Tuesday, December 16, 2014

मेरी प्रथम पच्चीसी : दसवी किस्त


(शुरुआती नौ किस्तों में जीवन के प्रारंभिक अठारह वर्षों की दास्तां सुना चुका हूँ, अब तक की ज़िंदगी के अनुभव बहुत ज्यादा हैपनिंग तो नहीं रहे पर जैसे भी रहे उनमें सिखाने का माद्दा बहुत था। अपने परिवार से निकलकर जिस हॉस्टल में स्नातक किया वहाँ भी माहौल काफी कुछ सुरक्षित ही था और लगभग एक जैसे वर्ग, संस्कृति और प्रकृति वाले लोगों के साथ रहा। अपने हॉस्टल लाइफ का विवरण एक अन्य ब्लॉग पर स्मारक रोमांस और Pinkish Day in Pinkcity नाम से लिखी पोस्ट में कर चुका हूं। इसलिये यहाँ ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा, सीधे आगे की किस्सागोई शुरु करता हूँ। चुंकि पहले कह चुका हूँ मेरी प्रथम पच्चीसी स्वांतसुखाय ही लिखी जा रही है इसलिये किसी से भी जबरदस्ती इसमें प्रवेश करने का आग्रह नहीं करुंगा। अपनी रुचि और समय के अनुकूल ही इसमें प्रविष्ट हों।)

गतांक से आगे....

ज़िंदगी उस वक्त सबसे ज्यादा कठिन हो जाती है..जब सीधे चल रहे रास्तों के बाद अचानक कोई मोड़ आता है। जब फैसले लेेने की घड़ी आती है। जब हमें ऐसे चौराहों पर छोड़ दिया जाता है जहां रास्तों का पता बताने वाले बोर्ड  नहीं लगे होते। लेकिन आप जहाँ हो वहाँ आप रह नहीं सकते और आगे बढ़ने को लेकर निरंतर संशय की स्थिति बनी रहती है। ज़िंदगी हर हाल में फैसले की दरकार कर रही होती है और ऐसे चौराहों से जीवन में पहली बार मुलाकात हो रही थी। हालांकि हाई स्कूल या हायर सेकेंडरी के बाद इस तरह की परिस्थितियां बनती हैं जब फैसला करना होता है लेकिन तब हमारे ज्ञान और विवेक की बजाय माँ-बाप के लिये गये फैसलों की अहमियत ज्यादा होती है। पर स्नातक की परीक्षा करने के बाद पूर्णतः स्वंय की समझ और हिम्मत से ही चुनाव करना पड़ता है। जयपुर के टोडरमल स्मारक में पांच साल पूरे करने के बाद अब फैसले की घड़ी थी, बदलाव की घड़ी थी और बदलाव हमेशा आपको विचलित करता है।

उस परिसर में रहते हुए कभी सोचा नहीं था कि इक दिन इसे छोड़कर किसी और तलाश में निकलना होगा।  दोस्तों का साथ, फुरसत के लम्हे और ऐशो-आराम की घड़ियां अब इतिहास बनने जा रही थी। संघर्ष का सफ़र शुरु हो रहा था। इसलिये मन बड़ा बेचैन था और इन बेचैनियों के दौर में ही आपको अपने सफ़र का अगला रास्ता तय करना होता है। यदि अच्छी किस्मत, हौंसला और हिम्मत न हो तो इस दौर में लिये गये फैसले पूरी ज़िंदगी को ही अंधेरों के भंवर में धकेल सकते हैं। इसलिये जिम्मेदारी ज्यादा थी। जो छूट रहा था उसका ग़म था, जो हो रहा था वो बहुत तनावपूर्ण था और जो हासिल करना है वो बहुत ही कन्फ्युसिंग था। ऐसी मानसिक स्थिति के बीच मैंने ग्लैमर की चकाचौंध में मुग्ध होकर मीडिया को अपना करियर बनाने का मन बनाया। अपने हॉस्टल में मैं स्टार माना जाता था, अच्छा वक्ता, तार्किक दक्षता वाला और कुछ हद तक बुद्धिमान भी समझा जाता था...पर उस छोटे से दायरे में मैं कूपमंडूक ही था और खुद को मिली तनिक सी प्रशंसा में उन्मादी हो रहा था। उस उन्माद ने ही मुझमें ये आत्मविश्वास भरा था कि मैं मीडिया में भी स्टार बन सकता हूँ। लेकिन जैसे ही उस छोटे से कूँए से निकल कर दुनिया के समंदर में पहुंचा तो अपने अदने से कद का ज्ञान हुआ और पता चला कि मियां! यहाँ तो तुमसे कई बेहतर बल्लम खाँ पहले से ही अपनी मंजिल को पाने के लिये संघर्ष कर रहे हैं।

बहरहाल, टोडरमल स्मारक के छूटने के साथ ही अब एक नया शहर और नया सफ़र मुझे मिल चुका था। भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में दाखिला लेने जा रहा था और इस युनिवर्सिटी के सामान्य से इंट्रेंस एक्साम ने ही मुझे अपनी गिरेबान में झांकने का अवसर प्रदान कर दिया और ये पता चल गया कि अपने इस झूठे आत्मविश्वास को जितने जल्दी खुद से बाहर किया जा सके उतना बेहतर है क्योंकि ये आत्मविश्वास नहीं अहंकार है और अहंकार के साथ कभी कुछ सीखा नहीं जा सकता। विनम्रता से ही ज्ञान प्राप्त करने की पात्रता प्रगट होती है और विनम्रता ही ज्ञान या शिक्षा का परिणाम होना चाहिये। इंट्रेस टेस्ट में मेरा सिलेक्शन नहीं हुआ और मध्यप्रदेश का होने के कारण स्टेट कोटे के कारण वेटिंग लिस्ट में भी अंतिम स्थान मिला था। बाद में किस्मत और थोड़ी मिन्नतों के बाद जैसे-तैसे उस युनिवर्सिटी में पढ़ने का अवसर मिला। इससे पहले के कुछ दिन बेहद कठिन और किंकर्तव्यविमूढ़ कर देने वाले थे।

