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Tuesday, February 5, 2019

जश्न और जीत की नई गर्जना - हाऊज् द जोश? …..हाई सर!!!

(***ये फिल्म समीक्षा दिल्ली से प्रकाशित मासिक पत्रिका "हिन्दुस्तान ओपिनियन" के जनवरी-फरवरी 2019 के अंक में प्रकाशित हुई, इसलिये प्रकाशन होने तक इसे ब्लॉग पर डालना संभव नहीं हो सका।)

सिनेमा के जनक दादासाहेब फाल्के का एक कथन था फिल्में निश्चित ही मनोरंजन का सशक्त माध्यम हैं। लेकिन इनका सार्थक प्रयोग ज्ञानवर्धन और जागरुकता के लिये भी किया जा सकता है। सीमा पर अपने साहस का परिचय देते हमारे वीर जवानों की कर्तव्यनिष्ठा एवं शौर्य के बारे में सुनना और उसके जीवंत रूपांतरण को रुपहले परदे पर देखना एकदम भिन्न अनुभूति का संचार हमारे ज़ेहन में करता है।

उरी- द सर्जिकल स्ट्राईक सिनेमा की हमारे जवानों को दी गई एक ऐसी आदरांजलि का नाम है जिसे दशकों बाद भी एक सशक्त दस्तावेज की तरह प्रस्तुत किया जा सकता है। ये एक ऐसी फिल्म है जिसने सिनेमाई मानदंडों की पारंपरिक रीत के परे एक ऐसे कथ्य की प्रस्तुति पेश कर सफलता पाई जो अमूमन सिनेमा में विरले ही देखने को मिलती है।

जहां न कोई पारंपरिक प्रेम कहानी है, न कोई आइटम नंबर और न नायिका के बदन से सरकता लिबास... ये सब वे चीज़ें हैं जिन्हें सिनेमाई कामयाबी का मूलतत्व कहा जाता है लेकिन इन सबसे हटकर उरी- द सर्जिकल स्ट्राईकअपने पहले फ्रेम से अंतिम फ्रेम तक सेना का शौर्य, साहस, समर्पण और अनेक कठिनाईयों के बावजूद अपनी कर्तव्यनिष्ठा का निर्वहन करते जवानों की कहानी है।

फिल्म के केन्द्र में सिंतबर 2016 में भारतीय सेना द्वारा उरी में हुई आतंकी वारदात के बाद पाकिस्तान पर की गई जबावी कार्रवाई है लेकिन फिल्म का ट्रीटमेंट कुछ ऐसा है कि फ्रेम दर फ्रेम आप ज़ेहन में देशभक्ति का जज़्बा महसूस करते हुए कई मर्तबा हमारे सैनिकों के लिये तालियां बजाते हैं और उनकी निष्ठा को सलाम करते हैं।

फिल्म के कथानक के जरिये निर्देशक आदित्य धर दर्शकों को पेट्रिऑटिज्म का जबरदस्त डोज़ देते हैं। फ्रेम दर फ्रेम फिल्म चीख चीखकर ये बताती है कि आप पेट्रियोटिक सिनेमा देख रहे हैं। युद्ध पर आधारित फ़िल्में यूं भी भारतीय सिनेमा में कम ही बनी है लेकिन जो चंद फिल्में हमें याद हैं उनमें हम उरी-  द सर्जिकल स्ट्राईक को भी याद रखेंगे। निर्देशक का जबरदस्त ट्रीटमेंट और काफी क्लीशेड स्क्रीनप्ले उरी को क्लास फिल्म बनाने के साथ साथ मास फिल्म भी बनाती है। यही वजह है कि क्रिटिकली और कमर्शियली दोनों पहलुओं पर फिल्म सफल साबित हुई है। बेहद कम बजट की बनी होने के बावजूद करीब 200 करोड़ रुपये का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन कर फिल्म ने यह साबित भी कर दिया है।

फिल्म की अदाकारी की बात की जाये तो विक्की कौशल अपनी कम्पीटेंट एक्टिंग के चलते दर्शकों के दिलों में अपनी खास जगह बनाने में कामयाब होते हैं। उनकी अदाकारी देख ये यकीन करना मुश्किल होता है कि ये वही विक्की कौशल हैं जिन्हें हमने मसान फिल्म में एक कम्पेल्ड युवक के रूप में देखा था। कहना गलत नहीं होगा कि उरी के लाउड स्क्रीनप्ले को भी अपनी बढ़िया अदाकारी से विक्की कौशल ने बैलेंस किया है। फिल्म देखने के बाद विहान का किरदार दर्शकों पर अपनी खास छाप छोड़ता भी है। विक्की कौशल के अलावा दूसरे किरदार भी अपनी- अपनी भूमिकाओं में काफी सजे हैं। परेश रावल, मोहित रैना, स्वरूप सम्पत, यामी गौतम और कीर्ति कुलहरि आदि सभी ने अपने अपने किरदारों के साथ न्याय किया है।

फिल्म की जबरदस्त एक्शन कोरियोग्राफी, जोश भर देने वाले संवाद, वॉर सीन्स का पिक्चराईजेशन और कॉस्ट्युम फिल्म के घटनाक्रम को यकीन करने वाला बनाते हैं। कुछ लोगों को पैट्रियॉटिज्म को ओवरडोज फिल्म में दिख सकता है लेकिन यही ओवरडोज एक बड़े मास के लिये फिल्म की यूएसपी भी है। चुंकि ये फिल्म बहुत पुराने घटनाक्रम को पेश करने के बजाय हाल ही में हुई वारदात पर आधारित है लिहाजा दर्शक खुद को फिल्म से बेहतर ढंग से जोड़ पाते हैं।

अपने मिशन पर जाने से पहले विक्की कौशल जब जवानों में ऊर्जा का संचार करते हुए सवाल करते हैं हाउज् द जोश... तो सिनेमाघर में बैठा दर्शक भी उसी ऊर्जा को महसूस करते हुए जबाव देता है हाई सर। ये नारा उरी फिल्म का ही सुर नहीं रह गया है बल्कि नये भारत के युवा की भी गर्जना बन गई है और इसे कई अवसरों पर इन दिनों सुना जा सकता है।

बहरहाल, सिनेमा के ट्रेंड बन चुके मसाला मनोरंजन से इतर इन दिनों लीक से हटकर बनने वाली ये कुछेक फ़िल्में भारतीय सिनेमा की प्रतिष्ठा में जबरदस्त इजाफा करने वाली साबित हुई हैं। बीते वर्ष रिलीज़ हुई फिल्म राज़ी के बाद हाल ही में प्रदर्शित उरी- द सर्जिकल स्ट्राईकसिनेमा में राष्ट्रवाद का बेहतरीन शंखनाद है।

Saturday, March 24, 2018

शिक्षक और शिक्षण को आदरांजलि : हिचकी

यादों का हिरण जब कभी अतीत के गलियारों में उछलकूद करता है और गुजरता है अपने बचपन के मनोरम पड़ावों के ईर्द-गिर्द तो उसे गाहे-बगाहे, उस पड़ाव पर कहीं-कोई कुछ खास, एक अदद सा अध्यापक भी खड़ा नजर आता है। ज़िंदगी में पहली मर्तबा मोहब्बत भी शायद हमें हमारे टीचर से ही होती है। लड़का हो तो कोई महिला अध्यापिका और लड़की हो तो कोई पुरुष टीचर...दिल में एक ऐसी जगह बना लेता है जिसे आसमां की ऊंचाई पर ले जाकर पूजने को मन करता है। दिल करता है तनाव के भंवर में उसके कांधे पर सिर रख रोया जाये.. भ्रम के हालातों में अपनी उस भ्रमणा का समाधान तलाशा जाये। "सबका कोई न कोई एक फेवरेट टीचर ज़रूर होता है लेकिन क्या आपको उसकी उस वक्त की सैलरी पता है?"

कुछ ऐसे ही सुर से उठी और इस सुर को और भी सुरीला बनाती, हिन्दी सिनेमा की बेहतरीन फिल्म है हिचकी। तारे ज़मीं पर, इम्तिहान, किताब, जागृति, ब्लैक, हिन्दी मीडियम जैसी फिल्मों के बाद शिक्षक और शिक्षण को एक और आदरांजलि प्रस्तुत करती निर्देशक सिद्धार्थ मल्होत्रा और अभिनेत्री रानी मुखर्जी की ये फिल्म अध्यापक के मायनों को तमाम भौतिक उपलभ्य से परे ले जाती है। भारतीय संस्कृति, साहित्य और समाज गुरु के महात्मय को सदियों से बयां करता चला आ रहा है... सिनेमा ने उस सुर को मौजूदार दौर के मुताबिक तनिक बदले कलेवर के साथ प्रस्तुत किया है लेकिन उसका मूल भाव अब भी वही है। हिन्दी सिनेमा में अध्यापकों के बदलते प्रतिमान पर पहले इसी ब्लॉग पर एक अन्य लेख लिख चुका हूँ।

यह फिल्म अमेरिकी मोटिवेशनल स्पीकर और शिक्षक ब्रैड कोहेन के जीवन से प्रेरित है। टॉरेट सिंड्रोम जैसी दुर्लभ न्यूरोलॉजिकल स्थिति से जूझते हुए उन्होंने अनगिनत कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन अंततः एक सफल शिक्षक के रूप में अपनी पहचान बनाई। उन्होंने अपने जीवन पर पुस्तक लिखी, जिसके आधार पर वर्ष 2008 में Front of the Class नामक अमेरिकी फिल्म बनी। 'हिचकी' उसी मूल भावना का भारतीय रूपांतरण है, लेकिन इसकी भारतीय संवेदनाएं, सामाजिक परिवेश और भावनात्मक प्रस्तुति इसे अपनी अलग मौलिक पहचान देती हैं। यही इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती है।

रानी मुखर्जी का जीवंत और आत्मीय अभिनय 'हिचकी' को उन चुनिंदा फिल्मों की श्रेणी में खड़ा कर देता है जिन्हें केवल देखा नहीं जाता, बल्कि लंबे समय तक महसूस किया जाता है। मर्दानी के लगभग चार वर्ष बाद बड़े पर्दे पर लौटी रानी के लिए इससे बेहतर वापसी शायद संभव नहीं थी। उन्होंने एक बार फिर सिद्ध किया कि उत्कृष्ट अभिनय का कोई विकल्प नहीं होता। अपने दौर की शीर्ष अभिनेत्रियों में शुमार रानी, एकल महिला सितारा होते हुए भी पूरी फिल्म को अपने कंधों पर सहजता से लेकर चलती हैं और कहीं न कहीं श्रीदेवी की याद ताजा कर देती हैं, जिन्होंने English Vinglish और Mom जैसी महिला-केंद्रित फिल्मों से अपनी अद्भुत वापसी दर्ज कराई थी।

'हिचकी' दरअसल नाकामयाबियों और जन्मजात सीमाओं को चुनौती देने वाली एक विलक्षण सिनेमाई कृति है। यह मेहनत, जिजीविषा और अटूट इच्छाशक्ति का ऐसा मधुर राग है जो बार-बार गिरने के बाद भी फिर से उठ खड़े होने का साहस देता है। यह सिखाती है कि कई बार असफलताओं का चरम, सफलता के सबसे निकट होने का संकेत होता है और उस दरवाजे को खोलने के लिए बस "एक और" दस्तक की जरूरत होती है। यह फिल्म "क्यों?" और "क्यों नहीं?" के बीच का अंतर समझाती है तथा निराशा के अंधकार में भटक रहे व्यक्ति के लिए ध्रुवतारे की तरह दिशा दिखाती है।

यह उन दुर्लभ फिल्मों में शामिल है जिन्हें आंखें केवल देखती नहीं, बल्कि आत्मा महसूस करती है। हर दृश्य मन की गहराइयों में उतरता चला जाता है और भावनाओं का ऐसा ज्वार पैदा करता है कि कई बार आंखें अनायास ही नम हो उठती हैं। दिलचस्प यह है कि उस क्षण हम अपनी भावुकता छिपाने के लिए बगल में बैठे व्यक्ति की ओर भी नहीं देखते, जबकि संभव है कि वह भी ठीक उसी भावावेश से गुजर रहा हो।

फिल्म में नैना माथुर (रानी मुखर्जी) के प्रिंसिपल पद से सेवानिवृत्त होकर विद्यालय से विदा लेने वाला दृश्य मुझे व्यक्तिगत रूप से सबसे अधिक भावुक करता है। उस पल अनायास ही अपने अध्यापन जीवन की स्मृतियां ताजा हो जाती हैं। विद्यार्थियों द्वारा दी गई वह आत्मीय विदाई आज भी स्मृतिपटल पर वैसी ही अंकित है। संयोग देखिए कि लगभग चार वर्ष पहले मार्च माह के इन्हीं दिनों, जीवन की व्यावहारिक आवश्यकताओं और बेहतर आर्थिक संभावनाओं के आकर्षण में मैंने अपने सबसे प्रिय अध्यापन-करियर को अलविदा कह दिया था। दुनिया की नजर में शायद मैंने आगे बढ़कर कुछ बेहतर हासिल किया हो, लेकिन उस निर्णय का एक मौन अफसोस आज भी मन के किसी कोने में जीवित है।

फिल्म का अंतिम संवाद शिक्षा व्यवस्था पर गहरी टिप्पणी करता है। नैना माथुर का प्रतिद्वंद्वी रहा शिक्षक अंततः स्वीकार करता है कि "दुनिया में कोई विद्यार्थी बुरा नहीं होता, अच्छे या बुरे शिक्षक होते हैं। और जो मानवीय दृष्टि से अच्छे नहीं हैं, वे वास्तव में शिक्षक कहलाने के योग्य भी नहीं हैं।" शायद यही संवाद पूरी फिल्म का सबसे बड़ा संदेश भी है।

चलते-चलते, अपने विद्यार्थियों द्वारा दी गई विदाई के उस वीडियो (जिसका यूट्यूब लिंक नीचे संलग्न है) को याद करते हुए मैं पूरे मन से 'हिचकी' देखने की अनुशंसा करता हूँ। यदि आपने अब तक यह फिल्म नहीं देखी है, तो इसे केवल एक फिल्म समझकर नहीं, बल्कि जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण को थोड़ा और विस्तृत करने के लिए अवश्य देखिए।

https://www.youtube.com/watch?v=ePhjjpGSpSs

इत्यलम्।

Saturday, February 17, 2018

बड़े-बड़े विमर्शों के बीच उपेक्षित होती छोटी-छोटी बातों का दस्तावेज : पैडमैन

*लेख की शुरुआत में सबसे पहले उन तमाम ब्लॉगर साथियों और इस ब्लॉग के चहेते पाठक रहे मित्रों से माफी... उन तमाम वजहों के लिये जिनके कारण मैं अपने पसंदीदा काम ब्लॉगिंग में निष्क्रिय सा हो गया हूँ। यकीनन कुछ व्यस्तताएं रहीं, कुछ बाधाएं भी रहीं लेकिन इन सबसे ज्यादा मेरी स्वयं की अपनी बदलती रुचि, आलस्य और समय प्रबंधन करने के गुर का अभाव होना ही इस निष्क्रियता का अहम् कारण है। बहरहाल तकरीबन पौने दोे साल बाद कोई फिल्म समीक्षा लिख रहा हूँ। नज़रे इनायत कीजिये-

