Sunday, May 19, 2013

प्रेम की असंख्य परतें और 'आशिक़ी 2' की लोकप्रियता का रसायन....

फ़िल्म 'आशिक़ी-2' का प्रदर्शन हुए तकरीबन एक महीने से ऊपर हो चुका है लेकिन आज भी ये बेहद सामान्य सी फ़िल्म युवाओं और कुछ विशेष सेंटीमेंटल टाइप के दर्शकों को ख़ासी लुभा रही है। हालांकि मैनें सोचा नहीं था कि इस फ़िल्म पर कुछ लिखुंगा..लेकिन दिनोंदिन दर्शकों में बढ़ती इस फ़िल्म की खुमारी ने मुझे इस फ़िल्म की लोकप्रियता और मानव हृदय में स्थित भावनात्मक और वासनात्मक असंख्य परतों के रसायन को समझने पर विवश कर दिया। यद्यपि ये कभी संभव नहीं हो सकता कि आप व्यक्तित्व की परतों की उधेड़बुन करते हुए..किसी मानवमन का असल चित्रण प्रस्तुत कर सको या फिर किसी परिणाम के कारणों की कोई सार्वभौमिक, सर्वमान्य व्याख्या दे सको... क्योंकि हृदय की संकरी गलियों में कोई दूसरा व्यक्ति तो क्या हम स्वयं ही प्रवेश नहीं पा पाते। ये बता पाना नितांत नामुमकिन है कि किस परिस्थिति पर व्यक्ति का रवैया क्या होगा..और वो किस राह को चुनेगा।

हमारे सिनेमा ने हमेशा सुखांत का ही चुनाव किया है और सुखांत ही दर्शक के मनोरंजन की मुख्य धुरी रहा है। अपने अधूरे सपने, दबी-कुची इच्छाओं को पूरा करने और शोषण के विरुद्ध स्वर मुखर करने की वो मंशा जिसे दर्शक अपने यथार्थ में पूरा नहीं कर पाता...उसे इस 70 MM के परदे पर देख वो संतुष्ट भी होता है और मनोरंजित भी। ऐसे में 'आशिक़ी-2' के दुखांत को स्वीकार करना और उसे लोकप्रिय बनाना दर्शक की बदलती सोच का प्रतीक है या जिसे हम कह सकते हैं कि ये भावनात्मक परिपक्वता और यथार्थ की स्वीकारता का परिचायक है या फिर इसे हम भारतीय दर्शकों के मूड़ की बात मान सकते हैं जो दर्शक कभी तो कचरा-कूरा भी खा लेता है और कभी उसी कचरे को महज इसलिए नकार देता है कि उसपे मक्खी बैठी होती है। हिन्दी सिनेमा में पहले भी दुखांत प्रस्तुत हुए है लेकिन उनमें मजबूत तार्किकता थी लेकिन 'आशिक़ी-2' में एक सतही तर्क देकर और उथले हालात प्रस्तुत कर प्रेम कहानी का दुखांत कर दिया जाता है। यदि ये एक मुख्यधारा के सिनेमा के इतर, किसी शराब के साइडइफेक्टस का विज्ञापन होता तब बात समझी जा सकती थी...लेकिन हिन्दुस्तानी सिनेमा के सौ वर्ष पूरे होने पर..एक सामान्य सी फ़िल्म को मिलने वाली ये लोकप्रियता चौंकाने वाली है।

नायक बेइंतहा दीवानगी में पहले सबकुछ भुलाकर एक साधारण लड़की को सुपरस्टार बनाता है और फिर अपनी एक लत के चलते न सिर्फ अपने करियर बल्कि अपने प्यार और अपनी जिंदगी को भी छोड़ देता है...लेकिन उसके इन तमाम कृत्यों को भी अंत में त्याग की तरह बतलाकर महिमामंडित किया जाता है। नायिका एक सामान्य लड़की से सुपरस्टार तक का फासला तय करती है और नायक के जाने के बाद अपने स्टारडडम को बनाये रखके नायक के त्याग के प्रति आदरांजलि प्रस्तुत करती है। और इससे भी बड़ी आदरांजलि वो दर्शक इस फ़िल्म को लोकप्रिय बनाकर दे रहे हैं जिन्होने अपनी मोहब्बत के अधूरे सपनों की चिता दिल की जमीं पे जलाई है।

