Wednesday, August 29, 2012

क्या सच में बातों से ज़िंदगी नहीं चलती....???

हिन्दुस्तानी फ़िल्मों, साहित्य और कई बार घरों की चारदीवारी के अंदर भी अक्सर एक संवाद सुनने को मिलता है..."बातों से ज़िंदगी नहीं चलती"। ज़िंदगी अपने आप में ही एक बड़ा संगीन मुद्दा है और ये कैसे चलती है इस प्रश्न का जबाब खोजने में सैंकड़ो दर्शन, धर्म, ग्रंथ, पुराणों का जन्म हो गया...और इन तमाम चीजों से कई तरह के विवादों का ज़न्म हो गया, पर आज तक इस प्रश्न के एक सार्वभौमिक जबाब का जन्म नहीं हो पाया कि ज़िन्दगी कैसे चलती है? 

बहरहाल, भले इस बात का पता न चला हो कि ज़िन्दगी कैसे चलती है पर इस सार्वभौमिक बात को सब ही कहते मिल जाते हैं कि "बातों से ज़िंदगी नहीं चलती"। गर बातें नहीं है तो स्वाभाविक तौर पर ख़ामोशी होगी तो सवाल खड़ा होता है कि क्या ख़ामोशी से ज़िन्दगी चलती है ? जबाब मिलना मुश्किल है। कुछ और जमाने के प्रसिद्ध संवाद है- 'ज़िंदगी तो भैया पैसों से चलती है' या फिर 'प्यार से ज़िंदगी चलती है' या 'रिश्तों का नाम ज़िंदगी है'...सब बड़ा गड्डमगड्ड है। ज़िंदगी...ज़िंदगी...जिंदगी...कमबख़्त एक ऐसा शब्द है ये, जिस शब्द को शुरुआत में या मुख्य केन्द्र में लेकर हजारों शायरियां, गज़लें, कविताएं और फ़िल्मी गीतों का निर्माण हुआ है...इस ब्लॉग जगत पे भी कम से कम सौ-दो सौ ब्लॉग होंगें जिन्होंने अपने ब्लॉग में ज़िंदगी शब्द का इस्तेमाल किया होगा...हर कोई ज़िंदगी की पड़ताल कर रहा है और सब अपनी-अपनी राग आलाप रहे हैं कि ज़िंदगी ऐसे चलती है और ऐसे नहीं चलती है। अपने लेख को आगे बढ़ाने से पहले मैं आपको बता दूं कि मैं अपने इस लेख में ज़िंदगी के संबंध में कोई नई रिसर्च प्रस्तुत करने नहीं जा रहा...दरअसल आज इस शब्द पे एक खुन्नस सी आ रही थी बस इसलिए अपने दिल की भड़ास ज़िंदगी पर...माफ कीजिए ज़िंदगी शब्द पर निकाल रहा हूं।

खैर फिलहाल हमारा मुद्दा है कि क्या बातों से ज़िंदगी नहीं चलती...प्रसिद्ध संचार विशेषज्ञ डेविड बर्लो का कहना है कि मानव अपने जाग्रत समय में से सत्तर फीसदी समय का प्रयोग शाब्दिक संचार के साथ करता है। इसमें वो बोलना-सुनना, पढ़ना-लिखना आदि काम करता है। सीधा सा मतलब है वो अपना समय किसी न किसी तरह बातों के साथ बिताता है और ये सत्तर फीसदी समय तब गिना गया है जबकि इसमें सिर्फ शाब्दिक संचार को शामिल किया गया है गर अशाब्दिक संचार को भी शामिल करें तो ये गणना सौ फीसदी हो जाती है..और दिल में घुमड़ने वाली वे लाखों बचैनियां, कसमसाहटें, परेशानियां, जज़्बात और असंख्यात विचार जो किसी न किसी तरह बातों से ही जन्में है और खुद को शब्द देने के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं..उन्हें हम आखिर कैसे बातों से अलग कर सकते है। लेकिन इन बातों को थामें फिर भी जिंदगी चल रही है...और यही ज़िंदगी की सबसे अच्छी बात है कि वो चलती रहती है और शायद यही सबसे बुरी बात भी।

संसद में सैंकड़ो योजनाएं बन रही है, अन्ना हजारे, बाबा रामदेव से लेकर विपक्ष तक सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं..रैलियां निकल रही हैं...बीस चैनलों पर दो सौ बाबा इंसान को मुक्ति का पाठ पढ़ा रहे हैं...लाखों स्कूल-कॉलेज पढ़ा-पढ़ाकर समाज में साक्षर बेरोजगारों की फौज खड़ी कर रहे हैं...कई बड़े बिजनस प्रोजेक्ट तैयार हो रहे हैं...एक्टर-क्रिकेटर-स्मगलर सबकी कांफ्रेंस हो रही है..ऑफिस में, घर में, सड़क पर सब जगह मीटिंग्स का दौर चालु है...ग्लोबल वार्मिंग, पर्यावरण संरक्षण, से लेकर ग्लोबलाइजेशन जैसी बड़ी-बड़ी समस्याओं से निपटने के सम्मेलन आयोजित हो रहे हैं..शादी-व्याह, जन्म-मरण और दसियों त्यौहारों का सेलीब्रेशन या कोई न कोई उत्सव हो रहा है..फ़िल्मों, अखबारों, विज्ञापनों, रास्तों पर चस्पा पोस्टरों, किताबों से लेकर शहर के नुक्कड़ो, गांव की चौपालों में कुछ न कुछ प्रसारित, प्रचारित किया जा रहा है....अरे भैया ये सब क्या है ? बातें...बातें...और सिर्फ बातें। और इन सबके साथ कालीन के नीचे छुपी-थकी-हारी, वेवश, फ्रस्टयाई, इगनोर की हुई, बेचारी ज़िंदगी चल रही है।

