Friday, June 4, 2010

ये है मुंबई मेरी जान.......


पिछले हफ्ते एक बेहद खुबसूरत शहर और करोड़ों लोगों की धड़कन मुंबई शहर को बेहद करीब से देखने का अनुभव हुआ । देखकर लगा कि आखिर क्यों इसे मायानगरी या नशीला शहर कहते हैं। हालाँकि ये मेरा पहला मुंबई भ्रमण नहीं था लेकिन पिछली बार यहाँ अपने कॉलेज के साथ शैक्षणिक भ्रमण पर आना हुआ था। उस समय तो दोस्तों के साथ मस्ती में ही कुछ यूँ मशगूल थे कि इस शहर को समझने का मौका ही नहीं मिला। तब इस शहर के सम्बन्ध में मेरी धारणा कुछ अलग थी, अब एक अलग धारणा है।

जितनी बार इस शहर का नाम बदला उससे कही ज्यादा बार इसकी संस्कृति,रीति-रिबाज़, रहन-सहन बदला अब ये शहर महज एक शहर नहीं बल्कि एक अलग ही स्वप्न संसार, एक अलग ही दुनिया बन गया है।
मुंबई ह़र काल में लोगों के आकर्षण का केंद्र रहा है,यह देश की व्यावसायिक राजधानी है। ये शहर अपने में जिंदगी के हर रंग समेटे है, मन के सभी रस, दिल की भावनाएं, दुनिया की खुशियाँ और दुनिया का दर्द हर चीज़ के दर्शन आपको इस नाचीज शहर में हो जायेंगे।

जी हाँ यही शहर है जहाँ सड़क से संसद तक की, अर्श से फर्श की, नालों से महलों तक, झुग्गी से बग्घी तक की जिंदगी के दर्शन हम कर सकते हैं। लाखों लोग यहाँ आते हैं और यहीं के हो जाते हैं। पहले वे इस शहर को पकड़ना चाहते हैं फिर ये शहर ही उन्हें पकड़ लेता है कि भले ही वे इसे छोड़ना चाहे पर यह शहर उन्हें नहीं छोड़ता। फिल्म texi no.9 2 11 में एक गीत कुछ इस प्रकार है-"लाख-लाख लोग आके बस जाते हैं इस शहर से दिल लगा के फंस जाते हैं, सोने की राहों पर सोने को जगह नहीं..शोला है या है बिजुरिया दिल की बजरिया मुंबई नगरिया..."

भले ही मुंबई के इर्द-गिर्द समुद्र है लेकिन उससे भी संगीन समुद्र यह मुंबई शहर खुद है जो अपने देश के हर वर्ग, हर क्षेत्र, हर संस्कृति के व्यक्ति को समाये हुए है और हर व्यक्ति के पेट के चूहे मार रहा है। यहाँ आकर हर व्यक्ति कुछ न कुछ पा जाता है कोई बहुत ज्यादा पाता है तो कोई थोडा कम। लेकिन इससे भी बड़ा सच है जो हमने 'मेट्रो' फिल्म के एक संवाद में सुना है "कि ये शहर जितना हमें देता है उससे कही ज्यादा हमसे छीन लेता है"।

दरअसल
जब भी किसी के दिमाग में मुंबई का चेहरा उभरता है तो उसकी नज़र बड़ी-बड़ी आलिशान बिल्डिंग, शोपिंग काम्प्लेक्स, मल्टी प्लेक्स पर तो जाती है पर हजारों वर्गफीट में फैली धारावी की झुग्गियां नहीं दिखती जहाँ समृद्ध लोगों की अपेक्षा कई गुना तादाद में लोग रहते हैंउसकी नज़र फिल्म सिटी, बालीवुड पर तो जाती है पर वह नाले किनारे बसने वाली जिंदगी से बेखबर हैवो बोम्बे स्टॉक एक्सचेंज को देखता है पर चौपाटी पर बड़ा पाव बेचता कल्लू उसे नहीं दिखताफैशन जगत की चकाचौंध तो दिखती है पर ट्रेफिक सिग्नल पर पेपर बेचता बच्चा और भीख मांगती अम्मा नहीं दिखतीयह किसी आश्चर्य से कम नहीं कि हम मुंबई जाके शाहरुख़ का 'मन्नत' और अमिताभ का 'जलसा' देखना चाहते हैं पर हमारे दिमाग में बिरजू नाई और भोलू हम्माल के वो आशियाने नहीं आते जिनमे वो जिंदगियां बसती है जो हमसे दो मीठे बोल को तरस रही हैइस शहर से उड़ने वाले वो विमान दिखते हैं जो अमेरिका, सिंगापूर, लन्दन जाते हैं पर लोकल ट्रेन की पेलमपेल पर नज़र नहीं जाती