बेहद नवाचारी, होनहार निर्देशक आर. बाल्की निर्देशित और अक्षय कुमार अभिनीत 'पैडमैन' बॉक्स ऑफिस पर धूम मचा रही है। मसलन, इसकी सफलता महज बॉक्स ऑफिसी धनबरसाऊ कामयाबी नहीं है बल्कि ये वो सिनेमाई दस्तावेज है जिसकी नज़ीरें सिनेमा के विद्यार्थियों को आने वाले वक़्त में भी दी जायेंगी। आर बाल्की की पिछली फिल्मों की तरह इस फिल्म का विषय भी बेहद संजीदा और समाज में एक विमर्श खड़ा करने वाला है लेकिन उनकी पिछली फिल्मों 'शमिताभ' और 'की एंड का' की तरह ये फिल्म अपने कथ्य के प्रवाह में लड़खड़ाती नहीं है। बल्कि जितनी ईमानदारी से ये विषय चुना और गढ़ा गया है उतनी ही खूबसूरती से परदे पर प्रस्तुत भी हुआ है।

बाल्की के प्रॉडक्शन हाउस के विषय कुछ ऐसे रहे हैं जिनके बारे में यदि हम पहले सुनलें तो ये कयास लगाना मुश्किल है कि इस पर भी कोई ढाई-तीन घंटे की मनोरंजक, प्रभावी फिल्म बन सकती है लेकिन जब हम इन्हें देखते हैं तो लगता है कि ये छोटा सा उपेक्षित विषय कितना कुछ कहने की दरकार रखता था। चीनी-कम, इंग्लिश-विंग्लिश, पा, की एं का ऐसी ही फिल्मों की मिसाल है लेकिन पैडमैन इस कड़ी का अद्भुत नगीना है जिसकी चमक अक्षय कुमार, सोनम कपूर और राधिका आप्टे की अदाकारी, स्वानंद किरकिरे-आर बाल्की के संवाद और अमित त्रिवेदी के संगीत ने कई गुना बढ़ा दी है। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर फिल्म की नसों में रक्त बनकर तैरता है जो उस समय भी ज़ेहन में हिलोरें पैदा करता है जब परदे पर कोई डॉयलॉग नहीं होता। 

जिस दौर में हम रह रहे हैं वहां आये दिन बड़ी-बड़ी शोध संगोष्ठियां, दार्शनिक विमर्श, कार्यशालाएं, वैश्विक सम्मेलन और न जाने क्या-क्या हो रहा है...लेकिन इन बड़े बड़े विमर्शों के बीच रोजमर्रा की अदनी सी चीज़ें हमारी आम दिनचर्या में चर्चा का विषय नहीं बन सकी हैं। हाँ, इन पर बड़े सम्मेलनों में चर्चा जरूर होती है लेकिन ये हमारे पारिवारिक-सामाजिक वार्तालाप में अब भी सम्मिलित न हो सकें है। औरतों का मासिक धर्म और उन दिनों में सैनिटरी पैड्स का प्रयोग आधी आबादी की मूलभूत जरूरत है। लेकिन इस बारे में बात करने में झिझक, शर्म, रुढ़िवादी मान्यताएं कई उन विसंगतियों को आमंत्रित करती हैं जो महिलाओं के लिये अत्यंत कष्टकारी और कई बार जानलेवा भी बन पड़ती हैं। 

हर घर में, हर व्यक्ति, हर महीने अपने आसपास रह रहीं माँ-बहन-बेटी या पत्नी के जीवन में ये दौर देखते हैं। लेकिन कभी 'अमुक महिला को खाना नहीं बनाना', 'वो छुट्टी से हैं' या कुछ खिलंदड़ लोगों द्वारा टपांच दिन का टेस्ट मैचट जैसे शब्दों से इसकी असल सच्चाई और मुश्किल को ही उभरकर सामने नहीं आने देते। जब हम पीरियड्स का नाम लेने में ही इतने संकोची हैं तो इस पर बात क्या खाक कर सकेंगे। मेडिकल स्टोर पर कागज में लपेटकर पैड्स का दिया जाना, घर में प्रयोग किये जा चुके पैड्स को ठिकाने लगाने की मुश्किलें, किसी दूसरे कपड़े के नीचे अंडरगारमेंट्स या फ्रैश पेड्स छुपा कर रखना ये तमाम वे चीजें हैं जो इन विषयों पर कभी चर्चा ही न होने देंगी। और उचित जानकारी एवं समझ के अभाव में जो आधी अधूरी जानकारी से महिलाएं कदम उठायेंगी वो उनके लिये कई नई मुश्किलों को आमंत्रण देने वाली साबित होंगी। फिल्म में एक आंकड़ा पेश किया है कि देश में इस समय महज 12 से 15 प्रतिशत महिलाएं ही सैनेटरी पेैड्स का इस्तेमाल करती हैं तो आप खुद सोच सकते हैं कि देश की पिच्यासी फीसदी महिलाओं को हम किस दिशा में धकेल रहे हैं। इन वजहों से न जाने कितनी औरतें बांझ हो जाती हैं, कितनी असाध्य गुप्त रोगों के चंगुल में फंस जाती हैं और कई संक्रमण के कारण मर भी जाती हैं। जिसमें ग्रामीण भारत की स्थिति तो बेहद भयावह है। ऐसे अति आवश्यक विषय पर मौन रखते हुए हम महिलासशक्तिकरण या सशक्त भारत का सपना संजो रहे हैं। फिल्म में अक्षय का एक डॉयलॉग है- "बिग मैन, स्ट्रांग मैन नॉट मेकिंग कंट्री स्ट्रांग...वूमेन स्ट्रांग, मदर स्ट्रांग, सिस्टर स्ट्रांग देन कंट्री स्ट्रांग।

इस बदलाव के रास्ते में पुरुषों से ज्यादा समाज की रुढ़िवादी सोच में जकड़ी कई महिलाएं ही जिम्मेदार हैं जिन महिलाओं पर इस पितृसत्तात्मक समाज ने अनेक रिवाजों के बंधन थोप संस्कृति का संरक्षक होने का जिम्मा सौंप रखा है। कहने को बहू-बेटी एक समान है, कहने को घर का बेटा-बेटी समान है लेकिन इन रिश्तों के दरमियां पसरी हुई असमानता आसानी से महसूस की जा सकती है, यदि हम महसूस करना चाहें तो। लज्जा, औरत का गहना है, व्रतपरायणता, स्वामिधर्मिता, संस्कृति प्रसारिका जैसे न जाने कितने विशेषण लादकर हम उसे दबाये रखना चाहते हैं लेकिन इस संस्कृति-सभ्यता की दुहाई में हम उसकी नैसर्गिक उड़ान और चाहतों का ही गला घोंट रहे हैं... क्योंकि हम जानते हैं कि औरत अपनी क्षमता के साथ यदि बाहर आये तो इस पितृसत्तात्मक समाज की हवाई उड़ जायें। हम जानते हैं कि प्राकृतिक तौर पर औरत...एक पुरुष से ज्यादा सशक्त है। ऐसे में कैसे हम उसकी उड़ान को पंख दे सकते हैं। ध्यान रहे मैं यहां महिलासशक्तिकरण की शह लेते हुए स्त्री की उन आदतों या प्रदर्शन की पैरवी नहीं कर रहा हूँ जो एक पुरुष को भी शोभा नहीं देते। 

दायरे यदि स्त्री के लिये हैं तो पुरुष के लिये भी हैं लेकिन पुरुष की सोच में बदलाव के लिये तो कोई उपक्रम नहीं, पुरुष को संस्कृति-सभ्यता, धर्म-समाज, जात-बिरादरी का कोई लिहाज नहीं  इसलिये मर्यादा के नाम पर हर बेड़ी औरत के पैरों में ही बांध देना कोई न्याय नहीं है। हम नहीं जानते कि हमने इस दोहरी सोच के चलते खुद को विकास की राह में कितना पीछे कर लिया है। हम उन चीज़ों में ही उलझे पड़े हैं जिनसे हमें उस आदिम युग में ही बाहर निकल जाना था जब हमने पत्ते या जानवर की खाल, लिबास के तौर पर पहनना छोड़ा था। 

कालीन के नीचे धूल खा रहे इन तमाम विषयों पर से फिल्म ने रुढ़िवाद की धूल झाड़ने की कोशिश की है। अक्षय की अदाकारी और फिल्म का स्क्रीनप्ले इतना कमाल है कि दर्शक भी इस सिनेमाई कथ्य के प्रवाह में बहता नजर आता है। तमिलनाड़ू के अरुणाचलम् मुरुगुंथम के जीवन से प्रेरित फिल्म "पैडमैन" के लक्ष्मी के जरिये मुरुगुंथम के संघर्ष को भी समझा जा सकता है। वास्तव में ऐसे लोगों की ज़िद ही है जिसने समाज को नित नये नवोन्मेषों से समृद्ध बनाया है और ऐसी अधिकांश ज़िद की मूल वजह प्रेम ही रहा है। फिर चाहे वो पहाड़ तोड़ने वाले दशरथ मांझी हों या समाज में बहिष्कृत करार दिये गये 'पैड्स' के निर्माता मुरुगुंथम। फिल्म में एक संवाद कुछ इसी तरह है कि 'तुम्हारी फिक्र ने इस जिद को पैदा किया, अब जिद इस कदर बढ़ गई कि फिक्र ही कहीं खो गई'। ये जिद ही आविष्कारी लोगों को पागल बना देती है और फिल्म के अंत में अक्षय कहते भी हैं कि "यू थिंक आई मैड, बट मैड ऑनली बिकमिंग फैमस"। फिल्म के आखिर में अक्षय का टूटी फूटी अंग्रेजी में बोला गया गया संवाद..फिल्म का सार है और हिन्दी सिनेमा के कई अद्भुत क्लाईमैक्स दृश्यों में से एक बन पड़ा है।

ओवरऑल ये फिल्म एक कंप्लीट इंटरटैनिंग पैकेज है। जिसने समाज को जागरुक करने वाले सिनेमा के उस उद्देश्य को भी पूरा किया है जिसका जिक्र भारतीय सिनेमा के पितामह दादासाहेब फाल्के किया करते थे। लोंग-इलायची की तरह फिल्म में मौजूद अन्य चरित्र अभिनेताओं की अदाकारी भी कमाल है। अक्षय की फिल्म देख उनके उस कथन के मायने भी समझ आते हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पे कितना कमाती है ये मायने नहीं रखता, बस जिस उद्देश्य के लिये ये फिल्म बनी है वो पूरा हो जाये। अक्षय का इस व्यवसायिक सफलता के प्रति निर्मोही रवैया हमें तभी समझ आ गया था जब उन्होंने गणतंत्र दिवस की छुट्टीयों वाले वीकेंड से अपनी फिल्म को 'पद्मावत' के लिये सहर्ष हटाने को मंजूर कर लिया था। कुछ सालों पहले मैं कहा करता था कि अक्षय की पोटली में अरबी क्लब (100 करोड़ कमाई वाली) फिल्में भले बहुत हैं लेकिन उनके पास एक भी अदद महान् फिल्म नहीं है। लेकिन बीते सालों में एयरलिफ्ट, रुस्तम, टॉयलेट-एक प्रेम कथा और अब पैडमैन ने इस मिथक को तोड़ दिया है। उनकी आने वाली फिल्म "गोल्ड" की पहली झलक भी उम्मीद जगाती है।

खैर, उम्र के इस पड़ाव पर "मिंटिंग मनी" के व्यामोह से बाहर निकल देश-समाज के लिये कुछ खास करने और जीवन के असल अर्थ तलाशने के प्रति ही इंसान को उन्मुख होना चाहिये। सिनेमाई माध्यम से अक्षय शायद यहीं कर रहे हैं। हम बड़े फलक़ पर न सहीं, अपने आसपास तो एक सकारात्मक बदलाव ला ही सकते हैं। 

Wednesday, May 4, 2016

कालीन के नीचे छिपी सार्थकता के "फैन" बनाम चौंधियाती सफलता का "सन्नाटा"

बीती तीन मई को हिन्दी सिनेमा ने अपने एक सौ तीन वर्ष पूरे कर लिये हैं। एक सौ तीन वर्ष के हिन्दी सिनेमा में सफलता का प्रतिशत भी महज तीन ही होगा और सार्थक फिल्में भी बमुश्किल तीन फीसदी ही होंगी। इनमें ऐसी फिल्में जो सफल और सार्थक दोनों ही हों वे तो एक-आध प्रतिशत ही ढूंढने से मिल पायेंगी। लेकिन इन एक-दो फीसदी फिल्मों में ही सिनेमा की श्वांसे हैं और इन्हीं की दम पर सार्थक सिनेमा का हिरण व्यवसायिकता के जंगल में दौड़ पा रहा है।

सिनेमा के जनक दादा साहेब फाल्के कहा करते थे कि "यकीनन सिनेमा मनोरंजन का एक सशक्त माध्यम हैं लेकिन इसका उपयोग ज्ञानवर्धन और सामाजिक सरोकार के लिये भी किया जा सकता है" पर आज इस सिनेमा की सफलता और उद्देश्यों को नापने का एक मात्र जरिया इसकी व्यवसायिकता है। फिल्में रिलीज होने के कुछ घंटों बाद ही ये अटकलें शुरु हो जाती हैं कि अमुक फिल्म सौ करोड़ कमा पायेगी या नहीं...और कुछ घंटों बाद ही फिल्म की कमाई के ब्यौरों के आधार पर उसे सफल या असफल करार दे दिया जाता है। व्यवसायिकता के इस व्यामोह ने सिनेमा से कलापक्ष को बाहर निकाल फेंका है और उसे महज एक दुकान में तब्दील कर दिया है।

पिछले दो-तीन हफ्तों में रिलीज़ हुई कुछ फिल्में इस बात का बखूब उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। जय गंगाजल, फैन, बाग़ी जैसी फ़िल्में अपनी चमक का झूठा आभामंडल रचकर पहले तीन दिन में तीस-चालीस करोड़ का व्यवसाय करती हैं और अपनी भव्यता के फरेब़ में दर्शक को ठगती है जिससे दर्शक कालीन के नीचे खामोशी से श्वांस ले रहीं कई सार्थक फिल्में देखने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाता। यही वजह है कि अलीगढ़, जुबान, निल बटे सन्नाटा जैसी फिल्में दर्शकों के अभाव में एक सप्ताह भी सिनेमाघरों में टिकी नहीं रह पाती। बड़े बजट की सितारा सज्जित फिल्मों से इन सार्थक फिल्मों को इस मायने में भी नुकसान है कि प्रायः मल्टीप्लेक्स में बड़ी बजट फिल्मों के साथ लगी इन ऑफबीट फिल्मों के लिये सिनेमाघरों में टिकट दरें कम नहीं की जातीं और इन्हें भी बहुसितारा-बड़ी फिल्मों की टिकट दरों पर ही देखना होता है। जिससे आम दर्शक डेढ़ सौ, दो सौ रुपये खर्च कर इन फिल्मों को देखने का रिस्क नहीं लेना चाहता।

