Saturday, October 11, 2014

स्वार्थी वृत्तियो पर हो मलाल, तभी संभव है जीवन का सत्यार्थ

युद्ध की विभीषिका, प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़, संसाधनों को हथियाने के लिये लालायित बुर्जुआ वर्ग के अधिपति, विस्तारवाद की राजनीति औऱ ऐसे माहौल के बीच ही ख़बर आती है एक भारतीय और एक पाकिस्तानी के नोबल शांति पुरुस्कार मिलने की। सीमा पे युद्ध के आशंकित बादलों को कवर करने के लिये उतावला बैठा मीडिया अचानक, उन व्यक्तित्वों की तह में उतरने लगता है जिसके चलते इन शख्सियतों ने इस प्रतिष्ठित अंंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कार को हासिल किया। शांति, हमेशा युद्ध से खूबसूरत, दैदीप्यमान और वजनदार होती है।

मलाला युसुफजई और कैलाश सत्यार्थी। अपने पीछे संघर्ष का एक विस्तृत इतिहास छोड़ा है इन्होंने, तब जाकर इस चमकदार उपलब्धि को हासिल किया है और निश्चित ही ये प्रयत्न जब शुरु किये गये थे तो इन प्रयत्नों का उद्देश्य कतई ये नहीं था कि इन्हें वैश्विक स्तर पर सम्मानित किया जायेगा। यदि ये पुरुस्कार न भी मिला होता तब भी ये संघर्ष इतना ही महान होता जितना आज माना जा रहा है। भले ही इसे इतनी व्यापक पहचान न मिली होती। इस पुरुस्कार के परे भी कई ऐसे लोग हैं जिन्हें कभी कोई सम्मान नहीं मिला लेकिन फिर भी वे अपने प्रयासों से एक सुंदर जहाँ रचने का प्रयत्न कर रहे हैं। सफलता या सम्मान मिल जाने के बाद हमें लोगों का संघर्ष नजर आने लगता है अन्यथा संघर्ष तो कई जगह व्याप्त है। उपलब्धियां सिर्फ उत्कृष्ट प्रयत्नों पर मोहर लगा देती हैं पर ये मोहर न भी हो तब भी उन प्रयासों की सत्यता से इंकार नहीं किया जा सकता।

मेरे इस लेख का उद्देश्य इस पुरुस्कार और पुरुस्कार पाने वालों पर कुछ कहना नहीं है क्योंकि ये बात मीडिया बखूब कर रहा है और पुरुस्कार को सही-गलत ठहराने वाले कई समीक्षात्मक दृष्टिकोण इस प्रचारतंत्र में नजर आ रहे हैं। इन व्यक्तित्वो का सम्मान होना चाहिये था या नहीं, ये अलग विषय है। नोबेल महानता का पैमाना तय करे ये सही नहीं है क्योंकि कई व्यक्तित्व अपने कार्यों से खुद इतने महान हो जाते हैं कि नोबेल जैसे पुरुस्कार ही उनके आगे बौने नजर आते हैं। क्या गाँधी, विवेकानंद की महानता का पैमाना कोई नोबेल तय कर सकता है? 

यहाँ बात है जीवन के सत्यार्थ की, जीवन के असल प्रयोजन की। मौजूदा दौर, जीवन की अगाध व्यापकता को संकुचित कर चंद छद्म स्वार्थों तक सीमित करने वाला है। मैं, मेरा घर, मेरा परिवार, मेरी जाति, कुल, वंश या देश...ऐसे न जाने कितने 'मैं, मेरे और मुझ' के दायरे हमने बना रखे हैं इस 'मेरेपन' या अंधी आत्ममुग्धता में क्या किसी को वसुधैव कुटुंबकम् की संकल्पना समझ आ सकती है। बेशक, हमारे अपने कुछ कर्तव्य उन लोगों के प्रति होते हैं जो हमसे जुड़े हैं लेकिन अपने उस दायरे के भौतिकवादी विस्तार के कारण हम अनायास ही दूसरों के अधिकार क्षेत्र में प्रविष्ट हो जाते हैं और इस स्वार्थी वृत्ति के परिणाम स्वरूप पैदा होती है अनंत तृष्णा, शोषण, भ्रष्टाचार, अन्याय और अंत में युद्ध। ये जीवन का सत्यार्थ कतई नहीं है।

एक उक्ति है यदि 'हासिल करो तो बांटो, और कुछ सीखो तो सिखाओ'। तमाम प्राप्तियों और हुनर का सर्वोत्तम प्रयोग बस यही है कि जिसमें देने का भाव निहित है। त्याग, करुणा, परोपकारिता और अंत में इन्हीं गुणों से बढ़ते हुए वीतरागता, निर्मोहीपना या स्थितप्रज्ञता तक पहुंचना, यही है जीवन का सत्यार्थ। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की विचारणा 'परस्परोपग्रहो जीवानाम्' अर्थात् परस्पर एक दूसरे का उपकार, इसी संकल्पना से साकार हो सकती है। जीवन के इस सत्यार्थ के पहले ज़रुरी है कि हमें अपनी तमाम स्वार्थी वृत्तियों का मलाल हो।

