साला सब फ़िल्मी है...

फ़िल्मी दुनिया में हकीकत की तलाश है..

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Friday, June 2, 2023

अखबारों की सुर्खियों में लंदन में आयोजित Pure Soul संगोष्ठी।






































Posted by Ankur Jain at 1:53 AM No comments:
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Labels: Pure Soul, SOAS, Taran Swami, University of London
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अपने बारे में....

Ankur Jain
Bhopal, Madhyapradesh, India
ज़िंदगी को जिंदादिली से जीने का कायल। सपने कई हैं पर कोई भी जिंदगी से बड़े नहीं, बस इसीलिये दौड़ने से ज्यादा थमे रहने में मशगूल। कुछ करने की अपेक्षा साक्षी बने रहना ज्यादा भाता है कोई इसे मेरा निकम्मापन कहे तो कहे। खैर, मार्च 2014 से डीडी न्यूज भोपाल में बतौर कॉपी एडिटर कार्यरत। इससे पहले भोपाल की ही पीपुल्स युनिवर्सिटी में करीब तीन वर्ष तक अध्यापन। टोडरमल दि. जैन सिद्धांत महाविद्यालय से स्नातक कर आगे की पढ़ाई हेतु मीडिया संस्थानों का रुख किया। ज़िंदगी की कई विपरीत परिस्थितियों से कुछ इल्म भी हुआ बाकी तालीम के खर्चों की रसीदें भी बहुत जुटाई। मीडिया अध्ययन में पीएचडी, एमएससी (इलेक्ट्रॉनिक मीडिया), एमफिल (मास कम्युनिकेशन), एमए (हिन्दी, फिलोसोफी, हिस्ट्री एवं एजुकेशन) की उपाधियां अहंकार बढ़ा रही हैं। दुनिया घूमने, फिल्में पढ़ने और किताबें देखने का भी शगल है और कुछ कुछ लिखने की कुलबुलाहट भी बनी रहती है जब विचार ज्यादा ही उधेड़बुन ज़ेहन में करते हैं तो उनमें से कुछ इस ब्लॉगोस्फियर पर उड़ेल देता हूँ। "ये हौसला कैसे झुके" नामक पुस्तक का लेखन। कई पत्र-पत्रिकाओं में लेख भी प्रकाशित। अनेक शोध संगोष्ठियों में शोध पत्र प्रस्तुत, जिनमें वर्ष 2023 में युनिवर्सिटी ऑफ लंदन का शोधपत्र भी शामिल, बस इतना सा खुद ने कुछ बोलने-बताने के लिये किया है। बाकी तो जब मिलो तो खुद ही निर्णय करना।
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कितने आदमी थे....


widgeo.net

ब्लॉग के बारे में...

बचपन से ही फिल्मो को लेकर जबरदस्त क्रेज रहा है...इसलिए जिंदगी भी फ़िल्मी सी हो गई है...इस फ़िल्मी होती जिंदगी में सच को तलाश रहा हूँ...अपने ज़हन को भी सिनेमाई माध्यम की तरह प्रयोगशाला बना दिया है...जहां कई विचारों का पोस्टमार्टम चलता रहता है और उस पोस्टमार्टम से बाहर आये परिणामों का कुछ अंश इस ब्लॉग पर पटक देता हुं...फिल्मो के बढ़ते प्रभाव में रील लाइफ और रियल लाइफ का भेद करना मुश्किल हो गया है...अब हर ज़ज्बात, भावनाये, संवेदनाएं फ़िल्मी सी ही लगती है...और इस फ़िल्मी होती दुनिया में असल जाने कहाँ दबा पड़ा है...बस अपने विचारों और सोच से उस असल को खंगालने का प्रयास है-ये ब्लॉग....मेरे दिल का आइना बनने की कोशिश करता है-ये ब्लॉग...मेरी दिमागी तिकड़म को परोसने की हसरत है-ये ब्लॉग...ये फ़िल्मी नहीं है, लेकिन फिर भी फ़िल्मी है-ये ब्लॉग...और यही इसका ठिकाना भी है....तो चटका लगाते रहे-www.filmihai.blogspot.com पर...और इस पे पड़ी हुई किसी सामग्री ने आपके जज़्बातों या विचारों के सुकून में कुछ ख़लल डाली हो या उन्हें अनावश्यक मचलने पर मजबूर किया हो तो मुझे उससे वाकिफ़ ज़रूर करायें...मुझसे सहमत या असहमत होने का आपको पूरा हक़ है.....
अंकुर 'अंश'

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    (टीचर्स डे के विशेष उपलक्ष्य में प्रस्तुत, भारतीय सिनेमा में अध्यापक की बदलती छवि को बयाँ करती प्रस्तुति-) “ यह तन विष की बेलरी , गुरु...
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    (गांधी जी की 150वी जयंती वर्ष में प्रकाशित हो रही एक पत्रिका के विशेषांक के लिए लेख तैयार किया है इसलिए ब्लॉग के पाठकों के लिए जरूरत से ज्...
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    कालिदास के प्रेम रस से सराबोर नाटको से लेकर शेक्सपीयर की अमर रोमांटिक कृतियों तक...मीरा की भक्ति से लेकर जायसी के विरह बारहमासों तक, गुरु...
  • इक बूंद भी उसने न पी पर 'पीके' वो कहलाया था : टिंगा-टिंगा, नंगा-पुंगा दोस्त
    वैश्विक परिदृष्य में इन दिनों पाकिस्तान में हुई आतंकवादी वारदात की ख़बर ताजी है..भारत में धर्मांतरण के मुद्दे पर संसद आये दिन गरमाती रहती ...
  • जिंदगी का हर पत्थर इतना बड़ा नहीं होता कि सबकी नज़र में आ जाये- "भाग मिल्खा भाग"
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अक्सर घूमा करता हूँ..जिन गलियों में

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    गोलघर चलोगे? गंगा एकदम ललमटिया गई होगी - It will never be not strange. कि सपने में बौखते हुए तुम अचानक से न टकराओ। धुंध-भरी स्काईलाइन पर कई इमारतें हों। कुछ न्यू-यॉर्क, कुछ पेरिस…नदी बहती हो...
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    मगर मुश्किल है राँझे-हीर का किरदार हो जाना ... - *मुझे अच्छा लगेगा आपका सरकार हो जाना,ये गलती है, तो इस गलती, का सौ-सौ बार हो जाना. छपक छप-छप लहर के साथ सागर पार हो जाना,इसे कहते हैं ...
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    जब माँ साथ होती है!! - जाने कहाँ छिप जाती हैउ उदासी, ख़ामोशी, और तन्हाई जब माँ साथ होती है !!! ... सारी मुस्कराहटों को पता होता है, माँ की धड़कनों से हर कोना हँसता है, ...
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