6 अगस्त 2007, युनिवर्सिटी में अपनी पहली क्लास अटेंड करने पहुंचा। सब कुछ अलग और नया था। अब तक जो पढ़ा था उसका रत्तीभर भी यहाँ काम नहीं आना था, और जो यहाँ की ज़रूरत थी उसका तनिक भी ज्ञान नहीं था। जो साथी मेरे साथ थे उनमें से कोई दिल्ली विश्विद्यालय, इलाहबाद विश्वविद्यालय और फर्ग्युसन इंस्टीट्युट जैसे देश के नामी-गिरामी शिक्षा संस्थानों से अध्ययन करके मेरे साथ बैठे थे। जिनकी देश-दुनिया के गहनतम मुद्दों पर होने वाली चर्चा मेरे लिये किसी दूसरे ग्रह की बात लगती थी। संस्कृत, अंग्रेजी साहित्य और दर्शनशास्त्र के अध्ययन करने से मैं संस्कारी और चरित्रवान तो था पर बुद्धिमान कतई नहीं। अभी तक सिर्फ ब्वायस् हॉस्टल और कॉलेज में पढ़ाई की थी तो कन्याओं के सानिध्य से ही डर लगता था। लेकिन अब माहौल बदल गया था और ज़िंदगी ओवर फ्रेंक होने की डिमांड कर रही थी। फ्रेंक और बोल्ड होना ज़रुरी तो था पर ये सब रातों-रात तो हो नहीं सकता था। इसलिये अपनी क्लास पढ़कर तुरंत घर भाग लेता। दो-चार ऐसे लोगों से दोस्ती ज़रूर हो गई थी जो मेरी ही तरह अपने अस्तित्व की तलाश कर रहे थे। तब लड़कियों से दूर भागने का कारण मैं लोगों को ये बताता कि मैंं इन सब चीज़ों में अपना टायम वेस्ट नहीं करना चाहता पर सच्चाई यह थी कि मुझमें न तो हिम्मत थी और न लड़कियों से बात करने का हुनर। अन्यथा दिल तो बहुत करता..कि मेरी भी इन सबसे यारी हो, मैं भी मस्तमौला बन यहां-वहाँ घूमो, मैं भी किसी से प्यार करूं और जीभर के अपना समय बरबाद करूं।

लगभग इसी तरह अपना पहला सेमेस्टर गुजार दिया और जयपुर को छोड़े लगभग साल भर हो जाने के बाद भी आये दिन पुराने साथियों और गुजरे दिनों की यादें परेशान करती। वक्त बदल चुका था पर मैं नहीं बदल पा रहा था। अपने पहले सेमेस्टर में कुछ अच्छा हुआ तो वो बस यही कि प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित एक वाद-विवाद प्रतियोगिता के लिये मेरा चयन युनिवर्सिटी से हुआ और दिल्ली के एक बड़े मंच पर युनिवर्सिटी का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला। जिससे अपनी कक्षा के लोगों के बीच कुछ गुमनामी जरूर कम हुई पर तेजी से बन रहे छोटे-छोटे ग्रुप में से किसी भी ग्रुप का सदस्य मैं नहीं बन सका और लड़कियों से दोस्ती अब तक महरूम ही थी। आज सोचता हूँ तो लगता है एक बेहद मूर्खतापूर्ण ख्वाहिश के लिये मैंने कई-कई घंटे फिजूल की हरकतों और विचारों में ज़ाया किये। एक 25-30 लोगों की कक्षा का खेमों में बंटना अपने-आप में बुरा है जिससे हमारे संबंधों और सोच का दायरा भी सिकुड़कर बेहद छोटा हो जाता है और इस तरह छोटे से दायरे में सिमट जाने से सीखने की संभावनाएं भी कम होती है क्योंकि अधिकतम का सानिध्य हमें ज्यादा समझ प्रदान करता है। लेकिन उम्र के उस दौर में यह सब चीज़ें समझ नहीं आती, हम किसी मजबूत और रुतबेदार ग्रुप का सदस्य बनना चाहते हैं और खेमों में बंटकर कब हम स्वार्थी और ओछी प्रवृत्तियां करने लगते हैं पता ही नहीं चलता। खुद को सुपीरियर दिखाने की चाहत में कई दिखावे और झूठे शिगूफे भी हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाते हैं।

खैर, किसी ग्रुप्स का सदस्य न होने का दर्द था तो खुशनसीबी भी थी कि ग्रुपिंग में बरबाद होने वाले समय से बचा रहा जिससे कि इस सेमेस्टर में कई किताबें पढ़ी, फ़िल्में देखी जिससे अपने साथियों के बीच का मेरा पिछड़ापन कुछ कम ज़रूर हुआ। पर समझ का दायरा सिर्फ किताबों तक ही सीमित था, ज़िंदगी की समझ तो गलतियां करने और ठोकर खाने से ही बढ़ती है। इस सेमेस्टर के अंत तक पहुंचते-पहुंचते ज़िंदगी के कई अहंकार और टूटे। जिसके चलते जीवन की महत्ता का आंशिक अहसास हुआ। उन घटनाओं के ज़िक्र के चलते ये किस्त काफी लंबी हो जायेगी, बस इसी विस्तार भय से अभी यहीं रुकना मुनासिब समझता हूँ..पर शायद ज़िंदगी की असली 'साढ़े साती' की शुरुआत अब होने वाली थी। जीवन की क्षणभंगुरता और लम्हों की अहमियत क्या होती है यह समझ आ रहा था..सेहत, समय और संबंधों की कद्र बताने वाली घटनाएं घटना शुरु हो रही थी....उन तमाम घटनाओं के साथ जल्द लौदूंगा..क्योंकि मेरी पच्चीसी का असल सार तो उन घटनाओं में ही है........................

