Saturday, January 18, 2014

गपोढ़ अल्फाज़ और अधेड़ अहसासों की 'डेढ़ इश्किया'

'हर किसी को आज़ादी पसंद होती है लेकिन उस आज़ादी के लिये किसी न किसी को तो कीमत ज़रूर चुकानी होती है'...लगभग ऐसे ही किसी गंतव्य तक पहुंचने का प्रयास करती अभिषेक चौबे निर्देशित और विशाल भारद्वाज निर्मित 'डेढ़ इश्कियां' देखी। हालांकि विशाल भारद्वाज की छाया इस फ़िल्म पे पड़ी हुई है इसलिये किसी सार्वभौमिक कथ्य तक पहुंचने की आशा आप नहीं कर सकते...क्योंकि मासुमियत और गहन बौद्धिकता के बीच फंसे इस फ़िल्मकार के कथानक को देख लोग इसे अपने-अपने ढंग से विश्लेषित करते हैं..और विश्लेषण के पश्चात सबके अपने-अपने ही निष्कर्ष होते हैं। वैसे ये विशाल से ज्यादा अभिषेक की फ़िल्म हैं इसलिये आप मनोरंजन और अर्थों की कुछ नई परतें इस सिनेमाई कलेवर से उखाड़ सकते हैं। मनोरंजन के लिये इस फ़िल्म की गपोढ़ संवादगी और अर्थों की खोज के लिये इसके अधेड़ पड़ चुके जज्बातों की उधेड़बुन की जा सकती है..कुछ इन्हीं वजहों से ये सिनेमा के पारंपरिक मनोरंजन से दूर हो ऑफबीट फ़िल्म होने का दंभ भर सकती है...किंतु फिल्म का ट्रीटमेंट, सिनेमेटोग्राफी और कुछ ऐसी ही दूसरी चीज़ें इसे मुख्यधारा के सिनेमा में धकेल देती हैं।

इंसान के रुहानी जज़्बातों की विविध परतों और तकरीबन बूढ़े हो चुके अहसासों को..समाज की रिवाज़ी बंदिशों से आज़ाद कर एक नया आसमान देने की कोशिश अभिषेक चौबे ने की हैं...यूं तो फ़िल्म का मनोरंजन पक्ष ज्यादा मुखर है इसलिय फ़िल्म के कुछ कंट्रोवर्सियल मायने चुप्पी साधे रहते हैं। खासतौर से वर्तमान के इस दौर में जहाँ देश की एक कोर्ट द्वारा समलैंगिकता को बड़ा अपराध बताया गया है, धारा-377 पर राजनीतिक गहमागहमी ज़ारी है.. उसी दौर में ये फ़िल्म बड़ी खामोशी से उन रिश्तों की पैरवी करती नज़र आती है। निर्देशक ने फिल्म में बेहद संवेदनशील दृश्यों को इस चतुराई से फिल्माया है कि अंत तक उस रिश्ते के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता...पारा ज़ान(माधुरी) और मुनिया(हुमा कुरैशी) के आपसी संबंधों को जिस असमंजसपूर्ण स्थिति के साथ फिल्मकार ने प्रस्तुत किया है वो भारतीय समाज के अंदर बहुत बड़े विवाद की वजह माने जाते हैं किंतु फिल्मकार के प्रस्तुतिकरण का तरीका इतना ज्यादा डिप्लोमेटिक है कि विवाद करने की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती। जबकि इसी रिश्ते के बिंदास प्रस्तुतिकरण के चलते मीरा नायर की 'फायर' विवादास्पद बन जाती है। 

पारा और मुनिया के रिश्ते की पृष्ठभूमि निर्मित करने की जो वजह फिल्मकार ने दी है उसके चलते दर्शकों को भी इस रिश्ते के साथ हमदर्दी हो जाती है। इस रिश्ते की वजह भी पारा के शौहर का समलैंगिक होना बताया गया है...और अपने शौहर की इन अय्याशियों के चलते ही पारा की ज़िंदगी में तन्हाई है और पारा ज़ान को उस तन्हाई को दूर करने का ज़रिया किसी मर्द के नहीं बल्कि एक औरत के प्रेम में ही नज़र आता है। अपने पति की अय्याशियां और उनके समलैंगिक संबंध पारा के मन में सारे मर्द समाज के लिये ही नफ़रत का बीज़ बो देते हैं और पुरुष की इन स्वछंद हरकतों के खिलाफ ही उसकी जंग है..उसका बदला किसी मर्द को ठगने से पूरा होगा जिससे वो अपने स्वछंद आनंद के पैमाने निर्धारित कर सकें, उस आनंद को जी सके।

एक खास बौद्धिक वर्ग को  ये रास्ता महिलासशक्तिकरण के दरबाजे पे दस्तक की तरह नज़र आयेगा..जहाँ ये स्त्री द्वारा अपनी आजादी और आनंद के लिये किये गये संघर्ष का ही एक रूप माना जायेगा...और इसे वे स्त्री का तिरियाचरित्र न कह 'Survival of Fittest' कहना ज्यादा पसंद करेंगे। एक स्त्री अपने शरीर को मर्द को सौंपते वक्त भी अपना ही उल्लु सीधा कर रही है और संभोग उपरांत उस मर्द को भी ये संशय बना हुआ है कि उसने स्त्री का इस्तेमाल किया है या वो खुद स्त्री द्वारा इस्तेमाल किया गया है...अबसे पहले औरत की इज़्जत को दैवीय रूप देकर हमेशा उसे पुरुष के समक्ष दबाने की कोशिश की गई है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि औरत, चाहकर भी पुरुष की आबरु नहीं लूट सकती किंतु पुरुष ऐसा कर सकता है।

