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Sunday, July 12, 2026

लहरों, पहाड़ों और कुछ टूटती धारणाओं के बीच : समुद्र, सन्नाटा और मैं

यात्राएँ दरअसल किसी देश तक पहुँचने का नाम नहीं होतीं। वे उन धारणाओं से बाहर निकलने का नाम होती हैं जिन्हें हम बरसों तक बिना परखे अपने भीतर पालते रहते हैं। हर जगह का एक चेहरा होता है, जिसे बाज़ार हमारे सामने प्रस्तुत करता है और एक आत्मा होती है, जिसे केवल वहाँ की मिट्टी, हवा, लोग और प्रकृति मिलकर रचते हैं। दुर्भाग्य से हम प्रायः चेहरों को ही सच मान बैठते हैं और आत्मा तक पहुँचने का धैर्य नहीं जुटा पाते।


थाईलैण्ड भी मेरे लिये वर्षों तक ऐसा ही एक चेहरा था। एक ऐसा देश जिसकी चर्चा होते ही नाइट लाइफ़, बार, रंगीन रोशनियाँ और कुछ ऐसी गतिविधियाँ याद आती थीं जिनसे मेरी प्रवृत्ति का दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं। शायद इसीलिये कभी मन में वहाँ जाने की इच्छा भी नहीं जगी। सोचता था कि जिस जगह का आकर्षण ही मेरे लिये आकर्षक नहीं है, वहाँ जाकर करूँगा भी क्या? लेकिन जीवन की खूबसूरती ही यही है कि वह हमारी धारणाओं से सलाह नहीं लेता। वह अचानक एक ऐसा दरवाज़ा खोल देता है जिसके पीछे हमारी सारी समझ छोटी पड़ जाती है।

पर्यावरण पत्रकारिता की एक अंतरराष्ट्रीय समिट ने मुझे वह दरवाज़ा खोलकर दिया। सत्ताईस जून की शाम दिल्ली से उड़ान भरी और कुछ घंटों बाद फुकेट की धरती पर था। विमान से उतरते ही पहली अनुभूति समुद्र की नहीं, हवा की हुई। हवा में एक अजीब-सी नमी थी, लेकिन उससे कहीं अधिक एक ऐसी शांति थी जो महानगरों की भागती ज़िंदगी में शायद अब दुर्लभ होती जा रही है। लगा जैसे हवा भी यहाँ धीरे-धीरे चलती है ताकि किसी के ख़्यालों की धुन में खलल न पड़े और मन थी धीरता न टूटे।

अगली सुबह ही फी-फी आइलैण्ड के लिये निकले। समुद्र में आगे बढ़ती स्पीडबोट के साथ पीछे छूटता किनारा मुझे बार-बार यही समझा रहा था कि जीवन में सुंदर चीज़ें हमेशा किनारे छोड़ने के बाद ही मिलती हैं। जो लोग हर समय सुरक्षित ज़मीन तलाशते रहते हैं, वे समुद्र का विस्तार कभी नहीं जान पाते।


फी-फी आइलैण्ड पहुँचना किसी पर्यटन स्थल पर पहुँचना नहीं था, वह प्रकृति की एक जीवित कविता में प्रवेश करना था। इतना निर्मल पानी कि अपनी ही परछाईं भी अनजान लगने लगे। दूर-दूर तक फैली हरी पहाड़ियाँ, दूध-सी सफ़ेद रेत और फ़िरोज़ी लहरें... प्रकृति जब रंग भरती है तो किसी चित्रकार की कल्पना भी उसके सामने फीकी पड़ जाती है। मैं देर तक समुद्र को देखता रहा। पहाड़ों के साथ समुद्र हमेशा से मुझे इसलिए भी आकर्षित करता है क्योंकि वह अपने भीतर अनगिनत नदियों को समेट लेने के बाद भी किसी से उसका नाम नहीं पूछता। स्वयं की अनुभूति और निस्पृह प्रेम भी शायद ऐसा ही होता होगा। जितना विशाल, उतना ही निर्विकार।

वहाँ बैठकर पहली बार लगा कि प्रकृति कभी प्रदर्शन नहीं करती। वह सुंदर है, लेकिन उसे सुंदर कहलाने की बेचैनी नहीं। केवल मनुष्य है जो हर समय अपने होने का प्रमाण माँगता रहता है। अपने अस्तित्व को जहाँ तहाँ प्रदर्शित करने की बेचैनी, खुद के वजूद पर झूठे कलेवर चढ़ाने की बेचैनी।