Saturday, November 22, 2014

'वेस्ट ऑफ टाइम' की 'इम्पॉर्टेंस'

राजकुमार हिरानी निर्देशित और आमिर खान अभिनीत साल की सबसे प्रतीक्षित फ़िल्म 'पीके' अपनी रिलीज़ से पहले ही जमकर सुर्खियां बटोर रही हैं। जिनमें हाल ही में बाहर आया फिल्म का संगीत और खास तौर पर 'लव इज वेस्ट ऑफ टाइम' खासा आकर्षित करता है। कोई गहरी और दार्शनिक बात न करते हुए गीत के बोल सिर्फ उन जज़्बातों को बयां करते हैं जो हर युवामन के अनुभूत हैं। युवामन की फितरत को भली भांति समझते हुए गीतकार जहाँ प्यार-व्यार को वेस्ट ऑफ टाइम कहता है तो वहीं आई वांट टू वेस्ट माय टाइम, आई लव दिस भेस्ट ऑफ टाइम कहता भी नज़र आता है।

यकीनन, जब दार्शनिको द्वारा ये कहा जाता है कि प्रेम बुद्धिमानों की मूर्खता और मूर्खों की बुद्धिमानी है। तो इस पंक्ति में प्रेम को वक्त की बरबादी के साथ उसकी उपयोगिता को भी वे बड़े डिप्लोमेटिक तरह से बयां कर देतेे हैंँ। इस दुनिया में अब तक जितना कुछ भी सुना-समझा और अनुभव किया है उसमें इक चीज़ समझ आई है कि ज़िंदगी के अनेक विषयों में से प्रेम ही एकमात्र ऐसा विषय है जिस पर कही गई हर बात सही है। प्रेम पर व्यक्त तमाम नज़रिये अपनी-अपनी जगह सही है और कहीं न कहीं गलत भी। ये जरुरी भी है, मजबूरी भी। इसमें खुशी भी हैं, ग़म भी। इसमें देवत्व भी है और पाशविकता भी। ये ताकत भी देता है और कमजोर भी करता है। ये खुदा की बरकत भी है और अभिषाप भी। ये जीने की वजह भी है और मरने का कारण भी। ऐसी तमाम एक-दूसरे से विरुद्ध लगने वाली चीज़ों का निवास प्रेम में होता है और इनमें से कोई भी नज़रिया यदि प्रस्तुत किया जा रहा है तो वे सब अपनी-अपनी जगह सही है और प्रेम के इन्हीं तमाम रूपों को लेकर हिन्दी सिनेमा में हर तरह के गीत प्रस्तुत हुए हैं। साहित्यकारों ने अपनी रचनाएं लिखी हैं। साहित्य और सिनेमा के इसी क्रम का एक और सोपान प्रतीत होता है ये गीत जिसमें प्रेम को 'वेस्ट ऑफ टाइम' कहते हुए भी 'एक बार तो इस जीवन मां करना है वेस्ट ऑफ टाइम' जैसे बोल पिरोये गये हैं।

जीवन के सबसे सृजनात्मक समय में होने वाली सबसे गैर-उत्पादक अनुभूति का नाम है प्रेम। लेकिन इस अनुभूति को पा लेने के बाद व्यक्ति में जिस रचनात्मकता की वृद्धि होती है वो बिना इसके हासिल किये नहीं हो सकती। इसलिये शायद कहा है कि इंसान के जीवन में सबसे क्रांतिकारी परिवर्तन तब होते हैं जब उसके जीवन में या तो कोई लड़की आ जाती है अथवा जीवन से चली जाती है। दोनों ही कंडीशन में किसी हमदर्द की जीवन में मौजूदगी तो जरुरी है ही क्योंकि जाने के लिये भी उसे आना होगा ही। प्रेम परिपक्वता देता है और जीवन को सतही सोच से परे ले जाकर कई ऐसे गहरे अनुभवों का दीदार कराता है जो बिना प्रेम के संभव नहीं। प्यार के जीवन में आविर्भाव के बाद हम अपने प्रेमी को कितना समझ पाते हैं यह तो फिर भी एक विवादित प्रश्न है लेकिन हम खुद के व्यक्तित्व की कई अनगढ़ परतों से अपना परिचय पा लेते हैं। रविन्द्र सिंह के उपन्यास 'आई टू हेड लव स्टोरी' के मुखपृष्ठ पर एक पंक्ति है- 'तेरे जाने का कुछ ऐसा असर हुआ मुझपे, तुझको खोजते-खोजते मैंने खुद को पा लिया' और यह हकीकत है कि प्रेम करने के बाद हम खुद को ज्यादा बेहतर तरीके से समझने लगते हैं। यह प्रेम ही है जो एक भले इंसान में से उसके अच्छे व्यक्तित्व की परतें उतारकर, छुपी हुई बहसी परतों को बाहर निकाल देता है और कई मर्तबा एक बुरे इंसान से उसके व्यक्तित्व की विषाक्त परतें उतारकर, उसकी दबी पड़ी दैवीय परतें उभार देता है।

प्रेम के सफल या असफल होने से ज्यादा मायने रखता है प्रेम का होना, क्योंकि सफलता और असफलता का निर्धारण बाहर से देखी गई दृष्टि से किया जाता है। जबकि प्यार को अंतर्तम से देखा जाये तो उसमें ऐसे भेद ही नहीं है वो बस प्रेम है। कहा ये भी जाता है कि असफल प्रेम अक्सर नफरत में बदल जाता है लेकिन ये भी उसी सतही नज़रिये का कथन है क्योंकि प्रेम, उपेक्षा में तो बदल सकता है पर नफरत में कभी नहीं। निश्चित ही प्रेम स्वार्थी होता है लेकिन यह स्वार्थी होकर भी अंतस में सबसे ज्यादा त्याग की भावना का संचार करता है। वक्त के साथ प्रेम पर भी अपने दौर के रंग देखने को मिलते हैं और इसकी अनुभूति और अभिव्यक्ति में भी फर्क देखा जाता है लेकिन फिर भी कुछ ऐसा भी होता है जो सर्वत्र एक समान होता है। प्रेम का ऐसा सार्वभौमिक, शाश्वत अहसास पूर्णतः अमूर्त है और सैंकड़ो परते चढ़ाने-उतारने के बावजूद वो सदा एक महक बनकर जीवंत रहता है। यही वजह है कि इस 'वेस्ट ऑफ टाइम' का 'इम्पार्टेंस' किसी भी दूसरे 'युसफुल टाइम' से बढ़कर है। प्रेम की इसी उपयोगिता को देखते हुए सैंकड़ो साल पहले कबीर को कहना पड़ा- 'पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढें सो पंडित होय।।'

