Monday, February 18, 2013

प्रेम : प्रसन्नता एवं प्रताड़ना का मिश्रित रसायन

"यह भ्रम है केवल भ्रम..कि प्रेम मनुष्य को अमर बनाता है। मनुष्य को अमर बनाती है निर्ममता, निरीहता- अमर होते हैं सिर्फ पत्थर के देवता! दुःख, सुख, वेदना, आनंद, जीवन और मृत्यु से उदासीन...इनकी पथरीली आंखों में आंसु नहीं आते- ऐसा अमृतत्व देवताओं के लिए है मनुष्य के लिए नहीं...मनुष्य के लिए है प्रेम। जिसमें मृत्यु है और मृत्यु जीवन की प्रेरणा है, विरह प्रेम की उत्तेजना है और यही है मानव जीवन के दुःख-सुख का विधाता" धर्मवीर भारती की ये पंक्तियां प्रेम का सटीक विवरण प्रस्तुत करती है जहां प्रेम में अफसोस करने की समस्त गुंजाइशों की मनाही है...जो प्रेम जीवन में प्रसन्नता भरता है उसी प्रेम को ये पूरा हक़ है कि वो प्रताड़ित करे। प्रेम का आकांक्षी जब प्रसन्नता को न्यौता देता है उसी वक्त उसका मौन निमंत्रण प्रताड़नाओं के लिए भी होता है।

जीवन को दिशा, हमेशा अमूर्त चीजों से ही प्राप्त होती है और यही नियंता होती है हमारी ख़ुशी और ग़म की। चाहे प्रेम हो, प्रेरणा हो, कल्पना हो या फिर हो उम्मीद...ये तमाम चीजें हमारे ईर्द-गिर्द एक भ्रम का आभामण्डल रचती है और इन्हीं से हासिल किए जज्बातों से लबरेज हो इंसान बहुत-कुछ कर गुजरता है। इन अमूर्त चीजों से ही मिली हुई मूर्त चीजों को देख इंसान की सफलता और असफलता के मानक निर्धारित किए जाते हैं...पर कभी भी होता वो नहीं जो दिखता है और यहीं आकर वे समस्त चीजें जो दिखती है वो भ्रम हो जाती है और न दिखने वाली चीजें यथार्थ। इंसान अपने सुख-दुख का निर्धारक स्वयं होता है और स्वयं ही उसे भोगता है। खलील जिब्रान की एक उक्ति है "इंसान इस दुनिया में नितांत अकेला है, प्रेम और दोस्ती उसे किसी के साथ होने का भ्रम पैदा करते हैं"। जब तक ये भ्रम जिंदा है तब तक ही प्रसन्नता है, भ्रम टूटा और प्रताड़नाएं प्रारंभ। कल्पनाओं के लोक में ही अतीव आनंद विचरण करता है...वास्तव में कुछ अभीष्ट के पाने से ज्यादा प्रसन्नता, उसे पाने की कल्पनाओं में है इसी तरह कुछ प्रियवस्तु को खोने से ज्यादा दुख, उसे खोने के ख्याल में है।

कहते हैं प्रेम, सीमाएं निर्धारित करता है किंतु मनुष्य के व्यक्तित्व का आकाश असीम है। अगर चन्दन पवन के झोंको के साथ सुगन्ध रूप में न बिखरकर उन्हीं मलय-शिखाओं में सीमित रह जाए तो संसार में कौन उसे जान पाएगा। ऐसे ही प्रेम गर मनुष्य के असीम व्यक्तित्व में समाकर अनंत की यात्रा न करें तो संसार में उसकी पहचान समाप्त हो जाएगी। लेकिन आज प्रेम का संसार सीमित है कुछेक व्यक्तियों में, कुछेक जज़्बातों में, कुछेक दिनों और कुछेक वस्तुओं में..बस यही कारण है कि प्रेम सीमित है और मोहताज हो चुका है कुछ हासिल करने के लिए...जिसमें से मिट चुका है देने का भाव, त्याग और समर्पण। खड़ी हो चुकी है जिसके सामने कई सीमाएं, बन चुके हैं तमाम बंधन और खो दी है इंसान ने वो संवेदनाएं जो प्रेम को समझ सके। यही वजह है कि घुट रहा है प्रेम रिवाज़ों और समाजों के बीच...प्रेम के साथ ही घुट रहा है इंसान, उन प्रताड़नाओं के कारण जो प्रेम को न समझने के कारण पैदा हुई है। इस प्रताड़ना ने पैदा की है असीम पीड़ा, असीम क्रोध और असीम दुर्वासनाएं...जो कभी भी प्रेम का मक़सद नहीं थी।

