Friday, November 18, 2011

प्यार का सुर और दर्द का राग : रॉकस्टार


जिन्दगी में कुछ बड़ा करना है तो दर्द पैदा करो..सर्वोत्तम कला या भीड़जुटाऊ सफलता त्रासद जिन्दगी से जन्म लेती है...लेकिन एक वक़्त आता है जब हमारे पास कला, शोहरत, सफलता, पैसा सब होता है पर ये सब जिस दर्द से हासिल हुआ है वही दर्द असहनीय बन जाता है। गोयाकि जनक और जन्य दोनों बर्दाश्त के बहार होते हैं...असंतोष जिन्दगी का सच होता है।

रणवीर कपूर अभिनीत और इम्तियाज़ अली द्वारा निर्देशित फिल्म 'रॉकस्टार' कुछ इसी कथ्य को लेकर आगे बढती है। नायक की हसरत होती है एक बड़ा सिंगिंग रॉकस्टार बनने की...और उसके पास अपनी इस हसरत को हासिल करने लायक प्रतिभा भी है लेकिन फिर भी तमाम सामाजिक, आर्थिक बंदिशें उसे अपने मुकाम पे नहीं पहुँचने दे रही। इसी वक़्त कोई उसे कहता है कि तू तब तक अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर सकता जब तक तुझमें एक जूनून न हो, तड़प न हो, दर्द न हो, टुटा हुआ दिल न हो...अपने लक्ष्य को हासिल करने की दीवानगी इस कदर नायक के दिल में हैं...कि वो बुद्धिपूर्वक उस दर्द को पाना चाहता है...जानबूझ के तड़पने के लिए उसमे बेकरारी है...पर दर्द हालत के थपेड़ों से सहसा मिलता है उसके लिए कोई पूर्वनियोजन नहीं होता।

लेकिन इसी कश्मकश में नायक ये समझ बैठता है कि वो जो चाह रहा है वो मिल पाना मुश्किल है...और इसी बीच वो अपनी सब हसरत भुलाकर दोस्त बन बैठता है एक लड़की हीर कौल का...इस दोस्ती की शुरुआत में उसे नहीं पता कि यही दोस्ती उसकी जिन्दगी के सबसे त्रासद लम्हों को जन्म देगी। वो तो बस अभी सिर्फ उन पलों में डूबा है जहाँ सिर्फ खुशियाँ है, मस्ती है, बेफिक्री है..उसे नहीं मालूम कि ये बेफिक्री ही आगे चलके उसकी जिन्दगी का दर्द बनेगी और यही उसे एक अनचाही शोहरत दिलाएगी, उसे रॉकस्टार बनाएगी। सच, आनंद जितना चरम पे पहुंचकर नीचे उतरता है वो उतना ही गहरा दर्द बन जाता है।

नायक और नायिका सिर्फ अपनी दोस्ती के मजे ले रहे हैं..और लिस्ट बना-बनाकर छोटी-छोटी हसरतें पूरी करने में खुशियाँ ढूंढ़ रहे हैं। कभी वे ब्लू फिल्म देखते हैं तो कभी देशी दारू पीते हैं..ये सब करते हुए भी वो बस दोस्त होते हैं...और नहीं जानते कि उनका ये साथ अब उनकी आदत बन चुका है, प्यार बन चुका है। जो उनके अलग-अलग हो जाने के बाद भी उन्हें तड़पाने वाला है।

हालात दोनों को अलग कर देते हैं..लेकिन अलग होके भी अब वो अलग नहीं रह गए हैं...यहाँ नायक अब जनार्दन से जोर्डन बन चूका है और नायिका एक गृहणी...दोनों उस जिन्दगी को जी रहे हैं जो वो चाहते थे लेकिन फिर भी दोनों के दिल में एक कसक है..सब कुछ मन का होके भी न जाने क्यूँ सब कुछ मन का नहीं है। जिंदगी कितनी अजीब होती है हम जो चाहते है उसे हासिल कर लेने के बाद भी यही लगता है कि कुछ कमी है...और बेचैनियाँ बराबर हमें तड़पाती रहती हैं। उस तड़प को, उस कसक को बयां कर पाना मुमकिन नहीं होता और जो हम बयां करते हैं वो हमारा असल अहसास नहीं होता...क्योंकि "जो भी मैं कहना चाहूं बरबाद करें अल्फाज़ मेरे"