दरअसल 'आशिक़ी-2' 2011 में प्रदर्शित 'रॉकस्टार' फ़िल्म का अवरोही क्रम है। 'रॉकस्टार' में नायक एक आम आदमी है फिर उसका प्रेम, दर्द का जनक बनता है और प्रेम की पीड़ा से स्टारडम पैदा हुई है..वहीं 'आशिक़ी-2' में नायक की स्टारडम से प्रेम और फिर प्रेम की पीड़ा से वो गिरकर एक आम इंसान बन जाता है। परिवर्तन दोनो जगह हुआ है लेकिन फिर भी दोनों परिवर्तनों में फर्क है क्योंकि आम से खास तो बना जा सकता है पर खास से कभी कोई आम नहीं बन सकता..क्योंकि शिखर पे चढ़ते वक्त आपकी रफ्तार संतुलित होती है आप हांफ तो सकते हो पर चोटिल नहीं होते, पर शिखर से उतरते वक्त रफ्तार बहुत तेज होती है और अक्सर चोट भी लग जाती है। गोया इंसान शिखर से उतरता नहीं, गिर जाता है। इस फ़िल्म में ही एक संवाद है 'स्टार जब फ्लॉप होता है तो बड़ा मनहूस लगने लगता है।' एक बिन्दु ऐसा होता है जहां प्रेम, पीड़ा देता है और पीड़ा से बहुत कुछ मिलता है पर न प्रेम सहन होता है न वो पीड़ा और नाही उस पीड़ा से मिला बहुत कुछ। जनक और जन्य दोनों बर्दाश्त के बाहर होते है। इस बारे में मैं अपने एक पिछले लेख प्यार का सुर और दर्द का राग : रॉकस्टार में भी काफी कुछ कह चुका हूँ।

इंसान की दिग्भ्रमित प्रवृत्ति सबसे ज्यादा प्रेम के जज्बातों में ही परिलक्षित होती है जहां वो हमेशा एक भ्रम की स्थिति में बना रहता है। भ्रम के साथ ही प्रेम में आगे बढ़ता है, भ्रम के चलते ही अपने प्रेम को अपनाने से हिचकता है और भ्रम के साथ ही उसे छोड़ देता है और छोड़ने के बाद भी उसे ये भ्रम बना रहता है कि उसका फैसला सही है या गलत? और गर प्रेम को पा भी लेता है तब भी उसे यही भ्रम होता है कि जिसे उसने पाया है क्या वो वाकई उसे प्यार करता है? इसलिये प्रेम तब तक जिंदा रहता है जब तक भ्रम जिंदा रहता है और यही भ्रम इंसान को ये अहसास कराता रहता है कि वो अकेला नहीं है। सारा उत्साह और ग़म कल्पनाओं में ही होता है पर सच्चाई ये भी है कि कल्पनाओं का सौंदर्य यथार्थ से कई गुना बड़ा होता है। इस फ़िल्म के अंत में भी नायिका के चेहरे पर मुस्कान है क्योंकि अपने प्रेम की यादें और नायक का भ्रम उसके साथ है। इसी भ्रम के साथ शाहरुख ख़ान फ़िल्म 'मोहब्बतें' में संस्कृति की धज्जियां उड़ाते हुए युवाओं के दिलों के अंदर प्रेम की पींगे फोड़ते हैं।

बहरहाल, फ़िल्म का संगीत बेहतरीन है और संभवतः ये भी इसकी लोकप्रियता का कारण हो सकता है। सुपरहिट फ़िल्म आशिकी का रीमेक होना भी इसकी प्रारंभिक सफलता की वजह हो सकती है। आदित्य रॉय कपूर और श्रद्धा कपूर में संभावनाएं हैं। संपादन और सिनेमेटोग्राफी के स्तर पर फ़िल्म में कई खामियां हैं। फ़िल्म की कहानी मध्यांतर में सुस्त पड़ती है और स्क्रीनप्ले पर से भी निर्देशक की ग्रिप ढीली पड़ती है। कुल मिलाकर एक समान्य फ़िल्म है लेकिन फ़िल्म से जुड़े सभी लोगों का भविष्य उज्जवल है क्योंकि इसकी लोकप्रियता और भट्ट कैंप का साथ उन्हें आगे बढ़ाने के लिए काफी है। 

खैर, प्रेम और लोकप्रियता का रसायन समझना प्याज की परतें उतारने की तरह है इन परतों को उतारते-उतारते हाथ में कुछ नहीं आता..बस अंत में एक महक रह जाती है और आजकल तो वो महक भी नकली है..........

Thursday, May 2, 2013

हिन्दी सिनेमा के सौ बरस

(ये आलेख दैनिक समाचार पत्र 'पीपुल्स समाचार' के संपादकीय में कल अर्थात् 3 मई 2013 को प्रकाशित होने जा रहा है...अपने ब्लॉगर मित्रों से पहले ही इसे साझा कर रहा हूँ)