ऐसा सिर्फ इस वर्ष की इन कुछेक फिल्मों के साथ ही नहीं हुआ है इससे पहले भी डोर, उड़ान, दसविदानिया, चलो दिल्ली, लंचबॉक्स, इंग्लिश-विंग्लिश, बीए पास, क्वीन, मसान जैसी फिल्मों को भी अपेक्षाकृत सफलता नहीं मिली। मजेदार बात ये भी है कि उपरोक्त वर्णित इन फिल्मों की सफलता के बाद इनके निर्देशकों को फिल्म इंडस्ट्री ने नोटिस किया...इन फिल्मों को कई अवार्ड समारोहों में सराहा गया... बाद में इन तमाम फिल्मों के निर्देशकों को उनकी अगली फिल्म के लिये पिछली फिल्मों के दम पर बड़ा स्टार्ट मिला लेकिन उनमें से कई फिल्में एक बार फिर दर्शकों की उम्मीदों पर खरी न उतर सकीं। इसका सबसे बड़ा कारण यही रहा कि पहले वाली फिल्मों की सार्थकता को गौढ़ कर इन निर्देशकों ने अपनी अगली फिल्म को मसाला मनोरंजन के साथ पेश किया। इस व्यावसायिकता के आग्रह ने भले इन फिल्मों पर रुपयों की बरसात करवाई हो पर सार्थकता का पिपासु दर्शक एक बार फिर छला गया। इसके उदाहरण हमने बीते वर्ष काफी देखे जब पिछली फिल्मों से उम्मीद जगाने वाले निर्देशकों ने ऑल द बेस्ट, शानदार, बॉम्बे वेलवेट जैसे डिब्बों का निर्माण किया।

ये सारा दुख हालिया रिलीज़ 'निल बटे सन्नाटा' फिल्म में सूने पड़े सिनेमाघरों को देख पैदा हुआ है। बॉलीवुड की मौलिकता और इसके अपने खालिश अंदाज की प्रतिनिधि ये फिल्म, विदेशी फैक्ट्री के चुराये मसाला मनोरंजन "बाग़ी" से कमाई के मामले में पिछड़ गई। इस फिल्म को कई शहरों में सिनेमाघर ही नसीब नहीं हुए और जहाँ नसीब हुए भी वहां इसे दो-तीन दिन में ही या तो अपने शो कम करने पड़े या बाहर ही निकल जाना पड़ा। इस तरह से इन ऑफबीट फिल्मों का व्यवसायिकता में पिछड़ जाना कई दूसरे मायनों में भी घातक होता है। इससे इनके निर्देशक हतोत्साहित होते हैं और निर्माता भी ऐसी फिल्मों पर दाव नहीं खेलना चाहते। जिससे हम सिनेमा में सार्थक परंपरा को पनपने से पहले ही ख़त्म कर देते हैं।

बहरहाल, इस तमाम नकारात्मकता के बावजूद वे लोग बधाई के पात्र हैं जो इस रचनात्मकता के लिये अवकाश रखते हैं। 'निल बटे सन्नाटा' आज से सालों बाद भी हिन्दी सिनेमा का एक अहम् दस्तावेज माना जायेगा जबकि 'फैन' या 'बाग़ी' पर वक्त की धूल ज़रूर जमा होगी। नवोदित निर्देशक अश्विनी अय्यर तिवारी में अपार संभावना हैं उम्मीद करेंगे कि वे इस सार्थकता को आगे भी लेकर जायें। इस फिल्म के निर्माता और रांझणा, तनु वेड्स मनु जैसी फिल्मों के निर्देशक आनंद एल राय को भी बधाई जिन्होंने ऐसी फिल्म के निर्माण में सहयोग किया। साथ ही स्वरा भास्कर, रत्ना पाठक, पंकज त्रिपाठी को भी उनके शानदार अभिनय के लिये बधाई तथा ऐसी फिल्म के चुनाव के लिये साधुवाद।

एक बात समझना बहुत जरुरी है कि भारतीय सिनेमा प्रेम रतन धन पायो, दिलवाले, फैन या सिंह इस किंग टाइप अरबी क्लब (सौ करोड़ का क्लब) की फिल्मों से जीवंत नहीं रह सकता...इसे मसान, लंचबॉक्स और निल बटे सन्नाटा जैसी फिल्में ही ऑक्सीजन देती हैं और यही इसे जिंदा रखे हुए हैं।

Saturday, January 23, 2016

पैसे और प्रतिभा का सर्वोत्तम उपयोग...कि वो दूसरों के काम आये : एयरलिफ्ट

इन्फोसिस के संस्थापक एन. आर. नारायणमूर्ति ने अपनी पुस्तक में एक बेहद सुंदर बात कही है कि 'इस पूरे विश्व में आप अपने पैसे और हुनर का उपयोग दूसरों की मदद करने से बेहतर किसी दूसरी जगह नहीं कर सकते।' यदि आप दूसरों के मुकाबले ज्यादा भाग्यशाली है तथा पद, प्रतिष्ठा, पैसे और प्रतिभा में दूसरों से आगे हैं तो ये सब आपको सिर्फ और सिर्फ ऐसे उन तमाम लोगों के काम आने के लिये मिले हैं जो अपेक्षाकृत आपसे कम किस्मतवाले और कम संसाधन संपन्न है। सामर्थ्य होने के बाद प्राप्त जिम्मेदारी और सेवा की अनुभूति क्या होती है ये जानना है तो एयरलिफ्ट देखिये। 1990 में इराक और कुवैत युद्ध के दौरान हुए दुनिया के सबसे बड़े रेस्क्यु ऑपरेशन पर आधारित इस फिल्म में यकीनन कई काल्पनिक घटनाओं और पात्रों का समावेश किया है लेकिन जिस उद्देश्य और कथ्य को लेकर ये फिल्म आगे बढ़ती है वो सिनेमा माध्यम की सार्थकता और सशक्तता को अभिव्यक्त करती है।

हम अपने घरों में बैठ जब कभी भी सरकार द्वारा चलाये गये ऐसे रेस्क्यु ऑपरेशन के बारे में पढ़ते हैं या संकट में घिरे प्रवासी भारतीयों की खबरें टीवी पर देखते हैं तो कभी भी उन हालातों की गंभीरता को महसूस नहीं कर पाते लेकिन निर्देशक  राजा कृष्ण मेनन ने जिस संजीदगी और संवेदनशीलता के साथ इस फिल्म के दृश्यों को पिरोया है और उनमें जिस तरह से सिनेमाई बिम्बों का प्रयोग किया है वो हमें इन हालातों में फंसे होने का सा अहसास कराते हैं। एक तरह से देखा जाये तो यथार्थपरक घटनाओं पर बनी फिल्मों में ज्यादा नाटकीयता भरने की संभावना निर्देशक के पास नहीं होती...क्योंकि इन फिल्मों का क्लाइमेक्स पहले से जाहिर होता है। ऐसे में कॉन्फ्लिक्ट और रिसोल्युशन को दिखाने के लिये नूतन बिम्बों का इस्तेमाल ही निर्देशकीय कौशल को दिखाता है। फिल्म के अाखिरी मिनटों में प्रस्तुत दृश्य में जब रेस्क्यु कैंप के बाहर निर्धारित भारतीय प्रतिनिधि द्वारा भारतीय तिरंगे को लहराया जाता है तो यह दृश्य दर्शकों में चरम आवेश और राष्ट्रभावना का संचार करता है...इस दृश्य को ही क्लाइमेक्स और इसे ही फिल्म के कॉन्फ्लिक्ट का रिसोल्युशन निर्देशक ने बना दिया है। 

फिल्म में प्रस्तुत पात्र  रंजीत कात्याल सहित कई दूसरे लोगों के यथार्थ में होने पर निश्चित ही कई सवाल खड़े हो सकते हैं। यकीनन निर्देशक ने इन पात्रों को कल्पना की जमीं पर ही रूपांकित किया है और घटना के सिनेमाई प्रस्तुतिकरण के लिये इतनी आजादी हर निर्देशक के पास होती है लेकिन करीब 1 लाख 70 हजार लोगों को मुसीबत से निकालने वाले इतने बड़े रेस्क्यु ऑपरेशन के दौरान असल में कोई  हीरो न रहा हो  ऐसा नहीं हो सकता। जरुरी नहीं कि वो रंजीत कात्याल जैसा कोई बिजनेसमेन हो या कोहली जैसा कोई सरकारी बाबू। लेकिन कोई न कोई इन जैसा जरूर रहा होगा जिसने बिना किसी सम्मान या पहचान की चाह के अपनी लायकात, पद या सामर्थ्य का उपयोग सेवा, समर्पण और हालातों से निपटने में किया होगा। 59 दिन तक 500 से ज्यादा फ्लाइट्स से लोगों के निकालने वाले इस मिशन में उन पायलट्स, एयर कमांडोस और उन फ्लाइट्स में सवार क्रू मेंबर की भूमिका को क्या कम कर आंका जा सकता है जो उन मुश्किल हालातों के बावजूद इस रेस्क्यु ऑपरेशन में शरीक़़ हुए थे। वास्तव में दूसरों के लिये कुछ कर गुजरने के भाव रखने वाले, ऐसे लोगों की वजह से ही ये दुनिया रहने लायक है।

निर्देशक राजा कृष्ण मोहन इस फिल्म के बाद ख्यात फिल्मकारों की श्रेणी में शुमार हो जायेंगे। इससे पहले  'बस यूं ही' और 'बारह आना' जैसी दो फिल्में ही उन्होंने बनाई है। लेकिन इस फिल्म के जरिये निर्माता निखिल आडवाणी और सह निर्माता अक्षय कुमार ने उन पर विश्वास जताकर अद्बुत काम किया है। फिल्म में कहीं भी बॉलीवुडनुमा अतिरेक नहीं है...न अनावश्यक संवाद ठुंसे गये हैं न हीं एक्शन दृश्य। ऐसी कहानियों में गीत-संगीत की जरुरत नहीं होती जैसा हमने 'बेबी' फिल्म में देखा था लेकिन इस फिल्म में गानों का प्रयोग कहीं भी फिल्म की गति को बाधा नहीं पहुंचाता और वे पार्श्व में घटना को आगे बढ़ाते ही प्रतीत होते हैं। युद्ध के दृश्यों को काफी जीवंतता के साथ फिल्माया गया है। अपना वतन, अपनी जमीं और अपने लोगों के बीच रहने का सुख क्या होता है इस महसूसियत को प्रस्तुत करने में निर्देशक ने स्क्रीन के हर हिस्से का इस्तेमाल किया है। गोया कि सिनेमेटोग्राफर ने स्क्रीनप्ले के अनुरूप पात्रों के ज़ेहन में उतरकर निर्देशकीय उद्देश्यों को परदे पर उतारा है। 

वहीं यदि अभिनय की बात की जाये तो ये अक्षय कुमार के सर्वोत्तम अभिनय में से एक है और इसे वे अपने करियर की श्रेष्ठ फिल्मों में सबसे ऊपर रखना पसंद करेंगे। अक्षय ने अपने करियर में बिना किसी बड़े बैनर से जुड़कर जो नाम स्थापित किया है वो काबिले तारीफ है। नये और कम प्रतिष्ठित फिल्मकारों के साथ काम करने की परंपरा को अक्षय ने 'एयरलिफ्ट' में भी निभाया है। यही वजह है कि पचास से भी कम सफलता प्रतिशत के बावजूद अक्षय इतने सालों बाद भी आज खुद को इंडस्ट्री में बनाये हुए हैं। अक्षय के अलावा अौर जो दूसरे कलाकार हैं उन्होंने भी अपने-अपने हिस्से के किरदार को पूरी ईमानदारी से अभिनीत किया है। बाकी कथानक को प्रगट करना इस पोस्ट का उद्देश्य नहीं है उसके लिये तो फिल्म को ही देखा जाना चाहिये।

लिजलिजी भावुकता, फूहड़ हास्य और अतार्किक अतिरेकपूर्ण एक्शन फिल्मी कचरे के परे संदेशपरक तथा संवेदनशील सिनेमा के शौकीन लोगों के लिये 'एयरलिफ्ट' एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। जिसे सिर्फ देखे नहीं, पढ़े जाने की आवश्यकता है।

Tuesday, December 1, 2015

ज़िंदगी के रंगमंच पे भरमाये जज़्बातों का 'तमाशा'

दिल ये संभल जाये, हर ग़म फिसल जाये और पलकें झपकते ही दिन ये निकल जाये...शायद यही और इतनी सी ही तो है जिंदगी की जद्दोज़हद। बेवश, लाचार और संघर्ष से लबरेज जिंदगी में चंद सुकूं के पल पाना और उन पलों की निरंतरता को बनाये रखना। क्यूं उड़े कोई पंछी गगन में गर उसे सब कुछ मिले अपने बनाये घरोंदे में...क्यूं दौड़े मरुस्थल में हिरण, गर मिल बैठे उसे अपनी ही जगह पे बेइंतहा नीर...आखिर क्यूं दौड़ाये कोई अपने कदम डगर-डगर, गर चैन मिल जाये उसे अपने ही आशियां में। आखिर कहां, किस डगर और किस नगर में मिलेगा हमारा अपना चैन। क्या बदलें, कहाँ ठहरें, किसे छोड़े और किसे अपनाये जिससे मिले हमारा-अपना चैन। इस अंधी खोज से ही पैदा हुए हैं सभी धर्म-दर्शन, काबा-काशी, बुद्ध-वीर, शिव-जीसस और खुदा। एक उधेड़बुन मिटाने के लिये हमने ये सब बनाये थे पर इनके कारण मेरी-तेरी-हमारी एक और उधेड़बुन शुरु हो गई...और इस तरह खोज में खोजने वाला ही खो गया। तमाशे के किरदार, तमाशा निभाते-निभाते अपना असल परिचय ही भूल गये।

