Wednesday, April 23, 2014

काश! प्रेम में सिर्फ 'टू स्टेट्स' ही होते....

हिन्दुस्तान एक ऐसा देश, जहाँ प्रेम की आध्यात्मिकता और पारलौकिकता को बताने वाला सबसे ज्यादा साहित्य लिखा। लेकिन प्रेम की स्वतंत्रता को सबसे अधिक बाधा भी हमारे देश ने पहुंचाई और उन बाधाओं के चलते अब अपने देश में भी प्रेम पर पाश्चात्य कलेवर चढ़ चुका है और अब यहां स्त्री-पुरुष पहले हमबिस्तर होते हैं फिर आईलवयू बोला जाता है। लेकिन फिर भी कुछ मोहब्बती जज़्बात जस के तस इस बदले कलेवर में करवट बदल रहे हैं, इंसान की रूह में चस्पा होकर। समाज़-रिवाज, घर-परिवार, रिश्ते-नाते, रीति-नीति ये सब वो स्टेट्स या क्षेत्र थे जिनमें इंसान एक सुखद संरक्षण के साथ अपने जज़्बातों की मौलिकता को जिंदा रखते हुए जीना चाहता था..पर सदियों से ये वो स्टेट्स बने हुए हैं जो अहसासों की आजादी पर सरहदें बनाते हैं...और उन सरहदों में घुट रहा है इश्क़ और घुट रही है व्यक्ति की मौलिक आजादी।

चेतन भगत के उपन्यास पर बनी फ़िल्म टू स्टेट्स देखी। लेकिन आगे कुछ लिखने से पहले ये बता देना चाहता हूं कि मैं यहां फ़िल्म की समीक्षा नहीं कर रहा हूं..क्योंकि उसपे पहले ही काफी कुछ कहा जा रहा है और ये फ़िल्म सौ करोड़ी क्लब में भी शामिल होने जा रही है। हालांकि मुझे फ़िल्म के कुछ हिस्से और आलिया भट्ट-अर्जुन कपूर के अभिनय के अलावा फिल्म औसत ही लगी...तो इस तरह मेरी दिलचस्पी न तो फ़िल्म पर कुछ कहने की है और न ही टू-स्टेट्स उपन्यास पे..क्योंकि चेतन भगत की लेखन शैली मेरी प्रकृति से मेच नहीं करती। मैं यहां हर हिन्दुस्तानी प्रेम कहानी में छुपे उन स्टेटस की बात करना चाहता हूँ जिन स्टेटस ने दिल की एक धरती पर कई सरहदें बनाकर हमें अलग-अलग दायरों में रहने पर मजबूर कर दिया।

भारत देश की विविधता ने सबसे ज्यादा क़त्ल यदि किसी का किया है तो वो मोहब्बत ही है...प्रेम के देवताओं की पूजा करने के बावजूद हमनें इंसान में उस रूप को पनपने की तमाम संभावनाओं को ख़त्म कर दिया। इन दिखावटी रस्मों और विविधताओं में कई दूसरी चीज़ें सर्वप्रमुख हो गई जबकि प्रेम को हासिये पे फेंक कर तड़पने के लिये छोड़ दिया गया। यदि इंसान द्वारा निर्मित सरहदों में बसे परिक्षेत्र को गिनाने लग जाये तो पता नहीं कितने स्टेट्स बन खड़े होंगे और अब प्रेम के साथ इस बात को भी तय करना होगा कि इस मोहब्बत का जन्म एक ही स्टेट्स में हुआ है या नहीं...और यदि नहीं हुआ है तो ज़बरदस्ती उसी स्टेट्स में प्रेम पैदा करना होगा। ऐसे में कौन इस दुनिया को समझाये कि प्रेम न बाड़े उपजे, प्रेम न हाट बिकाय। राजा-परजा जेहि रुचे सिर दे सोई ले जाय.. 

