Tuesday, June 9, 2015

समाज के दो भिन्न ध्रुवों पर खड़ी नारियों का प्रतीक : तनुजा और कुसुम

'तनु वेड्स मनु रिटर्न्स' हिन्दी सिनेमा के बेहतरीन दस्तावेजों में शुमार हो रही है। फिल्म में बला की ताजगी है कि टीवी पे नजर आने वाली इसकी क्षणिकाएं बारंबार देखे जाने पर भी आपका मन मोह लेती हैं। कहना चाहिये कि ऐसी फ़िल्में बनाई नहीं जाती बल्कि बन जाती हैं। जिन्हें देखते समय जो आनंद हम महसूस करते हैं वो तो अपनी जगह है पर देखे जाने के लंबे समय बाद ये कुछ ज्यादा ही रस देती हैं। हरियाणवी कुसुम का किरदार सिनेमा के स्वर्णिम इतिहास में निश्चित ही जगह लेगा। गोयाकि किरदार ने कलाकार को गौढ़ कर दिया है और दत्तो के किरदार से तनुजा के पराजय वाले दृश्य को देख कंगना रानौत शायद खुद भूल जायेंगी कि इन दोनों भूमिकाओँ में वे स्वयं अभिनय कर रही हैं।


बहरहाल, हास्य और मनोरंजन के परे भी इस फ़िल्म में कई संगीन अर्थ है। जिनकी हर कोई अपने हिसाब से व्याख्या कर सकता है। फिलहाल यहाँ तनुजा और कुसुम के जरिये भारतीय समाज मेंं नारी दृष्टिकोण के दो भिन्न पक्षों पर मंथन करने को जी चाह रहा है।  तनुजा और कुसुम (दत्तो) महज दो महिलाएं ही नहीं बल्कि दो संस्कृतियां हैं। समाज के दो विरुद्ध ध्रुव हैं। दो अलग सोच हैं जिन पर समाज ने नारी के तमाम Do's & Don'ts तय कर रखे हैं।

तनुजा जहाँ उन तमाम नारियों की प्रतिनिधि है जो भले अपने अरमानों को पंख देती हैं लेकिन दृष्टिकोण के अभाव में जो रास्ता चुनती हैं वो नारीत्व की संजीदगी को उससे कोसों दूर कर देती है। वो आजादख़याल वाली होके भी जिस्म की नुमाइश ही करती नज़र आती है और गाहे-बगाहे खुद को एक वस्तु के तौर पर ही प्रस्तुत करती है। अपने बौद्धिक-भावनात्मक अस्तित्व के परे उसे अपने तन का ही गुरूर है, छद्म आधुनिकता के कलेवर में लिपटी वो मेकअप-ड्रेसिंग और बाहरी आडंबर को ही सब कुछ मान बैठी है और चर्म के मिथ्या उपासक  इस पितृसत्तात्मक समाज में वो अपने ज़िंदा माँस के लोथड़े से जिस्म के भूखे गीदड़ो को लुभाती है। इसके लिये कभी-कभी उसे प्रेम का लॉलीपॉप कुछ पुरुषों द्वारा पकड़ा दिया जाता है। ये वो महिला है जिसकी यूएसपी ब्वॉयफ्रेंड की संख्या से बढ़ती है और फ्लर्टिंग के मार्केट में कमर्शियल डिमांड में इजाफा होता है।

तनु समाज की उस सोच का भी प्रतीक है जो औरत के सेटलमेंट को शादी, हसबेंड, बच्चों तक सीमित मानती हैं। जहाँ उसके बदन को ही उसका वतन माना जाता है। जहाँ खूबसूरती सबसे बड़ा वरदान और समाज द्वारा निर्धारित बदसूरती के मापदण्ड सबसे बड़ा अभिशाप है। जिस समाज का उच्च शिक्षित वर्ग भी आईएएस, डॉक्टर, इंजीनियर या फिर कोई एनआरआई बनने की तमन्ना महज इसलिये पालता है कि इससे उसका विवाह किसी दैहिक सौंदर्य संयुक्त महिला से हो जायेगा और वर्ग-बिरादरी में उसकी मिथ्या प्रतिष्ठा में कुछ स्टार और चस्पा हो जायेंगे। इस सोच से पुरुष अपनी भौतिक उपलब्धियों से मनचाही महिला पाता रहेगा और किसी पद-पैसे-प्रतिष्ठा वाले पुरुष की प्राप्ति को ही महिला की उपलब्धि समझा जायेगा। जिस समाज में महिला का अपना कोई वजूद नहीं, वो पिता-पति और आखिर में पुत्र से ही अपना अस्तित्व गढ़ेगी, यही उसका सौभाग्य माना जायेगा और इसे ही उसके संस्कार कहकर महिमामंडित किया जायेगा।