लेकिन आज की नास्तिक वैज्ञानिकता ने तमाम चरित्रनिर्माण के स्मारकों को पोंगापंथी कहकर, हमें उससे विमुख कर दिया है। जिसके फलस्वरूप जन्मी मैक्डोनाल्ड संस्कृति हमें 'विश करो-डिश करो' की शिक्षा दे रही है। इस दौर में संतुष्टि का भाव कहा खोजा जा सकता है जहाँ अगाध तृष्णा को बढ़ाने के जतन किये जा रहे हैं, और बेतहाशा इच्छाएं अपने फन फैला रही हैं। इन अंधी महत्वाकांक्षाओं से ही जन्मी है तमाम भौतिकवादिता और इस भौतिकवादिता के आभामंडल में ग्रस्त हो हमारा समाज, शिक्षाप्रणाली, साहित्य और सिनेमा भी महज संवेदनहीन मनुष्य का निर्माण कर रहे हैं। जहाँ सिर्फ हड़पने का भाव है देने का नहीं। जीवन का सत्यार्थ भारी बैंक बेलेंस, आलीशान बंगला, गाड़ी और झूठा रुतबा बनकर रह गया है। इन सब चीज़ों को पाकर हमें लगता है कि हमारा विस्तार हो रहा है पर असल में यह मानवीयता के सिकुड़ने का प्रतीक है।

जीवन का सत्यार्थ, अपने व्यवहार से प्राणीमात्र को सुकून देने में हैं...विषमताओं को दूर कर एक वर्गविहीन आदर्श समाज बनाने में हैै..खुद को पर्यावरणोन्मुखी बनाने में है...'मैं' का भाव ख़त्म कर 'हम' का भाव जगाने में है और इस हम में संपूर्ण बृह्माण्ड को ही समेट लेने में हैं। जीवन का सत्यार्थ नोबेल या इस जैसे दूसरे पुरुस्कारों को पा लेने में नहीं, जीवन का सत्यार्थ समस्त आधि-व्याधि और उपाधियों से परे खुद को समझ लेने में है। वास्तव में देखा जाये तो आज सत्यार्थ को नोबेल की जरूरत नहीं, नोबेल को खुद सत्यार्थ प्राप्ति के जतन करना चाहिये...................

Saturday, September 20, 2014

मेरी प्रथम पच्चीसी : नौवी किस्त

(पिछली किस्त पढ़ने के लिये क्लिक करें- पहली किस्त, दूसरी किस्ततीसरी किस्तचौथी किस्त, पांचवी किस्तछठवी किस्तसातवी किस्तआठवी किस्त)

(ज़िंदगी के घरोंदे में मौजूदा दौर के घुटन भरे कमरों में राहत की हवा को महसूस करने के लिये, रूह की दीवार में लगे यादों के झरोखों को खोल अपने अतीत के नज़ारों से ठंडक को पाने के जतन कर रहा हूं और बस इसलिये पच्चीसी स्वांतसुखाय और स्वप्रेरणार्थ ही मुख्यता से लिखी जा रही है। लेकिन उन लोगो के लिये भी इसका महत्व कुछ कम नहीं है जिनके प्रेम की छाया में मैं कुछ सुकुन पा लेता हूँ और जिनके अतीत की झांकियां मेरे गुजश्ता दौर से मेल खाती हैं, जो इस पच्चीसी में खुद को पाते हैं। औपचारिकता को किनारे रख पच्चीसी के घटनाक्रम को आगे बढ़ाता हूँ...अन्यथा बातें तो यूंही चलती रहेंगी।)

गतांक से आगे-

ज़िंदगी जवानी की दहलीज पे दस्तक देेने के लिये खासी उत्सुक हो रही थी...पर अब तक जवां नहीं हुई थी। लेकिन यकीन मानिये सबसे ज्यादा नटखट अहसास जवां होने के तनिक पहले ही दिल में पैदा होते हैं। अंग्रेजी और संस्कृत साहित्य से बैचलर डिग्री कर रहा था तो शेक्सपियर, मारलो, कीट्स, शैली और वर्ड्सवर्थ जैसे कवियों का रोमांटिज्म सिर चढ़ रहा था तो दूसरी तरफ कालिदास, माघ और भास जैसे कवियों का साहित्य मन को और मनचला बना रहा था। प्रेम, दरअसल उम्र के पड़ाव की एक बेहद नैसर्गिक क्रिया होती है जब सहज पैदा हुए जज़्बात अपना आसरा जहाँ-तहाँ तलाशते हैं। प्रेम, का कोई निश्चित रूप नहीं होता और ये अहसास जीवन में पूर्व अनूभूत भी नहीं होते तो अक्सर इन अहसासों की तलाश कई मर्तबा हमको भटका देती है और वर्तमान की नवसंस्कृति प्रायः प्रेम की खोज शारीरिक आकर्षण या संभोग में तलाशती नज़र आ रही है क्योंकि वर्तमान का साहित्य और सिनेमा दोनों ही मजबूरन उस तरफ हमें धकेल रहा है। हालांकि दोष साहित्य या सिनेमा का नहीं है क्योंकि सांस्कृतिक बदलाव को जो रूप हमें इन पर देखने को मिल रहा है वो समाज का ही सच है पर diffusion of innovation के सिद्धांत को समझते हुए बात करें तो यह ज़रूर कहा जा सकता है कि प्रेम के कुत्सित रूप को व्यापक बनाने में ये निमित्त ज़रूर हैं।

बहरहाल, मैं इक्कीसवी शताब्दी में भी कालिदास और मिल्टन, मारलो, धर्मवीर भारती जैसे साहित्यकारों को पड़ रहा था। इसलिये मुझमें विकसित हुआ रोमांटिज्म चेतन भगत, रविंद्र सिंह जैसे लेखकों के साहित्य में उद्धृत रोमांटिज्म से काफी अलग था और बस इसलिये दिल में प्रेम को पाने की भावनात्मक तड़प तो थी पर उसमें वासनात्मक पक्ष काफी गौढ़ था। नहीं था ऐसा मैं नहीं कह सकता क्योंकि प्रेम का वृक्ष मन-मस्तिष्क और देह के सामुहिक उपक्रमों के उपरांत ही पल्लवित होता है। मन इसमें भावनात्मकता का संचार करता है, मस्तिष्क इसे बौद्धिक बनाता है और देह के कारण ये होता है वासनात्मक। हार्मोनल चेंजेस तो थे पर भावनात्मक पक्ष मजबूत होने के कारण कभी अपनी मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं किया और इन सब वजहों से ही कई मर्तबा अपने दोस्तों के बीच मैं गये-गुजरे सिद्धांतों को मानने वाला दकियानूस इंसान भी कहलाया गया।

