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Sunday, July 31, 2022

प्रेमचंद : कलम से रुपहले परदे तक

 (मुन्शी प्रेमचंद की 142वी जयंती पर विशेष, पीपल्स समाचार पत्र के संपादकीय पर भी प्रकाशित)


     “सिनेमा की शक्ति को सब पहचानते हैं, परन्तु साहित्यिक अहंकार और संकुचित सोच के कारण, इस नये माध्यम को आत्मसात करने से घबराते हैं - वे ये भूल जाते हैं कि सम्यक्-सांस्कृतिक परिवर्तन के लिए शक्तिशाली माध्यमों की जरूरत होती है”।                                             - कमलेश्वर



      आज से तकरीबन दो दशक पहले प्रसिद्ध साहित्येकार और पटकथा लेखक कमलेश्वर की ये युक्ति, वर्तमान दौर में सिनेमा और साहित्य के रिश्ते को भी बतलाती है और दोनों माध्यमों के बीच उपस्थित अंतर्द्वंद का भी चित्रण करती है। सिनेमा और साहित्य दोनों ही शिक्षा, जागरुकता और मनोरंजन के माध्यम है बस फर्क ये है कि सिनेमा संप्रेषण का एक नव्योत्तर माध्यम है और साहित्य एक पारंपरिक माध्यम। हर नवीन माध्यम को, पुरातन माध्यम के समर्थकों से आलोचना झेलनी ही पड़ती हैं तो वहीं आधुनिक माध्यम, प्राचीन माध्यम को हासिये पर धकेलता हुआ आगे बढ़ता है। लेकिन इन आलोचनाओं और प्रतिस्पर्धाओं के बावजूद दोनों माध्यम अपनी-अपनी उपयोगिता को बरकरार रखते हुए तथा एकदूसरे पर अपना-अपना प्रभाव छोड़ते हुए आगे बढ़ते हैं।

     सिनेमा ने भी अपनी विकास यात्रा के लिये साहित्य का अवलंबन लिया और उसे अपने में समाहित अंतर्वस्तु, साहित्य की चौखट पे ही मिली। जब साहित्य पर सिनेमा की ये घुसपैठ शुरु हुई तो साहित्यकार भला कहाँ चुप रहने वाले थे और आलोचना के इस दौर में खुद मुंशी प्रेमचंद ने ही सिनेमा पर निराशवादी प्रतिक्रिया व्यक्त की- “साहित्य ऊंचे भाव, पवित्र भाव अथवा सुंदरम् को सामने लाता है। पारसी ड्रामे, होली, कजरी, बारहमासी चित्रपट आदि साहित्य नहीं हैं क्योंकि इन्हें सुरूचि से कोई प्रयोजन नहीं है। सिनेमा में वही तमाशे खूब चलते हैं जिनमें निम्न भावनाओं की विशेष तृप्ति हो। साहित्य दूध होने का दावेदार है, जबकि सिनेमा ताड़ी या शराब की भूख को शांत करता है। साहित्य जनरूचि का पथ-प्रदर्शक होता है, उसका अनुगामी नहीं, सिनेमा जनरूचि के पीछे चलता है।”।

      शुरुआती दौर में सिनेमा की आलोचना करने वाला यही उपन्यास सम्राट, सिनेमा का सर्वाधिक लोकप्रिय साहित्यकार बना। हिन्दी साहित्य में सबसे ज्यादा फ़िल्में प्रेमचंद की रचनाओं पर ही बनी और ये स्वाभाविक भी है क्योंकि प्रेमचंद-सा ख्यातिप्राप्त और प्रासांगिक रचनाकार दूसरा कोई हिन्दी साहित्य में हुआ भी नहीं है। जब बंबई में बोलती फ़िल्मों का दौर शुरु हुआ तो प्रेमचंद ने खुद बंबई का रुख किया, पर इस माया नगरी और व्यवसायिक फिल्म इंडस्ट्री में वे असफल ही हुए। मोहन भावनानी की कंपनी अजंता सिनेटोन के प्रस्ताव पर 1934 में आठ हजार रुपए सालाना के अच्छे-खासे अनुबंध पर वे मुंबई पहुंचे। प्रेमचंद की कहानी पर मोहन भावनानी ने 1934 में ‘मजदूर ‘ बनाई। प्रेमचंद का क्रांतिकारी तेवर उसमें इतना प्रभावी था कि फिल्म सेंसर के हत्थे चढ़ गई। मुंबई प्रांत; पंजाब/लाहौर; फिर दिल्ली- फिल्म पर प्रतिबंध लगते गए। उसमें ‘श्रमिक अशांति’ का खतरा देखा गया। फिल्म की विधा तब नई थी, समाज में फिल्म का असर तब निरक्षर समुदाय तक भी पुरजोर पहुंचता था। अंतत: ‘मजदूर ‘ सेंसर से पास हुई, पर चली नहीं। हां, उसके असर के बारे में कहते हैं कि प्रेमचंद ने अपने सरस्वती प्रेस के मजदूरों को ‘जागृत’ कर दिया था। वहां के श्रमिकों में असंतोष भड़क गया। साहित्य की तरह सिनेमा में भी प्रेमचंद का आगाज़ क्रांतिकारी ढंग से हुआ। इस फिल्म में न सिर्फ मुंशीजी ने संवाद लिखे, बल्कि एक संक्षिप्त किरदार भी निभाया। सिल्वर स्क्रीन पर यह संभवतः प्रेमचंद की इकलौती प्रस्तुति थी।  

     इस फिल्म की असफलता के बाद प्रेमचंद का संचार की इस विधा से मोहभंग हो गया। उन्होंने कहा- “मैं जिन इरादों से आया था, उनमें से एक भी पूरा होता नजर नहीं आता। ये प्रोड्यूसर जिस ढंग की कहानियां बनाते आए हैं, उसकी लीक से जौ भर भी नहीं हट सकते। ‘वल्गैरिटी’ को ये ‘एंटरटेनमेंट बैल्यू’ कहते हैं।अभी वह ज़माना बहुत दूर है, जब सिनेमा और साहित्य का एक रूप होगा। लोक-रुचि जब इतनी परिष्कृत हो जायगी कि वह नीचे ले जाने वाली चीज़ों से घृणा करेगी, तभी सिनेमा में साहित्य की सुरुचि दिखाई पड़ सकती है”। 1934 में ही प्रेमचंद के उपन्यास सेवासदन  (जो पहले उर्दू में 'बाजारे-हुस्न' नाम से लिखा गया था) पर नानूभाई वकील ने फिल्म बनाई। यह फिल्म बिना प्रेमचंद की मर्जी के उनकी रचना से खिलवाड़ करके प्रस्तुत हुई थी। प्रेमचंद उससे उखड़ गए थे। हिंदी साहित्य में लेखक और फिल्मकार की तकरार की कहानी वहीं से प्रारंभ हुई मानी जा सकती है। हालांकि कुछ साल बाद इसी उपन्यास पर तमिल में के. सुब्रमण्यम ने जब फिल्म बनाई, तो प्रेमचंद उससे शायद संतुष्ट हुए हों, क्योंकि यह एक सफल फिल्म थी। अगले वर्ष उनके उपन्यास नवजीवन  पर फिल्म बनी, यह भी एक सार्थक फिल्म मानी गई। सिनेमा में उपन्यास सम्राट के सक्रिय योगदान की कहानी बस यही तक थी। 1936 में उनका निधन हो गया। लेकिन उनके साहित्य का दामन सिनेमा ने कभी नहीं छोड़ा।

