Sunday, March 31, 2013

ज़िंदगी के चौराहे

(ये लेख आज से लगभग चार वर्ष पहले अपने रायपुर प्रवास के दौरान..होली के दिन भांग के नशे में लिखा था..पर आज भी जब इसे पढ़ता हुं तो इसकी यथावत् प्रासंगिकता को पाता हुं..कृप्या इस अचेत अवस्था में लिखे गये लेख को साहित्यिक पैमानों पर तौलने की कोशिश न करें...)

जिंदगी में रास्ते लंबे भले हों, मगर मुश्किल नहीं होने चाहिए..इससे भी ज्यादा दुखद है उनका असमंजस भरा होना। कठिनाईयों से ज्यादा संशय परेशान करता है। राही की मुश्किल भी तब बढ़ जाती है जब सीधे-सादे रास्तों के बाद चौराहे आते हैं और उन चौराहों का तो क्या कहना, जहाँ रास्ते दिखाने वाले बोर्ड नहीं लगे हों। जिंदगी में भी इंसान ऐसे कई चौराहों से रूबरू होता है और जिंदगी के चौराहों में कोई इंडिकेशन बोर्ड नहीं होता। सही रास्तों को चुनने का बोझ होता है, एक अनचाहा डर सताता है। कई बार चौराहे कुछ ऐसे होते हैं कि कोई रास्ता ही नज़र नहीं आता। ऐसे ही समय में इंसान के असली हुनर और दूरदर्शिता की पहचान होती है।

समाज में एक ओर पहचान, सुरक्षा, स्थायित्व पाने की चाहत तो दूसरी ओर शारीरिक परिवर्तन, विलासिता की तमन्ना, रिश्तों के बंधन जटिलताओं का निर्माण करते हैं। ऐसे हालातों में बीता हुआ सफ़र याद आता है जहां बेरोकटोक हम जिंदगी की गाड़ी को सरपट भगाये जा रहे थे। दरअसल, हम गतिमान जीवन में ही इतना मस्त हो जाते हैं कि उस जीवन से परिवर्तन हमें विचलित कर देता है। पुराने रिश्ते जब परबान चढ़ते हैं तभी उनके बिखरने का वक्त आ जाता है। वक्त तो बीत जाता है पर बीते हुए लम्हों की कसक साथ रह जाती है..अब जो नया रास्ता शुरू होता है वहां प्रारंभ फिर शून्य से होता है।

लोग अपने वर्तमान स्वच्छंद जीवन को देख कहते हैं कि काश! ताउम्र बस ऐसे ही जीवन चलता रहे, बस युंही मौज-मस्ती में वक्त गुज़र जाये और किसी तरह का कोई परिवर्तन न हो...पर इस वक्त वो भूल जाते हैं कि गतिमान लम्हों की कीमत ही इसलिए है कि ये हमेशा नहीं रहने वाले। अंतहीन सफ़र कभी सुहाना नहीं होता। परिवर्तन में नवीनता गर्भित है।

इंसान एक अजीब सी खींझ महसूस करता है...एक तरफ कुछ सार्थक न कर पाने की बेवशी...दूसरी तरफ मृत्यु, स्वास्थ्य, असुरक्षा का अदृश्य भय..जो प्रगट नहीं होता। दरअसल, अनिष्ट की आशंका अदृश्य ही होती है। अपने ही सपनों का सैलाब हमें तंग करता है क्योंकि लोगों को मुकम्मल जहां नहीं मिलता। हर एक उपलब्धि एक नई ज़रूरत को जन्म देती है और ज़रूरत से फिर नई उपलब्धि होती है। जीवन का चक्र घूमकर हमें फिर वहीं खड़ा कर देता है जहाँ से हमने सफ़र की शुरुआत की थी। सच, परिवर्तनीय जगत वास्तव में कितना अपरिवर्तनीय होता है। दुनिया के परिवर्तनीय स्वरूप को देखने के कारण अप्रसन्नता है...अपरिवर्तनीय का दीदार हो जाये तो तकलीफ कभी छू भी न पायेगी। परेशानी ये है कि जीवन-चक्र में घूमते हुए हमारे हाथ खाली ही होते हैं।

