Wednesday, October 21, 2015

इक्कीसवी सदी में आये परिवर्तन का प्रतीक थे सेहवाग...

सचिन, सौरव, राहुल, लक्ष्मण के बाद अब आखिरकार वीरेन्द्र सेहवाग ने भी क्रिकेट को अलविदा कह दिया और इस तरह अब मुझे ये पूरी तरह स्वीकार कर लेना चाहिये कि मेरे जीवन का एक पड़ाव पूरी तरह से गुजर चुका है और मैं जीवन की मध्यावधि में प्रविष्ट होते हुए अब अधेड़ उम्र की ओर बढ़ने के लिये तैयार हूँ। जिस तरह से हम आजादी के बाद वाले भारत को तीन भागों में बांटते हैं- आपातकाल के पहले का दौर, आपातकाल के बाद से उदारवाद के पहले तक का दौर और तीसरा उदारवाद आने के बाद वाला दौर। कुछ उसी तरह भारतीय क्रिकेट खास तौर से वनडे क्रिकेट को भी तीन भागों में बांट सकते हैं- उन्नीस सौ पिचहत्तर से उन्नीस सौ नब्बे तक, उन्नीस सौ नब्बे से वर्ष दो हजार तक का दौर और दो हजार के बाद से अब तक का दौर। 

पहले टेस्ट क्रिकेट की प्रवृ्त्ति ही क्रिकेट पर हावी थी, बाद में वनडे क्रिकेट का सुरूर लोगों पे छाया और अब टी-20 का दौर है। वर्तमान को हम विगत तीनों दौर का सम्मिश्रण कह सकते हैं जहाँ तीनों प्रवृत्तियां कम या ज्यादा रूप से सामानांतर प्रवाहित हो रही हैं। इन तीनों दौर के तीन स्तंभ हम मान सकते हैं-सुनील गावस्कर, सचिन तेंदुलकर और तीसरे के वीरेन्द्र सेहवाग को। सेहवाग नवसंस्कृति या न्यू एज्ड जनरेशन के प्रतिनिधि थे जिनकी शैली वर्तमान के युवाओं की प्रवृत्ति को बताने वाली थी। जहां कम समय में बहुत कुछ पाने या तेजी से अपने लक्ष्य तक पहुंचने की बेतावी विद्यमान है। भले इस पीढ़ी को बड़े-बुजुर्गों द्वारा आलोचनात्मक दृष्टि से देखा जाये किंतु ये अपनी धुन में मस्त तेजी से सफलता के नये कीर्तिमान स्थापित करने मे यकीन करता है और बने बनाये हर रिवाज-रीति-नीति और दर्शन से परे ये स्वयं का अपना ही अलग दर्शन विकसित करता है और उसको ही सही साबित करना इसका अंतिम लक्ष्य है। सेहवाग भी कुछ ऐसे ही थे।

यहां पूर्व की तहर सब्र नहीं था और जब हम सेहवाग को बल्लेबाजी करते हुए देखते थे तो यह मानना मुश्किल लगता था कि कभी सुनील गावस्कर ने साठ ओवर तक क्रीज़ पर रहते हुए महज छत्तीस रन बनाये होंंगे। सेहवाग और सेहवाग के समानांतर ही विकसित कई अन्य खिलाड़ियों की शैली का ही नतीजा था टी-20। उन्नीस सौ पिचहत्तर में भले वनडे क्रिकेट शुरु हो गया था किंतु लंबे अरसे तक उस पर टेस्ट का ही साया नजर आता रहा। बाद में सचिन तेंदुलकर, सईद अनवर, सनत जयसूर्या जैसे खिलाड़ियों के चलते वनडे ने अपना रोमांच अख्तियार किया और छह या सात की रनगति से बनने वाले स्कोर को देख इस खेल पर बल्लेबाजों का वर्चस्व नजर आने लगा। कालांतर में आठ और दस का रनरेट भी बौना नजर आने लगा तथा पचास ओवर के खेल में चार सौ रनों के लक्ष्य को भी पार होते देखा। ये सेहवागीय प्रवृत्ति का ही असर था जिन्होंने टेस्ट क्रिकेट को भी वनडे और फिर टी-20 सरीका बना डाला।