दुर्भाग्य ये है कि जिन चीजों पर हमारी नज़र नहीं जाती वही असली मुंबई है, वही सच्ची और बृहद मुंबई है। हमने हमारी अंखियों के झरोखों से दिखने वाले नजारों को भी संकुचित कर लिया है और जिस शहर को देखा है वो तो पुस्तक का सिर्फ मुख पृष्ठ है अन्दर के पन्नो से हम अनजान है। मुंबई की असली जिंदगी तो इस शहर के कालीन के नीचे पल रही है। इस शहर में ट्रेफिक प्रॉब्लम के कारण गाड़ियों की रफ़्तार धीमी हो जाती है पर गाड़ियों की उस धीमी रफ़्तार के बीच जिंदगी भागती रहती है।

लोग कहते हैं यहाँ का इन्सान बहुत खड़ूस और चिड़चिड़ा होता है पर ऐसा कहने वालो के भी सिर और कंधे पर वजन रखकर, उनके पैर बांधकर दौड़ने को कहा जाय तो वे भी संगीत का मधुर तराना नहीं सुनायेंगे। मुंबई के आदमी की जिंदगी शायद ऐसी ही है, चिडचिडाहट आना लाजमी है। ये एक वो शहर है जो अपने में कई शहर, कई प्रदेश, कई देश या यूँ कहे कि कई दुनिया समेटे है। मुंबई को समझना सिर्फ मुंबई को समझना नहीं है एक अच्छी-खासी दुनिया को समझना है।

वैसे तो मुंबई महाराष्ट्र की राजधानी है, पर ये महज महाराष्ट्र की नहीं ये सारे राष्ट्र की है सारे देश का दिल इसमें बसता है पर राजनैतिक मुर्खता के परिचायक राज ठाकरे जैसे लोगों को ये कौन समझाए, जो अपने देश में ही सरहदें बना रहे हैं। समझ नहीं आता कि काम का बोझ सिर पर रखने के कारण कहीं इस इन्सान का दिमाग घुटनों में तो नहीं आ गया, शायद इसलिए आज घुटनों के दर्द की शिकायत बढ रही है।

खैर, मुंबई के व्यक्ति के लिए तो हम ये कह सकते हैं कि वो जिंदगी जीते समय अपने भगवान को ये नहीं बताता कि उसकी परेशानियाँ कितनी बड़ी है बल्कि अपनी परेशानियों को ये बताता है कि उसका भगवान कितना बड़ा है। यही सोचकर बस जिंदगी जीता चला जाता है।

ये मुंबई अपने आप में एक पुराण है, एक ग्रन्थ है, एक महाकाव्य है जब इसके भाव को विचारकर पड़ोगे तो आँखे नम भी होगी, दिल में गम भी होगा, थोड़ी ख़ुशी तो थोडा गुस्सा भी आएगा पर अंततः आप एक मजबूत और परिपक्व इन्सान बन जाओगे। मेरी कलम का इस मुंबई गाथा का बखान करने में दम फूल रहा है विशेष तो आप खुद इसे महसूस करके देखें...शायद आप खुद बेहतर ढंग से जन पाए। अंत में २ पंक्तिया याद कर विराम लूँगा-
इन बंद कमरों में मेरा दम घुटता है,
खिड़कियाँ खोलो तो ज़हरीली हवा अन्दर आती है....

Thursday, May 20, 2010

जब वक़्त का पहिया चलता है...


