Sunday, January 23, 2011

सिनेमाई परंपरा को तोड़ती फ़िल्में : नो वन किल्ड जेसिका और धोबी घाट

हिंदी सिनेमा ने २०१० के विदाई के साथ ही एक दशक को विदा कह दिया। २०११ के साथ एक नया दशक नयी उम्मीदों के साथ सामने हैं...पिछले दशक ने न्यू-एज्ड सिनेमा के रूप में हमें एक नए तरह के सिनेमा से मुखातिब कराया और अब एक बार फिर कुछ ऐसे ही नयेपन की आस है...और इस आस को २०११ के पहले माह में रिलीज फिल्मों ने और अधिक बढ़ा दिया है...बात 'नो वन किल्ड जेसिका' और 'धोबी घाट' की करना है.......

पहले तो बता दूँ कि कैसे ये फ़िल्में सिनेमाई परंपरा को तोड़ती है...दोनों फ़िल्में मार-धाड, रोमांटिक सीन, गीत-संगीत, इश्क-मोहब्बत या शीला-मुन्नी-चुलबुल पांडे टायप के मसालों से रहित हैं...न पूरा यथार्थ है जिससे ये वृत्तचित्र सिनेमा नहीं है और नाही पूरी कल्पना है जिससे ये खालिश व्यावसायिक सिनेमा भी नहीं रह जाता। ये यथार्थ के रोल में कल्पना का क्रीम डालकर तैयार किया ऐसा क्रीमरोल है जो असल मानवीय स्थिति-परिस्थिति, जज्बातों के करीब जान पड़ता है। सिनेमा देखने वाला सारा दर्शक वर्ग इस पर मुग्ध नहीं होगा, इसका लक्षित दर्शक वर्ग सीमित है।

'नो वन किल्ड जेसिका' एक यथार्थपरक घटना पर निर्मित एक बेहतरीन दस्ताबेज बन गया है। जिसे देख दर्शक जेसिका के मर्डर से खुद को जोड़ उस घटना के लिए आक्रोशित होता है। उसे सिस्टम के आगे पिसते आम आदमी की घुटन महसूस होती है...और दिल में इस व्यवस्था के खिलाफ हुंकार भरने की कुलबुलाहट होती है। फिल्म देखते वक़्त उसका खून भी खोलता है पर थियेटर के बाहर आकर उसे असल का बोध होता है कि इस बड़े से तंत्र में वह एक पुर्जा भर है। निर्देशक राजकुमार गुप्ता का सधा हुआ निर्देशन एक सीन भी मिस करने से रोकता है...और फिल्म के आगे बढ़ते जाने के साथ दर्शक भी अपनी सीट पे आगे की ओर खिंचा चला जाता है। रही सही कमी रानी मुखर्जी और विद्या बालन के दमदार अभिनय से पूरी हो जाती है।

ठीक इसी तरह का नयापन 'धोबीघाट' में है...नयेपन की आस तो हालाँकि तब से ही थी जब से इसके साथ आमिर का नाम जुड़ा था। लेकिन आमिर को पसंद करने वाले विशाल दर्शक वर्ग में से एक हिस्से को निराशा मिली जो दर्शक वर्ग गजनी और फ़ना वाले आमिर को चाहता हैं। एकलठाठिया सिनेमा का हुल्लड़, मनमौजी दर्शक भी खुद को ठगा हुआ महसूस करेगा... क्योंकि ये फिल्म न हसाती है, न उकसाती है, न नचाती है ये तो बस बताती है और क्या बताती है ये भी दर्शक को अपनी बौद्धिक क्षमताओं के अनुसार तय करना होगा। दरअसल ये एक ऐसी पेंटिंग है जो किसी के लिए सिर्फ रंगों का धब्बा है तो किसी के लिए इसमें आशावादी छवियाँ उभरती हैं तो किसी के लिए निराशावादी। इसे पसंद करने वाला मल्टीप्लेक्स सिनेमा का, नजरदार दर्शक होगा...ये फिल्म एक ऐसा आर्ट है जिसमे सिनेमाई ट्रेंड्स शामिल है।