दूसरी ओर एक देहाती कुसुम का किरदार है। अपने अरमानों को पंख यह भी देती है लेकिन इसकी कोशिश किसी के साये तले अपना वजूद तलाशने की नहीं, बल्कि खुद की पहचान स्थापित करने की है। ये प्रेम को इसलिये नकारती है कि उसकी इस आशिक़ी की नज़ीर कई दूसरी महिलाओं को खुले गगन में उड़ने से रोक सकती हैं और उसका प्रेम सैंकड़ो आजाद ख़याल महिलाओं के चरित्र पर लांछन लगा सकता है। ये वो महिला है जो प्रेम के लिये समाज की रुढ़िवादी सोच के सामने सीना ताने खड़ी हो जाती है और सांत्वना स्वरूप मिली लिजलिजी प्रेम की भावनाओं को ठुकरा भी देती है। फिल्म के आखिर में कुसुम का खुद को एथलेटिक्स बताते हुए कहना कि या तो उसे फर्स्ट आना पसंद है या हार जाना, पर खैरात में मिली सांत्वना की वो कतई आकांक्षी नहीं। यह सोच ही उसे शक्तिस्वरूपा बनाती है। ये वो लड़की है जो आंसू भी बहाती है और ज़रूरत पड़ने पर लोगों के कबूतर भी उड़ाती है। 

ये उस नारी का प्रतीक है जो तथाकथित मॉडर्न नहीं है पर इसे निभाना भी आता है और ज़रूरत पड़ने पर मिटाना भी। ये जोड़ना भी जानती है और तोड़ना भी। जो खुद को सहेज सकती है, बच्चे पाल सकती है और मौका आने पर घर भी चला सकती है। कुसुम छोटे शहरों और देश के गांवों में पल रही उन दबी आकांक्षाओं का प्रतीक है जिनका दहकता लावा रस्म ओ रिवाज़ की कालिख से ठंडा नहीं पड़ता। जिसके सपने छत पर सूख रहे उन कपड़ो की तरह नहीं है जो शाम होते-होते उतार लिये जाते हैं। शादी-बच्चे, घर-परिवार इसके हौसले को पस्त नहीं करते। ये भले एक तरफ पत्नी है, माँ है पर दूसरी तरफ कोई स्पोर्ट्स वूमन, डॉक्टर, साइंटिस्ट, इंडस्ट्रिलिस्ट, आईएएस, आईपीएस या किसी संस्था-संगठन की प्रधान भी है। इसकी निगाहों में दोहरा पैनापन है जो सिर्फ दिल ही नहीं चुरातीं बल्कि अब डराती भी हैं।

तनु वेड्स मनु, पीकू, क्वीन, मैरीकॉम, कहानी जैसी पिछले कुछ वर्षों में आई फ़िल्मों ने महिला के जिस बदले स्वरूप को मुखर किया है वो काबिलेतारीफ है। अब हमारे सिनेमा की नायिका पेड़ों के ईर्द-गिर्द आशिकी फरमाने या गुंडों के बीच असहाय घिरे होने पर नायक को अपनी मर्दानगी दिखाने का मौका देने के लिये ही नहीं है बल्कि अब इसने ब्युटी पार्लर के साथ-साथ जिम जाना भी शुरु कर दिया है। इसके पास जादूई क्लिप है जिससे ये बाल भी बांधती है और दूसरों के सिर भी खोलती है। क्लासरूम के अंदर, किताबों के बीच अब यह लव लेटर ही एक्सचेंज नहीं करती बल्कि उनके जरिये इसने नेवी, एयरफोर्स जैसे पुरुष वर्चस्व वाले क्षेत्रों में दस्तक दे दी है। हाँ कुछ पोंगापंथी, धर्मभीरुता, परंपरा और रुढ़िवाद के मेघ अब भी हैं जो इस प्रभातमा की आभा को खुलकर सामने नहीं आने दे रहे...पर क्षितिज के किसी कोने पर ये निरंतर रोशनी बिखेर रही है। आधी आबादी का सच यही है...वो नहीं, जिसे तुमने बंधनों में जकड़ रखा है।

Monday, May 25, 2015

सार्थक मनोरंजन की वेदी पे फूटी सृजन की कोपल : तनु वेड्स मनु रिटर्न्स

बॉक्स ऑफिस आनंद एल. राय की बेहतरीन रचनाधर्मिता से गुलजार है। 'तनु वेड्स मनु' अपने पिछले संस्करण से ज्यादा ताजगी, नयापन और सार्थकता के साथ वापस लौटी है। मनोरंजन के गलियारे में सार्थक हास्य धूम मचा रहा है। विवाह और प्रेम की उधेड़बुन हास्य की चासनी में प्रस्तुत है साथ ही ये फिल्म बातों बातों में समाज से कई ज्वलंत प्रश्न भी कर लेती है और हिन्दुस्तान के कई राज्यों और कई समाजों में रची-पची पितृसत्तात्मक सोच पर बड़े प्यार से तमाचा मारती है।