अगले दिन फुकेट के ओल्ड टाउन की गलियों में घूमना समय के किसी पुराने अध्याय में प्रवेश करने जैसा था। रंगीन इमारतें, शांत सड़कें और हर मोड़ पर इतिहास की कोई अनकही कहानी। उसके बाद वहाँ के बौद्ध मंदिरों में पहुँचा। तो देखा कि अपनी आधुनिकता के बीच कैसे धर्म और अध्यात्म को ये देश संजोकर रखा है। सभी तरह के शोर से दूर एक अनूठी नीरवता यहाँ आपका ध्यान आकर्षित करती है। धर्म का सबसे सुंदर स्वरूप शायद मौन ही होता है। जहाँ शोर बढ़ जाता है, वहाँ आध्यात्मिकता धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है। बुद्ध की मूर्तियां शांत थी, लेकिन उनकी खामोशी भीतर चल रहे अनगिनत संवादों से कहीं अधिक मुखर थी। वाकई ईश्वर चाहे कोई भी हो शायद प्रार्थनाओं के शोर से अधिक उसे हमारी शांति ही प्रिय होती होगी।

उसी शाम क्राबी के लिये रवाना हुए। इस यात्रा का मूल उद्देश्य पर्यटन नहीं, पर्यावरण पत्रकारिता की वह समिट थी जिसके कारण यह पूरा सफ़र संभव हुआ। दुनिया के अलग-अलग देशों से आये पत्रकारों और विशेषज्ञों के बीच बैठकर महसूस हुआ कि पर्यावरण अब किसी एक देश का विषय नहीं रह गया है। न समुद्र पासपोर्ट देखते हैं, न हवाएँ वीज़ा। पृथ्वी ने कभी सीमाएँ नहीं बनाईं। सीमाएँ हमने बनाईं और फिर उन्हीं के भीतर कैद होकर स्वयं को स्वतंत्र घोषित करते रहे।

समिट समाप्त होने के अगले दिन फोर आइलैण्ड टूर था। यदि फी-फी ने समुद्र का सौंदर्य दिखाया था तो फोर आइलैण्ड ने उसकी विराटता का परिचय कराया। समुद्र के बीच खड़ी चट्टानें, उन पर उगी हरियाली और लहरों का अंतहीन संगीत... वहाँ खड़े होकर लगा कि प्रकृति जितनी विशाल है, मनुष्य का अहंकार उतना ही हास्यास्पद। हम अपने छोटे-छोटे पदों, उपलब्धियों और संपत्तियों पर इतराते रहते हैं और समुद्र एक लहर उठाकर बता देता है कि हम वास्तव में कितने छोटे हैं।


क्राबी का एओनांग बीच हर शाम एक उत्सव में बदल जाता था। दुनिया के अलग-अलग देशों के लोग, सड़क किनारे संगीत, कैफ़े, सूर्यास्त की लालिमा और समुद्र की ओर जाती हवा। लेकिन इस पूरे उत्सव में भी जो चीज़ सबसे अधिक प्रभावित करती रही, वह अनुशासन था। इतनी भीड़ के बावजूद न धक्का-मुक्की, न शोर, न अव्यवस्था। सभ्यता केवल बड़ी इमारतों से नहीं आती, वह नागरिकों के व्यवहार से जन्म लेती है।

दो दिन बाद बैंकॉक पहुँचे। आधुनिकता का ऐसा संतुलित स्वरूप कम ही शहरों में देखने को मिलता है। गगनचुंबी इमारतों के बीच सदियों पुराने मंदिर उसी गरिमा से खड़े हैं जैसे समय ने उन्हें छुआ ही न हो। चौड़ी सड़कें, व्यवस्थित यातायात और नियमों का सहज पालन यह समझाने के लिये काफी था कि किसी देश की पहचान उसके कानूनों से नहीं, उन्हें निभाने वाले लोगों से बनती है।

जंगल सफ़ारी का अनुभव रोमांच से भर देने वाला था। विभिन्न जानवरों के अद्भुत शो देखकर बार-बार यही लगा कि बुद्धिमत्ता केवल मनुष्य का विशेषाधिकार नहीं है। प्रकृति ने हर जीव को उसकी आवश्यकता के अनुसार विलक्षण बनाया है। हम स्वयं को सबसे विकसित प्राणी कहते हैं, लेकिन शायद सबसे अधिक विनाश भी हमने ही किया है।