प्रतीक बब्बर और मोनिका डोंगरा के बेमिसाल अभिनय का सुरूर सर चढ़कर बोलता है। यहाँ फिल्म समीक्षक दीपक असीम की बात याद करना चाहूँगा कि "जितना अभिनय कैटरीना कैफ अपनी १०० फिल्मों में नहीं कर पाएंगी उतना अभिनय मोनिका ने एक-२ फ्रेम में किया है"। इन दो कलाकारों का नाम लेकर मैं आमिर खान की महिमा कम नहीं कर रहा..दरअसल आमिर की क्षमताओं से हम परिचित हैं और उनसे तो बेहतरी की उम्मीद होती ही है...मैं बस ये बताना चाहता हूँ कि आमिर से प्रतीक, मोनिका और कृति मल्होत्रा उन्नीस साबित नहीं हुए और आमिर ने भी उनके रोल पर अतिक्रमण की कोशिश नहीं की... और इन सब अदाकारों के बीच सबसे खूबसूरती से अभिनय करती नजर आई है-मुंबई नगरिया। ऐसा लगता है मुंबई की मोनो एक्टिंग पर कोई पीछे से वाइस आवर दे रहा हो। कुछ दृश्य तो लाजवाब बन पड़े हैं। फिल्म में इंटरवल नहीं है क्योंकि मध्यांतर के होने से जज्बातों का वो रेशा टूट जाता जिसे ये फिल्म होले-होले करीने से बुन रही थी। फिल्म देखने के बाद स्तब्ध से हो जाते हैं समझ से परे होता है क्या सोचे, क्या बोले, क्या प्रतिक्रिया दे?

इन दोनों फिल्मों ने भारतीय सिनेमा के रुख को भले बदला न हो पर एक हल्का सा पेंच जरुर दिया है। मैं ये नहीं कहूँगा की इन फिल्मों में कोई कमियां नहीं हैं...वे हैं पर उद्देश्यों की महानता में कमियों को नजरंदाज कर देना चाहिए...और आज के दौर में जहाँ 'गुजारिश' जैसा सार्थक सिनेमा फ्लॉप होता है और चुलबुल पांडे की अतार्किक दबंगई चलती है वहां 'धोबी घाट' और 'जेसिका' का बनाया जाना तारीफेकाबिल है।

बहरहाल, ये तो साल की शुरुआत भर है हमें उम्मीद है कि आने वाले समय में कुछ और नगीने हमारे सामने होंगे...जो सिनेमा की दशा और दिशा दोनों के निर्धारण में सहायक साबित होंगे। हमें मलाल शीला और मुन्नी से नहीं..नाही हम दबंग, हाउसफुल और तीसमारखां से चिढ़ते है...ये सारी फ़िल्में बने और खूब फले-फूले...लेकिन गोलमाल और तीसमारखां में भरे सिनेमाहाल देखने के बाद 'अ वेडनेसडे', 'आमिर' और 'धोबीघाट' जैसी फिल्मों में खाली सीटें देखना खलता जरुर है......

Friday, January 21, 2011

तुम्हे खोने का ख्याल....(कविता)


खैरियत खफा है हमसे
अब
तो यहाँ हाल बेहाल है,
जबाव
अब किसी एक का
हुए
खड़े कई सवाल है
मिलकर भी बिछड़ने का
होता
अक्सर मलाल है,
तुम्हे
खोने से भी भयंकर
तुम्हे
खोने का ख्याल है। ।

बंद होंठो से भी होती बातें हजारों
बहके
कदम अब इन्हें संभालो यारों,
दिमाग
है दीवाना और दिल में सलवटें हैं
नींद
है बिस्तरों पे बस खाली करवटें हैं
ये कैसी खुश-मिजाजी
जिसमे
ख़ुशी है कम और दर्द विशाल है,
तुम्हे
खोने से भी भयंकर
तुम्हे
खोने का ख्याल है। ।

मंजिल
वही है लेकिन रस्ते खो गए हैं
जागे
हैं सपने सारे पर हम ही सो गए हैं,
ये
तिलिस्मी नीर कैसा जिसे पीके प्यास बढ़ रही है
ये
शिखर उत्तंग कैसा छूके जिसे श्वांस चढ़ रही है
तड़प-बेचैनी-बेखुदी बस यही
इस
जज्बात की मिसाल है,
तुम्हे
खोने से भी भयंकर
तुम्हे
खोने का ख्याल है। ।

खैरियत खफा है हमसे.........