     निधन के बाद उनकी कहानी पर स्वामी फिल्म बनी जो कि  औरत की फितरत और तिरिया-चरित्र नामक कहानियों पर आधारित थी। इसके अलावा उनकी प्रसिद्ध कहानी दो बैलों की कथा पर भी 1959 में कृष्ण चोपड़ा के निर्देशन में हीरा-मोती नामक फिल्म बनी। जिसकी काफी सराहना हुई।

     साठ के दशक में सिनेमा को प्रेमचंद की रचनाओं पे कुछ नायाब कृतियाँ देखने को मिली। उनके लोकप्रिय उपन्यास गोदान और गबन पर इसी नाम से 1963 और 1966 में फिल्में प्रदर्शित हुई। गोदान का निर्देशन त्रिलोक जेटली ने किया था। इस फिल्म में राजकुमार और महमूद जैसे निष्णांत कलाकारों ने अभिनय किया। गोदान की लोकप्रियता का आलम यह रहा कि दूरदर्शन ने इस उपन्यास पर 26 एपिसोड के एक धारावाहिक का भी निर्माण किया जिसका निर्देशन गुलजार द्वारा किया गया। गोदान के अलावा गबन भी हिन्दी सिनेमा की एक चर्चित फिल्म है जिसका निर्देशन ऋषिकेष मुखर्जी द्वारा किया गया तथा इसमें सुनील दत्त, साधना और मुमताज जैसे कलाकारों ने मुख्य भुमिका अदा की।

     हिन्दी सिनेमा के इतर क्षेत्रीय सिनेमा में भी प्रेमचंद एक चर्चित साहित्यिक हस्ती रहे। प्रायः विभिन्न साहित्यिक कृतियों पर फिल्म निर्माण के लिये पहचाने जाने वाले भारतीय सिनेमा के वरिष्ठतम, सुप्रसिद्ध फिल्मकार सत्यजीत रे ने, प्रेमचंद की कहानी ‘सद्गति’ पर इसी नाम से फिल्म का निर्माण किया। जिसे राष्ट्रीय अवार्ड से नवाजा गया। बंगाली सिनेमा के अलावा 1977 में मृणाल सेन ने प्रेमचंद की कहानी कफ़न पर आधारित ‘ओका ऊरी कथा’ नाम से एक तेलुगु फ़िल्म बनाई, जिसको सर्वश्रेष्ठ तेलुगु फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ।

     सिनेमा के अध्यापक की तरह जाने वाले सत्यजीत रे ने हिन्दी में सिर्फ एक फिल्म का निर्माण किया- ‘शतरंज के खिलाड़ी’। ये भी प्रेमचंद की कहानी पर ही आधारित थी। कहा जाता है प्रेमचंद के अंतरंग को जितने अच्छे से सत्यजीत रॉय ने समझा है उतना कोई और फिल्मकार नहीं समझ पाया। प्रेमचंद की कथाओं के भावों और संवेदनाओं को पूर्ण न्याय के साथ रॉय ने अपनी फिल्मों में प्रस्तुत किया है।

     इन तमाम फिल्मों और कई टेली धारावाहिकों के अलावा, आज भी प्रेमचंद के साहित्य का अकूट भंडार फिल्मकारों को कई कथानक उपलब्ध करा सकता है। ये साहित्य आज भी सिनेमा से अछूता है। इस साहित्य पर सामाजिक सोद्देश्यता से भरपूर सार्थक सिनेमा का निर्माण किया जा सकता है किंतु आज के इस सायबर युग में किसे फुरसत है जो प्रेमचंद के साहित्य को टटोले। यही वजह है कि हमारा सिनेमा, विदेशी और दक्षिण भारतीय फिल्मों के मोहपाश में उलझा हुआ है। उन मसाला फिल्मों का ही हिन्दी कलेवर तैयार कर हमारे फिल्मकार महान् निर्देशक होने का राग आलापे हुए हैं और अच्छी कथाएं न मिलने का रोना रो रहे हैं। सिनेमा की गरिमा को आसमानी ऊंचाई देने के लिये हमें सार्थक साहित्य की शरण में जाना ही होगा और इस रास्ते में हमारी मुलाकात प्रेमचंद से न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता।

                                      

Wednesday, May 4, 2016

कालीन के नीचे छिपी सार्थकता के "फैन" बनाम चौंधियाती सफलता का "सन्नाटा"

बीती तीन मई को हिन्दी सिनेमा ने अपने एक सौ तीन वर्ष पूरे कर लिये हैं। एक सौ तीन वर्ष के हिन्दी सिनेमा में सफलता का प्रतिशत भी महज तीन ही होगा और सार्थक फिल्में भी बमुश्किल तीन फीसदी ही होंगी। इनमें ऐसी फिल्में जो सफल और सार्थक दोनों ही हों वे तो एक-आध प्रतिशत ही ढूंढने से मिल पायेंगी। लेकिन इन एक-दो फीसदी फिल्मों में ही सिनेमा की श्वांसे हैं और इन्हीं की दम पर सार्थक सिनेमा का हिरण व्यवसायिकता के जंगल में दौड़ पा रहा है।

सिनेमा के जनक दादा साहेब फाल्के कहा करते थे कि "यकीनन सिनेमा मनोरंजन का एक सशक्त माध्यम हैं लेकिन इसका उपयोग ज्ञानवर्धन और सामाजिक सरोकार के लिये भी किया जा सकता है" पर आज इस सिनेमा की सफलता और उद्देश्यों को नापने का एक मात्र जरिया इसकी व्यवसायिकता है। फिल्में रिलीज होने के कुछ घंटों बाद ही ये अटकलें शुरु हो जाती हैं कि अमुक फिल्म सौ करोड़ कमा पायेगी या नहीं...और कुछ घंटों बाद ही फिल्म की कमाई के ब्यौरों के आधार पर उसे सफल या असफल करार दे दिया जाता है। व्यवसायिकता के इस व्यामोह ने सिनेमा से कलापक्ष को बाहर निकाल फेंका है और उसे महज एक दुकान में तब्दील कर दिया है।

पिछले दो-तीन हफ्तों में रिलीज़ हुई कुछ फिल्में इस बात का बखूब उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। जय गंगाजल, फैन, बाग़ी जैसी फ़िल्में अपनी चमक का झूठा आभामंडल रचकर पहले तीन दिन में तीस-चालीस करोड़ का व्यवसाय करती हैं और अपनी भव्यता के फरेब़ में दर्शक को ठगती है जिससे दर्शक कालीन के नीचे खामोशी से श्वांस ले रहीं कई सार्थक फिल्में देखने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाता। यही वजह है कि अलीगढ़, जुबान, निल बटे सन्नाटा जैसी फिल्में दर्शकों के अभाव में एक सप्ताह भी सिनेमाघरों में टिकी नहीं रह पाती। बड़े बजट की सितारा सज्जित फिल्मों से इन सार्थक फिल्मों को इस मायने में भी नुकसान है कि प्रायः मल्टीप्लेक्स में बड़ी बजट फिल्मों के साथ लगी इन ऑफबीट फिल्मों के लिये सिनेमाघरों में टिकट दरें कम नहीं की जातीं और इन्हें भी बहुसितारा-बड़ी फिल्मों की टिकट दरों पर ही देखना होता है। जिससे आम दर्शक डेढ़ सौ, दो सौ रुपये खर्च कर इन फिल्मों को देखने का रिस्क नहीं लेना चाहता।

