Sunday, August 2, 2026

मेरी प्रथम पच्चीसी : अंतिम किस्त


(**वर्ष 2013 में 31 जुलाई को स्वांतःसुखाय शुरू की गई जीवन की इस शृंखला को अब करीब तेरह वर्ष बीत चुके हैं। पिछली किस्त और इस किस्त के बीच भी पूरे सात वर्षों का लंबा अंतराल आ गया। अब लगा कि इस अधूरी यात्रा को उसके मुकाम तक पहुंचा ही देना चाहिए। क्योंकि जीवन के पहले पच्चीस वर्षों का लेखा-जोखा अपने पच्चीसवें जन्मदिन पर लिखना शुरू किया था, लेकिन गत 31 जुलाई को खाकसार 39वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। शुरुआत में सोचा न था कि यह सफर इतना लंबा खिंच जाएगा। कुछ आलस्य मेरा था, कुछ जीवन की व्यस्तताएं थीं और कुछ वे ज़ेहनी ऊहापोहें, जो समय-समय पर कलम को थाम भी लेती थीं। खैर... अब आगे बढ़ते हैं और इस पच्चीसी को उसके अंतिम पड़ाव तक पहुंचाते हैं।)


एम.फिल. वर्ष 2010 में पूरी हो चुकी थी। उसके बाद के कुछ महीने फिर उसी पुराने खालीपन के नाम रहे। जुलाई 2010 से लेकर फरवरी 2011 तक यहां-वहां कई इंटरव्यू दिए, कई उम्मीदें बांधीं, कई बार लौटकर निराशा भी हाथ लगी। लोगों से मैं यही कहता फिरता था कि अभी नौकरी नहीं, पढ़ना चाहता हूं। लेकिन भीतर का आदमी जानता था कि उसे एक अदद नौकरी चाहिए थी, सिर्फ इसलिए नहीं कि वेतन मिले, बल्कि इसलिए कि आत्मनिर्भर होकर अपने परिवार की आंखों में गर्व देख सके। आदमी अक्सर दुनिया से सच नहीं बोलता, कई बार वह खुद से भी सच छिपा लेता है।

इन्हीं दिनों मन का एक और कोना अपनी अलग दुनिया बसा रहा था। मौसम पहले से ज्यादा अच्छे लगने लगे थे। बारिश की बूंदें सिर्फ पानी नहीं लगती थीं, उनमें कोई अनकहा संदेश सुनाई देता था। पुराने रुहानी गीत घंटों तक कानों में गूंजते रहते। प्रेम-कथाओं वाले उपन्यास अपने पात्रों से ज्यादा अपने भीतर के आदमी से परिचय करा रहे थे। और कोई था... जिसकी मौजूदगी ने इन तमाम अनुभूतियों को अर्थ देना शुरू कर दिया था।

मुझे आज भी लगता है कि प्रेम मनुष्य को उसकी इहलौकिक सीमाओं से कुछ दूर ले जाकर किसी पारलौकिक अनुभूति का स्पर्श कराता है, बशर्ते वह अपने स्वार्थों से परे जाकर सिर्फ पाने का नहीं, बल्कि होने का भाव बन जाए। प्रेम केवल किसी का हाथ पकड़ लेने का नाम नहीं, बल्कि अपने भीतर के कठोर हिस्सों का पिघल जाना भी है। वह आपको किसी और के लिए जीना सिखाता है। प्रेम का पल्लवन, उसका इज़हार, इकरार, इंतज़ार और फिर कभी-कभी उसका वियोग... ये सब मिलकर ऐसी शिक्षा देते हैं जो शायद विश्वविद्यालयों की कोई डिग्री नहीं दे सकती।