इन प्रताड़नाओं से प्रेरित होकर प्रेम कब नफ़रत में बदल जाता है पता नहीं चलता...कोसता है उस शख़्स को जिसे दिलो-जान से ज्यादा चाहता था और मोहब्बत को कहता है बदनसीबी। प्रेम हो जाती है उस ओस के बूंद के समान जिसे सूरज की किरणें हर लेती है...और व्यक्ति बन जाता है उन जमीन में लहलहाने वाली दूर्वाओं के समान, जो तरसती है ओस की बूंद को पाने के लिए और तकती है प्यासी दृष्टि से नीलाकाश की ओर। गर किरणों को चाहा होता तो मिलता अनंत प्रकाश और आकाश से होती दिल्लगी तो मिलता असीम आश्रय। लेकिन प्रश्न ये है कि क्या ओस की नमी, कभी किरणों से मिल सकती थी...भले कुछ देर को ही सही या फिर मिल सकती थी आकाश की शुन्यता में जीवन की हरियाली? प्रेम और जीवन का कोई पर्याय दुनिया में नहीं हो सकता। लेकिन इंसान इन दोनों को ही छोड़कर भाग रहा है 'कुछ और' की तलाश में..पर वो 'कुछ और' क्या है ये शायद उसे ही पता नहीं।

प्रसन्नता और प्रताड़नाएं मिलकर प्रेम को जीवन देती है किसी भी एक के साथ चलते हुए प्रेम में कभी भी नवीनता नहीं आ सकती। प्रताड़ना के प्रत्येक आघात में प्रसन्नता  का आभास खोजना ही प्रेम है। रात्रि के अंधकार में ही ऊषा की किरण छुपी होती है...पत्थर के सनम ही मोहब्बत के खुदा होते हैं। भले वो सिर्फ कल्पनाओं में ही क्यों न हों और कल्पना का सौन्दर्य वास्तविकता से अधिक स्थायी होता है। प्रेम की लहरों के टकराने पर कल्पना के पत्थर टूट जाते हैं- कल्पना की जमीन पर प्रेम के पदचिन्ह अमर होते हैं। इन पदचिन्हों की आवाजें आती है गुजरे वक्त की यादों में। कल्पना प्रेम को नया जीवन देती है और यही मृत्यु में भी प्रेम का साथ देगी। जहां कल्पना है वहीं प्रेम होगा और वही होगी कोमलता और सरसता...लेकिन सिर्फ ये आनंद ही नहीं होगा वहां..इनके साथ ही निवास करेगी वेदना, प्रताड़ना।

आज की नवसंस्कृति के समझ से परे है ये विषय...नवसंस्कृति के लिए प्रेम है गुलाब के फूलों में,महंगे ग्रीटिंग कार्डस्, उपहारों और चॉकलेटों में, चुंबन और सेक्स में, वेलेंटाइन की विसेस में...और मैं भी इसी नवसंस्कृति का प्रतिनिधि हूं बस यही कारण है कि प्रेम को समझने की मुश्किल कोशिशों में लगा हूं............अंश


9 comments:

  1. प्रेम नहीं बल्कि प्रेम का नौसिखियापन हावी है नई पीढ़ी पर।

    ReplyDelete
  2. प्रसन्नता और प्रताड़नाएं मिलकर प्रेम को जीवन देती है,,,

    Recent Post दिन हौले-हौले ढलता है,

    ReplyDelete
  3. नहीं प्रतारक प्रेम सा, नहीं प्रताड़क अन्य |
    पर्जन्या दे देह पर, नयनों में पर्जन्य |
    नयनों में पर्जन्य, काटता रहा पतंगें |
    बुरा सदा अंजाम, करे मानव-मन नंगे |
    कुछ घड़ियों की मौज, प्रेम दारुण संहारक |
    बिना शस्त्र मर जाय, मौत पर हँसे प्रतारक ||

    प्रतारक=ठग
    प्रताड़क=कष्ट देने वाला
    पर्जन्या=दारुहल्दी
    पर्जन्य=बादल

    ReplyDelete
  4. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

    ReplyDelete
    Replies
    1. जी देखी...धन्यवाद।।
      साथ ही मेरे लेख को जो आपने अपने काव्यकौशल से संवारा है उसके लिए भी साधुवाद।।।

      Delete
  5. न जाने क्या पा जाने की और न जाने क्या खो जाने की, अव्यक्त सी प्यास है प्रेम।

    ReplyDelete
    Replies
    1. जितना समझने की कोशिश करो, उतना ही कम समझ आता है ये कमबख्त।।।

      Delete
  6. चंदन की तरह खुशबू देने वाले प्रेम के बारे में समझ और बढ़ी । आपकी अंतिम पंक्तियां बहुत अच्छी लगी, सचमुच नई संस्कृति के लिए यह मैक्डोनाल्ड के हैप्पी मेन्यू जैसा ही है प्यार

    ReplyDelete
    Replies
    1. सही कह रहे हैं सौरभजी।।।

      Delete

इस ब्लॉग पे पड़ी हुई किसी सामग्री ने आपके जज़्बातों या विचारों के सुकून में कुछ ख़लल डाली हो या उन्हें अनावश्यक मचलने पर मजबूर किया हो तो मुझे उससे वाकिफ़ ज़रूर करायें...मुझसे सहमत या असहमत होने का आपको पूरा हक़ है.....आपकी प्रतिक्रियाएं मेरे लिए ऑक्सीजन की तरह हैं-