 कुछ तिथियां अनायास ही ऐसी क्रांतियों की गवाह बन जाती हैं जिन्हें सालों बाद बड़े उत्सवों के साथ याद किया जाता है। इन तिथियों पर किये गये कार्यों को इतिहास में सम्मान के साथ देखा जाता है लेकिन इन कार्यों को जन्म देने वाले लोगों को खुद पता नहीं होता कि वे भविष्य में एक क्रांति के जनक के तौर पर याद किये जायेंगे। 3 मई 1913, की तिथि एक ऐसी ही अभूतपूर्व क्रांति की गवाह है जिस दिन भारतीय सिनेमा के जनक दादा साहेब फाल्के ने एक ऐसे संचार माध्यम का भारतीय सरजमीं पर सूत्रपात किया था जो आगे चलकर समाज का प्रमुख मानसिक भोजन बन गया। पहली बार लोगों ने जिंदगियों को परदे पर अठखेलियां करते देखा और आज हालात यह है कि सिनेमा को निकालकर समाज की कल्पना करना ही मुश्किल हो गया है।

    सौ सालों का लंबा फासला और लाखों फिल्मों की बहुमूल्य विरासत की नींव पर खड़ा आज हमारे देश का सिनेमा पूरे विश्व में हर साल सर्वाधिक फिल्में बनाने के लिये जाना जाता है। अरबों के कारोबार का नियंता आज सिर्फ मनोरंजन का ही नहीं, व्यवसाय का भी प्रमुख माध्यम बन गया है। लेकिन आज के इस विकास के  परे एक लंबी संघर्ष की दास्तान इस रुपहले परदे के पीछे हैं जहां कई बार आलोचनाओं के स्वर मुखर हुए तो कई बार इसने मील के पत्थर समाज में स्थापित किये।
     वैसे तो कई महत्वपूर्ण वस्तुओं की तरह सिनेमा का जन्म भी विदेशी सरजमी पर हुआ। इसके तहत सबसे क्रांतिकारी प्रयोग ल्यूमियर बंधुओं के द्वारा 1890 में हुआ। तब इन्होंने सात लघु फिल्मों का निर्माण करकर उनका प्रदर्शन किया। भारतीय सिनेमा के नजरिए से सबसे महत्वपूर्ण घटना घटी 7 जुलाई 1896 को जब मुम्बई के वाटसन होटल में ल्यूमियर बंधुओं की उन फिल्मों को प्रदर्शित किया गया। भारत में पहली बार फिल्म विद्या का जादू परदे पर देखने को मिला।
इस घटना के बाद कई लोगों ने उन फिल्मों से प्रभावित होकर लघु फिल्मों का निर्माण किया। लेकिन इस कडी में सबसे बडा कार्य किया धुंडी राज गोविंद फाल्के यानि दादा साहेब फाल्के ने। जो लंदन से ‘‘द लाइफ क्राइस्ट’’ देखकर इस कदर प्रभावित हुए कि वहां से उन्होंने फिल्म निर्माण का सारा सामान खरीद लिया और फिल्म बनाने का मन बनाया। उनके मन का ये विचार 3 मई 1913 को साकार हुआ। जब हिन्दी सिनेमा की पहली फिल्म ‘‘राजा हरिशचन्द्र’’ रिलीज हुई। पर्दे पर जीवंत चित्रों को देखना लोगों को इस तरह रास आया कि फिल्म निर्माण की श्रृखंला चल पड़ी। लेकिन इस दौर का सिनेमा सिर्फ दृश्यात्मक था और मौन होकर ही समाज का मनोरंजन करता था।
इस दिशा में आमूल-चूल परिवर्तन हुआ 14 मार्च 1931 को जब इन मूक दृश्यों को जुवां मिली, और भारत की पहली बोलती फ़िल्म आलमआरा प्रदर्शित हुई। तीस का दशक हिंदी सिनेमा के लिये कई मायनों में खास था जहां इस दशक में मूक दृश्यों को आवाज नसीब हुई तो दूसरी ओर इसी दशक में देश की पहली रंगीन फ़िल्म किसान कन्या का प्रदर्शन हुआ। सिनेमा की मनोरंजन के साथ अपनी सामाजिक जिम्मेदारी वाली प्रकृति का दर्शन भी हमें इसी दौर में देखने को मिला। जब तत्कालीन सामाजिक परिदृश्य को लेकर वी.शांताराम, महबूब खान और ज्ञान मुखर्जी जैसे निर्देशकों नें अछूत कन्या, औरत और किस्मत जैसी फिल्मों का निर्माण किया। किस्मत फ़िल्म का गीत दूर हटो ऐ दुनिया वालों, हिन्दुस्तान हमारा है तो तत्कालीन भारतीय समाज में आजादी का जयघोष बन गया।

