपजे, प्रेम न हाट बिकाये...बस तो ऐसा ही कुछ हमारे साथ हुआ और चाहने से क्या होता है प्रेम का पुष्प जब पल्लवित होना हो तभी होता है आपके ढूंढे से इसकी ओर-छोर-कोर की प्राप्ति नहीं की जा सकती। और जैसा कि मैं इस पच्चीसी की नौंवी किस्त में बता चुका हूँ कि कम उम्र में ही साहित्य की देशी और सांस्कृतिक परंपरा से रुबरु होने के कारण प्रेम का कोई कुत्सित रूप मुझे गंवारा नहीं था...मैं तो धर्मवीर भारती की नायिका सुधा, कालिदास की शकुंतला और शरदचंद्र की परिणीता को ही तलाशा करता था कॉलेज के गलियारों में। जो तब तो न मिल सकी...क्योंकि कालचक्र पर इस घटना का आविर्भाव तब तक न होना ही लिखा था...इसलिये प्रेम सरीके दिखने वाले छुटमुट सायों की छांव से दो-चार होकर वापस लौट आये...प्रेम की दास्तां सुनने के लिये अभी कुछ किस्तों का इंतजार और करना होगा।

कॉलेज का ये वर्ष यौवन के खुशनुमा अहसासों की वजहों से कुछ जल्द ही बीत रहा था...इसी वर्ष में कॉलेज का एजुकेशन ट्रिप गोवा, मुंबई, पुणे की यात्रा पर गया। एजुकेशन के नाम पर जाने वाले ये ट्रिप जिंदगी की सबसे खूबसूरत यात्राएं होती हैं। जिनमें तथाकथित महाविद्यालयीन शिक्षा के अतिरिक्त सब कुछ होता है...लेकिन ये बिना किताबी तालीम के भी जिंदगी के कई अहम् पाठ हमें सिखा देते हैं। अपनी इस यात्रा का वर्णन मैंने अपने इसी ब्लॉग पर लिखे जिंदगी का सफ़र और सफ़र में ज़िंदगी नामक पोस्ट में किया है...विस्ताररुचि वाले वहां  से पढ़ सकते हैं। इस यात्रा के सालों बाद अब भी कभी वे संस्मरण आंखों के सामने झूलते हैं तो उस दौर में वापस लौटने को जी चाहता है...उन्हीं रिश्तों, उन्हीं बचकाने अहसासों और उन यारों की महफिलों में होने वाली ऊटपटांग हरकतों का दीदार करने को जी चाहता है। लेकिन........ख़यालों में तो रिवर्स गियर हो सकता है पर ज़िंदगी में नहीं। 

बहरहाल, उन घटनाओं के साथ लौटूंगा जल्द....एक मर्तबा फिर अपनी यादों को रिवर्स कर। और चुराने की कोशिश करूंगा इसी वर्तमान में अतीत के गुजारे खट्टे-मीठे लम्हों को...अगली किस्त में। फिलहाल रुकता हूँ।

जारी....................

Sunday, September 6, 2015

मेरी प्रथम पच्चीसी : बारहवी किस्त

(पिछली किस्त पढ़ने के लिये क्लिक करें- पहली किस्त, दूसरी किस्ततीसरी किस्तचौथी किस्त, पांचवी किस्तछठवी किस्तसातवी किस्तआठवी किस्त, नौवी किस्तदसवी किस्त, ग्यारहवी किस्त)

(फिर एक लंबे विलंब के बाद पच्चीसी की कड़ियों को आगे बढ़ा रहा हू...जीवन के पहले पच्चीस बसंत की यह दास्तां शुरु किये दो वर्ष से ऊपर बीत गये। अब अट्ठाईसवे बसंद के गलियारे में प्रवेश कर चुका है लेकिन पच्चीसी की पूर्णता से अभी कोसों दूर हूँ। कोशिश रहेगी दास्तां जल्द समेटूं..और एक शुरु किये काम की जिम्मेदारी से जल्द निवृत्त हूँ।)


गतांक से आगे.....

मुसीबतें जब आती हैं तो भर-भरकर आती हैं। सीधी-सपाट ज़िंदगी में कई क्लाइमेक्स आके विचलित करने लगते हैं। हम किसी अज्ञात शक्ति से गुजारिश करते हैं, ऐ खुदा! बस भी करो..जिंदगी को बोरिंग बना दो। लगातार लगती ठोकरों के बाद जब सब कुछ सामान्य हो जाता है तब भी हम डरते रहते है और यही डर सताता रहता है कि पता नहीं ये खुशनुमा पल कब तक के हैं? अपने उस लघुतम एक्सीडेंट के ज़ख्म भरे भी नहीं थे कि एक और यातना मूंह बाये खड़ी थी। 2007 की नवंबर का अंतिम सप्ताह चल रहा था कि तभी पेट में किसी अनजान दर्द की तड़प उठ रही थी। लगा एसीडिटी टायप कुछ होगा और ऐसे ही किसी मर्ज की दवा-दारू करने में मशगूल था किंतु उन तमाम प्रयासों के बावजूद यातना तनिक भी कम नहीं हो रही थी..और जब दर्द अपनी सीमाएं लांघ चुका था तो अस्पताल जाना ही मुनासिब समझा।

घर से अस्पताल का रास्ता महज आधे घंटे का रहा होगा लेकिन एक-एक सेकंड की असहनीय पीड़ा जीना मुहाल कर रही थी। उस अस्पताल के मुख्यद्वार से पूर्व पड़ने वाले गतिअवरोधक पर जब गाड़ी ने स्पी़ड में जंप लिया तो यह वेदना मानो मौत का निमंत्रण थी। लगा मृत्यु पूर्व का अहसास ऐसा ही होता है...चेहरों के सामने अंधेरा पसर रहा था और मैं अपने पास खड़े पापा, भाई और अन्य परिजनों से गुहार लगा रहा था कि प्लीज इस बार बचा लो। तुच्छ सी प्रतीत होने वाली ज़िंदगी अमूल्य नजर आने लगती है। ज़िंदगी के सारे अच्छे और बुरे कर्म रेलगाड़ी की तरह सामने से गुजरने लगते हैं। सत्कार्यों को बारंबार दोहराने के और दुष्कृत्यों से तौबा करने के संकल्प हम झट से ले लेते हैं। इस वक्त पता चलता है कि दुनिया में टूटी और पीछे छूटी हर वस्तु को वैसा का वैसा पाया जा सकता है पर श्वांसों की डोर दोबारा मौका नहीं देती। ये महीन भी है और दुर्लभ भी। इस दर्दसंयुक्त चिंतनधारा के बीच सोनोग्राफी, सीटीस्केन जैसे टेस्ट भी जारी थे और पता लग गया था कि तन में पाया जाने वाला अपेंडेक्स नाम का अवशेषी अंग फट गया है। फटे अपेंडेक्स के जहर ने अंदरुनी मामला बिगा़ड़ रखा है इसलिये तुरंत ऑपरेशन की दरकार थी। चुंकि हॉस्पिटल में पहले से पहचान थी इसलिये बिना कागजी औपचारिकताओं के ऑपरेशन थियेटर में सीधे प्रविष्ट करा दिया। अगले कुछ घंटों में क्या हुआ पता नहीं।

तब लगा कि शरीर में विद्यमान एक अवशेषी अंग जब इतना कहर ढा सकता है तो अन्य जरुरी अंगों की विषम चाल क्या कर सकती है। कालांतर में यह राज भी खुले...किंतु हर समझ के लिये पीड़ा के सोपानों से गुजरना पड़ता है। सब कुछ समझ आना भी अच्छी बात नहीं..ज़िंदगी की कई तालीमों से हम अनजान ही बने रहे तो बेहतर है। बहरहाल जब होश आया तो पेट के उस हिस्से में दर्द तब भी विद्यमान था पर ये दर्द पहले की तरह अंदरुनी वजहों से नहीं बल्कि चीड़ा-फाड़ी के बाद उपजा ऑपरेशन का दर्द था। पहली मर्तबा इस तरह की सर्जरी के अनुभव से गुजरा था लिहाजा लगने लगा था कि अब सेकेंड हेंड पीस हो गया हूं पहले जैसी शक्तिसंपन्नत्ता अब न रहेगी।  पर तभी पता चला कि मेडिकल साइंस ने अब बहुत तरक्की कर ली है शल्य चिकित्सा इस क्षेत्र की बहुत आसान पद्धत्ति बन चुकी है और कुछ दिनों मे ही ज़िंदगी वापस पूर्ववत् मुख्यधारा में आ गई। तीन महीनों बाद ही मैंने युनिवर्सिटी में हुए एक क्रिकेट टूर्नामेंट में शिरकत कर अपना आत्मविश्वास वापस पाया। लेकिन तब सर्जरी के बाद अगले सात दिन उस हॉस्पिटल के आईसीयू का बैड नंबर नौ ही मेरा एकमात्र ठिकाना था। आहार-निहार सहित समस्त क्रियाएं बस यही तक सिमटी थी। विचारों की उधेड़बुन से तब बहुत कुछ सीखा। विराम का वक्त पहली बार विचार का वक्त बन रहा था।

खैर, दस दिन बाद हॉस्पिटल से घर आया। लगा कि बड़ी जंग जीत ली..सामने एमएससी के प्रथम सत्र की परीक्षा थी। बीते दस-पंद्रह दिन से जिंदगी से कट गया था इसलिये साथ वालों के साथ कदमताल मिलाने के लिये कुछ ज्यादा तेज दौड़ने की जरूरत थी और इसलिये अनजान प्रतिस्पर्धा के चलते बिना किसी को देखे पांच-सात दिन में ही बहुत कुछ पढ़ डाला। यह मेहनत कुछ ऐसी हुई जिसने दूसरों से कई कदम आगे निकाल दिया और पता चला कि जब प्रतिस्पर्धा करते हुए हम दूसरों को देखते हैं तो हम उस तेजी से नहीं बढ़ पाते जिस तेजी से हम सिर्फ खुद पे नजर रख किेये प्रयासों से बढ़ जाते हैं। आखिरकार एक्साम भी निपटे। और इस तरह तकलीफों के छुटमुट भंवर के बीच किसी तरह अपनी कश्ती को आगे बढ़ाया। 

कॉलेज के अगले सत्रों में कुंद पड़े जीवन को रफ्तार मिली। संकोच हवा हुआ, नये रिश्तों के द्वार खुले। ज़िंदगी में नये दोस्त आये जिन्होंने पुरानी यादों से छुटकारा दिलाया। मस्ती-मजाक और सेलीब्रेशन का दौर बढ़ गया। मैं भी इस नये जीवन में ढल गया और एक आम युवा की तरह उन्हीं अहसासों को जीने लगा जो इस उम्र का सच होते हैं। सतही संवेदना, जुनूनी सपने और अपरिपक्व ख़यालों के मिश्रण ने यादें तो बहुत दीं पर सीखने की संभावनाएं कम कर दीं। दोस्ती के उन्माद में चूर हो..बहुत कुछ पाया पर उससे कही ज्यादा बरबाद कर दिया। बेशक हम स्कूल-कॉलेज में उन्मादी जीवन बिता कई यादें संजो लेते हैं पर स्कूल-कॉलेज के असल मायनों से दूर चले जाते हैं। इस दौर से हमें यादें जरूर मिलती हैं पर उन यादों का कोई भविष्य नहीं होता। जीवन में संतुलन बहुत जरुरी है। उन्मादी जीवन से न ज्यादा निकटता हो और न ही दूरी। विद्यार्थी जीवन के हर रंग से हमारा वास्ता हो पर उन रंगों से इस वक्त की धवलता प्रभावित नहीं होना चाहिये।

जारी.................

