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Saturday, February 17, 2018

बड़े-बड़े विमर्शों के बीच उपेक्षित होती छोटी-छोटी बातों का दस्तावेज : पैडमैन

*लेख की शुरुआत में सबसे पहले उन तमाम ब्लॉगर साथियों और इस ब्लॉग के चहेते पाठक रहे मित्रों से माफी... उन तमाम वजहों के लिये जिनके कारण मैं अपने पसंदीदा काम ब्लॉगिंग में निष्क्रिय सा हो गया हूँ। यकीनन कुछ व्यस्तताएं रहीं, कुछ बाधाएं भी रहीं लेकिन इन सबसे ज्यादा मेरी स्वयं की अपनी बदलती रुचि, आलस्य और समय प्रबंधन करने के गुर का अभाव होना ही इस निष्क्रियता का अहम् कारण है। बहरहाल तकरीबन पौने दोे साल बाद कोई फिल्म समीक्षा लिख रहा हूँ। नज़रे इनायत कीजिये-

बेहद नवाचारी, होनहार निर्देशक आर. बाल्की निर्देशित और अक्षय कुमार अभिनीत 'पैडमैन' बॉक्स ऑफिस पर धूम मचा रही है। मसलन, इसकी सफलता महज बॉक्स ऑफिसी धनबरसाऊ कामयाबी नहीं है बल्कि ये वो सिनेमाई दस्तावेज है जिसकी नज़ीरें सिनेमा के विद्यार्थियों को आने वाले वक़्त में भी दी जायेंगी। आर बाल्की की पिछली फिल्मों की तरह इस फिल्म का विषय भी बेहद संजीदा और समाज में एक विमर्श खड़ा करने वाला है लेकिन उनकी पिछली फिल्मों 'शमिताभ' और 'की एंड का' की तरह ये फिल्म अपने कथ्य के प्रवाह में लड़खड़ाती नहीं है। बल्कि जितनी ईमानदारी से ये विषय चुना और गढ़ा गया है उतनी ही खूबसूरती से परदे पर प्रस्तुत भी हुआ है।

बाल्की के प्रॉडक्शन हाउस के विषय कुछ ऐसे रहे हैं जिनके बारे में यदि हम पहले सुनलें तो ये कयास लगाना मुश्किल है कि इस पर भी कोई ढाई-तीन घंटे की मनोरंजक, प्रभावी फिल्म बन सकती है लेकिन जब हम इन्हें देखते हैं तो लगता है कि ये छोटा सा उपेक्षित विषय कितना कुछ कहने की दरकार रखता था। चीनी-कम, इंग्लिश-विंग्लिश, पा, की एं का ऐसी ही फिल्मों की मिसाल है लेकिन पैडमैन इस कड़ी का अद्भुत नगीना है जिसकी चमक अक्षय कुमार, सोनम कपूर और राधिका आप्टे की अदाकारी, स्वानंद किरकिरे-आर बाल्की के संवाद और अमित त्रिवेदी के संगीत ने कई गुना बढ़ा दी है। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर फिल्म की नसों में रक्त बनकर तैरता है जो उस समय भी ज़ेहन में हिलोरें पैदा करता है जब परदे पर कोई डॉयलॉग नहीं होता। 

जिस दौर में हम रह रहे हैं वहां आये दिन बड़ी-बड़ी शोध संगोष्ठियां, दार्शनिक विमर्श, कार्यशालाएं, वैश्विक सम्मेलन और न जाने क्या-क्या हो रहा है...लेकिन इन बड़े बड़े विमर्शों के बीच रोजमर्रा की अदनी सी चीज़ें हमारी आम दिनचर्या में चर्चा का विषय नहीं बन सकी हैं। हाँ, इन पर बड़े सम्मेलनों में चर्चा जरूर होती है लेकिन ये हमारे पारिवारिक-सामाजिक वार्तालाप में अब भी सम्मिलित न हो सकें है। औरतों का मासिक धर्म और उन दिनों में सैनिटरी पैड्स का प्रयोग आधी आबादी की मूलभूत जरूरत है। लेकिन इस बारे में बात करने में झिझक, शर्म, रुढ़िवादी मान्यताएं कई उन विसंगतियों को आमंत्रित करती हैं जो महिलाओं के लिये अत्यंत कष्टकारी और कई बार जानलेवा भी बन पड़ती हैं। 

