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Friday, June 20, 2014

कसक

(ये पोस्ट मेरी लिखी एक कहानी "कसक" का एक अंश है..जो मुझे बेहद पसंद है। हाल ही में ये कथा महिला पाठकों पर आधारित पत्रिका 'संगिनी' में प्रकाशित हुई। कहानी का ये हिस्सा कथा के नायक- आरव और नायिका-पूनम के बीच हुए उस संवाद पर आधारित है जब वे एक-दूसरे से बिछड़ने के तकरीबन आठ साल बाद मिलते हैं....)

.........उस पूरे विशाल सभागृह में जब साथियों को अवार्ड के लिये बुलाया जाता तो शोर मच जाता। कॉलेज के कन्वोकेशन के लिये आयोजित उस पूरे माहौल में यूँ तो बहुत शोर था..पर आरव के ज़हन में गहन सन्नाटा पसरा हुआ था और वो अपने मोबाईल पर आये पूनम के उस मैसेज के बारे में ही सोच रहा था जिसमें उसने आरव से बस एक बार मिलने की गुज़ारिश की थी। मानो सालों पहले बंद कर दी गई किसी किताब के पन्ने हवा का झोंका आने से फिर पलट रहे हों और इस झोंके के कारण आरव अनचाहे ही यादों के सफ़र पर निकल गया...जहाँ चारों तरफ बस बेखुदी और दीवानेपन की बयार लहलहाया करती थी। अपनी इस कसमकस को दूर करने के लिये आरव ने पूनम से मिलना ही मुनासिब समझा...और शाम को सूरज ढलने से ठीक पहले वो तय किये स्थान पर पहुंच गया..जहाँ से नीचे देखने पर शहर के कदमों में पसरा विशाल तालाब अपनी लहरों से अठखेलियां कर रहा था और ऊपर देखने पर था अनंत नीरव आकाश...और इन दोनों के बीच असंख्य जज़्बात लिये खामोश खड़े पूनम और आरव..........

बड़ी देर से माहौल में फैली चुप्पी को तोड़ते हुए आखिर पूनम ने कहा-
पूनमः- कैसे हो?
            आरव ने अपनी आँखों को ऊपर उठाकर बड़ी ही उपेक्षित और घृणित निगाहों से पूनम को देखा।
पूनमः- (कुछ झेंपते हुए..एक मर्तबा फिर) घर में सब कैसे है?
           आरव ने फिर कुछ अजीब से मूँह बनाते हुए गहरी सांसे भरी।
 पूनमः- कुछ तो बोलो...
आरवः- (आँखें तररते हुए और बड़े ही सख़्त लहज़े में) क्या बोलूं? मैं कैसा हूँ..तुम कैसी हो...इन सब बातों में रक्खा क्या है या इन बातों को जानने, न जानने से किसी को क्या फर्क पड़ने वाला है...जल्दी अपनी बात ख़त्म करो और मुझे यहाँ से जाने दो।
पूनमः- मुुझसे इतनी नफ़रत क्युं है तुम्हें?
आरवः- नफरत? तुमसे क्युं नफरत होगी मुझे..जिसका मेरी ज़िंदगी में कोई अस्तित्व ही नहीं उसके लिये कैसी नफ़रत या कैसी मोहब्बत। मैं तुम्हारे लिये और तुम मेरे लिये तो कब की मर चुकी हो...
       शब्दों का बेहद कटु अस्त्र छोड़ा था आरव ने पूनम कुछ बोलने की स्थिति में नहीं थी अब..फिर भी कुछ देर की खामोशी के बाद उसने बड़े हिचकते हुए कुछ कहा क्योंकि वो बहुत सारी अधूरी बातें आज साफ करना चाहती थी।
पूनमः- तुम ऐसा बर्ताव क्युं कर रहे हो..जब हम साथ थे तो याद है न तुम क्या कहते थे कि हम....
आरवः- (पूनम की बात ख़त्म होने से पहले ही बात काटते हुए आरव ने कहा) जब हम साथ थे...(एक कुटिल मुस्कान उसके चेहरे पे तैर गई) साथ थे तब तो तुमने भी क्या-क्या कहा था पूनम...मुझे याद कराने से अच्छा है कि तुम याद कर लो और वैसे भी क्या होने वाला है अब इन सब बातों में..अब तो तुम्हारा अपना परिवार है..बच्चे हैं वहाँ अपना ध्यान लगाओ न...क्युं सूख चुके ज़ख्मों की पपड़ियां उखाड़ रही हो?
पूनमः- तुम्हारे सूखे होंगे..पर मेरे दिल में तो आज भी कसक बाकी है...कहने को सबकुछ है मेरे पास पर फिर भी एक अधूरापन हमेशा सताता है मुझे।
आरवः- कसक! तुम क्या जानो कसक क्या होती है (फिर कुटिल मुस्कान के साथ)
पूनमः- सच आरव! हर रोज़ तुम्हें याद करती हूँ...
आरवः- और मैं हर रोज़ तुम्हें भुलाने की कोशिश...
पूनमः- मैं अपनी ज़िंदगी के उन्हीं पलों को पाना चाहती हूँ जब तुम मेरे साथ थे..
आरवः- और मैं ज़िंदगी के उन्हीं पलों को अपने अतीत से मिटाना चाहता हूँ, जब तुम मेरे साथ थी...
पूनमः- ऐसा क्युं कह रहे हो आरव...तुम्हारा प्यार तो कभी हासिल करने का मोहताज़ नहीं था...
आरवः- हाँ बिल्कुल! और मुझे तुम्हारे न मिलने को लेकर कोई कसक भी नहीं है..मुझे कसक है उन दोगुले जज़्बातों के लिये जो तुमने मेरे सामने दिखाये..मुझे कसक है तुम्हारे दोहरे रवैये के कारण..मुझे शिकायत है तुम्हारी उन लफ्फाज़ी भरी बातों से जो अनायास ही मेरे अहसासों को मचलने पर मजबूर करती थी और मुझे दुनिया से बगावत के लिये उकसाती थी..मुझे शिकायत है तुम्हारी उस सोच से जो मुझे सिर्फ तुम्हारे खालीपन को भरने का ज़रिया समझती थी..जो एकसाथ दो-दो नावों पे सवारी करने का ख़याल दिल में पालती थी..तुम्हारा झूठ और कई बार तुम्हारी खामोशी...न जाने कितनी चीज़ें है जिसके चलते मुझे शिकायत है..मुझे कभी कोई शिकायत और कसक तुम्हारे बिछड़ने से पैदा हुए कड़वे यथार्थ से नहीं मुझे हमेशा से सिर्फ तुम्हारे स्वार्थी, तो कभी बेवकूफ तो कभी बेशर्म लहज़े के कारण ही रही है और अब तो मैंने इस कसक को भी खुद से दूर कर फेंका है इसलिय इन बातों को न ही करो तो बेहतर है.....
       (एक मर्तबा फिर गहन खामोशी..पर तब भी दिल के अंदर हज़ारों जज़्बात चीख रहे थे)

