Tuesday, September 18, 2012

कुछ "बरफी" के बहाने से........

आनंद जितना ज्यादा अपने चरम पर पहुंच कर नीचे उतरता है वो उतना ही गहरा दर्द बन जाता है। ज़िंदगी की कश्मकश भी अजब है जिसमें सुख-दुख का ताना-बाना कुछ इस ढंग से बुना होता है जिसमें समझ पाना मुश्किल होता है कि जिंदगी की खुशियां, गम को मुंह चिड़ा रही हैं या दर्द के साये खुशियों को हराने की जुगत में लगे हैं। दरअसल ख़ुशी या ग़म के पैमाने हमारी नज़र तय करती है यही वजह है कि कई बार दूर से दिखने वाली त्रासदियां करीब से देखने पर हसीन जान पड़ती हैं तो कई बार दूर से दिखने वाली रंगीनियां पास जाने पर त्रासद नज़र आती हैं।

बरफी...हंसाती है, रुलाती है, तड़पाती है तो कई बार अपनी गिरेबान में झांकने पर मजबूर भी करती है। अनुराग बासु की ये डिश उनकी उस छवि से बिल्कुल अलग है जिस फ्लेवर का टेस्ट अनुराग ने हमें उनकी 'लाइफ इन अ मेट्रो', 'गैंगस्टर' और 'मर्डर' जैसी पिछली फ़िल्मों में चखाया था। 'मेट्रो' बेहतरीन थी पर उसमें चरपरापन था लेकिन फिर भी उसका तीखापन लुभाता है। 'गैंग्सटर' भी लाजबाब थी जिसका कड़वापन मुंह में रखते वक्त तो चुभता है पर गले से नीचे उतरने के बाद स्वाद याद आता है। 'मर्डर' का स्वाद कसायला था जो चखते वक्त और गले से नीचे उतरने के बाद भी रास नहीं आती लेकिन फिर भी इसे बार-बार चखने की क्युरोसिटी बनी रहती है और कई मनचलों ने इसे कई-कई बार चखा है। तो बरफी का टेस्ट पूरी तरह से अलग है जो बहुत-बहुत-बहुत ज्यादा मीठा है पर फिर भी डायबिटीज़ की संभावना शुन्य है। इस फ़िल्म को देखने के बाद लगता है कि निश्चित ही ये किसी बेहद संवेदनशील और ज़िंदगी के प्रति सकारात्मक रवैया रखने वाले इंसान की ही कृति हो सकती है...अनुराग की छवि को बदल कर रख देने वाला सिनेमा...बेमिसाल, अद्बुत।

एक गुंगे-बहरे इंसान से जीने की कला सीखी जा सकती है...जिंदगी ने उसके साथ इंसाफ नहीं किया है पर वो जिंदगी के साथ इंसाफ करना जानता है। ये गुंगा बेहद वाचाल है औऱ अत्यधिक तफरीबाज़ भी। एक आम युवा की तरह उजड्डीपन लिए हुए...उसी तरह लंपट, उद्दंड, लडंकीबाज़। ये बहरा वो चीजें सुनता है जो शायद कान वालों को सुनाई नहीं देती। यही वजह है कि ये बड़ी-बड़ी खुशियों के बजाय..छोटी-छोटी चीजों में खुशियां ढूंढता है...उसकी इस खूबसूरत फ़ितरत को बखूब बयां किया है स्वानंद किरकिरे ने-"इत्ती सी ख़ुशी, इत्ती सी हंसी..इत्ता सा टुकड़ा चांद का..."और ये चांद का इत्ता सा टुकड़ा, पूनम के चांद से ज्यादा रोशनी फैलाता है। इस अशक्त पात्र की खुशी को देखने की एक नज़र ये भी हो सकती है कि जिसके जीवन में इतनी बड़ी निशक्तता का दर्द है उसे अब कौन-सी दूसरी चीज़ परेशान कर सकती है।

इसके इसी खिलंदड़पन पर वो लड़की अपना दिल हार बैठती है जिसकी पहले से शादी तय हो चुकी है और उसके जीने का अंदाज बदल गया है। लेकिन जिस समाज में धन-दौलत, धर्म-जाति-वर्ग गत अंतरों के कारण प्यार की अस्वीकृति होती है वहां इतनी बड़ी शारीरिक विकलांगता के भेद कैसे स्वीकार किए जा सकते हैं। लड़की की मां नायक की ख़ामोशी को रिश्ते के ख़ामोश हो जाने की वजह बताती है और उसे एक खुशहाल जिंदगी चुनने की हिदायत देती है। जिस उदाहरण को प्रेम की विचारणा को त्यागने के लिए प्रस्तुत किया जाता है उससे प्रेमिका संतुष्ट भी हो जाती है और जिस खुशहाल ज़िंदगी को चुना जाता है वहां जुवां है, लफ़्ज हैं फिर भी सतत खामोशी है। यहीं लफ़्जों की खामोंशी और ख़ामोशियों के लफ़्ज समझ आते हैं। फ़िल्म के अंत में अपने इस फैसले पर पश्चाताप करते हुए प्रेमिका कहती है जिंदगी में हम खुशियां, संपन्नता, ऐशोआराम देखते है प्यार नहीं पर जहां प्यार होता है वहां खुशियां, संपन्नता, ऐशोआराम खुद ब खुद पीछे चले आते हैं।