नायक का सुर प्यार की गहराई से जन्मा है और उस सुर में मिली हुई दर्द की राग उसे और कशिश प्रदान कर रही है...प्यार करने को वो सड्डा हक कहता है..लेकिन उसे अपने उस हक को हासिल करने में तमाम तरह के सामाजिक बंधन परेशान करते हैं...उन बंधनों से वो खुद को कटता हुआ महसूस करता है...वो कहता भी है कि आखिर क्यूँ उसे 'रिवाजों से-समाजों से काटा जाता है, बांटा जाता है..क्यूँ उसे सच का पाठ पढाया जाता है और जब वो अपना सच बयां करता है तो नए-नए नियम, कानून बताये जाने लगते हैं।' इस सामाजिक ढांचें में सफलता पचा पाना भी आसन नहीं है...आप सफल तो हो जाते हैं पर आप एक इंसानी जज्बातों का उस ढंग से मजा नहीं ले पाते जो एक आम आदमी को नसीब होता है। खुद को अपनी जड़ों से दूर महसूस करने लगते है..अपना आशियाना छूटा नजर आता है और हम वापस अपने घर आना चाहते हैं...और इस दर्द में सुर निकलता है "क्यूँ देश-विदेश में घूमे, नादान परिंदे घर आजा"

नायक अपने गीत-संगीत से ही प्यार को महसूस करता है...और उसके दिल की गहराई से निकले यही गीत आवाम की पसंद बन जाते हैं...नायक गाता है कि 'जितना महसूस करूँ तुमको उतना मैं पा भी लूँ' अपने गीत के साथ वो अपनी प्रेमिका का आलिंगन कर रहा है। संवेदना के रस में डूबकर कला और भी निखर जाती है...और साथ ही वो जनप्रिय बन जाती है।

बहरहाल, एक बहुत ही सुन्दर सिनेमा का निर्माण इम्तियाज़ ने किया है...जो उनके कद को 'जब वी मेट' और 'लव आजकल' के स्तर का बनाये रखेगी। इरशाद कामिल के लिखे गीत और रहमान के संगीत की शानदार जुगलबंदी देखने को मिली है...और फिल्म का गीत-संगीत ही फिल्म की आत्मा है...नहीं तो कहीं-कहीं इम्तियाज़ अपनी पकड़ फिल्म पे से छोड़ते नज़र आते हैं पर फिल्म का संगीत उन्हें संभाल लेता है। रणवीर की अदाकारी कमाल की है सारी फिल्म का भार उन्ही के कन्धों पर है...उन्होंने अपने अभिनय से साबित किया कि उनमे भावी सुपरस्टार के लक्षण बखूबी विद्यमान हैं...एक बेचैन गायक की तड़प को बेहतरीन ढंग से प्रस्तुत किया है रणवीर ने। नर्गिस फाखरी खूबसूरत लगी है उनमे एक ताजगी महसूस होती है...हम उम्मीद कर सकते हैं कि कटरीना के बाद एक और विदेशी बाला अपना बालीवुड में सिक्का जमा सकती है।

खैर, जुनूनी मोहब्बत, मोहब्बत पे समाजी बंदिशें, सफलता की हकीकत से रूबरू होना चाहते हैं और सुन्दर गीत-संगीत और फ़िल्मी रोमांटिज्म पसंद करते हैं... तो 'रॉकस्टार' कुछ हद तक आपकी इसमें मदद कर सकती है...

Tuesday, November 8, 2011

समृद्ध इण्डिया की उत्सवधर्मिता और लाचार भारत की बदनसीबी


दीपावली के साथ भारत में उत्सवों का एक दौर हर साल विदा ले लेता है और दूसरा दौर ग्यारह दिन बाद ही दस्तक दे देता है...जी हाँ अवरुद्ध पड़े शादी व्याह की बहार आ जाती है। भारत वो देश है जिसकी रगों में उत्सव खून बनकर बहते हैं। देश की सामाजिक संरचना या कहें भारतीय फितरत ही ऐसी है कि उसे हर वक़्त झूमने के अवसर की तलाश होती है गोयाकि खुद के घर में शादी न हो तो दूसरे की बारात में ठुमकने से भी परहेज नहीं है। इस असल भारतीय स्वभाव ने ही हमारी संस्कृति को लचीला स्वरूप प्रदान किया है। यही कारण है कि ये संस्कृति जितने जोश-खरोश के साथ दीवाली, ईद और रक्षाबंधन मानती है उतने ही उत्साह से वेलेंटाइन डे, मदर्स-फादर्स डे जैसे पश्चिमी दिनों को मनाती है।