एक घरेलु हिंसा के खिलाफ विज्ञापन टीवी पर आया करता था जिसके अंत में संदेश दिया जाता था-"चुप्पी तोड़ो"। एक अन्य सेलफोन कंपनी का विज्ञापन था जिसका स्लोगन था- "बात करने से ही बात बनती है" क्यों..आखिर क्यों चुप्पी या ख़ामोशी तोड़ने की बात की जा रही है जबकि बातों से कहां जिंदगी चलती है..?? अक्सर हम दुनिया में ऐसे लोगों को भी देखते हैं जो चुप है या हालतों, समाजों या रिवाजों ने उन्हें ख़ामोश बना दिया है ऐसे वो तमाम लोग हासिए पर फेंक दिए जाते हैं...नाम-शोहरत, वाहवाहियां उसे ही नसीब हो रही हैं जो बोलना जानता है...वही अपने हक, ज़माने से ले पाता है जिसे कहना आता है...सर्वत्र बोलने वाले ही तो अपना काम निकाल पा रहे हैं या कहें कि तथाकथित 'ढंग की ज़िंदगी' जी पा रहे हैं। फिर क्यों आखिर ये जुमला बोला जाता है कि "बातों से ज़िंदगी नहीं चलती"।

एक डॉक्टर की दवा से ज्यादा कई बार रोगी को उसके दिए दिलासे काम करते हैं..किसी का साथ निभाने का वादा दिल को कितना संबल देता है..भगवान के दर पर प्रार्थना कर दिल को कितना सुकुन मिलता है...प्यार का इज़हार-इकरार कितना रुमानी होता है...उत्सव के गीत, मुस्काते शब्द, मां की लोरियां, मजाक-मस्ती, दोस्तों के जोक्स ये सब क्या है....महज बातें ही तो है लेकिन ये बातें वो काम कर जाती है जो कि बड़ी-बड़ी चीजें नहीं कर पाती...फिर आखिर कैसे बातों से ज़िंदगी नहीं चलती???

अंत में उपकार फ़िल्म का इक गीत याद आ रहा है-"कोई किसी का नहीं ये झूठे, नाते हैं नातों का क्या..कसमें-वादे प्यार-वफा सब, बातें हैं बातों क्या " और तो आप पूरा गाना खुद सुन लीजिएगा, ये सारी 'बातों और ज़िंदगी' का झमेला अपने तो पल्ले नहीं पड़ता। भगवान और इस जमाने के बुद्धिजीवी जाने की ज़िंदगी कैसे चलती है..अपन को तो बस इत्ती-सी बात समझ आती है- ज़िंदगी, ज़िंदगी से चलती है..कभी हंसती है तो कभी रोती...और जो नहीं चलती, वो ज़िंदगी नहीं होती।

Friday, August 17, 2012

इक्कीसवी सदी की नारी और महिलासशक्तिकरण के छलावे

देश की स्वतंत्रता 65 वर्ष की हो चुकी है...काफी कुछ बदला पर कुछ चीजें जस की तस की है। उन्हीं में से एक है आज भी महिलाओं की स्थिति, महिलाओं के प्रति पुरुष की सोच। यकीनन आज के दौर में ये बात करना बड़ा अजीब लगता है जबकि आज जहां महिलाएं अंतरिक्ष में पहुंच रही हैं, ओलंपिक में मेडल जीत रही है, राजनीति और सिविल सर्विसेस में नाम कमा रही हैं।

ये सच हैं कि आज सतीप्रथा, अशिक्षा, बेमेल विवाह जैसे मामले सुनने में नहीं आते। महिलाओं के प्रेम संबंधों, अंतर्जातीय विवाह जैसी चीजों को समाज का कुछ समृद्ध और शिक्षित वर्ग दकियानूस नज़रों से नहीं देखता...लेकिन फ़िर भी पुरुष की तथाकथित मर्दाना सोच आज भी उसे ज़िस्म से ऊपर और यौन संतुष्टि से परे मानने को तैयार नहीं है। निश्चित तौर पर समाज में एक ऐसा भी पुरुष वर्ग है जो महिलाओं को आदर, सम्मान की नज़र से देखता है पर उस वर्ग की तादाद बहुत कम हैं। को-एड एजुकेशन से शिक्षित होती, मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती, आगे बढ़ती महिला पुरुष के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ती दिख रही है... लेकिन क्या वाकई में ऐसा है? क्या सच में आज महिला और पुरुष एक ज़मीन पर खड़े हैं? इन प्रश्नों पर थोड़ी गहराई में जाकर विचार करें तो हमें समझ आए कि महिलासशक्तिकरण शब्द कितना बड़ा छलावा है।