Saturday, April 11, 2015

मेरी प्रथम पच्चीसी : ग्यारहवी किस्त


(ज़िंदगी की तथाकथित व्यस्तताएं और ज़रुरी काम हमसे हमारी सृजनधर्मिता छीन लेते हैं। हम अंदर ही अंदर छटपटाते रहते हैं पर अपनी रचनात्मक शक्ति के प्रयोग को किसी न किसी वजह से टालते रहते हैं और सच्चाई यही है कि रचनात्मकता से बढ़कर सुख और किसी में नहीं। ऐसी ही कुछ व्यस्तताओं के चलते ब्लॉग लेखन में विलंब होता रहता है और अपने इस सृजनधर्म से दूर जाकर कसमसाहट भी होती है। बहरहाल लंबे वक्त बाद जीवन के प्रथम पच्चीस वर्षों का यह यात्रा वृत्तांत पुनः आगे बढ़ा रहा हूँ। विलंब होने से अहसासों का रेशा भी टूटता है जिसका फर्क लेखन पर भी प्रतिबिंवित होता है इस तरह के श्रंख्लाबद्ध लेखन के लिये निरंतरता आवश्यक होती है पर चाहते हुए भी कभी आलस तो कभी दूसरी वजहों से इस निरंतरता को बनाये रखना मुश्किल हो जाता है। खैर, औपचारिक बातों को विराम देते हुए पच्चीसी को आगे बढ़ाता हूँ। )

गतांक से आगे....

जीवन में जिस दौर से हम गुजर रहे होते हैं, हमें उसकी कद्र कभी नहीं आती और हम बरहमिश अतीत के गलियारों में ही डोलते रहते हैं...और इस प्रवृत्ति के चलते वर्तमान के सुख से वंचित रहते हुए स्वर्णिम वर्तमान को भी अतीत बन जाने देते हैं पश्चात इस खिन्नता से परेशान रहते हैं कि काश! तब हमने ये किया होता, काश! तब हमने वो किया होता। जीवन के प्रारंभिक उन्नीस वर्षों के गुजरने और स्नातक पर्यंत का अध्ययन पूर्ण करने के बाद जब स्नातकोत्तर की शिक्षा अर्जित करने भोपाल आया तो अपने अध्ययन का तकरीबन पूरा प्रथम सत्र गुजरे हुए लम्हों की यादों में ही बिता दिया। इस कारण नये रिश्तों और नये अहसासों को पनपने का ज्यादा अवसर ही नहीं मिला। अपने अतीत को वर्तमान से बेहतर बताते-बताते तत्कालीन दौर को कोसता रहा और वक्त को रेत के मानिंद अपनी मुट्ठी से फिसलने दिया। 

चीज़ें बहुत सामान्य ढंग से घट रही थीं। यूँ समझिये कि न कुछ बहुत बेहतरीन था और न ही कुछ बेहद बदतर। छोटी-छोटी चीज़ें खुशी देती थी और छोटी-छोटी समस्याएं ही पहाड़ सरीकी दिखती थी। सतही अहसास और बचकाने सपने दिल में हिलोरे लेते थे। जो कि उस उम्र का सच होते हैं। ज़रा सी तारीफ आसमानी अहंकार की वजह बन जाती थी और तनिक सी उपेक्षा रातों की नींद छीन लेती थी। समझ कम थी पर जानकारी शनैः शनैः बढ़ रही थी और समझ के बगैर जानकारी का बढ़ना कभी सुख का कारण नहीं होता। 

समझ, हमेशा विपदाओं और असफलताओं से ही मिलती हैं। गलतियां ही अनुभवी बनाती हैं। जब लाचारियों के कारण कुछ करने का रास्ता नज़र नहीं आता तो हम किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं और तभी हमें विराम का वक्त मिलता है ये विराम का वक्त अनायास ही विचार का वक्त बन जाता है। जिस कारण स्वतः समझ विकसित होने का माहौल निर्मित हो जाता है। प्रथमदृष्टया मुसीबतें बेहद विचलित करने वाली लगती हैं पर कालांतर में यही परिपक्वता का संचार करती हैं। मेरी ज़िंदगी में ऐसी ही विपदाओं का दौर शुरु हो रहा था जिस कारण क्षणिक उपलब्धियों और आधारहीन ख़याली घोड़ों पर लगाम लगी। जीवन की लंबाई के परे, इसकी गहराई को जानने के अवसर मिले। विराम का वक्त आया और यह अपने साथ विचार का वक्त लाया। यह सिलसिला शुरु तो 2007 में हुआ था पर थमा अब भी नहीं है।

नवंबर 2007 में अपने गृहग्राम से लौटते वक्त एक सड़क दुर्घटना का शिकार हुआ। हादसा इतना बड़ा नहीं था कि हॉस्पिटल में भर्ती होना पड़े और इतना छोटा भी नहीं था कि तुरंत चलने-फिरने लगे। इसलिये प्राथमिक उपचार के बाद आठ दस दिन विश्राम करना था...यूं कहिये अनचाहा विराम का वक्त..और बेवजह के विचार का वक्त। घटनाएं भले छोटी ही क्युं न हों पर जब वे घटती हैं तो यह ज़रुर लगता है कि अब तो हो गया काम-तमाम और हम एक अदृश्य शक्ति से ज़िंदगी की भीख मांगने लगते हैं। तमाम दुष्कृत्यों को न करने और सुकृत्यों को करने के तात्कालिक संकल्प लेते हैं पर वक्त बीतने के साथ एवं हालात सुधरते ही वे सारे संकल्प फ़ना हो जाते हैं। ज़िंदगी फिर स्वच्छंद हो जाती है। एक्सीडेंट हुआ तो अपने गाड़ी चलाने की रफ़्तार पे तो नियंत्रण पाया ही साथ ही ख़याली उड़ान पर भी लगाम लगी। तात्कालिक ही सही ज़िंदगी की क्षणभंगुरता का भान हुआ। मसान वैराग्य का जन्म और सुप्त चैतन्यता झंकृत हुई।

अपनी इस घटना के चलते कुछ लोगों की पुरातन और अंधश्रद्धा के दर्शन भी हुए। दरअसल, जिस जगह यह सड़क हादसा हुआ था उससे कुछ दुरी पहले एक धार्मिक आयतन पड़ता है जिसे लेकर मान्यता है कि वहां मत्था न टेका तो जीवन में बुरा होना निश्चित है। उस धार्मिक स्थल पर आपकी मान्यता हो या न हो लेकिन उस स्थान से गुजरते वक्त कमसकम गाड़ी का हॉर्न ज़रूर बजा देना चाहिये। पर मेरी नज़र में यह तमाम धारणायें धार्मिकता की पर्याय नहीं बल्कि पोंगापंथी ही हैं। मुझे याद नहीं कि मैंने वहां हॉर्न बजाया था या नहीं लेकिन यह ज़रूर बताना चाहूंगा कि यदि याद होता तब भी मैं वहां यह फिजूल की क्रिया नहीं करने वाला था। ऐसा कहकर मैं किसी धार्मिक आस्था और आयतन का तिरस्कार नहीं कर रहा हूँ पर स्वयं की श्रद्धा के बगैर, चाहे जहाँ महज डर या लालच के मत्था टेकने को नीतिगत आस्था के विरुद्ध ज़रूर बताना चाह रहा हूँ। ऐसी आस्थान मूल्यविहीन तो है ही साथ में इंसान के तार्किक और विवेकवान होने पर भी एक सवाल है। दुनिया का कोई ईश्वर इतना हल्के दर्जे का नहीं हो सकता जो खुद को नमन न करने वालों के साथ बुरा कर अपनी छद्मवृत्ति का परिचय दे। ईश्वरत्व का वास साम्यता के साथ ही हो सकता है। राग-द्वेष संयुक्त होना, पक्षपाती होना और दुनिया को अपने आगे झुकाने की वृत्ति रखना..ये तमाम चीज़ें ईश्वरत्व की पर्याय कतई नहीं है। लेकिन मुझे हिदायतें देने वाले तो दे ही रहे थे। अफसोस इस बात का है कि मेरे संग घटी उस घटना से मेरे श्रद्धान में तो शिथिलता नहीं आई पर कई दूसरे लोग इसे देखकर ज़रूर अंधश्रद्धानी बन गये। डर एवं लालच, सदैव और सर्वथा एक बहुत बड़ी विसंगति ही हैं और इन विसंगतियों के आधार से जो पैदा होगा...वो चाहे जो भी क्युं न हो पर धर्म कतई नहीं हो सकता।

खैर, इस हालात से उबरने में ज्यादा वक्त नहीं लगा...पर यह सुकून महज तीन-चार दिन का ही था क्युंकि कुछ दिनों बाद ही एक दूसरी विपदा बड़ी सज-धज के दर पे दस्तक देने जा रही थी। जीवन के सफ़र में एक और गतिअवरोधक आ चुका था...जिसकी चर्चा अगली किस्त में, फिलहाल रुकता हूँ। लेकिन हाँ चलते-चलते एक बात और कि गतिअवरोधक, जीवन सफर में हमारी रफ़्तार को धीमा भले कर दें लेकिन हर रास्ते और सुरक्षित सफ़र के लिये इनका होना बहुत ज़रुरी है।

जारी.....................

Tuesday, December 16, 2014

मेरी प्रथम पच्चीसी : दसवी किस्त


(शुरुआती नौ किस्तों में जीवन के प्रारंभिक अठारह वर्षों की दास्तां सुना चुका हूँ, अब तक की ज़िंदगी के अनुभव बहुत ज्यादा हैपनिंग तो नहीं रहे पर जैसे भी रहे उनमें सिखाने का माद्दा बहुत था। अपने परिवार से निकलकर जिस हॉस्टल में स्नातक किया वहाँ भी माहौल काफी कुछ सुरक्षित ही था और लगभग एक जैसे वर्ग, संस्कृति और प्रकृति वाले लोगों के साथ रहा। अपने हॉस्टल लाइफ का विवरण एक अन्य ब्लॉग पर स्मारक रोमांस और Pinkish Day in Pinkcity नाम से लिखी पोस्ट में कर चुका हूं। इसलिये यहाँ ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा, सीधे आगे की किस्सागोई शुरु करता हूँ। चुंकि पहले कह चुका हूँ मेरी प्रथम पच्चीसी स्वांतसुखाय ही लिखी जा रही है इसलिये किसी से भी जबरदस्ती इसमें प्रवेश करने का आग्रह नहीं करुंगा। अपनी रुचि और समय के अनुकूल ही इसमें प्रविष्ट हों।)

गतांक से आगे....

ज़िंदगी उस वक्त सबसे ज्यादा कठिन हो जाती है..जब सीधे चल रहे रास्तों के बाद अचानक कोई मोड़ आता है। जब फैसले लेेने की घड़ी आती है। जब हमें ऐसे चौराहों पर छोड़ दिया जाता है जहां रास्तों का पता बताने वाले बोर्ड  नहीं लगे होते। लेकिन आप जहाँ हो वहाँ आप रह नहीं सकते और आगे बढ़ने को लेकर निरंतर संशय की स्थिति बनी रहती है। ज़िंदगी हर हाल में फैसले की दरकार कर रही होती है और ऐसे चौराहों से जीवन में पहली बार मुलाकात हो रही थी। हालांकि हाई स्कूल या हायर सेकेंडरी के बाद इस तरह की परिस्थितियां बनती हैं जब फैसला करना होता है लेकिन तब हमारे ज्ञान और विवेक की बजाय माँ-बाप के लिये गये फैसलों की अहमियत ज्यादा होती है। पर स्नातक की परीक्षा करने के बाद पूर्णतः स्वंय की समझ और हिम्मत से ही चुनाव करना पड़ता है। जयपुर के टोडरमल स्मारक में पांच साल पूरे करने के बाद अब फैसले की घड़ी थी, बदलाव की घड़ी थी और बदलाव हमेशा आपको विचलित करता है।