उत्सवप्रियता का ये स्वभाव इस कदर मानवीय है कि जन्म की खुशियाँ तो इसमें शुमार हैं ही वरन मौत की रसोई भी शामिल है। इस मानवीय पृकृति ने ही विलासिता, बाजारवाद और झूठी शान-शौकत की प्रवृत्ति में इजाफा किया है।

आज हम त्यौहारों-उत्सवों के रंग में खुद नहीं रंगते बल्कि इन उत्सवों को अपने रंग में रंग देते हैं। अपनी दूषित प्रकृति से उत्सवों को दूषित कर दिया जाता है। मैं उत्सवप्रियता या प्रसन्नचित्तता का विरोधी नहीं हूँ बल्कि ये कहना चाहता हूँ कि हमने उत्सवों में अपनी प्रसन्नता के मायने जो तय किये हैं वो ग़लत हैं। अपने उत्सव धर्म से जो हमने प्रक्रितिधर्म को ठेस पहुचाई है वो ग़लत है। अपने परिवेश को भूलकर जो उत्साह मनाया है वह ग़लत है।

बात जटिल लग रही होगी सरल करने का प्रयास करता हूँ। दरअसल अपने हिन्दुस्तानी परिवेश को गहनता से देखा जाये तो यह हमें कतई उस उत्सव धर्म में शरीक होने कि इज़ाज़त नहीं देता जो हम मना रहे हैं। बशर्त आप एक उत्सवधर्मी न होकर एक इन्सान के नाते बात पर गौर करने की कोशिश करें। जिस देश की सत्तर प्रतिशत आबादी दो वक़्त का पेट भर खाना नहीं खा पा रही उस देश में कैसे आप ख़ुशी के जाम छलका सकते हैं, लाखों-करोड़ो रुपये महज़ पटाखों पर खर्चे जा सकते हैं। जिस देश में लाखों-करोड़ो बच्चे कुपोषण, भुखमरी का शिकार है या जिनके सर माँ-बाप का साया नहीं हैं वहां कैसे लोगों के गले के नीचे महँगी मिठाइयाँ उतर सकती हैं। जहाँ किसान आत्महत्या कर रहा है उसके पास क़र्ज़ चुकाने का चंद पैसा नहीं है जहाँ महंगाई के बोझ तले इन्सान अपने बच्चों को रोटी नहीं खिला पा रहा वहां कैसे धनतेरस जैसे अवसरों पर सोने-चाँदी कि दीनारें महज शगुन के तौर पर खरीदी जा सकती हैं।

हालात, उत्सवों पर वास्तव में बहुत थोड़े ही बदलते हैं कि आम दिनों में समृद्ध इण्डिया एक पैग पीता है और उत्सवों में दो,तीन या चार जबकि लाचार भारत आम दिनों में बस रोता है तो उत्सवों में उसका चेहरा हल्की मुस्कराहट लिए आंसू बहता है। आंसू इस लाचार भारत का यथार्थ है और मुस्कान आदर्श।

वैज्ञानिक विकास और तकनीकी दक्षता ने भी खुशहाली सिर्फ उस समृद्ध इण्डिया के हिस्से में दी है...फेसबुकिया सेलिब्रेशन उसे ही नसीब है वही इन सोशल नेट्वर्किंग साइट्स पे वधाईयां लाइक और शेयर कर रहा है। लाचार भारत उस दिन भी रिक्शा चला रहा है, इमारतें बना रहा है, गड्ढे खोद रहा है या समृद्ध इण्डिया के घरों,कालोनियों,सड़कों की सफाई में सलंग्न है। हाँ ये बात है कि किसी तरह उसे इस समृद्ध इण्डिया के उत्सवों का शोर ये बता देता है कि आज कुछ खास दिन है और इस खास दिन का पता लगने पर वो चेहरे पे मुस्कान लाकर फिर काम में लग जाता है।

वैज्ञानिक विकास इस लाचार भारत के विनाश का गड्ढा खोद रहा है उत्सवधर्मिता इसकी लाचारी को और बढ़ा रही है। प्रकृति और संसाधनों को जितनी हानि ये समृद्ध इण्डिया पहुंचा रहा है..उतना लाचार भारत नहीं। उल्टा वह तो उस हानि से त्रस्त ही हो रहा है। समृद्ध इण्डिया की जरुरत दो की है तो वह दो सौ का उपभोग कर रहा है और लाचार भारत की जरुरत एक की है तो वो उस एक को पाने के लिए ही संघर्षरत है। एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व के एक तिहाई संसाधनों पे विश्व जनसंख्या का सिर्फ छटवा हिस्सा उपभोग कर रहा है तो सोचिये एक बड़े जनसमूह के पास कितने संसाधन हैं? महंगाई, ग्लोबल वार्मिंग, बेरोजगारी, अशिक्षा, गरीबी जैसी सारी समस्याओं ने इस लाचार भारत के घर की ओर रुख कर लिया है।