कई छोटे-छोटे दृश्य बेमिसाल बन पड़े हैं..फ्रेम दर फ्रेम फ़िल्म गुदगुदाती हुई आगे बढ़ती है पर इस गुदगुदी में कुछ कतरा आंसू की बुंदे अनायास ही शामिल हो जाती है। फ़िल्म का एक छोटा सा नकारात्मक पक्ष फ़िल्म का संपादन है जो फ़िल्म की गति को धीमा करता है। रणवीर और प्रियंका का अभिनय उनके करियर के सर्वोत्तम शिखर पर है। रणवीर ने अपनी सितारा हैसियत का कद काफी उंचा कर लिया है..संवेदना से लबरेज दृश्यों और खिलंदड़ स्वरूप में वे कमाल करते हैं।अपने प्रेमप्रस्ताव को ठुकराए जाने के बाद बारिश में अपनी प्रियतमा के साथ वाले दृश्य में उनकी अदाकारी की संजीदगी देखी जा सकती है... प्रियंका का किरदार चुनौतीपूर्ण है क्योंकि एक मुख्यधारा की सितारा अभिनेत्रियां इस तरह के नॉन-ग्लैमरस् किरदार निभाने से कतराती है पर प्रियंका ने इस किरदार को बखूबी जिया है और खुद को शिखर की नायिका साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इंस्पेकटर के किरदार में सौरभ शुक्ला राहत देते हैं। नई अभिनेत्री इलियाना डिक्रुज़ खुबसूरत लगती हैं और अनुराग ने बड़ा सधा हुआ अभिनय उनसे करवाया है। फ़िल्म का संगीत बेहतरीन है और फिल्म देखते वक्त तो बेहद मधुरतम अहसास पैदा करता है। कुल मिलाकर फ़िल्म को एक क्लासिक दर्जा दिलाने वाले सारे तत्व मौजूद हैं।

खैर, अपनी तरह की एक अद्वितीय फ़िल्म है...गर न देखी हो तो ज़रूर देख कर आईये। भले बहुत कुछ फ़िल्म के बारे में कह दिया है पर ये ऐसी बरफी है जिसका स्वाद जिस ढंग से महसूस होता है उस ढंग से बता पाना मुश्किल है...पर यकीनन इस बरफी का स्वाद काफी बाद तक आपके ज़हन में रहेगा।

Wednesday, September 12, 2012

माय आइडियोलॉजी ऑल थ्रु द लाइफ, व्हाट वे यू कंन्विस....

अंग्रेजी का ये वाक्य मुझे फ़िल्म निर्देशक कबीर ख़ान के हाल ही में इंडिया टुडे को दिए एक इंटरव्यु के बाद याद आया। हालांकि मेरे अग्रज वरुण सर ने एक बार कबीर ख़ान की फ़िल्म 'एक था टाइगर' के रिलीज के वक्त इस सेंटेंस का ज़िक्र किया था लेकिन तब इसके भाव को मैं उतने अच्छे से नहीं समझ पाया था जितना कि उस इंटरव्यु को पढ़ने के बाद समझ पाया हुं...कबीर ख़ान का कहना था कि कोई इंसान चाहे कितना भी निष्पक्ष क्युं न हो किंतु सबके अपने-अपने पुर्वाग्रह होते हैं और वो अपनी अभिव्यक्ति में इस बात की कोशिश करता है कि सामने वाले को अपनी विचारप्रणाली से प्रभावित कर पाए। गोयाकि 'हम तो भाई जैसे हैं वैसे रहेंगे'।

 बहरहाल, इस वाक्य को यहां उद्धृत करने का मेरा उद्देश्य कुछ फ़िल्म निर्देशकों की विचारप्रणाली और उनकी फ़िल्मों की पड़ताल करना है। कबीर ख़ान की फ़िल्म 'एक था टाइगर' ब्लॉगबस्टर धमाल मचा चुकी है करोड़ो की बरसात से इसने यशराज कैंप और कबीर ख़ान के चेहरे पे खुशी ला दी है और कुछ खबरिया चैनल इसकी तुलना महान् 'थ्री इडियट्स' से करने की बचकाना हरकत कर रहे हैं जो कुछ ऐसा ही प्रतीत हो रहा है जैसे कि किसी वैश्या के मुजरे की तुलना शास्त्रीय नृत्यांगना के भरतनाट्यम से की जा रही हो। सफलता का पैमाना नोटों की बरसात को बनाया गया है। दरअसल सलमान की फ़िल्म सिर्फ सलमान की होती है वो किसी निर्देशक या प्रोडक्शन हाउस की फ़िल्म नहीं रह जाती। सलमान की लोकप्रियता का रसायन समझना दिमाग से बाहर की बात है। 

खैर, बात दुसरी करना है पाकिस्तान में 'एक था टाइगर' के प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई थी क्योंकि आईएसआई का जिस ढंग से ज़िक्र किया गया है वो पाकिस्तान को नागवार गुज़रा। ये एक हठवादी फैसला ज़रुर लग सकता है लेकिन भारत को भी इस बात पर आपत्ति होना चाहिए थी कि आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली आईएसआई की तुलना प्रतिष्ठित रॉ से करना कतई ठीक नहीं है। लेकिन अजब-गजब भारत में इस फ़िल्म ने कमाई के नए आयाम स्थापित किए। आईएसआई मुल्ला परस्ती के साये में आतंक और सिर्फ भारत के खिलाफ आतंक फैलाने में सहायक होती है। यह बात कई आतंकियों के पकड़े जाने के बाद अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म पर भी साबित हो चुकी है। किंतु रॉ के बारे में अब तक ये बात साबित नहीं हो पाई है। लेकिन एक आम दर्शक वर्ग जो रॉ और आईएसआई की इन कुंडलियों से बेखबर है वो इस बात को मोटे तौर पे मानने लगा है कि ये दोनों संगठन एक समान हैं।