स्टेट्स। धर्म-कर्म, जात-पात की स्टेटस, रुपया-पैसा, अमीरी-गरीबी की स्टेट्स, भाषा-बोली, रीति-रिवाज़ों की स्टेट्स, खान-पान, रहन-सहन, पद-प्रतिष्ठा की स्टेट्स, शक्ल-सूरत, विचार-मान्यता, पसंद-नापसंद की स्टेट्स, क्षेत्र-गोत्र, कर्म-काण्ड, पूजा-विधान, मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारों की स्टेट्स, समाज और मिजाज की स्टेट्स, नौकरी-कारोबार की स्टेट्स और क्या-क्या बताऊं, ऐसी न जाने कितनी स्टेट्स जिन स्टेट्स को तोड़कर प्रेम खुले आसमान में आजाद घूमने की मांग करता है..पर इन स्टेट्स के पहरेदार प्रेम के उन पंछियों को जकड़कर वापस उन्हीं सरहदों में कैद कर देते हैं। लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि इस अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाने के लिये किसी मानवाधिकार आयोग का गठन नहीं किया गया है..क्योंकि अधिकतम अत्याचार इतने इमोशनली ढंग से किया जाते हैं कि प्रेम का पंछी मरते हुए भी ये समझता है कि वो त्याग कर रहा है। जबकि सच्चाई ये है कि इन तमाम स्टेट्स के पीछे समाज की एकमात्र मान्यता व्यक्ति की स्वाभाविक आजादी की मांग को दबाना है और प्रेम सरीकी आजादी के लिये बगावत और किसी जज़्बात में नहीं हो सकती। बस इसलिये हमेशा से वेद-पुराण, रस्मों-रिवाज और रिश्तों का वास्ता देकर उस आजादी का गला घोंटना ही इस समाज की फितरत बन चुका है। विधि-विधान के साथ किये गये इस मर्डर की कीमत सिर्फ वो इंसान चुकाता है जिसके जज़्बात का क़त्ल हुआ है और इस गुनाह में शामिल परिवार-समाज का हर इंसान बाइज्ज़त बरी कर दिया जाता है।

इन दायरों के बीच ऐसा लगता है मानो इस दुनिया में प्रेम से बड़ा गुनाह और कोई नहीं है। सिर्फ प्यार होना, सिर्फ किसी का अच्छा इंसान होना, सिर्फ एक निश्छल दिल होना इस दुनिया के लिये काफी नहीं है...तो जब ये सभी भले जज़्बात अच्छे नहीं है तो फिर भला क्युं अच्छाई की सीख दी जाती हैं। आज जिन वजहों से प्रेम महज़ वासना में बदला है उसका सबसे बड़ा कारण समाज द्वारा बनाये गये यही स्टेट्स हैं। इन स्टेट्स के कारण ही इंसान बड़ा प्रेक्टिकल हो गया है..और वो प्रेम को बस खाने-खेलने की चीज़ समझता है क्योंकि उसने अपने दिमाग में अच्छे से ये बात बैठा ली है कि इस प्रेम का कोई भविष्य नहीं है इसलिय जब तक मिल रहा है सिर्फ इंज्वाय करो। अब इस इंज्वाय को यहाँ परिभाषित करने की ज़रूरत मैं नहीं समझता क्योंकि परिदृष्य हम सबके सामने है...

टू स्टेट्स..काश बस टू स्टेट्स ही होते। तो कितना आसान होता, इस एक सरहद को पार कर अपने प्यार को पा लेना...पर अफसोस ऐसा नहीं है। जुदाई को दिल में लिये हमें जीना है..और अाप ज्यादा ही इमोशनल होके यदि वहीं अटके हुए हैं तो आप कमज़ोर है..आप यदि आगे नहीं बढ़ रहे हैं तो आप बेवकूफ है और यदि खुद को कमज़ोर और बेवकूफ साबित नहीं कराना चाहते तो आप झूठे बन जाईये, आप बेशर्म और खुदगर्ज हो जाईये क्योंकि सिर्फ खुदगर्जी में ही प्रेम को भुलाया जा सकता है...और यदि ऐसा नहीं कर सकते तो बस एक कसक लिये सिर्फ जीते रहिये गुजरते हर दिन के साथ, आती-जाती हर श्वांस के साथ। ये बात अलग है कि उन दिनों और उन श्वांसो पर अब कोई मायने नहीं तैरा करते। काश! सिर्फ टू स्टेट्स होते..या फिर इन सरहदों को तोड़ने के लिये काश! हम थोड़ी हिम्मत जुटा पाते...काश! ये दुनिया थोड़ा तो प्यार को समझती..काश! हमें कभी प्यार ही न होता.....काश....काशश्श्श्श्श्....................... 