अखवारों में आने वाले विकास के आंकड़े एकतरफा हैं और विनाश के आंकड़े भी एकतरफा है। समृद्ध इण्डिया और लाचार भारत के बीच बस आर्थिक असंतुलन नहीं, उत्सव असंतुलन भी है। समृद्ध इण्डिया संयम और मर्यादा में उपभोग की नीति विसरा चूका है। उसकी उत्सवधर्मिता अब विलासिता बन चुकी है या कहें उसने खुश होने के जो मानक बनाये हैं वह उसके व्यसन बन चुके हैं। उसका उत्सवप्रियता पे खर्च बढ़ता जा रहा है और अय्याशियाँ ख़ुशी का रूप लेती जा रही हैं। उत्सवी खुशियाँ सिर्फ कालीन के ऊपर हैं कालीन के नीचे लाचार भारत की तड़प देखने की ज़हमत कोई नहीं कर रहा है।

आश्चर्य होता है एक सिर्फ इसलिए परेशान है कि उसे होटल में पिज्जा टाइम पे नहीं मिला या उसकी ब्रांडेड ज्वेलरी का आर्डर डिलीवर होने में देरी हो गयी..तो दूसरा भूखा रहकर भी अपनी कसक जाहिर नहीं कर पा रहा। एक इसलिए परेशान है कि उसके बच्चे को मन के इंग्लिश मीडियम स्कूल में एडमिशन नहीं मिला..तो दूसरा अपनी आँखों के सामने भूख से मरते बच्चे को देखकर भी आंसू नहीं बहा पा रहा। एक इसलिए गुस्सा है है कि उसकी बेटी की शादी के लिए मनपसंद मैरिज गार्डन नहीं मिला..तो दूसरा कदम-कदम पे दुत्कारे जाने के बाद भी अपना गुस्सा नहीं दिखा पा रहा। गोयाकि आंसू बहाने, गुस्सा दिखाने, दर्द में कराहने के लिए भी स्टेटस का होना जरुरी है।

बहरहाल, किसे पड़ी है दुनिया-ज़माने के सोचने की..अपनी उत्सवी फुलझड़ियाँ जलते रहना चाहिए, अपनी गिलास में जाम भरा होना चाहिए....हम तो लाचार भारत पे यह कहके पल्ला झाड़ सकते हैं कि ये उनके अपने कर्मों का फल है..हम अपने उत्सवों या कहें अय्याशियों को क्यों फीका करें। करवाचौथ और नवदुर्गा पे हम व्रत रखके उत्सव मनाते हैं..लाचार भारत भूखा रहकर हर दिन बेउत्सव व्रत करता है।

खैर, अपनी अय्याशियों की लगाम हमें टाईट करने की जरुरत नहीं है और वैसे भी हमें हमारे उत्सवी पटाखों के शोर में लाचारियों की चीखें सुनाई कहाँ देती हैं............................

Tuesday, October 18, 2011

'बोल' के लव आजाद है तेरे.....



पाकिस्तानी फिल्म 'बोल' देखने का अवसर मिला। हिन्दुस्तानी सिनेमा के इतर एक बेहद उम्दा और अर्थपूर्ण फिल्म जो व्यवस्था, रूढ़ीवाद एवं समाज की विसंगतियों के विरुद्ध एक उन्माद पैदा करती है। छद्म- धार्मिकता और पाखंड की तस्वीर दिखाती है।

निर्देशक शोएव मंसूर की एक और सार्थक फिल्म जो इंसानी हैवानियत और उसके असल रूप को बेनकाब करती है। परिवार नियोजन, महिला-सशक्तिकरण, धार्मिक अंधविश्वास, छद्मपुरुष मानसिकता, रूढ़िवादिता जैसे मुद्दों के खिलाफ जिस संजीदगी से स्वर मुखरित किया है वो सोचने पर विवश करती है। लगता है कैसे ये फिल्म पाकिस्तानी सेंसर बोर्ड से बचकर हम सब तक पहुच गई।