एक औरत द्वारा अपने भ्रम का आभामण्डल रचा जाता है और उस आभामण्डल की चमक के चलते ही कई नवाब अपने हुनर की पेशगी उसे पाने के लिये करते हैं...एक अधेड़, बीमार और अवसाद ग्रस्त महिला अपनी चालाकियों से दिग्गज मर्दों को बेवकूफ बनाती है..और उन अधेड़ मर्दों के बुढ़या चुके अहसासों को भी जवान बनाती है, उनमें नये अरमान जगाती है। इन तमाम कारगुज़ारियों के दरमियां परदे पे हमें मर्दों की विशाल महफिल के बीच सिर्फ एक औरत ही इंटेलीजेंट नज़र आती है अन्यथा हिन्दी सिनेमा का सुर तो हमेशा से औरतों को 'क्यूट' कह कर उनकी बेवकूफी की बिक्री करने वाला ही रहा है। वास्तव में पुरुष अपनी कमतरी को छुपाने के लिये ही साहित्य-सिनेमा और समाज में उन रिवाज़ों को जन्म देता है जिससे स्त्री अबला नज़र आती है अन्यथा प्राकृतिक तौर पे स्त्री, परुष की तुलना में अधिक मजबूत और हुनरमंद रही है। 'डेढ़ इश्किया' कहीं-कहीं नारी की उस सशक्तता का ऐलान करते नज़र आती है। एक अन्य अहम् बात जो इस सिनेमा में देखी जा सकती है कि फ़िल्म में तकरीबन तमाम किरदार अधेड़ उम्र के हैं लेकिन उनमें मोहब्बत के जज़्बात और इश्क पाने की हसरत अब भी जवां बनी हुई है..इन अहसासों की लुका-छिपी के बीच ही आला दर्जे की मूर्खता पैदा होती है और यही मूर्खता दिल को बच्चा बनाये रखती है। जिस बात को इस फ़िल्म के पिछले संस्करण में एक गीत के ज़रिये दर्शाया गया था।

बहरहाल, बेहतरीन अभिनय, शानदार संवाद एवं शायरियां, उम्दा निर्देशन, बढ़िया सिनेमेटोग्राफी और नवाबी कल्चर के दीदार करने की आरजू है तो डेढ़ इश्कियां एक अच्छा विकल्प है। हालांकि इस फ़िल्म की टारगेट ऑडियंस बहुत ज्यादा युनिवर्सल नहीं हैं पर आप थोड़ा भी शायराना और आशिकाना मिज़ाज रखते हैं तो 'डेढ़ इश्कियां' आपको निराश नहीं करेगी..और जैसा कि बताया कि ये विशाल भारद्वाज के बैनर तले बनी फिल्म है तो विशाल की फ़िल्मों में आपको ऐसी एक-आध चीज़ मिल ही जाती है जो आपके पैसे वसूल करवा देती है। लेकिन साथ ही ये भी याद रखें कि चुंकि ये भारद्वाज बैनर की फ़िल्म हैं तो आप बिना किसी निष्कर्ष के ही सिनेमाघरों से बाहर आयेंगे...क्योंकि दर्शकों को निश्कर्ष तक पहुंचाने से विशाल की यूएसपी प्रभावित होती है और अपनी यूनिकनेस के साथ समझौता करना विशाल को कतई पसंद नहीं आएगा........

Tuesday, January 14, 2014

मानव विकास सूचकांक बनाम सकल राष्ट्रीय खुशहाली (सौवी पोस्ट)

कुछ दिनों पहले प्रदर्शित हुई फिल्म 'लंचबॉक्स' में, अर्थशास्त्र में पढ़ाई जाने वाली एक महत्वपूर्ण अवधारणा "सकल राष्ट्रीय खुशहाली(Gross National Happiness)" की चर्चा काफी महत्वपूर्ण अर्थ को संप्रेषित करने के लिये की गई थी। हालांकि विश्व के सारे देश अपनी उपस्थिति एक उन्नत राष्ट्र के रूप में दर्ज कराने के लिये..आज "मानव विकास सूचकांक(Human Development Index)" के ऊंचे नंबरों की तरफ ललचायी निगाहों से देखते हैं...लेकिन मानव विकास सूचकांक के बादशाहत के इस काल में लोगों की खुशी को, समृद्धि का पैमाना बताने वाली "सकल राष्ट्रीय खुशहाली" की ये अवधारणा आज अच्छे खासे विकसित राष्ट्रों को भी सोचने को मजबूर कर रही है।

एक बेहद छोटे से राष्ट्र भूटान ने स्वयं की समृद्धि का पैमाना उन चीज़ों को बनाया..जो असल में इंसान और प्रकृति के सामंजस्य के साथ खुशहाल जीवन का प्रतीक हैं। प्रकृति को रौंदते हुए, उसका चौतरफा शोषण करते हुए आगे बढ़ने की तमाम विकास की नीतियों को, इस छोटे से देश ने नकार दिया...और अपने मूल्यों की रक्षा करते हुए, सांस्कृतिक दायरे को बरकरार रखते हुए तथा प्रकृति और पर्यावरण की दैवीयता के संरक्षण के साथ, इस देश ने हर चीज़ से पहले मानवमात्र की खुशी को चुना। सकल राष्ट्रीय खुशहाली हेतु जो मानक तय किये गये हैं उन्हें देखकर ये कहा जा सकता है कि लंबे समय तक के लिये सतत् पोषणीय विकास (Sustainable Development) इस ही रास्ते पे चलकर संभव है।