पूनमः- तुम नहीं समझोगे कि मैंने क्या खोया है..हर रोज़ इन आँखों से आँसू बहे हैं...
आरवः- हाँ, आँसू बहाना लाज़मी भी है क्युंकि तुमने सच में बहुत कुछ खोया है पूनम! मैं कभी नहीं रोयाा क्युंकि मुझे पता है मैंने कुछ नहीं खोया पर तुमने खोया है...मुझसे तो वो इंसान दूर हुआ जो कभी मेरा होना ही नहीं चाहता था पर तुमने उसे खोया है जो हमेशा तुम्हारा बनके रहना चाहता था।
पूनमः- एक लड़की के हालात और उसकी मजबूरियों को तुम नहीं समझ सकते...कभी तुम मेरी जगह आके तो सोचने की कोशिश करो।
आरवः- यदि मैं तुम्हारी जगह आके सोचने लगूँगा तो मेरी जगह आके कौन सोचेगा..मैंने प्यार किया था पूनम और प्यार सारी समझदारी ख़त्म होने के बाद ही परवान चढ़ता है..मैं क्युं कुछ समझूं, तुमने तो समझ लिया न सब..और अपनी उस समझ से ही तो तुम्हें ये खूबसूरत ज़िंदगी मिली है..(ताने मारने के अंदाज़ में आरव ने कहा)
पूनमः- तुम्हारी कितनी गलत फीलिंग है मेरे लिये पर मैंने हमेशा तुम्हारी बेहतरी की दुआ की है..तुम्हारे हर अचीवमेंट पे मुझे तुमसे ज्यादा खुशी मिली है आरव...
आरवः- अचीवमेंट! (खींझते हुए आरव बोला) किसे अचीवमेंट कहती हो तुम? यही कि मेरी दो पुस्तकें छप गई हैं या ये अचीवमेंट है कि मैं आज एक मोटी तनख्वाह वाली रुतबेदार नौकरी कर रहा हूँ...या फिर देश की पत्र-पत्रिकाओं में एक नामी स्तंभकार के तौर पे मेरे लेख पढ़े जाते हैं..या फिर बंगला, गाड़ी या बैंक बैलेंस..क्या है तुम्हारी नज़र में अचीवमेंटय़? जिससे इंसान के अहंकार की पुष्टि होती है बस वही सबसे बड़ी उपलब्धि होती है पूनम! और मेरा अहंकार तो तुम थी उस अहंकार के टूटने के बाद ऐसी कौनसी चीज़ है जो मुझे अचीवमेंट लगेगी..आज जो कुछ भी मेरे पास है वो बस एक बोझ है कोई उपलब्धि नहीं। जिसे मैं  भोगता नहीं बल्कि भुगतता हूँ।
पूनमः- हम्म्म...फिर भी तुम्हारे पास ऐसी हजारों चीज़ें हैं जो कहीं न कहीं तुम्हारे खालीपन को भर देती है पर मेरे पास तो बस अथाह अकेलापन है जो किसी को नज़र नहीं आता...
आरवः- आज जो मेरे पास है मैंने इसकी तमन्ना कभी नहीं की थी...मैं एक बहुत साधारण सी खुशनुमा ज़िंदगी बिताना चाहता था..एक बेहद मामुली इंसान बनके...पर तुम्हारे जाने के बाद मिली ये हज़ारों चीज़ें बस मेरे सुकून में खलल डालती है और न चाहते हुए भी आज मैं इनमें इतना उलझ गया हूँ कि अब पूरे जहाँ में इस उलझन से निकलने की गुंजाइश नज़र नहीं आती..और ये सारी उलझनें, जिसे दुनिया कामयाबी कहती है तुम्हारे जाने के बाद ही शुरु हुई थी...खैर, पता नहीं क्युं अब ये सब बातें मैं तुमसे कर रहा हूँ...