          आजादी के बाद हिनदुस्तानी सिनेमा को अंतर्राष्ट्रीय आयाम दिलाने में पचास के दशक की महत्वपूर्ण भूमिका रही। जहां बंगाली सिनेमा में सत्यजीत रे की पाथेर पांचाली, अपराजितो जैसी फ़िल्मों ने देश को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर ख्याति दिलाई, जिससे सत्यजीत रे फ़िल्म विधा के अध्यापक की तरह देखे जाने लगे। वहीं हिन्दी सिनेमा में राजकपूर, विमलरॉय, गुरुदत्त जैसे फ़िल्मकारों ने नवीन मानवीय दर्शनों का सिनेमा में आविर्भाव करके सिनेमा को महज मनोरंजन की सतही श्रेणी से उठाकर बुद्धिमत्ता की परिपक्व कक्षा में स्थापित कर दिया। विमल रॉय की दो बीघा जमीन हिन्दी सिनेमा में नवयथार्थवाद की जनक बनी तो राजकपूर की आवारा और गुरुदत्त की प्यासा इंसान की भावनात्मक छटपटाहट को उजागर करने वाली महत्वपूर्ण फ़िल्में मानी गई।

          साठ के दशक में जब देश हरित क्रांति और श्वेत क्रांति के कारण आई समृद्धि का जश्न मना रहा था तो सिनेमा ने भी देश की सीमा से बाहर निकलकर खूबसूरत मखमली ख्वाबों को जीना शुरु किया। सिनेमा का कैमरा हमारे देश की सरहदों से बाहर निकलकर स्विटजरलैण्ड, लंदन और अमेरिका की चकाचौंध को दर्शकों के सामने लेकर आया। यश चोपड़ा का रोमांटिज्म और ऋषिकेष मुखर्जी के आदर्शवाद का बेहतरीन कॉकटेल देखने को मिला। तो देव आनंद, राजेश खन्ना और शम्मी कपूर जैसे सितारों ने कश्मीर की वादियों में जाकर मोहब्बत के पाठ पढ़ाये। सितारों की दीवानगी दर्शकों के सर चढ़कर बोलने लगी और युवतियों के सिरहाने सितारों की तस्वीरें और बदन पर गुदने नज़र आने लगे।

     देश में समृद्धि बढ़ी तो भ्रष्टाचार ने भी दस्तक दी। इंसान पहले हालात से मजबूर था अब भ्रष्ट सिस्टम ने उसे लाचार बना दिया। दिल में आक्रोश लिये आम आदमी किसी अवतार की तलाश में था जो उसके क्रोध को परिभाषित करे। सिनेमा ने समाज को इस दौर में एक ऐसा ही एंग्री यंग मेन दिया जो सिस्टम से लड़ता-जूझता नज़र आता था। जंजीर, दीवार और त्रिशूल जैसी फ़िल्मों ने अमिताभ बच्चन को आम आदमी का सितारा बना दिया। तो इसी दौर में श्याम बेनेगल और गोविंद निहलानी जैसे फिल्मकारों ने लीक से हटकर अव्यवसायिक समानांतर सिनेमा का निर्माण कर समाज के स्याह पक्ष को उजागर किया। बेनेगल की अंकुर, निशांत, मंथन और निहलानी की आक्रोश, अर्धसत्य उपेक्षित समाज का आईना साबित हुई।

     सिनेमा ने अधिक लोकतांत्रिक स्वरूप अख्तियार किया और हर दर्शक वर्ग के हिसाब से एक तरफ शोले और मिस्टर इंडिया जैसी मसाला फ़िल्में थी तो दूसरी तरफ मजबूरियों को बताती अर्थ और सारांश जैसी यथार्थवादी फ़िल्में। नब्बे के दशक से पहले सिनेमा में प्रेम कहानियां तो थी पर वो आज के पारंपरिक प्रेमपाश के बजाय परिस्थितियों को भलीभांति समझ के पैदा होने वाले प्रेम को प्रदर्शित करती थी। नब्बे के दशक की शुरुआत में देश ने उदारवाद और भूमंडलीकरण को अपनाया, देश में पैसा आया और लाचारियां धीरे-धीरे विदा होने लगी। लोगों के पेट भराने लगे तो उन्होंने दिल लगाना शुरु कर दिया। सिनेमा में भी नायक-नायिका के संबंधों में बदलाव आया, कॉलेज रोमांस ने दस्तक दी। कयामत से कयामत तक, दिल, दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे और कुछ-कुछ होता है जैसी विशुद्ध प्रेमकहानियों का समावेश हुआ। शाहरुख, सलमान, आमिर लोगों के चहेते बने। तो आदित्य चोपड़ा, सूरज बड़जात्या और करण जौहर का स्विटजरलैण्ड, शिफॉन और करवाचौथ वाला सिनेमा हिट हुआ। इसी दौर में रामगोपाल वर्मा और राजकुमार संतोषी का नायक अभी भी सिस्टम से लड़ रहा था। 