हर चाही हुई चीज को पाने की कोशिश अनैतिक बना देती है। परिस्थितियों की बेवफाई चरित्र को नष्ट कर देती है और इन सारी चीजों का जन्म चौराहों पर लिये गए हमारे फैसलों के कारण होता है। सही-गलत की उलझन नतीजे आने तक बरकरार रहती है...और नतीजे आने के बाद हमारे हाथ कुछ नहीं होता, महज अनुभव के। जिस अनुभव को यदि हम दूसरों को बताए तो वो भी इन्हें नहीं मानता क्योंकि अधिकतर इंसान अपनी गलतियों से ही सीखते हैं।

तथाकथित सफलता की चकाचौंध ने इंसान की जिंदगी को आवृत्त कर दिया है। दुनिया में सक्सेस और स्टेटस के मायनों के चलते लाइफ के मायने घट गये हैं। एक स्टेज पर सक्सेस इतनी ख़ास हो जाती है कि उसके आगे जिंदगी बहुत छोटी नज़र आती है। चुंकि हर इंसान के हिसाब से सक्सेस के पैमाने अलग होते हैं, पर आज सफलता- करियर, पैसे के अर्थ में रूढ़ हो गई है। और उस भौतिकीय सफलता को ही सब कुछ माना जाता है। उस सफलता का आकर्षण हमें एक ऐसी दिशा में ले जाता है जहाँ आफतों को आदत बनाना पड़ता है। मंजिल पर पहुंचने के बाद रास्तों का सुकून याद आता है और मंजिल से बेहतर रास्ते लगने लगते हैं।

खैर, जीवन की हर चीज पर अपना ही एक दार्शनिक विचार खड़ा हो सकता है। अंत में मैं सिर्फ एक बात कहुंगा जो मैं बहुत सीधे-सादे अंदाज में बिना किसी चमत्कारिक शब्दों के कहुंगा...कि कुछ भी हो, रास्ते का चुनाव हो पाए या नहीं, सफलता मिले या नहीं या फिर किसी वा़ञ्छित वस्तु या व्यक्ति की दूरी ही क्यों न हो जाए...पर अपना चरित्र नीलाम मत कीजिए, सिद्धांतों से समझौता मत कीजिए। हमारी सबसे बड़ी पूंजी हमारा चरित्र है..अपनी पूंजी गंवाकर उपलब्धियों की प्राप्ति कभी सुखकर नहीं हो सकती। यकीन मानिए, अंततः सब ठीक हो जाएगा...............

Friday, March 8, 2013

जज्बातों के लिबास बनने की मुश्किल कोशिश करते अल्फ़ाज......

रॉकस्टार फिल्म का प्रसिद्ध गीत 'जो भी मैं कहना चाहुं, बरबाद करें अल्फाज मेरे' इंसान की अभिव्यक्ति की जबरदस्त लाचारी को बयां करने वाला गीत था। शब्द बृम्ह कहलाते हैं और इनके सहारे ही इंसान सभ्यता और विकास की नित नई इबारत लिख रहा है। रीति, रस्म, रिवाज, संस्कार का प्रसार इन्हीं अल्फाजों के सहारे हो रहा है...लेकिन इतना कुछ कह जाने के बाद भी बहुत कुछ अनकहा ही रह जाता है। या तो चीजें बयां नहीं हो पाती और गर बयां होती हैं तो समझी नहीं जाती। वार्ताओं का मंथन अमृत कम, ज़हर ज्यादा उगल रहा है और खामोशियों की वाचाल जुवां सुनने की कोई जहमत ही नहीं उठा रहा है।