उस परिसर में रहते हुए कभी सोचा नहीं था कि इक दिन इसे छोड़कर किसी और तलाश में निकलना होगा।  दोस्तों का साथ, फुरसत के लम्हे और ऐशो-आराम की घड़ियां अब इतिहास बनने जा रही थी। संघर्ष का सफ़र शुरु हो रहा था। इसलिये मन बड़ा बेचैन था और इन बेचैनियों के दौर में ही आपको अपने सफ़र का अगला रास्ता तय करना होता है। यदि अच्छी किस्मत, हौंसला और हिम्मत न हो तो इस दौर में लिये गये फैसले पूरी ज़िंदगी को ही अंधेरों के भंवर में धकेल सकते हैं। इसलिये जिम्मेदारी ज्यादा थी। जो छूट रहा था उसका ग़म था, जो हो रहा था वो बहुत तनावपूर्ण था और जो हासिल करना है वो बहुत ही कन्फ्युसिंग था। ऐसी मानसिक स्थिति के बीच मैंने ग्लैमर की चकाचौंध में मुग्ध होकर मीडिया को अपना करियर बनाने का मन बनाया। अपने हॉस्टल में मैं स्टार माना जाता था, अच्छा वक्ता, तार्किक दक्षता वाला और कुछ हद तक बुद्धिमान भी समझा जाता था...पर उस छोटे से दायरे में मैं कूपमंडूक ही था और खुद को मिली तनिक सी प्रशंसा में उन्मादी हो रहा था। उस उन्माद ने ही मुझमें ये आत्मविश्वास भरा था कि मैं मीडिया में भी स्टार बन सकता हूँ। लेकिन जैसे ही उस छोटे से कूँए से निकल कर दुनिया के समंदर में पहुंचा तो अपने अदने से कद का ज्ञान हुआ और पता चला कि मियां! यहाँ तो तुमसे कई बेहतर बल्लम खाँ पहले से ही अपनी मंजिल को पाने के लिये संघर्ष कर रहे हैं।

बहरहाल, टोडरमल स्मारक के छूटने के साथ ही अब एक नया शहर और नया सफ़र मुझे मिल चुका था। भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में दाखिला लेने जा रहा था और इस युनिवर्सिटी के सामान्य से इंट्रेंस एक्साम ने ही मुझे अपनी गिरेबान में झांकने का अवसर प्रदान कर दिया और ये पता चल गया कि अपने इस झूठे आत्मविश्वास को जितने जल्दी खुद से बाहर किया जा सके उतना बेहतर है क्योंकि ये आत्मविश्वास नहीं अहंकार है और अहंकार के साथ कभी कुछ सीखा नहीं जा सकता। विनम्रता से ही ज्ञान प्राप्त करने की पात्रता प्रगट होती है और विनम्रता ही ज्ञान या शिक्षा का परिणाम होना चाहिये। इंट्रेस टेस्ट में मेरा सिलेक्शन नहीं हुआ और मध्यप्रदेश का होने के कारण स्टेट कोटे के कारण वेटिंग लिस्ट में भी अंतिम स्थान मिला था। बाद में किस्मत और थोड़ी मिन्नतों के बाद जैसे-तैसे उस युनिवर्सिटी में पढ़ने का अवसर मिला। इससे पहले के कुछ दिन बेहद कठिन और किंकर्तव्यविमूढ़ कर देने वाले थे।

6 अगस्त 2007, युनिवर्सिटी में अपनी पहली क्लास अटेंड करने पहुंचा। सब कुछ अलग और नया था। अब तक जो पढ़ा था उसका रत्तीभर भी यहाँ काम नहीं आना था, और जो यहाँ की ज़रूरत थी उसका तनिक भी ज्ञान नहीं था। जो साथी मेरे साथ थे उनमें से कोई दिल्ली विश्विद्यालय, इलाहबाद विश्वविद्यालय और फर्ग्युसन इंस्टीट्युट जैसे देश के नामी-गिरामी शिक्षा संस्थानों से अध्ययन करके मेरे साथ बैठे थे। जिनकी देश-दुनिया के गहनतम मुद्दों पर होने वाली चर्चा मेरे लिये किसी दूसरे ग्रह की बात लगती थी। संस्कृत, अंग्रेजी साहित्य और दर्शनशास्त्र के अध्ययन करने से मैं संस्कारी और चरित्रवान तो था पर बुद्धिमान कतई नहीं। अभी तक सिर्फ ब्वायस् हॉस्टल और कॉलेज में पढ़ाई की थी तो कन्याओं के सानिध्य से ही डर लगता था। लेकिन अब माहौल बदल गया था और ज़िंदगी ओवर फ्रेंक होने की डिमांड कर रही थी। फ्रेंक और बोल्ड होना ज़रुरी तो था पर ये सब रातों-रात तो हो नहीं सकता था। इसलिये अपनी क्लास पढ़कर तुरंत घर भाग लेता। दो-चार ऐसे लोगों से दोस्ती ज़रूर हो गई थी जो मेरी ही तरह अपने अस्तित्व की तलाश कर रहे थे। तब लड़कियों से दूर भागने का कारण मैं लोगों को ये बताता कि मैंं इन सब चीज़ों में अपना टायम वेस्ट नहीं करना चाहता पर सच्चाई यह थी कि मुझमें न तो हिम्मत थी और न लड़कियों से बात करने का हुनर। अन्यथा दिल तो बहुत करता..कि मेरी भी इन सबसे यारी हो, मैं भी मस्तमौला बन यहां-वहाँ घूमो, मैं भी किसी से प्यार करूं और जीभर के अपना समय बरबाद करूं।

लगभग इसी तरह अपना पहला सेमेस्टर गुजार दिया और जयपुर को छोड़े लगभग साल भर हो जाने के बाद भी आये दिन पुराने साथियों और गुजरे दिनों की यादें परेशान करती। वक्त बदल चुका था पर मैं नहीं बदल पा रहा था। अपने पहले सेमेस्टर में कुछ अच्छा हुआ तो वो बस यही कि प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित एक वाद-विवाद प्रतियोगिता के लिये मेरा चयन युनिवर्सिटी से हुआ और दिल्ली के एक बड़े मंच पर युनिवर्सिटी का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला। जिससे अपनी कक्षा के लोगों के बीच कुछ गुमनामी जरूर कम हुई पर तेजी से बन रहे छोटे-छोटे ग्रुप में से किसी भी ग्रुप का सदस्य मैं नहीं बन सका और लड़कियों से दोस्ती अब तक महरूम ही थी। आज सोचता हूँ तो लगता है एक बेहद मूर्खतापूर्ण ख्वाहिश के लिये मैंने कई-कई घंटे फिजूल की हरकतों और विचारों में ज़ाया किये। एक 25-30 लोगों की कक्षा का खेमों में बंटना अपने-आप में बुरा है जिससे हमारे संबंधों और सोच का दायरा भी सिकुड़कर बेहद छोटा हो जाता है और इस तरह छोटे से दायरे में सिमट जाने से सीखने की संभावनाएं भी कम होती है क्योंकि अधिकतम का सानिध्य हमें ज्यादा समझ प्रदान करता है। लेकिन उम्र के उस दौर में यह सब चीज़ें समझ नहीं आती, हम किसी मजबूत और रुतबेदार ग्रुप का सदस्य बनना चाहते हैं और खेमों में बंटकर कब हम स्वार्थी और ओछी प्रवृत्तियां करने लगते हैं पता ही नहीं चलता। खुद को सुपीरियर दिखाने की चाहत में कई दिखावे और झूठे शिगूफे भी हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाते हैं।

खैर, किसी ग्रुप्स का सदस्य न होने का दर्द था तो खुशनसीबी भी थी कि ग्रुपिंग में बरबाद होने वाले समय से बचा रहा जिससे कि इस सेमेस्टर में कई किताबें पढ़ी, फ़िल्में देखी जिससे अपने साथियों के बीच का मेरा पिछड़ापन कुछ कम ज़रूर हुआ। पर समझ का दायरा सिर्फ किताबों तक ही सीमित था, ज़िंदगी की समझ तो गलतियां करने और ठोकर खाने से ही बढ़ती है। इस सेमेस्टर के अंत तक पहुंचते-पहुंचते ज़िंदगी के कई अहंकार और टूटे। जिसके चलते जीवन की महत्ता का आंशिक अहसास हुआ। उन घटनाओं के ज़िक्र के चलते ये किस्त काफी लंबी हो जायेगी, बस इसी विस्तार भय से अभी यहीं रुकना मुनासिब समझता हूँ..पर शायद ज़िंदगी की असली 'साढ़े साती' की शुरुआत अब होने वाली थी। जीवन की क्षणभंगुरता और लम्हों की अहमियत क्या होती है यह समझ आ रहा था..सेहत, समय और संबंधों की कद्र बताने वाली घटनाएं घटना शुरु हो रही थी....उन तमाम घटनाओं के साथ जल्द लौदूंगा..क्योंकि मेरी पच्चीसी का असल सार तो उन घटनाओं में ही है........................

Saturday, September 20, 2014

मेरी प्रथम पच्चीसी : नौवी किस्त

(पिछली किस्त पढ़ने के लिये क्लिक करें- पहली किस्त, दूसरी किस्ततीसरी किस्तचौथी किस्त, पांचवी किस्तछठवी किस्तसातवी किस्तआठवी किस्त)

(ज़िंदगी के घरोंदे में मौजूदा दौर के घुटन भरे कमरों में राहत की हवा को महसूस करने के लिये, रूह की दीवार में लगे यादों के झरोखों को खोल अपने अतीत के नज़ारों से ठंडक को पाने के जतन कर रहा हूं और बस इसलिये पच्चीसी स्वांतसुखाय और स्वप्रेरणार्थ ही मुख्यता से लिखी जा रही है। लेकिन उन लोगो के लिये भी इसका महत्व कुछ कम नहीं है जिनके प्रेम की छाया में मैं कुछ सुकुन पा लेता हूँ और जिनके अतीत की झांकियां मेरे गुजश्ता दौर से मेल खाती हैं, जो इस पच्चीसी में खुद को पाते हैं। औपचारिकता को किनारे रख पच्चीसी के घटनाक्रम को आगे बढ़ाता हूँ...अन्यथा बातें तो यूंही चलती रहेंगी।)

गतांक से आगे-

ज़िंदगी जवानी की दहलीज पे दस्तक देेने के लिये खासी उत्सुक हो रही थी...पर अब तक जवां नहीं हुई थी। लेकिन यकीन मानिये सबसे ज्यादा नटखट अहसास जवां होने के तनिक पहले ही दिल में पैदा होते हैं। अंग्रेजी और संस्कृत साहित्य से बैचलर डिग्री कर रहा था तो शेक्सपियर, मारलो, कीट्स, शैली और वर्ड्सवर्थ जैसे कवियों का रोमांटिज्म सिर चढ़ रहा था तो दूसरी तरफ कालिदास, माघ और भास जैसे कवियों का साहित्य मन को और मनचला बना रहा था। प्रेम, दरअसल उम्र के पड़ाव की एक बेहद नैसर्गिक क्रिया होती है जब सहज पैदा हुए जज़्बात अपना आसरा जहाँ-तहाँ तलाशते हैं। प्रेम, का कोई निश्चित रूप नहीं होता और ये अहसास जीवन में पूर्व अनूभूत भी नहीं होते तो अक्सर इन अहसासों की तलाश कई मर्तबा हमको भटका देती है और वर्तमान की नवसंस्कृति प्रायः प्रेम की खोज शारीरिक आकर्षण या संभोग में तलाशती नज़र आ रही है क्योंकि वर्तमान का साहित्य और सिनेमा दोनों ही मजबूरन उस तरफ हमें धकेल रहा है। हालांकि दोष साहित्य या सिनेमा का नहीं है क्योंकि सांस्कृतिक बदलाव को जो रूप हमें इन पर देखने को मिल रहा है वो समाज का ही सच है पर diffusion of innovation के सिद्धांत को समझते हुए बात करें तो यह ज़रूर कहा जा सकता है कि प्रेम के कुत्सित रूप को व्यापक बनाने में ये निमित्त ज़रूर हैं।