मन ने विचलित होने की पुरजोर कोशिश की। जैसा मैंने ऊपर बताया न कि इस उम्र के जज़्बात अपना आसरा तलाशते हैं। कालिदास की एक उक्ति है 'कामी सुतां पश्यति' अर्थात् कामी व्यक्ति हर तरफ अपने अनुकूल चीजें तलाशता है। तो अब सिनेमा और संगीत की ओर भी बेइंतहा दिल ललचा उठा और खालिश प्रेमकथाओं में डुबी हुई फ़िल्में दिल को रुचने लगी, ऐसा प्रायः हर युवा के साथ होता है। लेकिन अभी तक मैंने अठारहवे बसंत को पार नहीं किया था इसलिये जो इन फिल्मों और साहित्य से सीखकर मन की व्याख्या होती थी वो बहुत ही सतही और भटकाने वाली होती थी। वास्तव में कच्ची उम्र और अनुभवहीनता के कारण युवाओं में जो बगावती तेवर पैदा होते हैं उसमें बहुत बड़ा हाथ फ़िल्मों और हमउम्र साथियों का ही होता है क्योंकि नासमझी की ये व्याख्याएं हमें कई बार इतना नीचे गिरा देती हैं कि जीवन में उनसे उबर पाना ही बहुत मुश्किल हो जाता है। यही कारण है कि ऐसे में माँ-बाप का सख़्त संरक्षण और अनुभव बहुत आवश्यक होता है। लेकिन इस कठिनतम दौर में मैं अपने माँ-बाप से कोसों दूर बैठा था भटकने की संभावनाएं प्रबल थी। लेकिन मैं शुक्रगुजार हूँ उस दौर के अपने दोस्तों का जिनकी संगति और मार्गदर्शन ने मुझे अपनी हदों में बांधे रखा।

मेरे साथ एक चीज़ हमेशा रही कि बेहद कम उम्र में शिक्षा अर्जित करते हुए मैं आगे बढ़ रहा था इसलिये जो सहपाठी मुझे मिलते थे वे उम्र में काफी बड़े और अनुभवी होते थे और एक बहुत बड़ा कारण यह भी रहा कि उनकी संगति के कारण मुझमें हमेशा उम्र से पहले ही कई चीज़ों को लेकर परिपक्वता आती रही। हालांकि बचकानी प्रवृत्तियां भी कम नहीं थी पर बौद्धिक तौर पर समझ ज़रूर कुछ जल्दी विकसित हो ही रही थी। यहाँ मैं अपने कुछ ऐसे ही दोस्तों को याद ज़रूर करना चाहुंगा। जिनमें सबसे खास थे अमित, रोहन, विक्रांतजी, सन्मति, विवेक, निपुण, जीतेन्द्र, अभय अंकित। हालांकि ये लिस्ट बहुत लंबी हो सकती है क्योंकि मेरी समझ और सीख के कारण कई मित्र हैं पर जिनके नाम यहाँ मैंने लिये उन्होंने मेरी नादानियों और नासमझियों को सबसे ज्यादा झेला। मेरे अत्यंत उजड्ड और अहंकारी स्वभाव को सहा और मेरे लाख बुरे बर्ताव के बावजूद ये मेरे साथ जुड़े रहे। लेकिन मेरी उन आदतों को सहते हुए मुझे समझाते रहे और दिल से मेरी तरक्की के सहभागी बने रहे।

चुंकि मेरी हॉस्टल लाइफ अब अपने अंतिम पड़ाव में चल रही थी इसलिये सभी से याराना कुछ ज्यादा ही हो गया था क्योंकि हम जानते थे कि अब अलग हुए तो फिर यादों में ही मुलाकात होगी वरना ज़िंदगी की व्यस्तताओं में दोस्तों की प्राथमिकता रह ही कहाँ जाती है। दोस्ती बस एक कोरी रस्म ही बनकर रह जाती है और यही सोचते हुए हम हर एक दिन, हर एक पल को खुल कर जीना चाहते थे और हररोज़ कुछ न कुछ तिकड़मी और अनोखा करने की जुगत में लगे रहते। स्नातक के अंतिम वर्ष के छात्र होने के कारण हम सबसे सीनियर छात्र हुआ करते थे और विभिन्न सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं अन्य दूसरी गतिविधियों को करवाने का जिम्मा हम पर ही हुआ करता था। उस वर्ष मुझे औऱ मेरे मित्र रोहन को इन सब आयोजनों का प्रमुख नियुक्त किया गया था तो अधिकार और जिम्मेदारी का प्रथम अहसास तभी महसूस हुआ था। इन अधिकारों और जिम्मेदारियों के आने की वजह से रुतबा भी बड़ा हुआ लगता था और हम अपने ही अहंकार में फूले घूमते थे।