हर घर में, हर व्यक्ति, हर महीने अपने आसपास रह रहीं माँ-बहन-बेटी या पत्नी के जीवन में ये दौर देखते हैं। लेकिन कभी 'अमुक महिला को खाना नहीं बनाना', 'वो छुट्टी से हैं' या कुछ खिलंदड़ लोगों द्वारा टपांच दिन का टेस्ट मैचट जैसे शब्दों से इसकी असल सच्चाई और मुश्किल को ही उभरकर सामने नहीं आने देते। जब हम पीरियड्स का नाम लेने में ही इतने संकोची हैं तो इस पर बात क्या खाक कर सकेंगे। मेडिकल स्टोर पर कागज में लपेटकर पैड्स का दिया जाना, घर में प्रयोग किये जा चुके पैड्स को ठिकाने लगाने की मुश्किलें, किसी दूसरे कपड़े के नीचे अंडरगारमेंट्स या फ्रैश पेड्स छुपा कर रखना ये तमाम वे चीजें हैं जो इन विषयों पर कभी चर्चा ही न होने देंगी। और उचित जानकारी एवं समझ के अभाव में जो आधी अधूरी जानकारी से महिलाएं कदम उठायेंगी वो उनके लिये कई नई मुश्किलों को आमंत्रण देने वाली साबित होंगी। फिल्म में एक आंकड़ा पेश किया है कि देश में इस समय महज 12 से 15 प्रतिशत महिलाएं ही सैनेटरी पेैड्स का इस्तेमाल करती हैं तो आप खुद सोच सकते हैं कि देश की पिच्यासी फीसदी महिलाओं को हम किस दिशा में धकेल रहे हैं। इन वजहों से न जाने कितनी औरतें बांझ हो जाती हैं, कितनी असाध्य गुप्त रोगों के चंगुल में फंस जाती हैं और कई संक्रमण के कारण मर भी जाती हैं। जिसमें ग्रामीण भारत की स्थिति तो बेहद भयावह है। ऐसे अति आवश्यक विषय पर मौन रखते हुए हम महिलासशक्तिकरण या सशक्त भारत का सपना संजो रहे हैं। फिल्म में अक्षय का एक डॉयलॉग है- "बिग मैन, स्ट्रांग मैन नॉट मेकिंग कंट्री स्ट्रांग...वूमेन स्ट्रांग, मदर स्ट्रांग, सिस्टर स्ट्रांग देन कंट्री स्ट्रांग।

इस बदलाव के रास्ते में पुरुषों से ज्यादा समाज की रुढ़िवादी सोच में जकड़ी कई महिलाएं ही जिम्मेदार हैं जिन महिलाओं पर इस पितृसत्तात्मक समाज ने अनेक रिवाजों के बंधन थोप संस्कृति का संरक्षक होने का जिम्मा सौंप रखा है। कहने को बहू-बेटी एक समान है, कहने को घर का बेटा-बेटी समान है लेकिन इन रिश्तों के दरमियां पसरी हुई असमानता आसानी से महसूस की जा सकती है, यदि हम महसूस करना चाहें तो। लज्जा, औरत का गहना है, व्रतपरायणता, स्वामिधर्मिता, संस्कृति प्रसारिका जैसे न जाने कितने विशेषण लादकर हम उसे दबाये रखना चाहते हैं लेकिन इस संस्कृति-सभ्यता की दुहाई में हम उसकी नैसर्गिक उड़ान और चाहतों का ही गला घोंट रहे हैं... क्योंकि हम जानते हैं कि औरत अपनी क्षमता के साथ यदि बाहर आये तो इस पितृसत्तात्मक समाज की हवाई उड़ जायें। हम जानते हैं कि प्राकृतिक तौर पर औरत...एक पुरुष से ज्यादा सशक्त है। ऐसे में कैसे हम उसकी उड़ान को पंख दे सकते हैं। ध्यान रहे मैं यहां महिलासशक्तिकरण की शह लेते हुए स्त्री की उन आदतों या प्रदर्शन की पैरवी नहीं कर रहा हूँ जो एक पुरुष को भी शोभा नहीं देते। 