असीम कुंठा, असीम दर्द, पीड़ा, मोहब्बत या नफरत से कभी गोली निकलती है, कभी गाली, कभी आंसु तो कभी कविता...पर अनुभूतियों का कतरा भी अभिव्यक्त नहीं होता। इंसान बेचैनियों का बवंडर दिल में दबाये जिये जाता है क्योंकि दुनिया में वो किनारे ही नहीं हैं जिस दर पे जज्बातों की लहरें अपना माथा कूटे। बेचैनियों की आग हर दिल में धधक रही है पर धुआं ही नहीं उठ रहा..जिसे देख लोग उस आग का अनुमान लगा सके। धुआं उठ भी जाये तो वो लोगों की आंखों में धंस जाता है जिसके बाद लोग उस आग को देखने की हसरत ही त्याग देते हैं क्योंकि जो भी मैं कहना चाहूं, बरबाद करें अल्फाज मेरे। इंसान अनभिव्यक्त ही रह जाता है।

जिंदगी के सफर में रिश्तों की सड़क साथ चलने का आभास देती है पर हम आगे बढ़ते जाते हैं और सड़क का हर हिस्सा अपनी जगह ही स्थिर रहता है। हम अकेले ही होते हैं..हमेशा, हर जगह। कुछ पड़ावों पर हमें हमारा साया नजर आता है जो हम सा ही प्रतीत होता है..पर वो बस प्रतीत ही होता है क्योंकि हम जैसा और कोई नहीं होता। हमारे दिल में वो परछाईयां जगह पाने लगती हैं जो हम सी नजर आती है...हमको समझती हुई सी दिखती है पर अचानक हमारा दिवास्वपन टूटता है और हम फिर बिखर जाते हैं...बिना अभिव्यक्त हुए। कभी मुस्काने बिखरती हैं तो कभी आंसू..और कभी कुछ बेहुदा से अल्फाज भी...पर सब झूठे ही रहते हैं। याद आता है वो गीत- 'कसमें-वादे, प्यार-वफा सब बातें हैं बातों का क्या.......

इस सूचना विस्फोट के युग में कितना कुछ बाहर आ रहा है...सोशल नेटवर्किंग साइट्स, टेलीविजन, फिल्म, साहित्य सब जगह कितना कुछ अभिव्यक्त हो रहा है...पर क्या वाकई अनुभूतियां मुखर हो पा रही हैं। भ्रम के इस युग में अल्फाज सबसे बड़े भ्रम हैं। जो बातें हैं वो जज्बात नहीं है...वो जज्बात हो ही नहीं सकते क्योंकि जज्बात नग्न ही होते हैं और अदृश्य भी...ये लफ्जों के लिबास उन्हें ढंक सकते हैं प्रगट नहीं कर सकते। पूरा जीवन उस एक शख्स और उन चंद अल्फाजों को खोजने में लग जाता है जहां जज्बातों को पनाह मिल सके।

तपन से वर्फ पिघल सकती है, लोहा पिघल सकता है, पर्वत, पाषाण और  संपूर्ण पर्यावरण पिघल सकता है...पर रूह की इस भीषण गर्मी से इंसान नहीं पिघल रहा। उसके सीने में मौजूद जज्बातों के विशाल सरोवर पर बना दायरों का बांध, अल्फाजों की लहरों को निकलकर आने ही नहीं दे रहा..और जो बाहर आ रहा है वो बहुत ही सतही और दूषित लहरें हैं जिन्हें पवित्र बनाने के झूठे जतन किये जा रहे हैं। बहरहाल, अपने इस असमर्थ लेख के गरीब अल्फाजों से कुछ कहने की अनकही कोशिश कर रहा हूं...पर इन गरीब अल्फाजों ने उन संसाधनों को आज तक विकसित नहीं किया जिससे ये कुछ कह पायें...खैर, मैनें कहने की मुश्किल कोशिश की है आप समझने के दुर्लभ जतन करना.............

Friday, February 22, 2013

क्या इस हिंसा के ताण्डव का कोई अंत है....?


