Tuesday, December 1, 2015

ज़िंदगी के रंगमंच पे भरमाये जज़्बातों का 'तमाशा'

दिल ये संभल जाये, हर ग़म फिसल जाये और पलकें झपकते ही दिन ये निकल जाये...शायद यही और इतनी सी ही तो है जिंदगी की जद्दोज़हद। बेवश, लाचार और संघर्ष से लबरेज जिंदगी में चंद सुकूं के पल पाना और उन पलों की निरंतरता को बनाये रखना। क्यूं उड़े कोई पंछी गगन में गर उसे सब कुछ मिले अपने बनाये घरोंदे में...क्यूं दौड़े मरुस्थल में हिरण, गर मिल बैठे उसे अपनी ही जगह पे बेइंतहा नीर...आखिर क्यूं दौड़ाये कोई अपने कदम डगर-डगर, गर चैन मिल जाये उसे अपने ही आशियां में। आखिर कहां, किस डगर और किस नगर में मिलेगा हमारा अपना चैन। क्या बदलें, कहाँ ठहरें, किसे छोड़े और किसे अपनाये जिससे मिले हमारा-अपना चैन। इस अंधी खोज से ही पैदा हुए हैं सभी धर्म-दर्शन, काबा-काशी, बुद्ध-वीर, शिव-जीसस और खुदा। एक उधेड़बुन मिटाने के लिये हमने ये सब बनाये थे पर इनके कारण मेरी-तेरी-हमारी एक और उधेड़बुन शुरु हो गई...और इस तरह खोज में खोजने वाला ही खो गया। तमाशे के किरदार, तमाशा निभाते-निभाते अपना असल परिचय ही भूल गये।

इम्तियाज अली निर्देशित, रणबीर-दीपिका अभिनीत 'तमाशा' कुछ ऐसी ही दार्शनिक उधेड़बुन के पटल पर, भरमाये जज़्बातों वाले उलझे रिश्तों को सुलझाने की एक कहानी है। मसलन जो दिख रहा है वो नहीं है। इस सभ्यता और तथाकथित शिष्टाचार के मिलावटी-झूठे रंगों ने व्यक्ति के असल रंग को ही दबा दिया है। दिल में अधाह व्यग्रता और बेवशी की आग होने के बावजूद इंसां मुस्कुरा रहा है। जैसा ये मानव वाकई में चाहता है वैसा कोई नहीं जी रहा है बल्कि सबने अपना जीवन उस अनुरूप गढ़ लिया है जैसा ये जमाना चाहता है। समझौता, हर तरफ सिर्फ समझौता...अपने अहसासों में, रिश्तों में, करियर में, जीवन के हर कदम पे। इंसान का ये समझौता वो कॉम्प्रोमाइज या त्याग वाला समझौता नहीं है बल्कि ये 'क्या कहेंगे लोग' के डर और अपने मिथ्या प्रदर्शन की भावना के कारण मानवीय कमजोरी वाला समझौता है। इस कमजोरी के चलते हम किसी और की चंद झूठी तारीफों के लिये अपना एक जीवन यूंही तबाह कर देते हैं।

'तमाशा' में भी इम्तियाज की अन्य फ़िल्मों की तरह किरदार बहुत कन्फ्यूज हैं और उनका कन्फ्यूजन फिल्म के अंतिम फ्रेम तक पहुंचते-पहुंचते ही दूर होता है। फिल्म ने किस्सागोई की पुरानी परंपरा को एक मर्तबा फिर जीवित करने की कोशिश की है और कहानियों से इंसान के निर्माण को इम्तियाज ने बखूब बयान किया है। गोयाकि दुनिया की सारी कहानियां एक जैसी हैं बस परिस्थितियां बदली हैं। हीर-रांझा, सीरी-फरियाद, लैला मजनू, राम-सीता, राधा-कृष्ण सभी कहानियां एक जैसे अहसासों से जुड़ी हैं बस मिलन और विरह की वजह बदलती गई हैं। हम चाहें तो इन कहानियों में अपनी कहानी को खोज लें लेकिन उन कहानियों में अपनी ज़िंदगी का रिसोल्युशन या उपसंहार तलाशें तो वो कोरी मूर्खता होगी...हमारी कहानी का रिसोल्युशन हमारा दिल जानता है। बस उसे सभी तरह के भय, लालच या अहंकार से परे देखना जरुरी है। जो उसे देखकर, पहचानकर बस उसे ही चाहते हैं उन्हें वो जरूर मिलता है। जैसा कि इम्तियाज की 'जब वी मेट' में गीत (करीना कपूर) कहती है जो हम एक्चयुअल में चाहते हैं...रियल में, हमे वोही मिलता है"। गर कुछ नहीं मिला है तो हमारी चाहत में ऐब है, ठगी है।