ऐसा नहीं है कि कबीर ख़ान आईएसआई के समर्थक हैं लेकिन उन्हें ऐतराज रॉ से भी है ये ज़ाहिर होता है। यही वजह है कि उन्होंने एक प्रेम कहानी की चासनी में डुबोकर इतना भारी डोज़ आम जनता को दिया है और लोगों की धारणा में ये बात कुछ हद तक जम भी गई है। कबीर ख़ान एक पत्रकार और डॉक्युमेंट्री निर्देशक के तौर पर कई सालों तक काम कर चुके हैं कई देशों का भ्रमण किया है और 9/11 के अमेरिकी हमले के बाद का वैश्विक परिदृश्य उन्होंने देखा है तथा मुस्लिम देशों और आवाम के साथ होने वाले सौतेले व्यवहार के प्रति उनके दिल में आक्रोश है। जिस आक्रोश को वो भारतीय परिवेश में ढालकर मीठे गुलगुलों के साथ अपनी फ़िल्मों में प्रदर्शित करते हैं। उनकी पिछली फ़िल्म 'न्युयार्क' में भी हम इस बात की झलक देख सकते हैं जहां पूरी फ़िल्म में वे एक मुस्लिम अमेरिकी प्रवासी द्वारा हमले की योजना और उसके उद्देश्य को महिमामंडित करते रहते हैं तथा अंत में एक धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी विचारधारा के साथ फ़िल्म को ख़त्म करते हैं। लेकिन वे शायद ये भूल जाते हैं कि अमेरिका का ये कड़ा रवैया दूर से देखने पर भले तानाशाह और सामंतवादी नज़र आए लेकिन उनके इसी रवैये के कारण पिछले ग्यारह सालों में वहां आतंकी हमला, बमविस्फोट तो दूर एक दिवाली का संगोला भी कोई नहीं फोड़ पाया। कबीर की पहली फ़िल्म 'काबुल एक्सप्रेस' एक गुणवत्तापरक, बेहतरीन फ़िल्म थी लेकिन उस फ़िल्म में भी दो पत्रकारों के ज़रिए एक पाकिस्तानी और अफगानिस्तानी के बीच हुए संवाद ये जता रहे थे कि अमेरिकी नीतियां पूरी तरह ग़लत हैं और आतंक को पनाह दे रहे तालिबान पर की जा रही कार्यवाहियां ठीक नहीं हैं। हालांकि जिस प्लॉट पर फ़िल्म विकसित हो रही थी वो बहुत ही जायज़ और इंसानियत के नैतिक मुल्यों को लिए हुए था फिर भी कबीर के पुर्वाग्रहों की झलक हम उनमें देख सकते हैं और खास तौर पर तब वे पुर्वाग्रह और अधिक समझ आते हैं जब लोग 'एक था टाइगर' और 'न्युयार्क' देख चुके हों।

कोई भी निर्देशक या साहित्यकार जब अपनी पहली कृति प्रस्तुत करता है.. तो उसमें समाहित विषयवस्तु प्रथमबार में कुछ अनछुए पहलुओं को उजागर करने के कारण प्रशंसनीय मानी जाती है.. पर जब आप लगातार वही विचारधारा, उन्हीं पहलुओं को दिखाते हैं तो उनकी आलोचना होना स्वाभाविक हैं...क्योंकि 'वैसा है' ये तो माना जा सकता हैं लेकिन 'सबकुछ सिर्फ वैसा ही है' ये नहीं माना जा सकता। लेकिन निर्देशक अपने इन आग्रहों से बाहर नहीं आ पाते और जब कभी आना चाहते हैं तो वो सिनेमाई पटल पर वह कमाल नहीं दिखा पाते.. जो वो अपने आग्रहों का ट्रीटमेंट कर दिखाते हैं...क्योंकि अपनी विचारधारा से दूसरे को प्रभावित करने की खुशी काम में स्वाभाविकता ला देती है। 

सिर्फ कबीर ख़ान ही क्यों..हम कुछ दूसरे फ़िल्मकारों की फ़िल्मों को भी देख सकते हैं। महान् फिल्मकार बिमल रॉय ने अपनी फ़िल्मों में सदा उस प्रेम को प्रदर्शित किया जो परिस्थितियों को भलीभांति समझ कर, सहज, गैर-पारंपरिक ढंग से पैदा होता था उनकी फ़िल्मों में परिस्थितियां महत्वपूर्ण थी नाकि प्रेम या रिश्ते-नाते...जिसे शायद उन्होंने अपनी ज़िंदगी में अनुभव किया हो। राज-कपूर का अंदाज हमेशा दार्शनिकता लिए होता था...और वे अपनी फ़िल्मों के किरदारों को, प्रेम को, तनावों को, गरीबी को, यहां तक की संभोग को भी किसी दुसरी दुनिया में ले जाकर दार्शनिकता का चोगा पहना देते थे। कई असफल रिश्ते और प्रेम की नाकामयाब पारियां खेलने वाले गुरुदत्त कि हर फ़िल्म बस यही जताती थी कि 'ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है'। उनके दिल में एक टीस थी जिसे वो बखुबी परदे पर प्रस्तुत करते थे। फ़िल्म 'प्यासा' का लेखक हो या 'साहब बीबी और गुलाम' की बहुरानी दोनों एक कसक लिए जी रहे हैं। जिन्हें दुनिया में प्रेम की तलाश है लेकिन जो माहौल उनके ईर्दगिर्द है वहां वो प्रेम, अपनापन नहीं मिल रहा। उनकी इन फ़िल्मों में ही गुरुदत्त की आत्महत्या की वजह तलाशी जा सकती है। श्याम बेनेगल का कैमरा बेवफा पत्नी, वैश्याओं, अपराधी सरगनाओं को यथार्थ मानता है और इसे ही आज की दुनिया के समानांतर महसूस करता है। 'मंडी', 'मंथन', 'भुमिका' देख ये समझा जा सकता है। श्याम बेनेगल का हास्य भी कटु यथार्थ से पैदा होता है और वे 'वेलकम टु सज्जनपुर' और 'वेलडन अब्बा' का निर्माण करते हैं।