इन्हीं भावनाओं के बीच अंततः फरवरी 2011 में एक मीडिया कॉलेज में बतौर अध्यापक जीवन की पहली नौकरी शुरू हुई। पहली तनख्वाह से ज्यादा खुशी इस बात की थी कि अब अपने नाम के आगे "कार्यरत" लिख सकूंगा। उसी समय जीवन में पहला प्रेम भी अपने पूरे सौंदर्य के साथ मौजूद था। मैं दोस्तों से मुस्कराकर कहता फिरता था—"यार, ज़िंदगी का सबसे सुनहरा दौर चल रहा है।"

लेकिन जीवन का एक पुराना नियम है—जब सब कुछ बहुत अच्छा लगने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि समय अगली परीक्षा की तैयारी भी कर चुका है। दरअसल, जीवन का सौंदर्य इसी परिवर्तन में है। परिपक्व वही है जो अनुकूलताओं में उन्मत्त न हो और प्रतिकूलताओं में टूट न जाए। साम्य ही अंततः मनुष्य का सबसे बड़ा साधन है।

उधर वर्ष 2011 का क्रिकेट विश्वकप भी पूरे शबाब पर था। पूरा देश उत्साह में डूबा हुआ था और टीम इंडिया लगातार जीतती चली जा रही थी। इसी दौरान 27 मार्च 2011 को एक और सुखद समाचार मिला कि पीएच.डी. प्रवेश परीक्षा में मेरा चयन हो गया है। सचमुच ऐसा लगता था मानो चारों ओर हरियाली ही हरियाली हो।

लेकिन इन्हीं सब हरियालियों के बीच 2 अप्रैल 2011 का वह दिन आया, जिसने जीवन की दिशा ही बदल दी। कुछ शारीरिक असमर्थता और भीतर की असहजता के कारण चिकित्सक के पास पहुंचा। जांच हुई और पता चला—दोनों किडनियां जवाब दे चुकी हैं। जीवन की तेज़ रफ्तार से भागती गाड़ी को ऐसा ब्रेकर मिला कि एक पल को लगा, शायद अब यहीं विराम है।

लेकिन नियतिर की योजनाएं मनुष्य की कल्पनाओं से बड़ी होती हैं। 

18 मई 2011 को सफल किडनी ट्रांसप्लांट हुआ। मेरी मां ने अपनी एक किडनी देकर मुझे दूसरा जीवन दिया। मां के त्याग, समर्पण और प्रेम को शब्दों में बांधना संभव नहीं। उस पूरे दौर के अनुभवों को मैंने अपनी पुस्तक "ये हौसला कैसे झुके" में विस्तार से लिखा है। इसलिए यहां उसे दोहराना उचित नहीं समझता। ये पुस्तक विभिन्न ई कॉमर्स स्टोर पर मौजूद है जिसे गूगल पर इसी नाम से सर्च कर ढूंढा जा सकता है।

इतना अवश्य कहूंगा कि उस कठिन समय में प्रेम भी एक संबल बनकर साथ खड़ा रहा। जब कोई व्यक्ति आपको आपकी सफलताओं के कारण नहीं, बल्कि आपकी कमजोरियों सहित स्वीकार करता है, तब प्रेम अपने सबसे पवित्र रूप में होता है। शायद इसीलिए आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि बीमारी ने मेरे अच्छे समय को बहुत अच्छा नहीं होने दिया, लेकिन प्रेम ने उसी बुरे समय को उतना बुरा भी नहीं होने दिया।

करीब तीन महीने के पुनर्वास के बाद फिर जीवन की मुख्यधारा में लौटा। कॉलेज वापस जॉइन किया। अध्यापन हमेशा से मेरा प्रिय शगल रहा है। विद्यार्थियों के बीच जाकर मैं स्वयं भी विद्यार्थी बन जाता था। जितना उन्हें पढ़ाता, उससे कहीं अधिक उनसे सीखता। ज्ञान के संसार से मेरा रिश्ता केवल पेशे का नहीं, आत्मा का रहा है। कई बार अपने साथियों की कक्षाएं लेने का अवसर मिला तो उसे भी आनंद से स्वीकार किया। कॉलेज में बिताए वे तीन वर्ष आज भी स्मृतियों के सबसे रंगीन पन्नों में दर्ज हैं।