20 comments:

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    1. आभार आपका...

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  2. काश........
    मगर ये हो न सका....सदियों से मोहब्बत को ऐसी कई सलाखों से जकड हुआ है समाज के ठेकेदारों ने...
    nice post ankur !!
    और इसमें कोई तुम्हारा दर्द तो नहीं छुपा :-)

    अनु

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    1. दर्द तो कहीं न कहीं हर किसी के दिल में रहता है अनुजी... :) पर उस दर्द से बाहर निकल ही सृजन हो सकता है..इसलिए फिलहाल सब ठीक है...शुक्रिया प्रतिक्रिया के लिये।।।

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  3. ज़िन्दगी ढेरों काश में दबी हुई सिसकती है, और हम फिर से काश बोल कर चुप हो जाते है. स्टेट्स दो भले हो प्रेम में मन का स्टेटस एक होना लाजिमी है. बहुत अच्छा चिंतन, बधाई.

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    1. आभार शबनम जी...यदि ज़िंदगी में काश न हो ज़िंदगी की रुमानियत ख़त्म हो जायेगी।।।

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  4. काश...ऐसi होतi ........बहुत अच्छा.....

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  5. Replies
    1. धन्यवाद ताबिश भाई।।।

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  6. काश .... यूँ भी इन बंधनों से हासिल ही क्या हुआ है ..... सार्थक विचार लिए पोस्ट....

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    1. सही कहा मोनिका जी..शुक्रिया प्रतिक्रिया के लिये।।।

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  7. क्या ये काश हमें बंधन मुक्त और समाज मुक्त भी करता हैं | जिस तरह एक साथ पढ़ते हुए बच्चे ...खुलेपन के साथ एक दूसरे के साथ रह रहें है ....क्या ये ही दिखाना अब हमारी मूवीस का काम रह गया है ?

    इस फिल्म के आधे भाग में सिवाए खुलेपन के कुछ नहीं था| प्यार का एहसास तो बाद में हुआ ओर सबसे बाद में परिवार की याद आई |अपना समाज, अपने बच्चे ....अपनी सोच किस दिशा में बढ़ रही है ....इसकी अब किसी को चिंता ही नहीं है .........

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    1. अंजु जी आपकी बात विचारणीय है...

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  8. सारगर्भित आलेख ....

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  9. प्रेम गली अति साँकरी, ता में दुई ना समाय।
    हम सब पृथ्वी वासी एक ही, 'प्रेम नगरी' के वासी क्यों नहीं हो सकते?

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    1. अति उत्तम...

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  10. मैने भी अभी देखी थी यह फिल्म।
    Book भी पडी़ थी।
    आज चेतन भगत वो लिखता है जो लोग पढ़ना या देखना चाहते है
    मै प्यार के बारे मै अनाड़ी हूँ लेकिन प्यार ऐसा नही
    होता होगा ये जानता हूँ

    मेरा आपसे निवेदन है कि आप चेतन भगत की नई book 'one indian girl' पर भी अपने विचार व्यक्त करें and your article is very nice good mind bloing

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  11. मैने भी अभी देखी थी यह फिल्म।
    Book भी पडी़ थी।
    आज चेतन भगत वो लिखता है जो लोग पढ़ना या देखना चाहते है
    मै प्यार के बारे मै अनाड़ी हूँ लेकिन प्यार ऐसा नही
    होता होगा ये जानता हूँ

    मेरा आपसे निवेदन है कि आप चेतन भगत की नई book 'one indian girl' पर भी अपने विचार व्यक्त करें and your article is very nice good mind bloing

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