"वक़्त आता है वक़्त जाता है, वक़्त कभी न ठहर पाता है है...इस वक़्त को संभाल के रखिये क्योंकि वक़्त वेवक्त काम आता है।" किसी कवि के ये पंक्तियाँ हमारे सामने एक प्रश्न छोड़ जाती है कि आखिर कैसे वक़्त को संभाला जा सकता है।

वक़्त को थामने वाली भुजाओं का जन्म आज तक नहीं हुआ, इस चक्र को थामने वाला वीर अब तक पैदा नहीं हुआ। दरअसल वक़्त को संभालने का आशय ही यह है कि वक़्त के साथ हो जाना। आज तक सभी महापुरुष वक़्त को बदलकर नहीं उसके साथ चलकर महान हुए हैं।

ये वक़्त सर्वशक्तिमान है, सारी पृकृति की धारा बदलने वाला ये इन्सान इस वक़्त के हाथों ही मजबूर है। करोडो वर्षों से चली आ रही रेस में एकबार भी ये इन्सान इस वक़्त को पछाड़ नहीं पाया। दुनिया के रंगमंच पर इंसानी कठपुतलियों की डोर वक़्त के हाथ में है। इसलिए कहा है 'समय से पहले और भाग्य से अधिक किसी को कुछ नहीं मिलता।' इन्सान ने वक़्त की सारी गतिविधियाँ नहीं देखी पर वक़्त ने इन्सान की हर हलचल पर नज़र रखी है। जब इन्सान सो रहा होता है ये वक़्त तब भी चल रहा होता है।

किसी शायर की पंक्तियाँ है "बस एक गुजरने के सिवा इस वक़्त को आता क्या है" पर एक सच और है जो शायद इससे बड़ा है "वक़्त नहीं गुजरता हम उस पर से गुजर जाते हैं"। कहीं तो ये वक़्त पेचीदा गलियों सा है, कहीं ये अथाह छलछलाता समंदर। पर दोनों में समानता ये है कि गलियों की संकीर्णता और समंदर की व्यापकता में जटिलता एक सम है जिससे इन्सान पार नहीं पा पाता।

दरअसल ज्ञात-अज्ञात में या कहे प्रगट-अप्रगट में एक एक चीज उलझी पड़ी है दरअसल वह कुछ भी नहीं और सारी कवायद भी उसमें ही है और उसमें हम कुछ कर भी नहीं पाते। वह है हमारा वर्तमान जो प्रगट भूत और अप्रगट भविष्य के बीच में उलझा हुआ है। वास्तव में वह पल भर का है और 'यह वर्तमान है' इतना सोचते ही वह भूत बन जाता है। तो इन्सान का कर्म आखिर किस वर्तमान में होगा, इक पल के वर्तमान को पकड़ पाना आसान नहीं। आसान क्या, संभव नहीं।

ये एक ऐसा सच है जिसे कोई नहीं मानेगा क्योंकि हमने तो यही सुना है कि इन्सान अपनी तकदीर खुद बनाता है , इन्सान कि इच्छा शक्ति सृष्टि का निर्माण करती है, बगैरा-बगैरा। साया फिल्म के गीत का इक बोल है-" कोई तो है जिसके आगे है आदमी मजबूर, हर तरफ-हर जगह , हर कहीं पे है हाँ उसी का नूर"। जिसके आगे ये मजबूर है वो है वक़्त। वक़्त के दरिया में मज़बूरी इस कदर है कि लाख हाथ फडफड़ाने पर भी किनारा नहीं मिलता। सारी योजनायें बक्से में धरी रह जाती है, तमन्नाएँ दिल में ही कुलाटी मारते रह जाती है, होता वही है जो वक़्त को मंजूर होता है। एक बहुत बड़ा सच जो आइन्सटाइन ने जीवन के अंतिम समय में कहा था -"घटनाएँ घटती नहीं है वह पहले से विद्यमान है तथा मात्र कालचक्र पर देखी जाती है।

इस दुनिया की सफलता, तुम्हारा सुख सब वक़्त की देन है तथा तुम्हारा दुःख भी वक़्त की कृपा से है, दोनों में एक बात समान है दोनों सदा टिकते नहीं है। सबसे तेज़ गति से भागता हुआ होने पर भी वक़्त सा स्थिर इस दुनिया में कोई नहीं है। चलता हुआ कुम्हार का चका अपनी जगह पर स्थिर भी है, वैसा ही वक़्त है। शुन्य से शुरू हुई यात्रा शुन्य पर ही ख़त्म हो जाती है पुनः शुन्य से शुरू होने के लिए। इसलिए कहते हैं मृत्यु जीवन का अंत नहीं शुरुआत है।