इन्हीं वर्षों में खूब पढ़ा, खूब लिखा, अनेक फिल्में देखीं, अनेक विचारों से जूझा, स्वयं को बार-बार परखा। जीवन में आकर्षण भी आए, मोह भी हुए, अनेक परिस्थितियां भी आईं, लेकिन ईश्वर की कृपा, संस्कारों की नींव और शायद कुछ अपनी इच्छाशक्ति ने हर बार मर्यादाओं की रक्षा कर ली। पीछे मुड़कर देखता हूं तो इस बात का संतोष है कि गलतियां बहुत कीं, पर ऐसी कोई गलती नहीं की जिसे आज अपनी आत्मा के सामने स्वीकार न कर सकूं।

समय धीरे-धीरे अपने अगले पड़ाव की ओर बढ़ रहा था। तभी प्रेम का वियोग भी जीवन का हिस्सा बना। मन फिर एक बार अस्थिर हुआ। हीनता, क्रोध, ईर्ष्या, क्षोभ, निराशा—इन सब भावों से भी परिचय हुआ। मनुष्य यदि ईमानदारी से आत्मावलोकन करे तो पाएगा कि उसके भीतर देवत्व और दानवत्व दोनों साथ-साथ रहते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि हम किसे रोज़ थोड़ा-थोड़ा भोजन दे रहे हैं।

ऐसे समय में यदि किसी ने सबसे अधिक संभाला तो वह था—स्वाध्याय। जिनवाणी से मिला आध्यात्मिक आलोक बार-बार अंधेरों के बीच दीपक बनकर खड़ा हुआ। यह दावा नहीं कि मैं कोई विशिष्ट व्यक्ति हूं या मैंने जीवन में कोई असाधारण उपलब्धियां अर्जित की हैं। लेकिन इतना अवश्य कह सकता हूं कि पच्चीसवें बसंत के बाद बीते तेरह वर्षों में यदि मैं अपनी सकारात्मकता बचा सका, अपने भीतर की आस्था को जीवित रख सका, तो उसके पीछे नियमित स्वाध्याय का बहुत बड़ा हाथ है। ज्ञान के बिना जीवन केवल घटनाओं का ढेर है; ज्ञान ही उन्हें अर्थ देता है।

मेरी पहली पच्चीसी का समापन एक गहरे दर्द के साथ हुआ था। लेकिन शायद वही दर्द आगे चलकर सबसे बड़ा शिक्षक भी बना। यदि उस समय बिखर गया होता तो संभवतः बाद के वर्षों में परिवार, मित्र, जीवनसंगिनी, बच्चों, सामाजिक-सांस्कृतिक यात्राओं, अकादमिक सफलताओं और जो कुछ भी थोड़ा-बहुत सार्थक कर पाया, वह संभव न हो पाता। इस वक्त कई मित्रों का साथ निश्चित ही एक सकारात्मक ऊर्जा की तरह साथ था उन सबका नाम लिखकर उन्हें किसी क्रम में नहीं रख सकता लेकिन वे मेरे लिये कितने खास है ये बात उन्हें बखूबी पता है।

आज इतना ही समझ पाया हूं कि प्रतिकूलताएं स्थायी नहीं होतीं और अनुकूलताएं भी शाश्वत नहीं हैं। जो आज असहनीय लगता है, वही कल स्मृति बन जाता है। और जो आज उपलब्धि लगती है, वह भी समय के साथ सामान्य हो जाती है। इसलिए जीवन का ध्येय शायद इन दोनों के पार जाकर स्वयं को जानना है।

हम समस्याएं नहीं हैं, समस्याओं के साक्षी हैं। हम सुख-दुख नहीं हैं, उनके अनुभवकर्ता हैं। हम वह एक लम्हा नहीं हैं जो बीत जाएगा; हमारे भीतर एक ऐसा तत्त्व भी है जो समय, परिस्थिति और उपलब्धियों से कहीं बड़ा है। उसी तत्त्व की अनुभूति शायद जीवन का वास्तविक प्रयोजन है।

यदि इस पूरी पच्चीसी से कोई एक सीख लेकर उठना चाहूं तो बस यही कि—जीवन आपको बार-बार गिराएगा, बार-बार संभालेगा और अंततः यह पूछेगा कि तुमने इन सबके बीच अपने असल स्वयं को कितना बचाकर रखा?