पुराने फ़िल्मकारों की बात छोड़ भी दे तो आज के फ़िल्मकारों ने भी अपनी कुछ लीक तय कर रखी है। सूरज बड़जात्या ने अपने घर में शायद हमेशा एक खुशनुमा माहौल देखा होगा इसलिए उन्हें हर तरफ हरा-हरा नज़र आता है। उनकी फ़िल्में रामायणनुमा आदर्श की स्थापना करती देखी जाती है पर वे महाभारतनुमा यथार्थ से कोसों दूर है उनके अपने पूर्वाग्रह है। तो रामगोपाल वर्मा 'सत्या' और 'कंपनी' में स्याह दुनिया दिखा कर कमाल करते हैं और जब कभी सीधी-सपाट प्रेमकहानी बनाने की कोशिश करते हैं तो फिजूल के डिब्बों को जन्म देते हैं। उन्हें अंडरवर्ल्ड के बाद भूत ही नज़र आते हैं सहज, शांत, आदर्श इंसान नहीं। तो ग्लैमर जगत की बखैया उधेड़ने में मधुर भंडारकर का कोई सानी नहीं...उन्होंने बड़े करीब से ग्लैमर वर्ल्ड की हकीकत जानी है तथा मधुर का नाम खुद एक बी ग्रेड फ़िल्म की नायिका के साथ विवादों में रह चुका है जिससे उन्हें इस चाकचिक्य की दुनिया के खासे अनुभव हैं और इसे लेकर अपनी ही एक विचारप्रणाली...यही वजह है कि कार्पोरेट, फैशन, फ़िल्म इंडस्ट्री से लेकर मीडिया जगत तक को वो नंगा कर चुके हैं। यश चोपड़ा और उनके नक्से कदम पर आगे बढ़े आदित्य चोपड़ा और करण जौहर का सिनेमा कश्मीर, स्विटजरलैंड, शिफॉन और करवाचौथ के नाम से मशहूर है ही। जिसकी मुख्य टारगेट ऑडियंस अप्रवासी भारतीय रहा करते हैं। दरअसल न तो सूरज बड़जात्या द्वारा प्रदर्शित हरियाली ही पूर्णतः सत्य है नाही भंडारकर और बेनेगल द्वारा वर्णित सामाजिक बंजरपन। दोनों बस एकदेश सामाजिक यथार्थ को बयां करते हैं।

खैर, इस वर्णन का कोई अंत नहीं है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वाले इस देश में सबको अपने पुर्वाग्रह परोसने का अधिकार है पर ये ध्यान रखना भी ज़रुरी है कि आपके पुर्वाग्रह किसी दूसरे इंसान को आहत न करें..कुछ आचार संहिताएं स्वयं से निर्धारित करने की ज़रुरत है। बात कबीर ख़ान से शुरु हुई थी और हमने इसमें कई निर्दशकों का पोस्टमार्टम कर डाला। वैसे हर निर्देशक की फ़िल्में देखने के मेरे अपने भी कुछ पुर्वाग्रह हैं और ये वर्णन भी उन पूर्वाग्रहों से अछूता नहीं रह सकता। वास्तव में तो हमारी नज़र ही इन पूर्वाग्रहों को सही या ग़लत ठहराती है। शेक्सपियर का एक वाक्य है जिससे अपनी बात ख़त्म करुंगा- "नथिंग इज गुड, नथिंग इस बैड...बट अवर थिंकिंग मेक इट सो"

Wednesday, August 29, 2012

क्या सच में बातों से ज़िंदगी नहीं चलती....???

हिन्दुस्तानी फ़िल्मों, साहित्य और कई बार घरों की चारदीवारी के अंदर भी अक्सर एक संवाद सुनने को मिलता है..."बातों से ज़िंदगी नहीं चलती"। ज़िंदगी अपने आप में ही एक बड़ा संगीन मुद्दा है और ये कैसे चलती है इस प्रश्न का जबाब खोजने में सैंकड़ो दर्शन, धर्म, ग्रंथ, पुराणों का जन्म हो गया...और इन तमाम चीजों से कई तरह के विवादों का ज़न्म हो गया, पर आज तक इस प्रश्न के एक सार्वभौमिक जबाब का जन्म नहीं हो पाया कि ज़िन्दगी कैसे चलती है? 