हर दिन बसों, ट्रेनों और अन्य पब्लिक ट्रांसपोर्ट के साधनों में अनचाही छूअन से गुज़रती महिला.. कॉलेज, ऑफिस और सड़कों पर महिला के बदन का पोस्टमार्टम करती पुरुष की निगाहें...तीखे, अनचाहे कानों में पड़ते शब्दवाण...अश्लील एसएमएस, कमेंट्स और जोक्स को सहती नारी जब रात में नींद लेने जाती होगी तो उस छुअन, उन निगाहों और शब्दों के सांपों को अपने बदन में लिपटता हुआ महसूस करती होगी...और ये वो सांप है जिसका ज़हर बिना डसे तड़प पैदा करता है।

किसी नौकरी में ऊंचे पद पर आसीन महिला के ऊपर भी उस ऑफिस के निचले दर्जे के कर्मचारी द्विअर्थी जोक्स मारने से परहेज़ नहीं करते..उन पुरुषों की निगाहें अपनी बॉस को भी पहले छद्म निगाहों से देखती है फिर उसे अपना बॉस मानती है। पुरुष मानसिकता आज भी महिला पर शासन जमाने को अपना हक़ समझती है...महिला से स्वयं का शासित होना उसे बर्दाश्त नहीं। 

आज अपने करियर में एक मुकाम बनाने की चाह रखने वाली महिला को किन मानसिक प्रताड़नाओं से गुज़रना पड़ता है ये शायद सिर्फ वही जानती है...और अगर अत्यधिक महत्वकांक्षी नारी हो तो उसे दलदल में उतरने से गुरेज़ नहीं। ऊंचे महकमों पे तैनात आला अफसरों की ज़िस्मानी भूख मिटाने का भोजन नारी बनती है...जहां उसे नाम, शोहरत, पैसा सब कुछ तो मिलता है पर नारीत्व ही समाप्त हो जाता है। कुछ महिलासशक्तिकरण के ठेकेदार नारी के इस कृत्य की वकालत करते पाए जाते हैं...उनके द्वारा स्त्री के कई लोगों से संबंध, विवाहेतर संबंध रखना आदि भी उदारवादी नज़रों से देखा जाता है, इसे वे महिला की प्रगतिवादी सोच कहते हैं। आश्चर्य होता है कि चारित्रिक पतन को कैसे महिलासशक्तिकरण का पर्याय माना जा सकता है और ख़ास तौर पर उस देश में जहां दुर्गा, सरस्वती और सीता की पूजा होती है। महिलासशक्तिकरण और महिलाविकास का राग आलापने वाले ये महानुभव..ऐसे विचार प्रगट कर अपनी हवस में आने वाले राह के रोड़ो को साफ करने की मंशा रखते हैं... और इनकी दिली तमन्ना यही होती है कि महिला की सोच इसी तरह तथाकथित प्रगतिवादी बने। गंदगी साफ करने के लिए कीचड़ में उतरना ज़रुरी होता है पर कीचड़ खाकर गंदगी साफ करना समझदारी नहीं है। महिला का सबसे बड़ा गहना उसका चरित्र है उस गहने को बेंचकर महिलासशक्तिकरण पाना, बहुत महंगा सौदा है।

अफसोस, कि भले सरकार और हमारी शिक्षा प्रणाली आज महिला को समाज की मुख्यधारा में लाने के जी-तोड़ जतन कर रही है पर पुरुष मानसिकता को बदलने में सब नाकाम है..और इस पुरुष वर्चस्व प्रधान समाज में, घर के बाहर की बात तो रहने ही दो...घर-परिवार के अंदर ही महिला इस पुरुष मानसिकता का शिकार है जहां उसे अपनी पसंद, अपनी इच्छाओं, जिजीविषाओं का गला हरक्षण घोंटना पड़ता है। शादी से पहले तक वह परिवार में बोझ है और घर की इज़्जत का जिम्मा भी बेचारी इस अबला पर है और शादी के बाद वो एक भोग्या है और यहां भी घर की इज़्जत की ठेकेदार ये अबला है...पर आश्चर्य, जिस पर घर की इज्जत टिकी है उसकी ही घर में इज्जत नहीं है। इसी पुरुष मानसिकता की देन है कई छुपे हुए गहन अपराध..यथा-भ्रुणहत्या, दहेज, महिलाउत्पीड़न, घरेलू हिंसा आदि।