मुझे आज भी अच्छे से याद है कि जिस आस्ट्रेलिया के भारत दौरे पर लक्ष्मण ने ऐतिहासिक 281 रनों की पारी खेली थी उसी दौरे की वनडे सीरिज के पहले मैच में सेहवाग ने 58 रन और तीन विकेट का ऑलराउंडर प्रदर्शन करते हुए टीम इंडिया को जीत दिलाई थी। इस प्रदर्शन के बाद सेहवाग वनडे टीम में अपनी जगह पक्की कर चुके थे बाद मे उसी वर्ष श्रीलंका में हुई एक त्रिकोणीय श्रंख्ला में सचिन के स्थान पर संयोग से सेहवाग को ओपनिंग करने का मौका मिला और इस सीरिज में 67 गेंदों पर उनके धुंआधार शतक ने टीम इंडिया को नया मास्टर ब्ल़ॉस्टर दे दिया। इस सीरिज के बाद टीम दक्षिण अफ्रीका दौरे पर गई जहाँ सेहवाग को टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण का अवसर मिला और उन्होंने यहां भी पहले टेस्ट में ही शतक बना टेस्ट टीम में भी अपनी दावेदारी मजबूत कर ली। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। बाद में एक अदद टेस्ट ओपनर के लिये तरस रही टीम इंडिया के लिये कप्तान गांगुली ने सेहवाग को बतौर सलामी बल्लेबाज उतार एक दाव खेला। उसके बाद की कहानी सबके सामने हैं। सेहवाग टीम इंडिया के कभी न भुलाये जा सकने वाले ओपनर बने। सेहवाग खेल रहे हों तो टेस्ट क्रिकेट भी अपने पूरे सबाव पर होता था। गावस्कर, अमरनाथ, तेंदुलकर, द्रविड़, लक्ष्मण जैसे महान् भारतीय टेस्ट बल्लेबाज जो नहीं कर पाये वो सेहवाग ने किया और दो बार तिहरे शतक के आंकड़े को पार किया। एक वनडे शैली के धाकड़ बल्लेबाज ने टेस्ट क्रिकेट में जो उपलब्धियां हासिल की उसने टेस्ट क्रिकेट की सारी परंपराओं को झुठला दिया और आज टेस्ट क्रिकेट में आये बदलाव में सेहवाग के योगदान को ही कम या ज्यादा रूप से मानना पड़ेगा।

सेहवाग टेस्ट में नंबर वन बनी टीम इंडिया के सदस्य रहे, 2003 की वर्ल्डकप उपविजेता, 2007 की टी-20 विजेता, 2011 की वनडे विश्वकप विजेता सहित सभी अहम् उपलब्धियों में सेहवाग टीम इंडिया के हिस्से थे और कई महत्वपूर्ण जीतों में टीम के सूत्रधार भी रहे। अपनी बल्लेबाजी से खेलप्रेमियों को अथाह खुशियां देने वाले सेहवाग के लिये न भूतो-न भविष्यति कहा जाये तो अतिश्योक्ति न होगी। बेशक उन जैसा धुंआधार कई खिलाड़ी खेलते हैं उनके रिकॉर्ड भी सेहवाग से बेहतर हो सकते हैं। लेकिन सेहवाग जैसा मस्तमौलापन, खिलंदड़ अंदाज वे कहाँ से लायेंगे। एक ऐसा खिलाड़ी जो भारतीय क्रिकेट में पहली बार तिहरा शतक मारने जा रहा है लेकिन फिर भी उसे इस ऐतिहासिक क्षण का हिस्सा बनने के लिये न सब्र करना गंवारा है और न ही किसी अतिरिक्त दबाव को अपने ऊपर हावी होने देना। उसे कीर्ति के शिखर पर विराजने के लिये सबसे आसान तरीका छक्का मारना ही नजर आता है और वो इस काम को बखूब अंजाम भी देता है। कोई माने या न माने किंतु ये बस सेहवाग के ही वश की बात थी।

कहते हैं मंजिल पे पहुंचकर तो सबको मजा आता है दम तो तब है जब सफर में भी मजा आये। सेहवाग उन लोगों में से थे जो सफर का भी बखूब लुत्फ़ उठाते थे..................

Sunday, September 6, 2015

मेरी प्रथम पच्चीसी : बारहवी किस्त

(पिछली किस्त पढ़ने के लिये क्लिक करें- पहली किस्त, दूसरी किस्त, तीसरी किस्त, चौथी किस्त, पांचवी किस्त, छठवी किस्त, सातवी किस्त, आठवी किस्त, नौवी किस्त, दसवी किस्त, ग्यारहवी किस्त)

(फिर एक लंबे विलंब के बाद पच्चीसी की कड़ियों को आगे बढ़ा रहा हू...जीवन के पहले पच्चीस बसंत की यह दास्तां शुरु किये दो वर्ष से ऊपर बीत गये। अब अट्ठाईसवे बसंद के गलियारे में प्रवेश कर चुका है लेकिन पच्चीसी की पूर्णता से अभी कोसों दूर हूँ। कोशिश रहेगी दास्तां जल्द समेटूं..और एक शुरु किये काम की जिम्मेदारी से जल्द निवृत्त हूँ।)


गतांक से आगे.....