खैर, इन्सान इस बात को मानने को तैयार नहीं, उसकी जिद है कि वो वक़्त को हराएगा। इसलिए लगा है वो नए-नए प्रयोगों में। इसकी हालत उस बच्चे से गयी बीती है जो चाँद से खेलने को मचल जाता है क्योंकि थाल में प्रतिबिंबित चाँद इसे संतुष्टि प्रदान नहीं कर रहा। इन्सान की इच्छाओं के अनुसार यदि सारी दुनिया चलने लगे तो सारी व्यवस्था गड़बड़ा जाएगी क्योंकि इंसानी इच्छाएं एक सामान नहीं है फिर किसकी कामनाएं पूरी हों?

जटिलताएं इतनी है कि उनमें सच कही दबा पड़ा है और हम उस सच का निर्णय नहीं कर पा रहे हैं। ताउम्र हम अपने दिल की अवधारणाएं बदलते रहते हैं। उन बदलती अवधारणाओं में कभी हमें सच नहीं मिलता। हमें वक़्त का सच भी मंजूर नहीं। भैया, वक़्त और इन्सान में उतना अंतर है जितना मंजूरी और मज़बूरी में............

Friday, April 30, 2010

खिलंदड अक्षय, व्यावसायिक सिनेमा और हॉउसफुल

आईपीएल के भूत के सोने के बाद सिल्वर स्क्रीन पर रिलीज़ हुई हाउसफुल। साजिद खान द्वारा निर्देशित और अक्षय कुमार -दीपिका पादुकोण जैसे सितारों से सजी फिल्म के प्रोमो देख लगता था कि बोलीवुड को एक और उम्दा फिल्म मिलेगी। लेकिन अफ़सोस ये भी खिलंदड अक्षयनुमा फिल्म है जिसे कमबख्त इश्क, हे बेबी, दे दनादन टायप की फिल्मों में ही शुमार किया जा सकता है।

अक्षय कुमार की ब्रांड वैल्यू इस समय शाहरुख़, आमिर, हृतिक जितनी ही है बजाय इसके कि उनके हिस्से कोई भी महानतम फिल्म नहीं है जिसे चकदे, तारे ज़मीन पर या कोई मिल गया की कोटि में शामिल किया जा सके। लेकिन पिछले एक दशक की फिल्मों पर यदि नज़र डाली जाये तो हम पाएंगे की फिल्म इंडस्ट्री को सबसे ज्यादा कमाई यदि किसी ने करके दी है तो वो है अक्षय कुमार। सन २००७ में तो उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री को ५०० करोड़ की सौगात दी थी, और पिछले सालों में रिलीज़ उनकी टशन, कमबख्त इश्क, ब्लू जैसी फिल्मों की कमाई ६०-७० करोड़ के आसपास है जबकि इनको फ्लॉप या औसत कामयाब फ़िल्में माना गया है। तारे ज़मीन पर और वेलकम एक ही दिन रिलीज़ हुयी थी, तारे ज़मीन पर ने महान फिल्म होने के बावजूद बमुश्किल ५० करोड़ का व्यवसाय किया जबकि दूसरी ओर वेलकम की कमाई १०० करोड़ के ऊपर थी।

तो क्या इन सारे समीकरणों के चलते अक्षय कुमार को महान सितारा मान लिया जाये? क्या व्यावसायिकता को महानता का पर्याय समझा जाये? यदि ऐसा है तो एक वैश्या किसी शास्त्रीय न्रित्यांगना से महान होगी, जेम्स कैमरून, सत्यजीत रे से बड़े निर्देशक होंगे, आईपीएल टेस्ट क्रिकेट से अधिक श्रेष्ठ होगा, लेकिन ऐसा नहीं है। अक्षय कुमार ने समय के साथ खुद को काफी परिपक्व बनाया है और आज वे एक हरफनमौला अदाकार है लेकिन फिल्म चयन और समर्पण में वे मात खा जाते हैं। यही कारण है की २० साल के उनके करियर के बावजूद उनके पास कोई DDLJ, हम आपके हैं कौन, लगान, रंग दे बसंती जैसा नगीना नहीं है। अपने सारे करियर में वे अपने एक्शन और खिलंदड स्वरुप में जकड़े रहे। जिस इन्सान में इतनी क़ाबलियत थी की वह कई महान कृतियों को जन्म दे सकता था लेकिन वो ताउम्र कुछ औसत महान फिल्मों के इर्द-गिर्द घूमता रहा।