     सदी बदली, सोच बदली और सिनेमा ने भी नई उम्र के दर्शक का दामन थामा। पारंपरिक, आदर्शवादी सोच से बाहर निकलकर युवा प्रेक्टिकल हुआ। प्रेम और विवाह अब उसकी मंजिल नहीं, रास्ते के पड़ाव भर रह गये। दिल चाहता है, वेकअपसिड, रंग दे बसंती, थ्री इडियट्स जैसी फ़िल्में बनी जिन्हें न्यू एज्ड सिनेमा के नाम से जाना गया। आज के सिनेमा में कई धारायें एकसाथ प्रवाहित हो रही हैं। दबंग, सिंघम और राउड़ी राठौड़ का एक्शन है तो जब वी मेट, लव आजकल, बरफी के रुहानी मोहब्बती जज्बात भी। अनुराग कश्यप का विशुद्ध डार्क कलेवर वाला वासेपुर है तो प्रकाश झा का गंगाजल, राजनीति और चक्रव्यूह वाला अपराध जगत।
 
     बहरहाल, 3 मई 2013 को शूटआउट एट वडाला प्रदर्शित हो रही है यह महज संयोग ही है कि आज से सौ साल पहले इस दिन प्रदर्शित होने वाली फ़िल्म राजा हरिश्चन्द्रतत्कालीन धार्मिक और पौराणिक मान्यता वाले समाज को बयां करती थी और शूटआउट एट वडाला वर्तमान के आपराधिक वृत्ति वाले समाज की प्रतिनिधि है। जिस समाज में दामिनी और गुड़िया पे हुए दुष्कृत्यों पर इंसाफ मांगने के लिए जनता सड़क पर है। सिनेमा भी तो आखिर समाज और सड़क का ही आईना है......

Saturday, April 6, 2013

तेरे जाने के मायने.....

(*इन दिनों एक लघु उपन्यास का लेखन कर रहा हूँ..ये पोस्ट उसी लेखन का एक हिस्सा है...जिसमें नायक-नायिका के संबंध-विच्छेद के बाद नायक अपनी पीड़ा एक ख़त के ज़रिये बयां करता है..जिसे आप सबके समक्ष सार्वजनिक कर रहा हूँ-)

आगे बढ़ो...कितना आसान होता है किसी से कह देना कि 'तुम सब कुछ भुलाके आगे बढ़ो'...और इंसान आगे बढ़ भी जाता है पर जिंदगी के कुछ धुंधले और उजले स्याह हिस्से वक्त की दीवार पर युंही चस्पा रह जाते हैं हमेशा के लिए। तुम्हारे जाने से ऐसा नहीं कि मैं जीना छोड़ दूंगा..या छोड़ दूंगा हंसना, मुस्कुराना या अपनी हसरतों को पंख देना...वो तो बाकायदा बने रहेंगे मेरी जिंदगी में...पर उन सबके होने के बावजूद, होगा मेरी मुस्कुराहटों में एक पेंच..हसरतों में अधूरापन, और हर सुवह के साथ रोज़ पलटते जिंदगी के बेरंग पन्ने। बाकी कुछ नहीं बदलेगा..और मैं आगे बढ़ता रहुंगा, सांसे चलती रहेंगी...तुम्हारे जाने से आखिर क्या रुकने वाला है?

गर कुछ अखरता भी है तो वो मेरा पागलपन है..वैसे भी ख्वाहिशें बड़ी मूर्ख होती हैं जो अब भी चाहती है कि तुम्हारे चेहरे पर किसी भी परेशानी के कारण पड़ी सलवटों को, तुम्हें गले से लगाकर दूर कर दूं...या फिर तुम्हारे गोलगप्पों के लिए बच्चों की तरह मचलने पर, उन्हें तुम्हारे सामने हाजिर कर दूं...मूर्खताएं, बस इतनी ही थोड़ी है इन उम्मीदों की मूर्खता का कहाँ तक बखान करूं... जो आज भी कोई नई बात पता चलने पर, सबसे पहले उन्हें बताने के लिए तुम्हें ही तलाशती हैं या फिर वो तुम्हारे लिए आंसू बहाने को भी तुम्हारे कंधे का इंतजार करती हैं। पर 'सब कुछ भुलाके आगे बढ़ो' ये मामुली से लफ्ज़ कहकर तुमने मुझसे वो सारे हक़ छीन लिए..जिनके जरिए मैं तुम्हारी फ़िक्र करता था या जिनके जरिए अपनी तकलीफ तुमसे कहता था।

आगे बढ़कर मैं शायद उन सारे सपनों को पूरा भी कर लुंगा, जो तुमने मेरे लिए देखे थे...पर तुम्हारे न होने पर क्या वाकई उन सपनों की पूर्णता पर मुझे वो खुशी होगी..जो खुशी हसरतों के अधूरेपन के बावजूद तुम्हारे साथ होने से होती थी। दुनिया की वो कौन-सी चीज है जो तुम्हारे जरिये पैदा किये गये खालीपन को भर पाएगी..या फिर मुझे मेरा वो अस्तित्व दे पाएगी..जो तुम्हारे आने से पहले था। मुस्कुराते चेहरे को देखकर कौन मेरे उस ग़म का आकलन कर पाएगा जो इन हालातों ने पैदा किया है..पर मैं आगे तो बढ़ ही रहा हूँ, जिंदगी कब थमती है।