'बोल' ह़र उस औरत का स्वर हैं जो खुले आकाश में उड़ना चाहती है, जो पाक पवन में साँस लेना चाहती है या कहे जो असल में जीना चाहती है। जिसकी दुनिया चौके की चारदिवारी तक सीमित नहीं, या जिसका जिस्म बिस्तरों पे ही बयां नहीं होता वो इन सबसे परे अपनी एक अलग शक्सियत भी रखती है। उसके जज्बात-तमन्नायें कुछ और भी चाहते हैं। लेकिन पुरुष उन जज्बातों को नहीं सिर्फ जिस्म को देखते हैं। फिल्म में एक दृश्य है जब हकीम साहब अपनी बेगम से कहते हैं "खुदा ने आपको दो ही तो हुनर बख्शे हैं एक स्वादिष्ट खाना पकाना और खुबसूरत औलादें पैदा करना " औरत को देखने का प्राय: यही नजरिया समाज में हैं यही कारण है कि आज तक बड़े से बड़े चित्रकार औरत को जिस्म से परे नहीं देख पाए।

ये फिल्म पाकिस्तानी या मुस्लिम समाज की ही कहानी बयां नहीं करती बल्कि हर उस समाज, हर इन्सान, हर वर्ग को आइना दिखाती है जहाँ सारे कायदे, सारे कानून, रस्मों-रिवाज़, मर्यादाएं सिर्फ और सिर्फ महिलाओं पर ही लामबंद कर दिए जाते हैं। जहाँ पुरुष हर तरह से अपने चरित्र की धज्जियाँ उड़ाते हुए भी शरीफ बना रहता है। जहाँ बड़े-बड़े पढ़े-लिखे लोग रुढियों के गुलाम होते हैं भले ही वह दूसरों को कितने भी आधुनिक ख़यालात धारण करने के उपदेश दें। लेकिन जब बात खुद पर आती है तो परम्पराओं की आड़ में रुढियों को पनाह दी जाती है। ये देख लगता है साक्षरता सिर्फ कागजों पर बढ़ी है विचारों में नहीं।

लेकिन इन्सान भूल जाता है की औरत जब तक खामोश है तब तक ही पुरुष वर्चस्व कायम है यदि वो 'बोल' उठे तो जमीन कांप उठती हैं और आसमान झुक जाता है। मर्द की जुवान बंद हो जाती है और बाजुओं की जोर-आज़माइश शुरू। एक दृश्य में बेटी अपने रुढ़िवादी पिता से कहती है "अब्बा! आप मर्द हैं ना जहाँ वेजुवां हुए वहां हाथ चलाने लगे।" पुरुष की दरिंदगी और बेरहमी को हर फ्रेम में बखूबी दर्शाया है शोएब मंसूर ने।

यूँ तो इन्सान की निगाहें और हवस हर तरफ महिला को तलाशती है पर यदि औलाद की बात हो तो बेटा ही चाहिए, बेटी को कलंक समझा जाता है। बेटे की चाह में औलादों की कतार लगा दी जाती है और यदि बेटा न हो तो इसका दोष भी औरत के सिर मढ़ा जाता है। सदियों से धार्मिक मान्यताओं का सहारा लेकर या औलाद को खुदा का करम जानकर इसी तरह बच्चों की संख्या बढ़ाई जा रही है फिर भले उनकी परवरिश में बेरुखी बरती जाये। फिल्म अपने अंत में यही प्रश्न छोडती है कि "क्या मारना ही गुनाह है पैदा करना नहीं"। क्या पहले से ही इस धरती पे भूखे बेवश लोग कम थे जो और लोगों को तड़पने के लिए धरती पे लाया जाये। जब ढंग से पाल नहीं सकते तो पैदा करने का हक किसने दिया।

फिल्म न जाने कितने ऐसे संगीन मुद्दों को उठाती है जो समाज की नस-नस में बसकर उसे बीमार बना रहे हैं। चाहे किन्नरों को देखने का नजरिया हो, चाहे महिलाओं कि शिक्षा, जातिवादी-सम्प्रदायवादी मानसिकता हो, या ईश्वरकर्तृत्व की घोर अतार्किक सोच हो हर तरफ ध्यान खींचने की कोशिश की गयी है। जहाँ भारत-पाकिस्तान के मैच में जीत-हार के लिए खुदा या भगवान को जिम्मेदार माना जाता हो, जहाँ संकीर्ण मानसिकता दो जातियों की बात तो दूर एक कुरान को मानने वाले सिया-सुन्नियों में भेद करती हो, जहाँ अपनी ही औलाद का लोकलाज वश क़त्ल किये जाने जैसा बेरहम कदम उठाया जाता हो वहां कैसे आधुनिक विचार और सुसंगतियों का प्रसार हो सकता है।