शेष जीवन उसी प्रश्न का उत्तर खोजने की यात्रा है।

इसी कामना के साथ कि जीवन की हर श्वास आत्मिक उत्थान, सत्मार्ग और स्वाध्याय को समर्पित हो सके... अपनी इस "पच्चीसी" को यहीं विराम देता हूं।

– इति।

Sunday, July 12, 2026

लहरों, पहाड़ों और कुछ टूटती धारणाओं के बीच : समुद्र, सन्नाटा और मैं

यात्राएँ दरअसल किसी देश तक पहुँचने का नाम नहीं होतीं। वे उन धारणाओं से बाहर निकलने का नाम होती हैं जिन्हें हम बरसों तक बिना परखे अपने भीतर पालते रहते हैं। हर जगह का एक चेहरा होता है, जिसे बाज़ार हमारे सामने प्रस्तुत करता है और एक आत्मा होती है, जिसे केवल वहाँ की मिट्टी, हवा, लोग और प्रकृति मिलकर रचते हैं। दुर्भाग्य से हम प्रायः चेहरों को ही सच मान बैठते हैं और आत्मा तक पहुँचने का धैर्य नहीं जुटा पाते।


थाईलैण्ड भी मेरे लिये वर्षों तक ऐसा ही एक चेहरा था। एक ऐसा देश जिसकी चर्चा होते ही नाइट लाइफ़, बार, रंगीन रोशनियाँ और कुछ ऐसी गतिविधियाँ याद आती थीं जिनसे मेरी प्रवृत्ति का दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं। शायद इसीलिये कभी मन में वहाँ जाने की इच्छा भी नहीं जगी। सोचता था कि जिस जगह का आकर्षण ही मेरे लिये आकर्षक नहीं है, वहाँ जाकर करूँगा भी क्या? लेकिन जीवन की खूबसूरती ही यही है कि वह हमारी धारणाओं से सलाह नहीं लेता। वह अचानक एक ऐसा दरवाज़ा खोल देता है जिसके पीछे हमारी सारी समझ छोटी पड़ जाती है।

पर्यावरण पत्रकारिता की एक अंतरराष्ट्रीय समिट ने मुझे वह दरवाज़ा खोलकर दिया। सत्ताईस जून की शाम दिल्ली से उड़ान भरी और कुछ घंटों बाद फुकेट की धरती पर था। विमान से उतरते ही पहली अनुभूति समुद्र की नहीं, हवा की हुई। हवा में एक अजीब-सी नमी थी, लेकिन उससे कहीं अधिक एक ऐसी शांति थी जो महानगरों की भागती ज़िंदगी में शायद अब दुर्लभ होती जा रही है। लगा जैसे हवा भी यहाँ धीरे-धीरे चलती है ताकि किसी के ख़्यालों की धुन में खलल न पड़े और मन थी धीरता न टूटे।

अगली सुबह ही फी-फी आइलैण्ड के लिये निकले। समुद्र में आगे बढ़ती स्पीडबोट के साथ पीछे छूटता किनारा मुझे बार-बार यही समझा रहा था कि जीवन में सुंदर चीज़ें हमेशा किनारे छोड़ने के बाद ही मिलती हैं। जो लोग हर समय सुरक्षित ज़मीन तलाशते रहते हैं, वे समुद्र का विस्तार कभी नहीं जान पाते।