कोरल आइलैण्ड का डे-टूर यात्रा का सबसे रोमांचक हिस्सा रहा। पैरासेलिंग करते समय जब समुद्र के ऊपर हवा में था, तब नीचे फैला नीला विस्तार किसी नक्शे की तरह दिखाई दे रहा था। उस क्षण पहली बार समझ आया कि ऊँचाई केवल देखने का कोण बदलती है, दुनिया नहीं। जीवन की अधिकांश समस्याएँ भी शायद ऐसी ही होती हैं। हम उन्हें जिस जगह खड़े होकर देखते हैं, वे वैसी ही दिखाई देती हैं।


स्नॉर्कलिंग करते हुए समुद्र के भीतर उतरना किसी दूसरे ग्रह पर पहुँच जाने जैसा अनुभव था। रंग-बिरंगी मछलियाँ, शांत जल और एक बिल्कुल अलग संसार। प्रकृति हमें बार-बार यही सिखाती है कि जीवन केवल वहाँ नहीं है जहाँ हमारी नज़र पहुँचती है।

बैंकॉक में ही जैन मंदिर जाने का सौभाग्य मिला। अपने देश से हजारों किलोमीटर दूर भगवान के दर्शन करना एक अलग ही अनुभूति थी। प्रवासी भारतीयों ने जिस श्रद्धा से अपनी संस्कृति को सँजोकर रखा है, वह सचमुच नमन योग्य है। मंदिर में बैठते ही अनायास लगा कि घर केवल वह नहीं होता जहाँ हम रहते हैं, घर वह भी होता है जहाँ हमारी आस्था सुरक्षित महसूस करती है।

थाई भोजन दुनिया भर में प्रसिद्ध है, लेकिन मेरी जीवनशैली उससे अलग रही है। यहाँ शुद्ध शाकाहारी और जैन भोजन के पर्याप्त विकल्प उपलब्ध थे, फिर भी अधिकतर समय अपने साथ लाया हुआ भोजन और बैंकॉक के परिचितों का स्नेह ही सहारा बना। यात्राएँ यह भी सिखाती हैं कि दुनिया में सबसे बड़ा स्वाद भोजन का नहीं, अपनत्व का होता है।

इस पूरे सफ़र में एक बात बार-बार भीतर कौंधती रही। जिस थाईलैण्ड को हम उसके बाज़ारू चेहरे से पहचानते हैं, उसकी वास्तविक पहचान कुछ और ही है। क्रिस्टल क्लियर बीच, हरे-भरे पर्वत, झरनों का संगीत, समुद्र की नमी, लोगों की विनम्रता, उनकी ईमानदारी, उनका सिविक सेंस और अनुशासन। किसी देश को पर्यटन के लिये सुंदर उसकी इमारतें नहीं बनातीं, वहाँ के लोग बनाते हैं। मुस्कुराता हुआ चेहरा, साफ़ सड़क और नियमों का पालन किसी भी स्मारक से कहीं अधिक बड़ा आकर्षण होता है।


पाँच जुलाई की रात जब दिल्ली लौट रहा था तो सूटकेस में कुछ कपड़े, कुछ स्मृतियाँ और सैकड़ों तस्वीरें थीं, लेकिन सबसे बड़ा सामान मेरे भीतर था। लौटा मैं वही था, पर वैसा नहीं था।

दरअसल यात्राएँ हमें नई जगहें नहीं दिखातीं, वे हमारी दृष्टि बदल देती हैं। वे समझाती हैं कि जीवन केवल वही नहीं है जो हम रोज़ जी रहे हैं। दुनिया हमारी कल्पना से कहीं अधिक बड़ी है और हमारी चिंताएँ उससे कहीं अधिक छोटी। प्रकृति के बीच खड़े होकर अहंकार स्वयं सिकुड़ने लगता है। ईर्ष्या, राग-द्वेष, प्रतिस्पर्धा और संग्रह की भूख अचानक बहुत बौनी दिखाई देने लगती है।

किताबें पढ़कर हम जानकार हो सकते हैं, लेकिन यात्राएँ हमें थोड़ा बेहतर मनुष्य बनाती हैं। वे हमारे भीतर जमा धूल झाड़ देती हैं। वे हमें याद दिलाती हैं कि हम पृथ्वी के स्वामी नहीं, केवल यात्री हैं। कुछ समय के लिये आये हैं, थोड़ा-सा देखेंगे, थोड़ा-सा सीखेंगे और फिर आगे बढ़ जायेंगे।