बहरहाल, भले इस बात का पता न चला हो कि ज़िन्दगी कैसे चलती है पर इस सार्वभौमिक बात को सब ही कहते मिल जाते हैं कि "बातों से ज़िंदगी नहीं चलती"। गर बातें नहीं है तो स्वाभाविक तौर पर ख़ामोशी होगी तो सवाल खड़ा होता है कि क्या ख़ामोशी से ज़िन्दगी चलती है ? जबाब मिलना मुश्किल है। कुछ और जमाने के प्रसिद्ध संवाद है- 'ज़िंदगी तो भैया पैसों से चलती है' या फिर 'प्यार से ज़िंदगी चलती है' या 'रिश्तों का नाम ज़िंदगी है'...सब बड़ा गड्डमगड्ड है। ज़िंदगी...ज़िंदगी...जिंदगी...कमबख़्त एक ऐसा शब्द है ये, जिस शब्द को शुरुआत में या मुख्य केन्द्र में लेकर हजारों शायरियां, गज़लें, कविताएं और फ़िल्मी गीतों का निर्माण हुआ है...इस ब्लॉग जगत पे भी कम से कम सौ-दो सौ ब्लॉग होंगें जिन्होंने अपने ब्लॉग में ज़िंदगी शब्द का इस्तेमाल किया होगा...हर कोई ज़िंदगी की पड़ताल कर रहा है और सब अपनी-अपनी राग आलाप रहे हैं कि ज़िंदगी ऐसे चलती है और ऐसे नहीं चलती है। अपने लेख को आगे बढ़ाने से पहले मैं आपको बता दूं कि मैं अपने इस लेख में ज़िंदगी के संबंध में कोई नई रिसर्च प्रस्तुत करने नहीं जा रहा...दरअसल आज इस शब्द पे एक खुन्नस सी आ रही थी बस इसलिए अपने दिल की भड़ास ज़िंदगी पर...माफ कीजिए ज़िंदगी शब्द पर निकाल रहा हूं।

खैर फिलहाल हमारा मुद्दा है कि क्या बातों से ज़िंदगी नहीं चलती...प्रसिद्ध संचार विशेषज्ञ डेविड बर्लो का कहना है कि मानव अपने जाग्रत समय में से सत्तर फीसदी समय का प्रयोग शाब्दिक संचार के साथ करता है। इसमें वो बोलना-सुनना, पढ़ना-लिखना आदि काम करता है। सीधा सा मतलब है वो अपना समय किसी न किसी तरह बातों के साथ बिताता है और ये सत्तर फीसदी समय तब गिना गया है जबकि इसमें सिर्फ शाब्दिक संचार को शामिल किया गया है गर अशाब्दिक संचार को भी शामिल करें तो ये गणना सौ फीसदी हो जाती है..और दिल में घुमड़ने वाली वे लाखों बचैनियां, कसमसाहटें, परेशानियां, जज़्बात और असंख्यात विचार जो किसी न किसी तरह बातों से ही जन्में है और खुद को शब्द देने के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं..उन्हें हम आखिर कैसे बातों से अलग कर सकते है। लेकिन इन बातों को थामें फिर भी जिंदगी चल रही है...और यही ज़िंदगी की सबसे अच्छी बात है कि वो चलती रहती है और शायद यही सबसे बुरी बात भी।

संसद में सैंकड़ो योजनाएं बन रही है, अन्ना हजारे, बाबा रामदेव से लेकर विपक्ष तक सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं..रैलियां निकल रही हैं...बीस चैनलों पर दो सौ बाबा इंसान को मुक्ति का पाठ पढ़ा रहे हैं...लाखों स्कूल-कॉलेज पढ़ा-पढ़ाकर समाज में साक्षर बेरोजगारों की फौज खड़ी कर रहे हैं...कई बड़े बिजनस प्रोजेक्ट तैयार हो रहे हैं...एक्टर-क्रिकेटर-स्मगलर सबकी कांफ्रेंस हो रही है..ऑफिस में, घर में, सड़क पर सब जगह मीटिंग्स का दौर चालु है...ग्लोबल वार्मिंग, पर्यावरण संरक्षण, से लेकर ग्लोबलाइजेशन जैसी बड़ी-बड़ी समस्याओं से निपटने के सम्मेलन आयोजित हो रहे हैं..शादी-व्याह, जन्म-मरण और दसियों त्यौहारों का सेलीब्रेशन या कोई न कोई उत्सव हो रहा है..फ़िल्मों, अखबारों, विज्ञापनों, रास्तों पर चस्पा पोस्टरों, किताबों से लेकर शहर के नुक्कड़ो, गांव की चौपालों में कुछ न कुछ प्रसारित, प्रचारित किया जा रहा है....अरे भैया ये सब क्या है ? बातें...बातें...और सिर्फ बातें। और इन सबके साथ कालीन के नीचे छुपी-थकी-हारी, वेवश, फ्रस्टयाई, इगनोर की हुई, बेचारी ज़िंदगी चल रही है।

एक घरेलु हिंसा के खिलाफ विज्ञापन टीवी पर आया करता था जिसके अंत में संदेश दिया जाता था-"चुप्पी तोड़ो"। एक अन्य सेलफोन कंपनी का विज्ञापन था जिसका स्लोगन था- "बात करने से ही बात बनती है" क्यों..आखिर क्यों चुप्पी या ख़ामोशी तोड़ने की बात की जा रही है जबकि बातों से कहां जिंदगी चलती है..?? अक्सर हम दुनिया में ऐसे लोगों को भी देखते हैं जो चुप है या हालतों, समाजों या रिवाजों ने उन्हें ख़ामोश बना दिया है ऐसे वो तमाम लोग हासिए पर फेंक दिए जाते हैं...नाम-शोहरत, वाहवाहियां उसे ही नसीब हो रही हैं जो बोलना जानता है...वही अपने हक, ज़माने से ले पाता है जिसे कहना आता है...सर्वत्र बोलने वाले ही तो अपना काम निकाल पा रहे हैं या कहें कि तथाकथित 'ढंग की ज़िंदगी' जी पा रहे हैं। फिर क्यों आखिर ये जुमला बोला जाता है कि "बातों से ज़िंदगी नहीं चलती"।

एक डॉक्टर की दवा से ज्यादा कई बार रोगी को उसके दिए दिलासे काम करते हैं..किसी का साथ निभाने का वादा दिल को कितना संबल देता है..भगवान के दर पर प्रार्थना कर दिल को कितना सुकुन मिलता है...प्यार का इज़हार-इकरार कितना रुमानी होता है...उत्सव के गीत, मुस्काते शब्द, मां की लोरियां, मजाक-मस्ती, दोस्तों के जोक्स ये सब क्या है....महज बातें ही तो है लेकिन ये बातें वो काम कर जाती है जो कि बड़ी-बड़ी चीजें नहीं कर पाती...फिर आखिर कैसे बातों से ज़िंदगी नहीं चलती???

