Sunday, August 11, 2013

दो विरुद्ध ध्रुवों का बेतुका मिलन : चेन्नई एक्सप्रेस

शाहरुख़ खान अभिनीत एवं रोहित शेट्टी निर्देशित बहुप्रतिक्षित फिल्म 'चेन्नई एक्सप्रेस' इस हफ्ते प्रदर्शित हुई। हालांकि किसी तरह की समीक्षा करने लायक इस फिल्म को मैं नहीं समझता लेकिन इन दिनों कई बड़े समीक्षकों तथा आला मीडिया हाउसेस द्वारा इस सामान्य सी फ़िल्म का जिस तरह से महिमामंडन किया जा रहा है वो समझ से बाहर है और यही वजह है कि इसपे कुछ कहने का मन कर रहा है।

बहरहाल, बात करते हैं कि कैसें ये दो विरुद्ध ध्रुवों की फिल्म हैं...रोहित शेट्टी और शाहरुख ख़ान। दोनों ही अलग रचनात्मकता, भिन्न प्रकृति और भिन्न छवि वाले व्यक्ति हैं। यदि हर कोई अपनी सीमाओं में रहकर ही प्रयोगवादी रहे तो वो निरंतर नवीन सृजन जनसमुदाय को दे सकता है पर जब कभी भी उन सीमाओं से बाहर आके पैर पसारने की कोशिश की जाती है तो कुछ उच्च दर्जे के डिब्बों का निर्माण हो जाता है और ऐसे डिब्बों का निर्माण संजय लीला भंसाली ने 'सांवरिया' के रूप में, आशुतोष गोवारीकर ने 'व्हाट्स योर राशि' के रूप में और रामगोपाल वर्मा ने उनकी बहुअपेक्षित 'आग' के रूप में किया है। ये सभी महान् निर्देशक हैं पर जब भी ये अपनी सीमाओं से बाहर आके अति महत्वाकांक्षी हुए, बस तभी खेल बिगड़ गया। हालांकि फिल्म इंडस्ट्री में ऐसे भी नाम है जो अपनी छवि से बाहर निकलकर असीम आकाश की यात्रा करते हैं..जैसे राजकपूर, विमल रॉय और वर्तमान के निर्देशकों में राजकुमार संतोषी तथा अभिनेताओं में अमिताभ बच्चन और आमिर खान। पर असीम आकाश में भी इन्होंने अपने दायरों के पंखों का बखूब लिहाज रखा।

रोहित शेट्टी और शाहरुख ख़ान..दोनों ही अपनी आकांक्षाओं के चलते उत्कृष्टता के सोपानों पे कदम रखना चाहते हैं और दोनों ही अपनी इस हसरत को निश्चित ही पूरा कर लेंगे। गोयाकि चैन्नई एक्सप्रेस व्यवसायिक ज़मीन पे सफल तो ज़रूर होगी पर सार्थकता की उम्मीद करने वाला दर्शक इससे खुद को ठगा हुआ ही महसूस करेगा। 

रोहित शेट्टी की पिछली पाँच फ़िल्में (गोलमाल रिटर्न, ऑल द बेस्ट, गोलमाल-3, सिंघम, बोल-बच्चन) सौ करोड़ के मायावी क्लब में शामिल होने वाली फिल्म रही हैं..और शाहरुख रॉ वन और जब तक है जान में अपने हाथ जलाये बैठे हैं लेकिन इन दो फ़िल्मों से शाहरुख के सितारा सिंहासन को कोई आंच नहीं आती। शाहरुख को एक अदद व्यवसायिक सफलता चाहिए और रोहित शेट्टी को शाहरुख जैसे बड़े नाम के साथ खुद का नाम जोड़ना है क्योंकि फ़िल्म इंडस्ट्री में अपने ग्लैमर को बनाये रखने के लिए और उसे ऊंचा करने के लिये कुछ सितारों की छाया हासिल होना बहुत ज़रुरी है, शाहरुख एक ऐसे ही सितारे हैं। दोनों ध्रुवों की अपनी-अपनी ज़रुरतें और जहाँ भी ज़रुरतें होती हैं वहां समझौता होना लाजमी है..और उसी समझौते का परिणाम है चैन्नई एक्सप्रेस।