Monday, January 17, 2011

मुझे नफरत है अपने सपनो से...(कविता)


हालाँकि मैं कोई कवि नहीं, न साहित्य जगत में अपनी रचनाओं से कुछ अवदान करने की हिमाकत करता हूँ...बस कभी-कभी कुछ बेचैनियाँ तंग करती है तो उन्हें कागजों पे उतारने की निरर्थक कोशिश कर लेता हूँ...उन बेचैनियों को मेरे मित्र कविता कह देते हैं...और मैं भी मजबूरन उनकी ये बात मान लेता हूँ- बहरहाल ऐसी ही एक बेचैनी प्रस्तुत है जिसे मजबूरन आपको झेलना पड़ेगा...

वे हर रात
ड़डाते हैं मेरी
दिल
की दीवारों पर
चमगादड़ बनकर
और
उस ड़फड़ाहट के
शोर में नहीं सो पाता मैं, अपने सपनों के चलते
मुझे
नफरत है अपने सपनों से
कही कुछ पाने के
बहुत दूर जाने के
इस
दुनिया पे छाने के
सपने
ही हैं
जो
जगाये रखते हैं मुझे
मुझे
नफरत है अपने सपनो से
इन सपनो में समायी
आस
की ज्वाला
जलाती
है मुझे
हर
पल-हर छिन
एक
प्यास
जो
बुझती कभी
बस
बढती है
हर
पल-हर दिन,
इन
सपनो की आस में
मिटने वाली प्यास में
गुजर
जाती है
मेरी
एक और रात
यूँ
ही
बिना
सोये
करवट
बदलते। । ।

Wednesday, December 22, 2010

कांच की बरनी और दो कप चाय


जीवन में जब सबकुछ जल्दी-२ करने की इच्छा होने लगती है। सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है..और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ने लगे हैं...उस समय ये बोध कथा "कांच की बरनी और दो कप चाय " याद आती है-
दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज उन्हें जिन्दगी का एक ख़ूबसूरत पाठ पढ़ाने जा रहे हैं। उन्होंने अपने साथ ली एक कांच की बरनी (जार) टेबल पे रखी और उसमे टेनिस की गेंद तब तक डालते रहे जब तक उस जार में एक भी गेंद के समा सकने की जगह नहीं बची। फिर उन्होंने छात्रों से पूछा की क्या बरनी भर गई?
आवाज आई- हाँ!!
फिर प्रोफ़ेसर साहब ने कुछ छोटे-२ कंकर उस बरनी में भरने शुरू किये...और वे कंकर भी बरनी में जहाँ-जहाँ जगह थी वहां समा गए। प्रो. साहब ने फिर पुछा क्या बरनी भर गई?
छात्रों की आवाज आई- हाँ!!
अब प्रो.साहब ने उस बरनी में रेत भरना शुरू किया...और देखते ही देखते वो रेत भी उस बरनी में समा गई, अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे। प्रो.साहब ने फिर पुछा-अब तो बरनी भर गई ना?
इस बार सारे छात्रों की एक स्वर में आवाज आई- हाँ अब भर गई!!
प्रो.साहब ने टेबल के नीचे से २ कप निकालकर उसमे स्थित चाय को बरनी में उड़ेल दिया..बरनी में वो चाय भी जगह पा गई....
विद्यार्थी भौचक्के से देखते रहे!!!
अब प्रो.साहब ने समझाना शुरू किया- "इस कांच की बरनी को तुम अपनी जिन्दगी समझो...टेनिस की गेंदे सबसे महत्त्वपूर्ण भाग मतलब भगवान, परिवार, रिश्ते-नाते, स्वास्थ्य, मित्र, शौक वगैरा। छोटे कंकर मतलब नौकरी, कार, बड़ा मकान या अन्य विलासिता का सामान...और रेत का मतलब और भी छोटी-मोटी बेकार सी बातें, झगडे, मन-मुटाव वगैरा।
अब यदि तुमने रेत को पहले जार में भर दिया तो उसमे टेनिस की गेंद और कंकरों के लिए जगह नहीं रह जाती, यदि पहले कंकर ही कंकर भर दिए होते तो गेंदों के लिए जगह नहीं बचती, हाँ सिर्फ रेत जरुर भरी जा सकती।
ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है यदि तुम छोटी-२ बातों के पीछे पड़े रहोगे और अपनी उर्जा और समय उसमे नष्ट करोगे तो जीवन की मुख्य बातों के लिए जगह नहीं रह जाती। मन के सुख के लिए क्या जरुरी है ये तुम्हे तय करना है।
धर्म-अध्यात्म में समय दो, परिवार के साथ वक़्त बिताओ, व्यसन मुक्त रहकर स्वास्थ्य पर ध्यान दो कहने का मतलब टेनिस की गेंदों की परवाह करो। बाकि सब तो रेत और कंकर हैं....
इसी बीच एक छात्र खड़ा हो बोला की सर लेकिन आपने ये नहीं बताया कि 'चाय के दो कप क्या हैं?'
प्रोफ़ेसर मुस्कुराये और बोले मैं सोच ही रहा था कि किसी ने अब तक ये प्रश्न क्यूँ नहीं पूछा.....इसका उत्तर ये है कि जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट क्यूँ ना लगे लेकिन अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा बचा कर रखना चाहिए.........
क्यूंकि आगे बढ़ने की चाह में करीबी रिश्तों को भुला देना समझदारी नहीं है...करीबी मित्र के साथ बिताये चंद लम्हों का सुख इस चराचर जगत का उत्तम आनंद है...इस आनंद के लिए वक़्त बचाए रखिये................