अंत में उपकार फ़िल्म का इक गीत याद आ रहा है-"कोई किसी का नहीं ये झूठे, नाते हैं नातों का क्या..कसमें-वादे प्यार-वफा सब, बातें हैं बातों क्या " और तो आप पूरा गाना खुद सुन लीजिएगा, ये सारी 'बातों और ज़िंदगी' का झमेला अपने तो पल्ले नहीं पड़ता। भगवान और इस जमाने के बुद्धिजीवी जाने की ज़िंदगी कैसे चलती है..अपन को तो बस इत्ती-सी बात समझ आती है- ज़िंदगी, ज़िंदगी से चलती है..कभी हंसती है तो कभी रोती...और जो नहीं चलती, वो ज़िंदगी नहीं होती।

Friday, August 17, 2012

इक्कीसवी सदी की नारी और महिलासशक्तिकरण के छलावे

देश की स्वतंत्रता 65 वर्ष की हो चुकी है...काफी कुछ बदला पर कुछ चीजें जस की तस की है। उन्हीं में से एक है आज भी महिलाओं की स्थिति, महिलाओं के प्रति पुरुष की सोच। यकीनन आज के दौर में ये बात करना बड़ा अजीब लगता है जबकि आज जहां महिलाएं अंतरिक्ष में पहुंच रही हैं, ओलंपिक में मेडल जीत रही है, राजनीति और सिविल सर्विसेस में नाम कमा रही हैं।

ये सच हैं कि आज सतीप्रथा, अशिक्षा, बेमेल विवाह जैसे मामले सुनने में नहीं आते। महिलाओं के प्रेम संबंधों, अंतर्जातीय विवाह जैसी चीजों को समाज का कुछ समृद्ध और शिक्षित वर्ग दकियानूस नज़रों से नहीं देखता...लेकिन फ़िर भी पुरुष की तथाकथित मर्दाना सोच आज भी उसे ज़िस्म से ऊपर और यौन संतुष्टि से परे मानने को तैयार नहीं है। निश्चित तौर पर समाज में एक ऐसा भी पुरुष वर्ग है जो महिलाओं को आदर, सम्मान की नज़र से देखता है पर उस वर्ग की तादाद बहुत कम हैं। को-एड एजुकेशन से शिक्षित होती, मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती, आगे बढ़ती महिला पुरुष के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ती दिख रही है... लेकिन क्या वाकई में ऐसा है? क्या सच में आज महिला और पुरुष एक ज़मीन पर खड़े हैं? इन प्रश्नों पर थोड़ी गहराई में जाकर विचार करें तो हमें समझ आए कि महिलासशक्तिकरण शब्द कितना बड़ा छलावा है।

हर दिन बसों, ट्रेनों और अन्य पब्लिक ट्रांसपोर्ट के साधनों में अनचाही छूअन से गुज़रती महिला.. कॉलेज, ऑफिस और सड़कों पर महिला के बदन का पोस्टमार्टम करती पुरुष की निगाहें...तीखे, अनचाहे कानों में पड़ते शब्दवाण...अश्लील एसएमएस, कमेंट्स और जोक्स को सहती नारी जब रात में नींद लेने जाती होगी तो उस छुअन, उन निगाहों और शब्दों के सांपों को अपने बदन में लिपटता हुआ महसूस करती होगी...और ये वो सांप है जिसका ज़हर बिना डसे तड़प पैदा करता है।

किसी नौकरी में ऊंचे पद पर आसीन महिला के ऊपर भी उस ऑफिस के निचले दर्जे के कर्मचारी द्विअर्थी जोक्स मारने से परहेज़ नहीं करते..उन पुरुषों की निगाहें अपनी बॉस को भी पहले छद्म निगाहों से देखती है फिर उसे अपना बॉस मानती है। पुरुष मानसिकता आज भी महिला पर शासन जमाने को अपना हक़ समझती है...महिला से स्वयं का शासित होना उसे बर्दाश्त नहीं। 