मुसीबतें जब आती हैं तो भर-भरकर आती हैं। सीधी-सपाट ज़िंदगी में कई क्लाइमेक्स आके विचलित करने लगते हैं। हम किसी अज्ञात शक्ति से गुजारिश करते हैं, ऐ खुदा! बस भी करो..जिंदगी को बोरिंग बना दो। लगातार लगती ठोकरों के बाद जब सब कुछ सामान्य हो जाता है तब भी हम डरते रहते है और यही डर सताता रहता है कि पता नहीं ये खुशनुमा पल कब तक के हैं? अपने उस लघुतम एक्सीडेंट के ज़ख्म भरे भी नहीं थे कि एक और यातना मूंह बाये खड़ी थी। 2007 की नवंबर का अंतिम सप्ताह चल रहा था कि तभी पेट में किसी अनजान दर्द की तड़प उठ रही थी। लगा एसीडिटी टायप कुछ होगा और ऐसे ही किसी मर्ज की दवा-दारू करने में मशगूल था किंतु उन तमाम प्रयासों के बावजूद यातना तनिक भी कम नहीं हो रही थी..और जब दर्द अपनी सीमाएं लांघ चुका था तो अस्पताल जाना ही मुनासिब समझा।

घर से अस्पताल का रास्ता महज आधे घंटे का रहा होगा लेकिन एक-एक सेकंड की असहनीय पीड़ा जीना मुहाल कर रही थी। उस अस्पताल के मुख्यद्वार से पूर्व पड़ने वाले गतिअवरोधक पर जब गाड़ी ने स्पी़ड में जंप लिया तो यह वेदना मानो मौत का निमंत्रण थी। लगा मृत्यु पूर्व का अहसास ऐसा ही होता है...चेहरों के सामने अंधेरा पसर रहा था और मैं अपने पास खड़े पापा, भाई और अन्य परिजनों से गुहार लगा रहा था कि प्लीज इस बार बचा लो। तुच्छ सी प्रतीत होने वाली ज़िंदगी अमूल्य नजर आने लगती है। ज़िंदगी के सारे अच्छे और बुरे कर्म रेलगाड़ी की तरह सामने से गुजरने लगते हैं। सत्कार्यों को बारंबार दोहराने के और दुष्कृत्यों से तौबा करने के संकल्प हम झट से ले लेते हैं। इस वक्त पता चलता है कि दुनिया में टूटी और पीछे छूटी हर वस्तु को वैसा का वैसा पाया जा सकता है पर श्वांसों की डोर दोबारा मौका नहीं देती। ये महीन भी है और दुर्लभ भी। इस दर्दसंयुक्त चिंतनधारा के बीच सोनोग्राफी, सीटीस्केन जैसे टेस्ट भी जारी थे और पता लग गया था कि तन में पाया जाने वाला अपेंडेक्स नाम का अवशेषी अंग फट गया है। फटे अपेंडेक्स के जहर ने अंदरुनी मामला बिगा़ड़ रखा है इसलिये तुरंत ऑपरेशन की दरकार थी। चुंकि हॉस्पिटल में पहले से पहचान थी इसलिये बिना कागजी औपचारिकताओं के ऑपरेशन थियेटर में सीधे प्रविष्ट करा दिया। अगले कुछ घंटों में क्या हुआ पता नहीं।

तब लगा कि शरीर में विद्यमान एक अवशेषी अंग जब इतना कहर ढा सकता है तो अन्य जरुरी अंगों की विषम चाल क्या कर सकती है। कालांतर में यह राज भी खुले...किंतु हर समझ के लिये पीड़ा के सोपानों से गुजरना पड़ता है। सब कुछ समझ आना भी अच्छी बात नहीं..ज़िंदगी की कई तालीमों से हम अनजान ही बने रहे तो बेहतर है। बहरहाल जब होश आया तो पेट के उस हिस्से में दर्द तब भी विद्यमान था पर ये दर्द पहले की तरह अंदरुनी वजहों से नहीं बल्कि चीड़ा-फाड़ी के बाद उपजा ऑपरेशन का दर्द था। पहली मर्तबा इस तरह की सर्जरी के अनुभव से गुजरा था लिहाजा लगने लगा था कि अब सेकेंड हेंड पीस हो गया हूं पहले जैसी शक्तिसंपन्नत्ता अब न रहेगी।  पर तभी पता चला कि मेडिकल साइंस ने अब बहुत तरक्की कर ली है शल्य चिकित्सा इस क्षेत्र की बहुत आसान पद्धत्ति बन चुकी है और कुछ दिनों मे ही ज़िंदगी वापस पूर्ववत् मुख्यधारा में आ गई। तीन महीनों बाद ही मैंने युनिवर्सिटी में हुए एक क्रिकेट टूर्नामेंट में शिरकत कर अपना आत्मविश्वास वापस पाया। लेकिन तब सर्जरी के बाद अगले सात दिन उस हॉस्पिटल के आईसीयू का बैड नंबर नौ ही मेरा एकमात्र ठिकाना था। आहार-निहार सहित समस्त क्रियाएं बस यही तक सिमटी थी। विचारों की उधेड़बुन से तब बहुत कुछ सीखा। विराम का वक्त पहली बार विचार का वक्त बन रहा था।