शाहरुख का दायरा चोपड़ा और जौहर कैंप का रोमांटिज्म है..वहीं शेट्टी की महारत एक्शन और कॉमेडी के विशुद्ध तड़के हैं। एक्शन और रोहितनुमा कॉमेडी शाहरुख की छवि के प्रतिकूल हैं और ये उनके दायरे के बाहर भी हैं यदि वे ऐसा करने की कोशिश करेंगे तो नितांत बेहुदे लगेंगे और इस फ़िल्म में लगे भी हैं। मसलन ट्रेन के दृश्यों में राक्षसनुमा गुंडों के समक्ष शाहरुख की अतिरेक पूर्ण प्रस्तुति इरिटेट करती हैं वहीं फिल्म के क्लाईमेक्स में उनका अपने से चौगुने डील-डोल वाले विलेन्स से लड़ना हजम नहीं होता। हीरो का चित्रण ऐसा हो कि उसमें दर्शक सहज ही किसी दैवीय शक्ति की कल्पना कर सकें, तो फिर संभावना के बाहर के दृश्यों को झेला जा सकता है जैसा कि 'दबंग' में सलमान को देख और 'सिंघम' में अजय देवगन को देख लगता है..पर शाहरुख को देख ऐसी फीलिंग किंचित मात्र भी नहीं आती..और जब यथार्थ को अनुभूत कराने में सिनेमा असफल हो जाता है तो वह अपने उद्देश्यों से भटक जाता है। इसी तरह रोहित ने शाहरुख की छवि को बनाये रखने के लिए अपने दायरे से बाहर निकल रोमांटिज्म को अपनी फिल्म में शामिल करना चाहा...पर यहाँ भी हम रोमांस की उस अनुभूति को महसूस नहीं कर पाते जैसा कि शाहरुख की 'डीडीएलजे', 'मोहब्बतें', 'कुछ-कुछ होता है', 'वीरजारा' टाइप की फ़िल्मों में महसूस करते हैं। इस तरह इन दोनों ध्रुवों के इस कॉकटेल का स्वाद जरा भी सुकून देने वाला नहीं लगता।

टेलीविज़न पे प्रसारित कॉमेडी सर्कस से चुराए गए संवाद, हास्य पैदा करने के लिये निर्मित घिसी-पिटी परिस्थितियां, लचर संवेदनाएँ, हजम न हो सकने वाला एक्शन और आदर्श की सतही ढंग से स्थापना करने का प्रयास..ये तमाम चीज़ें इस फ़िल्म में हैं और ये इन दोनों निर्देशक-कलाकार को उनके स्तर से नीचे लाने के लिये काफी है। गर इसके बावजूद आला समीक्षक और मीडिया हाउसेस इस फ़िल्म की तारीफों के कसीदे गढ़ रहे हैं तो उनकी निष्पक्षता पे संदेह होता है। 

रोहित की ये फ़िल्म भी निश्चित ही सौ करोड़ के क्लब में शामिल हो जाएगी..पर ये एक सिनेमाई पैकेज से पूरी तरह रहित औसत से भी नीचे की फ़िल्म हैं। अगर ये कमाई कर पा रही है तो उसका कारण इससे जुड़े बड़े नाम हैं...अन्यथा मैंने इससे भी बेहतर कई गुमनाम निर्देशकों की छोटे बजट की फ़िल्में देखी हैं जो बॉक्स ऑफिस पे असफल मानी गई हैं। 