फी-फी आइलैण्ड पहुँचना किसी पर्यटन स्थल पर पहुँचना नहीं था, वह प्रकृति की एक जीवित कविता में प्रवेश करना था। इतना निर्मल पानी कि अपनी ही परछाईं भी अनजान लगने लगे। दूर-दूर तक फैली हरी पहाड़ियाँ, दूध-सी सफ़ेद रेत और फ़िरोज़ी लहरें... प्रकृति जब रंग भरती है तो किसी चित्रकार की कल्पना भी उसके सामने फीकी पड़ जाती है। मैं देर तक समुद्र को देखता रहा। पहाड़ों के साथ समुद्र हमेशा से मुझे इसलिए भी आकर्षित करता है क्योंकि वह अपने भीतर अनगिनत नदियों को समेट लेने के बाद भी किसी से उसका नाम नहीं पूछता। स्वयं की अनुभूति और निस्पृह प्रेम भी शायद ऐसा ही होता होगा। जितना विशाल, उतना ही निर्विकार।

वहाँ बैठकर पहली बार लगा कि प्रकृति कभी प्रदर्शन नहीं करती। वह सुंदर है, लेकिन उसे सुंदर कहलाने की बेचैनी नहीं। केवल मनुष्य है जो हर समय अपने होने का प्रमाण माँगता रहता है। अपने अस्तित्व को जहाँ तहाँ प्रदर्शित करने की बेचैनी, खुद के वजूद पर झूठे कलेवर चढ़ाने की बेचैनी।


अगले दिन फुकेट के ओल्ड टाउन की गलियों में घूमना समय के किसी पुराने अध्याय में प्रवेश करने जैसा था। रंगीन इमारतें, शांत सड़कें और हर मोड़ पर इतिहास की कोई अनकही कहानी। उसके बाद वहाँ के बौद्ध मंदिरों में पहुँचा। तो देखा कि अपनी आधुनिकता के बीच कैसे धर्म और अध्यात्म को ये देश संजोकर रखा है। सभी तरह के शोर से दूर एक अनूठी नीरवता यहाँ आपका ध्यान आकर्षित करती है। धर्म का सबसे सुंदर स्वरूप शायद मौन ही होता है। जहाँ शोर बढ़ जाता है, वहाँ आध्यात्मिकता धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है। बुद्ध की मूर्तियां शांत थी, लेकिन उनकी खामोशी भीतर चल रहे अनगिनत संवादों से कहीं अधिक मुखर थी। वाकई ईश्वर चाहे कोई भी हो शायद प्रार्थनाओं के शोर से अधिक उसे हमारी शांति ही प्रिय होती होगी।

उसी शाम क्राबी के लिये रवाना हुए। इस यात्रा का मूल उद्देश्य पर्यटन नहीं, पर्यावरण पत्रकारिता की वह समिट थी जिसके कारण यह पूरा सफ़र संभव हुआ। दुनिया के अलग-अलग देशों से आये पत्रकारों और विशेषज्ञों के बीच बैठकर महसूस हुआ कि पर्यावरण अब किसी एक देश का विषय नहीं रह गया है। न समुद्र पासपोर्ट देखते हैं, न हवाएँ वीज़ा। पृथ्वी ने कभी सीमाएँ नहीं बनाईं। सीमाएँ हमने बनाईं और फिर उन्हीं के भीतर कैद होकर स्वयं को स्वतंत्र घोषित करते रहे।

समिट समाप्त होने के अगले दिन फोर आइलैण्ड टूर था। यदि फी-फी ने समुद्र का सौंदर्य दिखाया था तो फोर आइलैण्ड ने उसकी विराटता का परिचय कराया। समुद्र के बीच खड़ी चट्टानें, उन पर उगी हरियाली और लहरों का अंतहीन संगीत... वहाँ खड़े होकर लगा कि प्रकृति जितनी विशाल है, मनुष्य का अहंकार उतना ही हास्यास्पद। हम अपने छोटे-छोटे पदों, उपलब्धियों और संपत्तियों पर इतराते रहते हैं और समुद्र एक लहर उठाकर बता देता है कि हम वास्तव में कितने छोटे हैं।