बहरहाल, एक कमाल का सिनेमा है 'बोल'। जो न सिर्फ कथा के स्तर पर बल्कि तकनीकी स्तर पर भी अद्भुत है। ख़ूबसूरत छायांकन, हृदयस्पर्शी संवाद, सुन्दर संगीत व कमाल की अदाकारी इसे एक गुणवत्तापरक सिनेमा बनाती है... और इन सबमे सबसे बड़ा कमाल किया निर्देशक शोएब मंसूर ने जिन्होंने 'खुदा के लिए' के बाद एक बार फिर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया और सिद्ध किया कि उद्देश्य महान हों तो सीमित संसाधनों में भी महान फिल्म बनायीं जा सकती है।

यदि स्वच्छ कालीन के नीचे जमी समाज की गंदगी को, शिक्षित-सभ्य लोगों की बेहयाई को, धार्मिक विश्वासों के पीछे छुपे पाखंड-अंधविश्वासों को देखना है तो 'बोल' देखिये....शायद ये आपको अपनी गिरेबान में झाँकने का माध्यम भी साबित हो।

Wednesday, August 31, 2011

सलमान खान: सीमित प्रतिभा और अपार लोकप्रियता का रसायन


ईद के अवसर पर विगत २ वर्षों की तरह एक बार फिर सलमान अपनी नयी सौगात "बॉडीगार्ड" के साथ हाजिर है...लेकिन मै पहले ये बता दूँ कि मेरा ये लेख इस फिल्म की समीक्षा करने के लिए नहीं है क्योंकि अब तक मैंने ये फिल्म नहीं देखी है...यहाँ बात दूसरी करना है।

बालीवुड के सबसे बड़े सुपर सितारे बनते जा रहे सलमान का नाम ही किसी फिल्म का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन बढ़ाने के लिए काफी है.."बॉडीगार्ड" की सफलता के साथ वह पहले ऐसे सितारे बन जायेंगे जिनकी लगातार ४ फिल्मों का व्यावसायिक आंकड़ा १०० करोड़ के पार होगा। क्या कारण है कि एक सीमित प्रतिभा के कलाकार की फ़िल्में जो घोर अतार्किक होती है फिर भी दर्शक उन पर दीवानों कि तरह उमड़ पड़ता है...और उनकी इस अतार्किक विडंबनाओं को पूरे चाव से यथार्थ की भांति अनुभव कर देखता है।

एक साथ पचासों गुंडों के बीच बड़े ही अविश्वसनीय ढंग से लड़ता हुआ एक मसल्समेन दर्शकों में एक अजब उन्माद जगा जाता है...और उस उन्माद को जगाने के लिए उसे 'कृष' के हृतिक या 'रा-१' के शाहरुख़ की तरह किन्हीं दैवीय शक्तियों को पाने की जरुरत नहीं है। वह बिना किसी कलेवर के होते हुए भी सुपरहीरो है..लेकिन प्रतिनिधित्व आम आदमी का करता है। उन बेढंगे दृश्यों को देखते हुए शरीर में एक झुनझुनी दर्शक महसूस करता है और सहस रोंगटे खड़े हो जाते है।

कितनी अजीब बात है कि एक सीमित प्रतिभा का इन्सान इस कदर लोकप्रियता हासिल कर जाता है कि मिस्टर परफेक्शनिस्ट आमिर खान को कहना पड़ता है कि उन्हें सलमान की लोकप्रियता से जलन होती है। दरअसल लोकप्रियता का गणित भी बड़ा अजीब है जिसे समझ पाना बड़ा दुर्लभ है..और इस लोकप्रियता को हासिल करने के लिए कई बार प्रतिभा और कर्म बहुत बौने साबित हो जाते है..और कोई किस्मत का धनी बैठे-ठाले ही फेमस हो जाता है। योगगुरु बाबा रामदेव का भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन फ्लॉप हो जाता है तो एक छोटे से गाँव के आम आदमी अन्ना हजारे विशाल जनक्रांति ला देते हैं। कई प्रतिभाशाली कत्थक और भरतनाट्यम की नृत्यांग्नाएं गुमशुदा रहती है..और राखी सावंत जैसी दो कौड़ी की आइटम डांसर बड़ा नाम पा जाती है। 'बिग बॉस' के घर की सबसे बड़ी तमाशबीन डॉली बिंद्रा की TRP सबसे ज्यादा बढ़ जाती है। तकनीकी कौशल से लबरेज टेस्ट मेच क्रिकेट हाशिये पर फेंक दिया जाता है और २०-२० क्रिकेट की बहार आ जाती है। दरअसल इस देश में लोक को समझना ही टेड़ा काम है तो उसकी लोकप्रियता को कैसे समझा जा सकता है। लोकप्रियता बुद्धिजीवियों की पसंद से ज्यादा अघोरियों की पसंदगी पे निर्भर करती है...और अघोरियों के भी मूड़ होते हैं कभी कुढा-कचरा खाने वाले ये अघोरी उसी कचरे को इसलिए नकार देते हैं क्योंकि उसपे मक्खी बैठी थी।