इम्तियाज के पास हमारे समय की सबसे ईमानदार प्रेम कहानियां हैं और वह होना बड़ी बात नहीं है क्युंकि वे और भी बहुतों के पास हैं लेकिन बड़ी बात ये है कि इम्तियाज के पास उनका ईमानदार ट्रीटमेंट भी है। ज़िंदगी में जबरदस्ती का कोई काम ही नहीं है। इसके साथ खींचतान नहीं चल सकती। जो पसंद है वो पसंद है जो नहीं तो नहीं। कुछ भी अनावश्यक प्रयत्न पूर्वक नहीं कराया जा सकता क्योंकि जिन आदतों को हम प्रयत्नपूर्वक पालते हैं बाद में वही हमारा भाग्य बन जाती हैैं और हम उनके दास। इसलिये प्रयत्नों का प्रवाह सहज रुचि के अनुरूप बहने देना जरुरी है किंतु उन रुचियों पर बाहरी प्रभाव नहीं पड़ना चाहिये। पसंद-नापसंद का भी नितांत नैसर्गिक रहना जरुरी है और इस सहजता के साथ इंसान जहाँ जायेगा वहाँ अपनी असल मंजिल पायेगा। तब वो मंजिल पे पहुंचने का मजा तो लेगा ही, सफर का मजा भी लेगा। बहरहाल, इम्तियाज के निर्देशकीय कौशल पर पहले भी ज़िंदगी के हाईवे पे जज़्बातों का ओवरटेक कराता फ़िल्मकार और प्यार का सुर और दर्द का राग : रॉकस्टार नामक पोस्ट में काफी कुछ कह चुका हूँ। इसलिये यहाँ रुकता हूं।

इस सबके परे 'तमाशा' एक दर्शनीय फ़िल्म है। इम्तियाज की कमजोर फ़िल्मों में भी उनके दार्शनिक दृष्टिकोण की झलक देखने मिलती है तथा वो बहुत ही विरले किसी और निर्देशक में नजर आती है। बेशक, ये फिल्म  प्रस्तुतिकरण के मामले में इम्तियाज की कुछ पिछली फिल्मों की तुलना में कमजोर है पर इसके सुर में कोई फर्क नहीं है। अभिनय के मामले में रणबीर, दीपिका ने कमाल किया है तथा चंद छोटे दृश्यों में नजर आये पीयुष मिश्रा फिल्म के असल प्राण है, कहना चाहिये कि इस तमाशे के सूत्रधार वही जान पड़ते हैं। लोकेशंस शानदार हैं और सिनेमेटोग्राफी कुछ ऐसी है मानो हमारे घरों की सुंदरता बढ़ाने वाली प्राकृतिक सौंदर्य से युक्त सीनरियों के सामने ही फिल्म के पात्रों को बिठाके कथा बुनी हो। संगीत के लिये ज्यादा स्पेस नहीं है लेकिन जो दो-तीन गाने हैं उनमें ए आर रहमान ने अपनी प्रतिभा का भलीभांति परिचय दिया है। 'तुम साथ हो' गीत में भी हम इम्तियाज की पिछली फिल्मों वाले 'तुमसे ही', 'तुम हो साथ मेरे', 'तू साथ है तो दिन रात है' जैसे गीतों वाली मधुरता देखने मिलती हैं।

फिल्म में इश्क के बिछोह से पैदा तड़प और मिलन के बाद की खुशी को गहरे तक ऑब्जर्व करके इम्तियाज ने दिखाया है। सोचा न था, जब वी मेट, लव आजकल, रॉकस्टार और हाईवे में जो कुछ कहना रह गया था उसे ही इम्तियाज ने आगे बढ़ाया है। इम्तियाज भी गजब के किस्सागो है जहाँ भले उनके पात्र बदल रहे हैं, रंगमंच और उसकी पृष्ठभूमि बदल रही है लेकिन कहानी एक ही है..पर उस एक जैसी कहानी में हर बार कुछ नयापन है...असल में यही तो कहानीकार की खूबी होती है।

Wednesday, November 25, 2015

ये हौसला कैसे झुके!!!