लोग कहते हैं वक्त के साथ सब ठीक हो जाता है..पर टूटी हुई रस्सी को गांठ से जोड़ने के बाद क्या उसकी नैसर्गिक मजबूती को कभी वक्त दे पाया है...यकीनन वक्त के सहलाने वाले हाथ सारे ज़ख्म भर देते है पर ज़ख्म पर छूट गए दाग तो बने ही रहेंगे..जिन्हें देख-देख एक टीस तो ताउम्र उठती रहेगी। हां मुझे याद है जो तुम कहती थी कि एक दिन तो हमें अलग होना ही हैं...मुझे भी बहुत अच्छे से पता था कि ऐसा होगा...पर 'कहने' और 'हो जाने' में बहुत फर्क होता है..जब हम ऐसा कहते थे तब मुझे पता था कि कल का सूरज जब होगा तब हम फिर साथ होंगे...पर अब जबकि ऐसा हो गया है तो कल का सूरज तो क्या जिंदगी की हर प्रभात तुम्हारे बगेर देखना है मुझे...तुम जा चुकी हो पर ये वक्त आगे बढ़ रहा है और आगे बढ़ रहा हूँ मैं भी, इस वक्त के साथ। क्या आगे बढ़ जाने से कसक मिट जाती है?

जब जाना ही था तो क्युं वो सपने देखे थे और दिखाये थे मुझे भी..जिन सपनों को कभी अपने अंजाम तक ही नहीं पहुंचना था। वो सारी अधपकी सी इच्छाएं तो अब भी फसल बनकर दिल की जमीं पर लहलहा रहीं हैं जबकि बंजर हो चुकी है जिंदगी क्योंकि अब नहीं मिलता इसे तुम्हारी नजदीकियों का खाद-पानी। अपने साथ ये तमाम सपने भी क्यों न ले गई..क्यों न ले गई वो जज्बात की दावात..जिसमें लफ्जों की कलम डुबो-डुबोकर, हम लिखा करते थे जीवन की नित नई-नई इबारतें। तुम समझती हो कि मुझे तड़प मिली है तुम्हारे प्यार से, पर नहीं मुझे तड़प है उस नफ़रत के कारण जो आज मेरे दिल में कुलाटियां मारती है हर पल...नहीं, नहीं! ये न समझना कि मुझे तुमसे नफरत है...तुमसे तो आज भी उतना ही प्यार है पर तुम्हारे दिए हुए सपनों से है मुझे असीम नफरत...जो सपने फड़फड़ाते है मेरे दिल की दिवारों पर चमगादड़ बनकर...और उस फड़फड़ाहट के शोर में गुजर जाती है मेरी हर रात...बिना सोये, करवट बदलते।

Sunday, March 31, 2013

ज़िंदगी के चौराहे

(ये लेख आज से लगभग चार वर्ष पहले अपने रायपुर प्रवास के दौरान..होली के दिन भांग के नशे में लिखा था..पर आज भी जब इसे पढ़ता हुं तो इसकी यथावत् प्रासंगिकता को पाता हुं..कृप्या इस अचेत अवस्था में लिखे गये लेख को साहित्यिक पैमानों पर तौलने की कोशिश न करें...)

जिंदगी में रास्ते लंबे भले हों, मगर मुश्किल नहीं होने चाहिए..इससे भी ज्यादा दुखद है उनका असमंजस भरा होना। कठिनाईयों से ज्यादा संशय परेशान करता है। राही की मुश्किल भी तब बढ़ जाती है जब सीधे-सादे रास्तों के बाद चौराहे आते हैं और उन चौराहों का तो क्या कहना, जहाँ रास्ते दिखाने वाले बोर्ड नहीं लगे हों। जिंदगी में भी इंसान ऐसे कई चौराहों से रूबरू होता है और जिंदगी के चौराहों में कोई इंडिकेशन बोर्ड नहीं होता। सही रास्तों को चुनने का बोझ होता है, एक अनचाहा डर सताता है। कई बार चौराहे कुछ ऐसे होते हैं कि कोई रास्ता ही नज़र नहीं आता। ऐसे ही समय में इंसान के असली हुनर और दूरदर्शिता की पहचान होती है।

समाज में एक ओर पहचान, सुरक्षा, स्थायित्व पाने की चाहत तो दूसरी ओर शारीरिक परिवर्तन, विलासिता की तमन्ना, रिश्तों के बंधन जटिलताओं का निर्माण करते हैं। ऐसे हालातों में बीता हुआ सफ़र याद आता है जहां बेरोकटोक हम जिंदगी की गाड़ी को सरपट भगाये जा रहे थे। दरअसल, हम गतिमान जीवन में ही इतना मस्त हो जाते हैं कि उस जीवन से परिवर्तन हमें विचलित कर देता है। पुराने रिश्ते जब परबान चढ़ते हैं तभी उनके बिखरने का वक्त आ जाता है। वक्त तो बीत जाता है पर बीते हुए लम्हों की कसक साथ रह जाती है..अब जो नया रास्ता शुरू होता है वहां प्रारंभ फिर शून्य से होता है।