खैर, दस दिन बाद हॉस्पिटल से घर आया। लगा कि बड़ी जंग जीत ली..सामने एमएससी के प्रथम सत्र की परीक्षा थी। बीते दस-पंद्रह दिन से जिंदगी से कट गया था इसलिये साथ वालों के साथ कदमताल मिलाने के लिये कुछ ज्यादा तेज दौड़ने की जरूरत थी और इसलिये अनजान प्रतिस्पर्धा के चलते बिना किसी को देखे पांच-सात दिन में ही बहुत कुछ पढ़ डाला। यह मेहनत कुछ ऐसी हुई जिसने दूसरों से कई कदम आगे निकाल दिया और पता चला कि जब प्रतिस्पर्धा करते हुए हम दूसरों को देखते हैं तो हम उस तेजी से नहीं बढ़ पाते जिस तेजी से हम सिर्फ खुद पे नजर रख किेये प्रयासों से बढ़ जाते हैं। आखिरकार एक्साम भी निपटे। और इस तरह तकलीफों के छुटमुट भंवर के बीच किसी तरह अपनी कश्ती को आगे बढ़ाया। 

कॉलेज के अगले सत्रों में कुंद पड़े जीवन को रफ्तार मिली। संकोच हवा हुआ, नये रिश्तों के द्वार खुले। ज़िंदगी में नये दोस्त आये जिन्होंने पुरानी यादों से छुटकारा दिलाया। मस्ती-मजाक और सेलीब्रेशन का दौर बढ़ गया। मैं भी इस नये जीवन में ढल गया और एक आम युवा की तरह उन्हीं अहसासों को जीने लगा जो इस उम्र का सच होते हैं। सतही संवेदना, जुनूनी सपने और अपरिपक्व ख़यालों के मिश्रण ने यादें तो बहुत दीं पर सीखने की संभावनाएं कम कर दीं। दोस्ती के उन्माद में चूर हो..बहुत कुछ पाया पर उससे कही ज्यादा बरबाद कर दिया। बेशक हम स्कूल-कॉलेज में उन्मादी जीवन बिता कई यादें संजो लेते हैं पर स्कूल-कॉलेज के असल मायनों से दूर चले जाते हैं। इस दौर से हमें यादें जरूर मिलती हैं पर उन यादों का कोई भविष्य नहीं होता। जीवन में संतुलन बहुत जरुरी है। उन्मादी जीवन से न ज्यादा निकटता हो और न ही दूरी। विद्यार्थी जीवन के हर रंग से हमारा वास्ता हो पर उन रंगों से इस वक्त की धवलता प्रभावित नहीं होना चाहिये।

जारी.................

Sunday, August 9, 2015

ये प्रेम है...प्रेम में बहुत बल है बबुआ!!!

नवाजुद्दीन सिद्दीकी अभिनीत और केतन मेहता निर्देशित 'माँझी-द माउंटेन मैन' रिलीज़ से पहले ही खासी चर्चा में है। दशरथ मांझी के जीवन पर बनी इस फिल्म के ट्रेलर को ही अब तक पैंतालीस लाख से ज्यादा यूट्यूब व्यु मिल चुके हैं। लिफाफे से ख़त का मजमूं मालूम होता है। नवाजुद्दीन सिद्दीकी की नायाब अदाकारी और कुशल निर्देशन को ट्रेलर से ही भांपा जा सकता है। संवादों से कथ्य की गहराई और कथा के परे दर्शन तक जाने के इशारों को भी समझा जा सकता है। बाइस साल का अथक परिश्रम या यूं कहें कि एक जीवन को ही निसार कर देना...एक ऐसे लक्ष्य के लिये जिसे जमाना महज बौराई बुद्धि से ज्यादा और कुछ नहीं मान सकता। गर इस बेसिर-पैर के से दिखने वाले लक्ष्य को चुनने की प्रेरणा का न पता हो तो यकीनन इसे पागलपन ही कहा जायेगा। लेकिन 'पहाड़ तोड़ने' की सदियों पुरानी और असंभव मानी जाने वाली कहावत को सच करने वाले दशरथ मांझी की इस कथा के पीछे भी वही मनोभाव है..जो कांटों पे चलने की, जमाने से लड़ने की, समंदर में जा डूबने की या शिखर फतह करने की प्रेरणा देता है।