ज़िंदगी के अहसासों को डायरी में समेटना कईयों का शौक होता है और हममें से कई लोग अपने रोजमर्रा की घटनाओं, अनुभवों, खुशी और ग़म के पल को अल्फाजों में पिरो कुछ-कुछ राहत महसूस करते हैं। कागज़ों पे अहसासों को उकेरना भी किसी से बातें करने के समान ही होता है। लेकिन जब आपके कुछ अहसास ऐसे भी हों जिनकी अभिव्यक्ति दूसरोें की हौसला अफजाई में मदद कर सकें तो उन्हें सार्वजनिक करना एक उत्तम विचार ही कहा जायेगा।

जिंदगी के एक ऐसे ही कड़वे अनुभवों से दो-चार होने के बाद जब मैंनें उन्हें सिर्फ स्वांत-सुखाय और स्वप्रेरणार्थ डायरी में लिखा तो ये नहीं पता था कि ये पुस्तक की शक्ल लेगा। लेकिन जब ये विचार साकार हुआ और इसे लोगों ने सराहा तो मनोबल में अतीव ऊर्जा का संचार हुआ। मेरे अनुभवों की डायरी, जो लिखी तो किसी खास घटनाक्रम को लेकर है लेकिन इसका उद्देश्य संकुचित न हो अति विस्तृत है। इस डायरी को पुस्तक का रूप दिया है पंजाब के रिगी पब्लिकेशन ने और जुलाई में प्रकाशित होने के बाद से अब तक एक हजार से ज्यादा इसकी प्रतियां बिकना...अंतस में अतीव प्रसन्नता का संचार करने वाली खबर है।


सृजन, भले सराहना से पैदा न होता हो लेकिन प्रेरित जरूर होता है। अच्छा लगता है जब साहित्य के समंदर में हमारे सृजन के लघुतम प्रयासों के भी कुछ बिन्दु बिखरें और उन्हें लोग सराहें। 

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 YE HAUSLA KAISE JHUKE

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पुस्तक पर आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

Wednesday, October 21, 2015

इक्कीसवी सदी में आये परिवर्तन का प्रतीक थे सेहवाग...

सचिन, सौरव, राहुल, लक्ष्मण के बाद अब आखिरकार वीरेन्द्र सेहवाग ने भी क्रिकेट को अलविदा कह दिया और इस तरह अब मुझे ये पूरी तरह स्वीकार कर लेना चाहिये कि मेरे जीवन का एक पड़ाव पूरी तरह से गुजर चुका है और मैं जीवन की मध्यावधि में प्रविष्ट होते हुए अब अधेड़ उम्र की ओर बढ़ने के लिये तैयार हूँ। जिस तरह से हम आजादी के बाद वाले भारत को तीन भागों में बांटते हैं- आपातकाल के पहले का दौर, आपातकाल के बाद से उदारवाद के पहले तक का दौर और तीसरा उदारवाद आने के बाद वाला दौर। कुछ उसी तरह भारतीय क्रिकेट खास तौर से वनडे क्रिकेट को भी तीन भागों में बांट सकते हैं- उन्नीस सौ पिचहत्तर से उन्नीस सौ नब्बे तक, उन्नीस सौ नब्बे से वर्ष दो हजार तक का दौर और दो हजार के बाद से अब तक का दौर। 

