Tuesday, February 5, 2019
जश्न और जीत की नई गर्जना - हाऊज् द जोश? …..हाई सर!!!
Saturday, March 24, 2018
शिक्षक और शिक्षण को आदरांजलि : हिचकी
रानी मुखर्जी का जीवंत और आत्मीय अभिनय 'हिचकी' को उन चुनिंदा फिल्मों की श्रेणी में खड़ा कर देता है जिन्हें केवल देखा नहीं जाता, बल्कि लंबे समय तक महसूस किया जाता है। मर्दानी के लगभग चार वर्ष बाद बड़े पर्दे पर लौटी रानी के लिए इससे बेहतर वापसी शायद संभव नहीं थी। उन्होंने एक बार फिर सिद्ध किया कि उत्कृष्ट अभिनय का कोई विकल्प नहीं होता। अपने दौर की शीर्ष अभिनेत्रियों में शुमार रानी, एकल महिला सितारा होते हुए भी पूरी फिल्म को अपने कंधों पर सहजता से लेकर चलती हैं और कहीं न कहीं श्रीदेवी की याद ताजा कर देती हैं, जिन्होंने English Vinglish और Mom जैसी महिला-केंद्रित फिल्मों से अपनी अद्भुत वापसी दर्ज कराई थी।
'हिचकी' दरअसल नाकामयाबियों और जन्मजात सीमाओं को चुनौती देने वाली एक विलक्षण सिनेमाई कृति है। यह मेहनत, जिजीविषा और अटूट इच्छाशक्ति का ऐसा मधुर राग है जो बार-बार गिरने के बाद भी फिर से उठ खड़े होने का साहस देता है। यह सिखाती है कि कई बार असफलताओं का चरम, सफलता के सबसे निकट होने का संकेत होता है और उस दरवाजे को खोलने के लिए बस "एक और" दस्तक की जरूरत होती है। यह फिल्म "क्यों?" और "क्यों नहीं?" के बीच का अंतर समझाती है तथा निराशा के अंधकार में भटक रहे व्यक्ति के लिए ध्रुवतारे की तरह दिशा दिखाती है।
यह उन दुर्लभ फिल्मों में शामिल है जिन्हें आंखें केवल देखती नहीं, बल्कि आत्मा महसूस करती है। हर दृश्य मन की गहराइयों में उतरता चला जाता है और भावनाओं का ऐसा ज्वार पैदा करता है कि कई बार आंखें अनायास ही नम हो उठती हैं। दिलचस्प यह है कि उस क्षण हम अपनी भावुकता छिपाने के लिए बगल में बैठे व्यक्ति की ओर भी नहीं देखते, जबकि संभव है कि वह भी ठीक उसी भावावेश से गुजर रहा हो।
फिल्म में नैना माथुर (रानी मुखर्जी) के प्रिंसिपल पद से सेवानिवृत्त होकर विद्यालय से विदा लेने वाला दृश्य मुझे व्यक्तिगत रूप से सबसे अधिक भावुक करता है। उस पल अनायास ही अपने अध्यापन जीवन की स्मृतियां ताजा हो जाती हैं। विद्यार्थियों द्वारा दी गई वह आत्मीय विदाई आज भी स्मृतिपटल पर वैसी ही अंकित है। संयोग देखिए कि लगभग चार वर्ष पहले मार्च माह के इन्हीं दिनों, जीवन की व्यावहारिक आवश्यकताओं और बेहतर आर्थिक संभावनाओं के आकर्षण में मैंने अपने सबसे प्रिय अध्यापन-करियर को अलविदा कह दिया था। दुनिया की नजर में शायद मैंने आगे बढ़कर कुछ बेहतर हासिल किया हो, लेकिन उस निर्णय का एक मौन अफसोस आज भी मन के किसी कोने में जीवित है।
फिल्म का अंतिम संवाद शिक्षा व्यवस्था पर गहरी टिप्पणी करता है। नैना माथुर का प्रतिद्वंद्वी रहा शिक्षक अंततः स्वीकार करता है कि "दुनिया में कोई विद्यार्थी बुरा नहीं होता, अच्छे या बुरे शिक्षक होते हैं। और जो मानवीय दृष्टि से अच्छे नहीं हैं, वे वास्तव में शिक्षक कहलाने के योग्य भी नहीं हैं।" शायद यही संवाद पूरी फिल्म का सबसे बड़ा संदेश भी है।