एक तरफ जहाँ "मानव विकास सूचकांक(HDI)" लोगों की क्रय शक्ति में वृद्धि(Purchasing Power), साक्षरता दर(Literacy rate) और जीवन प्रत्याशा(Life Expectancy) जैसे मानकों को विकास का पैमाने मानता हैं...तो दूसरी तरफ "सकल राष्ट्रीय खुशहाली" में अच्छी आय के साथ अच्छा अभिशासन, पर्यावरणीय संरक्षण और सांस्कृतिक प्रोत्साहन जैसे मानक शामिल किये गये हैं। निश्चित ही HDI में सम्मिलित किये मानक विकास हेतु  काफी अहम् है पर उन मानकों को हासिल कर लिये जाने के बावजूद भी मानव अपनी संतुष्टि से कोसों दूर है उल्टा वह अब कुछ ज्यादा ही असंतुष्ट हो गया है। अमेरिकन-यूरोपियन देश आज इंफ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा, टेक्नॉलाजी, चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में संपूर्ण विश्व से काफी आगे हैं पर बावजूद इसके इन देशों की जनता अपनी तीव्रतम आकांक्षाओं के चलते घोर असंतुष्टि का जीवन जीने को मजबूर है। भौतिकवादी आग की लपटों में ये देश इस कदर झुलसे हैं कि वे किसी आईफोन, आईपॉड के लांच होने पे अपने शरीर के अंग बेचने के लिये या फिर सैक्सुअल डिजायर की तीव्रतम ख्वाहिश के चलते हर निकृष्टतम तरीकों को अपनाने तक के लिये तैयार हैं। 

पर्यावरण की बलि चढ़ाकर, इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया जा रहा है...भावनाओं को कुचलकर तकनीक एडवांस हो रही है..रिश्तों का गला घोंट कर प्रति व्यक्ति आय और क्रय शक्ति भी बढ़ रही है...शिक्षा का प्रसार हो रहा है पर दुर्भावनाएं और विसंगतियां कम नहीं हो रही..चिकित्सकीय सुविधाएं जीवन प्रत्याशा को भी लंबा कर रही है पर वो श्वांसे कम होती जा रही हैं जिनमें खुशी बसर करती हो। लेकिन इन सभी चीज़ों को विसरा कर सिर्फ झूठे आंकड़ों के आधार पे हरकोई खुद को महान् साबित करने का राग आलाप रहा है।

सकल राष्ट्रीय खुशहाली (GNH) और मानव विकास सूचकांक (HDI) के अंदर जो सबसे बड़ा फर्क है वो यही है कि जहाँ GNH में सांस्कृतिक प्रोत्साहन का समावेश किया गया है तो दूसरी ओर HDI में इसके लिये कोई अवकाश नहीं है। सांस्कृतिक प्रोत्साहन के अंदर कई मूल्य आधारित (Value Based) बातों को शामिल किया गया है औऱ ऐसा कहा जाता है कि 'जीवन में नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों का समावेश किये बिना प्रगति वरदान के बदले एक अभिषाप बन सकती है।' बहुत हद तक कई पश्चिमी देशों में ऐसा देखने को भी मिल रहा है...जहाँ बच्चे अपने स्कूल-कॉलेज के बैग में किताबों के साथ पिस्तौल लेकर भी निकलते हैं, जहाँ शादी की तिथि के साथ ही तलाक की डेट तय हो जाती है, जहाँ परिवार जैसी संस्था का पूर्णतः अभाव है, जहाँ बच्चे लोगों के लिये शारीरिक सुख में एक बड़ी बाधा हैं...जहाँ धर्म-दर्शन की बातें आत्मिक शांति से ज्यादा सिर्फ स्टेटस सिंबल बनकर रह गई हैं। इंद्रियजनित सुख की तलाश में जहाँ आध्यात्मिक सुख और संस्कार हासिये पे फेंक दिये गये हैं...और इंसान गहन असंतुष्टि में रहने के बावजूद अपने विनाश को ही विकास मानकर तालियां पीटे जा रहा है।

भूटान जैसे छोटे से देश की इस अवधारणा के बारे में जब भी चिंतन करता हूँ बड़ा आनंद महसूस होता है और मैं खुद को और अपने आसपास के माहौल को भी HDI के बजाय GNH के मानकों पर आंकने का ही प्रयास करता हूँ..पर कई बार मुझे अपने आसपास चल रही पश्चिम की हवाओं को और लोगों को उसके प्रभाव में मस्त देख काफी निराशा सी महसूस होती है..लेकिन उसपे अपनी जुवां बंद ही रखनी पड़ती हैं क्योंकि अपने मूल्यों की समझाईश यदि मैं लोगों को दूंगा तो महफिल के अंदर सबसे ज्यादा हंसी का पात्र मैं स्वयं ही बनूंगा...और बस इसलिये होंठों पे एक दर्दभरी मुस्कान लिये आगे बढ़ जाता हूँ और लोग मुझे खुश मानकर मानव विकास सूचकांक के मानकों के अनुसार ज्यादा नंबर दे देते हैं...........

Friday, December 13, 2013

महानता का पैमाना- लोकप्रियता, पैसा, प्रतिभा, चरित्र या कुछ और ???