Tuesday, December 21, 2010

इक्कीसवी सदी का पहला दशक और बालीवुड


२०१० के ख़त्म होने के साथ ही इक्कीसवी सदी का पहला दशक हमसे विदा हो जाएगा। यूँ तो गुजरा वक़्त दोबारा लौट के नहीं आता लेकिन उस गुजिश्ता दौर से हम कई चीजें सीखकर आने वाले कल में नए ढंग से कदम रख सकते हैं...गोयाकि आत्ममंथन नयी संभावनाओं के निर्माण में सहायक साबित होता है...बहरहाल

बात यहाँ हिंदी सिनेमा के सन्दर्भ में करना है...बीते कई दशकों की तरह इस दशक में भी हमारे हिंदी सिनेमा की सफलता का प्रतिशत तकरीबन पांच ही रहा। लेकिन यही पांच प्रतिशत कामयाबी नए लोगों और विभिन्न कार्पोरेट सेक्टर्स को फिल्म निर्माण के लिए ललचा रही है... और इसके चलते ही आज तकरीबन १०० वर्ष बाद भी भारतीय सिनेमा अपनी खास पहचान बनाये हुए है।

बीते दशक पे गौर किया जाय तो इस दशक में हम एक नए तरह के सिनेमा से रूबरू हुए, जो न तो पारम्परिक व्यावसायिक सिनेमा है नाही ये सामानांतर सिनेमा की तर्ज का है...ये अपने ही तरह का नया सिनेमा है जिसे विशेषज्ञ न्यूएज्ड सिनेमा कहते हैं। ये सिनेमा भी आज की युवा पीढ़ी की तरह सीधी-सपाट, खुली बातें करने वाला असल मानवीय चित्रण करता है...जहाँ मानव को उसकी खूबियों और कमजोरियों के साथ-साथ प्रस्तुत किया जाता है। इन फिल्मों के निर्देशक भी आज की पीढ़ी के ही है जो युवामन और आज के हालातों से भली भांति परिचित हैं। फरहान अख्तर, इम्तियाज अली, अब्बास टायरवाला, अयान मुखर्जी, कुनाल कोहली इसी श्रेणी के चर्चित नाम हैं।