दायरे यदि स्त्री के लिये हैं तो पुरुष के लिये भी हैं लेकिन पुरुष की सोच में बदलाव के लिये तो कोई उपक्रम नहीं, पुरुष को संस्कृति-सभ्यता, धर्म-समाज, जात-बिरादरी का कोई लिहाज नहीं  इसलिये मर्यादा के नाम पर हर बेड़ी औरत के पैरों में ही बांध देना कोई न्याय नहीं है। हम नहीं जानते कि हमने इस दोहरी सोच के चलते खुद को विकास की राह में कितना पीछे कर लिया है। हम उन चीज़ों में ही उलझे पड़े हैं जिनसे हमें उस आदिम युग में ही बाहर निकल जाना था जब हमने पत्ते या जानवर की खाल, लिबास के तौर पर पहनना छोड़ा था। 

कालीन के नीचे धूल खा रहे इन तमाम विषयों पर से फिल्म ने रुढ़िवाद की धूल झाड़ने की कोशिश की है। अक्षय की अदाकारी और फिल्म का स्क्रीनप्ले इतना कमाल है कि दर्शक भी इस सिनेमाई कथ्य के प्रवाह में बहता नजर आता है। तमिलनाड़ू के अरुणाचलम् मुरुगुंथम के जीवन से प्रेरित फिल्म "पैडमैन" के लक्ष्मी के जरिये मुरुगुंथम के संघर्ष को भी समझा जा सकता है। वास्तव में ऐसे लोगों की ज़िद ही है जिसने समाज को नित नये नवोन्मेषों से समृद्ध बनाया है और ऐसी अधिकांश ज़िद की मूल वजह प्रेम ही रहा है। फिर चाहे वो पहाड़ तोड़ने वाले दशरथ मांझी हों या समाज में बहिष्कृत करार दिये गये 'पैड्स' के निर्माता मुरुगुंथम। फिल्म में एक संवाद कुछ इसी तरह है कि 'तुम्हारी फिक्र ने इस जिद को पैदा किया, अब जिद इस कदर बढ़ गई कि फिक्र ही कहीं खो गई'। ये जिद ही आविष्कारी लोगों को पागल बना देती है और फिल्म के अंत में अक्षय कहते भी हैं कि "यू थिंक आई मैड, बट मैड ऑनली बिकमिंग फैमस"। फिल्म के आखिर में अक्षय का टूटी फूटी अंग्रेजी में बोला गया गया संवाद..फिल्म का सार है और हिन्दी सिनेमा के कई अद्भुत क्लाईमैक्स दृश्यों में से एक बन पड़ा है।

ओवरऑल ये फिल्म एक कंप्लीट इंटरटैनिंग पैकेज है। जिसने समाज को जागरुक करने वाले सिनेमा के उस उद्देश्य को भी पूरा किया है जिसका जिक्र भारतीय सिनेमा के पितामह दादासाहेब फाल्के किया करते थे। लोंग-इलायची की तरह फिल्म में मौजूद अन्य चरित्र अभिनेताओं की अदाकारी भी कमाल है। अक्षय की फिल्म देख उनके उस कथन के मायने भी समझ आते हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पे कितना कमाती है ये मायने नहीं रखता, बस जिस उद्देश्य के लिये ये फिल्म बनी है वो पूरा हो जाये। अक्षय का इस व्यवसायिक सफलता के प्रति निर्मोही रवैया हमें तभी समझ आ गया था जब उन्होंने गणतंत्र दिवस की छुट्टीयों वाले वीकेंड से अपनी फिल्म को 'पद्मावत' के लिये सहर्ष हटाने को मंजूर कर लिया था। कुछ सालों पहले मैं कहा करता था कि अक्षय की पोटली में अरबी क्लब (100 करोड़ कमाई वाली) फिल्में भले बहुत हैं लेकिन उनके पास एक भी अदद महान् फिल्म नहीं है। लेकिन बीते सालों में एयरलिफ्ट, रुस्तम, टॉयलेट-एक प्रेम कथा और अब पैडमैन ने इस मिथक को तोड़ दिया है। उनकी आने वाली फिल्म "गोल्ड" की पहली झलक भी उम्मीद जगाती है।