हमारा सिनेमा, विज्ञापन, अखबार और तमाम मीडिया महिला को एक वस्तु की तरह ही पेश करते हैं..हर जगह नारी लुभाने की एक वस्तु है और मार्केटिंग का अहम् ज़रिया। पुरुष मानसिकता इस क़दर समाज में घुल गई है कि महिला भी आज इस मानसिकता के प्रति सकारात्मक सोच रखने लगी है...उसे खुद के इस्तेमाल होने से गुरेज़ नहीं...और अपने भौंडे प्रदर्शन को वो खुद की तरक्की समझ बैठी है। आज उसके मूंह पे भी पुरुषों की भांति गाली है, जेब में हथियार है, चाल में ऐंठन हैं और ये सारी चीजें उसके लिए महिलासशक्तिकरण का प्रतीक है...पर इन सारी क्रियाओं में नारी कहां है? पुरुष और नारी दोनों का अपना अलग स्वतंत्र व्यक्तित्व है, अपना ही संसार है और इन दोनों के स्वतंत्र व्यक्तित्व से ही संतुलन है। नारी खुद में पुरुष के गुण समाहित करके अगर सोचे कि वो सशक्त हो गई है तो ये एक भूल है...और वो भी उन गुणों को जो पुरुष में भी होना अच्छा नहीं है। नारी की अस्मिता उसकी कोमलता, शर्म, प्रेम, करुणा, ममता से जानी जाती है इन गुणों का ह्रास होना भला कैसा महिलासशक्तिकरण है। 

खैर, भले एकतरफ महिलासशक्तिकरण के लिए हमारा तंत्र अपनी पीठ थपथपाता रहे..पर आए दिन भंवरीदेवी, गीतिका जैसी महिलाओं के साथ घटी घटनाएं हमारे तंत्र को आइना दिखा देती है...और इन घटनाओं में शुमार हमारे कानून और राजनीति के ठेकेदारों को भी उनकी गिरेबान में झांकने पे मजबूर कर देती है। इन सब चीजों से एक बात समझ में आती है कि महिलासशक्तिकरण, कभी भी महिला की सोच बदलने से नहीं आ सकती...महिलासशक्तिकरण के लिए पुरुष की सोच बदलना ज़रुरी है। ये ठीक उसी तरह है कि अपराध का जड़ से सफाया, पुलिस के कदमों पर नहीं...अपराधीयों के कदमों पर निर्भर है।


Friday, July 13, 2012

ज़िन्दगी, युवामन और टाइमपास



विगत दिनों एक टेलीविज़न कार्यक्रम में युवा अपराध से जुड़ी कहानी देखने को मिली। कहानी के अंत में एक संवाद था..आज का युवा जिंदगी को टाइमपास और टाइमपास को ज़िंदगी समझ रहा है और उस टाइमपास के विकल्प यदि उसके पास न हों तो उसे अवसाद घेर लेता है। बड़ी अजीब बात है कि शिक्षा में आई क्रांति ज़िंदगी के मायने तय नहीं कर पा रही है। भौतिकता का अंधानुसरण उसकी दिशा तय नहीं कर पा रहा है और जिस भी दिशा में आज युवा जा रहा है उसकी सर्वोत्कृष्ठता का राग आलापने में भी वो कोई कसर नहीं छोड़ रहा। लेकिन उसकी वो दिशा न तो उसे संतुष्टि प्रदान करने में सफल हो पा रही है नाहीं अवसाद कम कर पा रही है।

स्वामी विवेकानंद ने तकरीबन 150 वर्ष पहले हमारी शिक्षा व्यवस्था पे जो टिप्पणी की थी वो आज के शिक्षातंत्र पे ज्यादा चरितार्थ हो रही है। उनका कहना था- आज का पढ़ा-लिखा युवा चार बातें सबसे पहले सीखता है...पहली कि उसका बाप दकियानूस है और उसका दादा दिवाना था जो उसकी सोच है वही उत्कृष्ठ है, दूसरी कि हमारे सारे धर्मग्रंथ झूठे और कोरी गप्प हांकने वाले है, तीसरी कि अपने शौक और इच्छाएं ज़रुरी है और उनको पूरा करना ही सुख तथा चौथी कि विकास सिर्फ पश्चिम में ही है और हमारी उन्नति एवं शक्ति का विस्तार भी पाश्चात्य विचारप्रणाली से हो सकता है। इच्छाओं को पूरा करने की ये दौड़ टाइमपास को ज़रुरी बना देती है और ज़िंदगी का मतलब टाइमपास हो जाता है। दरअसल टाइमपास अपने अंदर के भगौड़ेपन का प्रतीक है हम खुद के साथ वक्त नहीं बिता पाते इसलिए किसी साधन का होना हमारे लिए अनिवार्य हो जाता है। विराम का वक्त बरदाश्त नहीं होता, लेकिन हम भूल जाते हैं कि विराम का वक्त विचार का वक्त भी हो सकता है।