आनंद राय ने कथा को अपने प्रस्तावित उद्देश्य तक ले जाने के लिये इस बार तनु के साथ दत्तो का भी साथ लिया है और दोनों ही किरदारो में कंगना के अभिनय ने एकतरफा साम्राज्य किया है। 'क्वीन' के बाद अब 'तनु वेड्स मनु' ने कंगना को चोटी पर विराजी समकालीन अभिनेत्रियों की श्रेणी में ला खड़ा किया है और कई मामलों में वे मौजूदा दौर की अभिनेत्रियों से भी ऊपर पहुंच गई हैं। कंगना के अभिनय कौशल के लिये अलग लेख की दरकार है फिलहाल बात को निर्देशक आनंद एल राय और तनु वेड्स मनु तक सीमित रखते हैं। 

आनंद राय की फ़िल्में मनोरंजन की तीव्र आग्रही हैं लेकिन मनोरंजन के चलते कभी सार्थक विमर्श गौढ़ नहीं होता। मसलन, रांझणा जैसी विशुद्ध मनोरंजक फ़िल्म प्रेम, धर्म और राजनीति की परतों को उधेड़ते हुए, उनके बीच पल रहे सुप्त मानवीय अहसासों और प्रवृत्तियों को बाहर लाती है लेकिन इस प्रयास के बीच यह कहीं भी गंभीर नहीं होती। आनंद का सिनेमा किसी भी तरह के भारी भरकम संवादों का सहारा लिये बिना गहरी बात कहता है और ऐसा ही तनु वेड्स मनु रिटर्न्स में देखा जा सकता है। 

आनंद की नायिका अल्हड़ होती है, वो नियमों को तोड़ती है और भारतीय समाज में प्रस्तुत पारंपरिक महिला की छवि को तोड़ते हुए वो करती है जो वह करना चाहती है। लेकिन बावजूद इसके प्रेम की संजीदगी उसी शिद्दत से महसूस करती है जैसी किसी भी दूसरी महिला के हृदय में होती है। प्रेम को लेकर वो कन्फ्यूस होती है पर तमाम संशयात्मक विचारों के बावजूद उसके मन का मोर वहीं जाकर आसरा पाता है जिसे उसने अपना सर्वस्व सौंपा है। वो बेवफा हो सकती है पर बदचलन नहीं। पर समाज महिला की तात्कालिक परिस्थितियों से पैदा बेवफाई को उसके चरित्र से जोड़ देता है और उसे कुल्टा, कुलच्छिनी जैसे सैंकड़ो दुर्नामों से संबोधित किया जाता है।

तनु वेड्स मनु या रांझणा जैसी फिल्मों की सफलता की अहम् वजह इनका मिट्टी से जुड़ा होना है। ये कहानियां किसी कल्पनालोक के आदर्श गगन में विचरण नहीं करती बल्कि हमारे आसपास के यथार्थ को ही प्रस्तुत करती हैं। प्रसिद्ध फिल्म समालोचक जयप्रकाश चौकसे इस बारे में कहते हैं 'हर देश का विशुद्ध देशज सिनेमा ही सार्थक होता है और आनंद राय, तिग्मांशु धुलिया, सुजॉय घोष और अजय बहल जैसे फिल्मकारों के सक्रिय रहते हॉलीवुड का अश्वमेघ भारत में कभी सफल नहीं होगा। सारी तकनीकी चकाचौंध हरियाणवी कुसुम से पराजित होगी। एक करोड़ चौंतीस लाख अप्रवासी भारतीय लोगों की डॉलर ताकत के कारण भारतीय शिक्षा के पाठ्यक्रम में पश्चिम की भौंडी नकल प्रस्तुत है। इसी कारण हमारा युवा दर्शक फास्ट और फ्युरियस हो गया है और स्वयं को एवेन्जर मान बैठा है।' पश्चिमी मीडिया और शिक्षा के प्रभाव के चलते देश में सांस्कृतिक साम्राज्यवाद की स्थिति है। यही वजह है कि पिज्जा और वर्गर की उपासक इस संस्कृति के मन में रोटी के प्रति उपेक्षाभाव है। हॉलीवुड फ़िल्मों की दीवानगी जता हम खुद को मॉडर्न साबित करना चाह रहे हैं।