बात शुरु करता हूँ एक बचपन में पढ़े नीति श्लोक से..जो संभवतः मैंने छठी कक्षा में पढ़ा था- नरस्य भरणम् रूपम्, रूपस्य भरणम् गुणः..गुणस्य भरणम् ज्ञानं, ज्ञानस्य भरणम् क्षमा। इस श्लोक की अंतिम पंक्ति में प्रयुक्त क्षमा शब्द को सबसे अंत में रखा गया है और इसे मनुष्य का सर्वोत्तम आभूषण कहा गया है..और यहाँ प्रयुक्त क्षमा शब्द का मतलब महज किसी को माफ कर देने तक सीमित नहीं है बल्कि ये बेहद व्यापक है और इसमें संपूर्ण चारित्रिक गुणवत्ता का समावेश किया गया है। एक अन्य पंक्ति भी कुछ इसी तरह की याद आ रही है कि "प्रतिभा इंसान को महान् बनाती है और चरित्र महान् बनाये रखता है" और इससे मिलती जुलती एक अन्य कहावत कुछ इस तरह है कि "आप  सिर्फ अपने चरित्र की रक्षा कीजिये आपकी प्रतिष्ठा आपकी रक्षा स्वयमेव कर लेगी" इत्यादि...यहाँ इन सब महानतम् सदवाक्यों को याद करने का प्रयोजन सिर्फ इतना है क्योंकि वर्तमान सामाजिक परिदृष्य पे कुछ कहना चाहता हूँ....

संत आसाराम, तहलका के संपादक तरुण तेजपाल, जस्टिस गांगुली और हाल ही में एक आला अफसर का नाम भी एक दुर्दांत आरोप में उछल रहा है...ये तमाम वे नाम है जो समाज के बहुप्रतिष्ठित वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं और इन्हें समाज बौद्धिक, नैतिक, या धार्मिक नज़रिये से उच्चता के शिखर पे देखता है...पर समाज में अपनी प्रतिष्ठा, पेशा, पद व आयु जैसे असल यथार्थ को नकार इन्होंने अपने ज़मीर को बेहद सस्ता साबित कर, न सिर्फ स्वयं की प्रतिष्ठा के साथ खिलवाड़ किया है बल्कि उन लाखों अनुसरणकर्ताओं की आस्था को भी धोखा दिया है जो इन्हें रोल मॉडल मान बैठी थी। इनके इस चारित्रिक पतन की पैरवी करते भी कुछ लोग देखने को मिल जाते हैं जो कहते हैं कि इनके व्यक्तिगत जीवन को इनके सामाजिक कार्यों से न जोड़ा जाये..पर समझ नहीं आता कि आखिर कैसे हम किसी के व्यक्तित्व को बाहर निकाल उसके कृतित्व का आकलन कर सकते हैं। समाज द्वारा किसी व्यक्ति विशेष को यदि असीम प्रतिष्ठा दी जाती है तो फिर वो इंसान सार्वजनिक हो जाता है..ऐसे में उसके लिये व्यक्तिगत मामला नाम की कोई चीज़ ही नहीं रह जाती। उसका हर कृत्य समाज की धारा को प्रभावित करता है...समाज द्वारा मिले सम्मान के बदले उसे कई सामाजिक उत्तरदायित्वों का निर्वहन करना आवश्यक है..ऐसे में महिला उत्पीड़न, बलात्कार जैसे मामले तो नितांत ओछे स्तर के कृत्य कहे जायेंगे।

अब यहाँ प्रश्न उठता है कि समाज का विशाल जनसैलाब यदि किसी का अनुयायी बन जाता है, मीडिया किसी को अथाह प्रसिद्धि दे देती है, असीम दौलत से कोई दुनिया की किसी भी वस्तु को अपने हक में कर सकता है या बौद्धिक चातु्र्य अथवा अपने हुनर से कोई किसी का दिल जीत लेता है तो क्या मात्र इतना करने भर से किसी को महानता के शिखर पे स्थापित कर देना चाहिये। दूसरी तरफ एक आम इंसान है जो ईमानदारी से बमुश्किल अपने घर का खर्च चला रहा है, मंदिर-मस्जिद-गुरद्वारे की सीख को अपने हृदय से चमेटे हुए नैतिकता का दामन थामा है, अपनी पत्नी-बच्चों के छोटे से परिवार में ही पूर्ण संतुष्ट है...लेकिन हालातों के थपेड़े लगातार खा रहा है, उसे अपने मोहल्ले के ही पूरे लोगों द्वारा नहीं पहचाना जाता, उसकी कही बातों से कोई हेडलाइंस नहीं बनती पर सद्शास्त्रों में लिखी बातों, सत्य, अहिंसा, सदाचार पर एक विश्वास दृढता से बनाये हुये हैं और इसी तरह जीवन जीते हुये एक दिन वो मर भी जाता है...अब इन विभिन्न प्रवृत्ति के लोगों में से महानता का तमगा किसके सिर पे जाना चाहिये। अगर भारतीय संस्कृति के वेद-पुराणों से महानता का पैमाना तलाशा जाये तो वहाँ सिर्फ और सिर्फ सद्चरित्रता को ही ये तमगा हासिल होगा..इस त्याग प्रधान संस्कृति में कभी पद-पैसा और प्रतिष्ठा को नहीं पूजा गया है..यहाँ सिर्फ सदाचरण की माला फेरी गई है..और सिर्फ भारतीय संस्कृति की ही क्यों बात करें सुकरात, प्लेटो, अरस्तु जैसे पाश्चात्य चिंतक भी सदाचरण की महत्ता को ही स्वीकार करेंगे बाकि चीज़ें उनके लिये भी गौढ़ ही रहेंगी।