प्रेम। प्रताड़ित होकर कई मर्तबा मुरझाया सा दिख सकता है...आवेश और दीवानगी का शिकार हो कई बार भटका सा भी दिख सकता है..या फिर तथाकथित उसूल और रीति-रिवाज़ों के नाम पे ठगा सा नजर आ सकता है। यकीनन ये बुद्धिमानी से कोसों दूर एक ऐसा भावानात्मक ज्वर है जो खुद के साथ-साथ कई दूसरों को भी जला देता है पर इन सब विषमताओं और कमियों के बावजूद ये पूरी मुस्तैदी से दुनिया में अपनी मौजूदगी दर्ज कराता रहा है, करा रहा है और कराता रहेगा। प्रेम की दीवानगी में ही इसकी खूबसूरती है। इससे उपजा पागलपन ही क्रांति को जन्म देता है और उस क्रांति की बयार में ही परिवर्तन की फसल लहलहाती है।

'मांझी' फिल्म के ट्रेलर में भी एक संवाद सुनने को मिल रहा है..जब पार्श्व से ये पूछती आवाज आती है कि ये पहाड़ तोड़ने की ताकत कहाँ से लाते हो..जिस पर दशरथ का किरदार निभा रहे नवाज़ का उत्तर होता है- 'ये प्रेम है...प्रेम में बहूत बल है बबुआ।' यकीन मानिये जिस रोज़ इस जहाँ से प्रेमानुभूतियां समाप्त हो जायेंगी बस ये जहाँ भी थम जायेगा। प्रेम के आसरे और आधार भले हर किसी के लिये जुदा-जुदा हों पर प्रेम का होना ज़रुरी है। आवश्यक नहीं कि ये किसी स्त्री के आधार से जन्मा पारंपरिक मोहपाश के माफिक ही हो..इसके केंद्र में कई दूसरी वजहें भी हो सकती हैं लेकिन इच्छाशक्ति, जीवटता और हौसले का संचार प्रेम से ही होता है। जो हमें पहाड़ तोड़ने, समंदर लांघने, हलाहल पीने या सितारे तोड़ने तक का साहस देता है। 

जगत में साहस का संचार भी प्रेम से ही मुमकिन है। क्रोध, व्यग्रता या रोष से बल प्रदर्शित नहीं होता, बल-वीर्य और साहस का वास भी प्रेम में ही है। प्रेम पर अड़ंगे लगाने के पीछे समाज की मंशा मनुष्य को कमजोर बनाये रखना है क्योंकि प्रेम चली आ रही प्रथाओं, रीति-रिवाज़ों और समाज की तथाकथित संस्कृति को आंख मूंद कर स्वीकार नहीं करता। प्रेम, प्रश्न करता है और उन सवालों से पोंगापंथी की तमाम इमारतें बिखर जाती हैं और तर्क के नींव पर विचारों का नवीन महल सृजित होता है।

'मांझी-द माउंटेन मैन' को देखना भी रोचक होगा क्योंकि इस साहस, धैर्य और सतत प्रयासों की बानगी पेश करने वाली असल कथा के पीछे भी प्रेम है। गोयाकि एक अति कोमल भाव, कठोर से कठोर और कठिन से कठिन काम को करा देने का माद्दा रखता है। ये महज एक संयोग है कि अपनी हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ''ये हौसला कैसे झुके'' में भी मैंने एक बिन्दु लिखा है 'प्रेम ही बनता है हौसले की वजह'। जीवन में बाधाओं को चीरकर छोटे या बड़े चाहे किसी भी लक्ष्य तक पहुंचे व्यक्ति को देखा जाये उसके पार्श्व में प्रेम ही प्रेरणा का कारण होता है। दशरथ मांझी की कथा प्रसिद्ध है इसलिये हम उन्हें जानते हैं...पर कई छोटी-बड़ी सैंकड़ों मिसाल पेश करने वाली सुप्त कथाएं भी प्रेम से ही पल्लवित और सुरभित होती आई हैं किंतु प्रेम से शून्य हृदय इस बात को नहीं समझ सकता।

Sunday, June 14, 2015

खूबसूरत बाग में सूखे पत्तों की अहमियत : हमारी अधूरी कहानी

आवारगी, बंजारगी, दीवानगी...ये वो लफ़्ज हैं जो कई मर्तबा समझदारी से ज्यादा मजा देते हैं। समझ हमेशा समझौतों के लिये उकसाती है और दिल हमेशा बने-बनाये नियमों के परे खुले गगन में उड़ने को प्रेरित करता है। दिल की इस स्वच्छंद चाल को बांधने के लिये हमने अनेक परंपराएं, रिवाज़, दायरे और सरहदें खड़ी की है और जीवन को किसी न किसी तरह गुलाम बनाये रखने के ही जतन किये हैं। धर्म, सभ्यता, संस्कार जैसे लफ़्जों से कई मर्तबा हम अपनी पोंगापंथी की ही पैरवी करते नज़र आते हैं और ये सब व्यक्ति को बेहतर बनाने के बजाय उसे दकियानूस ही बनाये रखते हैं हम पढ़-लिखकर भी मूर्ख बने रहते हैं। तथाकथित रीति-नीतियों के नाम पर जकड़े रहते हैं किन्हीं अमूर्त बंधनों में।