फिल्म में ठेठ हरियाणवी कुसुम अपनी वाक्पटुता से अति वाचाल तनुजा का भी मूंह बंद कर देती है और बताती है कि शक्ति का संचार सिर्फ विलायती परिवेश के संपर्क से ही पैदा नहीं होता, हम जड़ों से जुड़े रहकर भी असीम सामर्थ्यवान हो सकते हैं। भारतीय नारी अनादि से अपनी माटी से जुड़ी रहकर ही शक्तिस्वरूपा है यह तो विदेशी प्रभाव है  जिसके कारण वह कॉकरोच देख किसी पुरुष को आवाज देती है। कुसुम आंसू बहाती है और ज़रूरत पड़ने पर कनपटी पे हाथ भी चलाती है। पर आंसू बहाते हुए वो कतई कमजोर नहीं होती और हाथ चलाते वक्त वो असंवेदनशील नहीं होती। आंसू और संवेदनशीलता मजबूती का प्रतीक हैं, कमजोरी तो अपने जज़्बात छुपाने और गुस्सा दिखाने से बयां होती है। मनु को तनु से मिलाते वक्त कुसुम खुद को एथलेटिक्स बताते हुए भीख में मिली सांत्वना लेने से इंकार करती है लेकिन अपने प्रेम के न मिल पाने के कारण छुपकर आंसू भी बहाती है। निर्देशक का प्रस्तुतिकरण कुछ ऐसा है कि इन दोनों ही प्रकरणों में कुसुम की मजबूती ही प्रदर्शित होती है कमजोरी नहीं।

आनंद की पिछली फिल्में रांझणा और तनु वेड्स मनु (प्रथम) तो कहीं-कहीं कमजोर होती हुई भी प्रतीत होती थीं पर तनु वेड्स मनु रिटर्न्स में ऐसा नहीं है। माधवन का अभिनय संजीदा है और किरदार के अनुरूप यही उनसे दरकार थी। संवादों से ज्यादा उन्हें अपने चेहरे से अभिनय करना था लेकिन इस बीच कहीं भी अति नाटकीय होने की गुंजाईश नहीं थी। ऐसे में कंगना के धमाकेदार दोहरे अभिनय के बीच खुद को समन्वयित रखने के लिये माधवन् का काम निश्चित ही प्रशंसनीय है। इसके अलावा लोंग-इलायची की तरह माइंड-फ्रेशनर के रूप में प्रयुक्त अन्य चरित्र अभिनेताओं का तो कहना ही क्या। इस फिल्म में जितना कंगना और माधवन को याद रखा जायेगा उतना ही पप्पी बने दीपक डोबरियाल, राजा अवस्थी के रूप में जिमी शेरगिल और अन्य किरदारों में स्वरा भासकर और जीशान अयूब को भी याद किया जायेगा।

बहरहाल, फिल्म को समझने  और इसके संबंध में अपनी धारणा बनाने के लिये इस लेख का सहारा कतई न लें क्योंकि यह लेख तो फिर भी बहुत जटिल हो सकता है जबकि फिल्म तो बेहद हल्के-फुल्के अंदाज में आपका मनोरंजन करती है।

Saturday, April 11, 2015

मेरी प्रथम पच्चीसी : ग्यारहवी किस्त


(ज़िंदगी की तथाकथित व्यस्तताएं और ज़रुरी काम हमसे हमारी सृजनधर्मिता छीन लेते हैं। हम अंदर ही अंदर छटपटाते रहते हैं पर अपनी रचनात्मक शक्ति के प्रयोग को किसी न किसी वजह से टालते रहते हैं और सच्चाई यही है कि रचनात्मकता से बढ़कर सुख और किसी में नहीं। ऐसी ही कुछ व्यस्तताओं के चलते ब्लॉग लेखन में विलंब होता रहता है और अपने इस सृजनधर्म से दूर जाकर कसमसाहट भी होती है। बहरहाल लंबे वक्त बाद जीवन के प्रथम पच्चीस वर्षों का यह यात्रा वृत्तांत पुनः आगे बढ़ा रहा हूँ। विलंब होने से अहसासों का रेशा भी टूटता है जिसका फर्क लेखन पर भी प्रतिबिंवित होता है इस तरह के श्रंख्लाबद्ध लेखन के लिये निरंतरता आवश्यक होती है पर चाहते हुए भी कभी आलस तो कभी दूसरी वजहों से इस निरंतरता को बनाये रखना मुश्किल हो जाता है। खैर, औपचारिक बातों को विराम देते हुए पच्चीसी को आगे बढ़ाता हूँ। )

गतांक से आगे....

जीवन में जिस दौर से हम गुजर रहे होते हैं, हमें उसकी कद्र कभी नहीं आती और हम बरहमिश अतीत के गलियारों में ही डोलते रहते हैं...और इस प्रवृत्ति के चलते वर्तमान के सुख से वंचित रहते हुए स्वर्णिम वर्तमान को भी अतीत बन जाने देते हैं पश्चात इस खिन्नता से परेशान रहते हैं कि काश! तब हमने ये किया होता, काश! तब हमने वो किया होता। जीवन के प्रारंभिक उन्नीस वर्षों के गुजरने और स्नातक पर्यंत का अध्ययन पूर्ण करने के बाद जब स्नातकोत्तर की शिक्षा अर्जित करने भोपाल आया तो अपने अध्ययन का तकरीबन पूरा प्रथम सत्र गुजरे हुए लम्हों की यादों में ही बिता दिया। इस कारण नये रिश्तों और नये अहसासों को पनपने का ज्यादा अवसर ही नहीं मिला। अपने अतीत को वर्तमान से बेहतर बताते-बताते तत्कालीन दौर को कोसता रहा और वक्त को रेत के मानिंद अपनी मुट्ठी से फिसलने दिया। 