बहरहाल बात यदि हाउसफुल की करें तो यह फिल्म तो अक्षय की हेरा-फेरी, भूल-भुलैया,मुझसे शादी करोगी टायप की उम्दा फिल्मों में से भी नहीं है। ऐसा लगता है की साजिद मार-मारके जबरन हँसाने की कोशिश कर रहे हैं। शायद ये फिल्म हिट भी हो जाएगी क्योंकि फिल्म को हिट कराने वाले सजिदनुमा सभी मसाले इसमें पड़े हुए हैं और प्रारंभिक भीड़ देखकर यही लगता है। साजिद ने 'हे बेबी' की बची-कुची कसर इसमें निकाल ली है। लेकिन इन सारी चीजों के कारण फिल्म को बेहतर नही कहा जायेगा। अक्षय कुमार जिन्होंने इस फिल्म में पनौती का किरदार निभाया है उनकी रियल लाइफ की अच्छी किस्मत का फायदा फिल्म को जरूर मिलेगा। छोटे शहरों और कस्बों में अक्षय के दीवाने इसे हिट करा देंगे। लेकिन गुणवत्ता परक फिल्म देखने वालों को निराश होना पड़ेगा।
अब तो उम्मीदें हृतिक की 'काइट्स' और प्रकाश झा की 'राजनीति' से ही है.....

Saturday, March 27, 2010

यादों की जुगाली


अक्सर लोगों के सेल फोन में एक मैसेज पड़ने को मिलता है.."वादे और यादें में क्या फर्क है, जिसका उत्तर है-वादे इन्सान तोड़ते हैं, और यादें इन्सान को तोड़ती हैं।" क्या वास्तव में यादें इतनी निर्मम होती हैं जबकि इन्सान उन्हें रंगीन कहता है, उनके सहारे जिंदगी गुज़ारने की बात करता है। खैर.....

दरअसल इन्सान के नन्हे से दिल में स्थित स्मृतियों का समंदर ही उसे एक सामाजिक प्राणी बनाता है जिसके बल पर वह ताउम्र आचार-विचार और व्यवहार करता है। यादों का विसर्जन पागलपन की शुरुआत है। यादों का कमजोर होना इन्सान का कमजोर होना है। फिर कैसे उन्हें निर्मम कहा जा सकता है, जालिम कहा जा सकता है।

इन्सान का टूटना उसकी अपनी वैचारिक विसंगति है, उसमें यादों को दोष नहीं दिया जा सकता। अतीत की कड़वाहट का असर यादों पर नहीं पड़ता, इसलिए शायद कहा जाता है कि "अतीत चाहे कितना भी कड़वा क्यों हो उसकी यादें हमेशा मीठी होती है। दरअसल यादें तो मीठी होती है नाही कड़वी, यादें तो बस यादें होती है। इन्सान अपनी तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार उन पर अच्छा या बुरा होने का चोगा उड़ा देता है।

यादों का जीवन में अमूल्य स्थान है, यादें ही मनुष्य को कुदरत कि असीम संरचनाओं से अलग करती हैं। इन यादों पर ही गीत है, संगीत है, साहित्य है, संस्कृति है, धर्म है सारा समाज है। हिंदी फिल्मों में तो यादें समरूपता से नजर आने वाला विषय है। कालिदास के प्रसिद्ध नाटक "अभिज्ञान शाकुंतलम" का क्लाइमेक्स ही यादों के विस्मरण पर केन्द्रित है। यादों में इश्क है, नफरत है, दोस्ती है, दर्द है, ख़ुशी है, हसरत है और सबसे बड़ी चीज यादों में यादें हैं।