और फिर यकायक कौंधती है दिल में प्रेम की बिजली और टूट जाती हैं सरहदें..मिटने लगती हैं सारी परंपरायें..कांप उठती है सभ्यता...दी जाने लगती हैं दलीलें प्रेम का गला घोंटने, कभी समाजों की तो कभी रिवाजो की। प्रेम स्वाभाविक तौर पर आजादी का हिमायती है...स्त्री की आजादी प्रेम में ही छुपी है। प्रेम पर बंदिश लगाकर समाज ने आधी आबादी को दबाये रखने के ही जतन किये हैं। गर स्त्री प्रेम करने लगी तो वो आजाद हो जायेगी, बन जायेगी सशक्त और अपनी सहज शक्तिसंपन्नता से गिरा देगी पौरुष के तमाम रेतीले महल। तो अच्छा है रोक लिया जाये...चाहे जैसे भी उसे प्रेम करने से।

हमारी अधूरी कहानी। दीवानगी और आवारगी की ऐसी ही एक प्रेम कहानी है। जो हर कहानी की तरह अधूरी रहकर भी पूरी है। प्रेम का अधूरापन ही उसकी पूर्णता है। प्रेम, वही है जो मंजिल पर नहीं पहुंचा क्योंकि प्रेम का कोई गंतव्य होता ही नहीं है। मंजिल, ठहराव का नाम है और जहाँ ठहराव है वहां प्रेम दम तोड़ देता है। प्रेम की गति, निरंतर बना रहने वाला प्रवाह ही उसका जीवन है। इश्क़ रास्तों में ही बसर करता है जब भी वो कहीं पहुंच जाता है बस वहीं ये ख़त्म हो जाता है। संपूर्णता एक भ्रम है और इस भ्रम में ही प्रेम का जीवन। 

प्रेम की यही चिरंतन कमी इसकी  खूबसूरती है। ये खिले गुलाबों में नहीं मुरझाये पत्तों में बसता है लेकिन वहां बसकर भी ये उन पत्तों में महक बिखेर देता है। जब कोई प्रेम में होता है तो सब अच्छा लगता है। खुद को लुटाकर भी हम खुद को पा जाते हैं। प्रेम करने को जीवन की कमी समझा जाता है लेकिन इसी कमी से जीवन पूरा होता है। हाँ ये दर्द देता है, आंसू देता है पर आंसूओं और ग़म से ही जीवन बनता है। बड़ा बदनसीब है वो शख़्स जिसने कभी दर्द को महसूस नहीं कया और बड़ी सूखी हैं वो आंखें जो कभी आंसूओं से नम नहीं हुई।

लेकिन कमी भला किसे पसंद है और हम अपनी सारी बुद्धिमत्ता से एक ऐसा जीवन रचना चाहते हैं जिसमें सिर्फ समृद्धि हो, खुशी हो। हम ऐसा बाग चाहते हैं जहाँ हर तरफ बस खिले फूल हों कोई कांटे नहीं, कोई सूखा पत्ता नहीं। पर एक बाग तभी अपनी सहज प्रकृति के साथ जीवित रह सकता है जिसमें खिले फूलों के साथ राह में बिखरे सूखे पत्ते भी पड़े हों। कमियां, अधूरापन इनसे ही खूबसूरती बनती है बेदाग चीज़ कभी खूबसूरत नहीं होती। दरअसल, जीवन की सबसे बड़ी कमी ही ये है कि हम दुनिया में कोई ऐसी चीज़ तलाशते हैं जिसमें कोई कमी न हो।

मोहित सूरी की ये बेहतरीन फ़िल्म प्रेम की दबी पड़ी कई परतों को उधेड़ती है। कई अहसासों को टटोलती है और साथ ही सभ्य समाज से इस पर बंदिशें लगाने के विरोध में कई सवाल भी करती है। फ़िल्म का कथ्य यहाँ प्रकट करना मेरा उद्देश्य नहीं क्योंकि उसके लिये फ़िल्म को देखा जाये वो ही बेहतर है। यहाँ तो बस फ़िल्म को देख मेरे मन में उठे जज़्बातों को बयां करने की कोशिश की है। 

महेश भट्ट का संग पा मोहित अपनी इस कृति में प्रेम की गहराई को छूते हैं। महेश भट्ट और शगुफ्ता रफीक़ की कलम फ़िल्म की असल जान है और फ़िल्म के संवाद असल अभिनेता। जिन्हें निभाते हुए विद्या बालन और इमरान हाशमी भी अपने करियर का उत्कृष्ट अभिनय करते नजर आते हैं। मोहित की पिछली फ़िल्म आशिकी टू और एक विलेन की लिजलिजी और अतार्किक भावुकता से फिल्म बहुत दूर है। मोहित की बजाय महेश भट्ट का असर फिल्म पर साफ परिलक्षित होता है। संगीत, मोहित की बाकी फ़िल्मों की तरह उनकी प्रतिष्ठा के अनुरूप है। कई दृश्य लंबे और धीमे होने से उबाऊ लगते हैं पर यह कमियां फ़िल्म के कथ्य और उद्देश्य के आगे नजरअंदाज करने लायक है। 