पहले टेस्ट क्रिकेट की प्रवृ्त्ति ही क्रिकेट पर हावी थी, बाद में वनडे क्रिकेट का सुरूर लोगों पे छाया और अब टी-20 का दौर है। वर्तमान को हम विगत तीनों दौर का सम्मिश्रण कह सकते हैं जहाँ तीनों प्रवृत्तियां कम या ज्यादा रूप से सामानांतर प्रवाहित हो रही हैं। इन तीनों दौर के तीन स्तंभ हम मान सकते हैं-सुनील गावस्कर, सचिन तेंदुलकर और तीसरे के वीरेन्द्र सेहवाग को। सेहवाग नवसंस्कृति या न्यू एज्ड जनरेशन के प्रतिनिधि थे जिनकी शैली वर्तमान के युवाओं की प्रवृत्ति को बताने वाली थी। जहां कम समय में बहुत कुछ पाने या तेजी से अपने लक्ष्य तक पहुंचने की बेतावी विद्यमान है। भले इस पीढ़ी को बड़े-बुजुर्गों द्वारा आलोचनात्मक दृष्टि से देखा जाये किंतु ये अपनी धुन में मस्त तेजी से सफलता के नये कीर्तिमान स्थापित करने मे यकीन करता है और बने बनाये हर रिवाज-रीति-नीति और दर्शन से परे ये स्वयं का अपना ही अलग दर्शन विकसित करता है और उसको ही सही साबित करना इसका अंतिम लक्ष्य है। सेहवाग भी कुछ ऐसे ही थे।

यहां पूर्व की तहर सब्र नहीं था और जब हम सेहवाग को बल्लेबाजी करते हुए देखते थे तो यह मानना मुश्किल लगता था कि कभी सुनील गावस्कर ने साठ ओवर तक क्रीज़ पर रहते हुए महज छत्तीस रन बनाये होंंगे। सेहवाग और सेहवाग के समानांतर ही विकसित कई अन्य खिलाड़ियों की शैली का ही नतीजा था टी-20। उन्नीस सौ पिचहत्तर में भले वनडे क्रिकेट शुरु हो गया था किंतु लंबे अरसे तक उस पर टेस्ट का ही साया नजर आता रहा। बाद में सचिन तेंदुलकर, सईद अनवर, सनत जयसूर्या जैसे खिलाड़ियों के चलते वनडे ने अपना रोमांच अख्तियार किया और छह या सात की रनगति से बनने वाले स्कोर को देख इस खेल पर बल्लेबाजों का वर्चस्व नजर आने लगा। कालांतर में आठ और दस का रनरेट भी बौना नजर आने लगा तथा पचास ओवर के खेल में चार सौ रनों के लक्ष्य को भी पार होते देखा। ये सेहवागीय प्रवृत्ति का ही असर था जिन्होंने टेस्ट क्रिकेट को भी वनडे और फिर टी-20 सरीका बना डाला।

मुझे आज भी अच्छे से याद है कि जिस आस्ट्रेलिया के भारत दौरे पर लक्ष्मण ने ऐतिहासिक 281 रनों की पारी खेली थी उसी दौरे की वनडे सीरिज के पहले मैच में सेहवाग ने 58 रन और तीन विकेट का ऑलराउंडर प्रदर्शन करते हुए टीम इंडिया को जीत दिलाई थी। इस प्रदर्शन के बाद सेहवाग वनडे टीम में अपनी जगह पक्की कर चुके थे बाद मे उसी वर्ष श्रीलंका में हुई एक त्रिकोणीय श्रंख्ला में सचिन के स्थान पर संयोग से सेहवाग को ओपनिंग करने का मौका मिला और इस सीरिज में 67 गेंदों पर उनके धुंआधार शतक ने टीम इंडिया को नया मास्टर ब्ल़ॉस्टर दे दिया। इस सीरिज के बाद टीम दक्षिण अफ्रीका दौरे पर गई जहाँ सेहवाग को टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण का अवसर मिला और उन्होंने यहां भी पहले टेस्ट में ही शतक बना टेस्ट टीम में भी अपनी दावेदारी मजबूत कर ली। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। बाद में एक अदद टेस्ट ओपनर के लिये तरस रही टीम इंडिया के लिये कप्तान गांगुली ने सेहवाग को बतौर सलामी बल्लेबाज उतार एक दाव खेला। उसके बाद की कहानी सबके सामने हैं। सेहवाग टीम इंडिया के कभी न भुलाये जा सकने वाले ओपनर बने। सेहवाग खेल रहे हों तो टेस्ट क्रिकेट भी अपने पूरे सबाव पर होता था। गावस्कर, अमरनाथ, तेंदुलकर, द्रविड़, लक्ष्मण जैसे महान् भारतीय टेस्ट बल्लेबाज जो नहीं कर पाये वो सेहवाग ने किया और दो बार तिहरे शतक के आंकड़े को पार किया। एक वनडे शैली के धाकड़ बल्लेबाज ने टेस्ट क्रिकेट में जो उपलब्धियां हासिल की उसने टेस्ट क्रिकेट की सारी परंपराओं को झुठला दिया और आज टेस्ट क्रिकेट में आये बदलाव में सेहवाग के योगदान को ही कम या ज्यादा रूप से मानना पड़ेगा।