बहरहाल, मैं इक्कीसवी शताब्दी में भी कालिदास और मिल्टन, मारलो, धर्मवीर भारती जैसे साहित्यकारों को पड़ रहा था। इसलिये मुझमें विकसित हुआ रोमांटिज्म चेतन भगत, रविंद्र सिंह जैसे लेखकों के साहित्य में उद्धृत रोमांटिज्म से काफी अलग था और बस इसलिये दिल में प्रेम को पाने की भावनात्मक तड़प तो थी पर उसमें वासनात्मक पक्ष काफी गौढ़ था। नहीं था ऐसा मैं नहीं कह सकता क्योंकि प्रेम का वृक्ष मन-मस्तिष्क और देह के सामुहिक उपक्रमों के उपरांत ही पल्लवित होता है। मन इसमें भावनात्मकता का संचार करता है, मस्तिष्क इसे बौद्धिक बनाता है और देह के कारण ये होता है वासनात्मक। हार्मोनल चेंजेस तो थे पर भावनात्मक पक्ष मजबूत होने के कारण कभी अपनी मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं किया और इन सब वजहों से ही कई मर्तबा अपने दोस्तों के बीच मैं गये-गुजरे सिद्धांतों को मानने वाला दकियानूस इंसान भी कहलाया गया।

मन ने विचलित होने की पुरजोर कोशिश की। जैसा मैंने ऊपर बताया न कि इस उम्र के जज़्बात अपना आसरा तलाशते हैं। कालिदास की एक उक्ति है 'कामी सुतां पश्यति' अर्थात् कामी व्यक्ति हर तरफ अपने अनुकूल चीजें तलाशता है। तो अब सिनेमा और संगीत की ओर भी बेइंतहा दिल ललचा उठा और खालिश प्रेमकथाओं में डुबी हुई फ़िल्में दिल को रुचने लगी, ऐसा प्रायः हर युवा के साथ होता है। लेकिन अभी तक मैंने अठारहवे बसंत को पार नहीं किया था इसलिये जो इन फिल्मों और साहित्य से सीखकर मन की व्याख्या होती थी वो बहुत ही सतही और भटकाने वाली होती थी। वास्तव में कच्ची उम्र और अनुभवहीनता के कारण युवाओं में जो बगावती तेवर पैदा होते हैं उसमें बहुत बड़ा हाथ फ़िल्मों और हमउम्र साथियों का ही होता है क्योंकि नासमझी की ये व्याख्याएं हमें कई बार इतना नीचे गिरा देती हैं कि जीवन में उनसे उबर पाना ही बहुत मुश्किल हो जाता है। यही कारण है कि ऐसे में माँ-बाप का सख़्त संरक्षण और अनुभव बहुत आवश्यक होता है। लेकिन इस कठिनतम दौर में मैं अपने माँ-बाप से कोसों दूर बैठा था भटकने की संभावनाएं प्रबल थी। लेकिन मैं शुक्रगुजार हूँ उस दौर के अपने दोस्तों का जिनकी संगति और मार्गदर्शन ने मुझे अपनी हदों में बांधे रखा।

मेरे साथ एक चीज़ हमेशा रही कि बेहद कम उम्र में शिक्षा अर्जित करते हुए मैं आगे बढ़ रहा था इसलिये जो सहपाठी मुझे मिलते थे वे उम्र में काफी बड़े और अनुभवी होते थे और एक बहुत बड़ा कारण यह भी रहा कि उनकी संगति के कारण मुझमें हमेशा उम्र से पहले ही कई चीज़ों को लेकर परिपक्वता आती रही। हालांकि बचकानी प्रवृत्तियां भी कम नहीं थी पर बौद्धिक तौर पर समझ ज़रूर कुछ जल्दी विकसित हो ही रही थी। यहाँ मैं अपने कुछ ऐसे ही दोस्तों को याद ज़रूर करना चाहुंगा। जिनमें सबसे खास थे अमित, रोहन, विक्रांतजी, सन्मति, विवेक, निपुण, जीतेन्द्र, अभय अंकित। हालांकि ये लिस्ट बहुत लंबी हो सकती है क्योंकि मेरी समझ और सीख के कारण कई मित्र हैं पर जिनके नाम यहाँ मैंने लिये उन्होंने मेरी नादानियों और नासमझियों को सबसे ज्यादा झेला। मेरे अत्यंत उजड्ड और अहंकारी स्वभाव को सहा और मेरे लाख बुरे बर्ताव के बावजूद ये मेरे साथ जुड़े रहे। लेकिन मेरी उन आदतों को सहते हुए मुझे समझाते रहे और दिल से मेरी तरक्की के सहभागी बने रहे।

चुंकि मेरी हॉस्टल लाइफ अब अपने अंतिम पड़ाव में चल रही थी इसलिये सभी से याराना कुछ ज्यादा ही हो गया था क्योंकि हम जानते थे कि अब अलग हुए तो फिर यादों में ही मुलाकात होगी वरना ज़िंदगी की व्यस्तताओं में दोस्तों की प्राथमिकता रह ही कहाँ जाती है। दोस्ती बस एक कोरी रस्म ही बनकर रह जाती है और यही सोचते हुए हम हर एक दिन, हर एक पल को खुल कर जीना चाहते थे और हररोज़ कुछ न कुछ तिकड़मी और अनोखा करने की जुगत में लगे रहते। स्नातक के अंतिम वर्ष के छात्र होने के कारण हम सबसे सीनियर छात्र हुआ करते थे और विभिन्न सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं अन्य दूसरी गतिविधियों को करवाने का जिम्मा हम पर ही हुआ करता था। उस वर्ष मुझे औऱ मेरे मित्र रोहन को इन सब आयोजनों का प्रमुख नियुक्त किया गया था तो अधिकार और जिम्मेदारी का प्रथम अहसास तभी महसूस हुआ था। इन अधिकारों और जिम्मेदारियों के आने की वजह से रुतबा भी बड़ा हुआ लगता था और हम अपने ही अहंकार में फूले घूमते थे।

जो भी था, सब बड़ा मजेदार था और अब यादों के इन झरोखों से कूदकर वापस उन्ही दिनों को पा लेने की आरजू दिल में पैदा होती है पर हमेशा निर्मम यथार्थ हमें वर्तमान में खींच लाता है। वो नादानियां, वो वेबकूफियां भले कितनी ही नासमझ क्युं न हों पर उनका यादों में किया स्मरण बड़ा सुकून देता है और आज हम भले ही रुतबा, पैसा और अथाह प्रतिष्ठा पालें पर वो गुजरे दौर की ठलुआई सा मजा कभी नहींं दे सकती। हम आज तरक्की के जेट पर सवार हो भले देश-दुनिया की सैर कर आयें पर ये सब उस दौर की उस आवारगी के आनंद को छू भी नहीं सकती, जब हम दोस्तों के साथ नंगे पैर सड़कों पर टहला करते थे और सिटी बस में खड़े-खड़े धक्के खाया करते थे। वो दौर एक बार फिर अच्छे से जीने का जी करता है क्योंकि उस दौर को अक्सर हम बड़े और कामयाब बनने की चाह में यूं ही ज़ाया कर देते हैं। सच, चीज़ों की कीमत उनके दूर चले जाने के बाद ही समझ आती है............................

ज़ारी................

Thursday, July 24, 2014

मेरी प्रथम पच्चीसी : आठवीं किस्त

(पिछली किस्त पढ़ने के लिये क्लिक करें- पहली किस्त, दूसरी किस्ततीसरी किस्तचौथी किस्त, पांचवी किस्तछठवी किस्तसातवी किस्त)

(कलम की रेलगाड़ी पे बैठ यादों के सफ़र पे निकले मैंने अपने अतीत के नज़ारों को एक बार फिर जीने की कोशिश की...पर अब भी बहुत कुछ है जो आगे इस सफ़र में आयेगा। अतीत में झांकना कई मर्तबा बड़ा प्रेरक होता है तो कई बार ये आंखें नम भी कर देता है। गुजरे दौर का वो वक्त जिसमें हम रोये थे उसे सोचकर हंसी आती है और जिन लम्हों में हम हंसे थे उन्हें सोचकर रोना आता है पर दोनों ही तरह के लम्हों को याद कर अधूरापन तो सालता ही है क्योंकि ये कसक हमेशा बनी होती है कि अब फिर हम उन लम्हों को नहीं जी पायेंगे। जो बीत गया सो बीत गया...लेकिन यादों और किस्सागोई के जरिये अतीत के पुराने पड़ चुके पन्नों पर से धूल ज़रूर झाड़ी जा सकती है। लेकिन इस ताजगी के लिये एक सच्चे हमदर्द, हमसफ़र की तलाश होती है और उसका मिलना ही शायद सबसे मुश्किल है..और इस मुश्किल घड़ी में कलम ही सच्ची मित्र बनकर सामने आती है और आज के इस सायबर युग में उस मित्र का काम कर रहा है ये चिट्ठाजगत..बस इसीलिये अपनी यादों के इडियट् बॉक्स से कुछ चिट्ठियां निकाल यहां बिखेर रहा हूँ.... )

गतांक से आगे-

दोस्तों का नया हुजूम जुड़ रहा था और पुराने दोस्तों की दिल के आंगन से धीरे-धीरे विदाई हो रही थी। हालांकि विदा हुए कुछ दरख़्त कई मर्तबा रूह में  ऐसे चिपक जाते हैं कि ताउम्र उनकी कचोट हृदय को उद्वेलित करती रहती है। लेकिन उस अर्धपरिपक्व उम्र का कोेई पुराना दरख़्त मेरी रुहानी दहलीज पर न टिक सका। दरअसल  ये मानव स्वभाव है कि 'नज़रों से दूर तो दिल से दूर'। नयी-नयी नज़दिकिया हर बार प्राथमिकताएं बदल देती हैं और ऐसा ही कुछ मेरे साथ था। अपने इस आशियाने के जिन साथियों से ट्युनिंग बैठना थी वो बैठ गई थी और जिनसे नहीं बैठना थी उनसे अनचाहे ही दूरी बनी हुई थी। मेरे बेहद जिद्दी और अहंकारी स्वभाव के कारण दोस्ती कम दुश्मनी ज्यादा होती थी। उस स्वभाव के कुछ छींटे आज भी कायम है और अपनी कमी जानते हुए भी खुद को सुधार पाना बड़ा मुश्किल होता है। बुद्धि, हालातों को समझ सब कुछ सामान्य कर देना चाहती है पर अहंकार चीज़ों को जटिल करता जाता है। इससे पता चलता है कि समस्त ज्ञान और विवेक के लिये अहंकार, रोष और क्रोध जैसे विषाक्त जज़्बात कितने घातक हैं। मुझे अच्छे से याद है कि मेरी कक्षा के कुल 35 विद्यार्थियों में से 16 छात्रों से मैं एक ही समय पर दुश्मनी पाले बैठा था और प्रायः इन सबसे ही मेरी बात नहीं होती थी। कुछ दूरियां तो ऐसी थी कि उस परिसर में पांच साल तक पड़ने के बावजूद मैंने उन लोगों से कभी बात नहीं की। वक्त बीतने के साथ हम ये भूल जाते हैं कि हमने किस वजह से बैर पाला था पर उस बैर से बड़ी हमारेे बीच की दूरी बन जाती है...गलतियों की खाई को भरना बहुत आसान है पर दूरियों की खाई गहराती ही जाती है।

कक्षा बारहवीं बोर्ड परीक्षा होने के वजह से हमें उस हॉस्टल में कुछ विशेष रियायतें मिला करती थी। लेकिन उन आजादियों को हम प्रॉडक्टिव काम करने के बजाय फिजूल के कामों में ज्यादा खर्च करते थे। जैसे धार्मिक कक्षाओं, पूजा-प्रार्थना से हमें छुट्टी दी जाती तो हम शॉपिंग, खेल-कूद या सोने में अपना वक्त ज़ाया करते, बस से हमें कॉलेज के लिये भेजा जाता तो किसी सिनेमाहॉल में फ़िल्में देखने चले जाते। तब ये सब करने में बहुत मजा आता था पर आज सोचते हैं तो लगता है कि उस वक्त का कुछ बेहतर उपयोग किया जा सकता था पर जीवन की कड़वी सच्चाई यही है कि सारी समझदारी वक्त बीतने के बाद ही आती है। ज़िंदगी के उस दौर में गुटबाजी का भी सुरूर छाया रहता था और अपना एक दल बनाकर खुद को तीसमारखां साबित करने की जुगत सवार रहती और उस गुटबाजी में खूब राजनीति होती और दूसरों को नीचा और खुद को ऊंचा दिखाने की कोशिश करते। तत्कालीन स्कूल या हॉस्टल में होने वाली प्रतियोगिताओं में अव्वल आने के लिये साम-दाम-दंड-भेद सबका सहारा लेते और अपनी लकीर लंबी करने के लिये प्रायः दूसरों की लकीर मिटाने से भी मैंने गुरेज़ नहीं किया। प्रतिस्पर्धाएं हमें आगे बढ़ाने के लिये होती है लेकिन हमें पता ही नहीं चलता कि चारित्रिक तौर पर हम कई बार बहुत पीछे चले जाते हैैैै क्योंकि प्रतिस्पर्धा के साथ राजनीति और कूटनीति भी सहज व्यक्तित्व का हिस्सा बनती है और जीवन में राजनीति का प्रवेश होने के बाद नैतिकता बहुत दूर चली जाती है।