तमाम भौतिक चाकचिक्य का बाज़ार हमारे उस आंतरिक भगौड़ेपन को दूर करने के लिए है। उन्नति का पैमाना इन्हीं संसाधनों के विकास से तय किया जाता है जो हमारा टाइमपास कर रहे है। टेलीवज़न पे प्रसारित सैंकड़ो चैनल, हाई-स्पीड इंटरनेट, सोशल नेटवर्किंग साइट्स, मोबाइल फोन, मॉल कल्चर, मल्टीप्लेक्स, कॉम्पलेक्स आदि समस्त चीजें संस्कृति का मैक्डोनाल्डाइजेशन की गवाही दे रही हैं। लेकिन संसाधनों का निरंतर होता ये विकास, तब भी संतुष्टि प्रदान करने में समर्थ नहीं हो पा रहा अपितु हमारी इच्छाओं की आग में घी डालने का ही काम कर रहा है। इस असंतुष्टि का ही नतीजा है कि आज आत्महत्या का प्रतिशत निरंतर बढ़ रहा है और इन आत्महत्या करने वालों की तादाद में 15 से 35 वर्ष के युवा ज्यादा है। हम सोच सकते हैं कि पहले भले हमें इतने संसाधन महरूम नहीं थे, ज़िंदगी अभावों में बसर होती थी, लेकिन लोगों में आत्मबल हुआ करता था जिसके दम पे वो अभावों से लड़ते हुए भी कभी ज़िंदगी का साथ नहीं छोड़ते थे। उनके पास जिजीविषा हुआ करती थी किंतु आज का परिदृष्य सामने है।

स्वामी दयानंद सरस्वती ने संदेश दिया था कि वेदों की ओर लौटो...पर आज के संदर्भ में यदि आप किसी नौजवान को ये उक्ति सुनाने जाएंगे तो यकीनन आप घोर हंसी के पात्र बनेंगें। आज वेदों, पुराणों की बात तो छोड़ ही दीजिए अच्छे साहित्य की तरफ भी रुझान नज़र नहीं आता। जिस तथाकथित साहित्य को पढ़ा जा रहा है वो भी इच्छाओं को हवा देने का काम करता है। जिनकी अहम विषयवस्तु सेक्स हुआ करती है और जिसे प्रेम के नाम पर परोसा जाता है। आधुनिक साहित्य, समाज और सिनेमा नैतिकता और मूल्यों की स्थापना में नाकाम सिद्ध हो रहा है।

ज़िंदगी की सार्थकता गर्लफ्रेंड, पार्टी, पैसा और सेक्स से मानी जाती है। अब इस जीवनशैली में आप कहां सद्विचारों को स्थापित कर सकते हैं और यदि स्थापित करने की कोशिश की गई तो ज़माने में आप एक गई-गुज़री सोच वाले रुढ़िवादी इंसान करार दिए जाएंगें। प्राचीनतम चंद अंधपरंपराओं से लड़ने की गुहार युवा से की गई थी किंतु उसने प्राचीनतम संपूर्ण ज्ञान को ही तिलांजलि दे दी। संतुलित वैज्ञानिक विचारप्रणाली अपनाने की मांग युवा से की गई थी किंतु उसने प्रत्यक्षवाद की आड़ में संपूर्ण आत्मिक भावनओं का ही दमन कर दिया।

बहरहाल, कहाँ तक कथन करुं...पहले भी अपने दो लेख जोश-जुनून-जज़्बात और जवानी तथा उद्दंड जवानी, दहकते शोले और बाढ़ का उफनता पानी में काफी कुछ कह चुका हूं। इस संबंध में कुछ कहता हूं तो अपने ही मित्रों और संबंधियों की नज़रों में दकियानूस साबित हो जाता हूं। दिल की भड़ास पन्नों पर और ब्लॉग पे निकालकर संतुष्ट हो जाता हूं अन्यथा ज़माना मुझे ये सब कहने की इज़ाजत और मोहलत नहीं देता........

Tuesday, May 29, 2012

प्रताड़ित होने से बेहतर पराजित होना : सत्यमेव जयते


बचपन से ये सीख सुनता आ रहा हूँ कि सच प्रताड़ित तो हो सकता है पर पराजित नहीं..और इसी बात पे यकीन रखते हुए कठिन विपदाओं में भी सच का आँचल नहीं छोड़ता...लेकिन कई बार वर्तमान दौर की प्रताड़नायें बर्दाश्त के बाहर हो जाती है तब ये आँचल भले न छूटे, पर उस आँचल पे अपनी पकड़ ढीली होती हुयी जरुर महसूस करता हूँ...तब भी एक विश्वास के साथ किसी न किसी तरह थामे रहता हू उस दामन को..ये सोचकर कि कोई तो होगा जो इन प्रताडनाऑ में साथ देने आएगा, पर नहीं...मूल्यविहीनता के इस दौर में साथ तो दूर कोई उस राह पे बढते रहने के लिए हौसला-अफजाई भी नहीं करता...जो आवाजें आती है वो यही कहती है...समय के साथ चलो...और ये वक़्त सच के चीरहरण का है ये वक़्त सत्य को पैरों तले कुचलने का है...ये वक़्त निजी स्वार्थों में सच को अनदेखा करने का है...तब ये दिल भी कह उठता है कि साला प्रताड़ित होने से बेहतर तो पराजित होना है!

डार्विन का survival of fittest (शक्तिशाली ही जियेंगे, बाकि हासिये पे फेंक दिए जायेंगे) का सिद्धांत भी इसी ओर इशारा करता है कि भैया शक्ति का संचार अपने अंदर करो और ताकतवरों की ही संगत करो...अपने अंदर शक्ति का उत्सर्जन कर ही आप इस दौर में ज़माने से कदमताल मिलाकर आगे बढ़ पाओगे...लेकिन उस शक्ति के लिए हमें भ्रष्टता की संगत करनी होगी, मूल्यविहीनता का आलिंगन करना होगा, ज़माने के हितों से आँखें मूंद कर स्वार्थी होना होगा...क्योंकि वर्तमान दौर की शक्ति इन्ही सब चीजों में निहित है...और भ्रष्टता के पुजारी ही फल-फूल रहे है...चुनाव आपके हाथ में है..एक तरफ चौंधिया देने वाली भौतिक समृद्धि तो एक ओर फटे हुए सच का दामन थामे अकेले खड़े आप...