चलते-चलते, अपने विद्यार्थियों द्वारा दी गई विदाई के उस वीडियो (जिसका यूट्यूब लिंक नीचे संलग्न है) को याद करते हुए मैं पूरे मन से 'हिचकी' देखने की अनुशंसा करता हूँ। यदि आपने अब तक यह फिल्म नहीं देखी है, तो इसे केवल एक फिल्म समझकर नहीं, बल्कि जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण को थोड़ा और विस्तृत करने के लिए अवश्य देखिए।
https://www.youtube.com/watch?v=ePhjjpGSpSs
इत्यलम्।
Saturday, February 17, 2018
बड़े-बड़े विमर्शों के बीच उपेक्षित होती छोटी-छोटी बातों का दस्तावेज : पैडमैन
Wednesday, May 4, 2016
कालीन के नीचे छिपी सार्थकता के "फैन" बनाम चौंधियाती सफलता का "सन्नाटा"
Saturday, January 23, 2016
पैसे और प्रतिभा का सर्वोत्तम उपयोग...कि वो दूसरों के काम आये : एयरलिफ्ट
Tuesday, December 1, 2015
ज़िंदगी के रंगमंच पे भरमाये जज़्बातों का 'तमाशा'
Sunday, June 14, 2015
खूबसूरत बाग में सूखे पत्तों की अहमियत : हमारी अधूरी कहानी
Tuesday, June 9, 2015
समाज के दो भिन्न ध्रुवों पर खड़ी नारियों का प्रतीक : तनुजा और कुसुम
Monday, May 25, 2015
सार्थक मनोरंजन की वेदी पे फूटी सृजन की कोपल : तनु वेड्स मनु रिटर्न्स
आनंद राय ने कथा को अपने प्रस्तावित उद्देश्य तक ले जाने के लिये इस बार तनु के साथ दत्तो का भी साथ लिया है और दोनों ही किरदारो में कंगना के अभिनय ने एकतरफा साम्राज्य किया है। 'क्वीन' के बाद अब 'तनु वेड्स मनु' ने कंगना को चोटी पर विराजी समकालीन अभिनेत्रियों की श्रेणी में ला खड़ा किया है और कई मामलों में वे मौजूदा दौर की अभिनेत्रियों से भी ऊपर पहुंच गई हैं। कंगना के अभिनय कौशल के लिये अलग लेख की दरकार है फिलहाल बात को निर्देशक आनंद एल राय और तनु वेड्स मनु तक सीमित रखते हैं।
Sunday, February 8, 2015
हंसी-खुशी का है राज़ फ़िल्लम, फुल्ली फिल्लम है सांस भी : शमिताभ
Saturday, December 20, 2014
इक बूंद भी उसने न पी पर 'पीके' वो कहलाया था : टिंगा-टिंगा, नंगा-पुंगा दोस्त
पीके। आमिर ख़ान अभिनीत और राजकुमार हीरानी निर्देशित एक बेहतरीन फ़िल्म। इन दो लोगों का फ़िल्म से जुड़ा होने ही इसके सार्थक और मनोरंजक होने की गारंटी देती है। हीरानी ने अपनी पिछली फ़िल्मों की तरह इस बार भी अपने कद को और ऊंचा करने का ही काम किया है..या यूं कहें की उनके मन में समाज की दोहरी वृत्तियों को लेकर बेइंतहा छटपटाहट है जो किस्तों में बाहर आ रही है। 'पीके' भी मुन्नाभाई और थ्री इडियट्स की श्रंख्ला को ही आगे बढ़ाती है। हीरानी के नायक सभ्य-सुसंस्कृत समाज के प्रतिनिधि नहीं होते..ये तो गुंडे-मवाली, इडियट्स और दूसरे ग्रह के पियक्कड़ किस्म के नमूने होते हैं जो सभ्य समाज की तमाम संस्कृति की बखैया उधेड़ते हैं। 'पीके' भी कुछ ऐसी ही है। धर्म, धर्मायतनों और धार्मिकों की सच्चाई बयां करने वाली। ईश्वर के नाम पर चल रहीं सैंकड़ों दुकानों और उनके ठेकेदारों की असल नस्ल का परिचय देने वाली। भगवान के नाम पर इंसान से उसका हक छीनने वालों को उनकी गिरेबान में झांकने पर मजबूर करने वाली।Thursday, July 3, 2014
बंजारे को घर दिलाने की कोशिश : एक विलेन
Wednesday, April 23, 2014
काश! प्रेम में सिर्फ 'टू स्टेट्स' ही होते....