ऐसा सिर्फ इस वर्ष की इन कुछेक फिल्मों के साथ ही नहीं हुआ है इससे पहले भी डोर, उड़ान, दसविदानिया, चलो दिल्ली, लंचबॉक्स, इंग्लिश-विंग्लिश, बीए पास, क्वीन, मसान जैसी फिल्मों को भी अपेक्षाकृत सफलता नहीं मिली। मजेदार बात ये भी है कि उपरोक्त वर्णित इन फिल्मों की सफलता के बाद इनके निर्देशकों को फिल्म इंडस्ट्री ने नोटिस किया...इन फिल्मों को कई अवार्ड समारोहों में सराहा गया... बाद में इन तमाम फिल्मों के निर्देशकों को उनकी अगली फिल्म के लिये पिछली फिल्मों के दम पर बड़ा स्टार्ट मिला लेकिन उनमें से कई फिल्में एक बार फिर दर्शकों की उम्मीदों पर खरी न उतर सकीं। इसका सबसे बड़ा कारण यही रहा कि पहले वाली फिल्मों की सार्थकता को गौढ़ कर इन निर्देशकों ने अपनी अगली फिल्म को मसाला मनोरंजन के साथ पेश किया। इस व्यावसायिकता के आग्रह ने भले इन फिल्मों पर रुपयों की बरसात करवाई हो पर सार्थकता का पिपासु दर्शक एक बार फिर छला गया। इसके उदाहरण हमने बीते वर्ष काफी देखे जब पिछली फिल्मों से उम्मीद जगाने वाले निर्देशकों ने ऑल द बेस्ट, शानदार, बॉम्बे वेलवेट जैसे डिब्बों का निर्माण किया।

ये सारा दुख हालिया रिलीज़ 'निल बटे सन्नाटा' फिल्म में सूने पड़े सिनेमाघरों को देख पैदा हुआ है। बॉलीवुड की मौलिकता और इसके अपने खालिश अंदाज की प्रतिनिधि ये फिल्म, विदेशी फैक्ट्री के चुराये मसाला मनोरंजन "बाग़ी" से कमाई के मामले में पिछड़ गई। इस फिल्म को कई शहरों में सिनेमाघर ही नसीब नहीं हुए और जहाँ नसीब हुए भी वहां इसे दो-तीन दिन में ही या तो अपने शो कम करने पड़े या बाहर ही निकल जाना पड़ा। इस तरह से इन ऑफबीट फिल्मों का व्यवसायिकता में पिछड़ जाना कई दूसरे मायनों में भी घातक होता है। इससे इनके निर्देशक हतोत्साहित होते हैं और निर्माता भी ऐसी फिल्मों पर दाव नहीं खेलना चाहते। जिससे हम सिनेमा में सार्थक परंपरा को पनपने से पहले ही ख़त्म कर देते हैं।

बहरहाल, इस तमाम नकारात्मकता के बावजूद वे लोग बधाई के पात्र हैं जो इस रचनात्मकता के लिये अवकाश रखते हैं। 'निल बटे सन्नाटा' आज से सालों बाद भी हिन्दी सिनेमा का एक अहम् दस्तावेज माना जायेगा जबकि 'फैन' या 'बाग़ी' पर वक्त की धूल ज़रूर जमा होगी। नवोदित निर्देशक अश्विनी अय्यर तिवारी में अपार संभावना हैं उम्मीद करेंगे कि वे इस सार्थकता को आगे भी लेकर जायें। इस फिल्म के निर्माता और रांझणा, तनु वेड्स मनु जैसी फिल्मों के निर्देशक आनंद एल राय को भी बधाई जिन्होंने ऐसी फिल्म के निर्माण में सहयोग किया। साथ ही स्वरा भास्कर, रत्ना पाठक, पंकज त्रिपाठी को भी उनके शानदार अभिनय के लिये बधाई तथा ऐसी फिल्म के चुनाव के लिये साधुवाद।

एक बात समझना बहुत जरुरी है कि भारतीय सिनेमा प्रेम रतन धन पायो, दिलवाले, फैन या सिंह इस किंग टाइप अरबी क्लब (सौ करोड़ का क्लब) की फिल्मों से जीवंत नहीं रह सकता...इसे मसान, लंचबॉक्स और निल बटे सन्नाटा जैसी फिल्में ही ऑक्सीजन देती हैं और यही इसे जिंदा रखे हुए हैं।

Saturday, January 23, 2016

पैसे और प्रतिभा का सर्वोत्तम उपयोग...कि वो दूसरों के काम आये : एयरलिफ्ट

इन्फोसिस के संस्थापक एन. आर. नारायणमूर्ति ने अपनी पुस्तक में एक बेहद सुंदर बात कही है कि 'इस पूरे विश्व में आप अपने पैसे और हुनर का उपयोग दूसरों की मदद करने से बेहतर किसी दूसरी जगह नहीं कर सकते।' यदि आप दूसरों के मुकाबले ज्यादा भाग्यशाली है तथा पद, प्रतिष्ठा, पैसे और प्रतिभा में दूसरों से आगे हैं तो ये सब आपको सिर्फ और सिर्फ ऐसे उन तमाम लोगों के काम आने के लिये मिले हैं जो अपेक्षाकृत आपसे कम किस्मतवाले और कम संसाधन संपन्न है। सामर्थ्य होने के बाद प्राप्त जिम्मेदारी और सेवा की अनुभूति क्या होती है ये जानना है तो एयरलिफ्ट देखिये। 1990 में इराक और कुवैत युद्ध के दौरान हुए दुनिया के सबसे बड़े रेस्क्यु ऑपरेशन पर आधारित इस फिल्म में यकीनन कई काल्पनिक घटनाओं और पात्रों का समावेश किया है लेकिन जिस उद्देश्य और कथ्य को लेकर ये फिल्म आगे बढ़ती है वो सिनेमा माध्यम की सार्थकता और सशक्तता को अभिव्यक्त करती है।

हम अपने घरों में बैठ जब कभी भी सरकार द्वारा चलाये गये ऐसे रेस्क्यु ऑपरेशन के बारे में पढ़ते हैं या संकट में घिरे प्रवासी भारतीयों की खबरें टीवी पर देखते हैं तो कभी भी उन हालातों की गंभीरता को महसूस नहीं कर पाते लेकिन निर्देशक  राजा कृष्ण मेनन ने जिस संजीदगी और संवेदनशीलता के साथ इस फिल्म के दृश्यों को पिरोया है और उनमें जिस तरह से सिनेमाई बिम्बों का प्रयोग किया है वो हमें इन हालातों में फंसे होने का सा अहसास कराते हैं। एक तरह से देखा जाये तो यथार्थपरक घटनाओं पर बनी फिल्मों में ज्यादा नाटकीयता भरने की संभावना निर्देशक के पास नहीं होती...क्योंकि इन फिल्मों का क्लाइमेक्स पहले से जाहिर होता है। ऐसे में कॉन्फ्लिक्ट और रिसोल्युशन को दिखाने के लिये नूतन बिम्बों का इस्तेमाल ही निर्देशकीय कौशल को दिखाता है। फिल्म के अाखिरी मिनटों में प्रस्तुत दृश्य में जब रेस्क्यु कैंप के बाहर निर्धारित भारतीय प्रतिनिधि द्वारा भारतीय तिरंगे को लहराया जाता है तो यह दृश्य दर्शकों में चरम आवेश और राष्ट्रभावना का संचार करता है...इस दृश्य को ही क्लाइमेक्स और इसे ही फिल्म के कॉन्फ्लिक्ट का रिसोल्युशन निर्देशक ने बना दिया है। 