बहरहाल, दिमाग से फ़िल्म देखने की जरुरत नहीं है और न ही प्रेम की देखी-पढ़ी-समझी-सुनी परिभाषाओं के अनुसार पूर्वागृही होते हुए ये फिल्म देखें। बस, महसूस किये उन अहसासों को समेट फिल्म देखिये जिनके साथ कभी आपने प्रेम किया हो या कर रहे हों। यकीन मानिये समझदारी और संपन्नत्ता से परे आप खुद को पागलपन और आवारगी के साथ ही खुशनसीब समझेंगे।

Tuesday, June 9, 2015

समाज के दो भिन्न ध्रुवों पर खड़ी नारियों का प्रतीक : तनुजा और कुसुम

'तनु वेड्स मनु रिटर्न्स' हिन्दी सिनेमा के बेहतरीन दस्तावेजों में शुमार हो रही है। फिल्म में बला की ताजगी है कि टीवी पे नजर आने वाली इसकी क्षणिकाएं बारंबार देखे जाने पर भी आपका मन मोह लेती हैं। कहना चाहिये कि ऐसी फ़िल्में बनाई नहीं जाती बल्कि बन जाती हैं। जिन्हें देखते समय जो आनंद हम महसूस करते हैं वो तो अपनी जगह है पर देखे जाने के लंबे समय बाद ये कुछ ज्यादा ही रस देती हैं। हरियाणवी कुसुम का किरदार सिनेमा के स्वर्णिम इतिहास में निश्चित ही जगह लेगा। गोयाकि किरदार ने कलाकार को गौढ़ कर दिया है और दत्तो के किरदार से तनुजा के पराजय वाले दृश्य को देख कंगना रानौत शायद खुद भूल जायेंगी कि इन दोनों भूमिकाओँ में वे स्वयं अभिनय कर रही हैं।


बहरहाल, हास्य और मनोरंजन के परे भी इस फ़िल्म में कई संगीन अर्थ है। जिनकी हर कोई अपने हिसाब से व्याख्या कर सकता है। फिलहाल यहाँ तनुजा और कुसुम के जरिये भारतीय समाज मेंं नारी दृष्टिकोण के दो भिन्न पक्षों पर मंथन करने को जी चाह रहा है।  तनुजा और कुसुम (दत्तो) महज दो महिलाएं ही नहीं बल्कि दो संस्कृतियां हैं। समाज के दो विरुद्ध ध्रुव हैं। दो अलग सोच हैं जिन पर समाज ने नारी के तमाम Do's & Don'ts तय कर रखे हैं।

तनुजा जहाँ उन तमाम नारियों की प्रतिनिधि है जो भले अपने अरमानों को पंख देती हैं लेकिन दृष्टिकोण के अभाव में जो रास्ता चुनती हैं वो नारीत्व की संजीदगी को उससे कोसों दूर कर देती है। वो आजादख़याल वाली होके भी जिस्म की नुमाइश ही करती नज़र आती है और गाहे-बगाहे खुद को एक वस्तु के तौर पर ही प्रस्तुत करती है। अपने बौद्धिक-भावनात्मक अस्तित्व के परे उसे अपने तन का ही गुरूर है, छद्म आधुनिकता के कलेवर में लिपटी वो मेकअप-ड्रेसिंग और बाहरी आडंबर को ही सब कुछ मान बैठी है और चर्म के मिथ्या उपासक  इस पितृसत्तात्मक समाज में वो अपने ज़िंदा माँस के लोथड़े से जिस्म के भूखे गीदड़ो को लुभाती है। इसके लिये कभी-कभी उसे प्रेम का लॉलीपॉप कुछ पुरुषों द्वारा पकड़ा दिया जाता है। ये वो महिला है जिसकी यूएसपी ब्वॉयफ्रेंड की संख्या से बढ़ती है और फ्लर्टिंग के मार्केट में कमर्शियल डिमांड में इजाफा होता है।