सलमान खान की लोकप्रियता वेवजह हो या वे इसके लायक नहीं हैं ऐसा मैं नहीं कह रहा..मैं बस ये बताना चाहता हूँ कि बस लोकप्रियता को महानता का पैमाना नहीं बनाया जा सकता...लेकिन आज सर्वत्र आलम ये है कि लोग महानता के पीछे नहीं लोकप्रियता के पीछे ही भागना पसंद करते है..हिंदी फिल्म सिनेमा में सलमान इकलौते ऐसे सितारे नहीं रहे जो सीमित प्रतिभा के बाद इतने लम्बे समय तक इस इंडस्ट्री में मुस्तैदी से जमे रहे इससे पहले भी जुबली कुमार के नाम से मशहूर राजेंद्र कुमार और जीतेन्द्र ने लम्बी परियां खेली है। जो तत्कालीन प्रतिभाशाली कलाकार संजीव कुमार और अमोल पालेकर जैसे सितारों से ज्यादा लोकप्रिय रहे है।

सलमान की पैंठ उन दर्शक वर्ग तक है जहाँ शाहरुख़, आमिर और अक्षय पहुँचने के लिए तरसते हैं...इसका और विशदता से ज़िक्र मैंने अपने इसी ब्लॉग पर प्रकाशित लेख "सितारा सिंहासन और दबंग सलमान" में किया है। खैर यदि आपको असल सलमानी प्रभाव देखना है तो मल्टीप्लेक्स की बजाय एकलठाठिया सिनेमाघर में जाकर "बॉडीगार्ड" मजा लीजिये...जहाँ सलमान के एक-एक संवाद और एक्शन दृश्यों पर बजने वाली सीटियाँ और भान्त-भान्त के कमेंट्स आपको फिल्म से ज्यादा मनोरंजन प्रदान करेंगे।

फ़िलहाल अपनी बात समाप्त करता हूँ और सलमान के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूँ क्योंकि इन दिनों ये बॉडी-बिल्डर सुपर सितारा अपनी एक छोटी सी गले की नस के दर्द से परेशान है..और उसकी सर्जरी कराने अमेरिका गया हुआ है। यहाँ ये बात भी समझ आती है कि अपार लोकप्रियता और पहलवानी वदन होने के वावजूद इन्सान कितना लाचार है..फिर आखिर घमंड किसका करें। छलावे से भरे संसार में सबसे ज्यादा छल..हमारे साथ हमारा अपना शरीर और लोकप्रियता ही करती है।

Saturday, August 20, 2011

सिंहासन खाली करो कि..जनता आती है....


अन्ना की आंधी से सारा देश इस समय प्रभावित है..और सरकार अपने कदम टिकाये रखने के लिए जद्दोज़हद कर रही है। आलम ये है कि अन्ना की इस क्रांति ने सारे देश का माहौल इस समय अन्नामय कर दिया है..अभी की सबसे बड़ी खबर और सबसे बड़ा काम बस अन्ना का अनशन और जन-लोकपाल की बहाली बन चुका है। इसे आजादी की दूसरी लडाई का नाम दिया जा रहा है..जो किसी भी मायने में पहली लडाई से कमतर नहीं है। पहली लड़ाई हमने विदेशी लुटेरों के खिलाफ लड़ी थी..अब ये लड़ाई घर के अन्दर बैठे ठगों से है..और कहते हैं चोरों से ज्यादा सावधान ठगों से रहना चाहिए क्योंकि ठग अपना बना के लूटते हैं।