फिल्म में प्रस्तुत पात्र  रंजीत कात्याल सहित कई दूसरे लोगों के यथार्थ में होने पर निश्चित ही कई सवाल खड़े हो सकते हैं। यकीनन निर्देशक ने इन पात्रों को कल्पना की जमीं पर ही रूपांकित किया है और घटना के सिनेमाई प्रस्तुतिकरण के लिये इतनी आजादी हर निर्देशक के पास होती है लेकिन करीब 1 लाख 70 हजार लोगों को मुसीबत से निकालने वाले इतने बड़े रेस्क्यु ऑपरेशन के दौरान असल में कोई  हीरो न रहा हो  ऐसा नहीं हो सकता। जरुरी नहीं कि वो रंजीत कात्याल जैसा कोई बिजनेसमेन हो या कोहली जैसा कोई सरकारी बाबू। लेकिन कोई न कोई इन जैसा जरूर रहा होगा जिसने बिना किसी सम्मान या पहचान की चाह के अपनी लायकात, पद या सामर्थ्य का उपयोग सेवा, समर्पण और हालातों से निपटने में किया होगा। 59 दिन तक 500 से ज्यादा फ्लाइट्स से लोगों के निकालने वाले इस मिशन में उन पायलट्स, एयर कमांडोस और उन फ्लाइट्स में सवार क्रू मेंबर की भूमिका को क्या कम कर आंका जा सकता है जो उन मुश्किल हालातों के बावजूद इस रेस्क्यु ऑपरेशन में शरीक़़ हुए थे। वास्तव में दूसरों के लिये कुछ कर गुजरने के भाव रखने वाले, ऐसे लोगों की वजह से ही ये दुनिया रहने लायक है।

निर्देशक राजा कृष्ण मोहन इस फिल्म के बाद ख्यात फिल्मकारों की श्रेणी में शुमार हो जायेंगे। इससे पहले  'बस यूं ही' और 'बारह आना' जैसी दो फिल्में ही उन्होंने बनाई है। लेकिन इस फिल्म के जरिये निर्माता निखिल आडवाणी और सह निर्माता अक्षय कुमार ने उन पर विश्वास जताकर अद्बुत काम किया है। फिल्म में कहीं भी बॉलीवुडनुमा अतिरेक नहीं है...न अनावश्यक संवाद ठुंसे गये हैं न हीं एक्शन दृश्य। ऐसी कहानियों में गीत-संगीत की जरुरत नहीं होती जैसा हमने 'बेबी' फिल्म में देखा था लेकिन इस फिल्म में गानों का प्रयोग कहीं भी फिल्म की गति को बाधा नहीं पहुंचाता और वे पार्श्व में घटना को आगे बढ़ाते ही प्रतीत होते हैं। युद्ध के दृश्यों को काफी जीवंतता के साथ फिल्माया गया है। अपना वतन, अपनी जमीं और अपने लोगों के बीच रहने का सुख क्या होता है इस महसूसियत को प्रस्तुत करने में निर्देशक ने स्क्रीन के हर हिस्से का इस्तेमाल किया है। गोया कि सिनेमेटोग्राफर ने स्क्रीनप्ले के अनुरूप पात्रों के ज़ेहन में उतरकर निर्देशकीय उद्देश्यों को परदे पर उतारा है। 

वहीं यदि अभिनय की बात की जाये तो ये अक्षय कुमार के सर्वोत्तम अभिनय में से एक है और इसे वे अपने करियर की श्रेष्ठ फिल्मों में सबसे ऊपर रखना पसंद करेंगे। अक्षय ने अपने करियर में बिना किसी बड़े बैनर से जुड़कर जो नाम स्थापित किया है वो काबिले तारीफ है। नये और कम प्रतिष्ठित फिल्मकारों के साथ काम करने की परंपरा को अक्षय ने 'एयरलिफ्ट' में भी निभाया है। यही वजह है कि पचास से भी कम सफलता प्रतिशत के बावजूद अक्षय इतने सालों बाद भी आज खुद को इंडस्ट्री में बनाये हुए हैं। अक्षय के अलावा अौर जो दूसरे कलाकार हैं उन्होंने भी अपने-अपने हिस्से के किरदार को पूरी ईमानदारी से अभिनीत किया है। बाकी कथानक को प्रगट करना इस पोस्ट का उद्देश्य नहीं है उसके लिये तो फिल्म को ही देखा जाना चाहिये।

लिजलिजी भावुकता, फूहड़ हास्य और अतार्किक अतिरेकपूर्ण एक्शन फिल्मी कचरे के परे संदेशपरक तथा संवेदनशील सिनेमा के शौकीन लोगों के लिये 'एयरलिफ्ट' एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। जिसे सिर्फ देखे नहीं, पढ़े जाने की आवश्यकता है।

Sunday, April 20, 2014

अपने तरानों से दिल के फसानों का सौदा करता गीतकार : इरशाद क़ामिल

संगीत के प्रति अपने बेइंतहा प्रेम के चलते अनायास ही मुझे किसी गाने के बोल और उसकी धुन पर पोस्टमार्टम करने का शगल है। लेकिन इन दिनों आ रहे योयो हनी सिंह टाइप गानों पर मुझे काफी खुन्नस आती है जो गाने संगीत की दैवीयता को कमज़ोर कर उन्हें बड़ा ही जमीनी स्तर का बना देते हैं। ऐसे में एक गीतकार अपने गीतों में पिरोये अल्फाज़ों के ज़रिये बेहद संजीदा अर्थों की साधना करता प्रतीत होता है और उसके वही गीत दिल की हरकतों को बखूब अपने शब्दों में प्रस्तुत करते हैं। ये गीतकार है इरशाद कामिल, जो मुझे शैलेन्द्र, साहिर, प्रदीप, गुलज़ार और जावेद अख्तर जैसे गीतकारों की पीढ़ी का ही जान पड़ता है और अपने गीतों के ज़रिये उसी परंपरा का निर्वहन करता नज़र आता है।

तकरीबन 50 फ़िल्मों में 200 से भी ज्यादा गाने लिख चुका ये गीतकार, अपने अधिकतम गीतों में खुदा को तलाशते उसी बंजारेपन को बयां करता है जो इंसान की दार्शनिक परत का स्पर्श करता है और इन गीतों मेंसमाये प्रेम के कोमल जज़्बात भी खुदा की बंदगी करते से ही नज़र आते हैं। कहीं समाजों और रिवाज़ो के लिये इन गीतों में रोष है तो कहीं खुदा से ही प्रेम पर लगी बंदिशों के लिये जंग है..और इरशाद खुदा को ललकारते हुए लव आजकल में लिखते भी हैं "मांगा जो मेरा है, जाता क्या तेरा है..मैंने कौन सी तुझ से जन्नत मांग ली..कैसा खुदा है तू, बस नाम का है तू..रब्बा जो तेरी इतनी सी भी न चली"। ये वही गाना है जिसके लिये इरशाद को पहली मर्तबा फ़िल्मफेयर मिला था।