बात सच के साथ आमिर के बहुचर्चित शो सत्यमेव जयते’’ की भी करनी है...बहुत पहले से इस बारे में कुछ लिखने का सोच रहा हूँ...पर आमिर खान का हॉट फेनहोने के कारण सोचा कि अभी यदि कुछ लिखा तो आमिर के पक्षव्यामोह से ग्रसित होने के कारण संतुलित लेख न लिख पाउँगा...और लेखन में अतिरेक हो जाने का भय बना रहेगा... किन्तु अब चार एपिसोड बीत जाने के बाद भी मुझे यही लग रहा है कि लेखन अतिरेक पूर्ण ही होगा क्योंकि भले इस शो की आलोचना के स्वर भी सुनाई दे रहे हैं...पर मैं शो के उद्देश्य, और विषय-चयन को महान मानते हुए आमिर का और अधिक कद्रदान हो गया हूँ.....

भ्रूण-हत्या, बालयौन-शोषण, दहेज और चिकित्सातंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार को अब तक के चार एपिसोड में प्रस्तुत किया गया है...इन्हें देख कई बार रगों में खून तेज हो जाता है तो कई बार कमबख्त पानी बनकर आँखों से झर भी जाता है...माथे पे सलवटें आ जाती है...तो कई बार शर्म भी कि हम इस माहौल में जी रहे हैं...सच की कड़वाहट गले की नीचे उतरते हुए बहुत तड़पाती है...दिल दिमाग से सवाल पूछता है कि कैसे इंसान इतना बहसी और संवेदनशून्य हो सकता है?

भौतिकता की आस, असीमित इच्छाएं और स्वार्थ अपराधों को जन्म दे रही हैं पर उन अपराधों का रूप इतना भयावह है कि दिल परेशान हो उठता है..हर इंसान अपराधी जान पड़ता है...अपने रिश्ते-नातेदार और करीबी दोस्त भी संदिग्ध निगाहों से देखे जाने लगते हैं...हद इस बात की नहीं कि ये अपराध हो रहे हैं...हद तो तब होती है कि अपराध चौराहों पे नहीं घरों में ही हो रहे हैं...घर में ही हत्या, घरों में ही बलात्कार और घरों के अंदर ही लूट हो रही है...और ये हत्यारे, बलात्कारी और लुटेरे कोई असभ्य, अशिक्षित समाज के नहीं बल्कि सभ्य, सुसंस्कृत, सुशिक्षित समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं...और घर के बाहर इनकी अपनी अलग चमक है, सम्मान है...गोयाकि घर के बाहर चमकीला डिस्टेम्पर है और अंदर की दीवारें उधड़ रही है..ब्रांडेड कमीज के अंदर फटी बनियान है... इंसान का चेहरा उसकी फितरत बयां नहीं कर रहा...चेहरे पे सभ्यता का मुखौटा और दिल में हवस का सांप लहरा रहा है....

आमिर का ये प्रयास सराहनीय है...हालाँकि कुछ लोग इसे उनकी व्यावसायिक बुद्धि मानते है और सिर्फ पैसा कमाना ही एक मात्र उद्देश्य कहते हैं...व्यावसायिकता का होना बुरा नहीं है किन्तु आप उस व्यावसायिकता के जरिये यदि सामाजिक सरोकार का भी कुछ काम कर पाए तो वो उत्तम ही है...सिर्फ धंधा करना और सामाजिक जिम्मेदारी को निभाते हुए बिजनेस करने में फर्क होता है...पैसा कमाना बुरा नहीं है पर आप उस पैसे को कमाने का जरिया किसे बनाते हो ये आपके दृष्टिकोण का परिचायक होता है...शाहरुख खान की आईपीएल वाली टीम भी पैसा कमा रही है और आमिर का सत्यमेव जयते भी..पर दोनों कमाई में फर्क तो है न..और फर्क दोनों के नजरिये में भी है....एक अखवार के संपादक ने कहा था कि सत्यमेव जयते जैसा शो न्यूज चैनल के ४ इंटर्न ही बना सकते हैं...शायद वो सही कह रहे हों..पर क्या वो न्यूज चैनल वाले इतनी व्यापकता दे पाते अपने शो को...शायद नहीं...तो भले आमिर की लोकप्रियता ही इस शो को चर्चित बना रही हो...पर प्रशंसनीय तो ये भी है न कि उन्होंने अपनी लोकप्रियता का प्रयोग किस दिशा में किया...सोनी टीवी पे प्रसारित शो क्राइम पेट्रोल भी उम्दा प्रयास है..किन्तु उसका कथ्य कुछ अलग है.....