लोग अपने वर्तमान स्वच्छंद जीवन को देख कहते हैं कि काश! ताउम्र बस ऐसे ही जीवन चलता रहे, बस युंही मौज-मस्ती में वक्त गुज़र जाये और किसी तरह का कोई परिवर्तन न हो...पर इस वक्त वो भूल जाते हैं कि गतिमान लम्हों की कीमत ही इसलिए है कि ये हमेशा नहीं रहने वाले। अंतहीन सफ़र कभी सुहाना नहीं होता। परिवर्तन में नवीनता गर्भित है।

इंसान एक अजीब सी खींझ महसूस करता है...एक तरफ कुछ सार्थक न कर पाने की बेवशी...दूसरी तरफ मृत्यु, स्वास्थ्य, असुरक्षा का अदृश्य भय..जो प्रगट नहीं होता। दरअसल, अनिष्ट की आशंका अदृश्य ही होती है। अपने ही सपनों का सैलाब हमें तंग करता है क्योंकि लोगों को मुकम्मल जहां नहीं मिलता। हर एक उपलब्धि एक नई ज़रूरत को जन्म देती है और ज़रूरत से फिर नई उपलब्धि होती है। जीवन का चक्र घूमकर हमें फिर वहीं खड़ा कर देता है जहाँ से हमने सफ़र की शुरुआत की थी। सच, परिवर्तनीय जगत वास्तव में कितना अपरिवर्तनीय होता है। दुनिया के परिवर्तनीय स्वरूप को देखने के कारण अप्रसन्नता है...अपरिवर्तनीय का दीदार हो जाये तो तकलीफ कभी छू भी न पायेगी। परेशानी ये है कि जीवन-चक्र में घूमते हुए हमारे हाथ खाली ही होते हैं।

हर चाही हुई चीज को पाने की कोशिश अनैतिक बना देती है। परिस्थितियों की बेवफाई चरित्र को नष्ट कर देती है और इन सारी चीजों का जन्म चौराहों पर लिये गए हमारे फैसलों के कारण होता है। सही-गलत की उलझन नतीजे आने तक बरकरार रहती है...और नतीजे आने के बाद हमारे हाथ कुछ नहीं होता, महज अनुभव के। जिस अनुभव को यदि हम दूसरों को बताए तो वो भी इन्हें नहीं मानता क्योंकि अधिकतर इंसान अपनी गलतियों से ही सीखते हैं।

तथाकथित सफलता की चकाचौंध ने इंसान की जिंदगी को आवृत्त कर दिया है। दुनिया में सक्सेस और स्टेटस के मायनों के चलते लाइफ के मायने घट गये हैं। एक स्टेज पर सक्सेस इतनी ख़ास हो जाती है कि उसके आगे जिंदगी बहुत छोटी नज़र आती है। चुंकि हर इंसान के हिसाब से सक्सेस के पैमाने अलग होते हैं, पर आज सफलता- करियर, पैसे के अर्थ में रूढ़ हो गई है। और उस भौतिकीय सफलता को ही सब कुछ माना जाता है। उस सफलता का आकर्षण हमें एक ऐसी दिशा में ले जाता है जहाँ आफतों को आदत बनाना पड़ता है। मंजिल पर पहुंचने के बाद रास्तों का सुकून याद आता है और मंजिल से बेहतर रास्ते लगने लगते हैं।

खैर, जीवन की हर चीज पर अपना ही एक दार्शनिक विचार खड़ा हो सकता है। अंत में मैं सिर्फ एक बात कहुंगा जो मैं बहुत सीधे-सादे अंदाज में बिना किसी चमत्कारिक शब्दों के कहुंगा...कि कुछ भी हो, रास्ते का चुनाव हो पाए या नहीं, सफलता मिले या नहीं या फिर किसी वा़ञ्छित वस्तु या व्यक्ति की दूरी ही क्यों न हो जाए...पर अपना चरित्र नीलाम मत कीजिए, सिद्धांतों से समझौता मत कीजिए। हमारी सबसे बड़ी पूंजी हमारा चरित्र है..अपनी पूंजी गंवाकर उपलब्धियों की प्राप्ति कभी सुखकर नहीं हो सकती। यकीन मानिए, अंततः सब ठीक हो जाएगा...............

Friday, March 8, 2013

जज्बातों के लिबास बनने की मुश्किल कोशिश करते अल्फ़ाज......