इम्तियाज अली निर्देशित, रणबीर-दीपिका अभिनीत 'तमाशा' कुछ ऐसी ही दार्शनिक उधेड़बुन के पटल पर, भरमाये जज़्बातों वाले उलझे रिश्तों को सुलझाने की एक कहानी है। मसलन जो दिख रहा है वो नहीं है। इस सभ्यता और तथाकथित शिष्टाचार के मिलावटी-झूठे रंगों ने व्यक्ति के असल रंग को ही दबा दिया है। दिल में अधाह व्यग्रता और बेवशी की आग होने के बावजूद इंसां मुस्कुरा रहा है। जैसा ये मानव वाकई में चाहता है वैसा कोई नहीं जी रहा है बल्कि सबने अपना जीवन उस अनुरूप गढ़ लिया है जैसा ये जमाना चाहता है। समझौता, हर तरफ सिर्फ समझौता...अपने अहसासों में, रिश्तों में, करियर में, जीवन के हर कदम पे। इंसान का ये समझौता वो कॉम्प्रोमाइज या त्याग वाला समझौता नहीं है बल्कि ये 'क्या कहेंगे लोग' के डर और अपने मिथ्या प्रदर्शन की भावना के कारण मानवीय कमजोरी वाला समझौता है। इस कमजोरी के चलते हम किसी और की चंद झूठी तारीफों के लिये अपना एक जीवन यूंही तबाह कर देते हैं।

'तमाशा' में भी इम्तियाज की अन्य फ़िल्मों की तरह किरदार बहुत कन्फ्यूज हैं और उनका कन्फ्यूजन फिल्म के अंतिम फ्रेम तक पहुंचते-पहुंचते ही दूर होता है। फिल्म ने किस्सागोई की पुरानी परंपरा को एक मर्तबा फिर जीवित करने की कोशिश की है और कहानियों से इंसान के निर्माण को इम्तियाज ने बखूब बयान किया है। गोयाकि दुनिया की सारी कहानियां एक जैसी हैं बस परिस्थितियां बदली हैं। हीर-रांझा, सीरी-फरियाद, लैला मजनू, राम-सीता, राधा-कृष्ण सभी कहानियां एक जैसे अहसासों से जुड़ी हैं बस मिलन और विरह की वजह बदलती गई हैं। हम चाहें तो इन कहानियों में अपनी कहानी को खोज लें लेकिन उन कहानियों में अपनी ज़िंदगी का रिसोल्युशन या उपसंहार तलाशें तो वो कोरी मूर्खता होगी...हमारी कहानी का रिसोल्युशन हमारा दिल जानता है। बस उसे सभी तरह के भय, लालच या अहंकार से परे देखना जरुरी है। जो उसे देखकर, पहचानकर बस उसे ही चाहते हैं उन्हें वो जरूर मिलता है। जैसा कि इम्तियाज की 'जब वी मेट' में गीत (करीना कपूर) कहती है जो हम एक्चयुअल में चाहते हैं...रियल में, हमे वोही मिलता है"। गर कुछ नहीं मिला है तो हमारी चाहत में ऐब है, ठगी है।

इम्तियाज के पास हमारे समय की सबसे ईमानदार प्रेम कहानियां हैं और वह होना बड़ी बात नहीं है क्युंकि वे और भी बहुतों के पास हैं लेकिन बड़ी बात ये है कि इम्तियाज के पास उनका ईमानदार ट्रीटमेंट भी है। ज़िंदगी में जबरदस्ती का कोई काम ही नहीं है। इसके साथ खींचतान नहीं चल सकती। जो पसंद है वो पसंद है जो नहीं तो नहीं। कुछ भी अनावश्यक प्रयत्न पूर्वक नहीं कराया जा सकता क्योंकि जिन आदतों को हम प्रयत्नपूर्वक पालते हैं बाद में वही हमारा भाग्य बन जाती हैैं और हम उनके दास। इसलिये प्रयत्नों का प्रवाह सहज रुचि के अनुरूप बहने देना जरुरी है किंतु उन रुचियों पर बाहरी प्रभाव नहीं पड़ना चाहिये। पसंद-नापसंद का भी नितांत नैसर्गिक रहना जरुरी है और इस सहजता के साथ इंसान जहाँ जायेगा वहाँ अपनी असल मंजिल पायेगा। तब वो मंजिल पे पहुंचने का मजा तो लेगा ही, सफर का मजा भी लेगा। बहरहाल, इम्तियाज के निर्देशकीय कौशल पर पहले भी ज़िंदगी के हाईवे पे जज़्बातों का ओवरटेक कराता फ़िल्मकार और प्यार का सुर और दर्द का राग : रॉकस्टार नामक पोस्ट में काफी कुछ कह चुका हूँ। इसलिये यहाँ रुकता हूं।

इस सबके परे 'तमाशा' एक दर्शनीय फ़िल्म है। इम्तियाज की कमजोर फ़िल्मों में भी उनके दार्शनिक दृष्टिकोण की झलक देखने मिलती है तथा वो बहुत ही विरले किसी और निर्देशक में नजर आती है। बेशक, ये फिल्म  प्रस्तुतिकरण के मामले में इम्तियाज की कुछ पिछली फिल्मों की तुलना में कमजोर है पर इसके सुर में कोई फर्क नहीं है। अभिनय के मामले में रणबीर, दीपिका ने कमाल किया है तथा चंद छोटे दृश्यों में नजर आये पीयुष मिश्रा फिल्म के असल प्राण है, कहना चाहिये कि इस तमाशे के सूत्रधार वही जान पड़ते हैं। लोकेशंस शानदार हैं और सिनेमेटोग्राफी कुछ ऐसी है मानो हमारे घरों की सुंदरता बढ़ाने वाली प्राकृतिक सौंदर्य से युक्त सीनरियों के सामने ही फिल्म के पात्रों को बिठाके कथा बुनी हो। संगीत के लिये ज्यादा स्पेस नहीं है लेकिन जो दो-तीन गाने हैं उनमें ए आर रहमान ने अपनी प्रतिभा का भलीभांति परिचय दिया है। 'तुम साथ हो' गीत में भी हम इम्तियाज की पिछली फिल्मों वाले 'तुमसे ही', 'तुम हो साथ मेरे', 'तू साथ है तो दिन रात है' जैसे गीतों वाली मधुरता देखने मिलती हैं।

फिल्म में इश्क के बिछोह से पैदा तड़प और मिलन के बाद की खुशी को गहरे तक ऑब्जर्व करके इम्तियाज ने दिखाया है। सोचा न था, जब वी मेट, लव आजकल, रॉकस्टार और हाईवे में जो कुछ कहना रह गया था उसे ही इम्तियाज ने आगे बढ़ाया है। इम्तियाज भी गजब के किस्सागो है जहाँ भले उनके पात्र बदल रहे हैं, रंगमंच और उसकी पृष्ठभूमि बदल रही है लेकिन कहानी एक ही है..पर उस एक जैसी कहानी में हर बार कुछ नयापन है...असल में यही तो कहानीकार की खूबी होती है।

Sunday, June 14, 2015

खूबसूरत बाग में सूखे पत्तों की अहमियत : हमारी अधूरी कहानी

आवारगी, बंजारगी, दीवानगी...ये वो लफ़्ज हैं जो कई मर्तबा समझदारी से ज्यादा मजा देते हैं। समझ हमेशा समझौतों के लिये उकसाती है और दिल हमेशा बने-बनाये नियमों के परे खुले गगन में उड़ने को प्रेरित करता है। दिल की इस स्वच्छंद चाल को बांधने के लिये हमने अनेक परंपराएं, रिवाज़, दायरे और सरहदें खड़ी की है और जीवन को किसी न किसी तरह गुलाम बनाये रखने के ही जतन किये हैं। धर्म, सभ्यता, संस्कार जैसे लफ़्जों से कई मर्तबा हम अपनी पोंगापंथी की ही पैरवी करते नज़र आते हैं और ये सब व्यक्ति को बेहतर बनाने के बजाय उसे दकियानूस ही बनाये रखते हैं हम पढ़-लिखकर भी मूर्ख बने रहते हैं। तथाकथित रीति-नीतियों के नाम पर जकड़े रहते हैं किन्हीं अमूर्त बंधनों में।

और फिर यकायक कौंधती है दिल में प्रेम की बिजली और टूट जाती हैं सरहदें..मिटने लगती हैं सारी परंपरायें..कांप उठती है सभ्यता...दी जाने लगती हैं दलीलें प्रेम का गला घोंटने, कभी समाजों की तो कभी रिवाजो की। प्रेम स्वाभाविक तौर पर आजादी का हिमायती है...स्त्री की आजादी प्रेम में ही छुपी है। प्रेम पर बंदिश लगाकर समाज ने आधी आबादी को दबाये रखने के ही जतन किये हैं। गर स्त्री प्रेम करने लगी तो वो आजाद हो जायेगी, बन जायेगी सशक्त और अपनी सहज शक्तिसंपन्नता से गिरा देगी पौरुष के तमाम रेतीले महल। तो अच्छा है रोक लिया जाये...चाहे जैसे भी उसे प्रेम करने से।

हमारी अधूरी कहानी। दीवानगी और आवारगी की ऐसी ही एक प्रेम कहानी है। जो हर कहानी की तरह अधूरी रहकर भी पूरी है। प्रेम का अधूरापन ही उसकी पूर्णता है। प्रेम, वही है जो मंजिल पर नहीं पहुंचा क्योंकि प्रेम का कोई गंतव्य होता ही नहीं है। मंजिल, ठहराव का नाम है और जहाँ ठहराव है वहां प्रेम दम तोड़ देता है। प्रेम की गति, निरंतर बना रहने वाला प्रवाह ही उसका जीवन है। इश्क़ रास्तों में ही बसर करता है जब भी वो कहीं पहुंच जाता है बस वहीं ये ख़त्म हो जाता है। संपूर्णता एक भ्रम है और इस भ्रम में ही प्रेम का जीवन। 

प्रेम की यही चिरंतन कमी इसकी  खूबसूरती है। ये खिले गुलाबों में नहीं मुरझाये पत्तों में बसता है लेकिन वहां बसकर भी ये उन पत्तों में महक बिखेर देता है। जब कोई प्रेम में होता है तो सब अच्छा लगता है। खुद को लुटाकर भी हम खुद को पा जाते हैं। प्रेम करने को जीवन की कमी समझा जाता है लेकिन इसी कमी से जीवन पूरा होता है। हाँ ये दर्द देता है, आंसू देता है पर आंसूओं और ग़म से ही जीवन बनता है। बड़ा बदनसीब है वो शख़्स जिसने कभी दर्द को महसूस नहीं कया और बड़ी सूखी हैं वो आंखें जो कभी आंसूओं से नम नहीं हुई।

लेकिन कमी भला किसे पसंद है और हम अपनी सारी बुद्धिमत्ता से एक ऐसा जीवन रचना चाहते हैं जिसमें सिर्फ समृद्धि हो, खुशी हो। हम ऐसा बाग चाहते हैं जहाँ हर तरफ बस खिले फूल हों कोई कांटे नहीं, कोई सूखा पत्ता नहीं। पर एक बाग तभी अपनी सहज प्रकृति के साथ जीवित रह सकता है जिसमें खिले फूलों के साथ राह में बिखरे सूखे पत्ते भी पड़े हों। कमियां, अधूरापन इनसे ही खूबसूरती बनती है बेदाग चीज़ कभी खूबसूरत नहीं होती। दरअसल, जीवन की सबसे बड़ी कमी ही ये है कि हम दुनिया में कोई ऐसी चीज़ तलाशते हैं जिसमें कोई कमी न हो।

मोहित सूरी की ये बेहतरीन फ़िल्म प्रेम की दबी पड़ी कई परतों को उधेड़ती है। कई अहसासों को टटोलती है और साथ ही सभ्य समाज से इस पर बंदिशें लगाने के विरोध में कई सवाल भी करती है। फ़िल्म का कथ्य यहाँ प्रकट करना मेरा उद्देश्य नहीं क्योंकि उसके लिये फ़िल्म को देखा जाये वो ही बेहतर है। यहाँ तो बस फ़िल्म को देख मेरे मन में उठे जज़्बातों को बयां करने की कोशिश की है। 

महेश भट्ट का संग पा मोहित अपनी इस कृति में प्रेम की गहराई को छूते हैं। महेश भट्ट और शगुफ्ता रफीक़ की कलम फ़िल्म की असल जान है और फ़िल्म के संवाद असल अभिनेता। जिन्हें निभाते हुए विद्या बालन और इमरान हाशमी भी अपने करियर का उत्कृष्ट अभिनय करते नजर आते हैं। मोहित की पिछली फ़िल्म आशिकी टू और एक विलेन की लिजलिजी और अतार्किक भावुकता से फिल्म बहुत दूर है। मोहित की बजाय महेश भट्ट का असर फिल्म पर साफ परिलक्षित होता है। संगीत, मोहित की बाकी फ़िल्मों की तरह उनकी प्रतिष्ठा के अनुरूप है। कई दृश्य लंबे और धीमे होने से उबाऊ लगते हैं पर यह कमियां फ़िल्म के कथ्य और उद्देश्य के आगे नजरअंदाज करने लायक है। 

बहरहाल, दिमाग से फ़िल्म देखने की जरुरत नहीं है और न ही प्रेम की देखी-पढ़ी-समझी-सुनी परिभाषाओं के अनुसार पूर्वागृही होते हुए ये फिल्म देखें। बस, महसूस किये उन अहसासों को समेट फिल्म देखिये जिनके साथ कभी आपने प्रेम किया हो या कर रहे हों। यकीन मानिये समझदारी और संपन्नत्ता से परे आप खुद को पागलपन और आवारगी के साथ ही खुशनसीब समझेंगे।

Tuesday, June 9, 2015

समाज के दो भिन्न ध्रुवों पर खड़ी नारियों का प्रतीक : तनुजा और कुसुम

'तनु वेड्स मनु रिटर्न्स' हिन्दी सिनेमा के बेहतरीन दस्तावेजों में शुमार हो रही है। फिल्म में बला की ताजगी है कि टीवी पे नजर आने वाली इसकी क्षणिकाएं बारंबार देखे जाने पर भी आपका मन मोह लेती हैं। कहना चाहिये कि ऐसी फ़िल्में बनाई नहीं जाती बल्कि बन जाती हैं। जिन्हें देखते समय जो आनंद हम महसूस करते हैं वो तो अपनी जगह है पर देखे जाने के लंबे समय बाद ये कुछ ज्यादा ही रस देती हैं। हरियाणवी कुसुम का किरदार सिनेमा के स्वर्णिम इतिहास में निश्चित ही जगह लेगा। गोयाकि किरदार ने कलाकार को गौढ़ कर दिया है और दत्तो के किरदार से तनुजा के पराजय वाले दृश्य को देख कंगना रानौत शायद खुद भूल जायेंगी कि इन दोनों भूमिकाओँ में वे स्वयं अभिनय कर रही हैं।


बहरहाल, हास्य और मनोरंजन के परे भी इस फ़िल्म में कई संगीन अर्थ है। जिनकी हर कोई अपने हिसाब से व्याख्या कर सकता है। फिलहाल यहाँ तनुजा और कुसुम के जरिये भारतीय समाज मेंं नारी दृष्टिकोण के दो भिन्न पक्षों पर मंथन करने को जी चाह रहा है।  तनुजा और कुसुम (दत्तो) महज दो महिलाएं ही नहीं बल्कि दो संस्कृतियां हैं। समाज के दो विरुद्ध ध्रुव हैं। दो अलग सोच हैं जिन पर समाज ने नारी के तमाम Do's & Don'ts तय कर रखे हैं।