खैर, इस शो में दिखने वाले कड़वे सच एक बात और बयां करते हैं कि इन सारे अपराधों के पीछे कहीं न कहीं हमारी कमजोर बुनियाद भी जिम्मेदार है...जो हमें अपने परिवार से और प्रारंभिक शिक्षा से मिलती है...बच्चों को बचपन से ही महत्वाकांक्षाऑ का पाठ पढाया जाता है...नाम,पैसा,शोहरत कमाने के लिए ही जीवन है ऐसे उपदेश मिलते हैं...और यही चीज उन्हें अपनी शिक्षा पद्धति से सीखने को मिलती है...पर इन महत्वाकांक्षाऑ में नैतिकता और सामाजिक मूल्य हासिये पे फेंक दिए जाते हैं...गांधीजी कहते थे कि शिक्षा की बुनियाद चरित्र होना चाहिए, बाकि चीजें तो बच्चे अपनी प्रतिभा और माहौल से स्वतः सीख लेंगे...किन्तु शिक्षा ने उस बुनियाद को ही मजबूत बनाने की कोशिश नहीं की..इससे न तो चरित्र विकसित हो पाया नाही दृष्टिकोण व्यापक बन पाया!

बहरहाल, इस शो में नकारात्मकता के साथ कुछ सकारात्मक पहलु भी उजागर किये जाते है पर वो बहुत थोड़े है...और बरबाद होते इस समाज को आबाद करने में नाकाफी हैं...किन्तु वो सकारात्मक प्रयास राहत देते हैं...और कभी तो सवेरा होगाकी उम्मीद जागते हैं...इन छुटमुट सी रोशनियों का सहारा लेकर हमें भी सच का साथ देना है...और सच को जिन्दा रखने के लिए अपने-अपने स्तर पर प्रयास करते रहना है...सच पे से विश्वास खो देना कभी समस्या का समाधान नही हो सकता...भले इस डगर में आप अकेले हों लेकिन फिर भी आपको सच का दिया लेके इस घनघोर दुनिया के जंगल में अपने-अपने स्तर पे रोशनी बिखेरते रहना है...आपकी ये रोशनी कभी न कभी, किसी न किसी वन में भटके पथिक की जिंदगी में उजियारा जरुर लाएगी............


Tuesday, May 22, 2012

ढलते सूरज की तपिश : राहुल द्रविड़

विवादों से घिरे आईपीएल के पांचवे संस्करण का अंत होने जा रहा है और इस आईपीएल पांच से राजस्थान रॉयल बाहर हो चुकी है। सीमित संसाधन और गैरसितारा खिलाडियों से भरी टीम को राहुल द्रविड़ की कप्तानी भी पार न लगा पाई...लेकिन सारे टूर्नामेंट में राजस्थान के जुझारू प्रदर्शन ने कई यादगार, रोमांचक मेच बनाये...यूँ तो टीम के सबसे सफल बल्लेबाज अजिंक्य रहाणे रहे..लेकिन ढलती उम्र में भी राहुल द्रविड़ की जीवटता देखने लायक रही और उनकी आकर्षक बल्लेबाजी हमें ये गीत गुनगुनाने को मजबूर कर देती है कि अभी न जाओ छोड़ के, कि दिल अभी भरा नहीं

भारतीय टीम की ‘दीवार’ का रंग धुंधला पड़ गया पर मजबूती आज भी बरक़रार है..और किसी ज़माने में मैक्ग्राथ, एलन डोनाल्ड, कर्टनी वाल्श जैसे धुरंधर गेंदबाजो के प्रहारों को सहने वाली ये दीवार आज मलिंगा, डेल स्टेन, ब्रेट ली को भी उसी मुस्तैदी से खेलती है। सिर्फ संयत बल्लेबाजी ही नहीं, संयत व्यक्तित्व भी द्रविड़ की पहचान है। १६ साल के क्रिकेट करियर में न कभी द्रविड़ के बल्ले ने आग उगली, न उनकी बातों ने। उनके बल्ले से सितार की सुरलहरियां प्रवाहित होती थी और वाणी से फूल झड़ते थे। विवादों की गूंज इस साउंडप्रूफ दीवार में प्रवेश नहीं कर पाई। अपने करियर में मैच  फिक्सिंग और चैपल-गांगुली जैसे विवादों की कीचड़ के बीच भी इन्होंने खुद को कमल की तरह खुद को उस कीचड़ से दूर रखा।

राहुल द्रविड़ उन चुनिन्दा खिलाडियों में से थे जिनके परफार्मेंस और फिटनेस में निरंतरता रही। यही कारण है कि अपने डेब्यू टेस्ट मेच से लेकर लगातार ८४ टेस्ट खेलने का रिकार्ड इनके नाम है। यह रिकार्ड उनकी मानसिक मजबूती के साथ शारीरिक मजबूती को दर्शाता है और एक अनुशासित, आदर्श जीवन शैली की ओर इशारा करता है क्योंकि ये निरंतरता बिना अनुशासन के नहीं आ सकती। उनकी जीवनशैली आज के हुड़दंगी गैर जिम्मेदार युवा के लिए एक सीख देती है...द्रविड़ उस सदाबहार फूल की तरह रहे जो मदहोश करने वाली महक तो नहीं बिखेरता लेकिन हर मौसम में खिला रहना जनता है।