हैदराबाद दहल रहा है। आतंक के राक्षस ने इस हाईटेक होते शहर को मूंह चिढ़ाया है "कि बेटा देखते है तरक्की की कौन-सी इबारत तुम्हें दर्द से बचा सकती है"। 2008 के सिलेसिलेवार हमलों की यादें आज भी जहन में करवटें बदलती रहती हैं...तब हैदराबाद को बख्श दिया गया था..पर आतंक ने इस बार अपनी वापसी के लिए इस आधुनिक होते और सांस्कृतिक ढंग से जीने वाले शहर को चुना है। शायद ये मुंबई के ताज होटल पे हुए हमले से बड़ा नहीं है..और नाही इसे संसद के हमले के समतुल्य आंका जाएगा। लेकिन फिर भी इन हमलों की आवाज देश के और सत्ता के गलियारों में गूंजती जरूर है..ये बात अलग है कि उस गूंज को भुलाने में ज्यादा वक्त नहीं लगता। अफजल और कसाब को फांसी दी तो क्या हुआ..आतंक के मोहरे अभी और भी है। मोहरों को मार गिराने से उस विचार का क़त्ल नहीं होता..जो जिंदगी की बिसात पे इन मोहरों का प्रयोग करता है।

विकास चौमुखी नहीं है, पर इस देश में आतंक के तमाचे चारों ओर बरस चुके हैं। धर्म, संस्कृति, जाति, भाषाओं में बंटे इस देश की आतंक के दर्द से निकली आह एक है। सामाजिक असमानताओं के बावजूद सभी के आंसु समान है..विषमताओं की सरहदें अनेक हैं पर त्रासदियों के जख्म एक हैं। सच, अनेकता में बंटी इस दुनिया में आंसु और खुशी कितने धर्मनिरपेक्ष और साम्यवादी होते हैं। 

मीडिया आंक रहा है कि संसद, ताज या मुंबई लोकल ट्रेन जैसे कई हमलों में से ज्यादा शर्मनाक कौन सा है...पर अफसोस इसका जबाव तलाश पाना बहुत मुश्किल है, क्योंकि हमने भुकंप को, बरसात को, तापमान को या शरीर के ज्वर को नापने वाला स्केल तो बना लिया है पर भावनाओं को नापने वाला स्केल अभी विकसित कर पाना बाकी है। त्रासदी और दर्द को आखिर किस थर्मामीटर से नापें? 

लगातार होने वाले ये आतंकी हमले इंसानों के साथ-साथ हमारी संवेदनाओं को भी मार रहे हैं। अब धमाकों की ख़बर हमें विचलित नहीं करती, न दिल में कोई टीस उठती है इन ख़बरो को सुनना अब हमारी आदत बन चुका है। हर हमले के बाद वही नेताओं के भाषण, न्यूज चैनल के रिपोर्टरों द्वारा अलग-अलग एंगल से लोगों का दर्द दिखाना, अखबार के प्रख्यात स्तंभकारों द्वारा संपादकीय लिख देना या मेरे जैसे लेखन रुचि वाले लोगों द्वारा ब्लॉग या डायरी का कुछ स्पेस घेर लेना जस का तस होता है। हालात नहीं बदलते। बौद्धिक बयानबाजियों, तिकड़मी आरोप-प्रत्यारोपों के कलेवर बदलते हैं भौगोलिक परिवेश में फर्क नहीं आता। कुछ समय बाद धमाके की गूंज वायुमण्डल में कहीं खो जाती है और इंतजार होता है अगले बवण्डर का....

बड़े-बड़े जुलूस निकालकर, चौराहों पर प्रदर्शन कर नेताओं को गाली दी जाती है...लोगों को जागने के लिए कहा जाता है...पर सवाल ये है कि बेचारा आम आदमी जागकर कर क्या लेगा, उसके पास वोट डालकर नेता चुनने के अलावा और अधिकार ही क्या है...उसे मेहनत-मजदूरी कर दो वक्त की रोटी और अपने बच्चों की मांग पूरी करने से फुरसत मिले तो वो सड़कों पर आए। वो बेचारा इन मजबूरियों के साथ अपनी जिंदगी को चलाने की जुगत में ही लगा होता है और ये आतंक उसकी जिंदगी को ही थाम देता है...यहां सिर्फ उस एक इंसान की जिंदगी में ही भूचाल नहीं आता..फर्क उस पूरे परिवार पर पड़ता है जो जिंदा होकर भी जिंदा नहीं रह जाता।