प्रतिस्पर्धा का असली चरम क्रिकेट के मैदान पर नज़र आता था। जिसके लिय की जाने वाली तैयारियां और हमारे द्वारा बनाई जाने वाली रणनीतियां कुछ ऐसी हुआ करती थी मानो भारतीय टीम का ओलंपिक में प्रतिनिधित्व करना है। हर वर्ष दिसंबर-जनवरी में हॉस्टल में खेल-कूद प्रतियोगिताओं का आयोजन होता..मुझे याद नहीं आता कि उस समय क्रिकेट टूर्नामेंट जीतने पर हासिल हुई प्रसन्नता जैसी खुशी कभी और मिली हो। 31 दिसंबर 2003 को क्रिकेट कप जीतने के जज़्बात आज भी चेहरे पे मुस्कान और गौरव का संचार कर देते हैं। यकीनन वो  कोई बहुत बड़ा अचीवमेंट नहीं था, जीवन में उसके बाद कई उपलब्धियां आयी पर कोई भी उपलब्धि उस अदनी सी सफलता जैसी खुशी नहीं दे पाई।  अपने हॉस्टल की साहित्यिक-सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं में भी अब कुछ-कुछ रुतबा कायम होता जा रहा था जिससे आत्मविश्वास का संचार भी होने लगा था और जब आत्मविश्वास बढ़ता है तो सब अच्छा लगने लगता है। उस साल बारहवीं की परीक्षा में भी अच्छे खासे प्रतिशत से पास हुआ था तो जिस हॉस्टल की दीवारें पहले काटने दौड़ा करती थी वहीं अब अपने घर से भी प्यारी लगने लगी। उन दोस्तों से अब जज़्बाती गांठ जुड़ चुकी थी। बहुत कुछ सीखते हुए जिंदगी बढ़ रही थी तो बहुत कुछ चूक जाने का मलाल आज भी बना हुआ है। वैसे हम चाहे कितना कुछ भी क्युं न हासिल कर लें..जिंदगी के साथ कुछ 'काश' तो जुड़े ही रहते हैं।

हॉस्टल में सीनियर हो जाने का भी गजब का आनंद रहा करता था और जुनियरों के सामने शेखी बघारने में भी बहुत मजा आता था। इस प्रवृत्ति से मैं भी बहुत अच्छे से ग्रस्त था..और कई झूठी-सच्ची बातों के सहारे खुद को महान् बताने का कोई मौका नहीं छोड़ता था। भाषण, वाद-विवाद जैसी प्रतियोगिताओं में तब अच्छा खासा नाम हो गया था तो दूसरों को ज्ञान देने के बहाने भी मिल गये थे। उम्र के नाजुक दौर में अहंकार बहुत जल्दी दस्तक देता है और मैं तो वैसे ही जरा सी तारीफों से बढ़प्पन के भाव से ग्रस्त हो जाता था..तो जब भी तारीफें होती तो खुद को महान् और दूसरों को तुच्छ देखने की एक बेहद घटिया प्रवृ्त्ति का आविर्भाव अंतस में हो गया था। यदि उम्र बढ़ने के बावजूद भी हम इस प्रवृत्ति से घिरे हुए हैं तो समझ लीजिये हम बड़े हुए ही नहीं है। जीवन में आये कई उतार-चढ़ावों ने कमसकम दूसरों को हीनता से देखने का भाव को तो ख़त्म कर ही दिया। हाँ तारीफों के चलते आने वाला अहंकार का भाव आज भी बहुत हद तक बना हुआ है..इसलिये हमेशा लोगों की तारीफों से दूर भागने की कोशिश करता हूँ ताकि यथार्थ के नजदीक रह सकूं।

तकरीबन उसी साल मतलब उम्र के सोलहवें वर्ष में एक बड़ी धार्मिक सभा में प्रवचन करने का पहली बार मौका मिला था। जो कि हमारे उस हॉस्टल की परंपरा का हिस्सा होता था और हर छात्र उस स्वर्णिम अवसर में अपना सर्वस्व देने की कोशिश करता था। मुझे जब ये अवसर मिला तो लंबी तैयारी के बाद जब मैंने उस सभा में धूम मचाई तो लोगों की तारीफों ने एक बार फिर अभिमान को शिखर पर पहुंचा दिया। इसी तरह की छुटमुट उपलब्धियां इकट्ठी होती हुई नाम तो बड़ा कर रही थी पर दृष्टिकोण में ऊंचाई नहीं आयी थी और संकीर्ण मानसिकता की कई परतें अब भी चढ़ी हुई थी। जिन्हें आगे चलकर धीरे-धीरे ज्ञानार्जन से ही दूर किया जा सका। पूर्वाग्रह और दुराग्रह तो आज भी होगा और वो जाते-जाते ही जाता है क्योंकि सीखना ताउम्र जारी रहता है..लेकिन जज़्बाती और शैक्षिक परिवर्तन का वो एक मोड़ था जिस पर सबसे ज्यादा सीख भी मिली और परिपक्वता भी आई। उसी वर्ष पहली बार बिना किसी गार्जियन के देश के कई बड़े शहरों को घूमने का मौका मिला..जब शिविरों और संगोष्ठियों के लिये हमें वक्ता के तौर पर बाहर भेजा जाता और सफ़र से ज्यादा सीख देने वाली और कोई चीज़ नहीं हो सकती। दिल्ली, शिमला, पूना जैसे कई छोटे-बड़े शहरों को अकेले या दोस्तों के साथ घूमा...मजा भी बहुत आया, डर भी दूर हुआ और स्वावलंबी होने के क्रम मे कुछ सोपान और चढ़े। सबकुछ बड़ा वंडरफुल था..अपनी हॉस्टल लाइफ का विस्तृत वर्णन मैंने एक अन्य ब्लॉग पर स्मारक रोमांस और पिंकिश डे इन पिंक सिटी नामक श्रंख्ला में कर चुका हूँ इसलिये यहाँ ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा।

बहरहाल, जीवन का सोलहवां बसंत पार हो रहा था और अब कुछ नटखट और नादान अहसासों का भी ज़िंदगी में प्रवेश हो रहा था। समझदारी के साथ अय्याशी की चाहत भी बढ़ रही थी। एक तरफ संस्कार थे तो दूसरी तरफ मनचले मन की कश्मकस...दोनों का खूब संघर्ष हुआ और इस संघर्ष के कारण जिंदगी के अगले हिस्से मजेदार और जीवंत बने। रुकता हूँ अभी..उन पलों के साथ फिर लौटूंगा.................

Monday, June 16, 2014

मेरी प्रथम पच्चीसी : सातवीं किस्त


(स्वांतसुखाय लिखा जा रहा मेरी ज़िंदगी का ये संस्मरण अब तक आधे रास्ते में भी नहीं पहुंच पाया है..क्योंकि अपने गुजश्ता दौर की जुगाली कर उसे सम्यक् तौर पे पेश करने के लिये एक खास तरह के मूड़ की दरकार होती है जो हमेशा नहीं रह पाता..यही वजह है कि तकरीबन एक साल से मेरी प्रथम पच्चीसी के प्रारंभिक 13-14 वर्षों को ही बयां कर पाया हूँ..बहरहाल, ज़िंदगी के अब कुछ खुशनुमा पलों से बाकिफ़ कराना है तो चलिये चलते है अतीत के उस दौर में-जिस वर्ष नेटवेस्ट ट्राफी जीत युवराज और कैफ हीरो बने थे, जब अक्षरधाम और संसद पे हुए आतंकी हमले ने देश को दहलाया था, जिस वर्ष डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम की राष्ट्रपति पद के लिये ताजपोशी हुई थी..जी हाँ सन्-2002)

अपना घर-आंगन छोड़ एक बार फिर अपनी पुस्तैनी गलियों से दूर जा रहा था..दिल में तनिक भी ख्वाहिश नहीं थी उस अंगने को युं छोड़ आगे बढ़ जाने की..पर दुनिया के निर्मम यथार्थ और किसी अनजाने तथाकथित भविष्य को संवारने मां-बाप के जतन भी जारी थे और वो मुझे उस गाँव की मिट्टी से दूर गुलाबीनगरी की धरा पर पटक आना चाहते थे। ताकि मुझमें भी संस्कारों का संचार हो सके, मैं भी कोई ख्यातलब्ध हस्ती बन सकुं, जहाँ मेरे हुनर को तराशा जाये और इस काबिल बनाये जा सके कि इस फानी दुनिया में खुद के बल पे अपने अस्तित्व को टिकाये रख सकूँ। पर उस नादान बचपन की कहाँ इतनी आरजू होती है कि बड़े होकर अफसरी का लिबास मिले, लाखों-करोड़ों की संपत्ति जुटाई जाये, देश-दुनिया में अपनी शोहरत कमाई जाये। तब तो बस क्रिकेट का कोई दस-ग्यारह रुपये का मैच रखकर उसे जीत लेते थे तो लगता था कि हमसे बड़ा शहंशाह कोई नहीं है, कभी स्कूल के चार दोस्त अपने बड़बोलेपन की तारीफें कर देते तो लगता दुनिया की सारी शोहरत अपने ही कदमों में हैं..घर आयी कोई मौसी या बुआ 10-5 रुपये नेग के बतौर दे जाती तो लगता अपना लाखों का बैंक बेलेंस हो गया है पर ये नादानी थी..हम वो नहीं समझते जो हमारे बड़े समझते हैं। लेकिन एक बात है कि नादानी की ये खुशियां हमें कभी समझदारी से हासिल नहीं हो सकती..क्योंकि नादानी स्वप्न दिखाती है और समझदारी यथार्थ से रुबरू कराती है और सपनों का सौंदर्य यथार्थ से कई गुना खूबसूरत होता है।

खैर, रोते-गाते और जोर-जबरदस्ती के सहारे मेरी मम्मी और मामा ने मुझे अपने उस गांव से दूर कर ही दिया..2002 की 4 अगस्त को मैंने पहली मर्तबा जयपुर की जमीं पर कदम रखा। पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट। जी हाँ यही वो आसरा था जहाँ अगले पाँच सालों के लिये मेरा डेरा जमने जा रहा था..दरअसल जिस्मानी तौर पर तो मेरा इस संस्थान से साथ सिर्फ 5 सालों के लिये जुड़ा पर रुहानी स्तर पे मेरा पूरा जीवन ही इस संस्थान का गुलाम हो गया। मेरे इस वाक्य से इतना तो समझ आ ही गया हो गया कि इस संस्थान की मेरे जीवन में क्या अहमियत रही है..भले ही पहले बहुत न-नुकर की यहाँ आने के लिये पर एक बार यहाँ जमा तो फिर हमेशा के ही लिये इसका हो गया। कहने को तो ये एक जैन संस्था है..पर यहाँ से मुझे मानवता और सांस्कृतिक मूल्यों के ऐसे पाठ सीखने मिले जिसने ज़िंदगी की बाकी राह खुद ब खुद आसान कर दी। मेरे इस वाक्य से ये न समझना कि यहाँ पढ़ लेने के बाद मेरी ज़िंदगी में विपदायें आना बंद हो गई..विपत्तिेयें तो भरसक आयी और आज भी आती हैं पर अब कोई विपत्ति मुझे चित नहीं कर पाती..हां मैं विचलित ज़रूर होता हूँ और गिरता भी हूँ पर इस संस्थान से मिली शिक्षा मुझे फिर खड़े होकर तेज चलने की प्रेरणा दे देती है।