देश की जनता ने दिखा दिया कि वो बस भारतीय टीम के विश्व कप जीतने पे ही सड़कों पे नहीं आती..उसे खुद का हक मांगने के लिए भी सड़कों पे उतरना आता है...ये भीड़ अब महज भीड़ नहीं रह गयी है ये तो वो सैलाब है जो सरकार ढहाने को तैयार है। सरकार को ये अंदाजा भी न होगा कि एक ७५ साल का बुढा ऐसा कहर ढा सकता है...और कहीं न कहीं सरकार ने ही अन्ना को अपने गले की फांस बना लिया, अनशन रोकने और क्रांति को सीमित करने का हर प्रयास उल्टा साबित हुआ। बाबा रामदेव की तरह अन्ना को भी गिरफ्तार करके सरकार ने सोचा कि इस आन्दोलन को भी उसी तरह दबा देंगे जैसा रामदेव के साथ किया था। लेकिन उनका फैसला आग को हवा देने वाला साबित हुआ...और अब ये आन्दोलन दिल्ली की चार दिवारी से निकलकर सारे राष्ट्र का अहम् मुद्दा बन गया।

इससे कांग्रेस सरकार की राष्ट्रीय शाख न सिर्फ आम जनता की नजरों में धूमिल हुई बल्कि उसके अपने पक्के समर्थक भी उससे रूठ चुके हैं। तो दूसरी ओर विश्वपटल पे भी वो उसकी प्रतिष्ठा में गिरावट आई है। पी.चिदम्बरम, कपिल सिब्बल और अम्बिका सोनी जैसे राजनीतिक धुरंधरों की बयानबाजी ने जनसैलाब को और भड़का दिया..जन मानस को पढने में ये धुरंधर चूक कर गये। सरकार समझ रही है ये जनसैलाब अन्ना के कारण क्रांति पे उतरा है पर ऐसा नहीं है इसका कारण तो भ्रष्टाचार की हदें पार हो जाना है..महंगाई का आसमान पे जाना है, लोगों का जीना दूभर हो जाना है। अन्ना तो बस इस क्रांति के अग्रदूत हैं।

इतिहास से सबक न लेना भी सरकार की एक बड़ी भूल है...ऐसे ही जनसैलाब ने १९७५ में इन्द्रा सरकार को उखाड़ फेंका था और उस आन्दोलन की परिणति आपातकाल के रूप में सामने आई थी। अब एक बार फिर कोई बड़ा परिवर्तन इंतजार कर रहा है। अन्ना का ये आन्दोलन महज उतावलापन नहीं है..ये बहुत व्यवस्थित और दूरदर्शिता के साथ नियोजित आन्दोलन है...जिसमे अन्ना के प्रमुख हथियार किरण बेदी, केजरीवाल और भूषण जैसे दिग्गज है जिनका कुशल प्रवंधन इस आन्दोलन की लौ को बुझने की बात तो दूर, कम तक नहीं होने दे रहा।

इस आन्दोलन का समर्थन कर रही जनता को एक बात और ध्यान रखना भी जरुरी है कि वो महज सरकार पर नारेबाजी करके उसे ही बदलने का प्रयास न करें..स्वयं में भी बदलाव लाये। सरकार के खिलाफ आन्दोलन से ज्यादा जरुरी स्वयं के लिए भी एक आन्दोलन का होना है। सरकार को सदाचार की नसीहत देने से ज्यादा आवश्यकता खुद को भी सदाचारी बनाने की है। हम खुद अपने अन्दर से पहले भ्रष्टाचार का सफाया करें फिर सरकार से इसे दूर करने की मांग करे। हम खुद पहले अपनी जिम्मेदारियों को समझे फिर सरकार से जिम्मेदार होने की अपील करे। अन्यथा ये आन्दोलन भी महज एक छलावा बन के रह जायेगा। अपनी जरूरतों को सीमित कर एक न्यायोचित जीवन ही हमारी महत्वाकांक्षाओं का अहम् हिस्सा हो। तभी वैसा राष्ट्र निर्मित हो सकता है जिसके हम सपने संजो रहे है। देश सरकार के बदलाव से ज्यादा नागरिकों के योग्य बदलाव की दरकार कर रहा है।

अंत में दिनकर की कविता जो उन्होंने जे.पी.आन्दोलन के दरमियाँ पढ़ी थी, से अपनी बात समाप्त करूँगा-
सब से विराट जनतंत्र जगत का आ पहुंचा,
तैंतीस कोटि-हित सिंहासन तय करो
अभिषेक आज राजा का नहीं,प्रजा का है,
तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो।
आरती लिये तू किसे ढूंढता है मूरख,
मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में?
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे,
देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में।
फावड़े और हल राजदण्ड बनने को हैं,
धूसरता सोने से श्रृंगार सजाती है;
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।।