बीते दशक में मल्टीप्लेक्स संस्कृति के फलने-फूलने के कारण नए विषयों पर बनी कम बजट वाली फिल्मो को भी दर्शक नसीब हुए...और इन फिल्मों को विश्व स्तर पर सराहना मिली। खोसला का घोसला, भेजा फ्राई, देव डी, उडान, इकबाल जैसी फिल्मो ने मुख्य धारा के सिनेमा को चुनौती दी। फलतः बड़े बैनर और निर्देशकों ने इस तरह की फिल्मों में अपने हाथ आजमाए।

लेकिन इन कुछ फिल्मो की कामयाबीयों को छोड़ दे और सांगोपांग आकलन करे तो इस दशक में भी हमारा सिनेमा हमेशा की तरह चुनिन्दा सितारों के इर्द-गिर्द घूमता रहा। जिस कारण अच्छे लेखको और निर्देशकों को सितारा केन्द्रित होकर काम करना पड़ा। सीमित प्रतिभा द्वारा संचालित इस उद्योग ने नयी संभावनाओं को पनपने का अवसर नहीं दिया। इस कारण जमकर पिष्टपेषण हुआ मतलब पुरानी फिल्मों के रीमेक बने और सफल व्यावसायिक सिनेमा को फार्मूले की तरह प्रयोग कर सीक्वल बनाये गए। नए विषयों को अकाल बना रहा। धूम, हेरा-फेरी, गोलमाल इसी का नतीजा रही। इस श्रृंखला में 'मुन्ना भाई सीरिज' अपवाद रही। जो सीक्वल होते हुए भी उम्दा अभिव्यक्ति थी और दोनों फिल्मे गुणवत्तापरक थी।

सुभाष घई, राजकुमार संतोषी, डेविड धवन, महेश भट्ट जैसे निर्देशकों की जगह नए निर्देशकों ने अपने कदम जमाये। लगान, ब्लेक, दिल चाहता है, रंग दे बसंती, ३ इडियट्स जैसी फिल्मों से आशुतोष गोवारिकर, संजय लीला भंसाली, राजकुमार हिरानी, राकेश ओमप्रकाश मेहरा को ख्याति मिली। संगीतकारों में भी प्रीतम, सलीम-सुलेमान, विशाल-शेखर, साजिद-वाजिद ने अपना खास मुकाम बनाया। विभिन्न म्युजिक रियलिटी शो के जरिये गायकी में भी नयी प्रतिभाओ को अवसर मिले, जिससे उन्होंने भी बालीवुड के इस समंदर में खुद को स्थापित किया...सुनिधि चौहान, श्रेया घोषाल को सितारा हैसियत मिली।

शाहरुख़ खान, सलमान, अक्षय कुमार, अजय देवगन, हृतिक रोशन बुलंदियों पे रहे..लेकिन यदि दशक का सुपरस्टार चुनने की बात हो तो निर्विवाद रूप से आमिर खान श्रेष्ठ साबित होंगे...जिन्होंने लगान, रंग दे बसंती, तारे ज़मीन पर, दिल चाहता है, फ़ना, गजनी, ३ इडियट्स जैसे नगीने इंडस्ट्री को दिए, बस 'मंगल पांडे' इस दशक का उनके लिए हादसा रहा। संजय दत्त, अनिल कपूर लगातार तीसरे दशक में अपनी जगह बचाए रखने में सफल हुए।

भले ही नए निर्देशकों, लेखकों, संगीतकारों, गायकों का आगाज हुआ पर प्रतिष्ठित नाम भी अपनी उपस्थित दर्ज कराते रहे, और अपनी प्रतिष्ठा को बनाये रखा। यश चोपड़ा, श्याम बेनेगल, मणिरत्नम, सूरज बडजात्या, राम गोपाल वर्मा ने क्रमशः वीरजारा, जुबैदा, गुरु, विवाह, सरकार जैसी फिल्मों से खुद को मुख्य धारा में जोड़े रखा। तो वही a.r. रहमान, शंकर-अहसान-लॉय, उदित नारायण, सोनू निगम, लता मंगेशकर, अलका याग्निक जैसी हस्तियाँ अपनी मुस्तैदी के साथ बने रहे।