बहरहाल, मैं जयपुर आ चुका था...और लगभग चार दिन बीत जाने के बाद भी मेरा तनिक भी मन यहाँ रुकने का नहीं था..मेरे इस रवैये से मम्मी और मामा को खासे मानसिक त्रास से गुजरना पड़ रहा था। कई लोगों के समझाने के बाद भी दिल अब भी उन्हीं गांव के खेल मैदानों और अपने घर के सामने वाले बरामदे में लगा हुआ था..पर कहना चाहिये कि मेरी होनहार अच्छी थी जो लाख न चाहते हुए भी मेरी मानसिक स्थिति वहाँ रहने के अनुकूल बनी..और इसके लिये मैं दो व्यक्तियों के योगदान को ज़रूर स्मरण करना चाहूंगा-एक मेरे क्लासमेट अमितजी को और दूसरे हमारे संस्थान के तत्कालीन अधीक्षक धर्मेंद्र शास्त्री को..जिनकी हिदायतों ने तब न जाने मुझपे क्या असर किया कि बंदा उन दीवारों में खुद को बांधने के लिये तैयार हो सका।

मैं जयपुर में रुक चुका था..शुरु-शुरु में सब अजीब था। दोस्त कोई था नहीं और जो साथी थे वो मेेरे देहाती लहजे को लेके मजाक भी उड़ाया करते थे और पता लग रहा था कि यार भले अपन अपने गांव के बल्लम खां हैं पर इस भीड़ में अपनी शख्सियत गंगुतेली से गई बीती है। उस संस्थान में कई प्रतियोगिताएं और स्पर्धाएं  होती जिनमें भाग लेने को बहुत जी चाहता पर कभी हिम्मत नहीं जुटा पाता और कभी हिम्मत जुटा के उनमें हिस्सा लिया भी तो अपने आत्मविश्वास की कमतरी का बहुत जुर्माना भरना पड़ा..जी हाँ जिल्लत झेलनी पड़ी जिससे मरे-कुचे आत्मविश्वास की और बारह बज गई। अपना कोई अस्तित्व ही नहीं था उन शुरुआती दिनों में..इसलिये अपनी हस्ती को बनाये रखने के लिये कुछ हुनरमंद और गुंडा टायप दोस्तों की मंडली में दरबारी कवि होने का काम करने लगे..दरबारी कवि बोले तो उनकी चमचागिरि करने लगे। ताकि किसी न किसी तरह पहचान बनी रहे।

जिस-तिस प्रकार उन हालातों से सामंजस्य बिठा रहे थे..और जमके मस्तियों के संंग गलबाहियां कर रहे थे। जयपुर के सारे हॉटस्पॉट चंद महीनों में ही घूम लिये उसका कारण ये था कि मन में ये सोच बन गई थी कि बस एक साल पढकर यहाँ से कलटी मार लेना है..ऐशो-आराम की कोई सुविधा नहीं थी, अनुशासित जीवन शैली, समय की सख़्त पाबंदियां और विलासिता रहित दिनचर्या। इन हालातों में भला नादान दिल कहाँ चैन पा सकता है और इसलिये मैं भाग जाना चाहता था। हालत ये थी कि कभी टीवी पे क्रिकेट मैच आ रहा हो तो बाजार की किसी दुकान पे या किसी होटल में रखी टीवी पे जमीन पर बैठ के उस क्रिकेट मैच का लुत्फ़ लिया क्योंकि टीवी, मोबाइल, इंटरनेट जैसे साधन उस माहौल में और तब के वक्त में हमें नहीं हासिल थे। बहुत सारी चीज़ों में आत्मनिर्भरता भी आ रही थी। अपने बैंक संबंधी, स्कूल-कॉलेज संबंधी सभी काम खुद सेे करना, खुद कपड़े धोना, अकेले सफ़र करना ऐसी कई चीज़ें उस नन्ही उम्र में सीख रहे थे जिससे खुद में जिम्मेदारी का अहसास भी हो रहा था। अबसे पहले तक इन सब कामों को करने के लिये मम्मी-पापा पे आश्रित थे। लेकिन ये आत्मनिर्भरता अंदर ही अंदर एक स्वतंत्र व्यक्तित्व को ग़ढ़ रही थी। ये तब तो हमें बढ़ा कष्टकर जान पड़ता पर आज जब उसे देखते हैं तो मां-बाप और किस्मत को शुक्रिया अदा करने को जी चाहता है।

हमें नया आकार देते हुए समय का पहिया अपनी गति से चल रहा था..और हम उस माहौल को एडजस्ट भी करने लगे थे और उस एडजस्ट करने में कहीँ संस्थान के नियमों से रिश्ता जोड़ लिया था तो कुछ नियमों को तोड़ दिया था। मुझे अच्छे से याद है जब हमने 2003 का वर्ल्ड कप देखने के लिये उस संस्थान में गैरकानूनी ढंग से एक छोटा टीवी खरीदकर रखा था क्योंकि दक्षिण अफ्रीका में हुए उस वर्ल्डकप के अधिकांश मैच देर रात तक चलने वाले थे और तब हॉस्टल के बाहर जाकर कहीं टीवी देख पाना तो संभव नहीं था न। नियमों की सख्ती के बीच कोई अपने मन का काम कर लेने का मजा ही कुछ और है..पर हाँ ये ज़रूर है कि मैंने वहाँ रहते हुए भले कितने ही नियम तोड़े पर कभी खुद को अनैतिक नहीं होने दिया..मेरी स्वच्छंदता ने कभी उद्दंडता का रूप  अख्तियार नहीं किया.. इसका कारण मेरे परिवार और माँ-बाप के संस्कार ही हैं जिनकी बदौलत नियमों को भी नियमों के दायरे में रहते हुए तोड़ा। ज़िंदगी बढ़ रही थी और मेरे अंदर एक नयी शख्सियत अपना रूप गढ़ रही थी...घटनाएं तो कई हैं जिन्होंने मुझे आकार दिया पर सबका ज़िक्र न संभव है और न ही रोचक। इसलिये ठहरते हैं पर अगली किस्त में कुछ नयी घटनाओं और नये जज़्बातों के साथ फिर हाज़िर होता हूँ..........................

ज़ारी.........

Monday, April 14, 2014

मेरी प्रथम पच्चीसी : छठवी किस्त


(जीवन की अब तक यात्रा में अपने बचपने के कुछ छुटमुट संस्मरण प्रस्तुत किये हैं...इनमें घटनाओं के स्तर पर बहुत कुछ चमत्कारिक एवं सनसनीखेज नहीं है पर जज़्बातों का फ्लेवर पूरी संजीदगी से पिरोया है..हालांकि व्यस्तताओं और कुछ दूसरी वजहों से इस पच्चीसी की किस्तें काफी इंतज़ार के बाद प्रस्तुत कर पा रहा हूँ..पर लिखने से पहले हमेशा अपने मूड को टटोल लेता हूँ ताकि कुछ भी अतिरेकपूर्ण न लिखा जाये...क्योंकि अतिरेक किसी और के साथ नहीं अपितु मेरे स्वयं के साथ ही छल करने के समान होगा...चलिये प्रस्तुत करता हूं अपनी आगे के सफ़र की कहानी।)

गतांक से आगे-

अपना ननिहाल मुझे किसी तरह भी तरह रास नहीं आ रहा था..अपने आंसुओं की गंगा-जमुना बहाने के बावजूद भी मम्मी-पापा मानने को तैयार नहीं थे और मुझे अपने बेहतर भविष्य को संवारने वे उसी ज़मीं पर पहुंचा देना चाहते थे। बचपन से उत्पाती था इसलिये हर तरह के पैंतरे अपनाता था कई बार आत्महत्या करने के कुछ झूठे नाटक भी प्रस्तुत करता था। अब बताईये भला उस छोटी सी उम्र के बालक को ये कैसे पता कि हत्या-आत्महत्या क्या होती है..लेकिन आजकल टीवी ने बच्चों को बहुत ही सयाना बना दिया है और वे बड़ी आसानी से इस कृत्य का प्रयोग इमोशनल अत्याचार करने के लिये करते हैं..मैं भी वैसा ही कुछ कर रहा था। जिससे मेरे मां-बाप तो नहीं घबराते पर इसका असर नानी पर ज़रूर हो गया और उन्होंने मुझे वापस भेजने का फैसला कर ही लिया। कक्षा दसवीं की तकरीबन एक माह की पढ़ाई छिंदवाड़ा में करने के बाद मैं वापस अपने गांव में था..और बेइंतहा खुश था लेकिन घरवालों का रवैया मेरे लिये उस तरह प्रेमपूर्ण नहीं था जैसा कि एक बच्चे के लिये होना चाहिये। उसका कारण ये था कि मैंने उनके सपनों का क़त्ल किया था और उन्हें लगता था कि इस गांव में रहते हुए भला मैं क्या कर पाउंगा....

मम्मी-पापा का सोचना भी सही था क्योंकि उस गांव के माहौल से मुझे कभी भी आज की दुनिया की माडर्न रीत-नीत नहीं मिलने वाली थी और मैं उस तथाकथित गंवारु और बंजारेपन की फितरत को ही आत्मसात् करता और वो चरित्र आज के युग के जेंटलमैन कल्चर के विरुद्ध है जिसे कोई भी सभ्यता का उपासक मंज़ूर नहीं कर सकता। लेकिन मां-बाप द्वारा किये जाने वाले उपेक्षापूर्ण बर्ताव ने मुझे अंदर ही अंदर अपराधबोध के भाव से भर दिया था...और कई बार मुझे मेरे वापस लौट आने के फैसले पर पछतावा भी होता था..पर फिर भी दोस्तों का साथ और मनमौजी-हुल्लड़मस्ती सभी चीज़ें भुला देती। अपने गांव में तो मैं राजा ही था भले अंधों में काना राज़ा ही सही..और यही सुरक्षा का भाव मुझे उस दायरे से बाहर निकलने की इज़ाजत नहीं देता था क्योंकि दुनिया में सिर्फ कांप्टीशन है, सिर्फ एक अंधी दौड़ है..प्रतिस्पर्धा की ये अंधी दौड़, हमसे अपना मूल वजूद ही छीन लेती है और एक गांव में पला-बड़ा बालक भला कैसे आसानी से उस प्रतस्पर्धा के मंच पर एडजस्ट कर सकता है...लेकिन मेरी किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था..और कालांतर में वो गांव भी छूटा और साथ ही छूट गई उस गांव की मासूम छांव..जो छांव मेरे अंदर निश्चल-निर्मलता को बरकरार रखे हुई थी...बाहर निकलकर पढ़ाई की, कांपटीशन में खुद को बेहतर बनाने के जतन किये और उस तमाम जतन के चलते..चरित्र में एक कुटिलता प्रविष्ट हो गई।

फिर वही गांव..फिर वही गलिया और फिर वही जीवन की आदतें..सुवह से शाम उन्हीं गिनी-चुनी हरकतों में गुज़र जाती। खाना-पीना-सोना और कामचलाऊ पढ़ना और ऐसे ही कुछ अदने से काम..बस यही थी जीवन की हकीकत और यही था ज़िंदगी का फ़साना। जिस फ़साने में मौज करने के लिये ज्यादा कुछ करने की ज़रूरत नहीं थी बस बिना सोचे, सतही से विचारों और सामान्य से ज्ञान के साथ जीने की ज़रूरत थी और वो तो जी ही रहा था, बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के। चंद किलोमीटर का फासला तय करके पूरा गांव नापा जा सकता था..जिस गांव में रास्ते भी पास ही पास थे और रिश्ते भी, खूब समय रहा करता था..पर महानता तो तब है जब रास्ते लंबे हों, मंजिल जटिल और व्यस्तताएं इतनी हो जहां न रिश्तों के लिये फुरसत हो और न ही जज़्बातों के लिये। प्रैक्टिकल बनना ज़रुरी है...पर गांव की ये शिक्षा तो सिर्फ सेंटीमेंटल ही बना सकती है और सेंटीमेंटल बनकर कभी विकास नहीं किया जा सकता।