खैर, इसके अलावा यदि बात करें..तो विशाल-शेखर का संगीत उत्तम दर्जे का है और कुछ गाने सुकून देने वाले हैं बैकग्राउंड स्कोर भी अच्छा है। लोकेशंस कमाल की कही जा सकती हैं और उन्हें परदे पे देख वहां जाने को दिल करता है..एक्टिंग के मामले में सिर्फ दीपिका पादुकोण की तारीफ की जा सकती है..जिन्होंने अपनी अभिनय क्षमता में यकीनन एक स्टार जोड़ा है। कुछ दृश्यों में सिनेमेटोग्राफी बढ़िया हैं पर कुछ जगह एक औसत फ़िल्म की तरह शॉट्स लिये गये हैं। इन तमाम चीज़ो के अतिरिक्त ये एक चलताऊ और उबाऊ फ़िल्म हैं जो लोग इसे देख वाकई में खूब हंस रहे हैं उन्हें अपने कॉमिक सेंस की समीक्षा करना चाहिये।

हमने पूरे तीन घंटे तक महंगी टिकट लिये जाने के चलते खुद को इस फिल्म से प्रताड़ित किया..इन तीन घंटों में कुछ अच्छा देखने को मिला तो वो था 'कृश' और 'सत्याग्रह' का ट्रेलर। उम्मीद है ये दोनों फ़िल्में अपने भव्यता के आभामण्डल से हमें ठगेंगी नहीं..जैसाकि चैन्नई एक्सप्रेस ने किया।

17 comments:

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    1. शुक्रिया शालिनी जी...

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  2. तो चलताऊ फिल्म होने वाली है ये ... पर साल में अब एकाधा फिल्में ही आती हैं शाहरुख की तो देख ही लेते हैं ...
    अच्छी समीक्षा है आपकी ...

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    1. धन्यवाद नासवा जी...

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    1. शुक्रिया आपका...

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  4. दरअसल यह दौर शाहरूख और सलमान में घटिया फिल्म दिखाने की प्रतिस्पर्धा का है इनसे इनके मानसिक दिवालियापन का भी पता चलता है। जहाँ तक पैसा कमाने की बात है तमाशबीन अचरज भरी चीजों को देखकर पैसा दे देते हैं लेकिन क्लासिक तो वह होती है जो हमेशा याद रहें, वक्त के साथ सलमान और शाहरूख लोगों को भले ही याद रहें लेकिन उनकी फिल्में शायद ही आने वाली पीढ़ी की जबान में होंगी, इससे उलट आमिर होंगे। बहरहाल पहले ही निश्चय था कि इस फिल्म को नहीं देखना है आपकी समीक्षा पढ़ने के बाद यह दृढ़ निश्चय में तब्दील हो गया।

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    1. सही कहा सौरभ जी..धन्यवाद इस प्रतिक्रिया के लिये।।।

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  5. Thanks Ankur for such a nice review!!
    I am waiting for satyagrah.

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  6. सही जानकारी मिली धन्यवाद.... स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

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    1. धन्यवाद आपका...

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  7. satya aur sundar apni-apni pasand bhi hai koi acchha batata hai to koi bakwaas waise maine abhi dekhi nahin hai ...

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    1. आप देखेंगी तो बेहतर ढंग से खुद समझ जायेंगी..वैसे फिल्म के प्रचार और कमाई के आंकड़ों के झांसे में मत आईएगा।।।

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  8. Dear Mr. Ankur Jain, Pls note that this movie is directed by Rohit Shetty who is very famous for a Masala Pack Movie. I have seen this movie and I loved it. Its really nice, funny & timepass movie. I think that you don't love to write good about SRK. I don't mind. It depends on personal perceptions.

    On the other side you will never write anything wrong about Akshay, Ajay, Abhishek, Hritik & Amitabh as I know that you are a great fan of them. No issues.

    I would ask you one question that why should SRK not produce Masala or funny movies ? He also want to be a part of all kind of categories.

    All commentors, watch the movie. It is as good as Golmaal series. Difference is that in Golmaal there were many actors but here the movie is ruled by fantastic acting of SRK & Deepika.

    It has broken all records of Income.

    Well done Red Chillies & Weel done Rohit Shetty & Team.

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    1. आपसे फोन पे इस बारे में विस्तृत बात हो चुकी है और मुझे उम्मीद है आप समझ गये होंगे।।।

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  9. मैं आपसे सहमत हूं ।

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