अकेले में भी जो किसी के संग होने का अहसास दे और कई मर्तबा महफिलों में भी तन्हा कर दे, ऐसा जादूगर प्रेम से बढ़कर कोई नहीं हो सकता। ये प्रेम ही है जिसमें 'मिलके भी हम न मिले' वाले जज्बात जागते हैं और इसमें ही 'जितना महसूस करूं तुमको, उतना ही पा भी लूं' वाले अहसासों से वास्ता होता है। 'पीके' के इस गीत में ही कुछ पंक्तियां हैं 'बैठे-बैठे बिना बात मुस्कायें, क्या है माजरा कुछ भी समझ न आये' इसलिये लव इज वेस्ट ऑफ टाइम। बट आय लव दिस वेस्ट ऑफ टाइम। 

दरअसल, हम हर उस चीज़ को व्यर्थ करार देते हैं जिसके अर्थ बुद्धि के विषय नहीं बनते। लेकिन बुद्धि के परे भी बहुत कुछ होता है और यदि हम प्रेम को भी बुद्धि का विषय न बना संबुद्धि से जाने..और इसका विश्लेषण न कर संश्लेषण करने की कोशिश करें तो शायद प्रेम भी हमें वेस्ट ऑफ टाइम न लगकर बहुत प्रॉडक्टिव लगने लगेगा। यह दुनिया बहुत प्रेक्टिकल हो गई यहां समय का सदुपयोग सिर्फ पैसे और संसाधनों की कमाई को माना जाता है पर प्रेम इन सब चीज़ों को नहीं, जज़्बातों को कमाकर देने वाली चीज़ है। भौतिकवादिता के प्यालों में सिर्फ शारीरिक सुखों का घूंट पीने वालों के लिये 'व्यक्ति का भावनात्मक होना' वेस्ट ऑफ टाइम ही है। चुंकि प्रेम पे लिखी तमाम पाण्डुलिपियां 'सिक्स सिग्मा' जैसे किसी प्रबंधन का सिद्धांत न बन हमारे व्यवसायिक उपयोग में नहीं आती। इसलिये प्रेम के तमाम आचार, विचार और संस्कार बस वेस्ट ऑफ टाइम ही लगते हैं। 

बहरहाल, किसी कवि की कुछ पंक्तियां हैं- 'मैं जो लिखता हूँ वो व्यर्थ नहीं है...हूँ जहाँ खड़ा वहाँ गर तुम आ जाओ, तो कह न सकोगे कि इसका कोई अर्थ नहीं है।' प्रेम पे लिखी किसी लेखनी को वेस्ट ऑफ टाइम कहना या प्रेम से संतृप्त किसी अहसास को वेस्ट ऑफ टाइम कहने वालों के लिये उपरोक्त पंक्तियां सर्वोत्तम जबाव देती हैं। वैसे भी जब हम समय को खुद से बांधने की कोशिश करते हैं तब ही प्रेम की उपयोगिता और अनुपयोगिता का निर्धारण कर सकते हैं पर जब समय से खुद को बाँध देते हैं तब वेस्ट ऑफ टाइम का आकलन करने वाली बुद्धि ही ख़त्म हो जाती है। प्रेम में होने का मतलब है खुद की हस्ती, वक्त के हवाले कर देना। फिर वक्त अपने हिसाब से आपको दिशा दे देता है और हमें नियति की सच्चाई पता चल जाती है कि 'हम भले हाथ में घड़ी बांध वक्त को थामने का गुरुर कर ले, पर हाथ में हमारे एक लम्हा भी नहीं है.............

Saturday, October 11, 2014

स्वार्थी वृत्तियो पर हो मलाल, तभी संभव है जीवन का सत्यार्थ

युद्ध की विभीषिका, प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़, संसाधनों को हथियाने के लिये लालायित बुर्जुआ वर्ग के अधिपति, विस्तारवाद की राजनीति औऱ ऐसे माहौल के बीच ही ख़बर आती है एक भारतीय और एक पाकिस्तानी के नोबल शांति पुरुस्कार मिलने की। सीमा पे युद्ध के आशंकित बादलों को कवर करने के लिये उतावला बैठा मीडिया अचानक, उन व्यक्तित्वों की तह में उतरने लगता है जिसके चलते इन शख्सियतों ने इस प्रतिष्ठित अंंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कार को हासिल किया। शांति, हमेशा युद्ध से खूबसूरत, दैदीप्यमान और वजनदार होती है।

मलाला युसुफजई और कैलाश सत्यार्थी। अपने पीछे संघर्ष का एक विस्तृत इतिहास छोड़ा है इन्होंने, तब जाकर इस चमकदार उपलब्धि को हासिल किया है और निश्चित ही ये प्रयत्न जब शुरु किये गये थे तो इन प्रयत्नों का उद्देश्य कतई ये नहीं था कि इन्हें वैश्विक स्तर पर सम्मानित किया जायेगा। यदि ये पुरुस्कार न भी मिला होता तब भी ये संघर्ष इतना ही महान होता जितना आज माना जा रहा है। भले ही इसे इतनी व्यापक पहचान न मिली होती। इस पुरुस्कार के परे भी कई ऐसे लोग हैं जिन्हें कभी कोई सम्मान नहीं मिला लेकिन फिर भी वे अपने प्रयासों से एक सुंदर जहाँ रचने का प्रयत्न कर रहे हैं। सफलता या सम्मान मिल जाने के बाद हमें लोगों का संघर्ष नजर आने लगता है अन्यथा संघर्ष तो कई जगह व्याप्त है। उपलब्धियां सिर्फ उत्कृष्ट प्रयत्नों पर मोहर लगा देती हैं पर ये मोहर न भी हो तब भी उन प्रयासों की सत्यता से इंकार नहीं किया जा सकता।