तनुजा जहाँ उन तमाम नारियों की प्रतिनिधि है जो भले अपने अरमानों को पंख देती हैं लेकिन दृष्टिकोण के अभाव में जो रास्ता चुनती हैं वो नारीत्व की संजीदगी को उससे कोसों दूर कर देती है। वो आजादख़याल वाली होके भी जिस्म की नुमाइश ही करती नज़र आती है और गाहे-बगाहे खुद को एक वस्तु के तौर पर ही प्रस्तुत करती है। अपने बौद्धिक-भावनात्मक अस्तित्व के परे उसे अपने तन का ही गुरूर है, छद्म आधुनिकता के कलेवर में लिपटी वो मेकअप-ड्रेसिंग और बाहरी आडंबर को ही सब कुछ मान बैठी है और चर्म के मिथ्या उपासक  इस पितृसत्तात्मक समाज में वो अपने ज़िंदा माँस के लोथड़े से जिस्म के भूखे गीदड़ो को लुभाती है। इसके लिये कभी-कभी उसे प्रेम का लॉलीपॉप कुछ पुरुषों द्वारा पकड़ा दिया जाता है। ये वो महिला है जिसकी यूएसपी ब्वॉयफ्रेंड की संख्या से बढ़ती है और फ्लर्टिंग के मार्केट में कमर्शियल डिमांड में इजाफा होता है।

तनु समाज की उस सोच का भी प्रतीक है जो औरत के सेटलमेंट को शादी, हसबेंड, बच्चों तक सीमित मानती हैं। जहाँ उसके बदन को ही उसका वतन माना जाता है। जहाँ खूबसूरती सबसे बड़ा वरदान और समाज द्वारा निर्धारित बदसूरती के मापदण्ड सबसे बड़ा अभिशाप है। जिस समाज का उच्च शिक्षित वर्ग भी आईएएस, डॉक्टर, इंजीनियर या फिर कोई एनआरआई बनने की तमन्ना महज इसलिये पालता है कि इससे उसका विवाह किसी दैहिक सौंदर्य संयुक्त महिला से हो जायेगा और वर्ग-बिरादरी में उसकी मिथ्या प्रतिष्ठा में कुछ स्टार और चस्पा हो जायेंगे। इस सोच से पुरुष अपनी भौतिक उपलब्धियों से मनचाही महिला पाता रहेगा और किसी पद-पैसे-प्रतिष्ठा वाले पुरुष की प्राप्ति को ही महिला की उपलब्धि समझा जायेगा। जिस समाज में महिला का अपना कोई वजूद नहीं, वो पिता-पति और आखिर में पुत्र से ही अपना अस्तित्व गढ़ेगी, यही उसका सौभाग्य माना जायेगा और इसे ही उसके संस्कार कहकर महिमामंडित किया जायेगा।

दूसरी ओर एक देहाती कुसुम का किरदार है। अपने अरमानों को पंख यह भी देती है लेकिन इसकी कोशिश किसी के साये तले अपना वजूद तलाशने की नहीं, बल्कि खुद की पहचान स्थापित करने की है। ये प्रेम को इसलिये नकारती है कि उसकी इस आशिक़ी की नज़ीर कई दूसरी महिलाओं को खुले गगन में उड़ने से रोक सकती हैं और उसका प्रेम सैंकड़ो आजाद ख़याल महिलाओं के चरित्र पर लांछन लगा सकता है। ये वो महिला है जो प्रेम के लिये समाज की रुढ़िवादी सोच के सामने सीना ताने खड़ी हो जाती है और सांत्वना स्वरूप मिली लिजलिजी प्रेम की भावनाओं को ठुकरा भी देती है। फिल्म के आखिर में कुसुम का खुद को एथलेटिक्स बताते हुए कहना कि या तो उसे फर्स्ट आना पसंद है या हार जाना, पर खैरात में मिली सांत्वना की वो कतई आकांक्षी नहीं। यह सोच ही उसे शक्तिस्वरूपा बनाती है। ये वो लड़की है जो आंसू भी बहाती है और ज़रूरत पड़ने पर लोगों के कबूतर भी उड़ाती है। 

ये उस नारी का प्रतीक है जो तथाकथित मॉडर्न नहीं है पर इसे निभाना भी आता है और ज़रूरत पड़ने पर मिटाना भी। ये जोड़ना भी जानती है और तोड़ना भी। जो खुद को सहेज सकती है, बच्चे पाल सकती है और मौका आने पर घर भी चला सकती है। कुसुम छोटे शहरों और देश के गांवों में पल रही उन दबी आकांक्षाओं का प्रतीक है जिनका दहकता लावा रस्म ओ रिवाज़ की कालिख से ठंडा नहीं पड़ता। जिसके सपने छत पर सूख रहे उन कपड़ो की तरह नहीं है जो शाम होते-होते उतार लिये जाते हैं। शादी-बच्चे, घर-परिवार इसके हौसले को पस्त नहीं करते। ये भले एक तरफ पत्नी है, माँ है पर दूसरी तरफ कोई स्पोर्ट्स वूमन, डॉक्टर, साइंटिस्ट, इंडस्ट्रिलिस्ट, आईएएस, आईपीएस या किसी संस्था-संगठन की प्रधान भी है। इसकी निगाहों में दोहरा पैनापन है जो सिर्फ दिल ही नहीं चुरातीं बल्कि अब डराती भी हैं।

तनु वेड्स मनु, पीकू, क्वीन, मैरीकॉम, कहानी जैसी पिछले कुछ वर्षों में आई फ़िल्मों ने महिला के जिस बदले स्वरूप को मुखर किया है वो काबिलेतारीफ है। अब हमारे सिनेमा की नायिका पेड़ों के ईर्द-गिर्द आशिकी फरमाने या गुंडों के बीच असहाय घिरे होने पर नायक को अपनी मर्दानगी दिखाने का मौका देने के लिये ही नहीं है बल्कि अब इसने ब्युटी पार्लर के साथ-साथ जिम जाना भी शुरु कर दिया है। इसके पास जादूई क्लिप है जिससे ये बाल भी बांधती है और दूसरों के सिर भी खोलती है। क्लासरूम के अंदर, किताबों के बीच अब यह लव लेटर ही एक्सचेंज नहीं करती बल्कि उनके जरिये इसने नेवी, एयरफोर्स जैसे पुरुष वर्चस्व वाले क्षेत्रों में दस्तक दे दी है। हाँ कुछ पोंगापंथी, धर्मभीरुता, परंपरा और रुढ़िवाद के मेघ अब भी हैं जो इस प्रभातमा की आभा को खुलकर सामने नहीं आने दे रहे...पर क्षितिज के किसी कोने पर ये निरंतर रोशनी बिखेर रही है। आधी आबादी का सच यही है...वो नहीं, जिसे तुमने बंधनों में जकड़ रखा है।

Monday, May 25, 2015

सार्थक मनोरंजन की वेदी पे फूटी सृजन की कोपल : तनु वेड्स मनु रिटर्न्स

बॉक्स ऑफिस आनंद एल. राय की बेहतरीन रचनाधर्मिता से गुलजार है। 'तनु वेड्स मनु' अपने पिछले संस्करण से ज्यादा ताजगी, नयापन और सार्थकता के साथ वापस लौटी है। मनोरंजन के गलियारे में सार्थक हास्य धूम मचा रहा है। विवाह और प्रेम की उधेड़बुन हास्य की चासनी में प्रस्तुत है साथ ही ये फिल्म बातों बातों में समाज से कई ज्वलंत प्रश्न भी कर लेती है और हिन्दुस्तान के कई राज्यों और कई समाजों में रची-पची पितृसत्तात्मक सोच पर बड़े प्यार से तमाचा मारती है।


आनंद राय ने कथा को अपने प्रस्तावित उद्देश्य तक ले जाने के लिये इस बार तनु के साथ दत्तो का भी साथ लिया है और दोनों ही किरदारो में कंगना के अभिनय ने एकतरफा साम्राज्य किया है। 'क्वीन' के बाद अब 'तनु वेड्स मनु' ने कंगना को चोटी पर विराजी समकालीन अभिनेत्रियों की श्रेणी में ला खड़ा किया है और कई मामलों में वे मौजूदा दौर की अभिनेत्रियों से भी ऊपर पहुंच गई हैं। कंगना के अभिनय कौशल के लिये अलग लेख की दरकार है फिलहाल बात को निर्देशक आनंद एल राय और तनु वेड्स मनु तक सीमित रखते हैं। 

आनंद राय की फ़िल्में मनोरंजन की तीव्र आग्रही हैं लेकिन मनोरंजन के चलते कभी सार्थक विमर्श गौढ़ नहीं होता। मसलन, रांझणा जैसी विशुद्ध मनोरंजक फ़िल्म प्रेम, धर्म और राजनीति की परतों को उधेड़ते हुए, उनके बीच पल रहे सुप्त मानवीय अहसासों और प्रवृत्तियों को बाहर लाती है लेकिन इस प्रयास के बीच यह कहीं भी गंभीर नहीं होती। आनंद का सिनेमा किसी भी तरह के भारी भरकम संवादों का सहारा लिये बिना गहरी बात कहता है और ऐसा ही तनु वेड्स मनु रिटर्न्स में देखा जा सकता है। 

आनंद की नायिका अल्हड़ होती है, वो नियमों को तोड़ती है और भारतीय समाज में प्रस्तुत पारंपरिक महिला की छवि को तोड़ते हुए वो करती है जो वह करना चाहती है। लेकिन बावजूद इसके प्रेम की संजीदगी उसी शिद्दत से महसूस करती है जैसी किसी भी दूसरी महिला के हृदय में होती है। प्रेम को लेकर वो कन्फ्यूस होती है पर तमाम संशयात्मक विचारों के बावजूद उसके मन का मोर वहीं जाकर आसरा पाता है जिसे उसने अपना सर्वस्व सौंपा है। वो बेवफा हो सकती है पर बदचलन नहीं। पर समाज महिला की तात्कालिक परिस्थितियों से पैदा बेवफाई को उसके चरित्र से जोड़ देता है और उसे कुल्टा, कुलच्छिनी जैसे सैंकड़ो दुर्नामों से संबोधित किया जाता है।

तनु वेड्स मनु या रांझणा जैसी फिल्मों की सफलता की अहम् वजह इनका मिट्टी से जुड़ा होना है। ये कहानियां किसी कल्पनालोक के आदर्श गगन में विचरण नहीं करती बल्कि हमारे आसपास के यथार्थ को ही प्रस्तुत करती हैं। प्रसिद्ध फिल्म समालोचक जयप्रकाश चौकसे इस बारे में कहते हैं 'हर देश का विशुद्ध देशज सिनेमा ही सार्थक होता है और आनंद राय, तिग्मांशु धुलिया, सुजॉय घोष और अजय बहल जैसे फिल्मकारों के सक्रिय रहते हॉलीवुड का अश्वमेघ भारत में कभी सफल नहीं होगा। सारी तकनीकी चकाचौंध हरियाणवी कुसुम से पराजित होगी। एक करोड़ चौंतीस लाख अप्रवासी भारतीय लोगों की डॉलर ताकत के कारण भारतीय शिक्षा के पाठ्यक्रम में पश्चिम की भौंडी नकल प्रस्तुत है। इसी कारण हमारा युवा दर्शक फास्ट और फ्युरियस हो गया है और स्वयं को एवेन्जर मान बैठा है।' पश्चिमी मीडिया और शिक्षा के प्रभाव के चलते देश में सांस्कृतिक साम्राज्यवाद की स्थिति है। यही वजह है कि पिज्जा और वर्गर की उपासक इस संस्कृति के मन में रोटी के प्रति उपेक्षाभाव है। हॉलीवुड फ़िल्मों की दीवानगी जता हम खुद को मॉडर्न साबित करना चाह रहे हैं।

फिल्म में ठेठ हरियाणवी कुसुम अपनी वाक्पटुता से अति वाचाल तनुजा का भी मूंह बंद कर देती है और बताती है कि शक्ति का संचार सिर्फ विलायती परिवेश के संपर्क से ही पैदा नहीं होता, हम जड़ों से जुड़े रहकर भी असीम सामर्थ्यवान हो सकते हैं। भारतीय नारी अनादि से अपनी माटी से जुड़ी रहकर ही शक्तिस्वरूपा है यह तो विदेशी प्रभाव है  जिसके कारण वह कॉकरोच देख किसी पुरुष को आवाज देती है। कुसुम आंसू बहाती है और ज़रूरत पड़ने पर कनपटी पे हाथ भी चलाती है। पर आंसू बहाते हुए वो कतई कमजोर नहीं होती और हाथ चलाते वक्त वो असंवेदनशील नहीं होती। आंसू और संवेदनशीलता मजबूती का प्रतीक हैं, कमजोरी तो अपने जज़्बात छुपाने और गुस्सा दिखाने से बयां होती है। मनु को तनु से मिलाते वक्त कुसुम खुद को एथलेटिक्स बताते हुए भीख में मिली सांत्वना लेने से इंकार करती है लेकिन अपने प्रेम के न मिल पाने के कारण छुपकर आंसू भी बहाती है। निर्देशक का प्रस्तुतिकरण कुछ ऐसा है कि इन दोनों ही प्रकरणों में कुसुम की मजबूती ही प्रदर्शित होती है कमजोरी नहीं।

आनंद की पिछली फिल्में रांझणा और तनु वेड्स मनु (प्रथम) तो कहीं-कहीं कमजोर होती हुई भी प्रतीत होती थीं पर तनु वेड्स मनु रिटर्न्स में ऐसा नहीं है। माधवन का अभिनय संजीदा है और किरदार के अनुरूप यही उनसे दरकार थी। संवादों से ज्यादा उन्हें अपने चेहरे से अभिनय करना था लेकिन इस बीच कहीं भी अति नाटकीय होने की गुंजाईश नहीं थी। ऐसे में कंगना के धमाकेदार दोहरे अभिनय के बीच खुद को समन्वयित रखने के लिये माधवन् का काम निश्चित ही प्रशंसनीय है। इसके अलावा लोंग-इलायची की तरह माइंड-फ्रेशनर के रूप में प्रयुक्त अन्य चरित्र अभिनेताओं का तो कहना ही क्या। इस फिल्म में जितना कंगना और माधवन को याद रखा जायेगा उतना ही पप्पी बने दीपक डोबरियाल, राजा अवस्थी के रूप में जिमी शेरगिल और अन्य किरदारों में स्वरा भासकर और जीशान अयूब को भी याद किया जायेगा।