क्राबी का एओनांग बीच हर शाम एक उत्सव में बदल जाता था। दुनिया के अलग-अलग देशों के लोग, सड़क किनारे संगीत, कैफ़े, सूर्यास्त की लालिमा और समुद्र की ओर जाती हवा। लेकिन इस पूरे उत्सव में भी जो चीज़ सबसे अधिक प्रभावित करती रही, वह अनुशासन था। इतनी भीड़ के बावजूद न धक्का-मुक्की, न शोर, न अव्यवस्था। सभ्यता केवल बड़ी इमारतों से नहीं आती, वह नागरिकों के व्यवहार से जन्म लेती है।

दो दिन बाद बैंकॉक पहुँचे। आधुनिकता का ऐसा संतुलित स्वरूप कम ही शहरों में देखने को मिलता है। गगनचुंबी इमारतों के बीच सदियों पुराने मंदिर उसी गरिमा से खड़े हैं जैसे समय ने उन्हें छुआ ही न हो। चौड़ी सड़कें, व्यवस्थित यातायात और नियमों का सहज पालन यह समझाने के लिये काफी था कि किसी देश की पहचान उसके कानूनों से नहीं, उन्हें निभाने वाले लोगों से बनती है।

जंगल सफ़ारी का अनुभव रोमांच से भर देने वाला था। विभिन्न जानवरों के अद्भुत शो देखकर बार-बार यही लगा कि बुद्धिमत्ता केवल मनुष्य का विशेषाधिकार नहीं है। प्रकृति ने हर जीव को उसकी आवश्यकता के अनुसार विलक्षण बनाया है। हम स्वयं को सबसे विकसित प्राणी कहते हैं, लेकिन शायद सबसे अधिक विनाश भी हमने ही किया है।

कोरल आइलैण्ड का डे-टूर यात्रा का सबसे रोमांचक हिस्सा रहा। पैरासेलिंग करते समय जब समुद्र के ऊपर हवा में था, तब नीचे फैला नीला विस्तार किसी नक्शे की तरह दिखाई दे रहा था। उस क्षण पहली बार समझ आया कि ऊँचाई केवल देखने का कोण बदलती है, दुनिया नहीं। जीवन की अधिकांश समस्याएँ भी शायद ऐसी ही होती हैं। हम उन्हें जिस जगह खड़े होकर देखते हैं, वे वैसी ही दिखाई देती हैं।


स्नॉर्कलिंग करते हुए समुद्र के भीतर उतरना किसी दूसरे ग्रह पर पहुँच जाने जैसा अनुभव था। रंग-बिरंगी मछलियाँ, शांत जल और एक बिल्कुल अलग संसार। प्रकृति हमें बार-बार यही सिखाती है कि जीवन केवल वहाँ नहीं है जहाँ हमारी नज़र पहुँचती है।

बैंकॉक में ही जैन मंदिर जाने का सौभाग्य मिला। अपने देश से हजारों किलोमीटर दूर भगवान के दर्शन करना एक अलग ही अनुभूति थी। प्रवासी भारतीयों ने जिस श्रद्धा से अपनी संस्कृति को सँजोकर रखा है, वह सचमुच नमन योग्य है। मंदिर में बैठते ही अनायास लगा कि घर केवल वह नहीं होता जहाँ हम रहते हैं, घर वह भी होता है जहाँ हमारी आस्था सुरक्षित महसूस करती है।

थाई भोजन दुनिया भर में प्रसिद्ध है, लेकिन मेरी जीवनशैली उससे अलग रही है। यहाँ शुद्ध शाकाहारी और जैन भोजन के पर्याप्त विकल्प उपलब्ध थे, फिर भी अधिकतर समय अपने साथ लाया हुआ भोजन और बैंकॉक के परिचितों का स्नेह ही सहारा बना। यात्राएँ यह भी सिखाती हैं कि दुनिया में सबसे बड़ा स्वाद भोजन का नहीं, अपनत्व का होता है।