ऐसे में सर्वाधिक दुविधा की परिस्थिति एक आम जनमानस के सामने आ गई है कि वो किसकी उपासना करे..और प्रतिष्ठा, पैसा, प्रतिभा और चरित्र में से किसके लिये प्रयत्न करें क्योंकि उत्तम चरित्र से संपन्न इंसान कदाचित् किसी इक्का-दुक्का इंसान से यदा-कदा ये तारीफ पा सकता है कि अमुक व्यक्ति भला इंसान है पर इस दुनिया में तवज्जो भले इंसान को नहीं बड़े इंसान को मिलती है और यहाँ बड़ा बनने के लिये पैसा-प्रतिष्ठा और प्रतिभा होना ज़रूरी है..इन चीज़ों के होने को ही शक्ति का स्त्रोत माना गया है। तो फिर भला कौन अपने साथ चरित्र का झुनझुना लेके बैठने वाला है। आज की नवसंस्कृति उस भौतिक चाकचिक्य के प्रति ही लालायित है और तमाम नैतिक मानदंड हासिये पे फेंक दिये गये हैं..और इसी के चलते वो आज लिव इन रिलेशन, होमो सैक्स जैसे अधिकारों की मांग कर रहा है और मल्टी सेक्सुअल रिलेशन उसके लिये खुली सोच का प्रतीक है। भले आज लोग ये चाहें कि बुद्ध, महावीर, गाँधी पैदा हों पर साथ ही सब ये भी चाहते हैं कि हमारे घर में नहीं पड़ोसी के घर में ही ये शख्सियत जन्में। अपने घर में उन्हें बडा़ उद्योगकर्मी बेटा, विदेश की किसी मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत मोटी तनख्वाह वाला दामाद, आईएस, डॉक्टर, इंजीनियर ही चाहिये लेकिन कोई भी इन गुणों के साथ एक अदद अच्छे इंसान की मांग नहीं करता। उल्टा यहां तो कहा जाता है कि अय्याशी करने के लिये ही ये तमाम बड़े ओहदे हैं..और इन लोगों का ही अय्याशी, भौंडेपन और छद्मआधुनिकता पर सच्चा अधिकार है।

दरअसल, ये हम सबके चिंतन औऱ चिंता के अहम् मुद्दे है कि इस समाज की भीषण विसंगति की पराकाष्ठा इससे बढ़कर और क्या होगी कि यहां एक बड़ा धर्मगुरू, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का पहरी एक संपादक और अच्छे-बुरे का निर्णय देने वाला एक न्यायाधीष ही सदाचार से परांड्गमुख हो गये है तो फिर किसके समक्ष अब गुहार लगाई जाये और किससे शिकायत की जाये...आलम यही है कि चिंगारी कोई भड़के तो सावन उसे बुझाये पर जो सावन आग लगाये उसे कौन बुझाये...यहाँ तो समाज के खिवैया ही नौका को मझदार में पटके दे रहे हैं।

Saturday, November 16, 2013

सचिन! एक चिट्ठी तुम्हारे लिये....

क्रिकेट के भगवान के नाम से संबोधित किये जाने वाले, प्रिय सचिन! पिछले पाँच-छह सालों से आपके क्रिकेटीय करियर में हम आखिरी शब्द सुनते आ रहे हैं..यथा- सचिन का आखिरी इंग्लैँड दौरा, आखिरी आस्ट्रेलिया दौरा, आखिरी वर्ल्डकप, आखिरी वनडे, आखिरी आईपीएल, आखिरी ट्वेंटी-ट्वेंटी आदि। लेकिन इन तमाम आखिरी शब्दों से बहुत ज्यादा अलग है ये सुनना और फिर देखना भी कि सचिन का क्रिकेट में आखिरी दिन। आँखों में आँसू। आपके भी और आपके चाहने वाले लाखों दर्शकों के मन में भी..और ये हों भी क्यों न? हम किसी स्कूल-कॉलेज में बमुश्किल दो-पाँच साल बिताने के बाद विदा होते हैं तो रो पड़ते हैं..और फिर आपके लिये तो क्रिकेट वो फलसफा था जिसे आपने अपनी जिंदगी का लगभग आधा हिस्सा दिया है। आपका पहला प्यार, आपकी गर्लफ्रेंड और असल मायनों में आपकी अर्धांगिनी भी बस क्रिकेट ही तो था..तो फिर कैसे कोई इसे एकदम से छूट जाने पर भावुक न हो..आपके मानसिक धरातल पर इसे छोड़ने की तैयारी तो काफी पहले से होगी लेकिन मानसिक तौर पे की गई समस्त तैयारियां कई बार भौतिक ज़मीन पर नाकाम ही साबित होती हैं और ये बखूब आपके चेहरे से ज़ाया हो रहा था। ठीक वैसे ही जैसे कि दो विरुद्ध सांस्कृतिक परिवेश के प्रेमी-युगल चाहे कितनी भी मानसिक तौर पे संबंध विच्छेद करने की तैयारी कर लें पर संबंध टूटने पे निकली आह को दबाना और अचानक पैदा हुआ खालीपन भरना आसान नहीं होता। आखिर आप कैसे इस अचानक छूटे हुए संबंध की टीस को कम कर पायेंगे..क्योंकि भले ये दुनिया और ये मीडिया आपको भगवान की हजार उपमा देदे पर सच तो यही है न कि आप भी आम इंसानों की तरह भावनाओं का एक पुतला, एक अदद इंसान ही हैं।