करियर के शुरूआती दिनों में कई विशेषज्ञों ने द्रविड़ को टेस्ट क्रिकेटर कहकर वनडे मैचों के लिए अनुपयुक्त घोषित कर दिया था। लेकिन वनडे का भी स्थापित बल्लेबाज बनकर द्रविड़ ने उनके मुंह पे ताला लगा दिया..और वनडे क्रिकेट में १०००० से ज्यादा रन बनाने वाले चंद वनडे विशेषज्ञ बल्लेबाजों की जमात में शामिल हुए। १९९९ के क्रिकेट विश्वकप में सचिन तेंदुलकर, ब्रायन लारा, सनत जयसूर्या, रिकी पोंटिंग जैसे धमाकेदार बल्लेबाज होने के बाबजूद द्रविड़ विश्वकप के टॉप स्कोरर रहे। २००३ के विश्वकप में विकेटकीपर की समस्या से जूझ रही भारतीय टीम के लिए द्रविड़ ने दस्ताने पहनकर विकेट के पीछे भी शानदार काम किया। वे सही मायने में टीम के संकटमोचक थे लेकिन इस संकटमोचक का योगदान हमेशा किसी न किसी वजह से दब जाता था और उन्हें वो तारीफें नहीं मिलती थी जिसके वे हक़दार थे। ये भूत करियर के शुरुआत से ही उनपे हावी रहा, जब अपने डेब्यू टेस्ट में ९७ रन की बेहतरीन पारी गांगुली के शतक के नीचे दब गयी। २००१ के ऐतिहासिक कोलकाता टेस्ट की लाजबाव १८० रन की पारी लक्ष्मण के २८१ रन के आगे धुंधली पड़ गयी। १९९९ विश्वकप में गांगुली के १८३ रन और २००० में सचिन तेंदुलकर के न्यूजीलेंड के खिलाफ वनडे में बनाये १८६ रन के पीछे दूसरे छोर पे मुस्तैदी से खड़े द्रविड़ के शतक भुला दिए गए। पाकिस्तान के खिलाफ मुल्तान टेस्ट में सहवाग के ३०९ रन ने और पाकिस्तान के ही खिलाफ २००६ में द्रविड़-सहवाग के विश्वरिकार्ड ४१० रन की ओपनिंग भागीदारी में सहवाग के दोहरे शतक ने द्रविड़ के शतक की चमक को फीका कर दिया। ऐसे न जाने कितने रिकार्ड होंगे जो उस समय किसी न किसी कारण से हमारा ध्यान द्रविड़ की तरफ नहीं खींच पाए...पर द्रविड़ ने इन सब बातों की परवाह किये वगेर अपना ध्यान सिर्फ अपने खेल पर लगाया...और इसी जीवटता से खेलते हुए जब उन्हें लगा कि अब उन्हें अपनी जगह नए युवा खिलाडियों के लिए खाली कर देना चाहिए तब उन्होंने वनडे और टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह दिया।

दरअसल, राहुल द्रविड़ अब एक इंसान नहीं एक प्रवृत्ति बन चुके है..और शायद आने वाले क्रिकेटर्स को यह तालीम दी जाये कि अपने अंदर द्रविड़त्व लाओ। द्रविड़ होने का मतलब धैर्य, साहस और अनुशासन का होना है..और क्रिकेट के इस जेंटलमेन गेम के लिए इन गुणों का होना अत्यधिक जरुरी है। क्रिकेट के असली जेंटलमेन बनकर रहे राहुल द्रविड़...धोनी, सहवाग अगर क्रिकेट की आंधी है तो द्रविड़ वो मधुर हवा है जो रूह को सुकून देती है। द्रविड़ के स्ट्रेट ड्राइव, लेट कट और पुल शाट को देखना लता मंगेशकर के गीतों को सुनने की तरह राहत का अहसास कराता है।
  
खैर, क्रिकेट के इस धुरंधर ने आईपीएल के इस संस्करण में ४५० से ज्यादा रन बनाकर खुद को क्रिकेट के इस तीसरे फॉरमेट का भी पुरोधा साबित किया। आज उम्र के इस पड़ाव पे आके भी राहुल ने जिस तरह का प्रदर्शन किया वो ये साबित करता है कि ढलते सूरज में भी तपिश होती है...उसका प्रकाश और प्रताप रात के चाँद-सितारों से कही ज्यादा होता है। अपने आगे के करियर को द्रविड़ अनिश्चित बताते है और किसी पूर्वनियोजित योजना के इतर वे समय की मांग के अनुरूप फैसले लेने को वरीयता देते हैं। क्रिकेट छोड़ने के बाद द्रविड़ के जीवन की दिशा क्या होगी ये तो वक्त बताएगा पर इतना पता है है कि अपनी खूबसूरती से संवारी क्रिकेटीय पारी की तरह उनके जीवन की पारी भी बेहद मजबूत होगी...जिसमे उनके परिवार, मित्र और रिश्ते-नातेदारों की अहमियत सर्वोपरि होगी।