आज अपने करियर में एक मुकाम बनाने की चाह रखने वाली महिला को किन मानसिक प्रताड़नाओं से गुज़रना पड़ता है ये शायद सिर्फ वही जानती है...और अगर अत्यधिक महत्वकांक्षी नारी हो तो उसे दलदल में उतरने से गुरेज़ नहीं। ऊंचे महकमों पे तैनात आला अफसरों की ज़िस्मानी भूख मिटाने का भोजन नारी बनती है...जहां उसे नाम, शोहरत, पैसा सब कुछ तो मिलता है पर नारीत्व ही समाप्त हो जाता है। कुछ महिलासशक्तिकरण के ठेकेदार नारी के इस कृत्य की वकालत करते पाए जाते हैं...उनके द्वारा स्त्री के कई लोगों से संबंध, विवाहेतर संबंध रखना आदि भी उदारवादी नज़रों से देखा जाता है, इसे वे महिला की प्रगतिवादी सोच कहते हैं। आश्चर्य होता है कि चारित्रिक पतन को कैसे महिलासशक्तिकरण का पर्याय माना जा सकता है और ख़ास तौर पर उस देश में जहां दुर्गा, सरस्वती और सीता की पूजा होती है। महिलासशक्तिकरण और महिलाविकास का राग आलापने वाले ये महानुभव..ऐसे विचार प्रगट कर अपनी हवस में आने वाले राह के रोड़ो को साफ करने की मंशा रखते हैं... और इनकी दिली तमन्ना यही होती है कि महिला की सोच इसी तरह तथाकथित प्रगतिवादी बने। गंदगी साफ करने के लिए कीचड़ में उतरना ज़रुरी होता है पर कीचड़ खाकर गंदगी साफ करना समझदारी नहीं है। महिला का सबसे बड़ा गहना उसका चरित्र है उस गहने को बेंचकर महिलासशक्तिकरण पाना, बहुत महंगा सौदा है।

अफसोस, कि भले सरकार और हमारी शिक्षा प्रणाली आज महिला को समाज की मुख्यधारा में लाने के जी-तोड़ जतन कर रही है पर पुरुष मानसिकता को बदलने में सब नाकाम है..और इस पुरुष वर्चस्व प्रधान समाज में, घर के बाहर की बात तो रहने ही दो...घर-परिवार के अंदर ही महिला इस पुरुष मानसिकता का शिकार है जहां उसे अपनी पसंद, अपनी इच्छाओं, जिजीविषाओं का गला हरक्षण घोंटना पड़ता है। शादी से पहले तक वह परिवार में बोझ है और घर की इज़्जत का जिम्मा भी बेचारी इस अबला पर है और शादी के बाद वो एक भोग्या है और यहां भी घर की इज़्जत की ठेकेदार ये अबला है...पर आश्चर्य, जिस पर घर की इज्जत टिकी है उसकी ही घर में इज्जत नहीं है। इसी पुरुष मानसिकता की देन है कई छुपे हुए गहन अपराध..यथा-भ्रुणहत्या, दहेज, महिलाउत्पीड़न, घरेलू हिंसा आदि।

हमारा सिनेमा, विज्ञापन, अखबार और तमाम मीडिया महिला को एक वस्तु की तरह ही पेश करते हैं..हर जगह नारी लुभाने की एक वस्तु है और मार्केटिंग का अहम् ज़रिया। पुरुष मानसिकता इस क़दर समाज में घुल गई है कि महिला भी आज इस मानसिकता के प्रति सकारात्मक सोच रखने लगी है...उसे खुद के इस्तेमाल होने से गुरेज़ नहीं...और अपने भौंडे प्रदर्शन को वो खुद की तरक्की समझ बैठी है। आज उसके मूंह पे भी पुरुषों की भांति गाली है, जेब में हथियार है, चाल में ऐंठन हैं और ये सारी चीजें उसके लिए महिलासशक्तिकरण का प्रतीक है...पर इन सारी क्रियाओं में नारी कहां है? पुरुष और नारी दोनों का अपना अलग स्वतंत्र व्यक्तित्व है, अपना ही संसार है और इन दोनों के स्वतंत्र व्यक्तित्व से ही संतुलन है। नारी खुद में पुरुष के गुण समाहित करके अगर सोचे कि वो सशक्त हो गई है तो ये एक भूल है...और वो भी उन गुणों को जो पुरुष में भी होना अच्छा नहीं है। नारी की अस्मिता उसकी कोमलता, शर्म, प्रेम, करुणा, ममता से जानी जाती है इन गुणों का ह्रास होना भला कैसा महिलासशक्तिकरण है। 

खैर, भले एकतरफ महिलासशक्तिकरण के लिए हमारा तंत्र अपनी पीठ थपथपाता रहे..पर आए दिन भंवरीदेवी, गीतिका जैसी महिलाओं के साथ घटी घटनाएं हमारे तंत्र को आइना दिखा देती है...और इन घटनाओं में शुमार हमारे कानून और राजनीति के ठेकेदारों को भी उनकी गिरेबान में झांकने पे मजबूर कर देती है। इन सब चीजों से एक बात समझ में आती है कि महिलासशक्तिकरण, कभी भी महिला की सोच बदलने से नहीं आ सकती...महिलासशक्तिकरण के लिए पुरुष की सोच बदलना ज़रुरी है। ये ठीक उसी तरह है कि अपराध का जड़ से सफाया, पुलिस के कदमों पर नहीं...अपराधीयों के कदमों पर निर्भर है।


Friday, July 13, 2012

ज़िन्दगी, युवामन और टाइमपास



विगत दिनों एक टेलीविज़न कार्यक्रम में युवा अपराध से जुड़ी कहानी देखने को मिली। कहानी के अंत में एक संवाद था..’आज का युवा जिंदगी को टाइमपास और टाइमपास को ज़िंदगी समझ रहा है’ और उस टाइमपास के विकल्प यदि उसके पास न हों तो उसे अवसाद घेर लेता है। बड़ी अजीब बात है कि शिक्षा में आई क्रांति ज़िंदगी के मायने तय नहीं कर पा रही है। भौतिकता का अंधानुसरण उसकी दिशा तय नहीं कर पा रहा है और जिस भी दिशा में आज युवा जा रहा है उसकी सर्वोत्कृष्ठता का राग आलापने में भी वो कोई कसर नहीं छोड़ रहा। लेकिन उसकी वो दिशा न तो उसे संतुष्टि प्रदान करने में सफल हो पा रही है नाहीं अवसाद कम कर पा रही है।