जो भी था, सब बड़ा मजेदार था और अब यादों के इन झरोखों से कूदकर वापस उन्ही दिनों को पा लेने की आरजू दिल में पैदा होती है पर हमेशा निर्मम यथार्थ हमें वर्तमान में खींच लाता है। वो नादानियां, वो वेबकूफियां भले कितनी ही नासमझ क्युं न हों पर उनका यादों में किया स्मरण बड़ा सुकून देता है और आज हम भले ही रुतबा, पैसा और अथाह प्रतिष्ठा पालें पर वो गुजरे दौर की ठलुआई सा मजा कभी नहींं दे सकती। हम आज तरक्की के जेट पर सवार हो भले देश-दुनिया की सैर कर आयें पर ये सब उस दौर की उस आवारगी के आनंद को छू भी नहीं सकती, जब हम दोस्तों के साथ नंगे पैर सड़कों पर टहला करते थे और सिटी बस में खड़े-खड़े धक्के खाया करते थे। वो दौर एक बार फिर अच्छे से जीने का जी करता है क्योंकि उस दौर को अक्सर हम बड़े और कामयाब बनने की चाह में यूं ही ज़ाया कर देते हैं। सच, चीज़ों की कीमत उनके दूर चले जाने के बाद ही समझ आती है............................

ज़ारी................

Friday, September 12, 2014

इश्क़ तुम्हें हो जायेगा........


'इश्क़ तुम्हें हो जायेगा' ये महज मेरे पोस्ट का टाइटल नहीं बल्कि ये अनुलता राज नायर जी की हाल ही में प्रकाशित पुस्तक का शीर्षक भी है। दरअसल, गर ये किताब न होती तो इस पोस्ट का जन्म ही नहीं होता। इसलिये इस पोस्ट का जन्म उन जज़्बातों के चलते हुआ है जो अनुजी की इस किताब को पढ़ने के बाद पैदा हुए हैं। आगे कुछ लिखने से पहले मैं बता देना चाहता हूँ कि इस पोस्ट को पुस्तक की समीक्षा न समझा जाये...क्युंकि साहित्यिक कसौटी के परे एक काव्यसंग्रह का जो मूल काम होता है वो ये पुस्तक बखूब करती है। जी हाँ जज़्बातों को जिस ढ़ंग से उद्वेलित होना चाहिये वो इस पुस्तक के हर इक वरक् को पलटते हुए महसूस किये जा सकते हैं और हर नज़्म रूह की तह में उतरती हुई खुद से इश्क़ करने को मजबूर करती है। 

यूं तो अनुजी से इस ब्लॉग के सायबर संजाल के चलते पहले से ही आत्मीय रिश्ता रहा है और उनकी लेखनी का मैं खासा कायल रहा हूँ औऱ उनकी लिखी रचनाओं की कई पंक्तियों को चुराकर मैंने अपने मस्तिष्क की डायरी मे उकेर रखी हैं और कुछ रचनाएं अंतस की बरनी में रखी-रखी आचार-मुरब्बे में कन्वर्ट हो चुकी है जिनका मूल तो याद नहीं पर उनके अर्थ पूरी संजीदगी से अपना रस देते हैं। मसलन ऐसी ही इक रचना है-

स्नेह की मृगतृष्णा
कभी मिटती नहीं
रिश्तों का मायाजाल
कभी सुलझता नहीं
तो मत रखो कोई रिश्ता मुझसे
मत बुलाओ मुझे किसी नाम से
प्रेम का होना ही काफी नहीं है क्या?

इस रचना का ज़िक्र यूं तो पुस्तक में नहीं है पर मेरी रुहानी अलमारी में बाकायदा कैद है। मुझे नहीं पता कि अनुजी ने इन जज़्बातों को खुद कितना महसूस किया है पर उनके लिखे हर एक हर्फ उस हर इंसान के अहसासों को बयां करते हैं जिसने एक बार भी गर सच्चा इश्क़ किया हो। तो इस तरह ये कविता भले निकली अनुजी की कलम से हों पर ये उनकी तरफ से हर आशिक़ के जज़्बातों का प्रतिनिधित्व मात्र हैं। अनुजी की पुस्तक के पेज नं 93 पे लिखी प्रेम कविता का भाव कुछ ऐसा ही हैं जहाँ वे कहती हैं-


निरर्थक है लिखा जाना
प्रेम कविताओं का
कि जो लिखते हैं
उन्होंने भोगा नहीं होता प्रेम
और जो भोगते हैं
उन्हें व्यर्थ लगता है
उसे यूं 
व्यक्त करना....

अनुजी की रचनाओं में जितना कल्पनाओं का आसमान समाया हुआ है उतना ही इनमें यथार्थ का धरातल भी है और वे प्रेम के उन्माद, प्रेम के विरह, प्रेम का पागलपन, मिलन और जुदाई सब कुछ बड़ी संजीदगी से और सौंदर्य के साथ बयां करती हैं। एक बानगी देखिये-

प्रेम का एक पल
छिपा लेता है अपने पीछे
दर्द के कई-कई बरस
कुछ लम्हों की उम्र ज्यादा होती है, बरसों से।

और कुछ इसी तरह...

यदि प्रेम एक संख्या होती
तो निश्चित ही 
विषम संख्या होगी
इसे बांटा नहीं जा सकता कभी
दो बराबर हिस्सों में।

अनुजी अपने इस काव्य संग्रह की शुरुआत में कहती हैं कि 'पढ़ना मुझे तन्हाईयों में कि इश्क़ तुम्हें हो जायेगा' पर इस काव्य संग्रह के पढ़ते वक़्त मैं बड़े असमंजस में रहा कि आखिर तन्हाई कहाँ से लाऊं क्योंकि इन कविताओं से उपजे जज़्बातों ने इस कदर कोलाहल मचाया कि सारी तन्हाई मानो कहीं फना हो गई। लेकिन फिर भी ये कविताएं खुद से इश्क़ करने पे मजबूर कर देती हैं। जो इंसान अभी इश्क़ में है उसे तो इन रचनाओं में अपना आज नज़र आयेगा ही पर जो कभी इश्क़ में था वो भी अपने अतीत को इन रचनाओं के सहारे जियेगा और जो न अभी इश्क़  में है और न ही कभी इश्क़ में था वो भी ऐसे इश्क़ को पाने के लिये उत्कंठित हो जायेगा और यदि उत्कंठित नहीं हुआ तो इन रचनाओं से ही इश्क़ फरमा बैठेगा। इन्हीं सब वजहों से ये काव्यसंग्रह अपने नाम को सार्थक करता है। और प्रेम के अर्थ को कुछ इस तरह तलाशती है-

मैं प्रेम में हूं

इसका सीधा अर्थ है
मैं नहीं हूं
कहीं और...