इश्क की पेचीदगियों को बताते इरशाद के गीत बरबस ही वाह कहने पर मजबूर कर देते हैं। चाहे ज़िक्र मेरे ब्रदर की दुल्हन फिल्म के गीत इश्क-रिस्क के उन बोलों की हो जहां वे "इसका उसका न इसका है, जाने कितना है किसका है..कैसी भाषा में भाषा में है लिखा" गीत में इश्क की उलझनें दिखाते हैं या फिर स्पेशल छब्बीस के गीत "सफ़र दो कदम है, जिसे इश्क लोग कहते..मगर इश्क वाले बस सफ़र में ही रहते..ख़त्म होता न उम्रभर इश्क का रास्ता, है बेहिसाब सा..जो तू न हो तो पानी-पानी नैना" की बात करें, ये सभी इ्श्क की उन सार्वभौमिक कठनाईयों को बयां करती है जो सदियों से इश्क के सामने आ रही हैं।

इसी तरह आशिकी टू फ़िल्म के गीत प्रेम में समाहित समर्पण के भाव को बयां करने की कोशिश करते हैं जिनमें इरशाद "मुझको न जितना मुझ पे उतना इस दिल को तुझपे, होने लगा ऐतबार..पूछुंगी न तुझको कभी न, चाहूँ मैं या न" लिखते हैं और कॉकटेल फिल्म के गीत तुम्ही हो बंधु के बोल "जब यार गले ले सार मेरी, मुझे क्या परवाह इस दुनिया की..तू जीत मेरी जग हार मेरी, मैं हूं ही नहीं इस दुनिया की" में अपना सर्वस्व साथी को सौंपने की बात प्रेमिका कहती नज़र आती है। खट्टा-मीठा का सजदा गाना भी कुछ ऐसे ही सुरों को पुख्ता करता नज़र आता है जहाँ "जाने तू सारा वो, दिल में जो मेरे हो..पढ़ले तू आंखे हर दफ़ा" कहकर अपने प्रेमी के सामने परदेदारी ख़त्म करने की बात कही गई है।

कई मर्तबा कामिल के गीत मोहब्बत के सामने आने वाले सारे दायरों पर भी जमाने से युद्ध करने की घोषणा करते है और हर बंधन से लोहा लेने के लिये संकल्पित नज़र आते हैं। रॉकस्टार का सड्डा हक एक ऐसा ही गीत है "मन बोले कि रस्में जीने का हरजाना, दुनिया-दुश्मन सब बेगाना..इन्हें आग लगाना मन बोले, मन से जीना या मरजाना" और इसी गाने का अगला अंतरा "समाजों से-रिवाज़ों से क्युं काटे मुझे, क्युं बांटे मुझे इस तरह" कहकर ईकोफ्रेंडली नेचर के रक्षक जमाने से कई प्रश्न करता है। रॉकस्टार की तरह इम्तियाज़ अली की एक अन्य फ़िल्म सोचा न था का गीत ओ यारा रब रुस जाने दे के बोल "जमाने को छोड़ दें, रिवाज़ों को तोड़ दे..टूटे न सपना कभी" में भी इसी कथ्य को मजबूत करते हैं।

इरशाद अपने गीतों में दूरियो को प्रेम की बंदिश नहीं मानते और उनकी दूरियां भी नजदीकियों से नजदीक होती है जो हमें कई गानों में दिखती है। जब वी मेट का "आँखों में आंखे तेरी, बाहों में बाहें तेरी..मेरा न मुझमें कुछ रहा, हुआ क्या" गीत हो या "तुम हो..पास मेरे, साथ मेरे तुम यूं..जितना महसूस करूं तुमको उतना ही पा भी लूं" हो गीत हो। इसके साथ ही जोड़ी ब्रेकर्स का गीत भी याद करना ज़रुरी है जहाँ "लफ़्जों से था जो परे, खालीपन को जो भरे..कुछ तो था तेरे मेरे दरमियां" कहकर इरशाद नजदीकियों से ज्यादा अहसास को प्रेम के लिये ज़रूरी होने का दावा करते हैं।

इसी तरह इरशाद के गीतों में प्रेम के लिये पजेशिवनेस भी हम बखूब देख सकते हैं..और वो अपने हिस्से का प्यार बांटने की तमाम संभावनाओं का निषेध उन गीतों में करते हैं। वी आर फेमिली का गीत आँखों में नींदे कुछ ऐसे ही कथ्य को कहता है "बांटू न किसी से साया भी तेरा, काजल जहाँ वहाँ तेरा बसेरा..आये जाये चाहे सूरज जहाँ में, तेरे बिना मेरा हो न सवेरा..तेरे कांधे पे ही लगे, जन्नत जैसी कोई जगह"। आक्रोश फ़िल्म का 'सौदा' गीत भी कई वादे करता है जहां प्रेमी कहता है "दिल कहे तेरे मैं होठों से, बातों को चुपके से लूं उठा..उस जगह धीरे से होले से, गीतों को अपने मैं दूं बिठा...सौदा तरानों का दिल के फसानों का है, लेले तराने मेरे होठों पे धर भी ले"। वहीं प्रेम के लिये पागलपन को बयां करता और मोहब्बत के चलते खुद को बेसुध बताने वाला अजब प्रेम की गज़ब कहानी फिल्म का 'आ जाओ मेरी तमन्ना' गीत "हर घड़ी लग रही तेरी कमी, ले चली किस गली ये ज़िंदगी..है पता लापता हूँ प्यार में, अनकही-अनसुनी चाहत जगी" कहते हुए उसी बेसुधी को जताता है।

कामिल के प्रेम गीतों की सबसे खास बात है उनमें छुपी आध्यात्मिकता..इसके साथ ही भारतीय और सूफी दर्शन के वे तत्व, जो उन गीतों को महज़ प्रेमगीतों की परिधि से बाहर निकालते हैं। आशिकी टू का 'पिया आये न' गीत कुछ ऐसी ही बात कहता है "हर खता की होती है कोई न कोई सजा, ग़म लिखे हो किस्मत में तो मिल ही जाती वजह..अब सभी ग़म अश्कों में सिमट से गये, अब सभी आंसू पलकों से लिपट से गये...कि पिया आये न"। इसके अलावा मौसम का 'इक तू ही तू ही' गीत के बोल "तेरा शहर जो पीछे छूट रहा, कुछ अंदर-अंदर टूट रहा..हैरान हैं मेर दो नैना, ये झरना कहां से फूट रहा" दर्शनशास्त्र की ऐसी ही ऊंचाई को छूता दिखता है। वहीं इक अन्य बेहतरीन गीत "बहता है मन कहीं, कहाँ जानता नहीं, कोई रोकले यहीं..भागे रे मन कहीं, आगे रे मन चला, जाने किधर जानूं न" भी मन की परतों को टटोलने का प्रयास करता है।