इन यादों के सहारे ही आदमी तन्हाइयों में भी तन्हा नहीं होता, तो कभी-कभी भीड़ में भी तन्हा हो जाता है। नमस्ते लन्दन फिल्म के एक गीत में जावेद अख्तर ने लिखा है-"कहने को साथ अपने इक दुनिया चलती है पर चुपके इस दिल में तन्हाई पलती है...बस याद साथ है तेरी याद साथ है" इस दुनिया से इन्सान चला जाता है पर कम्बख़त यादें नहीं जाती। लेकिन यादों का स्थायित्व भी सदा के लिए नहीं है दिल में बसने वाली यादें उसके रुकने के साथ ही ख़त्म हो जाती है।

दरअसल इन्सान यादों से दुखी नहीं होता, नाही उनसे टूटता है उसके दुःख का कारण यादों में छुपी हसरतों कि पूर्ति हो पाना है या यादों के माध्यम से सफलता की जुगाली है। सफल या सितारा व्यक्ति के सफल दिनों में गूंजा तारीफ का स्वर गैरसितारा दिनों में भी सुनाई देता है। सितारा दिनों में बजी तालियों की गडगडाहट, यादों में आज भी कायम रहती है। यादों की जुगाली में आज को जी पाना दुःख का कारण है। इन्सान को यादों का नहीं हसरतों का सैलाब तोड़ता है।

अतीत की यादों का हथोडा हम आज पर मारकर अपना भविष्य ज़ख्मी करते हैं। अतीत से हमें सिर्फ यादें मिलती हैं और यादों का कोई भविष्य नहीं होता। जिंदगी आज में जीने का नाम है, यादों की जुगाली से इसे गन्दा करना समझदारी का काम नहीं है।

दिल से यादों को नहीं अपनी इच्छाओं को समेटना होगा। मरकर भी किसी की यादों में जीने की हसरत मिटाना होगी, यश का लोभ समुद्र में विसर्जित करना होगा। इस झूटे संसार का राग भी झुटा है, इन्सान के मरने के बाद उसे यादों में भी जगह नहीं मिलती। आकाश के टूटते तारों से आकाश को कोई फर्क नहीं पड़ता, ज़मीन पर हमारी भी वही स्थिति है। कभी-कभी फिल्म के इक गीत में कुछ बोल इस तरह हैं-"क्यों कोई मुझको याद करे..क्यों कोई मुझको याद करे, मशरूफ ज़माना मेरे लिए क्यों वक़्त अपना बर्बाद करे...मै पल दो पल का शायर हूँ"
यादों की क्या अहमियत है, कितनी जरुरत है, निर्णय आप स्वयं करे, फैसला आप सब पर है। सबके फैसले अलग-अलग आयेंगे इससे मुझे आश्चर्य नहीं होगा। यादों की अहमियत सबके लिए जुदा-जुदा है। प्रतिक्रिया देकर यादों के विषय में ज़रूर बताएं........
अंकुर'अंश'

Tuesday, March 16, 2010

खान बनाम इडियट्स....




दो बड़े सितारे, दो बड़ी फ़िल्में मुकाबला महज फिल्म को हिट-सुपरहिट कराने का नहीं था, मुकाबला था बादशाहत का। मुकाबले में इंडस्ट्री के दो बड़े सितारे शुमार थे और ये इनके बीच पहला मुकाबला नहीं था। इससे पहले भी ये रब की जोड़ी और गजनी को मैदान में लड़ा चुके हैं। उस दौरान आमिर ने बाद में ज़िम्मा संभाला था इस बार शाहरुख़ बाद में मैदान में आये।

बहरहाल परिणाम सबके सामने आ चूका है 'इडियट्स ' हिंदी सिनेमा की सर्वकालिक महान फिल्मों में शामिल हो गयी है जबकि 'माय नेम इज खान' शाहरुख़ की खुद की फिल्मों में ही सर्वश्रेष्ठ नहीं है। न तो ये ' चकदे ' जैसी क्रिटिकली हिट है नाही DDLJ या 'कुछ-कुछ होताहै ' जैसी कमर्शियल हिट है। एक बेहद औसत फिल्म है जिसे शाहरुख़ महानतम होने का भ्रम पाल रहे हैं।