उस आम आदमी की समस्या महंगाई, बेरोजगारी या गरीबी से भी बड़ी है उसके सामने अपनी मूलभूत सुरक्षा का प्रश्न है। जिंदगी का प्रश्न है। वो अपनी इस असुरक्षा के लिए किसे उंगली दिखाए ये उसकी समझ से परे है। दीमक कहीं लगी है और खोखला कोई और हो रहा है। आतंकवादियों को क्या नसीहत दी जाए, उन्हें जहां से नसीहत मिलती है वो चीज बहुत बड़ी है। उनकी मगरमच्छ की खाल को शब्दों से नहीं भेदा जा सकता। उनका ज़मीर ही उन्हें नसीहत दे सकता है।

सुना था कि कलयुग का रूप बड़ा भयावह होगा पर इतना भयावह होगा ये अंदाजा नहीं था। इस समस्या को सुलझाने की तरकीब हमारे पास नहीं है, इस समस्या का समाधान भी उन दहशतगर्दों के पास है। यहां हमारी नहीं उनकी समझदारी से रास्ता निकलेगा, लेकिन वो दिन कब आएगा ये बता पाना असंभव है। दरअसल, जलना इस देश की फितरत बन चुका है..गर इस आतंकवाद की आग थोड़ी ठंडी पड़ती है तो हम दूसरी आग सुलगा देते हैं कहीं धर्म के नाम पर, कहीं क्षेत्र के नाम पर या फिर आरक्षण, नक्सलवाद और जाने क्या-क्या। इस आग मे वो इंसान हताहत होता है जिनसे उस बेचारे का कोई लेना-देना ही नहीं था। इस सबके कारण जीवन की दूसरी समस्याओं से हमारी नज़र ही हट जाती है, क्योंकि मूल समस्या ही जीवन की बन चुकी है।

खैर, ये दौड़ते-भागते शहर थमना नहीं जानते। आतंक के राक्षस के इन तमाचों से वो गिर तो जाते हैं पर उठकर फिर भागने लगते हैं...लेकिन दौड़ते-दौड़ते ये यही सवाल करते हैं कि मेरे दौड़ने से किसी को क्या तकलीफ है। धमाके में मरे लोगों को श्रंद्धांजलि। घायल लोगों पे संवेदना। इसके अलावा कुछ और किया भी नहीं जा सकता..पीड़ित लोगों का दर्द बांट पाना संभव नहीं पर उनके लिए दुआ जरूर कर सकता हूं। कुछ समय बाद आंख के आंसु सूख जाएंगे, दिल का दर्द भी चला जाएगा, जुवाँ खामोश हो जाएगी पर ये खामोश जुवाँ हमेशा यही पूछेगी कि मौत के इस ताण्डव का कोई अंत है.........?????

Monday, February 18, 2013

प्रेम : प्रसन्नता एवं प्रताड़ना का मिश्रित रसायन

"यह भ्रम है केवल भ्रम..कि प्रेम मनुष्य को अमर बनाता है। मनुष्य को अमर बनाती है निर्ममता, निरीहता- अमर होते हैं सिर्फ पत्थर के देवता! दुःख, सुख, वेदना, आनंद, जीवन और मृत्यु से उदासीन...इनकी पथरीली आंखों में आंसु नहीं आते- ऐसा अमृतत्व देवताओं के लिए है मनुष्य के लिए नहीं...मनुष्य के लिए है प्रेम। जिसमें मृत्यु है और मृत्यु जीवन की प्रेरणा है, विरह प्रेम की उत्तेजना है और यही है मानव जीवन के दुःख-सुख का विधाता" धर्मवीर भारती की ये पंक्तियां प्रेम का सटीक विवरण प्रस्तुत करती है जहां प्रेम में अफसोस करने की समस्त गुंजाइशों की मनाही है...जो प्रेम जीवन में प्रसन्नता भरता है उसी प्रेम को ये पूरा हक़ है कि वो प्रताड़ित करे। प्रेम का आकांक्षी जब प्रसन्नता को न्यौता देता है उसी वक्त उसका मौन निमंत्रण प्रताड़नाओं के लिए भी होता है।