इरशाद खुद पे विश्वास जगाने वाले गीत भी शानदार अल्फाज़ों में बयां करते हैं..लव आजकल फ़िल्म में ब्रेकअप की परिस्थिति को भी उन्होंने उल्लासमय लफ्ज़ों में प्रस्तुत किया है "चोर-बजारी दो नैनों की पहले थी आदत जो हट गई, प्यार की जो तेरी-मेरी उम्र आई थी वो घट गई..दुनिया की तो फिक्र कहां थी, तेरी भी अब चिंता घट गई"। मेरे ब्रदर की दुल्हन फ़िल्म का गीत धुनकी के अंतरे मे कामिल लिखते हैं "लादला दिल को हर बशर, इश्क दा चंगा है असर; करले खुद से ही प्यार बंदेया..है जहाँ की तुझको ख़बर, खुद से है पर तू बेखबर; ले ले अपनी बिसर बंदेया..गिरा दीवारें, लगा ललकारे" गीत की ये पंक्तियां खुद में एक अलग ही जोश का संचार करती हैं...इसी तरह हालिया रिलीज़ हाईवे का 'पटाखा गुड्डी' गीत भी सारी फिक्र रब के हवाले छोड़ने की बात करता है "तू तो पाक राब का बनका बच्चा राज दुलारा तू ही, मालिक ने जो चिंता दी तो दूर करेगा वोही, नाम अली का लेके तूतो नाच ले गली-गली" और ऐसे ही रॉकस्टार के 'नादान परिंदे' में "काटे चाहे कितना, परों से हवाओं को..खुद से न बच पायेगा तू" कहकर नादान परिंदे को वापस अपने घर लौटने की गुहार लगाई गई है। ये सारे गीत खुद पे विश्वास करने की अलख जगाने का काम करते हैं।

इन सब गीतों के वैसे तो बहुत कुछ इरशाद कामिल कह देते हैं पर फिर भी कुछ जज़्बात अनकहे ही रह जाते हैं और उन्हें कोई अल्फाज़ नहीं मिलते..और इस बात को उनका एक और श्रेष्ठतम गीत कहता है कि "जो भी मैं कहना चाहूं, बरबाद करें अल्फाज़ मेरे"। इरशाद के गीतों में हिन्दी, इंग्लिश, ऊर्दु और पंजाबी का शानदार कॉकटेल प्रस्तुत करते हैं लेकिन उन जुगलबंदियों के चलते कभी अर्थ से समझौता नहीं करते, जैसा कि आज कई दूसरे गीतकार कर रहे हैं। बहरहाल, मौजूदा दौर के गीतों में अर्थों की दुर्दशा देख कई मर्तबा आधुनिक गीतों से मोहभंग हो जाता है पर कामिल और ऐसे ही कुछ इक्का-दुक्का गीतकार वापस हिन्दी गीतों के प्रति रुचि बनाये रखते हैं..और संगीत महज कर्णस्पर्शी न रहकर आज भी हृदयस्पर्शी होने का अहसास कराता रहता है..क्योंकि जो दिल के तारों को झंकृत न करें ऐसा हर तराना और हर झंकार महज कोलाहल ही है, उसे संगीत कहकर आदर देना मेरी वैयक्तिक आचार संहिताओं के विरुद्ध है..........

Saturday, January 18, 2014

गपोढ़ अल्फाज़ और अधेड़ अहसासों की 'डेढ़ इश्किया'

'हर किसी को आज़ादी पसंद होती है लेकिन उस आज़ादी के लिये किसी न किसी को तो कीमत ज़रूर चुकानी होती है'...लगभग ऐसे ही किसी गंतव्य तक पहुंचने का प्रयास करती अभिषेक चौबे निर्देशित और विशाल भारद्वाज निर्मित 'डेढ़ इश्कियां' देखी। हालांकि विशाल भारद्वाज की छाया इस फ़िल्म पे पड़ी हुई है इसलिये किसी सार्वभौमिक कथ्य तक पहुंचने की आशा आप नहीं कर सकते...क्योंकि मासुमियत और गहन बौद्धिकता के बीच फंसे इस फ़िल्मकार के कथानक को देख लोग इसे अपने-अपने ढंग से विश्लेषित करते हैं..और विश्लेषण के पश्चात सबके अपने-अपने ही निष्कर्ष होते हैं। वैसे ये विशाल से ज्यादा अभिषेक की फ़िल्म हैं इसलिये आप मनोरंजन और अर्थों की कुछ नई परतें इस सिनेमाई कलेवर से उखाड़ सकते हैं। मनोरंजन के लिये इस फ़िल्म की गपोढ़ संवादगी और अर्थों की खोज के लिये इसके अधेड़ पड़ चुके जज्बातों की उधेड़बुन की जा सकती है..कुछ इन्हीं वजहों से ये सिनेमा के पारंपरिक मनोरंजन से दूर हो ऑफबीट फ़िल्म होने का दंभ भर सकती है...किंतु फिल्म का ट्रीटमेंट, सिनेमेटोग्राफी और कुछ ऐसी ही दूसरी चीज़ें इसे मुख्यधारा के सिनेमा में धकेल देती हैं।

इंसान के रुहानी जज़्बातों की विविध परतों और तकरीबन बूढ़े हो चुके अहसासों को..समाज की रिवाज़ी बंदिशों से आज़ाद कर एक नया आसमान देने की कोशिश अभिषेक चौबे ने की हैं...यूं तो फ़िल्म का मनोरंजन पक्ष ज्यादा मुखर है इसलिय फ़िल्म के कुछ कंट्रोवर्सियल मायने चुप्पी साधे रहते हैं। खासतौर से वर्तमान के इस दौर में जहाँ देश की एक कोर्ट द्वारा समलैंगिकता को बड़ा अपराध बताया गया है, धारा-377 पर राजनीतिक गहमागहमी ज़ारी है.. उसी दौर में ये फ़िल्म बड़ी खामोशी से उन रिश्तों की पैरवी करती नज़र आती है। निर्देशक ने फिल्म में बेहद संवेदनशील दृश्यों को इस चतुराई से फिल्माया है कि अंत तक उस रिश्ते के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता...पारा ज़ान(माधुरी) और मुनिया(हुमा कुरैशी) के आपसी संबंधों को जिस असमंजसपूर्ण स्थिति के साथ फिल्मकार ने प्रस्तुत किया है वो भारतीय समाज के अंदर बहुत बड़े विवाद की वजह माने जाते हैं किंतु फिल्मकार के प्रस्तुतिकरण का तरीका इतना ज्यादा डिप्लोमेटिक है कि विवाद करने की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती। जबकि इसी रिश्ते के बिंदास प्रस्तुतिकरण के चलते मीरा नायर की 'फायर' विवादास्पद बन जाती है। 

पारा और मुनिया के रिश्ते की पृष्ठभूमि निर्मित करने की जो वजह फिल्मकार ने दी है उसके चलते दर्शकों को भी इस रिश्ते के साथ हमदर्दी हो जाती है। इस रिश्ते की वजह भी पारा के शौहर का समलैंगिक होना बताया गया है...और अपने शौहर की इन अय्याशियों के चलते ही पारा की ज़िंदगी में तन्हाई है और पारा ज़ान को उस तन्हाई को दूर करने का ज़रिया किसी मर्द के नहीं बल्कि एक औरत के प्रेम में ही नज़र आता है। अपने पति की अय्याशियां और उनके समलैंगिक संबंध पारा के मन में सारे मर्द समाज के लिये ही नफ़रत का बीज़ बो देते हैं और पुरुष की इन स्वछंद हरकतों के खिलाफ ही उसकी जंग है..उसका बदला किसी मर्द को ठगने से पूरा होगा जिससे वो अपने स्वछंद आनंद के पैमाने निर्धारित कर सकें, उस आनंद को जी सके।