खैर, उम्र के इस पड़ाव पर "मिंटिंग मनी" के व्यामोह से बाहर निकल देश-समाज के लिये कुछ खास करने और जीवन के असल अर्थ तलाशने के प्रति ही इंसान को उन्मुख होना चाहिये। सिनेमाई माध्यम से अक्षय शायद यहीं कर रहे हैं। हम बड़े फलक़ पर न सहीं, अपने आसपास तो एक सकारात्मक बदलाव ला ही सकते हैं। 

Sunday, February 8, 2015

हंसी-खुशी का है राज़ फ़िल्लम, फुल्ली फिल्लम है सांस भी : शमिताभ

हिन्दुस्तान..एक ऐसा देश जो अपनी रग़ों में हुल्लड़याई का पूरा समंदर लिये घूमता है। जिसके अतीत की तमाम इबारतें अपने ज़हन में अनंत कथा-कहानियां समेटे बैठी हैं। किस्सागोई जिस देश का प्रमुख शग़ल है और दादी-नानी की कहानियां जहाँ लोगों के लिये प्राथमिक विश्वविद्यालय। इस देश में मेले हैं, मदारी हैं, सपेरे हैं, नाच-गाना-नौटंकी है और ये देश कला की ऐसी अनेक विधाओं, अनेक रंगों को अपने में समेटे है। इन सब चीज़ों के कारण कभी ये उपहास का केन्द्र बनता है तो कभी इस कला-संस्कृति की वजह से ये देश अपना सिर फ़क्र से ऊंचा करता है। चाहे डांस, ड्रामा जैसी परफार्मिंग आर्ट हो या पेन्टिंग, डिजाइनिंग जैसी नान-परफार्मिंग आर्ट, हमारे देश में हर कला को लेकर पागलपन है और ऐसे में इन तमाम आर्ट्स को अपने में समाने वाले सिनेमा की बात की जाये तो दीवानगी अपने चरम पर होती है।

शमिताभ। तकरीबन सौ सालों से इस देश के लोगों के मनोरंजन और पागलपन का पर्याय बन चुके भारतीय सिनेमा के प्रति आदरांजलि की तरह प्रस्तुत की गई है। लेकिन हमारे सिनेमा के महिमामंडन करने के साथ ही साथ ये फ़िल्म ऐसी कई शिकायतों को बड़ी बेबाकी से प्रस्तुत करती है..जो अरसे से हर सिने प्रेमी के दिल में उठता चली आ रहे हैं। मसलन,  भारतीय फ़िल्म उद्योग को बॉलीवुड कहना...फ़िल्मों में व्याप्त प्लेगिआरिज़्म पर चुटकी लेना..कुछ ऐसे ही इस इण्डस्ट्री के झूठ और दिखावे की चकाचौंध को प्रस्तुत करना। निर्देशक आर. बाल्की की ये महज़ तीसरी फ़िल्म है लेकिन अपनी पिछली दो फ़िल्मों की तरह इस फ़िल्म में भी वे सिनेमाई खूबसूरती के चरम पर नज़र आते हैं।

मनोरंजक कथानक और बेहतरीन प्रस्तुति के बीच फ़िल्म में कई सारे अर्थ भी छुपे हुए हैं..फ़िल्म के संवाद बाल्की की पिछली फ़िल्मों की तरह नयापन और विट (हास्य पैदा करने की कला) लिये हुए हैं। संवादअदायगी होती तो बड़ी गंभीरता से हैं पर दर्शक द्वारा ग्रहण होने के बाद ज़बरदस्त गुदगुदी पैदा करते हैं। ये संवाद हंसाने के लिये किसी तरह की लफ्फाज़ी का सहारा नहीं लेते..बल्कि इन्हें कहने और समझने के लिये खास विद्वत्ता की दरकार होती है। बाल्की द्वारा प्रस्तुत कॉमेडी उन तमाम निर्माता-निर्देशकों के मूंह पर तमाचा है जो कहते हैं कि आज के दौर में हास्य सिर्फ अश्लीलता की गलियों से होकर ही आ सकता है।