सेहवाग टेस्ट में नंबर वन बनी टीम इंडिया के सदस्य रहे, 2003 की वर्ल्डकप उपविजेता, 2007 की टी-20 विजेता, 2011 की वनडे विश्वकप विजेता सहित सभी अहम् उपलब्धियों में सेहवाग टीम इंडिया के हिस्से थे और कई महत्वपूर्ण जीतों में टीम के सूत्रधार भी रहे। अपनी बल्लेबाजी से खेलप्रेमियों को अथाह खुशियां देने वाले सेहवाग के लिये न भूतो-न भविष्यति कहा जाये तो अतिश्योक्ति न होगी। बेशक उन जैसा धुंआधार कई खिलाड़ी खेलते हैं उनके रिकॉर्ड भी सेहवाग से बेहतर हो सकते हैं। लेकिन सेहवाग जैसा मस्तमौलापन, खिलंदड़ अंदाज वे कहाँ से लायेंगे। एक ऐसा खिलाड़ी जो भारतीय क्रिकेट में पहली बार तिहरा शतक मारने जा रहा है लेकिन फिर भी उसे इस ऐतिहासिक क्षण का हिस्सा बनने के लिये न सब्र करना गंवारा है और न ही किसी अतिरिक्त दबाव को अपने ऊपर हावी होने देना। उसे कीर्ति के शिखर पर विराजने के लिये सबसे आसान तरीका छक्का मारना ही नजर आता है और वो इस काम को बखूब अंजाम भी देता है। कोई माने या न माने किंतु ये बस सेहवाग के ही वश की बात थी।

कहते हैं मंजिल पे पहुंचकर तो सबको मजा आता है दम तो तब है जब सफर में भी मजा आये। सेहवाग उन लोगों में से थे जो सफर का भी बखूब लुत्फ़ उठाते थे..................

Sunday, September 6, 2015

मेरी प्रथम पच्चीसी : बारहवी किस्त

(पिछली किस्त पढ़ने के लिये क्लिक करें- पहली किस्त, दूसरी किस्त, तीसरी किस्त, चौथी किस्त, पांचवी किस्त, छठवी किस्त, सातवी किस्त, आठवी किस्त, नौवी किस्त, दसवी किस्त, ग्यारहवी किस्त)

(फिर एक लंबे विलंब के बाद पच्चीसी की कड़ियों को आगे बढ़ा रहा हू...जीवन के पहले पच्चीस बसंत की यह दास्तां शुरु किये दो वर्ष से ऊपर बीत गये। अब अट्ठाईसवे बसंद के गलियारे में प्रवेश कर चुका है लेकिन पच्चीसी की पूर्णता से अभी कोसों दूर हूँ। कोशिश रहेगी दास्तां जल्द समेटूं..और एक शुरु किये काम की जिम्मेदारी से जल्द निवृत्त हूँ।)


गतांक से आगे.....

मुसीबतें जब आती हैं तो भर-भरकर आती हैं। सीधी-सपाट ज़िंदगी में कई क्लाइमेक्स आके विचलित करने लगते हैं। हम किसी अज्ञात शक्ति से गुजारिश करते हैं, ऐ खुदा! बस भी करो..जिंदगी को बोरिंग बना दो। लगातार लगती ठोकरों के बाद जब सब कुछ सामान्य हो जाता है तब भी हम डरते रहते है और यही डर सताता रहता है कि पता नहीं ये खुशनुमा पल कब तक के हैं? अपने उस लघुतम एक्सीडेंट के ज़ख्म भरे भी नहीं थे कि एक और यातना मूंह बाये खड़ी थी। 2007 की नवंबर का अंतिम सप्ताह चल रहा था कि तभी पेट में किसी अनजान दर्द की तड़प उठ रही थी। लगा एसीडिटी टायप कुछ होगा और ऐसे ही किसी मर्ज की दवा-दारू करने में मशगूल था किंतु उन तमाम प्रयासों के बावजूद यातना तनिक भी कम नहीं हो रही थी..और जब दर्द अपनी सीमाएं लांघ चुका था तो अस्पताल जाना ही मुनासिब समझा।