पूनमः- नहीं, कह लो आरव..कम से कम इससे ही तुम्हारी भड़ास कुछ कम हो जाये...
आरवः- हाँ सही कहती हो...मैं चाहे कुछ भी क्युं न कह लूँ पर तुमपे किसी बात का क्या फर्क पड़ने वाला है...शब्दों की अहमियत तुम्हें कब समझ आती है तुम्हारे लिये तो बातें बस बातें ही हैं न...भगवान ने मूँह दिया है तो बस बक दो कुछ भी..और वही तो तुमने हमेशा किया है और सबकी बातों को भी बस ऐसे ही सुना..हैं न?
पूनमः- सोचा था...कुछ अच्छी बातें करके अपने गुज़रे वक्त में से कुछ खुशनुमा पलों को चुरा लाउंगी तुम्हारे साथ..पर मुझे नहीं पता था कि मेरी उम्मीद से कई ज्यादा नफ़रत भरी है तुम्हारे दिल में मेरे लिये...
(बड़े ही अजीब लहज़े में एक बार फिर आरव ने अपना सिर हिलाया..मानो पूनम की बातें उसके लिये कोरी गप्प की तरह हो)
पूनमः- लेकिन मुझे खुशी है कि मुझे किसी ने कभी, कुछ पलों के लिये ही सही..पूरी शिद्दत से चाहा..और इसके लिये मैं खुद को हमेशा खुशकिस्मत समझूंगी...
आरवः- हाँ...समझ सकती हो...पर याद रखना मैंने तुम्हें इतना चाहा इस कारण तुम कोई बहुत खास हस्ती नहीं हो जाती..न तो तुम ही स्पेशल हो और न ही मैं...स्पेशल है मेरे वो जज़्बात जिनका क़त्ल कर तुमने आगे का रास्ता अख़्तियार किया..औऱ एक बाद याद रखना कि तुम्हारी जगह कोई और भी होता तो उससे भी मैं ऐसी ही मोहब्बत करता...
पूनमः- (कुछ-कुछ हकलाते हुएआरव..तुम्हारे और मेरे जज़्बातों में बस इतना फ्फर्क है कि तुम्हें अपने अहसासों को लफ्ज़ों में पिरोना आता है और मेरे जज़्बात दिल में कुलाटी मारकर ही दम तोड़ देते हैं....तुम कह सकते हो पर मैं............................
                 और अपनी आदत के अनुसार एक बार फिर पूनम नम आँखें लिये अपने आँसूओं को रोकने की नाकाम कोशिश करने लगी..पर फिर भी पूनम की बांयी आँख से निकली दो आँसू की बूंदें उसके गालों को छूते हूए ज़मीन पर गिर गई...कभी आरव इन आँसूओं को गालों पे आने से पहले ही अपने हाथों में या होंठो पे झेल लेता था पर अब वो निष्ठुर, निर्दयी बना बस एकटक पूनम को निहारता रहा........वक्त के साथ कितना कुछ बदल जाता है।

              दुनिया में मोहब्बत के जज़्बात सबसे अजीब है जिनके सही या ग़लत का फैसला करने वाली कोई अदालत जमाने में मौजूद नहीं है...हर मर्तबा इन जज़्बातों का क़त्ल करने वाला गुनहगार बेनेफिट ऑफ डाउट्स के कारण छूट जाता है और इसके बाद बाहरी दुनिया का हर इंसान अपनी-अपनी नज़ीर और अपने-अपने बयान पेश कर प्रेम को लेकर अपना नज़रिया तय करता है....और प्रेम के पाक जज़्बात भरी महफिलों में बस हंसी के शिगूफे बनकर रह जाते हैं.....................