प्रेम पंख देता है
प्रेमी पतंग हो जाते हैंं
और जब ये नहीं रहता
तब लड़ जाते हैं पेंच
कट जाती हैं पतंगे
आपस में ही उलझकर

मैं प्रेम में हूं
इसके कई अर्थ हैं
और सभी निरर्थक।

कविताएं तो बहुत है और समझ नहीं आ रहा कि किस किसका ज़िक्र करुं...पर बेहतर होगा कि मेरी इस पोस्ट से कुछ भी आकलन करने के बजाय आप खुद इसका जायका लें। यकीन मानिये यदि आपकी रूह की जमीन पर थोड़ी सी भी नमी है तो ये आपके अंदर जज़्बातों के कई कई कमल खिलाने का माद्दा रखती है औऱ कौमार्य की दहलीज पे पहुंचे युवाओं के लिये तो ये तकिये के नीचे रखकर सोने वाली पुस्तक है। इन रचनाओं की चासनी में जब अपने जज़्बातों को भीगा हुआ महसूस करेंगे तो रस, निश्चित ही तनिक बड़ जायेगा और इश्क़ तुम्हें हो जायेगा।

ऐसा नहीं कि
जन्म नहीं लेती
इच्छाएं अब मन में
बस उन्हें मार डालना सीख लिया है मैंने
शुक्रिया, ऐ मोहब्बत।

और एक अंतिम रचना याद कर विराम लेता हूँ...बाकी आप खुद इस पुस्तक को पढ़े तो अच्छा होगा और न ही अनुजी का कुछ परिचय देना चाहुँगा। वे मेरे शहर भोपाल की हैं इस कारण आत्मीयता कुछ विशेष है शेष परिचय के लिये उनकी रचनाएं ही काफी हैं। पोस्ट के आखिर में पुस्तक क्रय करने हेतु लिंक प्रोवाइड की गई है। पोस्ट की शुरुआत में भी टाइटल के साथ लिंक संलग्न है-

मैंने बोया था उस रोज
कुछ
बहुत गहरे, मिट्टी में
तुम्हारे प्रेम का बीज समझकर
और सींचा था अपने प्रेम से
जतन से पाला था 
देखो
उग आई है एक नागफनी
कहो, तुम्हें कुछ कहना है?

(पुस्तक क्रय हेतु लिंक- इश्क़ तुम्हें हो जायेगा)

Thursday, August 14, 2014

हम कितने आज़ाद....?

वाक़या कुछ यूं है कि ऑफिस से लौटते वक्त एक आठ-दस साल का बच्चा हाथों में तिरंगा लिये उसे बेंचने मेरे पास आकर रुका। बमुश्किल तीस-पैंतीस सेकेंड के लिये ट्रेफिक सिग्नल पर उस वक्त खड़े हुए मैं बड़े असमंजस में था कि झंडा लिया जाये या नहीं...पर मेरी कार के फ्रंट में चिपकाने के लिये उस तिरंगे की कीमत जो उस बच्चे ने मुझे तकरीबन बीस रुपये बताई थी काफी ज्यादा लगी और मैं उसका पंद्रह रुपये मूल्य लगाकर आगे बढ़ गया। फिर सोचा कि यार पांच रुपये की ही तो बात थी...उस तिरंगे को अपनी गाड़ी पे लगाकर मैं अपने देशभक्त होने का प्रमाण तो दे ही सकता था..और उस बच्चे को मिले उन पैसों से उसे एक वक्त का भोजन मिल जाता। लेकिन इन छद्म संवेदनशील जज़्बातों ने बड़ी देर से मेरी रूह पर दस्तक दी।

बात सिर्फ मेरी या किसी एक व्यक्ति की नहीं हैं..ऐसी सतही संवेदनाएं मुझ जैसे सैंकड़ो के मन में रहती होंगी। बात है उस सड़सठ सालों से चली आ रही तथाकथित आजाद व्यवस्था की जिसके चलते आज भी वो बच्चे जिन्हें बस्ता टांगे स्कूल जाना चाहिये वो फुटपाथों या चौराहों पर कुछ ऐसे ही तिरंगा, अखबार या कुछ ऐसी ही दूसरी चीज़ें बेंचते नज़र आ रहे हैं। सवाल उठता है उन दर्जनभर पंचवर्षीय योजनाओं पर जो आज भी प्रत्येक भारतीय की शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और भोजन सुनिश्चित नहीं कर पा रहीं हैं। सवाल है उन तमाम संसदीय और न्यायालयीन नियमों-अधिनियमों से, जिसके चलते संविधान की प्रस्तावना में वर्णित सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय आम आदमी से कोसों दूर है और यही वजह है कि शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकारों में शुमार किये जाने के बावजूद तिरंगा, फुटपाथ पर घूम रहे बच्चों के महज़ हाथों में लहलहा रहा है जबकि उस तिरंगे को उन बच्चों के ज़हन का हिस्सा बनना था। जो कि सिर्फ शिक्षा से संभव है।