स्वामी विवेकानंद ने तकरीबन 150 वर्ष पहले हमारी शिक्षा व्यवस्था पे जो टिप्पणी की थी वो आज के शिक्षातंत्र पे ज्यादा चरितार्थ हो रही है। उनका कहना था- “आज का पढ़ा-लिखा युवा चार बातें सबसे पहले सीखता है...पहली कि उसका बाप दकियानूस है और उसका दादा दिवाना था जो उसकी सोच है वही उत्कृष्ठ है, दूसरी कि हमारे सारे धर्मग्रंथ झूठे और कोरी गप्प हांकने वाले है, तीसरी कि अपने शौक और इच्छाएं ज़रुरी है और उनको पूरा करना ही सुख तथा चौथी कि विकास सिर्फ पश्चिम में ही है और हमारी उन्नति एवं शक्ति का विस्तार भी पाश्चात्य विचारप्रणाली से हो सकता है।“ इच्छाओं को पूरा करने की ये दौड़ टाइमपास को ज़रुरी बना देती है और ज़िंदगी का मतलब टाइमपास हो जाता है। दरअसल टाइमपास अपने अंदर के भगौड़ेपन का प्रतीक है हम खुद के साथ वक्त नहीं बिता पाते इसलिए किसी साधन का होना हमारे लिए अनिवार्य हो जाता है। विराम का वक्त बरदाश्त नहीं होता, लेकिन हम भूल जाते हैं कि विराम का वक्त विचार का वक्त भी हो सकता है।

तमाम भौतिक चाकचिक्य का बाज़ार हमारे उस आंतरिक भगौड़ेपन को दूर करने के लिए है। उन्नति का पैमाना इन्हीं संसाधनों के विकास से तय किया जाता है जो हमारा टाइमपास कर रहे है। टेलीवज़न पे प्रसारित सैंकड़ो चैनल, हाई-स्पीड इंटरनेट, सोशल नेटवर्किंग साइट्स, मोबाइल फोन, मॉल कल्चर, मल्टीप्लेक्स, कॉम्पलेक्स आदि समस्त चीजें संस्कृति का मैक्डोनाल्डाइजेशन की गवाही दे रही हैं। लेकिन संसाधनों का निरंतर होता ये विकास, तब भी संतुष्टि प्रदान करने में समर्थ नहीं हो पा रहा अपितु हमारी इच्छाओं की आग में घी डालने का ही काम कर रहा है। इस असंतुष्टि का ही नतीजा है कि आज आत्महत्या का प्रतिशत निरंतर बढ़ रहा है और इन आत्महत्या करने वालों की तादाद में 15 से 35 वर्ष के युवा ज्यादा है। हम सोच सकते हैं कि पहले भले हमें इतने संसाधन महरूम नहीं थे, ज़िंदगी अभावों में बसर होती थी, लेकिन लोगों में आत्मबल हुआ करता था जिसके दम पे वो अभावों से लड़ते हुए भी कभी ज़िंदगी का साथ नहीं छोड़ते थे। उनके पास जिजीविषा हुआ करती थी किंतु आज का परिदृष्य सामने है।

स्वामी दयानंद सरस्वती ने संदेश दिया था कि “वेदों की ओर लौटो”...पर आज के संदर्भ में यदि आप किसी नौजवान को ये उक्ति सुनाने जाएंगे तो यकीनन आप घोर हंसी के पात्र बनेंगें। आज वेदों, पुराणों की बात तो छोड़ ही दीजिए अच्छे साहित्य की तरफ भी रुझान नज़र नहीं आता। जिस तथाकथित साहित्य को पढ़ा जा रहा है वो भी इच्छाओं को हवा देने का काम करता है। जिनकी अहम विषयवस्तु सेक्स हुआ करती है और जिसे प्रेम के नाम पर परोसा जाता है। आधुनिक साहित्य, समाज और सिनेमा नैतिकता और मूल्यों की स्थापना में नाकाम सिद्ध हो रहा है।

ज़िंदगी की सार्थकता गर्लफ्रेंड, पार्टी, पैसा और सेक्स से मानी जाती है। अब इस जीवनशैली में आप कहां सद्विचारों को स्थापित कर सकते हैं और यदि स्थापित करने की कोशिश की गई तो ज़माने में आप एक गई-गुज़री सोच वाले रुढ़िवादी इंसान करार दिए जाएंगें। प्राचीनतम चंद अंधपरंपराओं से लड़ने की गुहार युवा से की गई थी किंतु उसने प्राचीनतम संपूर्ण ज्ञान को ही तिलांजलि दे दी। संतुलित वैज्ञानिक विचारप्रणाली अपनाने की मांग युवा से की गई थी किंतु उसने प्रत्यक्षवाद की आड़ में संपूर्ण आत्मिक भावनओं का ही दमन कर दिया।

बहरहाल, कहाँ तक कथन करुं...पहले भी अपने दो लेख “जोश-जुनून-जज़्बात और जवानी” तथा “उद्दंड जवानी, दहकते शोले और बाढ़ का उफनता पानी” में काफी कुछ कह चुका हूं। इस संबंध में कुछ कहता हूं तो अपने ही मित्रों और संबंधियों की नज़रों में दकियानूस साबित हो जाता हूं। दिल की भड़ास पन्नों पर और ब्लॉग पे निकालकर संतुष्ट हो जाता हूं अन्यथा ज़माना मुझे ये सब कहने की इज़ाजत और मोहलत नहीं देता........