जीवन को दिशा, हमेशा अमूर्त चीजों से ही प्राप्त होती है और यही नियंता होती है हमारी ख़ुशी और ग़म की। चाहे प्रेम हो, प्रेरणा हो, कल्पना हो या फिर हो उम्मीद...ये तमाम चीजें हमारे ईर्द-गिर्द एक भ्रम का आभामण्डल रचती है और इन्हीं से हासिल किए जज्बातों से लबरेज हो इंसान बहुत-कुछ कर गुजरता है। इन अमूर्त चीजों से ही मिली हुई मूर्त चीजों को देख इंसान की सफलता और असफलता के मानक निर्धारित किए जाते हैं...पर कभी भी होता वो नहीं जो दिखता है और यहीं आकर वे समस्त चीजें जो दिखती है वो भ्रम हो जाती है और न दिखने वाली चीजें यथार्थ। इंसान अपने सुख-दुख का निर्धारक स्वयं होता है और स्वयं ही उसे भोगता है। खलील जिब्रान की एक उक्ति है "इंसान इस दुनिया में नितांत अकेला है, प्रेम और दोस्ती उसे किसी के साथ होने का भ्रम पैदा करते हैं"। जब तक ये भ्रम जिंदा है तब तक ही प्रसन्नता है, भ्रम टूटा और प्रताड़नाएं प्रारंभ। कल्पनाओं के लोक में ही अतीव आनंद विचरण करता है...वास्तव में कुछ अभीष्ट के पाने से ज्यादा प्रसन्नता, उसे पाने की कल्पनाओं में है इसी तरह कुछ प्रियवस्तु को खोने से ज्यादा दुख, उसे खोने के ख्याल में है।

कहते हैं प्रेम, सीमाएं निर्धारित करता है किंतु मनुष्य के व्यक्तित्व का आकाश असीम है। अगर चन्दन पवन के झोंको के साथ सुगन्ध रूप में न बिखरकर उन्हीं मलय-शिखाओं में सीमित रह जाए तो संसार में कौन उसे जान पाएगा। ऐसे ही प्रेम गर मनुष्य के असीम व्यक्तित्व में समाकर अनंत की यात्रा न करें तो संसार में उसकी पहचान समाप्त हो जाएगी। लेकिन आज प्रेम का संसार सीमित है कुछेक व्यक्तियों में, कुछेक जज़्बातों में, कुछेक दिनों और कुछेक वस्तुओं में..बस यही कारण है कि प्रेम सीमित है और मोहताज हो चुका है कुछ हासिल करने के लिए...जिसमें से मिट चुका है देने का भाव, त्याग और समर्पण। खड़ी हो चुकी है जिसके सामने कई सीमाएं, बन चुके हैं तमाम बंधन और खो दी है इंसान ने वो संवेदनाएं जो प्रेम को समझ सके। यही वजह है कि घुट रहा है प्रेम रिवाज़ों और समाजों के बीच...प्रेम के साथ ही घुट रहा है इंसान, उन प्रताड़नाओं के कारण जो प्रेम को न समझने के कारण पैदा हुई है। इस प्रताड़ना ने पैदा की है असीम पीड़ा, असीम क्रोध और असीम दुर्वासनाएं...जो कभी भी प्रेम का मक़सद नहीं थी।

इन प्रताड़नाओं से प्रेरित होकर प्रेम कब नफ़रत में बदल जाता है पता नहीं चलता...कोसता है उस शख़्स को जिसे दिलो-जान से ज्यादा चाहता था और मोहब्बत को कहता है बदनसीबी। प्रेम हो जाती है उस ओस के बूंद के समान जिसे सूरज की किरणें हर लेती है...और व्यक्ति बन जाता है उन जमीन में लहलहाने वाली दूर्वाओं के समान, जो तरसती है ओस की बूंद को पाने के लिए और तकती है प्यासी दृष्टि से नीलाकाश की ओर। गर किरणों को चाहा होता तो मिलता अनंत प्रकाश और आकाश से होती दिल्लगी तो मिलता असीम आश्रय। लेकिन प्रश्न ये है कि क्या ओस की नमी, कभी किरणों से मिल सकती थी...भले कुछ देर को ही सही या फिर मिल सकती थी आकाश की शुन्यता में जीवन की हरियाली? प्रेम और जीवन का कोई पर्याय दुनिया में नहीं हो सकता। लेकिन इंसान इन दोनों को ही छोड़कर भाग रहा है 'कुछ और' की तलाश में..पर वो 'कुछ और' क्या है ये शायद उसे ही पता नहीं।