ये एक वाक़या तो महज़ एक मिशाल है...आजाद भारत की गुलाम तस्वीर का ज़िक्र कर पाना बहुत मुश्किल है। कहने को समाजवाद का चोगा ओड़ी, हमारी व्यवस्था में जितनी आर्थिक खाई देखी जा सकती है उतनी शायद ही किसी दूसरी विकासशील अर्थव्यवस्था में होगी। इस आर्थिक खाई का आलम कुछ ऐसा है कि देश का एक वर्ग अमेरिका, यूके, जापान के तमाम विकास को बौना साबित कर रहा है तो दूसरी ओर एक विशाल वर्ग ऐसा भी कालीन के नीचे पसरा पड़ा है जिसकी हालत सोमालिया, इथोपिया, कांगो सरीखे अफ्रीके देशों से गयी बीती है। एक वर्ग ऐसा है जो किसी मल्टीप्लेक्स में बड़े आराम से साढ़े तीन सौ का टिकट ले तीन घंटे का इंटरटेनमेंट खरीद रहा है तो उसी मल्टीप्लेक्स के बाहर खड़ी एक औरत अपनी गोद में टांगे उस बच्चे के लिये एक वक्त के भोजन के लिये साढ़े तीन रुपये की गुहार कर रही है।

ऐसे सैंकड़ो दृश्यों का ज़िक्र किया जा सकता है पर उन सबको बताना मेरा मक़सद नहीं। मैं सिर्फ लाचार भारत की इस भौतिक गुलामी की बात नहीं करना चाहता बल्कि समृद्ध इंडिया की उस मानसिक गुलामी को भी बयांं करना चाहता हूँ जिसके चलते ही इस भौतिक परतंत्रता का आलम फैला हुआ है। जी हाँ समृद्ध इंडिया! ऑलीशान गाड़ियों में घूमता, पॉश कालोनियों में करोड़ो-अरबों के बंगलों में रहने वाला, ब्रांडेड कपड़े और ज्वेलरी अपने बदन पे चढ़ाने वाला, लाखों के टूर पैकेज ले सिंगापुर-स्विटज़रलैण्ड घूमने वाला वही समृद्ध इंडिया जिसके अन्याय और सबकुछ हड़प लेने की हवसी प्रवृत्ति का ही नतीजा है लाचार भारत। इस इंडिया ने अपनी तमाम समृद्धि उन झूठी कसमों के ज़रिये हासिल की हैं जिन कसमों में ये लाचार भारत की सूरत बदलने की बात करते हैं। जी हाँ कभी नेता बनकर, कभी कोई प्रशासनिक अधिकारी बनकर, कभी डॉक्टर, इंजीनियर या उद्योगपति बनकर ये तमाम व्हाइट कॉलर लोग देश के हालात बदलने के लिये ही तो निकले थे पर इनकी स्वार्थि वृत्तियों और बस खुद को संवारने की चाहत ने आज गरीबी रेखा के नीचे लगभग 70 करोड़ लोगों को धकेल दिया है और जो इस रेखा से ऊपर रहने वाला मध्यमवर्ग है उसकी हालत भी कोई बहुत सम्मानीय नहीं है। परिस्थितियों के थपेड़े उसे भी पंगु ही बनाये हुये हैं।

इसे मानसिक गुलामी नहीं तो और क्या कहेंगे जहाँ प्रतिभा और पैसे का उपयोग बस खुद के उत्थान के लिये ही किया जाता हो...जहाँ पर्यावरण को बेइंतहा नुकसान अपने पैसे कमाने के साधनों को और पुख़्ता करने के लिये किया जाता हो..जहाँ रस्मों-रिवाज़ों के नाम पर धर्मस्थलों, मंदिर-मस्ज़िदों में करोड़ो चढ़ाया जाता हो लेकिन एक जीते-जागते इंसान की बेहतरी के लिये कोई उपक्रम नहीं है। डॉक्टर, इंजीनियर या व्यवसायी बन हर युवा अपने देश के हालात बदलने की दिशा में योगदान देने के बजाय विदेशों में मोटे पैकेज की नौकरी की चाहत पालता है। अपने बहुत थोड़े से जीवन को हर तरह से सिर्फ धन का गिरवी रखना क्या मानसिक दिवालियापन नहीं है। देश के उत्थान की बातें जिस दिन हमारी जुबानी मंशा न रहकर, ज़हन की आरजू बन जायेगी सही मायने में उस ही दिन हम आजाद होंगे। नहीं तो मुझ जैसे ही तमाम भारतीय पंद्रह रुपये का  कोई तिरंगा खरीद अपने घर या लाखों की कार पर चस्पा कर खुद की देशभक्ति को प्रमाणित करते रहेंगे और अपनी आज़ादी का जश्न युंही चलता रहेगा। या फिर व्हाट्सएप्प और फेसबुक की प्रोफाइल पिक्चर को तीन रंगों से रोशन कर देंगे..पर ज़हन उस तिरंगे के असल मायनों को कभी साकार नहीं कर पायेगा।

खैर...उम्मीद है हालात बदलेंगे, उम्मीद है हम आजाद होंगे..रूह से भी और ज़िस्म से भी। पर उसके लिये हर भारतीय को एक पत्थर तो तबीयत से उछालना ही होगा..एक दीपक तो शिद्दत से जलाना ही होगा। वो दिन जरूर आयेगा जब उस उछाले हुए पत्थर की चोट गुलामी के शीशों को तोड़ेगी और उस दीपक से सालों की तमस मिटेगी। पर तब तक........................................