आपके क्रिकेटीय सफर में बनाये गये उन तमाम रिकार्डस् का ज़िक्र मैं नहीं करूंगा जिनकी बदौलत आप मास्टर-ब्लॉस्टर और भगवान कहलाते हैं...क्योंकि आपका नाम ले देना ही रिकॉर्डस् का ज़िक्र कर देना है और मैंने कभी महज़ आपके उन जादूई आंकड़ों के कारण आपका सम्मान नहीं किया..आपकी कद्र मैंने हमेशा उस एक अच्छे इंसान के रूप में की है जो असीम लोकप्रियता, अगाध सम्मान और बेइंतहा चाहने वालों को पाने के बावजूद कभी अपने लक्ष्य, अपने ध्येय,  अपनी विनम्रता और मानवीयता से नहीं डिगा और आपकी ये भलमनसाहत विदाई के वक्त व्यक्त किये गये आपके वक्तव्य से भी बखूब प्रकट हुई। हाँ ये बात सत्य है कि उस नन्ही उम्र में जबकि मैं क्रिकेट का 'क' भी नहीं जानता था तब मेरे लिये क्रिकेट का मतलब आप ही थे। जिस वक्त आपने अपने करियर की शुरुआत की उस वक्त तो मैंने अपना होश ही नहीं संभाला था..मेरे लिये तो आपके करियर के  बढ़ते जाने का मतलब ही मेरे जीवन का वृंद्धिगत होना रहा है। इसलिय मैं अपनी अदनी सी बौद्धिकता से क्या आपके सूर्य समान विशाल क्रिकेटीय करियर को दीपक दिखाने की गुस्ताखी करूं। हाँ एक चीज़ को ज़रूर बयां करना चाहुँगा क्योंकि उसे मैं समझ सकता हूँ कि आपने इस क्रिकेटीय जीवन के लिये किस बहुमूल्य चीज़ का त्याग किया है- और वो है अपना बचपन और अपनी बिंदास जवानी।

जिस नादान उम्र में बच्चे छोटी-छोटी सी ज़िद और गुडडे-गुड़ियों के खेल में ही मशरूफ रहते हैं तब आपके हाथ में बल्ला था..जिस उम्र में नितांत मनमौजीपन होता है तब आप सुवह-शाम क्रिकेट के मैदान पे पसीना बहाया करते थे। जिस उम्र में जवानी की दहलीज़ पे कदम रखता एक युवा कॉलेज की अल्हड़ मस्तियों में डूबा रहता है, गर्लफ्रेंड, दोस्तों के साथ मस्ती, पार्टी और बंजारेपन की रंगीनियों में रंगा रहता है उस उम्र में आप देश का प्रतिनिधित्व कर रहे थे..और एक बड़ी भारी जिम्मेदारी को अपने कंधों पर उठाये हुए थे। जिंदगी के ये छोटे-छोटे मगर बेहद अहम् जज्बातों के साथ कॉम्प्रोमाइज़ करना कभी भी किसी इंसान के लिये आसान नहीं होता..लेकिन आपने अपनी जिंदगी के इस दौर में अपना सर्वस्व क्रिकेट को सौंप दिया था..और आपके इसी समर्पण, एकाग्रता और इच्छाशक्ति का ही परिणाम है कि आज आपको वो सब मिला जिसकी उम्मीद किसी इंसान को स्वप्न में भी नहीं होती। लेकिन एक अहम् बात ये भी है कि जो अकूट दौलत, सम्मान और यश आपको मिला है आपने कभी भी उसे नहीं चाहा..आपने तो बस एक क्रिकेट को चाहा और अपने लक्ष्य के प्रति किये गये शिद्दत से समर्पण ने आपको वो सब दिया जिसे देख लोग बौराये फिरते हैं। आपकी इस क्रिकेटीय निष्ठा को ही हमारा सैल्युट है अगर ये निष्ठा हर इंसान के पास आ जाये तो दुनिया में ऐसी कोई भी मंजिल नहीं जिसे लोग हासिल न कर पाये। वास्तव में कमी हममें ही होती है और हम अक्सर दोष बाहरी चीज़ों को देते हैं। हमें मंज़िल की चमक दिखाई देती है और हम उस मंजिल की चकाचौंध को ही पसंद करते हैं पर कभी भी हमें रास्तों का संघर्ष नज़र नहीं आता यही कारण है कि हमारी निष्ठा उस संघर्ष, उन प्रयासों में नहीं होती..जिन प्रयासों से अभीष्ट मंजिल की प्राप्ति होती है।

एक बात और कि मैंने कभी आपको भगवान की तरह नहीं माना..आप मेंरे लिये अपनी तमाम क्षमताओं का सदुपयोग करने वाले एक अच्छे इंसान ही रहे हैं..यही वजह है कि जब आप अच्छा नहीं खेलते थे तो आपके लिये भला-बुरा भी बहुत बोला है...लेकिन जब भी अच्छा खेले हैं तो आपको सिर-आंखों पे बैठाया है। आपको खेलते देखना मुझे जितना पसंद था उतना ही पसंद आपको सुनना भी है..क्योंकि आपकी मासुमियत और छलरहित इंसानियत आपके शब्दों से बखूब बयाँ होती है। एक अफसोस ज़रूर है कि कभी आपको सीधे मैदान पर जाकर खेलते हुए नहीं देख पाया..2006 की चैंपियंस ट्राफी के जिस इकलौत मैच को मैंने मैदान में जाकर देखा है उसमें आप किसी कारण वश नहीं खेले थे। इसलिये ये मलाल हमेशा रहेगा। लेकिन आपकी ऐसी असंख्य यादें हैं जिन्हें मैं आने वाली पीढ़ियों को सुनाउंगा और उन्हें सुनाते वक्त गर्व से हमारा सीना चौड़ा भी रहेगा कि हमने सचिन को क्रिकेट खेलते देखा है।

आपके जाने के बाद का खालीपन कुछ वक्त तो रहेगा लेकिन फिर ये भी भर जायेगा क्योंकि यही दुनिया की रीत है 'द शो मस्ट गो ऑन'। आपके बनाये रिकॉर्ड्स भी एक एक कर टूटेंगे क्योंकि रिकॉर्ड्स की फितरत ही ये होती है..लेकिन कोई टूटा हुआ रिकॉर्ड और आपकी जगह लेने वाले शख्स के आ जाने के बावजूद कभी आपका कद छोटा होने वाला नहीं है...आज क्रिकेटीय जगत में जो गम पसरा है वो भी इस कारण है कि आपने जो खुशियां दी है उनकी कोई सीमा नहीं रही है और खुशियां जितनी ऊंचाई पे जाकर नीचे उतरती हैं ग़म को भी उतना ही गहरा बना जाती हैं..समय के सहलाने वाले हाथ सारे ग़म भर देते हैं लेकिन उस ग़म से पैदा हुआ खालीपन तो जाते जाते ही जायेगा। सचिन! आप क्रिकेट का मैदान छोड़ सकते हैं हमारे दिल की ज़मीं नहीं........