बस इसी तरह मौज के साथ अपनी दसवीं कक्षा की पढ़ाई चल रही थी..दसवीं की ये परीक्षा गांवों में बहुत ही अहम् मानी जाती है और यदि आपने गांव में टाप कर लिया तो समझा जाता है कि आप ओलंपिक के स्वर्ण पदक विजेता है..मुझे भी इस परीक्षा की तैयारी में झोंका जा चुका था। जिस तरह शहरों में आईआईटी, आईएएस के कोचिंग सेंटर कुकुरमुत्तों की तरह नज़र आते हैं ऐसे ही गांवों में दसवी-बारहवी की परीक्षा के लिये कोचिंग सेंटर चलते हैं..मेरे घर के लोग इस महासंग्राम में अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते थे और मुझे गांव के तीन-तीन सर्वश्रेष्ठ कोचिंग सेंटर में पढ़ने भेजा जाता था..और शायद उन कोचिंग सेंटर की ही कृपा रही हो कि वहां से हासिल की गई तालीम की बदौलत बमुश्किल फर्स्ट डिवीजन बना के पास हुआ क्योंकि घर में पढ़ना क्या होता है इसकी दूर-दूर तक कोई जानकारी मुझे नहीं थी..कोचिंग और स्कूल के बाद यदि कोई चीज़ से मेरा लगाव था तो वो था क्रिकेट और इन तमाम चीज़ों के अलावा मेरा अगला गंतव्य क्रिकेट का मैदान ही होता था। इसलिये बोर्ड के उन एक्साम के बीच में भी क्रिकेट खेलने का कोई मौका नहीं छोड़ता।

खैर, जैसे-तैसे दसवीं की कक्षा पास की...और अब एक बार फिर उस सुनहरे भविष्य के लिये बाहर जाने का वक्त आ रहा था..मेरे घर वाले फिर खुद से दूर करने और ज़िंदगी पर पालिश करने मुझे किसी शहर में भेजने को तैयार थे...उनकी ज़िद भेजने की थी तो मेरी भी न जाने की। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था..हमारी जिद चाहे कुछ भी क्युं न हो, चलती हमेशा किस्मत की ही है और वो मुझे देश के इस हृदय स्थल से दूर, एक दूसरे ही प्रदेश में ले जा रही थी..गुलाबी नगरी। जी हां अगला सफ़र अब इस पिंक सिटी से शुरु होगा जो मेरे जीवन का असल मायने में यू-टर्न था...मैं वहां पहुंचने के लिये तैयार था और ज़िंदगी अपना एक अलग ही मुकाम तलाशने की कवायद में लग गई थी..चलिये उस कवायद और नये शहर की दास्तां अब अगली किस्त में सुनाई जायेगी..अभी यही रुकते हैं.............

ज़ारी.............

Saturday, January 25, 2014

मेरी प्रथम पच्चीसी : पांचवी किस्त

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(अपने जीवन की यात्रा का विवरण प्रस्तुत कर रहा हूँ..बहुत हद तक स्वांतसुखाय लिखा गया ये स्मरण, वास्तव में स्वयं की प्रेरणा के लिये है पर कुछ संघर्ष ऐसे हैं जो शायद किसी ओर के लिये भी प्रेरक साबित हो सके...जिंदगी के कुछ हिस्सों में भरपूर लफ्फाजी है तो कुछ बेहद ट्रेजिक लम्हों से भी दो चार हुआ। जो लम्हें रंगीन हैं वो यकीनन आप के बचपन की नटखट हरकतों को ताज़ा करेंगे लेकिन जो यादें त्रासदियों से लबरेज़ हैं वो एक हौंसले का संचार करेंगी, ऐसी मेरी आशा है...गुजश्ता किस्तों में काफी कुछ कह चुका हूँ अब उन पलों से आगे बढ़ने का वक्त है। हालांकि जैसा में पहले भी कह चुका हूँ कि सब कुछ कह पाना नामुमकिन है पर कम कहे गये में सबकुछ को समेटा ज़रूर जा सकता है..बस आप अल्फाज़ की जगह अहसास पढ़ने की कोशिश कीजिये)

गतांक से आगे-

कक्षा आठ की परीक्षा देने के बाद हर बार की तरह इस बार भी नानी के यहाँ छुट्टी मनाने गया था...जैसा कि बता चुका हूँ नानी के यहां जाना बड़ा ही रोमांचक हुआ करता था पर वहाँ एक हद तक ही मन लगता था उसके बाद वापस अपने गाँव लौटने की तलब मचा करती थी...लेकिन कुछ नाटकीय घटनाचक्र के कारण इस बार कि मेरी छुट्टियां लंबी होने जा रही थी...दरअसल अब मैं छुट्टियों के बाद वापस अपने घर लौटने वाला नहीं था और कक्षा नवमी में मेरा प्रवेश मेरे ननिहाल मतलब छिंदवाड़ा में ही होने जा रहा था। यह एक अहम् परिवर्तन था इसलिये थोड़ी घबराहट थी पर कुछ एडवेंचरर्स जैसी अनुभूति भी थी इसलिये थोड़ा जोश भी था.. लेकिन ये जोश कुछ हफ्तों में ही फ़ना हो गया और फिर उस जगह रहना मेरे लिये बस एक भार जैसा लगने लगा..धीरे-धीरे आत्मविश्वास भी मुरझाने लगा। कल तक जो मैं अपने आपको गाँव का शेर मानता था पर अब इस शहर में आकर अपने यथार्थ का भान हुआ और खुद को सब से काफी पिछड़ा महसूस किया और शायद इसी वजह से अब यहाँ स्कूल जाना, दोस्त बनाना, उनसे मिलना, पढ़ाई करना सब कुछ एक बोझ की तरह महसूस होने लगा। 

अपने आत्मविश्वास के कम होने का एक और कारण शायद नानी के घर के आर्थिक हालात भी थे  जिसके कारण मैं अपने संगी-साथियों में खुद को दीन-हीन महसूस करता था..जबकि अपने पैतृक निवास पे मैंने आला दर्जे की संपन्नता देखी थी पर यहाँ एकदम उल्टा ही था। स्वयं के तत्कालीन अहसासों की समीक्षा करता हूँ तो समझ आता है कि आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियां किस तरह से बालमन की बुनावट करती हैं और बचपन की उन अनुभूतियों के फलस्वरूप ही किसी व्यक्तित्व का निर्माण होता है...गोया कि बाहरी माहौल, आंतरिक वातावरण को आकार देता है जबकि ऐसा होना उचित नहीं माना जा सकता क्योंकि अंतर के वैचारिक परिवेश का निर्माण सद्ज्ञान और संस्कारों से होना चाहिये और उस आंतरिक परिवेश के अनुरूप हमें बाहरी वातावरण तैयार करना चाहिये। 

छिंदवाड़ा की इस भूमि पे रहते हुए एक और दुखद वाक़या मेरे साथ हुआ जब एक खेल के दौरान पेड़ पे से गिरने के कारण मेरे दोनों हाथ फ्रैक्चर हो गये और तकरीबन डेढ़ माह तक हाथों पर चढ़े प्लास्टर के कारण मैं उन सारे कामों से महरूम था जिनमें हाथों की ज़रूरत पड़ती है। उन पलों की अनुभूति बयाँ कर पाना ख़ासा मु्श्किल है पर ये समझ लीजिये कि जब महीने भर बाद मेरे प्लास्टर के खुलने की तिथि आई और एक्सरा रिपोर्ट में गड़बड़ी के चलते, उस प्लास्टर के खुलने की डेट को जब एक हफ्ते बढ़ा दिया गया..तो उस आगे बढ़े एक हफ्ते का वक्त मेरे लिये एक सदी के बराबर जान पड़ा था। कई बार ये सोच के अफसोस होता है कि हमें उपलब्ध चीज़ों की कीमत कभी समझ नहीं आती...न हम हाथों की कीतत समझते हैं न आँखो की, यहाँ तक की इस अनमोल जीवन की महत्ता का ख़याल भी हमें कभी नहीं आता। लेकिन ज़िंदगी के उन पलों ने मुझे कम उम्र में ही काफी कुछ सिखाया...इस कारण मुझे उन लम्हों से कोई शिकायत नहीं है और कहीं न कहीं उन लम्हों का ही योगदान है कि मैं जीवन में आने वाली आगामी विषमताओं के सामने मजबूती से खड़ा रहा। इस दौरान मेरा संघर्ष जो था वो अपनी जगह है पर मेरी नानी का मेरे लिये किया गया संघर्ष भी कुछ कम नहीं था..उन डेढ़ माह तक उनका जीवन सिर्फ मुझ तक केन्द्रित हो गया था..क्योंकि मैं इस कदर लाचार और निहत्था था कि मैं अपनी दिनचर्या की मौलिक चीज़े करने के लिये भी नानी का मोहताज़ बन गया था। नानी का मेरे लिये किये गये उस दौर के बर्ताव और समर्पण का मूल्य मैं किन्ही शब्दों से बयां नहीं कर सकता।

बहरहाल, इन कुछेक त्रासद पलों के अलावा कुछ बड़े ही रंगीन और महत्वपूर्ण जज़्बातों से भी मैं दो-चार हुआ..जिसमें सबसे ज्यादा अहम् चीज़ जो इस भूमि से मुझे मिली वो थी सांध्यकालीन पाठशाला। जिसमें भाग लेने हम हर शाम मंदिर जाया करते थे..इसने सद्ज्ञान, सत्चरित्र और संस्कारों का ऐसा बीजारोपण मुझमें किया जो ताउम्र मेरे चरित्र की मजबूती का आधार बना हुआ है। दरअसल, यह पाठशाला अधिकारिक तौर पे मेरी पहली धार्मिक-आध्यात्मिक शिक्षा का सोपान थी...बाद में ऐसे कई सोपानों से गुज़रते हुए मैंने आध्यात्मिक शिक्षा के शिखर तक की सैर की किंतु उस प्रथम सोपान की नींव को भुला पाना बहुत मुश्किल है। इसके अलावा मेरे दोस्त के घर में स्थित छोटे से ग्राउंड में हर शाम चार बजे क्रिकेट खेलने जाने का अपना अनुभव था...हर रोज़ मैं चार बजने का इंतज़ार किया करता, किसी दिन यदि मामा मुझे अपनी दुकान पे बैठा के बाहर चले जाते और इसी बीच क्रिकेट का टाइम हो जाता तो मन में अपने मामा को भी भला-बुरा कहने से नहीं चूकता था। क्रिकेट की इनकी रंगीनियों के अलावा हर सुवह कोचिंग को जाना, गवर्नमेंट कॉलेज में दोस्तों के भद्दे और अश्लील चुटकुलों को सुनना, चाहे जिसकी शादी-विवाह के फंक्शन में जाके तरह-तरह के व्यंजन खाना, स्कूल बंक करके पार्क में बैठना और न जाने ऐसे कितने तरह के अनोखे और मजेदार अनुभव थे जिनसे मैं पहली बार गुज़र रहा था...लेकिन इन अनुभवों से गुज़रते हुए मेरे अंदर एक व्यक्तित्व का सतत् निर्माण हो रहा था।

ये दौर 2000-2001 के दरमियां का है...नई सदी में दुनिया प्रविष्ट हो चुकी थी और मैं भी अहसासों की नई कशिश को महसूस कर रहा था। मेरे लिये ये जीवन का वो दौर था जब बचपनें ने पूरी तरह मेरा दामन नहीं थामा था और जवानी ने अब तक दस्तक नहीं दी थी..लेकिन अंदर ही अंदर कुछ तो बदल रहा था..और उस बदलाव के चलते कुछ विद्रोही जज़्बात रुह में दस्तक दे रहे थे तो कई रुमानी ख़यालों से भी दो चार होने लगा था..लेकिन उन नादान जज़्बातों में भटकने की सर्वाधिक संभावना थी..ऐसे में संगति सर्वाधिक असर करती है। जो उन जज्बातों को अपने अनुरूप आकार देने का माद्दा रखती है..खैर इन जज़्बातों का विवरण आगे की किस्तों में दूंगा..फिलहाल इन्हें स्किप कर आगे बढ़ता हूँ।