एक खास बौद्धिक वर्ग को  ये रास्ता महिलासशक्तिकरण के दरबाजे पे दस्तक की तरह नज़र आयेगा..जहाँ ये स्त्री द्वारा अपनी आजादी और आनंद के लिये किये गये संघर्ष का ही एक रूप माना जायेगा...और इसे वे स्त्री का तिरियाचरित्र न कह 'Survival of Fittest' कहना ज्यादा पसंद करेंगे। एक स्त्री अपने शरीर को मर्द को सौंपते वक्त भी अपना ही उल्लु सीधा कर रही है और संभोग उपरांत उस मर्द को भी ये संशय बना हुआ है कि उसने स्त्री का इस्तेमाल किया है या वो खुद स्त्री द्वारा इस्तेमाल किया गया है...अबसे पहले औरत की इज़्जत को दैवीय रूप देकर हमेशा उसे पुरुष के समक्ष दबाने की कोशिश की गई है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि औरत, चाहकर भी पुरुष की आबरु नहीं लूट सकती किंतु पुरुष ऐसा कर सकता है।

एक औरत द्वारा अपने भ्रम का आभामण्डल रचा जाता है और उस आभामण्डल की चमक के चलते ही कई नवाब अपने हुनर की पेशगी उसे पाने के लिये करते हैं...एक अधेड़, बीमार और अवसाद ग्रस्त महिला अपनी चालाकियों से दिग्गज मर्दों को बेवकूफ बनाती है..और उन अधेड़ मर्दों के बुढ़या चुके अहसासों को भी जवान बनाती है, उनमें नये अरमान जगाती है। इन तमाम कारगुज़ारियों के दरमियां परदे पे हमें मर्दों की विशाल महफिल के बीच सिर्फ एक औरत ही इंटेलीजेंट नज़र आती है अन्यथा हिन्दी सिनेमा का सुर तो हमेशा से औरतों को 'क्यूट' कह कर उनकी बेवकूफी की बिक्री करने वाला ही रहा है। वास्तव में पुरुष अपनी कमतरी को छुपाने के लिये ही साहित्य-सिनेमा और समाज में उन रिवाज़ों को जन्म देता है जिससे स्त्री अबला नज़र आती है अन्यथा प्राकृतिक तौर पे स्त्री, परुष की तुलना में अधिक मजबूत और हुनरमंद रही है। 'डेढ़ इश्किया' कहीं-कहीं नारी की उस सशक्तता का ऐलान करते नज़र आती है। एक अन्य अहम् बात जो इस सिनेमा में देखी जा सकती है कि फ़िल्म में तकरीबन तमाम किरदार अधेड़ उम्र के हैं लेकिन उनमें मोहब्बत के जज़्बात और इश्क पाने की हसरत अब भी जवां बनी हुई है..इन अहसासों की लुका-छिपी के बीच ही आला दर्जे की मूर्खता पैदा होती है और यही मूर्खता दिल को बच्चा बनाये रखती है। जिस बात को इस फ़िल्म के पिछले संस्करण में एक गीत के ज़रिये दर्शाया गया था।

बहरहाल, बेहतरीन अभिनय, शानदार संवाद एवं शायरियां, उम्दा निर्देशन, बढ़िया सिनेमेटोग्राफी और नवाबी कल्चर के दीदार करने की आरजू है तो डेढ़ इश्कियां एक अच्छा विकल्प है। हालांकि इस फ़िल्म की टारगेट ऑडियंस बहुत ज्यादा युनिवर्सल नहीं हैं पर आप थोड़ा भी शायराना और आशिकाना मिज़ाज रखते हैं तो 'डेढ़ इश्कियां' आपको निराश नहीं करेगी..और जैसा कि बताया कि ये विशाल भारद्वाज के बैनर तले बनी फिल्म है तो विशाल की फ़िल्मों में आपको ऐसी एक-आध चीज़ मिल ही जाती है जो आपके पैसे वसूल करवा देती है। लेकिन साथ ही ये भी याद रखें कि चुंकि ये भारद्वाज बैनर की फ़िल्म हैं तो आप बिना किसी निष्कर्ष के ही सिनेमाघरों से बाहर आयेंगे...क्योंकि दर्शकों को निश्कर्ष तक पहुंचाने से विशाल की यूएसपी प्रभावित होती है और अपनी यूनिकनेस के साथ समझौता करना विशाल को कतई पसंद नहीं आएगा........

Tuesday, November 12, 2013

सिनेमा के व्यवसायिक दलदल में चंद सार्थकता के कमल

सिनेमाघरों में चैन्नई एक्सप्रेस जैसी बेतुकी और ग्रांड मस्ती जैसी फूहड़ फ़िल्म की व्यवसायिक कामयाबी के बाद...इन दिनों क्रिश-3 जैसी औसत सुपरहीरोनुमा फिल्म जमकर बॉक्स ऑफिस पे पैसा कूट रही है..इसी फेहरिस्त में धूम-3 टाइप मसाला फिल्म प्रदर्शन के इंतजार में है और मौजूदा लहर को देखकर कयास लगाना मुश्किल नहीं कि ये भी सौ करोड़ के मायावी क्लब में शामिल होने वाली फिल्म साबित होगी...जिस सौ करोड़ के आंकड़े को ही इन दिनों सफलता और सार्थकता का पर्याय माना जाने लगा है। प्रायः हर फिल्मकार इसी सौ करोड़ी जंजाल को आदर्श मान सिनेमा निर्माण कर रहा है।

दरअसल ये आज या कल का ही जंतर नहीं है इस सौ करोड़ी सन्निपात से हमारे फिल्मकार लगभग पिछले एक दशक से ग्रसित हैं और इस व्यवसायिक चकाचौंध ने उनसे सार्थकता के आग्रह को छीन लिया है यही वजह है कि दिग्गज फिल्मकार अपनी समस्त समय, शक्ति और बुद्धि का प्रयोग मात्र उस मसाला मनोरंजन के निर्माण मे कर रहे हैं जो उनकी काँखों से रुपयों की सरिताएं प्रवाहित करवा सकें। इस व्यवसायिक चमक के चलते ही उन्होंने सिनेमा के जनक दादा साहेब फाल्के की वो उक्ति भी विस्मरा दी है जिसमे फाल्के साहब ने कहा था कि 'य़द्यपि सिनेमा मनोरंजन का सशक्त माध्यम है लेकिन इसका उत्तम प्रयोग समाज में ज्ञानवर्धन और जागरुकता के लिये भी किया जा सकता है'। फिल्मकारों के व्यवसायिक मोह के कारण तमाम उत्तरदायित्व की भावनाएं हासिये में फेंक दी गई हैं और भौतिकवादिता की हवस के चलते हॉलीवुड और दक्षिण भारतीय मसाला फिल्मों की नकल से भी अब कोई गुरेज़ नहीं रहा है। इन फिल्मों के पहले भी सलमान खान को सितारा बनाने वाली दबंग, वांटेड, बॉडीगार्ड जैसी फिल्में और राउडी राठौर, गोलमाल रिटर्न्स, सिंघम, हाउसफुल टाइप फिल्में इसी व्यवसायिकता के दलदल को गहरा बना चुकी हैं। लेकिन इस सबके बावजूद गुजश्ता दशक को हिन्दी सिनेमा का स्वर्णिम दशक माना जा रहा है...इसका कारण है व्यवसायिकता के दलदल में खिले हुए चंद सार्थक एवं विविध मुद्दों पे बनी फिल्मों के खुशबुदार कमल, जो हिन्दी सिनेमा की गरिमा को अंतर्राष्ट्रीय मंच पे जिंदा रखे हुए हैं।