Tuesday, November 12, 2013

सिनेमा के व्यवसायिक दलदल में चंद सार्थकता के कमल

सिनेमाघरों में चैन्नई एक्सप्रेस जैसी बेतुकी और ग्रांड मस्ती जैसी फूहड़ फ़िल्म की व्यवसायिक कामयाबी के बाद...इन दिनों क्रिश-3 जैसी औसत सुपरहीरोनुमा फिल्म जमकर बॉक्स ऑफिस पे पैसा कूट रही है..इसी फेहरिस्त में धूम-3 टाइप मसाला फिल्म प्रदर्शन के इंतजार में है और मौजूदा लहर को देखकर कयास लगाना मुश्किल नहीं कि ये भी सौ करोड़ के मायावी क्लब में शामिल होने वाली फिल्म साबित होगी...जिस सौ करोड़ के आंकड़े को ही इन दिनों सफलता और सार्थकता का पर्याय माना जाने लगा है। प्रायः हर फिल्मकार इसी सौ करोड़ी जंजाल को आदर्श मान सिनेमा निर्माण कर रहा है।

दरअसल ये आज या कल का ही जंतर नहीं है इस सौ करोड़ी सन्निपात से हमारे फिल्मकार लगभग पिछले एक दशक से ग्रसित हैं और इस व्यवसायिक चकाचौंध ने उनसे सार्थकता के आग्रह को छीन लिया है यही वजह है कि दिग्गज फिल्मकार अपनी समस्त समय, शक्ति और बुद्धि का प्रयोग मात्र उस मसाला मनोरंजन के निर्माण मे कर रहे हैं जो उनकी काँखों से रुपयों की सरिताएं प्रवाहित करवा सकें। इस व्यवसायिक चमक के चलते ही उन्होंने सिनेमा के जनक दादा साहेब फाल्के की वो उक्ति भी विस्मरा दी है जिसमे फाल्के साहब ने कहा था कि 'य़द्यपि सिनेमा मनोरंजन का सशक्त माध्यम है लेकिन इसका उत्तम प्रयोग समाज में ज्ञानवर्धन और जागरुकता के लिये भी किया जा सकता है'। फिल्मकारों के व्यवसायिक मोह के कारण तमाम उत्तरदायित्व की भावनाएं हासिये में फेंक दी गई हैं और भौतिकवादिता की हवस के चलते हॉलीवुड और दक्षिण भारतीय मसाला फिल्मों की नकल से भी अब कोई गुरेज़ नहीं रहा है। इन फिल्मों के पहले भी सलमान खान को सितारा बनाने वाली दबंग, वांटेड, बॉडीगार्ड जैसी फिल्में और राउडी राठौर, गोलमाल रिटर्न्स, सिंघम, हाउसफुल टाइप फिल्में इसी व्यवसायिकता के दलदल को गहरा बना चुकी हैं। लेकिन इस सबके बावजूद गुजश्ता दशक को हिन्दी सिनेमा का स्वर्णिम दशक माना जा रहा है...इसका कारण है व्यवसायिकता के दलदल में खिले हुए चंद सार्थक एवं विविध मुद्दों पे बनी फिल्मों के खुशबुदार कमल, जो हिन्दी सिनेमा की गरिमा को अंतर्राष्ट्रीय मंच पे जिंदा रखे हुए हैं।

इस समझने के लिये ज्यादा पीछे जाने की ज़रूरत नहीं है इरफान ख़ान स्टारर लंचबॉक्स और राजकुमार यादव अभिनीत शाहिद, उन फिल्मों के उदाहरण हैं जो हिन्दी सिनेमा की सार्थकता को बयां करती हैं। लेकिन अफसोस होता है जब दबंग और चैन्नई एक्सप्रेस जैसी फिल्में हाउसफुल जाती हैं और इन सार्थक फिल्मों पे सिनेमाघरों में सीटें खाली पड़ी रहती हैं। जनता की ये प्रवृत्ति इस बात को बयाँ करती है कि हमारा रवैया ज़बरदस्त ढंग से बेहुदा तमाशे पे ताली बजाने वाला ही बना हुआ है भले ही हम कितनी ही बौद्धिकता की जुगाली लोगों के सामने करते नज़र आये। अपने मनोरंजन चुनने के लिये हम हमेशा अतार्किकता, सतही भावनाओं और अश्लीलता को ही आदर्श मानकर चलते हैं। ऐसा नहीं है कि मुख्यधारा के परे हास्यात्मक मनोरंजन देखने को नहीं मिलता बल्कि कई ऑफबीट फिल्में बेहद इंटेलीजेंस पूर्ण सिचुएशनल कॉमेडी एवं आला दर्जे के विट (हास्य जो संवादों से पैदा होता है) के माध्यम से उत्तमोत्तम हास्य पैदा करती हैं। इन मनोरंजक फिल्मों की कॉमेडी किसी अतार्किक, बेढंगी उछलकूदों में आधारित नहीं बल्कि हमारे आसपास की ज़िंदगी से जुड़ी हुई प्रतीत होती है। इसका बखूब दर्शन हमनें विकी डोनर, खोसला का घोसला, भेजा फ्राय, चलो दिल्ली, दो दूनी चार जैसी फिल्मों में किया है।