आमिर ने हमेशा आग में हाथ डालकर नगीने बाहर निकाले हैं। चाहे आशुतोष गोवारिकर की वो स्क्रिप्ट हो जिसे दर्जनों दरबाजों पर नकार दिया था उसी स्क्रिप्ट पर आमिर ने 'लगान' रचकर आस्कर का दरबाजा खटखटाया। 'तारे ज़मीन पर जैसे नान कमर्शियल सब्जेक्ट पर सिनेमा बनाकर वाहवाही लूटी। 'अक्स' जैसी फ्लाप फिल्म के निर्देशक से 'रंग दे बसंती' जैसी महान फिल्म बनवाई। वहीँ शाहरुख़ की सारी सफलता चोपड़ा केम्प के इर्द-गिर्द घूमकर दम तोड़ देती है और जब वे खुद फिल्म निर्माण में उतरते हैं तो 'हे राम', 'फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी' और 'बिल्लू' जैसे डिब्बों को जन्म देते हैं।
'माय नेम इज खान' का विषय उम्दा था और ये एक बेहद उम्दा फिल्म हो सकती थी अगर ये शाहरुख़ के प्रभाव से मुक्त होकर मात्र करण जौहर की फिल्म होती। प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक जयप्रकाश चौकसे ने कहा था कि ''शाहरुख़ पूरी फिल्म में इस भाव से ग्रस्त नज़र आ रहे हैं मानो वे कोई इतिहास रचने जा रहे है' इस भाव के करण ही शाहरुख़ स्वाभाविक शाहरुख़ नहीं रह जाते।
सारी फिल्म एक विशिष्ट पक्ष की ओर झुकी है इस फिल्म से ज्यादा निष्पक्ष प्रस्तुतिकरण करण की 'कुर्बान' में देखने को मिला। फिल्म के संवाद और काजोल का अभिनय तारीफे काबिल है। बाकि पूरी फिल्म एक खास वर्ग की ही तालिया बटोरसकी। ये एक कम्प्लीट पैकेज नहीं हैं। शाहरुख़ को बाला साहेब का शुक्रिया अदा करना चाहिए जिनके कारण फिल्म को शुरूआती भीड़ मिल गयी। फिल्म देखकर मीडिया कि हकीकत भी जान पड़ती है जो वेश्यावत बर्ताव करती है। मीडिया चेनल जिस भांति फिल्म का महिमा मंडन कर रहे थे वैसा फिल्म में कुछ नहीं है। वे सभी चेनल फिल्म के मीडिया पार्टनर थे।

दूसरी ओर बात 'थ्री इडियट्स ' की हो तो नाम सुनते ही दिल में गुदगुदी होने लगती है। इस फिल्म कि सफलता का कारण मात्र आमिर हों ऐसी बात नहीं है वे तो बस इस सफलता में शुमार कई लोगों में से एक हैं। लेकिन फिल्म चयन और समर्पण उनका अपना है। लोग कहते हैं फिल्म निर्माण में आमिर दखलंदाजी करते हैं मगर इस फिल्म में यदि हिरानी सही थे तो उन्होंने कुछ सुधार नहीं किया तथा उनके हाथ कि कठपुतली बनना ही मंज़ूर किया।

शाहरुख़ और आमिर में कौन श्रेष्ठ है ये मैं बताना नहीं चाहता, ये सबकी अपनी-अपनी पसंद है। मैं सिर्फ उस फिल्म कि तारीफ कर रहा हूँ जो लोगों के लिए एक फिल्म से बढकर एक पुराण बन गयी। उस फिल्म के विषय में शाहरुख़ कहते हैं कि उन्होंने अब तक 'थ्री इडियट्स' नहीं देखी। आप हीसोचिये-क्या ऐसा हो सकता है? या यह महज झूठी बांग है। और यदि ये सच है तो शाहरुख़ के अभाग्य की महिमा हमसे तो नहीं कही जा सकती। शाहरुख़ ये फिल्म देखें और कुछ सीखने का प्रयास करें।

खैर, दोनों खान बढ़िया सितारे हैं। बस दोनों में जरा सा अंतर है। आमिर समझदार इन्सान है और शाहरुख़ ज्यादा समझदार इन्सान है।