बहरहाल, फिल्म को समझने  और इसके संबंध में अपनी धारणा बनाने के लिये इस लेख का सहारा कतई न लें क्योंकि यह लेख तो फिर भी बहुत जटिल हो सकता है जबकि फिल्म तो बेहद हल्के-फुल्के अंदाज में आपका मनोरंजन करती है।

Sunday, February 8, 2015

हंसी-खुशी का है राज़ फ़िल्लम, फुल्ली फिल्लम है सांस भी : शमिताभ

हिन्दुस्तान..एक ऐसा देश जो अपनी रग़ों में हुल्लड़याई का पूरा समंदर लिये घूमता है। जिसके अतीत की तमाम इबारतें अपने ज़हन में अनंत कथा-कहानियां समेटे बैठी हैं। किस्सागोई जिस देश का प्रमुख शग़ल है और दादी-नानी की कहानियां जहाँ लोगों के लिये प्राथमिक विश्वविद्यालय। इस देश में मेले हैं, मदारी हैं, सपेरे हैं, नाच-गाना-नौटंकी है और ये देश कला की ऐसी अनेक विधाओं, अनेक रंगों को अपने में समेटे है। इन सब चीज़ों के कारण कभी ये उपहास का केन्द्र बनता है तो कभी इस कला-संस्कृति की वजह से ये देश अपना सिर फ़क्र से ऊंचा करता है। चाहे डांस, ड्रामा जैसी परफार्मिंग आर्ट हो या पेन्टिंग, डिजाइनिंग जैसी नान-परफार्मिंग आर्ट, हमारे देश में हर कला को लेकर पागलपन है और ऐसे में इन तमाम आर्ट्स को अपने में समाने वाले सिनेमा की बात की जाये तो दीवानगी अपने चरम पर होती है।

शमिताभ। तकरीबन सौ सालों से इस देश के लोगों के मनोरंजन और पागलपन का पर्याय बन चुके भारतीय सिनेमा के प्रति आदरांजलि की तरह प्रस्तुत की गई है। लेकिन हमारे सिनेमा के महिमामंडन करने के साथ ही साथ ये फ़िल्म ऐसी कई शिकायतों को बड़ी बेबाकी से प्रस्तुत करती है..जो अरसे से हर सिने प्रेमी के दिल में उठता चली आ रहे हैं। मसलन,  भारतीय फ़िल्म उद्योग को बॉलीवुड कहना...फ़िल्मों में व्याप्त प्लेगिआरिज़्म पर चुटकी लेना..कुछ ऐसे ही इस इण्डस्ट्री के झूठ और दिखावे की चकाचौंध को प्रस्तुत करना। निर्देशक आर. बाल्की की ये महज़ तीसरी फ़िल्म है लेकिन अपनी पिछली दो फ़िल्मों की तरह इस फ़िल्म में भी वे सिनेमाई खूबसूरती के चरम पर नज़र आते हैं।

मनोरंजक कथानक और बेहतरीन प्रस्तुति के बीच फ़िल्म में कई सारे अर्थ भी छुपे हुए हैं..फ़िल्म के संवाद बाल्की की पिछली फ़िल्मों की तरह नयापन और विट (हास्य पैदा करने की कला) लिये हुए हैं। संवादअदायगी होती तो बड़ी गंभीरता से हैं पर दर्शक द्वारा ग्रहण होने के बाद ज़बरदस्त गुदगुदी पैदा करते हैं। ये संवाद हंसाने के लिये किसी तरह की लफ्फाज़ी का सहारा नहीं लेते..बल्कि इन्हें कहने और समझने के लिये खास विद्वत्ता की दरकार होती है। बाल्की द्वारा प्रस्तुत कॉमेडी उन तमाम निर्माता-निर्देशकों के मूंह पर तमाचा है जो कहते हैं कि आज के दौर में हास्य सिर्फ अश्लीलता की गलियों से होकर ही आ सकता है।

फ़िल्म की महानता में बाल्की के निर्देशकीय कौशल के साथ साथ अमिताभ, धनुष और अक्षरा की एक्टिंग का भी अहम् योगदान है। अमिताभ अपने अभिनय और ताजगी से ये संशय पैदा कर रहे हैं कि वे अब 72 वर्ष के हो गये हैं। इस उम्र में वे बिना सुर छोड़े बेहतरीन गाना भी गाते हैं और लगता है कि इस साल बेस्ट सिंगर के कई सारे अवार्ड वे अपने खाते में न जोड़ लें। वहीं धनुष के लिये ये किरदार किसी चुनौती से कम नहीं था। एक मूक व्यक्ति का अभिनय, जो किसी भी बोलने वाले व्यक्ति से ज्यादा वाचाल लगता है और बॉलीवुड के शिखर सितारे की आवाज पर उसी तरह के भाव लेकर लाना, उन्हें अभिनय के शीर्ष पर ले जाता है। फिल्मों के लिये गली-मोहल्लों में दिखने वाली एक आम आदमी की दीवानगी को धनुष ने बखूब प्रस्तुत किया है। अक्षरा की यह पहली फ़िल्म है पर हिन्दी और तमिल के सुपरसितारों के सामने वो कतई फीकी नज़र नहीं आती। उन्हें देखना उतना ही मोहक लगता है जितना अमिताभ या धनुष को।

'शमिताभ' दो के मेल का नाम है...और ये मिलकर सौ वर्ष पुराने सिनेमा के दो प्रमुख अंगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऑडियोविसुअल। जी हाँ इन दो चीज़ों के कारण ही सिनेमा खुद को जनमानस का प्रमुख मानसिक भोजन बना सका है। यदि एक भी कमतर हो तो सिनेमा कभी भी अपना समग्र प्रभाव नहीं स्थापित कर सकता। धनुष दृष्याभिव्यक्ति का प्रतीक है तो अमिताभ श्रव्याभिव्यक्ति के। जब दोनों अपने-अपने अहंकार में पागल हो खुद को श्रेष्ठ साबित करते हैं तो जनता द्वारा उन्हें नकार दिया जाता है। फ़िल्म एक बहुत बड़ी सीख देते हुए ख़त्म होती है कि  सफलता समग्र प्रयासों का प्रतिफल है। जहाँ व्यक्ति सबको भूलकर सिर्फ 'मैं' पर अड़ बैठता है बस वही पतन की वजह बन जाती है। व्यक्ति का सबसे बड़ा अभिमान, जीवन में एक न एक दिन ज़रुर टूटता है। अहंकार को हम जितने चरम पर ले जाते हैं उसके टूटने पर दर्द भी उतना गहरा होता है। फिल्म इण्डस्ट्री ने सफल व्यक्ति के लिये स्टार शब्द इजाद किया है उसका कारण यही है कि सितारे चाहे कितने ही चमक लें पर टूटते ज़रूर हैं।

बहरहाल, कहने को बहुत कुछ है पर कहने-सुनने से बेहतर है इसे फ़िल्म को देखा जाये...ये हंसायेगी-गुदगुदायेगी और रुलायेगी भी पर गहन दार्शनिकता को संजोये कई प्रतीक भी फ़िल्म में देखे जा सकते हैं। कई सालों पहले मैंने अपना ये ब्लॉग 'साला सब फ़िल्मी हैं' बनाया था..जिसके परिचय के तौर पर मैंने कहा था कि अब हर जज़्बात, हंसी-खुशी, संवेदनाएं फ़िल्मी सी हो गई हैं..बस इस बात को चरितार्थ होते ही फ़िल्म में देखा जा सकता है। फ़िल्मों में नया और कुछ हटकर देखने के हिमायती लोगों के लिये ये फ़िल्म एक बेहतरीन अनुभव साबित होगी। शमिताभ..बॉलीवुड को अपनी मौजूदा श्रेणी से कुछ सोपान और ऊपर ले जाने वाली फ़िल्मों में से एक है।

Saturday, December 20, 2014

इक बूंद भी उसने न पी पर 'पीके' वो कहलाया था : टिंगा-टिंगा, नंगा-पुंगा दोस्त

वैश्विक परिदृष्य में इन दिनों पाकिस्तान में हुई आतंकवादी वारदात की ख़बर ताजी है..भारत में धर्मांतरण के मुद्दे पर संसद आये दिन गरमाती रहती है, लव जेहाद जैसे मुद्दें बहस का विषय बने हैं, इसी तरह पाखंड-झूठ-दिखावा और स्वार्थ जैसी दुर्दांत वृत्तियां दुनिया को एक समुचित संतुलन से दूर रखे हुई हैं। इन्ही वजहों से कोई सब कुछ होते हुए भी अगाध तृष्णा के चलते दुखी है तो कोई अभावों के चलते पीड़ित। कोई न मिले हुए को हासिल करना चाहता है तो कोई मिले हुए को गंवाना नहीं चाहता....और इन हालातों में जो मनोभाव व्यक्तित्व का हिस्सा बनता है वो है डर और लालच। फिर इन्हीं मनोभावों से जन्म लेती है धर्म की तथाकथित परिभाषाएं, तथाकथित ईश्वर के रूप और पश्चात ईश्वर एवं धर्म के नाम पर असंख्य आडंवर...अनंत सरहदें।

पीके। आमिर ख़ान अभिनीत और राजकुमार हीरानी निर्देशित एक बेहतरीन फ़िल्म। इन दो लोगों का फ़िल्म से जुड़ा होने ही इसके सार्थक और मनोरंजक होने की गारंटी देती है। हीरानी ने अपनी पिछली फ़िल्मों की तरह इस बार भी अपने कद को और ऊंचा करने का ही काम किया है..या यूं कहें की उनके मन में समाज की दोहरी वृत्तियों को लेकर बेइंतहा छटपटाहट है जो किस्तों में बाहर आ रही है। 'पीके' भी मुन्नाभाई और थ्री इडियट्स की श्रंख्ला को ही आगे बढ़ाती है। हीरानी के नायक सभ्य-सुसंस्कृत समाज के प्रतिनिधि नहीं होते..ये तो गुंडे-मवाली, इडियट्स और दूसरे ग्रह के पियक्कड़ किस्म के नमूने होते हैं जो सभ्य समाज की तमाम संस्कृति की बखैया उधेड़ते हैं। 'पीके' भी कुछ ऐसी ही है। धर्म,  धर्मायतनों और धार्मिकों की सच्चाई बयां करने वाली। ईश्वर के नाम पर चल रहीं सैंकड़ों दुकानों और उनके ठेकेदारों की असल नस्ल का परिचय देने वाली। भगवान के नाम पर इंसान से उसका हक छीनने वालों को उनकी गिरेबान में झांकने पर मजबूर करने वाली।

धर्म, इंसान को नैतिक बनाने के लिये था...ईश्वर, इंसान को अभिमानी बनने से रोकने के लिये था लेकिन अब इस धर्म के नाम पर ही नैतिकता का चीरहरण और इंसान का अभिमान पुष्ट हो रहा है। 'पीके' में कई ज्वलंत सवाल उठाते हुए एक बात कही गई है कि हम उस भगवान को माने जिसकी वजह से हमारी हस्ती, हमारे आचार-विचार और व्यवहार हैं न कि उस ईश्वर को अपनी आस्था का केन्द्र बनाये जिसे हमने अपने-अपने पक्ष पोषण के लिये पैदा किया है। आज धर्म और ईश्वर के नाम पर व्यवसाय हो रहा है, राजनीति हो रही है, बंटवारा हो रहा है, विवाद, लड़ाई-झगड़े और असीम हिंसा हो रही हैं लेकिन धर्म के नाम पर कहीं धर्म नहीं हो रहा। बेशक, हमें धार्मिक होना चाहिये...लेकिन पंथों में बंटे किसी एक ईश्वर का पिछलग्गु होकर नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता या कहें कि समस्त वसूधा को अपने प्रेम में समेटते हुए धार्मिक होना चाहिये। धर्म अपने अस्तित्व का बोध कराने के लिये था लेकिन उस धर्म की प्राप्ति के जतन आज खुद की और कई बार दूसरों की भी हस्ती मिटाकर किये जा रहे हैं। 

हीरानी ने अपनी पिछली फ़िल्मों लगे रहो मुन्नाभाई और थ्री इडियट्स की तरह इस फ़िल्म में भी अपना सिग्नेचर मार्क छोडा है। जैसे उन फ़िल्मों को देखने के बाद गेट वेल सून और ऑल इज वेल जैसे मंत्र ज़हन में छूट जाते हैं वैसे ही 'पीके' देखने के बाद 'राँग नंबर' दिल में चस्पा हो जायेगा..इस राँग नंबर के जरिये निर्देशक ईश्वर को पाने के उन तमाम जतनों पर सवाल उठाता है जिसके चलते देश-दुनिया में धर्म का व्यापार चल रहा है। मसलन फ़िल्म में कुछ ऐसे ही एक गीत के बोल हैं- "दुनिया नशे में टल्ली थी यह होश में उसे लाया था, थर्रा दे जो पूरी धरती को, वो सवाल उसने उठाया था...टिंगा-टिंगा-नंगा-पुंगा दोस्त"

'पीके' समझदारों के बीच भटका है और उसकी सबसे बड़ी मुश्किल इन समझदारों को ही समझना है। तन पर पहने जाने वाले भांत-भांत के वस्त्राभूषण की तरह लोगों ने अपने व्यक्तित्व पर भी असंख्य प्रकार के आवरण डाल रखे हैं और व्यक्तित्व की इन परतों में असल इंसान कौन है यही समझ पाना सबसे जटिल काम है। ज़मीन पर जो इंसान पैदा हुआ था वो ऐसा कतई नहीं था बल्कि जमाने ने समाजीकरण की प्रक्रिया करते हुए इस इंसान को गढ़ा है। जो अत्यंत छली है, असंतुष्ट है, स्वार्थी है और झूठा है और यदि इसने जैसे को तैसा कहना सीख लिया तो यह दुनिया इस पर मूर्ख होने का तमगा ठोंकते देर नहीं करेगी। डिप्लोमेटिक और प्रेक्टिकल होना ही आज की ज़रूरत है और ऐसा बन जाने पर मानवीयता और प्रेम का अक्स आपके व्यक्तित्व में बना रहे ऐसा हो पाना नितांत दुर्लभ है।

पीके में प्रेम कथा भी है...और बड़ी संजीदगी से निर्देशक ने बताया है कि प्रेम सिर्फ सन्निकटता का मोहताज होता है, मात्र सहृदयता का आकांक्षी होता है..इसके अलावा कोई शर्त उसपे नहीं लगाई जा सकती। लेकिन मौजूदा दौर के प्रेम में धर्म, जाति, वर्ग, देश जैसी न जाने कितनी बंदिशें है...धर्म के नाम पर बनाये गये तमाम रिवाज़ परतंत्र बनाये रखने के लिये हैं...प्रेम, स्वतंत्रता का हिमायती है इसलिये प्रेम पर भी धर्म की लकीरों से ही सबसे ज्यादा सरहदें बनाई जाती हैं। आश्चर्य होता है इस छोटे से जीवन और इस तनिक सी दुनिया में जाने कैसे इतनी सरहदें इस इंसान ने बना रखी हैं? 'पीके' का नायक दूसरी दुनिया के इंसान से प्यार कर बैठता है उसकी वजह सिर्फ सहृदयता है समानता कतई नहीं। 