Tuesday, February 25, 2014
ज़िंदगी के 'हाईवे' पे जज़्बातों का ओवरटेक कराता फ़िल्मकार : इम्तियाज़ अली
इम्तियाज़ के पात्र बड़े मनमौजी हैं..खासतौर से उनकी नायिकाएं और वे आज की चौका-चूल्हा में उलझी व बच्चे पैदा करने की मशीन बनी हुई महिलाओं को एक जवाब हैं जहाँ उनकी हस्ती इन पारंपरिक क्रियाओं से परे भी बहुत कुछ है...वे आजाद रहना चाहती हैं, कदम-कदम पे अपनी हसरतों को रौंदते रहना उन्हें पसंद नहीं, सिर्फ ज़मीन ही नहीं वे आकाश में अपना अस्तित्व खोजती है, वे नटखट हैं, बड़बोली हैं. प्यार करती है और जब-तब अपने जज़्बातों का ओवरटेक करवाती हैं...पर अपनी मर्यादाएं नहीं भूलती, उनका प्यार उद्दंता नहीं है, उनकी स्वतंत्रता कभी भी स्वच्छंदता में नहीं बदलती..आजाद रहते हुए भी उन्हें पता है कि अकेली लड़की खुली हुई तिजोरी की तरह है और पुरुष वर्चस्व वाले भौंडे समाज में उनकी नायिका खुद को प्यार करने वाले मर्द की निगाह को पहचानती हैं जिसकी नीयत साफ है...जो वाकई मर्द है।
बहरहाल, भले ही 'हाइवे' का प्रस्तुतिकरण व रोचकता इम्तियाज़ की बाकी फ़िल्मों की तुलना में कमजोर है पर फ़िल्म की मूल आत्मा में इम्तियाज़ का हृदय ही नज़र आता है और इम्तियाज़ की ये फ़िल्म कई मामलों में 'रॉकस्टार' की उन्हीं संवेदनाओं को छूकर आने की कोशिश करती है जिसमें कहानी, संवाद या प्रस्तुतिकरण ज्यादा मायने नहीं रखता, बस आप हर फ्रेम के साथ अहसासों की चासनी को अपने ज़हन में जाने का मौका देते जाईये..और वैसे भी इम्तियाज़ की ही फ़िल्म का सुर है "जो भी मैं कहना चाहूं, बरबाद करें अल्फाज़ मेरे" इसलिये लफ्ज़ों से बहुत दूर जाकर इस फ़िल्म को देखना होगा...जिसमें इंसान के दिल की अमूर्त तड़प को साकार करने की कोशिश इम्तियाज ने की है। खासतौर से नायक-नायिका द्वारा एक-दूसरे को आलिंगन करने वाला दृश्य जहाँ नायक अपने बनावटी रौबदार रूप से बाहर निकल एक बच्चा बन जाता है और नायिका स्त्री के स्वभावाविक रूप माँ के किरदार में आ जाती है...ओशो रजनीश की बात याद आती है कि प्रेम की गहराई पुरुष और स्त्री को उनके सर्वोत्तम और स्वाभाविक रूप में ला देती है जहाँ पुरुष में पुत्रत्व और स्त्री में मातृत्व का भाव आ जाता है और यही स्त्री-पुरुष का उत्कृष्टतम व सच्चा रूप है..इस रूप में आने के बाद स्त्री-पुरुष का आपस में किया गया आलिंगन, संभोग की परिधि से बाहर निकल जाता है अन्यथा इस संपूर्ण विश्व में प्रेम के नाम पे अपने हवस की पूर्ति और रस्म अदायगी ही हो रही है।