फ़िल्म की महानता में बाल्की के निर्देशकीय कौशल के साथ साथ अमिताभ, धनुष और अक्षरा की एक्टिंग का भी अहम् योगदान है। अमिताभ अपने अभिनय और ताजगी से ये संशय पैदा कर रहे हैं कि वे अब 72 वर्ष के हो गये हैं। इस उम्र में वे बिना सुर छोड़े बेहतरीन गाना भी गाते हैं और लगता है कि इस साल बेस्ट सिंगर के कई सारे अवार्ड वे अपने खाते में न जोड़ लें। वहीं धनुष के लिये ये किरदार किसी चुनौती से कम नहीं था। एक मूक व्यक्ति का अभिनय, जो किसी भी बोलने वाले व्यक्ति से ज्यादा वाचाल लगता है और बॉलीवुड के शिखर सितारे की आवाज पर उसी तरह के भाव लेकर लाना, उन्हें अभिनय के शीर्ष पर ले जाता है। फिल्मों के लिये गली-मोहल्लों में दिखने वाली एक आम आदमी की दीवानगी को धनुष ने बखूब प्रस्तुत किया है। अक्षरा की यह पहली फ़िल्म है पर हिन्दी और तमिल के सुपरसितारों के सामने वो कतई फीकी नज़र नहीं आती। उन्हें देखना उतना ही मोहक लगता है जितना अमिताभ या धनुष को।

'शमिताभ' दो के मेल का नाम है...और ये मिलकर सौ वर्ष पुराने सिनेमा के दो प्रमुख अंगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऑडियोविसुअल। जी हाँ इन दो चीज़ों के कारण ही सिनेमा खुद को जनमानस का प्रमुख मानसिक भोजन बना सका है। यदि एक भी कमतर हो तो सिनेमा कभी भी अपना समग्र प्रभाव नहीं स्थापित कर सकता। धनुष दृष्याभिव्यक्ति का प्रतीक है तो अमिताभ श्रव्याभिव्यक्ति के। जब दोनों अपने-अपने अहंकार में पागल हो खुद को श्रेष्ठ साबित करते हैं तो जनता द्वारा उन्हें नकार दिया जाता है। फ़िल्म एक बहुत बड़ी सीख देते हुए ख़त्म होती है कि  सफलता समग्र प्रयासों का प्रतिफल है। जहाँ व्यक्ति सबको भूलकर सिर्फ 'मैं' पर अड़ बैठता है बस वही पतन की वजह बन जाती है। व्यक्ति का सबसे बड़ा अभिमान, जीवन में एक न एक दिन ज़रुर टूटता है। अहंकार को हम जितने चरम पर ले जाते हैं उसके टूटने पर दर्द भी उतना गहरा होता है। फिल्म इण्डस्ट्री ने सफल व्यक्ति के लिये स्टार शब्द इजाद किया है उसका कारण यही है कि सितारे चाहे कितने ही चमक लें पर टूटते ज़रूर हैं।

बहरहाल, कहने को बहुत कुछ है पर कहने-सुनने से बेहतर है इसे फ़िल्म को देखा जाये...ये हंसायेगी-गुदगुदायेगी और रुलायेगी भी पर गहन दार्शनिकता को संजोये कई प्रतीक भी फ़िल्म में देखे जा सकते हैं। कई सालों पहले मैंने अपना ये ब्लॉग 'साला सब फ़िल्मी हैं' बनाया था..जिसके परिचय के तौर पर मैंने कहा था कि अब हर जज़्बात, हंसी-खुशी, संवेदनाएं फ़िल्मी सी हो गई हैं..बस इस बात को चरितार्थ होते ही फ़िल्म में देखा जा सकता है। फ़िल्मों में नया और कुछ हटकर देखने के हिमायती लोगों के लिये ये फ़िल्म एक बेहतरीन अनुभव साबित होगी। शमिताभ..बॉलीवुड को अपनी मौजूदा श्रेणी से कुछ सोपान और ऊपर ले जाने वाली फ़िल्मों में से एक है।