चलो बाहर चलते हैं आजादी का जश्न मनाया जा रहा है.....और हम भी कुछ नारे लगाते हैं, हम भी कुछ गीत गुनगुनाते हैं.......जनगणमन अधिनायक जय है, भारत भाग्य विधाता।

Sunday, August 3, 2014

एक बदसूरत लड़की का ख़त

(ये पोस्ट मेरी एक कहानी "वो बदसूरत लड़की" का एक हिस्सा है..जिसमें उस लड़की के रुहानी हालातों को बयाँ करने की कोशिश की है जो जमाने के तथाकथित सौंदर्य के पैमानों पर खरी नहीं उतरती...और समाज में सौंदर्य के लिये लालायित लोगों को देख, जो टीस उसके मन में पैदा होती है उसे अपने लफ्ज़ों में लपेट अपनी माँ को भेजने की कोशिश करती है। हालांकि एक पुरुष होते हुए किसी नारी के मन को समझ पाना आसान नहीं है लेकिन फिर भी मैंने एक नादान कोशिश ज़रूर की है-)

माँ..अब बस तुम्हारा नाम जुवां पर लाकर और आँखें बंद कर तुम्हारी तस्वीर देखकर ही मुझे सुकून मिलता है। वरना इस दुनिया के रवैये ने तो वो सारी खुशियां मुझसे छीन ली हैं जो खुशियां एक जवां लड़की को उसकी हसरतों के पूरा होने से मिलती हैं क्योंकि मेरी सूरत किसी भी तरह की उन ख्वाहिशों को पालने की इज़ाजत नहीं देती..जो ख्वाहिशें एक जवां लड़की की होनी चाहिये...और अब तो मैं जवां भी नहीं रही, उनतीस साल की लड़की भला कहाँ जवां मानी जाती है। एक नारी के सौंदर्य की एक्सपायरी डेट तो तय कर रखी है न इस दुनिया ने।

माँ..वैसे आपसे मैं ये सब क्यूं बोलू..अब तो आप भी ये समझ चुकी हो कि मैं एक बदसूरत लड़की हूँ...यदि सुंदर होती तो अब तक घर में थोड़ी बैठी रहती। अब ये बात आप और पापा मुझसे कहें या नहीं पर सच तो यही है न..जो दुनिया ने आपको बताया है। हाँ मैं मानती हूँ कि पापा के लिये मैं आज भी किसी परी से कम नहीं और इसलिये मेरी शादी के लिये क्या कुछ नहीं किया उन्होंने...पर अब मेरी वजह से उनके माथे पर पड़ने वाली सलवटें नहीं देखी जाती। वो ये मान क्युं नहीं लेते कि मेरे लिये कोई राजकुमार नहीं आयेगा...उनकी बेटी ऐसे किसी अरमान को पूरा नहीं कर सकती जो एक लड़की का पिता देखा करता है। मुझे पता है माँ जब दो महीने पहले हमारे पड़ोस वाली वो सुनीता चाची की बेटी, जो मुझसे उम्र में लगभग छह साल छोटी है उसका ब्याह हुआ तो आपको कैसा लगा होगा..और वो नटखट सी पिंकी, जिसे हम बचपन में अपने घर में खिलाया करते थे वो भी तो दुबई जाकर सैटल हो गई है न...एक एक कर मेरी सब सहेलियां और वो लड़कियां भी जो मुझे दीदी-दीदी कहकर बुलाती थी सभी तो शादी करके चली गई। हर शादी को देख पापा अपनी बेटी के लिये भी किसी ऐसे ही राजकुमार के सपने संजोते थे पर माँ यहाँ तो सिर्फ चमड़ी की कीमत है...और मुझे वो नहीं मिली है।

बचपन में जब टीवी पर वो फेयर एंड लवली और विको टरमरिक क्रीम का एड देखती थी तो दिल में हर बार उम्मीद का संचार होता था पर वो सब झूठे हैं मां..मैंने सब कुछ किया पर मेरा ये काला रंंग जाता ही नहीं है। लड़कियों का रंग गोरा होना इतना ज़रूरी क्युं है मां? एक बात और बताना है आपको..वो जब कॉलेज में मेरी सहेलियां श्रद्धा और सपना अपने-अपने ब्वायफ्रेंड के साथ घूमती थी न तो मेरा भी मन होता था कि मुझे भी कोई ऐसे चाहे, फोन करे, मेरी फिक्र करे, मुझे घुमाये और आपसे छुप-छुप के मैं भी किसी से प्यार करूं...पर ऐसा कभी न हुआ मेरे साथ। मेरे साथ पढ़ने वाले लड़कों ने सहानुभूति तो दिखाई मुझपे, पर साथ कोई नहीं रहा। और माँ पता है न आपको वो श्रद्धा और सपना कभी पढ़ने में भी अच्छी नहींं थी और वो अपने ब्वायफ्रेंड से झूठ बोल-बोलकर धोखा भी देती थी..लेकिन फिर भी लड़के उनको ही पसंद करते थे। मैं पढ़ने में तेज थी और झूठ बोलना, किसी का दिल दुखाना तो आपने सिखाया ही नहीं है मुझे, फिर भी कभी किसी ने पसंद नहीं किया। हाँ सब लड़के एक्साम के टाइम पे मेरी हेल्प लेने ज़रूर आते थे..और थैंक्स भी बोलते थे पर मुझे किसी ने प्यार के काबिल नहीं समझा। लड़की की सूरत के अलावा क्या कोई और चीज़ मायने नहीं रखती?