इस बीच अनुराग कश्यप, अनुराग बासु, मधुर भंडारकर जैसे फिल्मकारों ने लीग से हटकर फिल्म निर्माण कर तारीफें बटोरी...इनकी बनाई ब्लेक-फ्राईडे, मेट्रो, पेज ३ जैसी फिल्मो को काफी सराहना मिली। कई बी ग्रेड फिल्मे भी इस दरमियाँ आई जो अश्लीलता से लबरेज थी और उन्होंने मुख्यधारा के सिनेमा में आने की भरसक कोशिशें भी की। मर्डर, ख्वाहिश, शीशा जैसी कुछेक फिल्मे कमाई भी करने में सफल रही..पर बाद में इन पर ब्रेक लग गया, अब यदि ये बनती भी हैं तो मुख्य धारा से अलग रहकर इनका एक खास लक्षित दर्शक वर्ग होता है। इमरान हाशमी इस तरह की फिल्मो से सितारा बने। इस दशक की हास्य फिल्मो का जिम्मा प्रियदर्शन, अनीस बाजमी जैसे निर्देशकों ने संभाला। परेश रावल, राजपाल यादव, बोमन ईरानी प्रमुख चरित्र अभिनेता बनकर उभरे।

हमेशा की तरह महिला केन्द्रित फिल्मे न के बराबर बनी..लेकिन पुरुष केन्द्रित फिल्मों में नारी की छवि सशक्तता से प्रस्तुत हुई..जिससे बोल्ड होती नारी की महत्वकांक्षाएं खुलकर सामने आई। पिंजर, चमेली, लज्जा, फैशन, सलाम नमस्ते, पेज ३, जब वी मेट, लव आजकल जैसी फिल्मो में नारी अपने अधिकारों के लिए सजग नजर आई। आतंकवाद, नक्सल समस्या, समलैंगिकता, किसान आत्महत्या जैसे विषयों को लेकर फिल्म निर्माण हुआ। अ वेडनेसडे, मुंबई मेरी जान, आमिर, रक्तचरित्र, पीपली लाइव सफल रही।

कई कम बजट की अनापेक्षित फिल्मे सफल रही तो दूसरी ओर कई बड़े निर्देशकों की स्टारकास्ट से सजी महंगी फिल्मे औंधे मूंह गिरी। हालिया रिलीज काइट्स, खेलें हम जी जान से, रावण समेत मंगल पांडे, सांवरिया, रामू की आग, चांदनी चौक २ चाइना, पहेली, बिल्लू, कैश, लन्दन ड्रीम्स, ब्लू जैसी फिल्मे बुरी तरह फ्लॉप हुई...ये लिस्ट बहुत लम्बी है।

खैर, दस वर्षों के सिनेमा जगत पे महज एक लेख के जरिये कुछ नहीं कहा जा सकता। ये तो बस एक सरसरी निगाह दौड़ाने का प्रयास भर था। बस अब आने वाले वर्षों में हमारे सिनेमा से कुछ उम्दा, सार्थक, मनोरंजक फिल्मों की आशा रहेगी। क्योंकि ये सिनेमा हमारे लिए महज मनोरंजन का जरिया नहीं बल्कि हमारे समाज का दर्पण भी है। अंत में इन दस वर्षों की श्रेष्ठ फिल्मों के नाम याद कर विराम लूँगा.. ये श्रेष्ठ फिल्मे मेरी व्यक्तिगत पसंद पे आधारित है इन्हें विशेषज्ञों के मापदंडो पर न तौले-
लगान, दिल चाहता है, कोई मिल गया, मुन्नाभाई m.b.b.s., स्वदेश, रंग दे बसंती, जब वी मेट, तारे जमीन पर, नमस्ते लन्दन, ३ इडियट्स........................


(दैनिक पत्र 'राज एक्सप्रेस' एवं मासिक पत्रिका 'विहान' व 'सूचना साक्षी' में प्रकाशित)