बहरहाल, ज्यादा कुछ कहकर फ़िल्म का चिट्ठा इस पोस्ट में बयां नहीं करना चाहता..और ऐसा मैं कर भी नहीं सकता क्योंकि फ़िल्म के अर्थ बेहद गहरे हैं। एक शब्द में कहें तो ये बेमिसाल है। जिसका जल्द से जल्द थियेटर में जाकर मजा उठाया जाना चाहिये। आमिर खान के करियर में ऐसे अनेक नगीने हैं जो उन्हें दूसरे अभिनेताओं से अलग करते हैं यह फ़िल्म उनका कद समकालीन अभिनेताओं से और भी ऊपर ले जाने वाली है और 'हैप्पी न्यू ईयर' जैसे हादसे रचने वालों को तो ये प्रेरणा देने वाली है। फ़िल्म में कई जगह आमिर का अभिनय बदन में अनायास ही झुनझुनी पैदा कर देता है। खुद को कैसे किरदार में ढाला जाता है यह कोई आमिर से सीखे..नवोदित अभिनेताओं के लिये तो वे एक युनिवर्सिटी बन गये हैं।

विधु विनोद चोपड़ा भी बधाई के पात्र हैं जो इन सार्थक फ़िल्मों पर शिद्दत से काम करते हैं और वर्षों में भले एक फ़िल्म देते हैं लेकिन गुणवत्ता से समझौता नहीं करते। राजकुमार हीरानी के बारे में जो भी कहे वो कम है..संभवतः वे अपने दौर के इकलौते फ़िल्मकार हैं जो विषय की गंभीरता और मनोरंजन दोनों में से किसी को भी अपनी फ़िल्म में कमजोर नहीं पड़ने देते। अन्यथा, विषय के कारण मनोरंजन गौढ़ हो जाता है या मनोरंजन के कारण विषय..पर हीरानी अपवाद है। संगीत आनन्द देने वाला है..और हीरानी की दूसरी फ़िल्मों की तरह सांदर्भिक भी। अनुष्का में ताजगी है..और फिल्म देखने के बाद उनका अभिनय भी याद रखा जायेगा। दूसरे कलाकारों के लिये ज्यादा स्पेस नहीं है...पर जितना है उसमें वे अपने रोल से न्याय करते हैं। कुल मिलाकर कंप्लीट पैकेज। जो कमियां हैं भी तो उन्हें इग्नोर करना ही समझदारी है।

और ज्यादा क्या कहूँ...कुछ दिनों बाद आप खुद देख लीजियेगा कि ये 'पीके' किस तरह लोगों के दिलो-दिमाग पर छाने वाला है...यदि आप अब तक इस नायाब सिनेमा के दीदार से दूर हैं तो शीघ्रता करें..हो सकता है ये नंगा-पुंगा दोस्त पूर्वाग्रहों में भटके आपके दृष्टिकोण को भी सही दिशा दे दे..............

Thursday, July 3, 2014

बंजारे को घर दिलाने की कोशिश : एक विलेन

सरपट दौड़ती ज़िंदगी में मोहब्बत के कारण ही नये पेंच आते हैं...कभी मोहब्बत हो जाने से तो कभी मोहब्बत की डोर टूट जाने से, जीवन के मायने ही बदल जाते हैं। हर मर्तबा साहित्यकार या फिल्मकारों द्वारा प्रेम को मंजिल साबित करने के जतन किये जाते हैं पर मोहब्बत हमेशा रास्ता ही बनी रहती है जिसकी कोई मंजिल नहीं होती..और असल में मोहब्बत की खूबसूरती ही इस बात में है कि ये मंजिल नहीं, महज़ रास्ता है। रास्तों की खूबसूरती हमेशा मंजिल से ज्यादा होती है लेकिन हम किसी अव्यक्त मंजिल की तलाश में रास्तों का मजा भी नहीं ले पाते।

मोहित सूरी निर्देशित फिल्म 'एक विलेन' भी नायकनुमा विलेन को प्रेम के जरिये मंजिल दिलाने की कोशिश करती है। जिसे फिल्म के बहुचर्चित गाने 'मुझे कोई यूं मिला है जैसे बंजारे को घर' के जरिये बयां भी किया गया है। लेकिन फिर भी मोहित सूरी अपनी तथाकथित सुखद अहसास वाली एंडिंग करने के बावजूद बंजारे को घर नहीं दिला पाते..क्योंकि प्रेम में गंतव्य का प्रावधान ही नहीं होता। प्रेम को मासूमियत और दीवानगी को दिखाने का मोहित सूरी का अपना ही एक पैटर्न है जो 'एक विलेन' में भी बखूब नज़र आता है। मोहित का नायक पारंपरिक शिष्टाचार और नैतिकता से युक्त नहीं होता और न ही उसमें मानवीय सभ्यता का समावेश देखने को मिलता है लेकिन फिर भी वो फिल्म के कथानक में पूरे सिस्टम और सभ्य समाज के बीच सबसे ज्यादा दर्शकों की सहानुभूति जुटाता है। यही वजह है कि वो विलेन होते हुए भी नायक है क्योंकि वो प्यार करता है और हमने हिन्दी सिनेमा की शुरुआत से ही प्यार करने का जिम्मा नायक को सौंप रखा है...किसी और में प्यार के लिये दीवानगी हो, ये हमें रास नही आता।

'एक विलेन' में दरअसल एक नहीं बल्कि दो विलेन हैं।  दोनों हत्याएं करते हैं, दोनों ही अपनी-अपनी नायिकाओं से बेइंतहा प्यार करते हैं लेकिन दर्शक का जुड़ान सिर्फ एक के साथ होता है और सिस्टम के हाथों कुंठा झेलने वाला और अनायास ही जिस किसी को मार देने वाला काम्प्लेक्सिटी से घिरा दूसरा विलेन (रितेश देशमुख) दर्शकों की हमदर्दी नहीं जुटा पाता..क्योंकि उसके हिंसक रवैये की वजह तार्किक नहीं है जबकि पहले विलेन (सिद्धार्थ मल्होत्रा) का हिंसक होना सतर्क और उद्देश्यपूर्ण बताया गया है। शायद इसीलिये वो विलेन होते हुए भी अनाधिकारिक तौर पर इस फिल्म का हीरो है। 

मोहित सूरी ने हत्या और हिंसा के परे इस फिल्म में जो प्रेम कहानी बताई है वो बड़ी रुमानियत और मासूमियत को संजोये हुए है और फिल्म की असली यूएसपी भी वही है। प्रेम को प्रकृति से जोड़ते हुए जिन नाजुक लम्हों को मोहित ने संजोया है वो उनकी तरह का पहला सिनेमाई एक्सपेरिमेंट है...और मौजूदा दौर में पर्यावरणविद् जिन क्लाइमेटिक चेंजेस को लेकर चिंता जाहिर कर रहे हैं उन चीज़ों को ही इस फिल्म में खूबसूरती से प्रेम के साथ लिंक किया गया है। सावन की पहली बारिश में मोर का नाचना, तितलियों के साथ अठखेलियां करना, समंदर के नीचे की दुनिया, मछलियों का संसार, मूंगे की चट्टान,  हवा के साथ बहने के दृश्यों का प्रेम के साथ समायोजन बड़ा सुंदर नज़र आता है..और ये दृश्य ही प्रेम का प्रकृतिकरण और प्रकृति का प्रेमीकरण  करते प्रतीत होते हैं। जो मानवीय जज़्बातों को ग्रास रूट लेवल का बनाते हैं और प्रेम की सबसे बड़ी सच्चाई को बयां करते हैं।

बहरहाल, मोहित सूरी इस फ़िल्म की सफलता से स्टार निर्देशकों की जमात में शामिल हो गये हैं और उन्होंने भट्ट कैम्प के बाहर भी अपनी पुख्ता मौजूदगी दर्ज कराई है। सिद्धार्थ मल्होत्रा के लिये ये फिल्म उनके करियर को नये परवाज़ देने वाली साबित होगी..तो श्रद्धा कपूर को आशिकी टू के बाद इससे बेहतर अवसर नहीं मिल सकता था और इस अवसर को उन्होंने बखूबी भुनाया भी है। मोहित सूरी की फ़िल्मों के संगीत के विषय में कुछ समीक्षा करना गुस्ताख़ी होगी क्योंकि संगीत की उनसे ज्यादा परख मौजूदा दौर के कुछ ही फिल्मकारों में देखने को मिलती है..और सबसे बड़ी बात उनकी फ़िल्मों के संगीत की ये है कि मोहित की फ़िल्मों में स्थापित संगीतकारों की बजाय नये संगीतकारों को अवसर दिया जाता है।

खैर, कुछ कमियों के बावजूद ग्रे-शेड में गुजरते धवल जज़्बातों की महीन प्रस्तुति को देखना है तो ये एक बेहतरीन अनुभव हो सकता है। वैसे भी दीवानगी की हद से गुजर चुके लोग भले ही समृद्धि के शिखर पे पहुंच जायें पर उन्हें वहीं बेखुदी की गलियां भाती है और क़ातिल की तरह हर आशिक उन्हीं गलियों में बार-बार लौटना चाहता है जहाँ उसने आशिकी की थी..................

Wednesday, April 23, 2014

काश! प्रेम में सिर्फ 'टू स्टेट्स' ही होते....

हिन्दुस्तान एक ऐसा देश, जहाँ प्रेम की आध्यात्मिकता और पारलौकिकता को बताने वाला सबसे ज्यादा साहित्य लिखा। लेकिन प्रेम की स्वतंत्रता को सबसे अधिक बाधा भी हमारे देश ने पहुंचाई और उन बाधाओं के चलते अब अपने देश में भी प्रेम पर पाश्चात्य कलेवर चढ़ चुका है और अब यहां स्त्री-पुरुष पहले हमबिस्तर होते हैं फिर आईलवयू बोला जाता है। लेकिन फिर भी कुछ मोहब्बती जज़्बात जस के तस इस बदले कलेवर में करवट बदल रहे हैं, इंसान की रूह में चस्पा होकर। समाज़-रिवाज, घर-परिवार, रिश्ते-नाते, रीति-नीति ये सब वो स्टेट्स या क्षेत्र थे जिनमें इंसान एक सुखद संरक्षण के साथ अपने जज़्बातों की मौलिकता को जिंदा रखते हुए जीना चाहता था..पर सदियों से ये वो स्टेट्स बने हुए हैं जो अहसासों की आजादी पर सरहदें बनाते हैं...और उन सरहदों में घुट रहा है इश्क़ और घुट रही है व्यक्ति की मौलिक आजादी।

चेतन भगत के उपन्यास पर बनी फ़िल्म टू स्टेट्स देखी। लेकिन आगे कुछ लिखने से पहले ये बता देना चाहता हूं कि मैं यहां फ़िल्म की समीक्षा नहीं कर रहा हूं..क्योंकि उसपे पहले ही काफी कुछ कहा जा रहा है और ये फ़िल्म सौ करोड़ी क्लब में भी शामिल होने जा रही है। हालांकि मुझे फ़िल्म के कुछ हिस्से और आलिया भट्ट-अर्जुन कपूर के अभिनय के अलावा फिल्म औसत ही लगी...तो इस तरह मेरी दिलचस्पी न तो फ़िल्म पर कुछ कहने की है और न ही टू-स्टेट्स उपन्यास पे..क्योंकि चेतन भगत की लेखन शैली मेरी प्रकृति से मेच नहीं करती। मैं यहां हर हिन्दुस्तानी प्रेम कहानी में छुपे उन स्टेटस की बात करना चाहता हूँ जिन स्टेटस ने दिल की एक धरती पर कई सरहदें बनाकर हमें अलग-अलग दायरों में रहने पर मजबूर कर दिया।

भारत देश की विविधता ने सबसे ज्यादा क़त्ल यदि किसी का किया है तो वो मोहब्बत ही है...प्रेम के देवताओं की पूजा करने के बावजूद हमनें इंसान में उस रूप को पनपने की तमाम संभावनाओं को ख़त्म कर दिया। इन दिखावटी रस्मों और विविधताओं में कई दूसरी चीज़ें सर्वप्रमुख हो गई जबकि प्रेम को हासिये पे फेंक कर तड़पने के लिये छोड़ दिया गया। यदि इंसान द्वारा निर्मित सरहदों में बसे परिक्षेत्र को गिनाने लग जाये तो पता नहीं कितने स्टेट्स बन खड़े होंगे और अब प्रेम के साथ इस बात को भी तय करना होगा कि इस मोहब्बत का जन्म एक ही स्टेट्स में हुआ है या नहीं...और यदि नहीं हुआ है तो ज़बरदस्ती उसी स्टेट्स में प्रेम पैदा करना होगा। ऐसे में कौन इस दुनिया को समझाये कि प्रेम न बाड़े उपजे, प्रेम न हाट बिकाय। राजा-परजा जेहि रुचे सिर दे सोई ले जाय.. 

स्टेट्स। धर्म-कर्म, जात-पात की स्टेटस, रुपया-पैसा, अमीरी-गरीबी की स्टेट्स, भाषा-बोली, रीति-रिवाज़ों की स्टेट्स, खान-पान, रहन-सहन, पद-प्रतिष्ठा की स्टेट्स, शक्ल-सूरत, विचार-मान्यता, पसंद-नापसंद की स्टेट्स, क्षेत्र-गोत्र, कर्म-काण्ड, पूजा-विधान, मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारों की स्टेट्स, समाज और मिजाज की स्टेट्स, नौकरी-कारोबार की स्टेट्स और क्या-क्या बताऊं, ऐसी न जाने कितनी स्टेट्स जिन स्टेट्स को तोड़कर प्रेम खुले आसमान में आजाद घूमने की मांग करता है..पर इन स्टेट्स के पहरेदार प्रेम के उन पंछियों को जकड़कर वापस उन्हीं सरहदों में कैद कर देते हैं। लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि इस अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाने के लिये किसी मानवाधिकार आयोग का गठन नहीं किया गया है..क्योंकि अधिकतम अत्याचार इतने इमोशनली ढंग से किया जाते हैं कि प्रेम का पंछी मरते हुए भी ये समझता है कि वो त्याग कर रहा है। जबकि सच्चाई ये है कि इन तमाम स्टेट्स के पीछे समाज की एकमात्र मान्यता व्यक्ति की स्वाभाविक आजादी की मांग को दबाना है और प्रेम सरीकी आजादी के लिये बगावत और किसी जज़्बात में नहीं हो सकती। बस इसलिये हमेशा से वेद-पुराण, रस्मों-रिवाज और रिश्तों का वास्ता देकर उस आजादी का गला घोंटना ही इस समाज की फितरत बन चुका है। विधि-विधान के साथ किये गये इस मर्डर की कीमत सिर्फ वो इंसान चुकाता है जिसके जज़्बात का क़त्ल हुआ है और इस गुनाह में शामिल परिवार-समाज का हर इंसान बाइज्ज़त बरी कर दिया जाता है।

इन दायरों के बीच ऐसा लगता है मानो इस दुनिया में प्रेम से बड़ा गुनाह और कोई नहीं है। सिर्फ प्यार होना, सिर्फ किसी का अच्छा इंसान होना, सिर्फ एक निश्छल दिल होना इस दुनिया के लिये काफी नहीं है...तो जब ये सभी भले जज़्बात अच्छे नहीं है तो फिर भला क्युं अच्छाई की सीख दी जाती हैं। आज जिन वजहों से प्रेम महज़ वासना में बदला है उसका सबसे बड़ा कारण समाज द्वारा बनाये गये यही स्टेट्स हैं। इन स्टेट्स के कारण ही इंसान बड़ा प्रेक्टिकल हो गया है..और वो प्रेम को बस खाने-खेलने की चीज़ समझता है क्योंकि उसने अपने दिमाग में अच्छे से ये बात बैठा ली है कि इस प्रेम का कोई भविष्य नहीं है इसलिय जब तक मिल रहा है सिर्फ इंज्वाय करो। अब इस इंज्वाय को यहाँ परिभाषित करने की ज़रूरत मैं नहीं समझता क्योंकि परिदृष्य हम सबके सामने है...