रॉकस्टार फिल्म का प्रसिद्ध गीत 'जो भी मैं कहना चाहुं, बरबाद करें अल्फाज मेरे' इंसान की अभिव्यक्ति की जबरदस्त लाचारी को बयां करने वाला गीत था। शब्द बृम्ह कहलाते हैं और इनके सहारे ही इंसान सभ्यता और विकास की नित नई इबारत लिख रहा है। रीति, रस्म, रिवाज, संस्कार का प्रसार इन्हीं अल्फाजों के सहारे हो रहा है...लेकिन इतना कुछ कह जाने के बाद भी बहुत कुछ अनकहा ही रह जाता है। या तो चीजें बयां नहीं हो पाती और गर बयां होती हैं तो समझी नहीं जाती। वार्ताओं का मंथन अमृत कम, ज़हर ज्यादा उगल रहा है और खामोशियों की वाचाल जुवां सुनने की कोई जहमत ही नहीं उठा रहा है।

असीम कुंठा, असीम दर्द, पीड़ा, मोहब्बत या नफरत से कभी गोली निकलती है, कभी गाली, कभी आंसु तो कभी कविता...पर अनुभूतियों का कतरा भी अभिव्यक्त नहीं होता। इंसान बेचैनियों का बवंडर दिल में दबाये जिये जाता है क्योंकि दुनिया में वो किनारे ही नहीं हैं जिस दर पे जज्बातों की लहरें अपना माथा कूटे। बेचैनियों की आग हर दिल में धधक रही है पर धुआं ही नहीं उठ रहा..जिसे देख लोग उस आग का अनुमान लगा सके। धुआं उठ भी जाये तो वो लोगों की आंखों में धंस जाता है जिसके बाद लोग उस आग को देखने की हसरत ही त्याग देते हैं क्योंकि जो भी मैं कहना चाहूं, बरबाद करें अल्फाज मेरे। इंसान अनभिव्यक्त ही रह जाता है।

जिंदगी के सफर में रिश्तों की सड़क साथ चलने का आभास देती है पर हम आगे बढ़ते जाते हैं और सड़क का हर हिस्सा अपनी जगह ही स्थिर रहता है। हम अकेले ही होते हैं..हमेशा, हर जगह। कुछ पड़ावों पर हमें हमारा साया नजर आता है जो हम सा ही प्रतीत होता है..पर वो बस प्रतीत ही होता है क्योंकि हम जैसा और कोई नहीं होता। हमारे दिल में वो परछाईयां जगह पाने लगती हैं जो हम सी नजर आती है...हमको समझती हुई सी दिखती है पर अचानक हमारा दिवास्वपन टूटता है और हम फिर बिखर जाते हैं...बिना अभिव्यक्त हुए। कभी मुस्काने बिखरती हैं तो कभी आंसू..और कभी कुछ बेहुदा से अल्फाज भी...पर सब झूठे ही रहते हैं। याद आता है वो गीत- 'कसमें-वादे, प्यार-वफा सब बातें हैं बातों का क्या.......

इस सूचना विस्फोट के युग में कितना कुछ बाहर आ रहा है...सोशल नेटवर्किंग साइट्स, टेलीविजन, फिल्म, साहित्य सब जगह कितना कुछ अभिव्यक्त हो रहा है...पर क्या वाकई अनुभूतियां मुखर हो पा रही हैं। भ्रम के इस युग में अल्फाज सबसे बड़े भ्रम हैं। जो बातें हैं वो जज्बात नहीं है...वो जज्बात हो ही नहीं सकते क्योंकि जज्बात नग्न ही होते हैं और अदृश्य भी...ये लफ्जों के लिबास उन्हें ढंक सकते हैं प्रगट नहीं कर सकते। पूरा जीवन उस एक शख्स और उन चंद अल्फाजों को खोजने में लग जाता है जहां जज्बातों को पनाह मिल सके।

तपन से वर्फ पिघल सकती है, लोहा पिघल सकता है, पर्वत, पाषाण और  संपूर्ण पर्यावरण पिघल सकता है...पर रूह की इस भीषण गर्मी से इंसान नहीं पिघल रहा। उसके सीने में मौजूद जज्बातों के विशाल सरोवर पर बना दायरों का बांध, अल्फाजों की लहरों को निकलकर आने ही नहीं दे रहा..और जो बाहर आ रहा है वो बहुत ही सतही और दूषित लहरें हैं जिन्हें पवित्र बनाने के झूठे जतन किये जा रहे हैं। बहरहाल, अपने इस असमर्थ लेख के गरीब अल्फाजों से कुछ कहने की अनकही कोशिश कर रहा हूं...पर इन गरीब अल्फाजों ने उन संसाधनों को आज तक विकसित नहीं किया जिससे ये कुछ कह पायें...खैर, मैनें कहने की मुश्किल कोशिश की है आप समझने के दुर्लभ जतन करना.............