चीज़ें बहुत सामान्य ढंग से घट रही थीं। यूँ समझिये कि न कुछ बहुत बेहतरीन था और न ही कुछ बेहद बदतर। छोटी-छोटी चीज़ें खुशी देती थी और छोटी-छोटी समस्याएं ही पहाड़ सरीकी दिखती थी। सतही अहसास और बचकाने सपने दिल में हिलोरे लेते थे। जो कि उस उम्र का सच होते हैं। ज़रा सी तारीफ आसमानी अहंकार की वजह बन जाती थी और तनिक सी उपेक्षा रातों की नींद छीन लेती थी। समझ कम थी पर जानकारी शनैः शनैः बढ़ रही थी और समझ के बगैर जानकारी का बढ़ना कभी सुख का कारण नहीं होता। 

समझ, हमेशा विपदाओं और असफलताओं से ही मिलती हैं। गलतियां ही अनुभवी बनाती हैं। जब लाचारियों के कारण कुछ करने का रास्ता नज़र नहीं आता तो हम किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं और तभी हमें विराम का वक्त मिलता है ये विराम का वक्त अनायास ही विचार का वक्त बन जाता है। जिस कारण स्वतः समझ विकसित होने का माहौल निर्मित हो जाता है। प्रथमदृष्टया मुसीबतें बेहद विचलित करने वाली लगती हैं पर कालांतर में यही परिपक्वता का संचार करती हैं। मेरी ज़िंदगी में ऐसी ही विपदाओं का दौर शुरु हो रहा था जिस कारण क्षणिक उपलब्धियों और आधारहीन ख़याली घोड़ों पर लगाम लगी। जीवन की लंबाई के परे, इसकी गहराई को जानने के अवसर मिले। विराम का वक्त आया और यह अपने साथ विचार का वक्त लाया। यह सिलसिला शुरु तो 2007 में हुआ था पर थमा अब भी नहीं है।

नवंबर 2007 में अपने गृहग्राम से लौटते वक्त एक सड़क दुर्घटना का शिकार हुआ। हादसा इतना बड़ा नहीं था कि हॉस्पिटल में भर्ती होना पड़े और इतना छोटा भी नहीं था कि तुरंत चलने-फिरने लगे। इसलिये प्राथमिक उपचार के बाद आठ दस दिन विश्राम करना था...यूं कहिये अनचाहा विराम का वक्त..और बेवजह के विचार का वक्त। घटनाएं भले छोटी ही क्युं न हों पर जब वे घटती हैं तो यह ज़रुर लगता है कि अब तो हो गया काम-तमाम और हम एक अदृश्य शक्ति से ज़िंदगी की भीख मांगने लगते हैं। तमाम दुष्कृत्यों को न करने और सुकृत्यों को करने के तात्कालिक संकल्प लेते हैं पर वक्त बीतने के साथ एवं हालात सुधरते ही वे सारे संकल्प फ़ना हो जाते हैं। ज़िंदगी फिर स्वच्छंद हो जाती है। एक्सीडेंट हुआ तो अपने गाड़ी चलाने की रफ़्तार पे तो नियंत्रण पाया ही साथ ही ख़याली उड़ान पर भी लगाम लगी। तात्कालिक ही सही ज़िंदगी की क्षणभंगुरता का भान हुआ। मसान वैराग्य का जन्म और सुप्त चैतन्यता झंकृत हुई।