घर से अस्पताल का रास्ता महज आधे घंटे का रहा होगा लेकिन एक-एक सेकंड की असहनीय पीड़ा जीना मुहाल कर रही थी। उस अस्पताल के मुख्यद्वार से पूर्व पड़ने वाले गतिअवरोधक पर जब गाड़ी ने स्पी़ड में जंप लिया तो यह वेदना मानो मौत का निमंत्रण थी। लगा मृत्यु पूर्व का अहसास ऐसा ही होता है...चेहरों के सामने अंधेरा पसर रहा था और मैं अपने पास खड़े पापा, भाई और अन्य परिजनों से गुहार लगा रहा था कि प्लीज इस बार बचा लो। तुच्छ सी प्रतीत होने वाली ज़िंदगी अमूल्य नजर आने लगती है। ज़िंदगी के सारे अच्छे और बुरे कर्म रेलगाड़ी की तरह सामने से गुजरने लगते हैं। सत्कार्यों को बारंबार दोहराने के और दुष्कृत्यों से तौबा करने के संकल्प हम झट से ले लेते हैं। इस वक्त पता चलता है कि दुनिया में टूटी और पीछे छूटी हर वस्तु को वैसा का वैसा पाया जा सकता है पर श्वांसों की डोर दोबारा मौका नहीं देती। ये महीन भी है और दुर्लभ भी। इस दर्दसंयुक्त चिंतनधारा के बीच सोनोग्राफी, सीटीस्केन जैसे टेस्ट भी जारी थे और पता लग गया था कि तन में पाया जाने वाला अपेंडेक्स नाम का अवशेषी अंग फट गया है। फटे अपेंडेक्स के जहर ने अंदरुनी मामला बिगा़ड़ रखा है इसलिये तुरंत ऑपरेशन की दरकार थी। चुंकि हॉस्पिटल में पहले से पहचान थी इसलिये बिना कागजी औपचारिकताओं के ऑपरेशन थियेटर में सीधे प्रविष्ट करा दिया। अगले कुछ घंटों में क्या हुआ पता नहीं।

तब लगा कि शरीर में विद्यमान एक अवशेषी अंग जब इतना कहर ढा सकता है तो अन्य जरुरी अंगों की विषम चाल क्या कर सकती है। कालांतर में यह राज भी खुले...किंतु हर समझ के लिये पीड़ा के सोपानों से गुजरना पड़ता है। सब कुछ समझ आना भी अच्छी बात नहीं..ज़िंदगी की कई तालीमों से हम अनजान ही बने रहे तो बेहतर है। बहरहाल जब होश आया तो पेट के उस हिस्से में दर्द तब भी विद्यमान था पर ये दर्द पहले की तरह अंदरुनी वजहों से नहीं बल्कि चीड़ा-फाड़ी के बाद उपजा ऑपरेशन का दर्द था। पहली मर्तबा इस तरह की सर्जरी के अनुभव से गुजरा था लिहाजा लगने लगा था कि अब सेकेंड हेंड पीस हो गया हूं पहले जैसी शक्तिसंपन्नत्ता अब न रहेगी।  पर तभी पता चला कि मेडिकल साइंस ने अब बहुत तरक्की कर ली है शल्य चिकित्सा इस क्षेत्र की बहुत आसान पद्धत्ति बन चुकी है और कुछ दिनों मे ही ज़िंदगी वापस पूर्ववत् मुख्यधारा में आ गई। तीन महीनों बाद ही मैंने युनिवर्सिटी में हुए एक क्रिकेट टूर्नामेंट में शिरकत कर अपना आत्मविश्वास वापस पाया। लेकिन तब सर्जरी के बाद अगले सात दिन उस हॉस्पिटल के आईसीयू का बैड नंबर नौ ही मेरा एकमात्र ठिकाना था। आहार-निहार सहित समस्त क्रियाएं बस यही तक सिमटी थी। विचारों की उधेड़बुन से तब बहुत कुछ सीखा। विराम का वक्त पहली बार विचार का वक्त बन रहा था।