इन हास्यात्मक फिल्मों के अलावा कई ऐसी भी फिल्में रही हैं जो संवेदनाओं एवं वैचारिकता की चासनी में इस कदर डूबी होती है कि उनका आस्वादन करते वक्त अपने ज़हन को छुईमुई सा बना लेना होता है..मानो रुह का थोड़ा भी कड़क मिज़ाज इनके संपूर्ण जायके को मटियामेट करके रख देगा। इकबाल, डोर, उड़ान, शिप ऑफ थीसिस, दसविदानिया और मि.एंड मिसेज अय्यर कुछ इसी श्रेणी की फिल्में हैं। आतंकवाद, गरीबी, बेवशी, बेरोजगारी, सांप्रदायिकता जैसे मुद्दों पर भी सिनेमा की इस दूसरी पंक्ति की धारा ने शानदार इंटेलेक्चुअल मनोरंजन पैदा किया है। ए वेडनेसडे, आमिर, मुंबई मेरी जान, फिराक़, ये मेरा इंडिया, द नेमसेक, पीपली लाइव, धर्म और फंस गए रे ओबामा जैसी कुछ फिल्में हिन्दी सिनेमा को सैल्युट मारने को मजबूर करती हैं। विविध विषयों पर बनी इन तमाम फिल्मों को देख ये यकीन करना मुश्किल होता है कि सामान्य से दिखने वाले इन विषयों पर इस कद़र मनोरंजन गढ़ा जा सकता है। पिछले वर्ष प्रदर्शित होने वाली ओह मॉय गॉड और इंग्लिश-विंग्लिश का ज़िक्र करना भी इस कड़ी में बेहद आवश्यक है।

इन सरल-सहज विषयों के अलावा कुछ फिल्में ऐसी भी हैं जो ग्रे शेड या कालीन के नीचे के स्याह पक्ष को उजागर करती नज़र आती है देखने में बेहद उलझी हुई और जटिल फिल्में मालुम होती हैं इनका प्रस्तुतिकरण भी अतिरेकपूर्ण जान पड़ता है..लेकिन इस सबके बावजूद ये व्यवसायिक मसाला फिल्मों से पूर्णतः भिन्न प्रकृति की होती हैं और इन फिल्मों पर भी व्यवसायिकता के परे कलापक्ष ही मजबूती से जाहिर होता है। अनुराग कश्यप, दिबाकर बनर्जी, मणिरत्नम इसी कोटि की फ़िल्में बनाने वाले फिल्मकार रहे हैं और ब्लैक फ्राइडे, गैंग्स ऑफ वासेपुर, अब तक छप्पन, मद्रास कैफे, शंघाई, हजारों ख्वाहिशें ऐसी, मैट्रो, गुलाल, कहानी जैसी फिल्में ऑफबीट सिनेमा के इस वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं।

बहरहाल, इस व्यवसायिकता के दलदल में यदा-कदा नज़र आने वाले ये सार्थकता के कमल राहत पहुंचाते हैं और कमसकम मेरे सिनेमाई प्रेम को जीवित रखे हुए हैं अन्यथा चैन्नई एक्सप्रेस, ग्रांडमस्ती, दबंग टाइप फिल्में कई बार मेरा सिनेमा से मोहभंग कर चुकी हैं। खुशी की बात ये भी है कि इस तरह नवीन व छुपे हुए विषयों पे प्रायः नई उम्र के फिल्मकार फिल्में बना रहे हैं और स्थापित फिल्मकारों को मूंह चिढ़ा रहे हैं जो बॉक्स ऑफिस का प्रयोग धन कूटने के लिये ही करते हैं। फिल्मों के साथ-साथ अब फिल्मकारों में भी विविधता है अन्यथा पहले हम ऑफबीट फिल्मों के लिये महज श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, मणिकौल जैसे निर्देशकों पर ही आश्रित थे। ऊपर वर्णित इन फिल्मों ने ही हिन्दी सिनेमा को विश्व मंच पर अगले पायदान पे पहुंचा दिया है...हालांकि कुछ मुख्यधारा की फिल्में भी मनोरंजन के साथ सार्थक प्रयास कर रही है जिनमें थ्री इडियट्स, जब वी मेट, लगे रहो मुन्नाभाई, लगान, रंग दे बसंती, भाग मिल्खा भाग प्रमुख हैं किंतु उनकी संख्या भी बहुत कम है। मुख्यधारा की सार्थक फिल्मों के परे ऑफबीट सार्थक फिल्मों का ज़िक्र इसलिये भी ज़रूरी हो जाता है कि अक्सर ये फिल्में अनदेखी ही रह जाती हैं जबकि मैनस्ट्रीम सिनेमा को तो बहुलता में दर्शकवर्ग मिल ही जाता है।

खैर, आज अपने कंप्यूटर में एक बेहद छोटे बैनर की ऐसी ही गुमनाम फिल्म सड्डा अड्डा देखने के कारण..अनायास ही मेरे मन में इन सार्थक मगर गुमनाम फिल्मों के प्रति कुछ लिखने का खयाल आया..जिस वजह से ये लेख लिखने की प्रेरणा मिली। एक बात ज़रूर है कि इस तरह के सिनेमा से आने वाली महक से व्यवसायिक प्रयासो पे आने वाली खुन्नस कुछ कम जरुर होती है.....