टू स्टेट्स..काश बस टू स्टेट्स ही होते। तो कितना आसान होता, इस एक सरहद को पार कर अपने प्यार को पा लेना...पर अफसोस ऐसा नहीं है। जुदाई को दिल में लिये हमें जीना है..और अाप ज्यादा ही इमोशनल होके यदि वहीं अटके हुए हैं तो आप कमज़ोर है..आप यदि आगे नहीं बढ़ रहे हैं तो आप बेवकूफ है और यदि खुद को कमज़ोर और बेवकूफ साबित नहीं कराना चाहते तो आप झूठे बन जाईये, आप बेशर्म और खुदगर्ज हो जाईये क्योंकि सिर्फ खुदगर्जी में ही प्रेम को भुलाया जा सकता है...और यदि ऐसा नहीं कर सकते तो बस एक कसक लिये सिर्फ जीते रहिये गुजरते हर दिन के साथ, आती-जाती हर श्वांस के साथ। ये बात अलग है कि उन दिनों और उन श्वांसो पर अब कोई मायने नहीं तैरा करते। काश! सिर्फ टू स्टेट्स होते..या फिर इन सरहदों को तोड़ने के लिये काश! हम थोड़ी हिम्मत जुटा पाते...काश! ये दुनिया थोड़ा तो प्यार को समझती..काश! हमें कभी प्यार ही न होता.....काश....काशश्श्श्श्श्....................... 

Tuesday, February 25, 2014

ज़िंदगी के 'हाईवे' पे जज़्बातों का ओवरटेक कराता फ़िल्मकार : इम्तियाज़ अली

उसे रास्ते पसंद हैं..और उन रास्तों से ही कुछ ऐसी मोहब्बत है कि मनमर्जी से जहाँ-तहाँ, जब-तब वो रिश्तों या जज़्बातों का ओवरटेक करते हुए मस्तमौला बन बस चलते रहना चाहता है...और उसकी फ़िल्मों की हर नायिका 'हाईवे' की वीरा की तरह वहाँ नहीं लौटना चाहती जहाँ से वो आई है और वहाँ भी नहीं जाना चाहती जहाँ उसे ले जाया जा रहा है..गोया सफ़र ही रास्ता है और सफ़र ही मंजिल...और इन्हीं वजहों से इम्तियाज़ अपनी फ़िल्मों में एकआध ऐसा गाना भी रख देते हैं जिसमें इरशाद क़ामिल को कुछ ऐसा लिखना होता है..'हम जो चलने लगे, चलने लगे हैं ये रास्ते..मंजिल से बेहतर लगने लगे हैं ये रास्ते'।

इम्तियाज़ के पात्र बड़े मनमौजी हैं..खासतौर से उनकी नायिकाएं और वे आज की चौका-चूल्हा में उलझी व बच्चे पैदा करने की मशीन बनी हुई महिलाओं को एक जवाब हैं जहाँ उनकी हस्ती इन पारंपरिक क्रियाओं से परे भी बहुत कुछ है...वे आजाद रहना चाहती हैं, कदम-कदम पे अपनी हसरतों को रौंदते रहना उन्हें पसंद नहीं, सिर्फ ज़मीन ही नहीं वे आकाश में अपना अस्तित्व खोजती है, वे नटखट हैं, बड़बोली हैं. प्यार करती है और जब-तब अपने जज़्बातों का ओवरटेक करवाती हैं...पर अपनी मर्यादाएं नहीं भूलती, उनका प्यार उद्दंता नहीं है, उनकी स्वतंत्रता कभी भी स्वच्छंदता में नहीं बदलती..आजाद रहते हुए भी उन्हें पता है कि अकेली लड़की खुली हुई तिजोरी की तरह है और पुरुष वर्चस्व वाले भौंडे समाज में उनकी नायिका खुद को प्यार करने वाले मर्द की निगाह को पहचानती हैं जिसकी नीयत साफ है...जो वाकई मर्द है।

सदियों से नारी को चारदीवारी में दबोच कर रखने वाले समाज के अंदर.. इम्तियाज़ की महिलाचरित्रों द्वारा जो स्त्री विमर्श प्रस्तुत किया है वो अति बौद्धिक लोगों के कोरे उपदेशों से बहुत ऊपर बड़ा ही प्रेक्टिकल है। एक आदर्श स्त्री की तथाकथित भारतीय व्याख्या से दूर इम्तियाज़ की नायिका पूरे दम के साथ अपने प्रेमी के साथ भागने का दम रखती है(जब वी मेट)..ब्रेकअप पार्टी को इंज्वाय करती है और अबला नारी के तरह आंसू नहीं बहाती(लव आजकल), अपने कुछ दिनों के पुुरुष मित्र के साथ बिंदास हो जंगली जवानी जैसी फि़ल्म देखती है(रॉकस्टार) और आधीरात को चुपके से अपने मंगेतर के साथ कुछ प्यार भरे पल भी ढूंढना चाहती है...और अपने ही जज़्बातों की परख में जब उसे ये अहसास होता है कि उसका दिल क्या चाहता है तो बेखौफ हो वो अपने मंगेतर को छोड़, रास्ते में मिले अनजान साथी को चुनती है या शादी के बाद भी अपने पूर्वप्रेमी के मिलने पर उसे चूमती है उसका आलिंगन करती है। गोया कि हरजगह किसी बने-बनाये सिद्धांत को थामें आगे नहीं बढ़ती, वो आज में जीती है और जो भी वर्तमान का सच होता है बस उसे अपनाती है और इस बदलाव में हरबार होता है उसके मौजूदा जज़्बातों द्वारा पुराने अहसासों पर ओवरटेक। और इसी वजह से इम्तियाज़ अपनी 'हाइवे' की नायिका से बुलवाते भी है कि 'इस दुनिया में पता ही नहीं चलता कि क्या सही है और क्या ग़लत..सब कुछ मिक्स-मिक्स सा हो गया है'

इम्तियाज़ को समाज और समाज के रिवाज़ों से भी ऐतराज़ है..जहाँ शिष्टाचार सिर्फ टिशु पेपर की तरह महज़ खुद को सभ्य दिखाने का हथियार बनके रह गया है...उनके नायक-नायिका की आजादी को समाज के इस शिष्टाचार और रिवाज़ों ने ही ख़त्म किया है और उनकी फ़िल्में खासतौर पर हाइवे ये बताती है कि सबसे ज्यादा असभ्य लोग आलीशान मकानों, ऊंचे पदों और शहर के पॉश इलाकों में ही निवास करते हैं..नारी का क्यूट और शालीन की तथाकथित परिभाषा में बांधकर सबसे ज्यादा हाईप्रोफाइल लोगों ने ही शोषण किया है उसे बंधक बनाया है...घर के बाहर वाले लोगों से उसे बचने को कहा जाता है पर घर के अंदर उसे मर्यादा और संस्कारों की नसीहत देकर चुप्पी साधे हुए सारे जुल्म सहने को मजबूूर किया जाता है। पिता के हिसाब से उसे अपना जीवनसाथी चुनना होगा, माँ के हिसाब से उसे अपनी सोच रखनी होगी, भाई के हिसाब से उसे पहनना-ओढ़ना और दोस्ती करना होगा, पति के हिसाब से उसे माँ बनना होगा-घर संभालना होगा या काम करना होगा...और कभी-कभी अपने निकटतम रिश्तेदारों की हवस का शिकार भी बनना होगा। इन सबमें नारी का अपना वजूद कहाँ हैं? लेकिन इस सबके बावजूद उसे चुप्पी साधे रहना होगा क्योंकि यदि मूँह खोला तो वो असंस्कारी साबित कर दी जायेगी।

इम्तियाज़ की बाकी फ़िल्मों की तरह 'हाईवे' में भी पात्र अपना अस्तित्व खोजते नज़र आते हैं..और जज्बातों का ओवरटेक कराते हुए प्रेम की मासूम संवेदनाओं को भी उन्होंने बखूब जगह दी है। नायिका, खुद की सगाई होने के बावजूद अपने अपहरणकर्ता से प्रेम करती है..और अपनी हाईप्रोफाइल सोसायटी से दूर उसे एक किडनेपर में ही सभ्य इंसान नज़र आता है..उसकी ख़ुशी आलीशान बंगला, मोटरकार या लग्जरीस् में नहीं है बल्कि उसे दूर कहीं पर्वत पे एक कच्चा-सा पर अपना-सा घर चाहिए, प्यार करने वाला हमसफ़र चाहिये। इम्तियाज़ की इन कथाओं के सार को तहलका के फिल्म समीक्षक गौरव सोलंकी कुछ यूं बयाँ करते हैं "इम्तियाज के पास हमारे समय की सबसे ईमानदार प्रेम कहानियां हैं और वह होना बड़ी बात नहीं हैं क्योंकि वे और भी बहुत से लोगों के पास है. लेकिन इम्तियाज़ के पास उनका सबसे ईमानदार ट्रीटमेंट भी है..उनके पास युवाओं की भाषा है जिससे वे गज़ब के रोचक डॉयलाग गढ़ते हैं और बचपना है जो तालाब में कूदने से पहले  उसकी गहराई का अंदाज लगाने वाली तहजीब में यकीन नहीं रखता।"

बहरहाल, भले ही 'हाइवे' का प्रस्तुतिकरण व रोचकता इम्तियाज़ की बाकी फ़िल्मों की तुलना में कमजोर है पर फ़िल्म की मूल आत्मा में इम्तियाज़ का हृदय ही नज़र आता है और इम्तियाज़ की ये फ़िल्म कई मामलों में 'रॉकस्टार' की उन्हीं संवेदनाओं को छूकर आने की कोशिश करती है जिसमें कहानी, संवाद या प्रस्तुतिकरण ज्यादा मायने नहीं रखता, बस आप हर फ्रेम के साथ अहसासों की चासनी को अपने ज़हन में जाने का मौका देते जाईये..और वैसे भी इम्तियाज़ की ही फ़िल्म का सुर है "जो भी मैं कहना चाहूं, बरबाद करें अल्फाज़ मेरे" इसलिये लफ्ज़ों से बहुत दूर जाकर इस फ़िल्म को देखना होगा...जिसमें इंसान के दिल की अमूर्त तड़प को साकार करने की कोशिश इम्तियाज ने की है। खासतौर से नायक-नायिका द्वारा एक-दूसरे को आलिंगन करने वाला दृश्य जहाँ नायक अपने बनावटी रौबदार रूप से बाहर निकल एक बच्चा बन जाता है और नायिका स्त्री के स्वभावाविक रूप माँ के किरदार में आ जाती है...ओशो रजनीश की बात याद आती है कि प्रेम की गहराई पुरुष और स्त्री को उनके सर्वोत्तम और स्वाभाविक रूप में ला देती है जहाँ पुरुष में पुत्रत्व और स्त्री में मातृत्व का भाव आ जाता है और यही स्त्री-पुरुष का उत्कृष्टतम व सच्चा रूप है..इस रूप में आने के बाद स्त्री-पुरुष का आपस में किया गया आलिंगन, संभोग की परिधि से बाहर निकल जाता है अन्यथा इस संपूर्ण विश्व में प्रेम के नाम पे अपने हवस की पूर्ति और रस्म अदायगी ही हो रही है।

खैर, एक दर्शनीय फ़िल्म...कथा के परे यदि विधा के स्तर पर बात की जाय तो भी भले महानतम न हो पर बदतर भी नहीं है..ए आर रहमान का संगीत उनकी प्रतिष्ठा के अनुरूप। सिनेमैटोग्राफी और लोकेशन्स बेहतरीन और आपका पैसा वसूल करने की ताकत तो इसकी खूबसूरत लोकेशन्स में ही काफी है, सिनेमाई कथ्य की गुणवत्ता तो मुफ्त है..आलिया भट्ट का अभिनय लाजवाब है उन्हें देख लगता नहीं कि ये उनकी महज़ दूसरी फ़िल्म है..रणदीप हुड्डा का चुनाव एक किडनैपर के किरदार अनुसार एकदम फिट बैठा है..स्वाभाविक और उत्कृष्ट अभिनय। कुल मिलाकर कंपलीट पैकेज पर आप इसे सिर्फ मनोरंजन की उथली सतह से परे जाकर देखिये..ये आपको खुद के अहसासों का बोध कराने वाली प्रतीत होगी। एक आम इंसान की कथा..जहाँ कोरा आदर्शवाद नहीं बस स्वाभाविक आजादी की माँग है..जो प्रैक्टिकल है पर स्वार्थी नहीं। आपाधापी से घिरे किरदार बस मांगते है रत्ती भर प्यार..हमारी आपकी तरह। लेकिन समाज और रिवाज़ उन्हें काट देना चाहते हैं हमेशा की तरह सभ्य बनकर और प्यार करने वालों को असभ्य बनाकर..लेकिन फिर भी इन नायक-नायिकाओं का प्यार, नजदीकियों का मोहताज़ नही हैं..इरशाद कामिल 'रॉकस्टार' के लिये लिखते हैं 'जितना महसूस करुं तुमको, उतना मैं पा भी लूं' वैसा ही कुछ हाईवे में कहते हैं "हर दूरी शरमाये, तू साथ है हो दिन-रात है..साया-साया माही वे"। बंधनों के बावजूद प्रेम का सदियों से चला आ रहा अंतिम रिसोल्युशन- दूरियों के बावजूद बस एक अहसास...बिल्कुल हमारी-तुम्हारी तरह।