खैर, दस दिन बाद हॉस्पिटल से घर आया। लगा कि बड़ी जंग जीत ली..सामने एमएससी के प्रथम सत्र की परीक्षा थी। बीते दस-पंद्रह दिन से जिंदगी से कट गया था इसलिये साथ वालों के साथ कदमताल मिलाने के लिये कुछ ज्यादा तेज दौड़ने की जरूरत थी और इसलिये अनजान प्रतिस्पर्धा के चलते बिना किसी को देखे पांच-सात दिन में ही बहुत कुछ पढ़ डाला। यह मेहनत कुछ ऐसी हुई जिसने दूसरों से कई कदम आगे निकाल दिया और पता चला कि जब प्रतिस्पर्धा करते हुए हम दूसरों को देखते हैं तो हम उस तेजी से नहीं बढ़ पाते जिस तेजी से हम सिर्फ खुद पे नजर रख किेये प्रयासों से बढ़ जाते हैं। आखिरकार एक्साम भी निपटे। और इस तरह तकलीफों के छुटमुट भंवर के बीच किसी तरह अपनी कश्ती को आगे बढ़ाया। 

कॉलेज के अगले सत्रों में कुंद पड़े जीवन को रफ्तार मिली। संकोच हवा हुआ, नये रिश्तों के द्वार खुले। ज़िंदगी में नये दोस्त आये जिन्होंने पुरानी यादों से छुटकारा दिलाया। मस्ती-मजाक और सेलीब्रेशन का दौर बढ़ गया। मैं भी इस नये जीवन में ढल गया और एक आम युवा की तरह उन्हीं अहसासों को जीने लगा जो इस उम्र का सच होते हैं। सतही संवेदना, जुनूनी सपने और अपरिपक्व ख़यालों के मिश्रण ने यादें तो बहुत दीं पर सीखने की संभावनाएं कम कर दीं। दोस्ती के उन्माद में चूर हो..बहुत कुछ पाया पर उससे कही ज्यादा बरबाद कर दिया। बेशक हम स्कूल-कॉलेज में उन्मादी जीवन बिता कई यादें संजो लेते हैं पर स्कूल-कॉलेज के असल मायनों से दूर चले जाते हैं। इस दौर से हमें यादें जरूर मिलती हैं पर उन यादों का कोई भविष्य नहीं होता। जीवन में संतुलन बहुत जरुरी है। उन्मादी जीवन से न ज्यादा निकटता हो और न ही दूरी। विद्यार्थी जीवन के हर रंग से हमारा वास्ता हो पर उन रंगों से इस वक्त की धवलता प्रभावित नहीं होना चाहिये।

जारी.................

Sunday, August 9, 2015

ये प्रेम है...प्रेम में बहुत बल है बबुआ!!!

नवाजुद्दीन सिद्दीकी अभिनीत और केतन मेहता निर्देशित 'माँझी-द माउंटेन मैन' रिलीज़ से पहले ही खासी चर्चा में है। दशरथ मांझी के जीवन पर बनी इस फिल्म के ट्रेलर को ही अब तक पैंतालीस लाख से ज्यादा यूट्यूब व्यु मिल चुके हैं। लिफाफे से ख़त का मजमूं मालूम होता है। नवाजुद्दीन सिद्दीकी की नायाब अदाकारी और कुशल निर्देशन को ट्रेलर से ही भांपा जा सकता है। संवादों से कथ्य की गहराई और कथा के परे दर्शन तक जाने के इशारों को भी समझा जा सकता है। बाइस साल का अथक परिश्रम या यूं कहें कि एक जीवन को ही निसार कर देना...एक ऐसे लक्ष्य के लिये जिसे जमाना महज बौराई बुद्धि से ज्यादा और कुछ नहीं मान सकता। गर इस बेसिर-पैर के से दिखने वाले लक्ष्य को चुनने की प्रेरणा का न पता हो तो यकीनन इसे पागलपन ही कहा जायेगा। लेकिन 'पहाड़ तोड़ने' की सदियों पुरानी और असंभव मानी जाने वाली कहावत को सच करने वाले दशरथ मांझी की इस कथा के पीछे भी वही मनोभाव है..जो कांटों पे चलने की, जमाने से लड़ने की, समंदर में जा डूबने की या शिखर फतह करने की प्रेरणा देता है।