इस समझने के लिये ज्यादा पीछे जाने की ज़रूरत नहीं है इरफान ख़ान स्टारर लंचबॉक्स और राजकुमार यादव अभिनीत शाहिद, उन फिल्मों के उदाहरण हैं जो हिन्दी सिनेमा की सार्थकता को बयां करती हैं। लेकिन अफसोस होता है जब दबंग और चैन्नई एक्सप्रेस जैसी फिल्में हाउसफुल जाती हैं और इन सार्थक फिल्मों पे सिनेमाघरों में सीटें खाली पड़ी रहती हैं। जनता की ये प्रवृत्ति इस बात को बयाँ करती है कि हमारा रवैया ज़बरदस्त ढंग से बेहुदा तमाशे पे ताली बजाने वाला ही बना हुआ है भले ही हम कितनी ही बौद्धिकता की जुगाली लोगों के सामने करते नज़र आये। अपने मनोरंजन चुनने के लिये हम हमेशा अतार्किकता, सतही भावनाओं और अश्लीलता को ही आदर्श मानकर चलते हैं। ऐसा नहीं है कि मुख्यधारा के परे हास्यात्मक मनोरंजन देखने को नहीं मिलता बल्कि कई ऑफबीट फिल्में बेहद इंटेलीजेंस पूर्ण सिचुएशनल कॉमेडी एवं आला दर्जे के विट (हास्य जो संवादों से पैदा होता है) के माध्यम से उत्तमोत्तम हास्य पैदा करती हैं। इन मनोरंजक फिल्मों की कॉमेडी किसी अतार्किक, बेढंगी उछलकूदों में आधारित नहीं बल्कि हमारे आसपास की ज़िंदगी से जुड़ी हुई प्रतीत होती है। इसका बखूब दर्शन हमनें विकी डोनर, खोसला का घोसला, भेजा फ्राय, चलो दिल्ली, दो दूनी चार जैसी फिल्मों में किया है।


इन हास्यात्मक फिल्मों के अलावा कई ऐसी भी फिल्में रही हैं जो संवेदनाओं एवं वैचारिकता की चासनी में इस कदर डूबी होती है कि उनका आस्वादन करते वक्त अपने ज़हन को छुईमुई सा बना लेना होता है..मानो रुह का थोड़ा भी कड़क मिज़ाज इनके संपूर्ण जायके को मटियामेट करके रख देगा। इकबाल, डोर, उड़ान, शिप ऑफ थीसिस, दसविदानिया और मि.एंड मिसेज अय्यर कुछ इसी श्रेणी की फिल्में हैं। आतंकवाद, गरीबी, बेवशी, बेरोजगारी, सांप्रदायिकता जैसे मुद्दों पर भी सिनेमा की इस दूसरी पंक्ति की धारा ने शानदार इंटेलेक्चुअल मनोरंजन पैदा किया है। ए वेडनेसडे, आमिर, मुंबई मेरी जान, फिराक़, ये मेरा इंडिया, द नेमसेक, पीपली लाइव, धर्म और फंस गए रे ओबामा जैसी कुछ फिल्में हिन्दी सिनेमा को सैल्युट मारने को मजबूर करती हैं। विविध विषयों पर बनी इन तमाम फिल्मों को देख ये यकीन करना मुश्किल होता है कि सामान्य से दिखने वाले इन विषयों पर इस कद़र मनोरंजन गढ़ा जा सकता है। पिछले वर्ष प्रदर्शित होने वाली ओह मॉय गॉड और इंग्लिश-विंग्लिश का ज़िक्र करना भी इस कड़ी में बेहद आवश्यक है।

इन सरल-सहज विषयों के अलावा कुछ फिल्में ऐसी भी हैं जो ग्रे शेड या कालीन के नीचे के स्याह पक्ष को उजागर करती नज़र आती है देखने में बेहद उलझी हुई और जटिल फिल्में मालुम होती हैं इनका प्रस्तुतिकरण भी अतिरेकपूर्ण जान पड़ता है..लेकिन इस सबके बावजूद ये व्यवसायिक मसाला फिल्मों से पूर्णतः भिन्न प्रकृति की होती हैं और इन फिल्मों पर भी व्यवसायिकता के परे कलापक्ष ही मजबूती से जाहिर होता है। अनुराग कश्यप, दिबाकर बनर्जी, मणिरत्नम इसी कोटि की फ़िल्में बनाने वाले फिल्मकार रहे हैं और ब्लैक फ्राइडे, गैंग्स ऑफ वासेपुर, अब तक छप्पन, मद्रास कैफे, शंघाई, हजारों ख्वाहिशें ऐसी, मैट्रो, गुलाल, कहानी जैसी फिल्में ऑफबीट सिनेमा के इस वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं।

बहरहाल, इस व्यवसायिकता के दलदल में यदा-कदा नज़र आने वाले ये सार्थकता के कमल राहत पहुंचाते हैं और कमसकम मेरे सिनेमाई प्रेम को जीवित रखे हुए हैं अन्यथा चैन्नई एक्सप्रेस, ग्रांडमस्ती, दबंग टाइप फिल्में कई बार मेरा सिनेमा से मोहभंग कर चुकी हैं। खुशी की बात ये भी है कि इस तरह नवीन व छुपे हुए विषयों पे प्रायः नई उम्र के फिल्मकार फिल्में बना रहे हैं और स्थापित फिल्मकारों को मूंह चिढ़ा रहे हैं जो बॉक्स ऑफिस का प्रयोग धन कूटने के लिये ही करते हैं। फिल्मों के साथ-साथ अब फिल्मकारों में भी विविधता है अन्यथा पहले हम ऑफबीट फिल्मों के लिये महज श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, मणिकौल जैसे निर्देशकों पर ही आश्रित थे। ऊपर वर्णित इन फिल्मों ने ही हिन्दी सिनेमा को विश्व मंच पर अगले पायदान पे पहुंचा दिया है...हालांकि कुछ मुख्यधारा की फिल्में भी मनोरंजन के साथ सार्थक प्रयास कर रही है जिनमें थ्री इडियट्स, जब वी मेट, लगे रहो मुन्नाभाई, लगान, रंग दे बसंती, भाग मिल्खा भाग प्रमुख हैं किंतु उनकी संख्या भी बहुत कम है। मुख्यधारा की सार्थक फिल्मों के परे ऑफबीट सार्थक फिल्मों का ज़िक्र इसलिये भी ज़रूरी हो जाता है कि अक्सर ये फिल्में अनदेखी ही रह जाती हैं जबकि मैनस्ट्रीम सिनेमा को तो बहुलता में दर्शकवर्ग मिल ही जाता है।

खैर, आज अपने कंप्यूटर में एक बेहद छोटे बैनर की ऐसी ही गुमनाम फिल्म सड्डा अड्डा देखने के कारण..अनायास ही मेरे मन में इन सार्थक मगर गुमनाम फिल्मों के प्रति कुछ लिखने का खयाल आया..जिस वजह से ये लेख लिखने की प्रेरणा मिली। एक बात ज़रूर है कि इस तरह के सिनेमा से आने वाली महक से व्यवसायिक प्रयासो पे आने वाली खुन्नस कुछ कम जरुर होती है.....