अपनी इस घटना के चलते कुछ लोगों की पुरातन और अंधश्रद्धा के दर्शन भी हुए। दरअसल, जिस जगह यह सड़क हादसा हुआ था उससे कुछ दुरी पहले एक धार्मिक आयतन पड़ता है जिसे लेकर मान्यता है कि वहां मत्था न टेका तो जीवन में बुरा होना निश्चित है। उस धार्मिक स्थल पर आपकी मान्यता हो या न हो लेकिन उस स्थान से गुजरते वक्त कमसकम गाड़ी का हॉर्न ज़रूर बजा देना चाहिये। पर मेरी नज़र में यह तमाम धारणायें धार्मिकता की पर्याय नहीं बल्कि पोंगापंथी ही हैं। मुझे याद नहीं कि मैंने वहां हॉर्न बजाया था या नहीं लेकिन यह ज़रूर बताना चाहूंगा कि यदि याद होता तब भी मैं वहां यह फिजूल की क्रिया नहीं करने वाला था। ऐसा कहकर मैं किसी धार्मिक आस्था और आयतन का तिरस्कार नहीं कर रहा हूँ पर स्वयं की श्रद्धा के बगैर, चाहे जहाँ महज डर या लालच के मत्था टेकने को नीतिगत आस्था के विरुद्ध ज़रूर बताना चाह रहा हूँ। ऐसी आस्थान मूल्यविहीन तो है ही साथ में इंसान के तार्किक और विवेकवान होने पर भी एक सवाल है। दुनिया का कोई ईश्वर इतना हल्के दर्जे का नहीं हो सकता जो खुद को नमन न करने वालों के साथ बुरा कर अपनी छद्मवृत्ति का परिचय दे। ईश्वरत्व का वास साम्यता के साथ ही हो सकता है। राग-द्वेष संयुक्त होना, पक्षपाती होना और दुनिया को अपने आगे झुकाने की वृत्ति रखना..ये तमाम चीज़ें ईश्वरत्व की पर्याय कतई नहीं है। लेकिन मुझे हिदायतें देने वाले तो दे ही रहे थे। अफसोस इस बात का है कि मेरे संग घटी उस घटना से मेरे श्रद्धान में तो शिथिलता नहीं आई पर कई दूसरे लोग इसे देखकर ज़रूर अंधश्रद्धानी बन गये। डर एवं लालच, सदैव और सर्वथा एक बहुत बड़ी विसंगति ही हैं और इन विसंगतियों के आधार से जो पैदा होगा...वो चाहे जो भी क्युं न हो पर धर्म कतई नहीं हो सकता।

खैर, इस हालात से उबरने में ज्यादा वक्त नहीं लगा...पर यह सुकून महज तीन-चार दिन का ही था क्युंकि कुछ दिनों बाद ही एक दूसरी विपदा बड़ी सज-धज के दर पे दस्तक देने जा रही थी। जीवन के सफ़र में एक और गतिअवरोधक आ चुका था...जिसकी चर्चा अगली किस्त में, फिलहाल रुकता हूँ। लेकिन हाँ चलते-चलते एक बात और कि गतिअवरोधक, जीवन सफर में हमारी रफ़्तार को धीमा भले कर दें लेकिन हर रास्ते और सुरक्षित सफ़र के लिये इनका होना बहुत ज़रुरी है।

जारी.....................

Thursday, March 26, 2015

ज़ेहन में चस्पा कुछ रोज़...

कुछ तिथियां, बढ़ती ज़िंदगी के साथ आगे चलने से इंकार कर देती हैं और वो वहीं चिपकी रहना चाहती हैं जहाँ वो असल में जन्मी थी। 26 मार्च। एक ऐसी ही तिथि है जो मेरे ज़ेहन में कील की तरह ठुकी हैं भले तारीखें, कैलेण्डर की तरह बदल रही हैं। वैसे आज के संदर्भ में देखा जाये तो ये भारत के वर्ल्डकप सेमीफायनल में हारने के कारण पूरे देश के लिये मायूसी की तिथि है लेकिन मैं इस मायूसी के दरमियाँ खुद को एक साल पहले के उस रोज़ से ज्यादा जुड़ा पा रहा हूँ जहाँ कुछ अनजाने रिश्तों से अथाह अपनापन, प्यार और कद्र पाई थी। जहाँ लोगों के दिलों में मौजूद बेइंतहां खामोश मोहब्बत के दीदार किये थे और जाना था कि आप का होना सिर्फ आपके लिये नहीं कई और लोगों के लिये भी बहुत मायने रखता है। अपने वजूद के मायने पता चले थे और कुछ-कुछ अहम् की अनुभूति भी हुई थी। उस रोज़ को गुज़रे एक साल हो गया... इस बात पर यकीन नहीं होता क्योंकि सभी से रुहानी जुगलबंदी अब भी बेहद मजबूत है।

दरअसल, आज ही के दिन ठीक 1 वर्ष पहले अपने छात्रों और पूर्व कर्मक्षेत्र से मुझे विदाई मिली थी और वो विदाई कुछ ऐसी थी जिसके बाद मैं खुद को उस परिसर और उस परिसर के लोगों को खुद के ज्यादा करीब महसूस करने लगा था। उस रोज़ पता चला कि आपकी कर्तव्यनिष्ठा और मेहनत भले ही तत्काल अपना परिणाम प्रस्तुत न करे लेकिन देर-सबेर वो कई दिलों में इज़्जत और मोहब्बत बन अठखेलियां करती है। इसकी बानगी को मैं लफ़्जों से ज्यादा बयां नहीं कर सकता। इसलिये इस पोस्ट के साथ दो वीडियो प्रस्तुत कर रहा हूँ जिन्हें देख शायद आप मेरे जज़्बातों को ज्यादा अच्छे से समझ सकेंगे।