प्रसन्नता और प्रताड़नाएं मिलकर प्रेम को जीवन देती है किसी भी एक के साथ चलते हुए प्रेम में कभी भी नवीनता नहीं आ सकती। प्रताड़ना के प्रत्येक आघात में प्रसन्नता  का आभास खोजना ही प्रेम है। रात्रि के अंधकार में ही ऊषा की किरण छुपी होती है...पत्थर के सनम ही मोहब्बत के खुदा होते हैं। भले वो सिर्फ कल्पनाओं में ही क्यों न हों और कल्पना का सौन्दर्य वास्तविकता से अधिक स्थायी होता है। प्रेम की लहरों के टकराने पर कल्पना के पत्थर टूट जाते हैं- कल्पना की जमीन पर प्रेम के पदचिन्ह अमर होते हैं। इन पदचिन्हों की आवाजें आती है गुजरे वक्त की यादों में। कल्पना प्रेम को नया जीवन देती है और यही मृत्यु में भी प्रेम का साथ देगी। जहां कल्पना है वहीं प्रेम होगा और वही होगी कोमलता और सरसता...लेकिन सिर्फ ये आनंद ही नहीं होगा वहां..इनके साथ ही निवास करेगी वेदना, प्रताड़ना।

आज की नवसंस्कृति के समझ से परे है ये विषय...नवसंस्कृति के लिए प्रेम है गुलाब के फूलों में,महंगे ग्रीटिंग कार्डस्, उपहारों और चॉकलेटों में, चुंबन और सेक्स में, वेलेंटाइन की विसेस में...और मैं भी इसी नवसंस्कृति का प्रतिनिधि हूं बस यही कारण है कि प्रेम को समझने की मुश्किल कोशिशों में लगा हूं............अंश


Wednesday, February 6, 2013

कुछ अनुभव की कलम से....

कुछ जिंदगी के अनुभव
   मेरी ज़िन्दगी के कडवे मिज़ाज, हालातों की बेरुखी और कई बार दूनियादारी की कम समझ होने के साथ ज़ज्बाती होने की जो सज़ा मुकर्रर की गई है उसी का फलसफा यहाँ हिस्सों मे पेश कर रहा हूँ यह मेरी शाश्वत भटकन का प्रतीक है और अपने जैसे किसी की तलाश का परिणाम भी...। ये मेरे द्वारा ईजाद किए गए कोई दिव्य वाक्य नहीं हैं पर जिस किसी के भी कहे गए लफ़्ज हैं उसने यथार्थ के गहन अनुभव से ही इन्हें कहा होगा, मैंने तो बस इन्हें अपनी जिंदगी में साकार होते देखा है। इन्हें मेरे द्वारा किसी व्यक्ति विशेष का चरित्र चित्रण अथवा व्यक्तिगत अनुभव का सारांश न समझा जाए बल्कि इसका अर्थ अधिक व्यापक एवं सम्रग है...मै ऐसा समझता हूँ....।