मेरे इस लेख का उद्देश्य इस पुरुस्कार और पुरुस्कार पाने वालों पर कुछ कहना नहीं है क्योंकि ये बात मीडिया बखूब कर रहा है और पुरुस्कार को सही-गलत ठहराने वाले कई समीक्षात्मक दृष्टिकोण इस प्रचारतंत्र में नजर आ रहे हैं। इन व्यक्तित्वो का सम्मान होना चाहिये था या नहीं, ये अलग विषय है। नोबेल महानता का पैमाना तय करे ये सही नहीं है क्योंकि कई व्यक्तित्व अपने कार्यों से खुद इतने महान हो जाते हैं कि नोबेल जैसे पुरुस्कार ही उनके आगे बौने नजर आते हैं। क्या गाँधी, विवेकानंद की महानता का पैमाना कोई नोबेल तय कर सकता है? 

यहाँ बात है जीवन के सत्यार्थ की, जीवन के असल प्रयोजन की। मौजूदा दौर, जीवन की अगाध व्यापकता को संकुचित कर चंद छद्म स्वार्थों तक सीमित करने वाला है। मैं, मेरा घर, मेरा परिवार, मेरी जाति, कुल, वंश या देश...ऐसे न जाने कितने 'मैं, मेरे और मुझ' के दायरे हमने बना रखे हैं इस 'मेरेपन' या अंधी आत्ममुग्धता में क्या किसी को वसुधैव कुटुंबकम् की संकल्पना समझ आ सकती है। बेशक, हमारे अपने कुछ कर्तव्य उन लोगों के प्रति होते हैं जो हमसे जुड़े हैं लेकिन अपने उस दायरे के भौतिकवादी विस्तार के कारण हम अनायास ही दूसरों के अधिकार क्षेत्र में प्रविष्ट हो जाते हैं और इस स्वार्थी वृत्ति के परिणाम स्वरूप पैदा होती है अनंत तृष्णा, शोषण, भ्रष्टाचार, अन्याय और अंत में युद्ध। ये जीवन का सत्यार्थ कतई नहीं है।

एक उक्ति है यदि 'हासिल करो तो बांटो, और कुछ सीखो तो सिखाओ'। तमाम प्राप्तियों और हुनर का सर्वोत्तम प्रयोग बस यही है कि जिसमें देने का भाव निहित है। त्याग, करुणा, परोपकारिता और अंत में इन्हीं गुणों से बढ़ते हुए वीतरागता, निर्मोहीपना या स्थितप्रज्ञता तक पहुंचना, यही है जीवन का सत्यार्थ। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की विचारणा 'परस्परोपग्रहो जीवानाम्' अर्थात् परस्पर एक दूसरे का उपकार, इसी संकल्पना से साकार हो सकती है। जीवन के इस सत्यार्थ के पहले ज़रुरी है कि हमें अपनी तमाम स्वार्थी वृत्तियों का मलाल हो।

लेकिन आज की नास्तिक वैज्ञानिकता ने तमाम चरित्रनिर्माण के स्मारकों को पोंगापंथी कहकर, हमें उससे विमुख कर दिया है। जिसके फलस्वरूप जन्मी मैक्डोनाल्ड संस्कृति हमें 'विश करो-डिश करो' की शिक्षा दे रही है। इस दौर में संतुष्टि का भाव कहा खोजा जा सकता है जहाँ अगाध तृष्णा को बढ़ाने के जतन किये जा रहे हैं, और बेतहाशा इच्छाएं अपने फन फैला रही हैं। इन अंधी महत्वाकांक्षाओं से ही जन्मी है तमाम भौतिकवादिता और इस भौतिकवादिता के आभामंडल में ग्रस्त हो हमारा समाज, शिक्षाप्रणाली, साहित्य और सिनेमा भी महज संवेदनहीन मनुष्य का निर्माण कर रहे हैं। जहाँ सिर्फ हड़पने का भाव है देने का नहीं। जीवन का सत्यार्थ भारी बैंक बेलेंस, आलीशान बंगला, गाड़ी और झूठा रुतबा बनकर रह गया है। इन सब चीज़ों को पाकर हमें लगता है कि हमारा विस्तार हो रहा है पर असल में यह मानवीयता के सिकुड़ने का प्रतीक है।

जीवन का सत्यार्थ, अपने व्यवहार से प्राणीमात्र को सुकून देने में हैं...विषमताओं को दूर कर एक वर्गविहीन आदर्श समाज बनाने में हैै..खुद को पर्यावरणोन्मुखी बनाने में है...'मैं' का भाव ख़त्म कर 'हम' का भाव जगाने में है और इस हम में संपूर्ण बृह्माण्ड को ही समेट लेने में हैं। जीवन का सत्यार्थ नोबेल या इस जैसे दूसरे पुरुस्कारों को पा लेने में नहीं, जीवन का सत्यार्थ समस्त आधि-व्याधि और उपाधियों से परे खुद को समझ लेने में है। वास्तव में देखा जाये तो आज सत्यार्थ को नोबेल की जरूरत नहीं, नोबेल को खुद सत्यार्थ प्राप्ति के जतन करना चाहिये...................