शायद इसी लिये हर अच्छी यात्रा अधूरी ही लौटती है। क्योंकि यदि वह पूरी हो गयी, तो फिर अगली यात्रा की चाह कहाँ बचेगी? जैसे प्रेम की कोई मंज़िल नहीं होती, वैसे ही यात्राओं का भी कोई अंतिम पड़ाव नहीं होता। एक यात्रा समाप्त होती है तो दूसरी भीतर जन्म लेने लगती है। पासपोर्ट पर लगी मुहरें भले समय के साथ धुंधली पड़ जाएँ, लेकिन आत्मा पर दर्ज यात्राएँ कभी फीकी नहीं होतीं। और असल मायने में एक उत्तम यात्रा थमने की जिजीविषा भी पैदा करती है, कदमों से नहीं अपनी आंतरिक चंचलता से... मानो इस ब्रह्मांड की इस स्वचलित प्रवाह धारा में "मैं" महज तट पर बैठा एक दृष्टा मात्र हूँ... ठहरा हुआ, थमा हुआ... कहीं न जाने को आतुर।

और शायद यही किसी भी यात्रा का सबसे सुंदर स्मृति-चिह्न है—हम किसी देश से लौटते अवश्य हैं, लेकिन अपने भीतर से कभी वापस नहीं आ पाते... चैतन्य की डुबकियां कुछ ऐसी ही तो हैं।

Wednesday, December 24, 2025

बुर्ज खलीफ़ा से मन की यात्रा तक : एक सफ़र, कई अर्थ

और आखिर…

समय फिर अपनी एक और परत उतार चुका है। वर्ष 2025 का अंतिम सप्ताह शुरू हो गया है। कैलेंडर के पन्ने भले बदल रहे हों, लेकिन मन कुछ ठहर–सा गया है—बीते वर्ष की ओर। जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो एहसास होता है कि जीवन में सब कुछ योजनाबद्ध नहीं होता। कई बार जो घटता है, वही सबसे ज़रूरी होता है। कई बार जिन रास्तों पर बिना तैयारी निकल पड़ते हैं, वही भीतर तक पहुँचा देते हैं।

यूँ तो इस पूरे वर्ष में काम, दायित्व और संघर्षों की अपनी कहानी रही, लेकिन इन सबके बीच एक यात्रा है जो स्मृति में बार–बार उभर आती है—यूएई की वह यात्रा, जो महज़ देशों और शहरों की नहीं थी, बल्कि भीतर और बाहर—दोनों दिशाओं में की गई एक यात्रा थी।

यह सफ़र किसी पर्यटन की लालसा से शुरू नहीं हुआ था। एक निजी कार्य के सिलसिले में 24 सितंबर से 30 सितंबर 2025 तक आबुधाबी, दुबई और अजमान जाना तय हुआ। मेरे साथ थे—मेरा आठ वर्षीय बेटा तत्त्वार्थ, मित्र विवेक और उसका पुत्र निर्ग्रन्थ। सच कहूँ तो मन में यह यात्रा बस काम तक सीमित रखने का विचार था। लेकिन बच्चों की उत्सुक आँखों, उनके प्रश्नों और उनके सपनों ने इस सफ़र को विस्तार दिया। शायद जीवन भी ऐसा ही है—हम सीमाएँ तय करते हैं, और नियति उन्हें धीरे–धीरे तोड़ती चली जाती है।

24 सितंबर की रात मुंबई से एतिहाद एयरवेज़ की उड़ान ने हमें आबुधाबी की ओर ले जाना शुरू किया। विमान की खिड़की से झाँकते हुए नीचे फैलता अँधेरा और ऊपर सितारों की शांति—मन को अनायास ही भीतर की यात्रा पर ले जा रही थी। लगा, जैसे ज़मीन से उठते ही कई विचार भी पीछे छूटते जा रहे हों। शायद यात्रा का पहला चरण यही होता है—अपने भीतर के बोझ से थोड़ा हल्का होना।

25 सितंबर की सुबह आबुधाबी पहुँचे। वहाँ से बस द्वारा दुबई की ओर प्रस्थान किया। यह रास्ता महज़ शहरों को जोड़ने वाला नहीं था—यह अनुशासन, आधुनिकता और दृष्टि का रास्ता था। चौड़ी सड़कें, सटीक ट्रैफिक, शांत गति—मानो यह देश अपने नागरिकों को यह सिखा रहा हो कि विकास शोर से नहीं, व्यवस्था से आता है।

दुबई पहुँचकर होटल में ठहरने के बाद शाम को हम बर दुबई की गलियों में निकल पड़े। अनजान ज़मीन पर चलना, विभिन्न भाषाओं, चेहरों और संस्कृतियों के बीच खुद को देखना—यह अनुभव भीतर कुछ खोलता है। वहाँ कोई आपको नहीं जानता, फिर भी आप स्वयं को अधिक जानने लगते हैं। यह पहली बार था जब दुबई सिर्फ़ एक शहर नहीं, एक एहसास बनकर सामने आया।