भारत-आस्ट्रेलिया की ऐतिहासिक टेस्ट श्रंख्ला गतिमान थी..हरभजन की हैट्रिक और लक्ष्मण-द्वविड़ की शानदार पारियों की बदौलत आस्ट्रेलिया के विजयरथ को रोककर इंडिया चहुंओर कीर्ति अर्जित कर रही थी...लेकिन मैं इन खुशियों में डूबा हुआ होने पर भी वापस अपने घर लौटने को बेचैन था...अपने उसी गांव जहाँ घर के पीछे एक बूढ़ा आम का पेड़ है, जहां दादी के पलंग के पास सुलगती सिगड़ी है, जहां हरे-भरे खेत और उबड़-खाबड़ कच्चे रास्ते हैं, जहां कंचे, गिल्ली-डंडा और एक टूटा हुआ क्रिकेट का बल्ला है...मैं वहीं लौट जाना चाहता था...मेरे माँ-बाप के लिये मेरा वापस लौटना कहीं न कहीं मेरे उन्नत भविष्य के टूटने की तरह था..मेरे विकास की राह में रोड़ा था...पर बचपन कहाँ विकास चाहता है वो तो सिर्फ खुशी चाहता है..और वो खुशी यदि बैलगाड़ी, टूटे हुए खिलौनों और कच्ची पगडंडियों में मिल रही हो तो भला कौन हवाईजहाज, शॉपिंग मॉल और विदेश भ्रमण की आरजू करे???

ज़ारी............

Tuesday, October 15, 2013

मेरी प्रथम पच्चीसी : चौथी किस्त


(अपने जीवन की अब तक की यात्रा का विवरण दे रहा हूँ..पिछली किस्तों में जीवन के उन पलों को पिरोने की कोशिश की है जिनकी बेहद धुंधली सी यादें, ज़हन में यदा कदा खलबली मचाये रहती हैं। अब आने वाली किस्तें जिंदगी के अपेक्षाकृत समझदारी भरे वर्षों को प्रस्तुत करेंगी। यद्यपि समझदारी एक ऐसी चीज़ है जिसके कोई मानक निर्धारित नहीं किये जा सकते और इंसान 60-70 की उम्र में भी समझदार बनने के जतन करता रहता है। लेकिन फिर भी औपचारिक बातें, झूठी मुस्कान और तथाकथित शिष्टाचार को अपनाने का हुनर यदि आपमें आ गया है तो आप समझदार हो चुके हैं..और अब मैं भी कुछ ऐसा ही समझदार बनता जा रहा था)

गतांक से आगे-

उस दौर में कक्षा आठ की बोर्ड परीक्षा हुआ करती थी..आज के समय में ये बोर्ड परीक्षा शब्द कितने मायने रखता है मुझे नहीं पता..पर उस वक्त किसी परीक्षा की गंभीरता बताने के लिये अक्सर ये जुमले बोले जाते थे कि 'भैया, बोर्ड एक्साम है लटक मत जाना'। हालांकि पाँचवी कक्षा भी बोर्ड ही हुआ करती थी लेकिन कक्षा आठ के बोर्ड होने के मायने थोड़े अलग ही थे। मैं भी कक्षा आठ में था..परीक्षा की गंभीरता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि मुझे तीन-तीन ट्युशन क्लासेस अटेंड करने जाना होता था। इस वक्त तो सरकार के सर्व साक्षरता मिशन के अंतर्गत ये नियम बना दिया गया है कि कक्षा आठ तक किसी को फेल नहीं किया जा सकता..लेकिन तब ऐसा नहीं था मेरे घर और पड़ोस के कुछ भैया लोगों को इस क्लास में फेल होने का अनुभव था और उनका रिसल्ट हमारे माँ-बाप एक नज़ीर की तरह प्रस्तुत किया करते थे कि पढ़ोगे नहीं तो फलां-फलां भैया जैसे हो जाओगे। अब उस वक्त की मनः स्थिति को आखिर कैसे बयां करें कि वो मामुली सी आठवी की कक्षा किसी आईआईटी-जी और क्लैट जैसे एक्साम से कम नहीं जान पड़ती थी। सुबह पाँच बजे से मम्मी का पढ़ने के लिये उठा देना और लगातार सामने बैठ के पहरेदारी करना..ऐसा लगता था कि दुनिया का सबसे बड़ा कष्ट शायद यही है और हम ये सोचा करते कि बस एक बार ये आठवी पास हो जाये फिर तो ज़िंदगी में ऐश ही ऐश हैं..पर हमें तब क्या पता था कि लाइफ में आगे तो और बड़ी सर्कस है...जहाँ भोगोगे नहीं तो कुचल दिये जाओगे। भले हमें ये पता हो न हो कि इस तरह भागकर हमें आखिर पहुँचना कहाँ है..किंतु इस रेस में दौड़ते रहना ज़रूरी है। सुवह उठकर इन तकलीफों के अलावा एक सुखद चीज़ का अनुभव भी मिलता था और वो है खसखस-बादाम का हलुआ। जिसे हमारी माँ महज़ इसलिये खिलाया करती थी ताकि उनका बेटा भी इसे खाकर आइंस्टीन-न्यूटन जैसा बुद्धिमान बन सके। पता नहीं उनकी इस आशा पे आज हम कितना ख़रा उतर पाये....

लेकिन उन दिनों को आज भी मैं याद करता हूँ तो बड़ी ताजगी का अनुभव होता है...एक के बाद एक अलग-अलग कोचिंग क्लासेस अटेंड करने जाना। सर्दियों की सौंधी-सौंधी धूप में छत पे घूम-घूमकर किताबों का रट्टा लगाना..और नित नई-नई किंतु आसमानी उम्मीदों के साथ एक्साम देने जाना। सब कुछ बड़ा ही रोमांचक होता है..और प्रायः सभी इस उम्र से गुजरने वाले बालकों को इस अनुभूति से दो-चार होना पड़ता है। आज भले ही नवपीढ़ी अधिक साइंटिफिक और मॉडर्न हो गई हैं लेकिन उन आठवी-दसवी कक्षाओं की अनुभूतियां जस की तस हैं भले उनके लिबास कुछ बदल गए हैं। आज महत्वकांक्षाओं के पंख कुछ ज्यादा ही ऊंची उड़ान भरना चाहते हैं पर हमारी महत्वकांक्षाएं बस अपनी क्लास में टॉप करने तक सीमित थी..आज बच्चों को ये पता है कि उन्हें इस पढ़ाई से डॉक्टर, इंजीनियर या आईएएस बनना है हमें बस इतना पता था कि पढ़ने से बड़े आदमी बनते हैं..अब ये बड़ा आदमी कौन होता है ये तो आज तक समझ नहीं आया। लेकिन फिर भी अपनी इस युवावय में कोशिश यही बनी हुई है कि बड़े आदमी बनना है..आज इंसान की कीमत का सर्टिफिकेट यही 'बड़ा आदमी' होना हो गया है। एक ज़माने में व्यक्ति का परिचय ये कहकर दिया जाता था कि 'फलां इंसां भला आदमी है' पर आज लोगों की कीमत के मायने इस वाक्य से ज़ाया होते हैं कि 'फलां इंसा बड़ा आदमी हैं'। खैर जो भी हो उस कच्ची उम्र की वो नन्ही महत्वकांक्षाएं और उनके लिये की जाने वाली वो नादान कोशिशें बड़ी खूबसूरत हुआ करती थी जिनके लिये बारबार बच्चा बनने को जी चाहता है।

एक्साम के बाद वाली छुट्टियाँ भला किसे पसंद न आती होंगी...आज के इस फास्ट कल्चर के बीच समर वेकेशन के मायने काफी अलग हो गये हैं और अब इन छुट्टियों में भी तरह-तरह के समर कैंप, डांस-पैंटिंग-कराटे जैसी क्लासेस बच्चों के मत्थे मड़ दी जाती हैं पर पहले छुट्टियों का मतलब सिर्फ मामा-नानी का घर हुआ करता था। तपती दोपहर में नानी के हाथों बनी सत्तु, सिवैया या तरबूज जैसे जायकों से दिल और दिमाग को ठंडक पहुंचायी जाती थी। वही रात में गली-मोहल्लों के दोस्तों के साथ तरह-तरह के खेल खेले जाते थे।

मेरे बचपन के उस दौर में कंप्यूटर और अन्य थ्रीडी गेम्स की दस्तक नहीं हुई थी लेकिन विडियो गेम हालिया लांच हुआ था और बच्चों का उसपे जमकर भूत सवार रहा करता था। लगभग 1500 रुपये की कीमत वाले इस विडियो गेम की पहुंच भी अधिकतर घरों में नहीं थी और प्रायः हर छोटे कस्बे और नगरों में कई छोटी-छोटी दुकानें खुल गई थी जहाँ 4 रुपये प्रतिघंटे की दर से विडियो गेम खिलाया जाता था जिसमें भी कोन्ट्रा खेलने का चार्ज 5 रुपये प्रतिघंटे हुआ करता था..और बच्चों की लंबी-लंबी वैटिंग इन दुकानों में लगा करती थी। कोन्ट्रा, मारियो और निन्जा जैसे गैम्स काफी पापुलर थे..और गली-मोहल्ले के बच्चे इन गेम्स में अपनी-अपनी महारत का बखान बड़े चटकारे लेकर किया करते थे। यदि कोई साथी कोन्ट्रा की आठों स्टेज पार कर लेता या मारियो की तीसरी स्टेज में सीढ़ी से उतरती बतख से अपनी लाइफ बढ़ा लेता तो हमें लगता था कि मानो ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीत आया हो। ये सारे वाक़ये उसे ही समझ में आ सकते हैं जिसने इन गेम्स का लुत्फ़ उठाया हो।

उन गर्मियों की छुट्टियों के मायने हमारे लिये सिर्फ मस्तियां ही हुआ करती थी..कोई विशेष हुनर हासिल करने की जद्दोज़हद तो रहा ही नहीं करती थी। एक जो बड़ा फर्क तब और आज के वक्त में समझ आता है वो यही है कि पहले प्रसन्नता के लिये अधिक से अधिक जतन किये जाते थे पर आज सफलता के लिये सारी कोशिशें हैं। नानी का वो कच्चा घर, टूटा छज्जा और मिट्टी का बरामदा आज के इन आलीशान, संगमरमरी बंगलों से कई बेहतर और सुकून देने वाला था..उस टूटी खाट पे बड़ी चैन की नींद आती थी पर आज इन डल्लब के गद्दों पे भी अक्सर नींद कम और करवटें ज्यादा रहती हैं। वो चूल्हे की बनी रोटियां और चावल की खिचड़ी जिस तरह क्षुधा को तृप्त करती थी वो ताकत आज के पिज्जा, वर्गर और चाइनीज़ में कतई नहीं। बर्फ के गोले सा जायका, टॉप एंड टाउन और दिनशॉज की आइस्क्रीम में नहीं और न ही मॉल्स के फूड कोर्ट में वो लजीज़ स्वाद मिलता है जैसा तब रास्ते में बिकने वाले बुढ़िया के बाल और ठेले से जामुन खरीद के खाने में मिलता था।

हो सकता है तब ऐसा सिर्फ इसलिये हो क्योंकि हमारी दुनिया और समझ सीमित थी..पर उस सीमित दायरे सी प्रसन्नता क्या किसी वैश्वीकरण की व्यापकता से हासिल हो सकती है। बाहर से विस्तृत होकर भी हम अंदर से तो सिकुड़ ही रहे है..मोहल्ले की गलियाँ तो चौड़ी हो गई पर दिलों की तंगी कैसे दूर होगी?

जारी.........