Saturday, September 20, 2014

मेरी प्रथम पच्चीसी : नौवी किस्त

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(ज़िंदगी के घरोंदे में मौजूदा दौर के घुटन भरे कमरों में राहत की हवा को महसूस करने के लिये, रूह की दीवार में लगे यादों के झरोखों को खोल अपने अतीत के नज़ारों से ठंडक को पाने के जतन कर रहा हूं और बस इसलिये पच्चीसी स्वांतसुखाय और स्वप्रेरणार्थ ही मुख्यता से लिखी जा रही है। लेकिन उन लोगो के लिये भी इसका महत्व कुछ कम नहीं है जिनके प्रेम की छाया में मैं कुछ सुकुन पा लेता हूँ और जिनके अतीत की झांकियां मेरे गुजश्ता दौर से मेल खाती हैं, जो इस पच्चीसी में खुद को पाते हैं। औपचारिकता को किनारे रख पच्चीसी के घटनाक्रम को आगे बढ़ाता हूँ...अन्यथा बातें तो यूंही चलती रहेंगी।)

गतांक से आगे-

ज़िंदगी जवानी की दहलीज पे दस्तक देेने के लिये खासी उत्सुक हो रही थी...पर अब तक जवां नहीं हुई थी। लेकिन यकीन मानिये सबसे ज्यादा नटखट अहसास जवां होने के तनिक पहले ही दिल में पैदा होते हैं। अंग्रेजी और संस्कृत साहित्य से बैचलर डिग्री कर रहा था तो शेक्सपियर, मारलो, कीट्स, शैली और वर्ड्सवर्थ जैसे कवियों का रोमांटिज्म सिर चढ़ रहा था तो दूसरी तरफ कालिदास, माघ और भास जैसे कवियों का साहित्य मन को और मनचला बना रहा था। प्रेम, दरअसल उम्र के पड़ाव की एक बेहद नैसर्गिक क्रिया होती है जब सहज पैदा हुए जज़्बात अपना आसरा जहाँ-तहाँ तलाशते हैं। प्रेम, का कोई निश्चित रूप नहीं होता और ये अहसास जीवन में पूर्व अनूभूत भी नहीं होते तो अक्सर इन अहसासों की तलाश कई मर्तबा हमको भटका देती है और वर्तमान की नवसंस्कृति प्रायः प्रेम की खोज शारीरिक आकर्षण या संभोग में तलाशती नज़र आ रही है क्योंकि वर्तमान का साहित्य और सिनेमा दोनों ही मजबूरन उस तरफ हमें धकेल रहा है। हालांकि दोष साहित्य या सिनेमा का नहीं है क्योंकि सांस्कृतिक बदलाव को जो रूप हमें इन पर देखने को मिल रहा है वो समाज का ही सच है पर diffusion of innovation के सिद्धांत को समझते हुए बात करें तो यह ज़रूर कहा जा सकता है कि प्रेम के कुत्सित रूप को व्यापक बनाने में ये निमित्त ज़रूर हैं।

बहरहाल, मैं इक्कीसवी शताब्दी में भी कालिदास और मिल्टन, मारलो, धर्मवीर भारती जैसे साहित्यकारों को पड़ रहा था। इसलिये मुझमें विकसित हुआ रोमांटिज्म चेतन भगत, रविंद्र सिंह जैसे लेखकों के साहित्य में उद्धृत रोमांटिज्म से काफी अलग था और बस इसलिये दिल में प्रेम को पाने की भावनात्मक तड़प तो थी पर उसमें वासनात्मक पक्ष काफी गौढ़ था। नहीं था ऐसा मैं नहीं कह सकता क्योंकि प्रेम का वृक्ष मन-मस्तिष्क और देह के सामुहिक उपक्रमों के उपरांत ही पल्लवित होता है। मन इसमें भावनात्मकता का संचार करता है, मस्तिष्क इसे बौद्धिक बनाता है और देह के कारण ये होता है वासनात्मक। हार्मोनल चेंजेस तो थे पर भावनात्मक पक्ष मजबूत होने के कारण कभी अपनी मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं किया और इन सब वजहों से ही कई मर्तबा अपने दोस्तों के बीच मैं गये-गुजरे सिद्धांतों को मानने वाला दकियानूस इंसान भी कहलाया गया।

मन ने विचलित होने की पुरजोर कोशिश की। जैसा मैंने ऊपर बताया न कि इस उम्र के जज़्बात अपना आसरा तलाशते हैं। कालिदास की एक उक्ति है 'कामी सुतां पश्यति' अर्थात् कामी व्यक्ति हर तरफ अपने अनुकूल चीजें तलाशता है। तो अब सिनेमा और संगीत की ओर भी बेइंतहा दिल ललचा उठा और खालिश प्रेमकथाओं में डुबी हुई फ़िल्में दिल को रुचने लगी, ऐसा प्रायः हर युवा के साथ होता है। लेकिन अभी तक मैंने अठारहवे बसंत को पार नहीं किया था इसलिये जो इन फिल्मों और साहित्य से सीखकर मन की व्याख्या होती थी वो बहुत ही सतही और भटकाने वाली होती थी। वास्तव में कच्ची उम्र और अनुभवहीनता के कारण युवाओं में जो बगावती तेवर पैदा होते हैं उसमें बहुत बड़ा हाथ फ़िल्मों और हमउम्र साथियों का ही होता है क्योंकि नासमझी की ये व्याख्याएं हमें कई बार इतना नीचे गिरा देती हैं कि जीवन में उनसे उबर पाना ही बहुत मुश्किल हो जाता है। यही कारण है कि ऐसे में माँ-बाप का सख़्त संरक्षण और अनुभव बहुत आवश्यक होता है। लेकिन इस कठिनतम दौर में मैं अपने माँ-बाप से कोसों दूर बैठा था भटकने की संभावनाएं प्रबल थी। लेकिन मैं शुक्रगुजार हूँ उस दौर के अपने दोस्तों का जिनकी संगति और मार्गदर्शन ने मुझे अपनी हदों में बांधे रखा।