प्रेम। प्रताड़ित होकर कई मर्तबा मुरझाया सा दिख सकता है...आवेश और दीवानगी का शिकार हो कई बार भटका सा भी दिख सकता है..या फिर तथाकथित उसूल और रीति-रिवाज़ों के नाम पे ठगा सा नजर आ सकता है। यकीनन ये बुद्धिमानी से कोसों दूर एक ऐसा भावानात्मक ज्वर है जो खुद के साथ-साथ कई दूसरों को भी जला देता है पर इन सब विषमताओं और कमियों के बावजूद ये पूरी मुस्तैदी से दुनिया में अपनी मौजूदगी दर्ज कराता रहा है, करा रहा है और कराता रहेगा। प्रेम की दीवानगी में ही इसकी खूबसूरती है। इससे उपजा पागलपन ही क्रांति को जन्म देता है और उस क्रांति की बयार में ही परिवर्तन की फसल लहलहाती है।

'मांझी' फिल्म के ट्रेलर में भी एक संवाद सुनने को मिल रहा है..जब पार्श्व से ये पूछती आवाज आती है कि ये पहाड़ तोड़ने की ताकत कहाँ से लाते हो..जिस पर दशरथ का किरदार निभा रहे नवाज़ का उत्तर होता है- 'ये प्रेम है...प्रेम में बहूत बल है बबुआ।' यकीन मानिये जिस रोज़ इस जहाँ से प्रेमानुभूतियां समाप्त हो जायेंगी बस ये जहाँ भी थम जायेगा। प्रेम के आसरे और आधार भले हर किसी के लिये जुदा-जुदा हों पर प्रेम का होना ज़रुरी है। आवश्यक नहीं कि ये किसी स्त्री के आधार से जन्मा पारंपरिक मोहपाश के माफिक ही हो..इसके केंद्र में कई दूसरी वजहें भी हो सकती हैं लेकिन इच्छाशक्ति, जीवटता और हौसले का संचार प्रेम से ही होता है। जो हमें पहाड़ तोड़ने, समंदर लांघने, हलाहल पीने या सितारे तोड़ने तक का साहस देता है। 

जगत में साहस का संचार भी प्रेम से ही मुमकिन है। क्रोध, व्यग्रता या रोष से बल प्रदर्शित नहीं होता, बल-वीर्य और साहस का वास भी प्रेम में ही है। प्रेम पर अड़ंगे लगाने के पीछे समाज की मंशा मनुष्य को कमजोर बनाये रखना है क्योंकि प्रेम चली आ रही प्रथाओं, रीति-रिवाज़ों और समाज की तथाकथित संस्कृति को आंख मूंद कर स्वीकार नहीं करता। प्रेम, प्रश्न करता है और उन सवालों से पोंगापंथी की तमाम इमारतें बिखर जाती हैं और तर्क के नींव पर विचारों का नवीन महल सृजित होता है।

'मांझी-द माउंटेन मैन' को देखना भी रोचक होगा क्योंकि इस साहस, धैर्य और सतत प्रयासों की बानगी पेश करने वाली असल कथा के पीछे भी प्रेम है। गोयाकि एक अति कोमल भाव, कठोर से कठोर और कठिन से कठिन काम को करा देने का माद्दा रखता है। ये महज एक संयोग है कि अपनी हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ''ये हौसला कैसे झुके'' में भी मैंने एक बिन्दु लिखा है 'प्रेम ही बनता है हौसले की वजह'। जीवन में बाधाओं को चीरकर छोटे या बड़े चाहे किसी भी लक्ष्य तक पहुंचे व्यक्ति को देखा जाये उसके पार्श्व में प्रेम ही प्रेरणा का कारण होता है। दशरथ मांझी की कथा प्रसिद्ध है इसलिये हम उन्हें जानते हैं...पर कई छोटी-बड़ी सैंकड़ों मिसाल पेश करने वाली सुप्त कथाएं भी प्रेम से ही पल्लवित और सुरभित होती आई हैं किंतु प्रेम से शून्य हृदय इस बात को नहीं समझ सकता।