चलिए शुरु करते हैं-
  1. इस दुनिया में आपके अलावा कोई आपको सुखी नहीं कर सकता और नाही कोई दुखी बना सकता।
  2. समस्या अपना समाधान खुद खोज लेती हैं आपके हाथ सिर्फ सब्र करना होता है समाधान नहीं।
  3. दूनिया मे अपने जैसा कोई और भी होगा ऐसा सोचना सबसे बडी मूर्खता है लोग अपने जैसे प्रतीत होतें है लेकिन होता कोई नही।
  4. ऐसे आदमी से सदैव सावधान रहना चाहिए जिसके पास खोने के लिए कुछ भी न हो।
  5. किसी के लिए अपने सपनों के साथ समझौता किसी हालत मे नही करना चाहिए वरना ज़िन्दगी भर एक कसक बनी रहती है।
  6. 'विश्वास मत करो, संदेह करो' यह दर्शन ज्यादा प्रेक्टिकल है जिसे अक्सर भावुक लोग नकार देते है।
  7. प्यार और परिंदे को खुला छोड़ दीजिए, अगर लौट के आया तो आपका है और नहीं आया तो आपका था ही नहीं।
  8. अपने अतिरिक्त किसी से भी वफा की उम्मीद करना बेमानी है, सबकी अपनी-अपनी मजबूरी होती हैं।
  9. कच्ची भावुकता और परिपक्व संवेदनशीलता मे फर्क करना जितनी जल्दी सीख सको सीख लेना चाहिए वरना आप अक्सर रोते हुए पाए जाते हैं और हालात आप पर हँसते है।
  10. मित्रता के साथ कभी सामूहिक व्यवसायिक प्रयास की सोचना भी मूर्खता है अंत मे न दोस्ती नसीब होती है और न ही कुछ व्यवसायिक काम सिद्द होता है।
  11. इस दुनिया में हर इंसान रिश्तों के तवे पर अपने-अपने स्वार्थ की रोटियां सेंक रहा है फिर वो चाहे मां-बाप हों, भाई-बहन, पत्नि या प्रेमिका।
  12. अक्सर लोग आपका ज्ञान आपसे सीखकर आपके ही सामने बडी ही बेशर्मी के साथ बघार सकने की हिम्मत रखते है सो इसके लिए मानसिक रुप से तैयार रहना चाहिए।
  13. आप किसी के लिए सीढ़ी बन सकते हैं लेकिन मंजिल कभी नही, अक्सर लोग एक पायदान का सहारा लेकर उपर चढ़ जाते हैं और आप जड़तापूर्वक यथास्थान खडे हुए रह जातें है।
  14. रंज, मलाल, अपेक्षा और अधिकारबोध ऐसे भारी भरकम शब्दों को समझने की मैंटल फैकल्टी लोगो के पास होती ही नही है।
  15. रिश्तों मे अपनी जवाबदेही अक्सर कम ही लोग समझ पातें है दोषारोपण बेहद आसान है लेकिन किसी की कमजोरियों के साथ उसका साथ निभाना बहुत मुश्किल काम है।
  16. सफलता सम्बन्धों का फेवीकोल है असफल लोग अक्सर एक साथ नही रह पातें है।
  17. अतीत व्यसन से बडा कोई दूसरा व्यसन दूनिया मे हो ही नही सकता यह आपको रोजाना जिन्दा करता है और रोजाना मारता हैं।
  18. दूनिया की सबसे बडी सच्चाई यही है कि आदमी इस भरी दूनिया में नितांत ही अकेला है, सम्बन्धो का हरा-भरा संसार एक शाश्वत भ्रम है।
  19. दुनिया में इंसान की पहचान कभी उसके स्वतंत्र अस्तित्व और व्यक्तित्व से नहीं होती; बाहरी संयोग, शोहरत और सफलता अनिवार्य आईडी कार्ड है।
  20. आपका कोई भी फैसला कभी गलत नहीं होता, बस कुछ के नतीजे ग़लत निकल आते हैं।
   अभी बस इतना ही और भी बहुत सी बातें है लेकिन अगर मै सभी को लिखुंगा तो आपको लगेगा कि महान लोगों की उक्तियाँ टीप रहा हूँ। यह मेरा तज़रबा है ऐसे ही कुछ तज़रबे आपके भी हो सकते हैं यदि हैं तो अवगत कराएं। अगर आप इनसे कुछ सबक ले सकें तो मुझे खुशी होगी लेकिन यह सच है कि मैं आज तक नही ले पाया हूँ।.........अंश