मेरे साथ एक चीज़ हमेशा रही कि बेहद कम उम्र में शिक्षा अर्जित करते हुए मैं आगे बढ़ रहा था इसलिये जो सहपाठी मुझे मिलते थे वे उम्र में काफी बड़े और अनुभवी होते थे और एक बहुत बड़ा कारण यह भी रहा कि उनकी संगति के कारण मुझमें हमेशा उम्र से पहले ही कई चीज़ों को लेकर परिपक्वता आती रही। हालांकि बचकानी प्रवृत्तियां भी कम नहीं थी पर बौद्धिक तौर पर समझ ज़रूर कुछ जल्दी विकसित हो ही रही थी। यहाँ मैं अपने कुछ ऐसे ही दोस्तों को याद ज़रूर करना चाहुंगा। जिनमें सबसे खास थे अमित, रोहन, विक्रांतजी, सन्मति, विवेक, निपुण, जीतेन्द्र, अभय अंकित। हालांकि ये लिस्ट बहुत लंबी हो सकती है क्योंकि मेरी समझ और सीख के कारण कई मित्र हैं पर जिनके नाम यहाँ मैंने लिये उन्होंने मेरी नादानियों और नासमझियों को सबसे ज्यादा झेला। मेरे अत्यंत उजड्ड और अहंकारी स्वभाव को सहा और मेरे लाख बुरे बर्ताव के बावजूद ये मेरे साथ जुड़े रहे। लेकिन मेरी उन आदतों को सहते हुए मुझे समझाते रहे और दिल से मेरी तरक्की के सहभागी बने रहे।

चुंकि मेरी हॉस्टल लाइफ अब अपने अंतिम पड़ाव में चल रही थी इसलिये सभी से याराना कुछ ज्यादा ही हो गया था क्योंकि हम जानते थे कि अब अलग हुए तो फिर यादों में ही मुलाकात होगी वरना ज़िंदगी की व्यस्तताओं में दोस्तों की प्राथमिकता रह ही कहाँ जाती है। दोस्ती बस एक कोरी रस्म ही बनकर रह जाती है और यही सोचते हुए हम हर एक दिन, हर एक पल को खुल कर जीना चाहते थे और हररोज़ कुछ न कुछ तिकड़मी और अनोखा करने की जुगत में लगे रहते। स्नातक के अंतिम वर्ष के छात्र होने के कारण हम सबसे सीनियर छात्र हुआ करते थे और विभिन्न सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं अन्य दूसरी गतिविधियों को करवाने का जिम्मा हम पर ही हुआ करता था। उस वर्ष मुझे औऱ मेरे मित्र रोहन को इन सब आयोजनों का प्रमुख नियुक्त किया गया था तो अधिकार और जिम्मेदारी का प्रथम अहसास तभी महसूस हुआ था। इन अधिकारों और जिम्मेदारियों के आने की वजह से रुतबा भी बड़ा हुआ लगता था और हम अपने ही अहंकार में फूले घूमते थे।

जो भी था, सब बड़ा मजेदार था और अब यादों के इन झरोखों से कूदकर वापस उन्ही दिनों को पा लेने की आरजू दिल में पैदा होती है पर हमेशा निर्मम यथार्थ हमें वर्तमान में खींच लाता है। वो नादानियां, वो वेबकूफियां भले कितनी ही नासमझ क्युं न हों पर उनका यादों में किया स्मरण बड़ा सुकून देता है और आज हम भले ही रुतबा, पैसा और अथाह प्रतिष्ठा पालें पर वो गुजरे दौर की ठलुआई सा मजा कभी नहींं दे सकती। हम आज तरक्की के जेट पर सवार हो भले देश-दुनिया की सैर कर आयें पर ये सब उस दौर की उस आवारगी के आनंद को छू भी नहीं सकती, जब हम दोस्तों के साथ नंगे पैर सड़कों पर टहला करते थे और सिटी बस में खड़े-खड़े धक्के खाया करते थे। वो दौर एक बार फिर अच्छे से जीने का जी करता है क्योंकि उस दौर को अक्सर हम बड़े और कामयाब बनने की चाह में यूं ही ज़ाया कर देते हैं। सच, चीज़ों की कीमत उनके दूर चले जाने के बाद ही समझ आती है............................

ज़ारी................

Friday, September 12, 2014

इश्क़ तुम्हें हो जायेगा........


'इश्क़ तुम्हें हो जायेगा' ये महज मेरे पोस्ट का टाइटल नहीं बल्कि ये अनुलता राज नायर जी की हाल ही में प्रकाशित पुस्तक का शीर्षक भी है। दरअसल, गर ये किताब न होती तो इस पोस्ट का जन्म ही नहीं होता। इसलिये इस पोस्ट का जन्म उन जज़्बातों के चलते हुआ है जो अनुजी की इस किताब को पढ़ने के बाद पैदा हुए हैं। आगे कुछ लिखने से पहले मैं बता देना चाहता हूँ कि इस पोस्ट को पुस्तक की समीक्षा न समझा जाये...क्युंकि साहित्यिक कसौटी के परे एक काव्यसंग्रह का जो मूल काम होता है वो ये पुस्तक बखूब करती है। जी हाँ जज़्बातों को जिस ढ़ंग से उद्वेलित होना चाहिये वो इस पुस्तक के हर इक वरक् को पलटते हुए महसूस किये जा सकते हैं और हर नज़्म रूह की तह में उतरती हुई खुद से इश्क़ करने को मजबूर करती है। 

यूं तो अनुजी से इस ब्लॉग के सायबर संजाल के चलते पहले से ही आत्मीय रिश्ता रहा है और उनकी लेखनी का मैं खासा कायल रहा हूँ औऱ उनकी लिखी रचनाओं की कई पंक्तियों को चुराकर मैंने अपने मस्तिष्क की डायरी मे उकेर रखी हैं और कुछ रचनाएं अंतस की बरनी में रखी-रखी आचार-मुरब्बे में कन्वर्ट हो चुकी है जिनका मूल तो याद नहीं पर उनके अर्थ पूरी संजीदगी से अपना रस देते हैं। मसलन ऐसी ही इक रचना है-

स्नेह की मृगतृष्णा
कभी मिटती नहीं
रिश्तों का मायाजाल
कभी सुलझता नहीं
तो मत रखो कोई रिश्ता मुझसे
मत बुलाओ मुझे किसी नाम से
प्रेम का होना ही काफी नहीं है क्या?