और ये भी तो आपको पता ही है न कि कॉलेज टॉप करने के बाद भी मुझे नौकरी ढूंढने में कितनी परेशानी झेलना पड़ी। और वो हरमीत अंकल की जस्सी जिसका हरबार किसी न किसी सब्जेक्ट में बैक लगता था आज वो पता नहीं कैसे मुम्बई की एक कंपनी की सीईओ बन गई। जबकि मेरे काम से मेरी सूरत का कोई लेना देना नहीं था..मैंने न कोई फिल्म हीरोईन बनने का सोचा, न किसी टीवी का एंकर..जहाँ खूबसूरती मायने रखती है पर फिर भी ऐसा क्यूं? और आज भी कई लड़कियां जो इस कंपनी में इंटर्न करने आती है वो भी पता नहीं कैसे कुछ दिनों में ही मुझसे सीनियर बन जाती हैं और मैं छह साल से इस कंपनी का हिस्सा होते हुए भी उसी जगह पे किसी तरह टिकी हुई हूँ। लड़कियों की सूरत उन क्षेत्रों में भी इतनी ज़रूरी हो गई है जहाँ सूरत का कोई लेना देना ही नहीं है।

माँ आपको पता है जब हम लोग आज से आठ साल पहले वो शाहिद कपूर की 'विवाह' फ़िल्म देखने गये थे..तब मैं सोचती थी कि कोई ऐसा मेरी ज़िंदगी में भी आयेगा जो मुझे मेरे जज़्बातों के लिये चाहेगा न कि सूरत के लिये। पर ऐसा कुछ सच्चाई में नहीं होता। मेरे जीवन का सबसे सुनहरा दौर बस यूं ही गुज़र गया। मुझे समझ नहीं आता मेरे सुंदर न होने में मेरा क्या दोष...इंसान पैदा होने के बाद अपनी मेहनत से जिस काबिलियत और सद्गुणों से खुद को विकसित कर सकता है वो सब तो मैंने किया न..पर सूरत पे तो मेरा वश नहीं चल सकता। और जब भगवान को मुझे ऐसा बदसूरत बनाना ही था तो मेरे जज़्बातों को भी धुंधला कर देते...उन सारी तमन्नाओं को भी बेरंग कर देते..जो एक लड़की में होती हैै। लेकिन नहीं उन्होंने सिर्फ लड़कियों वाली तथाकथित खूबसूरती मुझे नहीं दी पर हर अहसास तो मुझमें भी वही हैं।

अब मैं थक चुकी हूँ माँ...अब मैं और आप लोगों को परेशान नहीं कर सकती...बस इसलिये मैंने फैंसला कर लिया है...ये सब ख़त्म करने का। अरे न..न..आप गलत सोच रही हैं इतना घबराने की ज़रूरत नहीं है आप लोगों के संस्कार मुझे कभी कोई गलत कदम नहीं उठाने देंगे..और खुद को ख़त्म करने का तो मैं सोच भी नहीं सकती। अब क़त्ल होगा उन जज़्बातों का जो एक लड़की को सौंदर्य की चाहत के अलावा और कुछ  देखने नहीं  देते...अब क़त्ल होगा उस चाहत का जिसके चलते लड़की अपना वजूद किसी मर्द के संग होने में तलाशती है। मेरा अस्तित्व खुद से है और अब इस चमड़ी में अपना अस्तित्व तलाशने के बजाय विचारों के उस अनंत आकाश में खुद की हस्ती खोजूंगी...जो इंसान की लौकिक ही नहीं पारलौकिक खूबसूरती को बेहतर बनाती है। माँ! मुझे अब कोई ग़म नहीं अपने ऐसे होने पे..और न किसी से कोई शिकायत है बल्कि मुझे फ़क्र है आप लोगों के दिये उन संस्कारों पे जो औरत को बाहरी नहीं बल्कि आंतरिक सुंदरता प्रदान करते हैं। और चर्म के मिथ्या उपासक इस समाज से भी मुझे कोई शिकायत नहीं क्योंकि गर मैं इनकी सुंदरता के मायनों पे खरी उतरती तो कभी अपनी वास्तविक सुंदरता को न समझ पाती।

अच्छा है मेरी चमड़ी, गीदड़ों की हवस का शिकार नहीं होगी..और दया, सत्य और वात्सल्य की सौरभ से खुद भी महकूंगी और दुनिया में हालातों की मार झेल रहे हज़ारों को महकाउंगी..और हाँ ये सब बात मैं किसी कुंठा मैं बयाँ नहीं कर रही बल्कि लंबी सोच के बाद हासिल हुए निष्कर्ष का परिणाम हैं मेरे ये विचार। लेकिन अब तक आप लोगों की हसरतों के लिये खुद को खामोश रखा था। मेरी खूबसूरती का पैमाना मैं खुद तय करुंगी, ये दुनिया नहीं। मेरे सौंदर्य पे मांस का लोथड़ा देखने वाला ये जमाना मोहर नहीं लगायेगा...ये पैमाना तो इतिहास तय करेगा कि कौनसी खूबसूरती चिरजीवंत है।

हाँ, माँ! जैसा पापा को लगता है वही सत्य है कि मैं परी हूँ। मेरा बदन ही मेरा वतन नहीं है..और न कोई चित्रकार ही मेरी तस्वीर बना सकता क्योंकि चित्रकारों ने भी जिस्म के परे कब देखा है औरत को। औरत का सच्चा सौंदर्य जिस दिन देख लिया न इन चित्रकारों ने उस रोज़ पूरी चित्रकला ही परिवर्तित हो जायेगी....और मैं तो वैसे भी विश्वसुंदरी हूँ। मेरी खूबसूरती को कैनवास पे उकेर सके, न ऐसी नज़र है कोई और न  ऐसा कोई रंग.............................