और अपने उन तमाम विद्यार्थियों और चाहने वालों से कहना चाहता हूँ कि जो मायने मेरे लिये, उनके दिल में हैं उतने या उससे कुछ ज्यादा ही वे सब मेरे लिये अहमियत रखते हैं। हो सकता है कभी ज़रुरत पढ़ने पर मैं किसी विशेष परिस्थिति में उनके काम न आ सकूं लेकिन तहे दिल से उनकी हर मुश्किल को आसान ज़रुर करना चाहूँगा और अपनी क्षमताओं के अंतिम सिरे तक से उन तमाम लोगों की प्रगति में सहभागी होना चाहूँगा।


साथ ही इन वीडियोस के रूप में दो नायाब तोहफे देने के लिये सभी विद्यार्थियों का शुक्रिया अदा करता हूँ...जिनकी बदौलत आप सबकी अमूल्य यादों का नज़राना हर वक़्त मेरे साथ हैं। पुनः शुक्रिया। अनायास ही एक गीत की पंक्ति याद आ रही है...''अकेला चला था मैं...न आया अकेला, मेरे संग-संग आया तेरी यादों का मेला..मेरे संग-संग आया तुम सबकी यादों का मेला।"
Miss You All :)

Thursday, February 12, 2015

हर 16 मई की एक 10 फरवरी होती है...

पोस्ट के शीर्षक में व्यक्त पंक्ति मेरे मित्र संभव निराला की फेसबुक वॉल से उठाया गया है..दिल्ली चुनाव के नतीज़ों के बाद व्यक्त की गई यह एक असल आम आदमी की अभिव्यक्ति है जो जीत की बधाई देने के साथ एक चेतावनी भी देती है। जो पंक्ति देखने में बेहद छोटी नज़र आती है पर बड़े गंभीर अर्थ लिये हुए है। अकल्पनीय, ऐतिहासिक, अद्भुत, अद्वितीय, अप्रतिम और ऐसी न जाने कितनी उपमाओं से दिल्ली चुनाव के नतीज़ों को बयाँ किया जा रहा है। भारत जैसे बहुदलीय राजनीति वाले लोकतंत्र में किसी पार्टी द्वारा यदि पिन्चयानवे प्रतिशत सीटों पर कब्ज़ा कर लिया जाये तो उसे निश्चित ही अद्भुत कहा जायेगा...और वो भी एक ऐसी पार्टी जिसे आये हुए जुमां-जुमां हफ्ता भर भी नहीं हुआ है। जी हाँ करीब सत्तर वर्ष पुराने लोकतंत्र में साल-दो साल पहले आई पार्टी का अस्तित्व इससे ज्यादा तो नहीं माना जा सकता। 

10 फरवरी। एक ऐसी तिथि जिसने अरविंद केजरीवाल को महानायक बना दिया। जो इंसान कुछ वक्त पहले तक भगोड़ा, धरनेबाज और इस तरह के कईयों शब्दवाणों से विभूषित किया जा रहा था। 10 फरवरी। एक ऐसी तिथि जिसने सफलता के रथ पर सवार सूरमाओं के सिंहासन को हिला दिया। 10 फरवरी। जिसने 16 मई की ऐतिहासिक विजय को बौना साबित कर दिया। 16 मई के जो हीरो थे, 10 फरवरी को वहीं उपहास के पात्र हो गये। लोकसभा चुनावों में मिली जीत के बाद जिन्हें अगले कुछ दशकों तक के लिये अपराजेय की तरह देखा जा रहा था..सारे देश में जिन्हें कोई चुनौती देता नहीं दिख रहा था..जो पूरे देश के अघोषित छत्रप बन गये थे। लेकिन इन सारे भ्रमों को 10 फरवरी ने तोड़ दिया। दरअसल, ये हार किसी दल, व्यक्ति या विचारधारा की नहीं है बल्कि ये अहंकार की हार है, एक अहंकार जो जनमानस की भावनाओं को संपूर्णतः समझ लेने का दंभ भरता था..और कुछ इसी तरह ये जीत अरविंद केजरीवाल, आम आदमी पार्टी या उनके प्रचंड प्रचार की नहीं है बल्कि ये एक उम्मीद की जीत है..ये उस विकल्प की जीत है जिसे चुनकर जनता सोचती है कि शायद अब हालात बदलेंगे। यह चरम सांप्रदायिक माहौल में धर्मनिरपेक्षता की जीत है..शाइनिंग इंडिया के सपने दिखाकर पुंजीवाद का पोषण करने वालों के समक्ष यह समाजवाद की जीत है।