तनु समाज की उस सोच का भी प्रतीक है जो औरत के सेटलमेंट को शादी, हसबेंड, बच्चों तक सीमित मानती हैं। जहाँ उसके बदन को ही उसका वतन माना जाता है। जहाँ खूबसूरती सबसे बड़ा वरदान और समाज द्वारा निर्धारित बदसूरती के मापदण्ड सबसे बड़ा अभिशाप है। जिस समाज का उच्च शिक्षित वर्ग भी आईएएस, डॉक्टर, इंजीनियर या फिर कोई एनआरआई बनने की तमन्ना महज इसलिये पालता है कि इससे उसका विवाह किसी दैहिक सौंदर्य संयुक्त महिला से हो जायेगा और वर्ग-बिरादरी में उसकी मिथ्या प्रतिष्ठा में कुछ स्टार और चस्पा हो जायेंगे। इस सोच से पुरुष अपनी भौतिक उपलब्धियों से मनचाही महिला पाता रहेगा और किसी पद-पैसे-प्रतिष्ठा वाले पुरुष की प्राप्ति को ही महिला की उपलब्धि समझा जायेगा। जिस समाज में महिला का अपना कोई वजूद नहीं, वो पिता-पति और आखिर में पुत्र से ही अपना अस्तित्व गढ़ेगी, यही उसका सौभाग्य माना जायेगा और इसे ही उसके संस्कार कहकर महिमामंडित किया जायेगा।

दूसरी ओर एक देहाती कुसुम का किरदार है। अपने अरमानों को पंख यह भी देती है लेकिन इसकी कोशिश किसी के साये तले अपना वजूद तलाशने की नहीं, बल्कि खुद की पहचान स्थापित करने की है। ये प्रेम को इसलिये नकारती है कि उसकी इस आशिक़ी की नज़ीर कई दूसरी महिलाओं को खुले गगन में उड़ने से रोक सकती हैं और उसका प्रेम सैंकड़ो आजाद ख़याल महिलाओं के चरित्र पर लांछन लगा सकता है। ये वो महिला है जो प्रेम के लिये समाज की रुढ़िवादी सोच के सामने सीना ताने खड़ी हो जाती है और सांत्वना स्वरूप मिली लिजलिजी प्रेम की भावनाओं को ठुकरा भी देती है। फिल्म के आखिर में कुसुम का खुद को एथलेटिक्स बताते हुए कहना कि या तो उसे फर्स्ट आना पसंद है या हार जाना, पर खैरात में मिली सांत्वना की वो कतई आकांक्षी नहीं। यह सोच ही उसे शक्तिस्वरूपा बनाती है। ये वो लड़की है जो आंसू भी बहाती है और ज़रूरत पड़ने पर लोगों के कबूतर भी उड़ाती है। 

ये उस नारी का प्रतीक है जो तथाकथित मॉडर्न नहीं है पर इसे निभाना भी आता है और ज़रूरत पड़ने पर मिटाना भी। ये जोड़ना भी जानती है और तोड़ना भी। जो खुद को सहेज सकती है, बच्चे पाल सकती है और मौका आने पर घर भी चला सकती है। कुसुम छोटे शहरों और देश के गांवों में पल रही उन दबी आकांक्षाओं का प्रतीक है जिनका दहकता लावा रस्म ओ रिवाज़ की कालिख से ठंडा नहीं पड़ता। जिसके सपने छत पर सूख रहे उन कपड़ो की तरह नहीं है जो शाम होते-होते उतार लिये जाते हैं। शादी-बच्चे, घर-परिवार इसके हौसले को पस्त नहीं करते। ये भले एक तरफ पत्नी है, माँ है पर दूसरी तरफ कोई स्पोर्ट्स वूमन, डॉक्टर, साइंटिस्ट, इंडस्ट्रिलिस्ट, आईएएस, आईपीएस या किसी संस्था-संगठन की प्रधान भी है। इसकी निगाहों में दोहरा पैनापन है जो सिर्फ दिल ही नहीं चुरातीं बल्कि अब डराती भी हैं।

तनु वेड्स मनु, पीकू, क्वीन, मैरीकॉम, कहानी जैसी पिछले कुछ वर्षों में आई फ़िल्मों ने महिला के जिस बदले स्वरूप को मुखर किया है वो काबिलेतारीफ है। अब हमारे सिनेमा की नायिका पेड़ों के ईर्द-गिर्द आशिकी फरमाने या गुंडों के बीच असहाय घिरे होने पर नायक को अपनी मर्दानगी दिखाने का मौका देने के लिये ही नहीं है बल्कि अब इसने ब्युटी पार्लर के साथ-साथ जिम जाना भी शुरु कर दिया है। इसके पास जादूई क्लिप है जिससे ये बाल भी बांधती है और दूसरों के सिर भी खोलती है। क्लासरूम के अंदर, किताबों के बीच अब यह लव लेटर ही एक्सचेंज नहीं करती बल्कि उनके जरिये इसने नेवी, एयरफोर्स जैसे पुरुष वर्चस्व वाले क्षेत्रों में दस्तक दे दी है। हाँ कुछ पोंगापंथी, धर्मभीरुता, परंपरा और रुढ़िवाद के मेघ अब भी हैं जो इस प्रभातमा की आभा को खुलकर सामने नहीं आने दे रहे...पर क्षितिज के किसी कोने पर ये निरंतर रोशनी बिखेर रही है। आधी आबादी का सच यही है...वो नहीं, जिसे तुमने बंधनों में जकड़ रखा है।