इस रचना का ज़िक्र यूं तो पुस्तक में नहीं है पर मेरी रुहानी अलमारी में बाकायदा कैद है। मुझे नहीं पता कि अनुजी ने इन जज़्बातों को खुद कितना महसूस किया है पर उनके लिखे हर एक हर्फ उस हर इंसान के अहसासों को बयां करते हैं जिसने एक बार भी गर सच्चा इश्क़ किया हो। तो इस तरह ये कविता भले निकली अनुजी की कलम से हों पर ये उनकी तरफ से हर आशिक़ के जज़्बातों का प्रतिनिधित्व मात्र हैं। अनुजी की पुस्तक के पेज नं 93 पे लिखी प्रेम कविता का भाव कुछ ऐसा ही हैं जहाँ वे कहती हैं-


निरर्थक है लिखा जाना
प्रेम कविताओं का
कि जो लिखते हैं
उन्होंने भोगा नहीं होता प्रेम
और जो भोगते हैं
उन्हें व्यर्थ लगता है
उसे यूं 
व्यक्त करना....

अनुजी की रचनाओं में जितना कल्पनाओं का आसमान समाया हुआ है उतना ही इनमें यथार्थ का धरातल भी है और वे प्रेम के उन्माद, प्रेम के विरह, प्रेम का पागलपन, मिलन और जुदाई सब कुछ बड़ी संजीदगी से और सौंदर्य के साथ बयां करती हैं। एक बानगी देखिये-

प्रेम का एक पल
छिपा लेता है अपने पीछे
दर्द के कई-कई बरस
कुछ लम्हों की उम्र ज्यादा होती है, बरसों से।

और कुछ इसी तरह...

यदि प्रेम एक संख्या होती
तो निश्चित ही 
विषम संख्या होगी
इसे बांटा नहीं जा सकता कभी
दो बराबर हिस्सों में।

अनुजी अपने इस काव्य संग्रह की शुरुआत में कहती हैं कि 'पढ़ना मुझे तन्हाईयों में कि इश्क़ तुम्हें हो जायेगा' पर इस काव्य संग्रह के पढ़ते वक़्त मैं बड़े असमंजस में रहा कि आखिर तन्हाई कहाँ से लाऊं क्योंकि इन कविताओं से उपजे जज़्बातों ने इस कदर कोलाहल मचाया कि सारी तन्हाई मानो कहीं फना हो गई। लेकिन फिर भी ये कविताएं खुद से इश्क़ करने पे मजबूर कर देती हैं। जो इंसान अभी इश्क़ में है उसे तो इन रचनाओं में अपना आज नज़र आयेगा ही पर जो कभी इश्क़ में था वो भी अपने अतीत को इन रचनाओं के सहारे जियेगा और जो न अभी इश्क़  में है और न ही कभी इश्क़ में था वो भी ऐसे इश्क़ को पाने के लिये उत्कंठित हो जायेगा और यदि उत्कंठित नहीं हुआ तो इन रचनाओं से ही इश्क़ फरमा बैठेगा। इन्हीं सब वजहों से ये काव्यसंग्रह अपने नाम को सार्थक करता है। और प्रेम के अर्थ को कुछ इस तरह तलाशती है-

मैं प्रेम में हूं

इसका सीधा अर्थ है
मैं नहीं हूं
कहीं और...

प्रेम पंख देता है
प्रेमी पतंग हो जाते हैंं
और जब ये नहीं रहता
तब लड़ जाते हैं पेंच
कट जाती हैं पतंगे
आपस में ही उलझकर

मैं प्रेम में हूं
इसके कई अर्थ हैं
और सभी निरर्थक।

कविताएं तो बहुत है और समझ नहीं आ रहा कि किस किसका ज़िक्र करुं...पर बेहतर होगा कि मेरी इस पोस्ट से कुछ भी आकलन करने के बजाय आप खुद इसका जायका लें। यकीन मानिये यदि आपकी रूह की जमीन पर थोड़ी सी भी नमी है तो ये आपके अंदर जज़्बातों के कई कई कमल खिलाने का माद्दा रखती है औऱ कौमार्य की दहलीज पे पहुंचे युवाओं के लिये तो ये तकिये के नीचे रखकर सोने वाली पुस्तक है। इन रचनाओं की चासनी में जब अपने जज़्बातों को भीगा हुआ महसूस करेंगे तो रस, निश्चित ही तनिक बड़ जायेगा और इश्क़ तुम्हें हो जायेगा।

ऐसा नहीं कि
जन्म नहीं लेती
इच्छाएं अब मन में
बस उन्हें मार डालना सीख लिया है मैंने
शुक्रिया, ऐ मोहब्बत।

और एक अंतिम रचना याद कर विराम लेता हूँ...बाकी आप खुद इस पुस्तक को पढ़े तो अच्छा होगा और न ही अनुजी का कुछ परिचय देना चाहुँगा। वे मेरे शहर भोपाल की हैं इस कारण आत्मीयता कुछ विशेष है शेष परिचय के लिये उनकी रचनाएं ही काफी हैं। पोस्ट के आखिर में पुस्तक क्रय करने हेतु लिंक प्रोवाइड की गई है। पोस्ट की शुरुआत में भी टाइटल के साथ लिंक संलग्न है-

मैंने बोया था उस रोज
कुछ
बहुत गहरे, मिट्टी में
तुम्हारे प्रेम का बीज समझकर
और सींचा था अपने प्रेम से
जतन से पाला था 
देखो
उग आई है एक नागफनी
कहो, तुम्हें कुछ कहना है?

(पुस्तक क्रय हेतु लिंक- इश्क़ तुम्हें हो जायेगा)