26 सितंबर का दिन गति से भरा था। दुबई फ्रेम में अतीत और भविष्य को आमने–सामने खड़ा देखा। म्यूज़ियम ऑफ़ द फ़्यूचर ने यह सवाल भीतर छोड़ा—क्या भविष्य केवल तकनीक है, या चेतना भी? दुबई क्रीक ने इतिहास की धड़कन सुनाई, मरीना वॉक ने वर्तमान की चमक दिखाई, और अटलांटिस, जाबील पैलेस व जुमेरा बीच ने यह एहसास दिया कि वैभव तब सुंदर होता है, जब वह संतुलित हो।

अगले दिन फिर आबुधाबी—लेकिन इस बार मन अलग था। बाप्स हिंदू मंदिर पहुँचकर भीतर एक गहरी शांति उतरी। लगा कि आधुनिकता और आध्यात्मिकता विरोधी नहीं हैं, यदि दोनों में सम्मान का भाव हो। फरारी वर्ल्ड और एमिरेट्स पैलेस ने वैभव दिखाया, लेकिन शेख ज़ायेद ग्रैंड मस्जिद ने विनम्रता सिखाई। श्वेत संगमरमर में लिपटी वह भव्यता दरअसल अनुशासन, श्रद्धा और दृष्टि का प्रतीक थी। वहाँ खड़े होकर यह समझ आया कि रेगिस्तान से इमारतें नहीं, संकल्प उगते हैं।

28 सितंबर का दिन कुछ खास था, सुबह ही अजमान स्थि जैन मंदिर में भगवान के दर्शन का सौभाग्य मिला। और उसके बाद साधर्मियों के बीच पहुँचकर, आचार्य कुन्दकुन्द के ग्रन्थ समयसार पर स्वाध्याय— यह अनुभव बाहर की यात्रा को भीतर से जोड़ रहा था। यूएई जैसे देश में रहकर भी लोग अपनी संस्कृति, संस्कारों और आध्यात्मिक चेतना को जीवित रखे हुए हैं—यह देखकर लगा कि जड़ें गहरी हों, तो मिट्टी बदलने से पेड़ नहीं सूखते।

शाम को डेज़र्ट सफारी—रेत के समंदर में उतरना, सूरज को ढलते देखना, ऊँट की सवारी और आग का नृत्य। बच्चों की खुशी में खुद को देखना—यह शायद किसी भी पिता के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार होता है। लगा कि यात्राएँ बच्चों को दुनिया दिखाने के लिए नहीं, उन्हें संवेदना सिखाने के लिए होती हैं।

29 सितंबर को बुर्ज खलीफ़ा की 125वीं मंज़िल से नीचे फैला दुबई देखा। ऊँचाई पर खड़े होकर मन ने एक सवाल किया—हम ऊपर क्यों जाना चाहते हैं? शायद इसलिए कि नीचे को बेहतर समझ सकें। शाम की यॉट राइड ने दुबई को रोशनी की कविता बना दिया। रात के समय यह शहर किसी सपने जैसा लगता है—पर एक जागता हुआ सपना।

अंतिम दिन दुबई के जैन मंदिर में दर्शन और साधर्मी भाई के यहाँ भोजन—अपनेपन का यह एहसास विदेश में और गहरा हो जाता है। संस्कार जब दूरी तय करते हैं, तो और मजबूत हो जाते हैं। वाकई, यह ट्रिप केवल एक विदेश यात्रा नहीं थी। यह बच्चों की आँखों में बसे सपनों, मित्रता की गर्माहट, साधर्मी बंधुत्व और आधुनिकता के बीच संस्कृति के संतुलन का साक्षात्कार थी।

शाम को आबुधाबी से मुंबई की उड़ान थी। लौटते समय लगा—हम वापस आ तो रहे हैं, लेकिन कुछ पीछे छोड़ नहीं रहे। कुछ साथ ले जा रहे हैं—अनुभव, प्रश्न, स्मृतियाँ और एक नई दृष्टि।

यह यात्रा शायद मुझे सिखा गई कि
सफ़र केवल देखने का नहीं होता,
सफ़र समझने का भी होता है,
सफर, खुद से गुजरने का भी होता है
सफर, शहरों को पढ़ने का भी होता है
अपने व्यक्तित्व को गढ़ने का भी होता है
और कभी–कभी,
रेगिस्तान हमें
खुद के सन्नाटों को चीरने के मंत्र
से भी परिचित करा देता है।

~अंकुर