इस पूरे सफ़र में एक बात बार-बार भीतर कौंधती रही। जिस थाईलैण्ड को हम उसके बाज़ारू चेहरे से पहचानते हैं, उसकी वास्तविक पहचान कुछ और ही है। क्रिस्टल क्लियर बीच, हरे-भरे पर्वत, झरनों का संगीत, समुद्र की नमी, लोगों की विनम्रता, उनकी ईमानदारी, उनका सिविक सेंस और अनुशासन। किसी देश को पर्यटन के लिये सुंदर उसकी इमारतें नहीं बनातीं, वहाँ के लोग बनाते हैं। मुस्कुराता हुआ चेहरा, साफ़ सड़क और नियमों का पालन किसी भी स्मारक से कहीं अधिक बड़ा आकर्षण होता है।


पाँच जुलाई की रात जब दिल्ली लौट रहा था तो सूटकेस में कुछ कपड़े, कुछ स्मृतियाँ और सैकड़ों तस्वीरें थीं, लेकिन सबसे बड़ा सामान मेरे भीतर था। लौटा मैं वही था, पर वैसा नहीं था।

दरअसल यात्राएँ हमें नई जगहें नहीं दिखातीं, वे हमारी दृष्टि बदल देती हैं। वे समझाती हैं कि जीवन केवल वही नहीं है जो हम रोज़ जी रहे हैं। दुनिया हमारी कल्पना से कहीं अधिक बड़ी है और हमारी चिंताएँ उससे कहीं अधिक छोटी। प्रकृति के बीच खड़े होकर अहंकार स्वयं सिकुड़ने लगता है। ईर्ष्या, राग-द्वेष, प्रतिस्पर्धा और संग्रह की भूख अचानक बहुत बौनी दिखाई देने लगती है।

किताबें पढ़कर हम जानकार हो सकते हैं, लेकिन यात्राएँ हमें थोड़ा बेहतर मनुष्य बनाती हैं। वे हमारे भीतर जमा धूल झाड़ देती हैं। वे हमें याद दिलाती हैं कि हम पृथ्वी के स्वामी नहीं, केवल यात्री हैं। कुछ समय के लिये आये हैं, थोड़ा-सा देखेंगे, थोड़ा-सा सीखेंगे और फिर आगे बढ़ जायेंगे।

शायद इसी लिये हर अच्छी यात्रा अधूरी ही लौटती है। क्योंकि यदि वह पूरी हो गयी, तो फिर अगली यात्रा की चाह कहाँ बचेगी? जैसे प्रेम की कोई मंज़िल नहीं होती, वैसे ही यात्राओं का भी कोई अंतिम पड़ाव नहीं होता। एक यात्रा समाप्त होती है तो दूसरी भीतर जन्म लेने लगती है। पासपोर्ट पर लगी मुहरें भले समय के साथ धुंधली पड़ जाएँ, लेकिन आत्मा पर दर्ज यात्राएँ कभी फीकी नहीं होतीं। और असल मायने में एक उत्तम यात्रा थमने की जिजीविषा भी पैदा करती है, कदमों से नहीं अपनी आंतरिक चंचलता से... मानो इस ब्रह्मांड की इस स्वचलित प्रवाह धारा में "मैं" महज तट पर बैठा एक दृष्टा मात्र हूँ... ठहरा हुआ, थमा हुआ... कहीं न जाने को आतुर।

और शायद यही किसी भी यात्रा का सबसे सुंदर स्मृति-चिह्न है—हम किसी देश से लौटते अवश्य हैं, लेकिन अपने भीतर से कभी वापस नहीं आ पाते... चैतन्य की डुबकियां कुछ ऐसी ही तो हैं।