लेकिन कहानी अब ख़त्म नहीं होती, शपथ लेने के बाद अरविंद केजरीवाल सो नहीं सकते। जनता ने उन्हें अपना सर्वस्व सौंप दिया है..अब तो उन पर अड़ंगे लगाने के लिये एक मजबूत विपक्ष तक मौजूद नहीं है..गठबंधन की मजबूरी नहीं है..तो क्या अब दिल्ली की तस्वीर बदलेगी? क्या अब दिल्ली में कालीन के नीचे का मटमैलापन दूर होगा? झुग्गियों की गंदगी, सड़कों पर अतिक्रमण, अनियंत्रित यातायात, बड़ती महंगाई, महिलाओं की असुरक्षा, बेरोजगारी और अपराध जैसी सैंकड़ो समस्याएं क्या अब दिल्ली का अतीत बनेंगी? यदि ऐसा हुआ तभी 10 फरवरी ऐतिहासिक हो सकती है अन्यथा याद रखें इस 10 फरवरी को 16 मई बनते देर नहीं लगेगी। अरविंद केजरीवाल ने जीत के बाद अपने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए जो बात कही थी उसे अंतर्सात भी करें कि जैसे जनता ने भाजपा-कांग्रेस का अहंकार तोड़ा है..काम न करने की स्थिति में वैसा ही आम आदमी पार्टी के साथ भी हो सकता है। मीडिया जिन्हें आज सिर-आंखों पे बिठा रहा है उन्हें रसातल में पहुंचाने में भी मीडिया को देर नहीं लगती।

अहंकार..चाहे किसी का भी क्यों न हो, टूटता ज़रूर है और इसकी बानगी अरविंद केजरीवाल लोकसभा चुनावों के दौरान देख चुके होंगे..जब दिल्ली में महज 28  सीट जीतने के बाद कुछ ऐसी ही कल्पना उन्होंने लोकसभा चुनाव के लिये भी की और अति उत्साह में खुद को नरेंद्र मोदी के सामने खड़ा कर दिया। जनता हमेशा सजग ही रहती है..वो सगी किसी की नहीं होती। वो ख़ामोशी से किसी के नकारा शासन को सहती है पर जहाँ उसे मौका मिलता है वो किसी भी नेता या दल को उसकी औकात दिखा देती है। अरविंद केजरीवाल याद रखें..दिल्ली, कोई देश की प्रतिनिधि नहीं है..इस छोटे से राज्य(वो भी अपूर्ण) की जीत से उत्साहित हों पर इसे समस्त देश का जनाधार न मान बैठे। आप अच्छा करें जनता आपको उसका ज़रूर ईनाम देगी..पर किसी भी तरह के दिखावे और झूठ के सहारे लोगों को छलने की कोशिश न करें। याद रखें हिन्दुस्तान में ऊपर चढ़ने का ग्राफ जितना तेज है उससे कहीं तेज नीचे गिरने का ग्राफ है।

यकीनन, आम आदमी पार्टी दूसरे किसी दल की तुलना में एक ऐसा दल है जो तेजी से देश के पटल पर छाया है पर उसका कारण यह है कि लोगों ने इस दल में 'आम आदमी' को देखा न की 'पार्टी' को। इस जीत के बाद 'आप' से यह उम्मीद की जायेगी कि इस दल के कार्यकर्ता भी शिवसेना और बजरंगदल की तरह के न बन जाये। ये खुद बुद्धि-विवेक से काम करें..पर अपनी बुद्धिमत्ता के चक्कर में जनता को मूर्ख न समझे, क्योंकि जनता हमेशा चतुर होती है वो हमेशा सच्चाई को चुनती है भले वो सच्चाई उसे तात्कालिक ही  क्युं न नज़र आये और बाद में वो सच उसे धोखा ही क्युं न दे दे। लेकिन जनता की प्राथमिकता एक सच्चा देशवासी ही है जो वास्तविक अर्थों में जनसेवा करना चाहता हो। देश की गुलामी के दौर में यह जनता भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ थी, राष्ट्रीय आपातकाल के दौर में यह जनसंघ के साथ थी..पिछले वर्ष घोर भ्रष्टाचार और सुप्त शासन के खिलाफ इसने भाजपा को समर्थन दिया और अब दिल्ली में इसने 'आप' के सिर ताज पहनाया। लेकिन जब भी, जो भी दल अपने दायित्वों से हट स्वार्थी वृत्तियों का पोषक हुआ और पद-पैसा या प्रतिष्ठा को तवज्जों दी तो जनता ने खुद उससे सिंहासन खाली करने का शंखनाद किया।

यह जीत दायित्वों का अगाध बोझ देने वाली है..कर्तव्यों से विमुख हो निर्भार करने वाली नहीं। बहुमत के कारण अधिकार ज़रूर मिले हैं पर जनकल्याण के लिये। सत्ता आने पर ये न सोचे कि ताकत 'आप'के पास है लोकतंत्र में ताकत हमेशा 'तुम'के पास ही होती है..ये तुम या तू शब्द से संबोधित की जाने वाली उपेक्षित जनता ही है जो 'आप' का निर्माण करती है।